पुनर्वास वित्त प्रशासन अधिनियम, 1948
(1948 का अधिनियम संख्यांक 12)
[23 मार्च, 1948]
पुनर्वास वित्त प्रशासन स्थापित
करने के लिए
अधिनियम
विस्थापित व्यक्तियों को कारबार या उद्योग में लगने के लिए समर्थ बनाने के वास्ते उन्हें युक्तियुक्त निबंधनों पर वित्तीय सहायता देने के प्रयोजन के लिए एक पुनर्वास वित्त प्रशासन स्थापित करना समीचीन है;
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है:
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पुनर्वास वित्त प्रशासन अधिनियम, 1948 है ।
[(2) इसका विस्तार, जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।]
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि कोई बात विषय या संदर्भ में विरुद्ध न हो,
(क) अधिनियम" से पुनर्वास वित्त प्रशासन अधिनियम, 1948 अभिप्रेत है;
(ख) प्रशासन" से इस अधिनियम के अधीन गठित पुनर्वास वित्त प्रशासन अभिप्रेत है;
(ग) उधार लेने वाले" से कोई ऐसा व्यष्टि, कम्पनी, व्यष्टियों का संगम या निकाय अभिप्रेत है जिसे इस अधिनियम के अधीन उधार दिया गया है चाहे वह निगमित हो या न हो;
(घ) विस्थापित व्यक्ति" से अभिप्रेत है
(i) कोई ऐसा व्यक्ति जो किसी ऐसे क्षेत्र से, [जो अब पाकिस्तान का भाग है], सिविल उपद्रवों के अथवा ऐसे उपद्रवों की आशंका के कारण विस्थापित होकर भारत में बस गया है और किसी कारबार या उद्योग में लगा हुआ है या लगने का इरादा रखता है, या
(ii) भारत में कोई व्यक्ति जिसका किसी 3[ऐसे क्षेत्र में, जो अब पाकिस्तान का भाग है], पूर्णतः या भागतः अपना कारबार, उद्योग या सम्पत्ति थी और जो सिविल उपद्रवों के या ऐसे उपद्रवों की आशंका के कारण पूर्णतः या भागत ऐसे कारबार, उद्योग या सम्पत्ति को खो बैठा है और जो भारत में किसी कारबार या उद्योग में लगा है या लगने का इरादा रखता है;
[(ङ) उधार" से ऐसी धनराशि अभिप्रेत है जो प्रशासन द्वारा
(i) किसी विस्थापित व्यक्ति को किसी ऐसे कारबार या उद्योग के प्रयोजन के लिए अग्रिम के रूप में दी गई है जिसमें वह स्वयं लगा है या लगने का इरादा रखता है, या
(ii) किसी ऐसे कारबार या उद्योग के सम्बन्ध में अग्रिम के रूप में दी गई है जिसका पर्याप्त भाग विस्थापित व्यक्तियों के स्वामित्वाधीन है; और]
(च) विहित" से धारा 23 के अधीन बनाए गए नियमों अथवा धारा 24 के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।
3. स्थापना और निगमन-(1) केन्द्रीय सरकार विस्थापित व्यक्तियों को कारबार या उद्योग में जम जाने के योग्य बनाने के लिए उनको [अथवा किसी ऐसे कारबार या उद्योग को, जिसका पर्याप्त भाग विस्थापित व्यक्तियों के स्वामित्वाधीन है,] युक्तियुक्त निबंधनों पर वित्तीय सहायता देने के लिए एक निगम गठित करेगी जो पुनर्वास वित्त प्रशासन कहलाएगा ।
(2) यह निगम पुनर्वास वित्त प्रशासन नाम का शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा जिसे इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए जंगम और स्थावर दोनों प्रकार की सम्पत्ति के अर्जन, धारण और अन्तरण की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगा या उस पर वाद लाया जाएगा ।
(3) प्रशासन का मुख्य कार्यालय दिल्ली में होगा और वह केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से भारत में ऐसे स्थानों पर शाखाएं खोल सकेगा जिन्हें वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का प्रभावपूर्ण रूप से निर्वहन करने के लिए आवश्यक समझे ।
4. प्रशासन का गठन-(1) प्रशासन में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्:
(क) एक अध्यक्ष जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा और जो मुख्य प्रशासक कहलाएगा;
(ख) [चार] शासकीय व्यक्ति जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे; और
(ग) 1[चार] अशासकीय व्यक्ति जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे ।
(2) प्रशासन द्वारा किया गया कोई कार्य केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा कि प्रशासन में कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि है ।
