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महाप्रशासक अधिनियम, 1963 ( Administrators-General Act, 1963 )


 

महाप्रशासक अधिनियम, 1963

(1963 का अधिनियम संख्यांक 45)

[11 दिसम्बर, 1963]

महाप्रशासक के पद और कर्तव्यों से सम्बन्धित विधि का

समेकन और संशोधन करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के चौदहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम महाप्रशासक अधिनियम, 1963 है ।

(2) इसका विस्तार ॥। सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) आस्तियों" से अभिप्रेत है मृतक व्यक्ति की सभी स्थावर और जंगम सम्पत्ति जो उसके ऋणों और उसके द्वारा वसीयत की गई रकमों के संदाय के लिए प्रभारित और उपयोजित की जा सकती है या जो उसके वारिसों और निकट सम्बन्धियों के बीच वितरण के लिए उपलब्ध है;

(ख) प्रशासनपत्र" के अन्तर्गत ऐसे कोई प्रशासनपत्र हैं चाहे वे साधारण हैं या जिनके साथ वसीयत की प्रति संलग्न है या जो समय की दृष्टि से या अन्यथा सीमित हैं ;

(ग) निकट सम्बन्धी" के अन्तर्गत कोई विधुर या मृतक व्यक्ति की विधवा या कोई अन्य व्यक्ति है जो प्रशासनपत्र का मृतक के लेनदार या वसीयतदार पर अधिमान देकर विधि द्वारा हकदार हो; और

(घ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।

अध्याय 2

महाप्रशासक का पद

3. महाप्रशासक की नियुक्ति-(1) राज्य सरकार राज्य के लिए एक महाप्रशासक नियुक्त करेगा:

परन्तु इसमें अन्तर्विष्ट किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह महाप्रशासक के रूप में उसी व्यक्ति की दो या अधिक राज्यों के लिए नियुक्ति का निवारण करती है ।

(2) कोई व्यक्ति महाप्रशासक के पद पर नियुक्त नहीं किया जाएगा जब तक कि वह कम से कम-

(क) सात वर्ष के लिए अधिवक्ता न रहा हो; या

(ख) सात वर्ष के लिए उच्च न्यायालय का अटर्नी न रहा हो; या

(ग) दस वर्ष के लिए राज्य की न्यायिक सेवा का सदस्य न रहा हो; या

(घ) पांच वर्ष के लिए उप-महाप्रशासक न रहा हो ।

4. उप-महाप्रशासक की नियुक्ति और शक्तियां-(1) राज्य सरकार महाप्रशासक की सहायता के लिए एक या अधिक उप-महाप्रशासक नियुक्त कर सकेगी और इस प्रकार नियुक्त किया गया उप-महाप्रशासक राज्य सरकार के नियंत्रण और महाप्रशासक के साधारण और विशेष आदेशों के अधीन रहते हुए महाप्रशासक के किन्हीं कर्तव्यों का निर्वहन और किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए सक्षम होगा और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करते समय उसके वही विशेषाधिकार होंगे और वह उन्हीं दायित्वों के अधीन होगा जो महाप्रशासक के हैं ।

(2) कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन उप-महाप्रशासक नियुक्त नहीं किया जाएगा जब तक कि वह कम से कम तीन वर्ष के लिए-

(क) अधिवक्ता न रहा हो; या

(ख) उच्च न्यायालय का अटर्नी न रहा हो; या

(ग) राज्य की न्यायिक सेवा का सदस्य न रहा हो ।

5. निगमन-महाप्रशासक उस राज्य के जिसके लिए वह नियुक्त किया गया है महाप्रशासक के नाम से एक एकल निगम होगा और ऐसे रूप में महाप्रशासक का शाश्वत उत्तराधिकार और सरकारी मुद्रा होगी और वह अपने निगमित नाम से वाद लाएगा या उस पर वाद लाया जा सकेगा ।

अध्याय 3

महाप्रशासक के अधिकार, शक्तियां और कर्तव्य

(क) प्रशासनपत्र और प्रोबेट का अनुदान

6. उच्च न्यायालय की पूर्ण राज्य के लिए अधिकारिता-जहां तक किसी राज्य के महाप्रशासक का सम्बन्ध है, उच्च न्यायालय तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन प्रोबेट या प्रशासनपत्र के अनुदान के प्रयोजन के लिए सक्षम अधिकारिता वाला न्यायालय समझा जाएगा चाहे वह सम्पदा जिसका प्रशासन किया जाना है, राज्य में कहीं भी स्थित हो:

      परन्तु इस धारा की किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी जिला न्यायालय की अधिकारिता को प्रभावित करती है ।

7. महाप्रशासक का प्रशासनपत्रों का हकदार होना यदि वे किसी निकट सम्बन्धी को अनुदत्त न कर दिए गए हों-उच्च न्यायालय द्वारा अनुदत्त कोई प्रशासनपत्र राज्य के महाप्रशासक को अनुदत्त किए जाएंगे यदि वे मतृक के निकट सम्बन्धी को अनुदत्त न कर दिए गए हों ।

8. लेनदारों, कतिपय वसीयतदारों और मित्रों पर अधिमान देकर महाप्रशासक का प्रशासनपत्रों का हकदार होना-राज्य के महाप्रशासक के बारे में राज्य के सभी न्यायालयों द्वारा समझा जाएगा कि उसको निम्नलिखित पर अधिमान दे कर वादकालीन पत्रों से भिन्न प्रशासनपत्रों का अधिकार है-

(क) लेनदार; या

(ख) वसीयतदार जो सर्वस्व वसीयतदार या अवशिष्टीय वसीयतदार या अवशिष्टीय वसीयतदार के प्रतिनिधि से भिन्न हो; या

(ग) मृतक का मित्र ।

9. महाप्रशासक का सम्पदाओं के प्रशासन के लिए आवेदन करने का अधिकार-(1) यदि-

(क) कोई व्यक्ति किसी राज्य में [दस लाख] रुपए से अधिक मूल्य की आस्तियां छोड़कर मर गया है; और

(ख) (चाहे उसकी वसीयत के प्रोबेट या उसकी सम्पदा के प्रशासनपत्र प्राप्त करना बाध्यकर हो या नहीं) किसी व्यक्ति ने जिसे ऐसी आस्तियों का प्रशासन सौंपने की अधिकारिता किसी न्यायालय को है, उसकी मृत्यु के पश्चात् एक मास के भीतर ऐसे राज्य में ऐसे प्रोबेट या प्रशासनपत्रों के लिए आवेदन नहीं किया है; और

