न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968
(1968 का अधिनियम संख्यांक 51)
[5 दिसम्बर, 1968]
उच्चतम न्यायालय के या किसी उच्च न्यायालय के किसी न्यायाधीश के
कदाचार या असमर्थता के अन्वेषण और सबूत की और संसद्
द्वारा राष्ट्रपति को समावेदन उपस्थापित किए
जाने की प्रक्रिया का विनियमन करने के
लिए तथा उनसे विषयों
के लिए सम्बद्ध
अधिनियम
भारत गणराज्य के उन्नीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 कहा जा सकेगा ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) “सभापति" से राज्य सभा का सभापति अभिप्रेत है ;
(ख) “समिति" से धारा 3 के अधीन गठित समिति अभिप्रेत है ;
(ग) “न्यायाधीश" से उच्चतम न्यायालय का या किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत भारत का मुख्य न्यायाधिपति और किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधिपति भी है ;
(घ) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ङ) “अध्यक्ष" से लोक सभा का अध्यक्ष अभिप्रेत है ।
3. न्यायाधीश के सदाचार या असमर्थता का समिति द्वारा अन्वेषण-(1) यदि राष्ट्रपति को ऐसा समावेदन, जिसमें किसी न्यायाधीश के हटाए जाने की प्रार्थना हो, उपस्थापित करने के प्रस्ताव की ऐसी सूचना दी जाए जो,-
(क) लोक सभा में दी गई सूचना की दशा में, उस सदन के सौ से अन्यून सदस्यों द्वारा,
(ख) राज्य सभा में दी गई सूचना की दशा में, उस सभा के पचास से अन्यून सदस्यों द्वारा,
हस्ताक्षरित हो तो, यथास्थिति, अध्यक्ष या सभापति ऐसे व्यक्तियों से, यदि कोई हों, परामर्श करने के पश्चात् जिन्हें वह ठीक समझे और ऐसी सामग्री पर, यदि कोई हो, विचार करने के पश्चात् जो उसे उपलभ्य हो या तो प्रस्ताव को ग्रहण कर लेगा या उसे ग्रहण करने से इंकार कर देगा ।
(2) यदि उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रस्ताव ग्रहण कर लिया जाता है तो, यथास्थिति, अध्यक्ष या सभापति प्रस्ताव को लम्बित रखेगा और उन आधारों का अन्वेषण करने के लिए जिन पर न्यायाधीश के हटाए जाने की प्रार्थना की गई है, यथाशाक्य शीघ्र, एक समिति गठित करेगा जो तीन सदस्यों से मिलकर बनेगी जिनमें से-
(क) एक सदस्य उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति, और अन्य न्यायाधीशों में से चुना जाएगा :
(ख) एक सदस्य उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधिपतियों में से चुना जाएगा ; और
(ग) एक सदस्य ऐसा व्यक्ति होगा जो, यथास्थिति, अध्यक्ष या सभापति की राय में, विशिष्ट विधिवेत्ता है :
परन्तु जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रस्ताव की सूचनाएं संसद् के दोनों सदनों में एक ही दिन दी जाएं वहां कोई समिति तब तक गठित नहीं की जाएगी जब तक कि प्रस्ताव दोनों सदनों में ग्रहण न कर लिया जाए और जहां ऐसा प्रस्ताव दोनों सदनों में ग्रहण कर लिया गया है वहां समिति अध्यक्ष और सभापति द्वारा मिलकर गठित की जाएगी :
परन्तु यह और कि जहां यथापूर्वोक्त प्रस्ताव की सूचनाएं संसद् के सदनों में विभिन्न तारीखों पर दी जाएं वहां वह सूचना जो बाद में दी गई है नामंजूर हो जाएगी ।
(3) समिति न्यायाधीश के विरुद्ध उन निश्चित आरोपों की विरचना करेगी जिनके आधार पर अन्वेषण का किया जाना प्रतिस्थापित है ।
(4) ऐसे आरोप, उन आधारों के कथन सहित जिन पर हर एक ऐसा आरोप आधारित है, न्यायाधीश को संसूचित किए जाएंगे और उसे उतने समय के भीतर जो कि समिति इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, प्रतिवाद का लिखित कथन उपस्थापित करने का युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा ।