5. सलाहकार बोर्ड-(1) केन्द्रीय सरकार नीति के विषयों पर प्रशासन को सलाह देने के लिए एक सलाहकार बोर्ड गठित करेगी और जहां आवश्यक हो प्रशासन की प्रत्येक शाखा को सलाह देने के लिए एक प्रादेशिक समिति गठित कर सकेगी ।
(2) सलाहकार बोर्ड में पन्द्रह से अनधिक इतने सदस्य होंगे जितने केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाएं ।
6. प्रशासन और सलाहकार बोर्ड के सदस्यों की पदावधि-(1) धारा 4 की उपधारा (1) के खण्ड (क) और (ख) के अधीन नियुक्त सदस्य केंद्रीय सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।
(2) धारा 4 की उपधारा (1) के खण्ड (ग) अथवा धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन नामनिर्देशित सदस्य अपने नामनिर्देशन की तारीख से दो वर्ष की अवधि तक के लिए पद धारण करेगा और पुनर्नामनिर्देशन के लिए पात्र होगा ।
(3) नामनिर्देशित सदस्य केन्द्रीय सरकार को संबोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा अपनी सदस्यता त्याग सकेगा और तब वह सदस्य नहीं रहेगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन पदत्याग द्वारा अथवा किसी अन्य कारण से हुई कोई आकस्मिक रिक्ति नए नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और उस रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्देशित व्यक्ति केवल उस अवधि के शेष भाग के लिए ही पद धारण करेगा जिसके लिए वह सदस्य, जिसका स्थान उसने लिया, नामनिर्देशित किया गया था ।
7. हित का प्रकटन-(1) प्रशासन का कोई भी सदस्य किसी ऐसे कारबार, उद्योग या समुत्थान में, जिस को धारा 12 के अधीन कोई सहायता दी गई है या दी जानी है कोई भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित नहीं रखेगा और यदि कोई ऐसा सदस्य ऐसी सहायता के जारी रहने के दौरान किसी समय ऐसा हित अर्जित कर लेता है तो वह उसे तुरन्त प्रशासन को प्रकट करेगा तथा या तो अपनी सदस्यता त्याग देगा या अपने हित का व्ययन ऐसी रीति में और इतने समय के अन्दर करेगा जो उसके द्वारा निदिष्ट की जाए ।
(2) यदि सलाहकार बोर्ड का कोई सदस्य किसी ऐसे कारबार, उद्योग या समुत्थान में जिसको धारा 12 के अधीन कोई सहायता दी गई है या दी जानी है कोई प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित रखता है अथवा ऐसी सहायता के जारी रहने के दौरान किसी समय ऐसा कोई हित अर्जित कर लेता है वह उसे तुरन्त प्रशासन को प्रकट करेगा तथा ऐसी सहायता से सम्बद्ध सलाहकार बोर्ड की कार्यवाहियों में भाग नहीं लेगा ।
8. सदस्यता से हटाया जाना-धारा 6 में किसी बात के होते हुए भी केन्द्रीय सरकार किसी भी कारण से जो उसे पर्याप्त प्रतीत हो किसी सदस्य को किसी भी समय प्रशासन या सलाहकार बोर्ड से हटा सकेगी ।
9. मुख्य प्रशासक-मुख्य प्रशासक, प्रशासन का पूर्णकालिक सेवक होगा और ऐसे वेतन और भत्ते प्राप्त करेगा तथा ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन होगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित किए जाएं ।
10. कर्मचारिवृन्द-प्रशासन विहित रीति में ॥।
(क) एक उप मुख्य प्रशासक और इतने अन्य अधिकारी तथा सेवक नियुक्त कर सकेगा जितने इस अधिनियम के अधीन कृत्यों को कार्यान्वित करने के लिए उसे समर्थ बनाने के वास्ते अपेक्षित हों;
(ख) उप मुख्य प्रशासक, अन्य अधिकारियों और सेवकों के वेतन और भत्ते या सेवा की अन्य शर्तें नियत कर सकेगा;
(ग) प्रशासन के और सलाहकार बोर्ड के सदस्यों कों संदेय पारिश्रमिक और भत्ते नियत कर सकेगा:
[परन्तु उप मुख्य प्रशासक और ऐसे अन्य अधिकारियों की, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किए जाएं, नियुक्ति और वेतन, भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तों का नियत करना उस सरकार की पूर्व मंजूरी के अधीन होगा ।]
11. प्रशासन की निधियां- [(1) केन्द्रीय सरकार प्रशासन को उसके कारबार के लिए समय-समय पर अग्रिम धन दे सकेगी जिसकी रकम कुल मिलाकर