(ग) (उन दशाओं में जिनमें ऐसे प्रोबेट या प्रशासनपत्र प्राप्त करना भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 39) के उपबंधों के अधीन बाध्यकर नहीं है) किसी व्यक्ति ने सम्पदा के संरक्षण के लिए अन्य कार्रवाई नहीं की है,

तो उस राज्य का महाप्रशासक जिसमें ऐसी आस्तियां हैं, राज्य सरकार द्वारा बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए ऐसे व्यक्ति की मृत्यु की और उसके द्वारा ऐसी आस्तियों के छोड़ने की सूचना उसे होने के पश्चात् युक्तियुक्त समय के भीतर ऐसी कार्यवाही कर सकेगा जो उस व्यक्ति की सम्पदा के प्रशासनपत्र उच्च न्यायालय से प्राप्त करने के लिए आवश्यक हो ।

      (2) महाप्रशासक इस धारा के अधीन कार्यवाही नहीं करेगा जब तक कि उसका समाधान नहीं हो जाता है कि यदि उसके द्वारा ऐसी कार्यवाही नहीं की जाती तो ऐसी आस्तियों के दुर्विनियोजन, क्षय या अपव्यय की आशंका है या जब तक उसका समाधान नहीं हो जाता कि आस्तियों के संरक्षण के लिए ऐसी कार्यवाही अन्यथा आवश्यक है ।

10. जहां तुरंत कार्रवाई आवश्यक हो, वहां आस्तियों का संग्रहण और धारण करने की महाप्रशासक की शक्ति-(1) जब कभी कोई व्यक्ति किसी राज्य में 1[दस लाख] रुपए से अधिक मूल्य की आस्तियां छोड़कर मर गया हो और उस राज्य के उच्च न्यायालय का समाधान हो जाता है कि ऐसी आस्तियों के दुर्विनियोजन, क्षय या अपव्यय का आसन्न खतरा है जिनके बारे में तुरंत कार्यवाही अपेक्षित है तो उच्च न्यायालय महाप्रशासक के या ऐसी आस्तियों में या उनके सम्यक् प्रशासन में हितबद्ध किसी व्यक्ति के आवेदन पर महाप्रशासक को तुरंत निदेश देगा कि-

(क) ऐसी आस्तियां संगृहीत करे और कब्जे में ले ले; और

(ख) उन्हें उच्च न्यायालय के निदेशों के अनुसार और ऐसे किन्हीं निदेशों के व्यतिक्रम में उस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार जहां तक वे ऐसी आस्तियों को लागू हों धारित करे, उनका निक्षेप करे, आपन करे, विक्रय करे या उन्हें विनिहित करे ।

      (2) उपधारा (1) के अधीन उच्च न्यायालय का कोई आदेश महाप्रशासक को इस बात का हकदार बनाएगा कि वह-

(क) ऐसी आस्तियों के प्रत्युद्धरण के लिए कोई वाद या कार्यवाही जारी रखे;

(ख) यदि वह ठीक समझता है तो ऐसे मृतक व्यक्ति की सम्पदा के प्रशासनपत्रों के लिए आवेदन करे;

(ग) सम्पदा की आस्तियों में से कोई फीस जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन प्रभार्य हो प्रतिधारित करे; और

(घ) ऐसी आस्तियों की बाबत उसके द्वारा किए गए सभी संदायों की प्रतिपूर्ति करे जो किसी प्राइवेट प्रशासक द्वारा विधिपूर्वक किए जाते ।

11. महाप्रशासक द्वारा की गई कार्यवाहियों के दौरान हाजिर होने वाले व्यक्ति को प्रोबेट या प्रशासनपत्रों का अनुदान-यदि धारा 9 या धारा 10 के उपबंधों के अधीन प्रशासनपत्र प्राप्त करने की कार्यवाहियों के दौरान-

(क) कोई व्यक्ति हाजिर होता है और-

      (i) मृतक की वसीयत के प्रोबेट के लिए; या

      (ii) मृतक के निकट सम्बन्धी के रूप में प्रशासनपत्रों के लिए,

      अपना दावा स्थापित करता है और ऐसी प्रतिभूति देता है जो विधि द्वारा उससे अपेक्षित है; या

(ख) कोई व्यक्ति उच्च न्यायालय का समाधान कर देता है कि ऐसे मामले में जिसमें भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 39) के उपबंधों के अधीन ऐसे प्रोबेट या प्रशासनपत्र प्राप्त करना बाध्यकर नहीं है उसने सम्पदा के संरक्षण के लिए सम्यक् तत्परता से अन्य कार्यवाहियां की हैं और उनका अभियोजन कर रहा है; या

(ग) उच्च न्यायालय का समाधान हो जाता है कि आस्तियों के दुर्विनियोजन, क्षय या अपव्यय की कोई आशंका नहीं है और यह कि आस्तियों के संरक्षण के लिए ऐसी कार्यवाहियों में प्रशासनपत्रों का अनुदान अन्यथा आवश्यक नहीं है,

तो उच्च न्यायालय-

(1) खण्ड (क) में वर्णित मामले में वसीयत का प्रोबेट या प्रशासनपत्र तद्नुसार अनुदत्त करेगा;

(2) खण्ड (ख) या खण्ड (ग) में वर्णित मामले में कार्यवाहियां समाप्त कर देगा; और

(3) सभी मामलों में उन धाराओं के अधीन उसके द्वारा की गई किसी कार्यवाही का खर्चा महाप्रशासक को अधिनिर्णीत करेगा जो सम्पदा में से उसकी वसीयती या निर्वसीयती व्यय के भाग के रूप में संदत्त किया जाएगा ।