(5) जहां यह अभिकथित किया जाए कि किसी शारीरिक या मानसिक असमर्थता के कारण न्यायाधीश अपने पद के कर्तव्यों का दक्षतापूर्वक पालन नहीं कर सकता और उस अधिकथन से इंकार किया जाए ; वहां समिति, न्यायाधीश की, ऐसे चिकित्सीय बोर्ड द्वारा जो इस प्रयोजन के लिए, यथास्थिति, अध्यक्ष या सभापति द्वारा, या जहां कि समिति अध्यक्ष और सभापति द्वारा मिलकर गठित की जाती है वहां इस प्रयोजन से उन दोनों के द्वारा, नियुक्त किया जाए, स्वास्थ्य परीक्षा की व्यवस्था कर सकेगी और न्यायाधीश उतने समय के भीतर जो समिति द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसी स्वास्थ्य परीक्षा के लिए अपने को समर्पित करेगा ।
(6) चिकित्सीय बोर्ड न्यायाधीश की ऐसी स्वास्थ्य परीक्षा करेगा जो आवश्यक समझी जाए और समिति को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा जिसमें यह कथित होगा कि क्या असमर्थता ऐसी है जिसने न्यायाधीश को पद पर बने रहने के लिए अनुपयुक्त बना दिया है ।
(7) यदि न्यायाधीश, चिकित्सीय बोर्ड द्वारा आवश्यक समझी गई स्वास्थ्य परीक्षा कराने से इंकार कर देता है तो, बोर्ड समिति को एक रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा जिसमें उस परीक्षा का कथन होगा जिसको कराने से न्यायाधीश ने इंकार कर दिया है, और समिति, ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर, उपधारणा कर सकेगी कि न्यायाधीश में ऐसी शारीरिक या मानसिक असमर्थता है जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रस्ताव में अभिकथित की गई है ।
(8) समिति, न्यायाधीश के लिखित कथन और स्वास्थ्य-रिपोर्ट पर, यदि कोई हो, विचार करने के पश्चात् उपधारा (3) के अधीन विरचित आरोपों को संशोधित कर सकेगी, और ऐसी दशा में न्यायाधीश को प्रतिवाद का नया लिखित कथन उपस्थापित करने के लिए युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा ।
(9) यदि केन्द्रीय सरकार से, यथास्थिति, अध्यक्ष या सभापति या दोनों यह अपेक्षा करें तो, वह न्यायाधीश के विरुद्ध मामला संचालित करने के लिए एक अधिवक्ता नियुक्त कर सकेगी ।
4. समिति की रिपोर्ट-(1) ऐसे किन्हीं नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, समिति को अन्वेषण करने के लिए अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करने की शक्ति होगी और वह, न्यायाधीश को, साक्षियों की प्रतिपरीक्षा करने, साक्ष्य देने और अपने प्रतिवाद में सुनवाई के लिए युक्तियुक्त अवसर देगी ।
(2) अन्वेषण की समाप्ति पर, समिति अपनी रिपोर्ट, यथास्थिति, अध्यक्ष या सभापति को या जहां कि समिति अध्यक्ष और सभापति द्वारा मिलकर गठित की गई है, वहां उन दोनों को, देगी जिसमें पूरे मामले पर ऐसे विचार व्यक्त करते हुए जिन्हें वह ठीक समझता है हर एक आरोप पर अलग-अलग उसके निष्कर्ष कथित होंगे ।
(3) अध्यक्ष या सभापति, या जहां कि समिति अध्यक्ष और सभापति द्वारा मिलकर गठित की गई है वहां वह दोनों, उपधारा (2) के अधीन प्रस्तुत की गई रिपोर्ट को, यथाशक्य शीघ्र, क्रमशः लोक सभा और राज्य सभा के समक्ष रखवाएंगे ।
5. समिति की शक्तियां-इस अधिनियम के अधीन कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए समिति को निम्नलिखित विषयों के बारे में, अर्थात् :-
(क) किसी व्यक्ति को समन करने और उसको हाजिर कराने तथा उसे शपथ पर परीक्षित करने के बारे में ;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करने के बारे में ;
(ग) शपथ पर साक्ष्य प्राप्त करने के बारे में ;