(क) प्रशासन को उधार देने के योग्य बनाने के प्रयोजन के लिए, इसमें इसके पश्चात् उपबंधित के सिवाय, बारह करोड़ पचास लाख रुपए से अधिक नहीं होगी; और
(ख) अनुसूचित बैंकों द्वारा दिए गए उधारों से सम्बन्धित हानियों को प्रत्याभूत करने में प्रशासन जो दायित्व उपगत करे उसकी पूर्ति करने योग्य उसको बनाने के प्रयोजन के लिए, दो करोड़ रुपए से अधिक नहीं होगी:
परन्तु इस अधिनियम के प्रारम्भ से ऐसी अवधि के व्यतीत होने के पश्चात्, जो केन्द्रीय सरकार उस निमित नियत करना ठीक समझे, यदि खण्ड (ख) में विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए अलग की हुई कोई धनराशि वस्तुतः उस प्रयोजन के लिए दी गई नहीं पाई जाती है और केन्द्रीय सरकार की राय में उस प्रयोजन के लिए उसके अपेक्षित होने की संभाव्यता नहीं है तो केन्द्रीय सरकार उस धन का प्रयोग खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट प्रयोजन के लिए प्रशासन को समय-समय पर अग्रिम धन देने में कर सकेगी, और जब कोई ऐसा अग्रिम धन दिया जाए तब यह समझा जाएगा कि खण्ड (क) में विनिर्दिष्ट परिसीमा तदनुकूल बढ़ा दी गई है ।]
(2) [किन्हीं ऐसे विनियमों के अधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, प्रशासन की सब ऐसी धनराशियां जो किसी प्रयोजन के लिए प्रशासन को तत्काल अपेक्षित न हों] भारतीय रिजर्व बैंक में या उसके किन्हीं अभिकरणों में जमा की जाएंगी अथवा ऐसी प्रतिभूतियों में विनिहित की जाएंगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित की जाएं ।
(3) प्रशासन इस प्रकार लिए गए अग्रिम धन पर तीन प्रतिशत प्रति वर्ष की दर से केन्द्रीय सरकार को ब्याज देगा ।
[12. प्रशासन का कारबार-प्रशासन
(क) धारा 13 के उपबन्धों के अधीन, उधार दे सकेगा;
(ख) उन हानियों को जो किसी अनुसूचित बैंक को किसी ऐसे उधार के सम्बन्ध में हों जो उस द्वारा दिया गया हो और प्रशासन द्वारा अनुमोदित किया गया हो, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर प्रत्याभूत कर सकेगा जो करार पाई जाएं:
परन्तु वह कुल रकम, जो किसी अनुसूचित बैंक के सम्बन्ध में प्रत्याभूत की जा सकेगी, और वे निबंधन और शर्तें, जिन पर ऐसी प्रत्याभूति दी जा सकेगी, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के अधीन होंगी:
परन्तु यह और कि ऐसी प्रत्याभूति के अधीन प्रशासन का अधिकतम दायित्व उस रकम से अधिक नहीं होगा जो धारा 11 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन उस समय प्राप्त हो;
(ग) ऐसे सब कार्य और बातें कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के निष्पादन के आनुषंगिक या पारिणामिक हों, जिनके अन्तर्गत प्रशासन चलाना भी है ।]
13. उधार-(1) केन्द्रीय सरकार उन रकमों के बारे में परिसीमाएं विहित कर सकेगी जिनके अन्तर्गत प्रशासन द्वारा उधार दिए जा सकेंगे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई उधार देने के प्रयोजन के लिए प्रशासन या तो अपने कर्मचारिवृन्द की मार्फत या उस जिले के, जिसमें उधार लेने वाला निवास करता है या कारबार चलाता है, जिला अधिकारी की मार्फत, अथवा किसी राज्य ॥। सरकार की मार्फत, या किसी बैंक अथवा किसी अन्य समुचित अभिकरण की मार्फत कोई रिपोर्ट मांग सकेगा ।
(3) प्रशासन उधार लेने वाले से छह प्रतिशत प्रति वर्ष से अनधिक की ऐसी दर पर, जो उस द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, ब्याज लेगा ।
(4) उधार की अवधि [पन्द्रह] वर्ष से अधिक नहीं होगी ।
(5) उधार, स्थिर पूंजी के लिए या कामकाज पूंजी के लिए या दोनों के लिए दिया जा सकेगा ।
उधार से सृजित आस्तियां, तत्प्रतिकूल किसी विधि या प्रथा के होते हुए भी, उधार पर ब्याज सहित उधार के प्रतिसंदाय के लिए प्रशासन को बंधकित समझी जाएंगी और उधार की रकम तथा उस पर ब्याज ऐसी आस्तियों पर प्रथम भार होगा ।
(6) प्रशासन किसी उधार के लिए ऐसी अतिरिक्त प्रतिभूति भी ले सकेगा जैसी वह आवश्यक समझे ।