12. कतिपय दशाओं में महाप्रशासक को प्रशासनपत्रों का अनुदान-यदि धारा 9 या धारा 10 के उपबन्धों के अधीन प्रशासनपत्र प्राप्त करने की कार्यवाही के अनुक्रम में और ऐसी अवधि के भीतर जैसी उच्च न्यायालय को युक्तियुक्त प्रतीत हो कोई व्यक्ति हाजिर नहीं होता है और किसी वसीयत के प्रोबेट के लिए या मृतक के निकट सम्बन्धी के रूप में प्रशासनपत्रों के अनुदान के लिए अपना दावा स्थापित नहीं करता है या उच्च न्यायालय का समाधान नहीं करता है कि ऐसे मामले में जिसमें भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 39) के उपबन्धों के अधीन ऐसे प्रोबेट या प्रशासनपत्र प्राप्त करना बाध्यकर नहीं है, उसने सम्पदा के संरक्षण के लिए सम्यक् तत्परता से अन्य कार्यवाहियां की हैं या उनका अभियोजन कर रहा है और उच्च न्यायालय का समाधान हो जाता है कि आस्तियों के दुर्विनियोजन, क्षय या अपव्यय की आशंका है या यह कि ऐसी कार्यवाहियों में प्रशासनपत्रों का अनुदान आस्तियों के संरक्षण के लिए अन्यथा आवश्यक है ;

      या यदि वह व्यक्ति जिसने मृतक के निकट सम्बन्धी के रूप में प्रशासनपत्रों के अनुदान के लिए अपना दावा सिद्ध कर दिया है, ऐसी प्रतिभूति देने में असफल रहता है जिसकी उससे विधि द्वारा अपेक्षा की जाए;

तो उच्च न्यायालय महाप्रशासक को प्रशासनपत्र अनुदत्त कर सकेगा ।

13. महाप्रशासक का प्रशासनपत्रों के लिए मृत्यु के पश्चात् एक मास के भीतर आवेदन करने से प्रवारित न होना-इस अधिनियम की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह महाप्रशासक को किसी मामले में मृतक की मृत्यु से एक मास की अवधि के भीतर प्रशासनपत्रों के लिए उच्च न्यायालय को आवेदन करने से प्रवारित करती है ।

(ख) अनुदानों का प्रतिसंहरण

14. महाप्रशासक से प्रशासनपत्रों का वापस लिया जाना और निष्पादक या निकट सम्बन्धी इत्यादि को प्रोबेट का अनुदान-यदि मृतक के किसी निष्पादक या निकट सम्बन्धी ने, जिस पर व्यक्तिगत रूप से उपस्थिति पत्र की तामील की गई है या जिसे उसके अनुसरण में हाजिर होने के लिए सूचना समय पर न मिली हो, उच्च न्यायालय के समाधानप्रद रूप में महाप्रशासक पर अधिमान देकर वसीयत के प्रोबेट या प्रशासनपत्रों के लिए दावा सिद्ध कर दिया है तो इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार महाप्रशासक को अनुदत्त किए गए कोई प्रशासनपत्र-

            (क) तब प्रतिसंहृत किए जाएंगे यदि मृतक की वसीयत राज्य में साबित कर दी जाती है,

(ख) अन्य दशाओं में तब प्रतिसंहृत किए जा सकेंगे यदि इस प्रयोजन के लिए महाप्रशासक को अनुदान के पश्चात् छह मास के भीतर एक आवेदन किया जाता है और उच्च न्यायालय का समाधान हो जाता है कि आवेदन किए जाने में या उस प्राधिकार के, जिसके अधीन आवेदन किया गया है प्रेषित किए जाने में कोई अयुक्तियुक्त विलम्ब नहीं हुआ है,

और, यथास्थिति, ऐसे निष्पादक या निकट सम्बन्धी को प्रोबेट या प्रशासनपत्र अनुदत्त किए जा सकेंगे ।

15. प्रतिसंहरण पर प्रशासनपत्र इत्यादि प्राप्त करने के खर्च का सम्पदा में से महाप्रशासक को संदत्त किए जाने का आदेश दिया जाना-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार महाप्रशासक को अनुदत्त कोई प्रशासनपत्र प्रतिसंहृत कर दिए जाते हैं तो उच्च न्यायालय प्रशासनपत्र प्राप्त करने के लिए खर्च का और कोई फीस जो अन्यथा इस अधिनियम के अधीन संदेय होती, उस खर्च सहित जो महाप्रशासक ने ऐसा प्रतिसंहरण प्राप्त करने के लिए किसी कार्यवाही में किया हो, महाप्रशासक को पूर्णतः या अंशतः संदत्त या उसके द्वारा प्रतिधारित किए जाने का आदेश कर सकेगा :

      परन्तु इस धारा की कोई बात धारा 10 की उपधारा (2) के खण्ड (ग) और (घ) पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

16. महाप्रशासक को अनुदत्त किए गए पत्रों का, प्रतिसंहरण के पश्चात् उसके सम्बन्ध में केवल शून्यकरणीय समझा जाना-यदि महाप्रशासक को इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार अनुदत्त किए गए प्रशासनपत्र प्रतिसंहृत कर दिए जाते हैं, तो जहां तक महाप्रशासक और उसके प्राधिकार के अधीन उनके अनुसरण में कार्य करने वाले सभी व्यक्तियों का सम्बन्ध है, उन्हें केवल शून्यकरणीय समझा जाएगा सिवाय किसी ऐसे कार्य के जो किसी ऐसे महाप्रशासक द्वारा या उपरोक्त अन्य व्यक्तियों द्वारा किसी वसीयत या किसी अन्य तथ्य की सूचना के पश्चात् किया गया हो, जिससे ऐसे पत्र शून्य हो जाते हैं :

      परन्तु किसी वसीयत या किसी अन्य तथ्य की कोई सूचना जिससे ऐसे कोई पत्र शून्य हो जाते हैं महाप्रशासक या उसके प्राधिकार के अधीन ऐसे पत्रों के अनुसरण में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी जब तक कि ऐसी सूचना दिए जाने के समय से एक मास की अवधि के भीतर वसीयत को साबित करने या पत्रों को प्रतिसंहृत कराने के लिए कार्यवाहियां प्रारम्भ नहीं कर दी जातीं और युक्तियुक्त विलम्ब के बिना ऐसी कार्यवाहियों का अभियोजन नहीं किया जाता ।

