वॉयस ऑफ एक्स सर्विसमैन सोसाइटी के नेशनल कोऑर्डिनेटर बीर बहादुर सिंह का. शुक्रवार को इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के बाद एक न्यूज़ चैनल (न्यूज18 हिन्दी) से बात करते हुए उन्होंने बताया, “सैनिक पुनर्वास विभाग द्वारा 1987 में जारी हुए आदेश को नजरअंदाज किया जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने इसी संबंध में एक नोटिस जारी करते हुए सरकार से जवाब मांगा है कि जवानों को इन सुविधाओं का लाभ क्यों नहीं दिया जा रहा है.कोको पेट्रोल पम्प की सुविधा मिलेगी तो अफसर को. पब्लिक सेक्टर की कंपनियों में सुरक्षा का ठेका मिलेगा तो एक अफसर को. यहां तक की कोयले की लोडिंग और उसके ट्रांसपोर्ट का ठेका भी सेना के रिटायर्ड अफसर को ही दिया जाता है. सेना के रिटायर्ड जवान को कहीं कोई वरीयता नहीं दी जाती है.
जबकि आदेश में साफ लिखा है कि इन सुविधाओं का लाभ एक्स सर्विसमैन को दिया जाएगा. अफसर और जवान का कोई भेद नहीं रहेगा. लेकिन इसे दरकिनार करते हुए रोजगार का लाभ सिर्फ रिटायर्ड अफसरों को दिया जा रहा है. ऑयल कंपनी द्वारा जब कोको पेट्रोल पम्प आवंटित किए जाते हैं तो ये सिर्फ अफसरों को ही मिलते हैं.
इसी तरह से पब्लिक सेक्टर की कपंनियों में सुरक्षा की जिम्मेदारी अफसर की सिक्योरिटी एजेंसी को मिलती है. कोयले खान में कोयले की लोडिंग और उसके ट्रांसपोर्ट का काम भी अफसर की ट्रांसपोर्ट एजेंसी को ही मिलता है. महानिदेशक सैनिक पुनर्वास जवान की एजेंसी या ट्रांसपोर्ट कंपनी को अपने पैनल में ही नहीं रखते हैं. वो सिर्फ अफसर की कंपनी और एजेंसी को ही पैनल में रखते हैं.
जबकि सरकार का आदेश है कि राष्ट्रीय बैंक और पब्लिक सेक्टर की कंपनियां सुरक्षा गार्ड और दूसरे काम के लिए एक्स सर्विसमैन को ही ठेका देंगी. इसी भेदभाव के विरोध में हम सुप्रीम कोर्ट में गए हैं.”
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