14. करार पाई गई अवधि से पूर्व प्रतिसंदाय की मांग करने की शक्ति-किसी करार में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, प्रशासन किसी उधार लेने वाले से सूचना द्वारा यह अपेक्षा कि वह उससे लिए गए किसी उधार का उस पर ब्याज सहित पूर्ण प्रतिसंदाय तत्क्षण करे, उस दशा में कर सकेगा, जिसमें
(क) प्रशासन को यह प्रतीत होता है कि उधार अभिप्राप्त करने के लिए अथवा धारा 17 के अधीन कोई जानकारी देने में उधार लेने वाले द्वारा किसी तात्त्विक विशिष्टि की बाबत मिथ्या या भ्रामक जानकारी दी गई थी; या
(ख) उधार लेने वाले ने उधार के सम्बन्ध में प्रशासन से की गई संविदा के निबन्धनों का अनुपालन नहीं किया है; या
(ग) इस बात की युक्तियुक्त आशंका है कि उधार लेने वाला अपने ऋणों को चुकाने में असमर्थ है या उसके विषय में दिवाले की कार्यवाहियां या समापन कार्यवाहियां प्रारंभ हो सकती हैं; या
(घ) किसी अन्य कारणवश प्रशासन के हितों के संरक्षण के लिए प्रशासन की राय में यह आवश्यक है ।
15. वसूली का ढंग-यदि उधार की रकम या उसकी कोई किश्त अथवा उस पर ब्याज, जो संविदा के निबंधनों के अनुसार अथवा धारा 14 के उपबंधों के अधीन प्राप्य है, प्रतिसंदत्त नहीं किया गया है तो प्रशासन
(क) विधि द्वारा उपबन्धित किसी अन्य उपचार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे उधार, किश्त या ब्याज को भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूल कर सकेगा, या
(ख) उधार लेने वाले के कारबार या उद्योग का कार्यभार ऐसे निबंधनों और शर्तों पर ग्रहण कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।
[16. लेखा और लेखापरीक्षा-(1) प्रशासन उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा तथा लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अन्तर्गत लाभ और हानि लेखा तथा तुलनपत्र भी हैं, ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जैसा केन्द्रीय सरकार द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित किया जाए ।
(2) प्रशासन के लेखाओं की भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा प्रतिवर्ष लेखापरीक्षा की जाएगी और ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा उपगत कोई व्यय प्रशासन द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के तथा प्रशासन के लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में होते हैं और विशिष्टतया उसे बहियां, लेखा, सम्बद्ध वाउचर तथा अन्य दस्तावेज और कागज-पत्र पेश किए जाने की मांग करने और प्रशासन के कार्यालयों में से किसी का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथाप्रमाणित प्रशासन के लेखे तद्विषयक लेखापरीक्षा रिपोर्ट सहित केन्द्रीय सरकार को हर वर्ष भेजे जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
17. निरीक्षण की शक्ति-(1) मुख्य प्रशासक या इस निमित्त उसके द्वारा लिखकर प्राधिकृत कोई अन्य अधिकारी आदेश द्वारा उधार लेने वाले से अपेक्षा कर सकेगा कि वह उसे ऐसी जानकारी दे या ऐसी लेखा बहियों और अन्य दस्तावेजों को ऐसे समय और स्थानों पर निरीक्षण के लिए पेश करे जो आदेश में विनिर्दिष्ट हों और उधार लेने वाला ऐसे आदेश का अनुपालन करेगा ।
(2) मुख्य प्रशासक या ऐसा अन्य अधिकारी पेश की गई ऐसी लेखा बहियों या दस्तावेजों का निरीक्षण कर सकेगा और उनमें से उद्धरण ले सकेगा ।
(3) मुख्य प्रशासक या निरीक्षण करने वाला अधिकारी अथवा उसके आदेशों के अधीन काम करने वाला कोई व्यक्ति उधार लेने वाले के कामकाज से सम्बद्ध कोई जानकारी किसी ऐसे व्यक्ति को संसूचित नहीं करेगा या संसूचित नहीं होने देगा जो उसके लिए वैध रूप से हकदार न हो ।
(4) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) या उपधारा (3) के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा तो वह कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दण्डनीय होगा ।
18. विवरणियां-(1) प्रशासन केन्द्रीय सरकार को एक अर्धवार्षिक रिपोर्ट, लेखाओं और ऐसी अन्य जानकारी सहित, इतने समय के अन्दर और ऐसी रीति में देगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।