17. प्रतिसंहरण पूर्व महाप्रशासक द्वारा किए गए संदाय-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार महाप्रशासक को अनुदत्त किए गए प्रशासनपत्र वसीयत के प्रोबेट के अनुदान पर या प्रशासनपत्रों के साथ वसीयत की प्रति के अनुदान पर प्रतिसंहृत किए जाते हैं तो प्रतिसंहरण पूर्व महाप्रशासक द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन ऐसे प्रशासनपत्रों के अनुसरण में किए गए सभी संदाय या कार्य जो ऐसी वसीयत की संलग्न प्रति सहित उसको विधिपूर्वक अनुदत्त किन्हीं प्रशासनपत्रों के अधीन विधिमान्य होते, ऐसे प्रतिसंहरण के होते हुए भी विधिमान्य समझे जाएंगे ।

(ग) साधारण

18. प्रशासनपत्रों के अनुदान के लिए महाप्रशासक की अर्जी-जब भी महाप्रशासक इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार प्रशासनपत्रों के लिए आवेदन करता है तो ऐसे पत्रों के अनुदान के लिए पेश किए जाने के लिए अपेक्षित अर्जी में इन बातों का कथन पर्याप्त होगा-

(i) अर्जीदार की सर्वोत्तम जानकारी और विश्वास में मृतक की मृत्यु का समय और स्थान;

(ii) मृतक के उत्तरजीवी निकट सम्बन्धी का नाम और पता, यदि ज्ञात हो;

(iii) उन आस्तियों की विशिष्टियां और मूल्य जिनके अर्जीदार को मिलने की संभावना है;

(iv) सम्पदा के दायित्वों की विशिष्टियां, यदि ज्ञात हों ।

19. नाम जिसमें प्रोबेट और पत्रों का अनुदान होगा-किसी महाप्रशासक को अनुदत्त सभी प्रोबेट या प्रशासनपत्र उसे उसके नाम में अनुदत्त किए जाएंगे ।

20. महाप्रशासक को अनुदत्त प्रोबेट या पत्रों का प्रभाव-(1) किसी राज्य के महाप्रशासक को उच्च न्यायालय द्वारा अनुदत्त प्रोबेट या प्रशासनपत्र सम्पूर्ण [भारत] में मृतक की सभी आस्तियों पर प्रभावी होंगे और मृतक के सभी ऋणियों तथा ऐसी आस्तियां धारित करने वाले सभी व्यक्तियों के विरुद्ध प्रतिनिधिक हक के रूप में निश्चायक होंगे और उन सभी ऋणियों को और सभी व्यक्तियों को जो अपने ऋण या ऐसी आस्तियां महाप्रशासक को संदत्त या समर्पित करें, पूर्ण क्षतिपूर्ति प्रदान करेंगे ।

      (2) जब कभी महाप्रशासक को उच्च न्यायालय द्वारा प्रोबेट या प्रशासनपत्र का अनुदान किया जाता है तो उच्च न्यायालय दूसरे राज्यों के उच्च न्यायालयों को यह प्रमाणपत्र भेजेगा कि ऐसा अनुदान किया गया है और ऐसा प्रमाणपत्र उसे प्राप्त करने वाले उच्च न्यायालय द्वारा फाइल में लगा लिया जाएगा ।

       [(3) केन्द्रीय विधि (जम्मू-कश्मीर पर विस्तारण) अधिनियम, 1968 (1968 का 25) के प्रारम्भ से पूर्व जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए उच्च न्यायालय द्वारा अनुदत्त कोई प्रोबेट या प्रशासनपत्र, ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् ऐसे ही प्रभावी होंगे मानो ऐसे प्रोबेट या प्रशासनपत्र इस धारा के अधीन अनुदत्त किए गए हैं ।]

21. [जम्मू-कश्मीर उच्च न्यायालय के अनुदान का प्रभाव]-केन्द्रीय विधि (जम्मू-कश्मीर पर विस्तारण) अधिनियम, 1968 (1968 का 25) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-8-1968 से) निरसित ।

22. प्रोबेट या प्रशासनपत्र के अधीन हित का प्राइवेट निष्पादक या प्रशासक द्वारा अन्तरण-(1) कोई प्राइवेट निष्पादक या प्रशासक उस राज्य के जिसमें सम्पदा की कोई आस्तियां स्थित हैं जिनकी बाबत ऐसे निष्पादक या प्रशासक ने प्रोबेट या प्रशासनपत्र प्राप्त किए हैं, महाप्रशासक की पूर्व अनुमति से राजपत्र में अधिसूचित उसके द्वारा हस्ताक्षरित लिखत द्वारा ऐसे प्रोबेट या पत्रों के आधार पर अपने में निहित सम्पदा की आस्तियों को महाप्रशासक को उसी नाम या किसी अन्य पर्याप्त वर्णन से अन्तरित कर सकेगा ।

      (2) ऐसे अन्तरण की तारीख से अन्तरक, यथास्थिति, ऐसे निष्पादक या प्रशासक के रूप में सभी दायित्व से मुक्त होगा सिवाय उन कार्यों के जो ऐसे अन्तरण से पूर्व किए गए हों, और महाप्रशासक को वे अधिकार होंगे जो उसके होते और वह उन दायित्वों के अधीन होगा जिनके अधीन वह होता यदि, यथास्थिति, प्रोबेट या प्रशासनपत्र ऐसे अन्तरण की तारीख को उसके नाम से उसको अनुदत्त कर दिए जाते ।

23. आस्तियों का विभाजन-(1) जब महाप्रशासक ने लेनदारों और अन्य व्यक्तियों को विहित सूचना दे दी है कि वे मृतक की सम्पदा के विरुद्ध अपने दावे उसको भेजे तो दावे भेजने के लिए उसमें नामित समय के अवसान पर वह इस बात के लिए स्वतंत्र होगा कि ऐसे वैध दावों के जिनकी उसे सूचना है उन्मोचन में सम्पदा या उसके किसी भाग का विभाजन करे ।

      (2) महाप्रशासक इस प्रकार विभाजित की गई आस्तियों के लिए किसी व्यक्ति को, जिसके दावों की सूचना विभाजन के समय उसे नहीं थी, दायी नहीं होगा ।

      (3) किसी दावे की कोई सूचना जो भेजी गई हो और महाप्रशासक द्वारा नामंजूर या अंशतः अस्वीकृत की गई हो, उस पर प्रभाव नहीं डालेगी जब तक कि ऐसे दावे को प्रवृत्त करने के लिए कार्यवाहियां विहित रीति में ऐसे दावे के नामंजूर या अस्वीकृत कर दिए जाने की सूचना के पश्चात् एक मास के भीतर प्रारम्भ न कर दी जाएं और जब तक ऐसी कार्यवाहियों का बिना अयुक्तियुक्त विलम्ब के अभियोजन नहीं किया जाता ।

