February 3, 2019:

ये विधेयक जुलाई, 2016 में संसद में पेश किया गया था, जिसके तहत अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है।

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस की अध्यक्ष ममता बनर्जी ने शनिवार को कहा कि उनकी पार्टी नागरिकता (संशोधन) विधेयक का विरोध करेगी और केंद्र की भाजपा नीत सरकार से इस विवादित विधेयक को वापस लेने की मांग की।

वह पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के ठाकुनगर में एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा विधेयक को पारित कराने के लिए तृणमूल कांग्रेस का समर्थन मांगने वाली टिप्पणी पर प्रतिक्रिया दे रही थी।

बनर्जी ने कहा, ‘‘ केंद्र को नागरिकता विधेयक वापस लेना होगा। इसका समर्थन करने का सवाल ही पैदा नहीं होता है। हम इसका विरोध करेंगे। हम उन्हें (मोदी को) कामयाब नहीं होने देंगे।’’

मतुआ समुदाय द्वारा आयोजित एक कार्यक्रम में मोदी ने नागरिकता (संशोधन) विधेयक की तारीफ करते हुए इसे संसद में पारित कराने के लिए तृणमूल कांग्रेस का समर्थन मांगा था।

उन्होंने कहा कि विधेयक उन लोगों को न्याय और सम्मान देगा जिन्होंने धर्म आधारित जुल्म का सामना किया है।

जानें- क्या है नागरिकता संशोधन विधेयक-2016

ये विधेयक जुलाई, 2016 में संसद में पेश किया गया था, जिसके तहत अफ़ग़ानिस्तान, पाकिस्तान तथा बांग्लादेश के हिन्दू, सिख, बौद्ध, जैन, पारसी और ईसाई धर्म के मानने वाले अल्पसंख्यक समुदायों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है.

पड़ोसी देशों के मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों को इसके दायरे से बाहर रखा गया है. विधेयक में प्रावधान है कि ग़ैर-मुस्लिम समुदायों के लोग अगर भारत में छह साल गुज़ार लेते हैं तो वे आसानी से नागरिकता हासिल कर पाएंगे. पहले ये अवधि 11 साल थी.

इस मुद्दे पर अब विवाद बढ़ता दिख रहा है. भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए के घटक दल, जिनका कुछ आधार मुस्लिम मतादाताओं के बीच भी है, उनमें इसे लेकर बेचैनी है.

सवाल उठता है कि क्या चुनाव आते-आते इस मुद्दे पर एनडीए कुनबा बिखरने लगेगा? इस सवाल के जवाब में असम के वरिष्ठ पत्रकार नवा ठाकुरिया कहते हैं कि इससे भाजपा को पूर्वोत्तर में नुक़सान झेलना पड़ सकता है.

वो कहते हैं, "इस विधेयक से पूर्वोत्तर भारत के अलावा देश का अन्य हिस्सा बहुत प्रभावित नहीं होगा. हिंदी पट्टी के क्षेत्र इसके समर्थन में है. सिर्फ़ विरोध है पूर्वोत्तर के कुछ राज्यों, पश्चिम बंगाल और बिहार के कुछ हिस्सों में."

"अन्य जगहों पर अपनी मज़बूती बनाने के लिए एक राष्ट्रीय पार्टी किसी एक क्षेत्र का बलिदान कर सकती है. असम की बात की जाए तो यहां भी भाजपा को बहुत नुक़सान नहीं होगा. कुछ नुक़सान से अगर अन्य राज्यों में फ़ायदा मिलता है तो यह रणनीति बेहतर मानी जाएगी."

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