(घ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालने के बारे में ;
(ङ) अन्य ऐसे विषयों के बारे में जो विहित किए जाएं,
वे समस्त शक्तियां होंगी जो किसी सिविल न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय होती हैं ।
6. रिपोर्ट पर विचार किया जाना और न्यायाधीश के हटाए जाने के लिए समावेदन उपस्थापित करने की प्रक्रिया-(1) यदि समिति की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष हो कि न्यायाधीश किसी कदाचार का दोषी नहीं है या उसमें कोई असमर्थता नहीं है, तब उस रिपोर्ट के सम्बन्ध में संसद् के किसी भी सदन में कोई आगे कार्रवाई नहीं की जाएगी और संसद् के सदन या सदनों में लम्बित प्रस्ताव पर कोई भी कार्यवाही नहीं की जाएगी ।
(2) यदि समिति की रिपोर्ट में यह निष्कर्ष हो कि न्यायाधीश किसी कदाचार का दोषी है या उसमें कोई असमर्थता है तो समिति की रिपोर्ट सहित धारा 3 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रस्ताव पर, संसद् के सदन या सदनों द्वारा, जिसमें या जिनमें वह लम्बित है, विचार किया जाएगा ।
(3) यदि प्रस्ताव, यथास्थिति, संविधान के अनुच्छेद 124 के खण्ड (4) के उपबन्धों के अनुसार या अनुच्छेद 218 के साथ पठित उस खण्ड के अनुसार, संसद् के हर एक सदन द्वारा अंगीकृत कर लिया जाता है तब यह समझा जाएगा कि न्यायाधीश का कदाचार या उसकी असमर्थता साबित हो गई है और न्यायाधीश के हटाए जाने की प्रार्थना करने वाला समावेदन उसी सत्र में जिसमें कि प्रस्ताव अंगीकृत किया गया है, संसद् के हर एक सदन द्वारा, राष्ट्रपति को विहित रीति से उपस्थापित किया जाएगा ।
7. नियम बनाने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के प्रयोजनों को क्रियान्वित करने के लिए नियम बनाने के प्रयोजन से, संसद् के दोनों सदनों की एक संयुक्त समिति, इसमें इसके पश्चात् अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अनुसार, गठित की जाएगी ।
(2) संयुक्त समिति 15 सदस्यों से गठित होगी जिसमें से दस सदस्य अध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे और पांच सदस्य सभापति द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे ।
(3) संयुक्त समिति अपना अध्यक्ष स्वयं निर्वाचित करेगी और उसे अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करने की शक्ति होगी ।
(4) उपधारा (1) के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, संयुक्त समिति अन्य विषयों के साथ-साथ निम्नलिखित का उपबन्ध करने के लिए नियम बना सकेगी, अर्थात् :-
(क) संसद् के एक सदन में अंगीकृत किए गए प्रस्ताव को दूसरे सदन में पारेषित करने की रीति ;
(ख) किसी न्यायाधीश के हटाए जाने के लिए राष्ट्रपति को समावेदन उपस्थापित करने की रीति ;
(ग) समिति के सदस्यों को और उन साक्षियों को, जिनसे ऐसी समिति में हाजिर होने की अपेक्षा की जाए, संदेय यात्रा और अन्य भत्ते ;
(घ) वे सुविधाएं जो न्यायाधीश को अपना प्रतिवाद करने के लिए दी जा सकेंगी ;
(ङ) कोई अन्य विषय जिसके लिए उपबन्ध, नियमों द्वारा किया जाना है या किया जाए या जिसकी बाबत संयुक्त समिति की राय में उपबन्ध आवश्यक है ।
(5) इस धारा के अधीन बनाए गए कोई भी नियम तब तक प्रभावी न होंगे जब तक कि वे अध्यक्ष और सभापति, दोनों ही द्वारा अनुमोदित और पुष्ट नहीं किए जाते और शासकीय राजपत्र में प्रकाशित नहीं किए जाते, और नियमों का ऐसा प्रकाशन इस बात का निश्चायक सबूत होगा कि वे सम्यक् रूप से बनाए गए हैं ।
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