      (4) इस धारा की कोई बात किसी लेनदार या अन्य दावेदार के इस अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी कि वह आस्तियों या उसके किसी भाग की बाबत उन व्यक्तियों के विरुद्ध, जिन्हें वे क्रमशः प्राप्त हुआ हो, कार्यवाही करे ।

      (5) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबन्धों के अधीन किसी वाद, अपील या आवेदन के लिए परिसीमा काल संगणित करने में किसी लेनदार या अन्य दावेदार के महाप्रशासक को दावा प्रस्तुत करने की तारीख और ऐसे दावे पर महाप्रशासक के अन्तिम विनिश्चय की तारीख के बीच की अवधि अपवर्जित की जाएगी ।

24. प्रशासन की समाप्ति के पश्चात् शासकीय न्यासी की न्यासी के रूप में नियुक्ति-(1) जब महाप्रशासक ने, जहां तक हो सके, उसके द्वारा प्रशासित किसी सम्पदा के सभी दायित्वों का निर्वहन कर दिया है तो वह इस तथ्य को राजपत्र में अधिसूचित करेगा और वह शासकीय न्यासी की अनुमति से और राज्य सरकार द्वारा बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए लिखत द्वारा शासकीय न्यासी को उसके पास शेष किन्हीं आस्तियों का न्यासी होने के लिए नियुक्त करेगा ।

      (2) ऐसी नियुक्ति पर, ऐसी आस्तियां शासकीय न्यासी में ऐसे निहित होंगी मानो उसे शासकीय न्यासी अधिनियम, 1913 (1913 का 2) के उपबन्धों के अनुसार न्यासी नियुक्त किया गया हो और उसके द्वारा उन्हीं न्यासों पर धृत रहेंगी जैसी वे ऐसी नियुक्ति के ठीक पूर्व धृत थी ।

25. सम्पदा के प्रशासन के सम्बन्ध में उच्च न्यायालय की निदेश देने की शक्ति-उच्च न्यायालय महाप्रशासक या आस्तियों या उनके प्रशासन में हितबद्ध किसी व्यक्ति द्वारा उसको किए गए आवेदन पर राज्य के महाप्रशासक को उसके भारसाधन में किसी सम्पदा या किसी ऐसी सम्पदा के प्रशासन के संबंध में कोई साधारण या विशेष निदेश दे सकेगा ।

26. महाप्रशासक से किसी प्रतिभूति की अपेक्षा का न किया जाना-किसी महाप्रशासक से किसी न्यायालय द्वारा यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह कोई प्रशासनपत्र उसको उस नाम से अनुदत्त किए जाने पर कोई प्रशासन बंधपत्र निष्पादित करे या अन्य प्रतिभूति न्यायालय को दे ।

27. आवेदन महाप्रशासक द्वारा सत्यापित किए जाने की रीति-किसी महाप्रशासक से अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन उसे पेश किया गया कोई आवेदन अपने हस्ताक्षर द्वारा सत्यापित करने से अन्यथा सत्यापित करे और यदि किसी ऐसे आवेदन में कथित तथ्य स्वयं उसकी अपनी जानकारी में नहीं है तो किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित और सत्यापित किया जाएगा जो आवेदन सत्यापन के लिए सक्षम हो ।

28. महाप्रशासक की प्रविष्टि का न्यास की सूचना न होना-कम्पनी की पुस्तकों में महाप्रशासक की अपने नाम से प्रविष्टि न्यास की सूचना नहीं होगी और कम्पनी अपने रजिस्टर में महाप्रशासक के नाम की प्रविष्टि किए जाने पर केवल इस कारण आक्षेप करने की हकदार नहीं होगी कि महाप्रशासक एक निगम है और आस्तियों के संबंध में कार्यवाही करने में यह तथ्य कि, वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध कार्यवाही की गई है महाप्रशासक है, अपने आप में न्यास की सूचना नहीं होगी ।

अध्याय 4

प्रमाणपत्र का अनुदान

29. महाप्रशासक किन मामलों में प्रमाणपत्र अनुदत्त कर सकेगा-(1) जब कभी कोई व्यक्ति किसी राज्य में आस्तियां छोड़कर मर गया है और ऐसे राज्य के महाप्रशासक का समाधान हो जाता है कि ऐसी आस्तियां, उस रकम की किसी राशि को छोड़कर जो किसी सरकारी बचत बैंक या किसी भविष्य निधि में जमा है जिसे भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबन्ध लागू होते हैं मृत्यु की तारीख को कुल मिलाकर  [दस लाख] रुपए से अधिक मूल्य की नहीं थी तो वह ऐसी आस्तियों में या उनके सम्यक् प्रशासन में हितबद्ध होने का लेनदार से भिन्न रूप में दावा करने वाले किसी व्यक्ति को अपने द्वारा हस्ताक्षरित एक प्रमाणपत्र इस बात के लिए हकदार ठहराते हुए अनुदत्त कर सकेगा कि वह उसमें वर्णित आस्तियां, जो उस राज्य में मृतक द्वारा छोड़ी गई है, जिनका मूल्य कुल मिलाकर 1[दस लाख] रुपए से अधिक न हो, प्राप्त करे ।

      (2) इस धारा के अधीन कोई प्रमाणपत्र मृत्यु से एक मास बीत जाने के पूर्व अनुदत्त नहीं किया जाएगा जब तक कि उक्त एक मास के बीत जाने के पूर्व महाप्रशासक से ऐसा करने के लिए प्रार्थना निष्पादक या मृतक की विधवा या उसकी सम्पदा का प्रशासन करने के लिए हकदार अन्य व्यक्ति के हस्तलेख से न की जाए और वह उसे अनुदत्त करना उचित समझता है ।

      (3) इस धारा के अधीन कोई प्रमाणपत्र अनुदत्त नहीं किया जाएगा, -

(i) जहां मृतक की वसीयत का प्रोबेट या उसकी सम्पदा का प्रशासनपत्र अनुदत्त कर दिया गया है या कर दिए गए हैं; या

