अब तक केवल निजी और सरकारी कर्मचारियों का पर्फोमेंस के आधार पर हर साल अप्रेजल होता है। लेकिन जल्द ही इसकी जद में देश भर के सभी न्यायालयों में कार्यरत न्यायाधीशों को भी लाया जा सकता है। नीति आयोग ने एक प्रस्ताव तैयार किया है, जिस पर लोकसभा चुनाव खत्म हो जाने और नई सरकार के पदभार ग्रहण करने के बाद विचार किया जाएगा।
जजों को मिलेगी रैंकिंग इकोनॉमिक टाइम्स की खबर के अनुसार प्रस्ताव के मुताबिक देश भर में कार्यरत 17 हजार न्यायाधीशों को उनके कार्य करने के आधार पर रैंकिंग भी मिलेगी। ऐसा इसलिए ताकि आम जनता को भी पूरी तरह से जज के कार्य के बारे में जानकारी मिल सके। इसलिए बनाया प्रस्ताव ईटी के मुताबिक देश में इस वक्त 2.8 करोड़ से ज्यादा मामले विभिन्न न्यायालयों में लंबित पड़े हैं। नई नीति से इन मामलों को कम करने का प्रयास किया जाएगा। न्यायाधीशों ने किया विरोध हालांकि न्यायधीशों की तरफ से इस प्रस्ताव का भारी विरोघ भी हो रहा है। ऐसा इसलिए क्योंकि इसको सरकार की तरफ से न्यायपालिका में सीधा हस्तक्षेप माना जाएगा। फिलहाल सरकार न्यायालयों और न्यायाधीशों के लिए किसी तरह का कोई फैसला नहीं लेती है। न्यायाधीशों से जुड़े सभी फैसले सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट लेते हैं।
अखिल भारतीय न्यायाधीश संघ के अध्यक्ष और पटना हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस राजेंद्र प्रसाद ने कहा है कि न्यायाधीश या फिर न्यायालय कोई फैक्ट्री नहीं है, जिनका पर्मोफेंस तय किया जा सके।
एक अन्य पूर्व न्यायाधीश ने कहा कि न्यायाधीशों के लिए पर्फोमेंस के आधार पर रेटिंग देना एक तरह से कार्यपालिका का न्यायपालिका पर अतिक्रमण है। इससे न्यायपालिका कमजोर होगी। इन पर होगा पर्मोंफेंस अप्रेजल जिन आधारों पर न्यायाधीशों का अप्रेजल होगा उनमें एक जज के पास केसों की संख्या, प्रत्येक केस में लगने वाला समय, प्रत्येक केस की लागत, निस्तारण की संख्या और कोर्ट का बजट शामिल है। वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट बनी आधार नीति आयोग ने यह प्रस्ताव वित्त मंत्रालय की रिपोर्ट के आधार पर तैयार किया है। इस रिपोर्ट के अनुसार जिस हिसाब से देश के न्यायालयों में विचाराधीन केसों की संख्या है उसको खत्म करने में कम से कम 324 साल का वक्त लगेगा। केस होंगे ट्रांसफर प्रस्ताव के मुताबिक न्यायाधीशों के पास मौजूद केस ट्रांसफर भी होंगे। जैसे कंपनियों के केस कंपनी मामलों को देखने वाले जज और अपीलीय ट्रिब्यूनल के पास और आपराधिक केस मेट्रोपोलिटन मेजिस्ट्रेट से हटाकर क्रिमिनल ज्यूडिशियल मेजिस्ट्रेट की कोर्ट में करने का प्रस्ताव है। इतनी है न्यायाधीशों की संख्या भारत में इस वक्त निचले न्यायालयों में 16,726 न्यायाधीश कार्यरत हैं। वहीं हाईकोर्ट में 673 और सुप्रीम कोर्ट में 25 न्यायाधीश हैैं। जस्टिस प्रसाद का कहना है कि जैसे हाईकोर्ट जिला न्यायालयों के लिए मुकदमें का निस्तारण करने के लिए टारगेट देती है, वैसा टारगेट सिस्टम हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट भी अपने लिए तैयार कर सकते हैं।
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