(2) रिपोर्ट तैयार हो जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र [संसद्] के समक्ष रखी जाएगी ।
19. केन्द्रीय सरकार की निदेश देने की शक्ति-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार समय-समय पर प्रशासन को ऐसे साधारण या विशेष निदेश दे सकेगी जैसे वह ठीक समझे और प्रशासन इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के प्रयोग में ऐसे किन्हीं निदेशों का अनुपालन करेगा ।
20. करों से छूट-भारतीय आय-कर अधिनियम, 1922 (1922 का 11) में या आय-कर, अधिकर या कारबार लाभकर से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी प्रशासन किसी आय, लाभ या अभिलाभ पर कोई आय-कर, अधिकर या कारबार लाभकर संदत्त करने का दायी नहीं होगा ।
21. प्रशासन का समापन-(1) कम्पनियों या निगमों के दिवाले या परिसमापन से सम्बद्ध विधि का कोई भी उपबंध प्रशासन को लागू नहीं होगा और प्रशासन को केन्द्रीय सरकार के आदेश के और ऐसी रीति के सिवाय, जैसी वह निर्दिष्ट करे, समापनाधीन नहीं किया जाएगा ।
(2) प्रशासन के समापनाधीन किए जाने की दशा में प्रशासन की आस्तियां, दायित्वों की, यदि कोई हों, पूर्ति करने के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार में निहित होंगी और तब केन्द्रीय सरकार को उन सब उधारों को, जो असंदत्त रह गए हों, वसूल करने में प्रशासन की सब शक्तियां होंगी ।
22. प्रत्यायोजन-प्रशासन, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगा कि किसी ऐसी शक्ति या कर्तव्य का, जो इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के अधीन प्रशासन को प्रदत्त या अधिरोपित है, ऐसी परिस्थितियों में और ऐसी शर्तों के अधीन, यदि कोई हों, जैसी उस निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, मुख्य प्रशासक, उप मुख्य प्रशासक या प्रशासन के अधीनस्थ किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रयोग या निर्वहन किया जा सकेगा ।
23. नियम बनाने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।
24. विनियम बनाने की शक्ति-(1) प्रशासन, केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमोदन से, उन सब बातों का उपबन्ध करने के लिए, जिनके लिए उपबंध किया जाना इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावशील करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन है, ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों से असंगत न हों ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे
(क) शर्तें जिन पर किसी व्यक्ति को विस्थापित व्यक्ति के रूप में मान्य किया जा सकेगा;
(ख) प्रशासन या सलाहकार बोर्ड या प्रादेशिक समिति की साधारण बैठकों की रीति और समय तथा उनमें अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया और वह रीति जिसमें मताधिकार का प्रयोग किया जा सकेगा;
(ग) निबंधन जिन पर प्रशासन उधार दे सकेगा;
(घ) इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित विवरणियों और विवरणों के प्ररूप;
(ङ) प्रशासन के अधिकारियों, सेवकों और अभिकर्ताओं के कर्तव्य और आचरण, वेतन, भत्ते और सेवा की शर्तें;
(च) उधारों और संविदाओं के लिए आवेदनों की रीति और प्ररूप;
(छ) रीति जिसमें प्रशासन के लेखे रखे जाएंगे और लेखापरीक्षा की जाएगी;
(ज) रीति जिसमें और शर्तें जिनके अधीन किसी ऐसे व्यक्ति के कारबार या उद्योग का, जिसे उधार दिया गया है, धारा 15 के अधीन कार्यभार ग्रहण किया जा सकेगा और प्रशासन किया जा सकेगा;
(झ) कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम के अधीन विनिर्दिष्ट किया जाना है या किया जाए ।
(3) इस धारा के अधीन बनाए गए सब विनियम राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे और उस तारीख को प्रवृत्त होंगे जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाए ।
[25. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