(ii) सरकारी बचत बैंक या किसी भविष्य निधि में निक्षिप्त किसी राशि के संबंध में, जिसे भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबन्ध लागू होते हैं ।

30. प्रमाणपत्रों का लेनदारों को अनुदान और कतिपय सम्पदाओं को भारसाधन में लेने की शक्ति-(1) यदि, धारा 29 के अन्तर्गत आने वाले मामलों में कोई व्यक्ति जो ऐसी आस्तियों में या उनके सम्यक् प्रशासन में हितबद्ध होने का लेनदार से भिन्न रूप में दावा करता हो, मृतक की मृत्यु से तीन मास के भीतर उस धारा के अधीन महाप्रशासक से प्रमाणपत्र या मृतक की वसीयत का प्रोबेट या सम्पदा के प्रशासनपत्र प्राप्त नहीं करता है तो महाप्रशासक प्रशासनपत्रों के बिना सम्पदा का प्रशासन ऐसी रीति से कर सकेगा मानो ऐसे पत्र उसे अनुदत्त किए गए थे ।

      (2) यदि महाप्रशासक ऐसी सम्पदा का प्रशासन करने में उपेक्षा करता है या उससे इंकार करता है तो वह लेनदार के आवेदन पर उसे ऐसी रीति से एक प्रमाणपत्र अनुदत्त करेगा मानो वह ऐसी आस्तियों में लेनदार से भिन्न रूप में हितबद्ध था और ऐसे प्रमाणपत्र का वही प्रभाव होगा जो धारा 29 के उपबन्धों के अधीन अनुदत्त प्रमाणपत्र का होता है और वह इस अधिनियम के उन सभी उपबन्धों के अधीन होगा जो ऐसे प्रमाणपत्र को लागू होते हैं ।

      (3) महाप्रशासक, यदि वह उचित समझता है, तो उपधारा (2) के अधीन प्रमाणपत्र अनुदत्त करने के पूर्व लेनदार से यह अपेक्षा करेगा कि वह मृतक की सम्पदा के सम्यक् प्रशासन के लिए उचित प्रतिभूति दे ।

31. महाप्रशासक का प्रमाणपत्र अनुदत्त करने के लिए बाध्य न होना जब तक कि दावेदार के हक इत्यादि के बारे में उसका समाधान न हो जाए-महाप्रशासक धारा 29 या धारा 30 के अधीन कोई प्रमाणपत्र अनुदत्त करने के लिए बाध्य न होगा जब तक कि ऐसी जांच करने के पश्चात्, जैसी वह उचित समझता है दावेदार के हक और मृतक द्वारा राज्य में छोड़ी हुई आस्तियां के मूल्य के बारे में उसका समाधान नहीं हो जाता है ।

32. प्रमाणपत्र का प्रभाव-धारा 29 या धारा 30 के अनुसार अनुदत्त किए गए प्रमाणपत्र के धारक की ऐसे प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट आस्तियों की बाबत वैसी ही शक्तियां और कर्तव्य होंगे और वह वैसे ही दायित्व के अधीन होगा जैसे कि उसके होते या वह उनके अधीन होता यदि प्रशासनपत्र उसको अनुदत्त किए जाते:

      परन्तु इस धारा की किसी भी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह ऐसा प्रमाणपत्र धारित करने वाले किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा करती है कि वह-

            (क) मृतक की आस्तियों के लेखे या उनकी तालिकाएं किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी के समक्ष पेश करे; या

            (ख) जैसा धारा 30 में उपबन्धित है उसके सिवाय कोई बन्धपत्र सम्पदा के सम्यक् प्रशासन के लिए दे ।

33. प्रमाणपत्र का प्रतिसंहरण-(1) महाप्रशासक धारा 29 या धारा 30 के उपबन्धों के अधीन अनुदत्त प्रमाणपत्र को निम्नलिखित आधारों में से किसी पर प्रतिसंहृत कर सकेगा, अर्थात्: -

(i) यह कि प्रमाणपत्र कपट या उसके किए गए दुर्व्यपदेशन द्वारा प्राप्त किया गया था;

(ii) यह कि प्रमाणपत्र अनुदान को न्यायोचित ठहराने के लिए आवश्यक तथ्य के असत्य अभिकथन से प्राप्त किया गया था भले ही ऐसा अभिकथन अनभिज्ञता या अनवधानता से किया गया था ।

      (2) कोई प्रमाणपत्र इस धारा के अधीन प्रतिसंहृत नहीं किया जाएगा जब तक कि प्रमाणपत्र के धारक को यह कारण दर्शित करने का उचित अवसर न दे दिया गया हो कि प्रमाणपत्र को इस प्रकार प्रतिसंहृत क्यों न किया जाए ।

34. प्रतिसंहृत प्रमाणपत्र का अभ्यर्पण-(1) जब कोई प्रमाणपत्र धारा 33 के उपबन्धों के अनुसार प्रतिसंहृत किया जाता है तो उसका धारक महाप्रशासक की अध्यपेक्षा पर उसे उस महाप्रशासक को अभ्यर्पित करेगा किन्तु उस पर संदत्त किसी फीस के प्रतिदाय का हकदार नहीं होगा ।

      (2) यदि ऐसा व्यक्ति जानबूझकर और उचित कारण के बिना प्रमाणपत्र अभ्यर्पित करने में उपेक्षा करे तो वह कारावास से, जो तीन मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

35. प्रमाणपत्र के प्रतिसंहृत किए जाने से पूर्व धारक को संदाय-जब कोई प्रमाणपत्र धारा 33 के उपबन्धों के अनुसार प्रतिसंहृत किया जाता है तो ऐसे प्रमाणपत्र के अधीन उसके धारक को ऐसे प्रतिसंहरण से पूर्व सद्भावपूर्वक किए गए सभी संदाय ऐसे प्रतिसंहरण के होते हुए भी संदाय करने वाले व्यक्ति का वैध उन्मोचन होंगे और ऐसे प्रमाणपत्र का धारक अपने द्वारा किए गए ऐसे किन्हीं संदायों को प्रतिधारित या उसकी बाबत अपनी प्रतिपूर्ति कर सकेगा, जो ऐसा व्यक्ति विधिपूर्वक करता जिसे बाद में कोई प्रमाणपत्र या प्रोबेट या प्रशासनपत्र दिया जाए ।

36. महाप्रशासक का उन आस्तियों के बारे में जिनके लिए उसने प्रमाणपत्र दिया है, प्रशासनपत्र लेने के लिए बाध्य न होना-महाप्रशासक उन आस्तियों के बारे में जिनकी बाबत वह धारा 29 या धारा 30 के अधीन कोई प्रमाणपत्र अनुदत्त करता है किसी मृतक व्यक्ति की संपदा के प्रशासनपत्र लेने के लिए बाध्य नहीं होगा किन्तु वह ऐसा कर सकेगा यदि वह धारा 33 के अधीन ऐसा प्रमाणपत्र प्रतिसंहृत कर लेता है या वह अभिनिश्चित कर लेता है कि संपदा का मूल्य [दस लाख] रुपए से अधिक है ।

37. कतिपय आस्तियों का अधिवास के देश में वितरण के लिए निष्पादक या प्रशासक को अन्तरण-जहां-

(क) कोई व्यक्ति जो [भारत के] किसी राज्य में अधिवास न करता हो किसी राज्य में या देश में जिसमें उसकी मृत्यु के समय वह अधिवास करता था, आस्तियां छोड़कर मर गया है; और

(ख) किसी ऐसे राज्यों में आस्तियों की बाबत उसकी संपदा के प्रशासन के लिए कार्यवाहियां धारा 29 या धारा 30 के अधीन की जाती हैं; और

(ग) अधिवास के देश में उस देश की आस्तियों की बाबत प्रशासन का अनुदान किया गया है,

तो, यथास्थिति, धारा 29 या धारा 30 के अधीन अनुदत्त प्रमाणपत्र का धारक या महाप्रशासक लेनदारों या अन्य व्यक्तियों को मृतक की संपदा के विरुद्ध अपने दावे उसको भिजवाने की विहित सूचना देने के पश्चात् और उस सूचना में नामित समय के अवसान पर उन विधिपूर्ण दावों का जिनकी उसे सूचना दी गई हो, उन्मोचन करने के पश्चात् भारत के बाहर  ॥। निवासी और उनके हकदार व्यक्तियों को, मृतक की संपत्ति का अधिशेष या अवशिष्ट, स्वयं वितरित करने के स्थान पर, यथास्थिति, निष्पादक या प्रशासक की सहमति से उसकी अधिशेष या अवशिष्ट का अंतरण अधिवास के देश में उन व्यक्तियों को वितरित करने के लिए कर सकेगा ।

अध्याय 5

दायित्व

38. सरकार का दायित्व-सरकार किसी दायित्व के जिसके निर्वहन का महाप्रशासक व्यक्तिगत रूप से दायी होता यदि वह प्राइवेट प्रशासक होता निर्वहन के लिए अपेक्षित सभी राशियों की पूर्ति करने की तब तक के सिवाय दायी होगा जब दायित्व ऐसा हो जो किसी भी प्रकार से न तो महाप्रशासक और न उसके किसी अधिकारी के कारण हुआ हो या जिसका न तो वह और न उसका कोई अधिकारी युक्तियुक्त तत्परता का प्रयोग करके निवारण कर सकता था और इन दोनों ही दशाओं में न तो महाप्रशासक और न ही सरकार किसी दायित्व के अधीन होंगे ।

39. महाप्रशासक के विरुद्ध लेनदार का वाद-(1) यदि लेनदार द्वारा किसी महाप्रशासक के विरुद्ध कोई वाद लाया जाता है तो ऐसा लेनदार वाद का खर्चा संदत्त करने का दायी होगा जब तक कि वह साबित नहीं कर देता है कि वाद के संस्थित करने से कम से कम एक मास पूर्व उसने महाप्रशासक को एक लिखित आवेदन किया था जिसमें उसके दावे की रकम और अन्य विशिष्टियां थीं और उनके समर्थन में ऐसा साक्ष्य भी दिया था जिसे मामले की परिस्थितियों में महाप्रशासक युक्तियुक्त रूप से मांगने का हकदार था ।

      (2) यदि कोई ऐसा वाद लेनदार के पक्ष में डिक्री कर दिया जाता है तो वह ऐसा होने पर भी जब तक कि वह प्रतिभूत लेनदार नहीं है न्यायालय द्वारा डिक्रीत या आदिष्ट रकम मृतक की आस्तियों में से अन्य लेनदारों के साथ समान और आनुपातिक रूप से संदत्त किए जाने का हकदार होगा ।

40. कतिपय दशाओं में वाद की सूचना का अपेक्षित न होना- सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 80 की कोई बात महाप्रशासक के विरुद्ध किसी वाद को लागू नहीं होगी जिसमें उसके विरुद्ध व्यक्तिगत रूप से किसी अनुतोष का दावा नहीं किया गया है ।

अध्याय 6

फीस

41. फीस-(1) महाप्रशासक के कर्तव्यों की बाबत ऐसी फीस, चाहे प्रतिशत के रूप में हो या अन्यथा, प्रभारित की जाएगी जैसी राज्य सरकार विहित करे ।

      (2) विभिन्न सम्पदाओं या सम्पदाओं के वर्गों के लिए या विभिन्न कर्तव्यों के लिए इस धारा के अधीन फीस की विभिन्न दरें होंगी, और जहां तक हो सके उनकी व्यवस्था इस प्रकार की जाएगी कि वेतन और इस अधिनियम के कार्यकरण के आनुषंगिक सभी अन्य व्ययों का उन्मोचन करने के लिए पर्याप्त रकम प्राप्त की जाए (जिसमें ऐसी राशियां सम्मिलित हैं जो राज्य सरकार इस अधिनियम के अधीन हानि के विरुद्ध सरकार की क्षतिपूर्ति के लिए अवधारित करे) ।

42. फीस का व्ययन-(1) कोई व्यय जो महाप्रशासक के भारसाधन में किसी संपदा में से प्रतिधारित या संदत्त किए जाते यदि वह ऐसी संपदा का प्राइवेट प्रशासक होता, इस प्रकार प्रतिधारित या संदत्त किए जाएंगे और धारा 41 के अधीन वर्णित फीस ऐसे व्यय के रूप में और उनके अतिरिक्त उसी प्रकार प्रतिधारित या संदत्त की जाएगी ।

      (2) महाप्रशासक इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्राप्त सभी फीस ऐसे प्राधिकारी को ऐसी रीति में और ऐसे समय पर, जैसा राज्य सरकार विहित करे, अन्तरित और संदत्त करेगा और वह सरकार के लेखे और उसके नाम जमा कर दी जाएगी ।

अध्याय 7

महाप्रशासक के लेखाओं की संपरीक्षा

43. संपरीक्षा-प्रत्येक महाप्रशासक के लेखाओं की विहित व्यक्ति द्वारा और विहित रीति से संपरीक्षा वर्ष में कम से कम एक बार और यदि राज्य सरकार ऐसा निदेश दे तो किसी अन्य समय पर भी की जाएगी ।

44. संपरीक्षकों का लेखाओं की परीक्षा करना और सरकार को रिपोर्ट देना-संपरीक्षक लेखाओं की परीक्षा करेंगे और विहित प्ररूप में उनका एक विवरण उस पर रिपोर्ट और अपने द्वारा हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र सहित राज्य सरकार को भेजेगी जिसमें यह दर्शित होगा कि-

(क) क्या लेखाओं की संपरीक्षा विहित रीति से की गई है;

(ख) क्या लेखाओं में, जहां तक ऐसी संपरीक्षा द्वारा अभिनिश्चित किया जा सकता है, लेखाओं में उस प्रत्येक बात का जो उसमें अन्तःस्थापित की जानी चाहिए, पूर्ण और सही वृत्तांत किया गया है;

(ग) क्या वे पुस्तकें जिकमा महाप्रशासक द्वारा रखा जाना इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम द्वारा निर्दिष्ट है, सम्यक् और नियमित रूप से रखी गई हैं; और

(घ) क्या आस्तियां और प्रतिभूतियां इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों द्वारा विहित रीति से सम्यक् रूप से रखी गई और विनिहित और निक्षिप्त की गई हैं,

या (यथास्थिति) ऐसे लेखाओं में कोई कमी है या महाप्रशासक ऐसे विषयों के सम्बन्ध में, जो ऐसे प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों का अनुपालन करने में असफल रहा है ।

45. संपरीक्षकों की साक्षियों को समन करने और उनकी परीक्षा करने और दस्तावेजें मांगने की शक्ति-(1) प्रत्यके संपरीक्षक को निम्नलिखित विषयों की बाबत से सभी शक्तियों होंगी जो किसी वाद का विचारण करने में किसी सिविल न्यायालय में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निहित होती हैं, अर्थात्: -

(क) साक्षियों को समन करना और उनको हाजिर कराना और शपथ पर उनकी परीक्षा करना;

(ख) प्रकटीकरण और निरीक्षण;

(ग) दस्तावेजों को पेश करने के लिए विवश करना; और

(घ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।

      (2) कोई व्यक्ति जब उसे समन किया जाता है हाजिर होने या कोई दस्तावेज या वस्तु पेश करने से इंकार करता है या बिना युक्तियुक्त कारण के इसमें उपेक्षा करता है या उपस्थित होता है और शपथ लेने या परीक्षा किए जाने से इंकार करता है तो उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 188 के अर्थ के भीतर और उसके अधीन दण्डनीय कोई अपराध किया है और संपरीक्षक ऐसे प्रत्येक इंकार या उपेक्षा की रिपोर्ट राज्य सरकार को करेगा ।

46. संपरीक्षा आदि का खर्चा-ऐसी संपरीक्षा और परीक्षा के और उसके आनुषंगिक खर्चे राज्य सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार अवधारित किए जाएंगे और विहित रीति से चुकाए जाएंगे ।

अध्याय 8

प्रकीर्ण

47. प्रशासन की साधारण शक्तियां-महाप्रशासक उसके द्वारा, विधिपूर्वक प्रयोक्तव्य व्यय की किन्हीं अन्य शक्तियों के अतिरिक्त न कि उनके अल्पीकरण में, व्यय उपगत कर सकेगा-

(क) ऐसे कार्यों पर जो उसके भारसाधन में किसी संपदा में किसी सम्पत्ति की उचित देखरेख और प्रबन्ध के लिए आवश्यक हो; और

(ख) उच्च न्यायालय की मंजूरी से ऐसे धार्मिक, पूर्त या अन्य उद्देश्यों पर और ऐसे सुधारों पर जो ऐसी सम्पत्ति की दशा में युक्तियुक्त और उचित हों ।

48. साक्षियों को समन करने और उनकी परीक्षा करने की शक्ति-(1) महाप्रशासक जब भी वह, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ऐसी वांछा करे, तथ्य के किसी प्रश्न के सम्बन्ध में अपना समाधान करने के लिए उन सभी शक्तियों का प्रयोग करेगा जो निम्नलिखित मामलों की बाबत वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निहित होती हैं, अर्थात्: -

(क) साक्षियों को समन करना और उनको हाजिर कराना और शपथ पर उनकी परीक्षा करना;

(ख) प्रकटीकरण और निरीक्षण;

(ग) दस्तावेजों को पेश करने के लिए विवश करना; और

(घ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।

      (2) धारा 45 की उपधारा (2) के उपबन्ध महाप्रशासक द्वारा इस धारा के अधीन समन किए गए किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उस धारा के अधीन समन किए गए व्यक्ति के सम्बन्ध में लागू होते हैं ।

49. फायदा पाने वाले के रूप में हितबद्ध व्यक्ति की महाप्रशासक के लेखाओं आदि का निरीक्षण करने और प्रतियां लेने की शक्ति-किसी संपदा के जो महाप्रशासक के भारसाधन में है, प्रशासन में हितबद्ध कोई व्यक्ति ऐसी शर्तों और निर्बन्धनों के अधीन जैसे विहित किए जाएं सभी युक्तियुक्त समयों पर ऐसी सम्पदा से सम्बन्धित लेखाओं और संपरीक्षकों की रिपोर्टों और प्रमाणपत्रों का निरीक्षण करने और विहित फीस के संदाय पर उनकी प्रतियां और उनसे उद्धरण लेने का हकदार होगा ।

50. मिथ्या साक्ष्य-जो कोई, इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत किसी परीक्षा के दौरान शपथ पर कोई कथन करता है जो मिथ्या है और जिसका मिथ्या होना वह या तो जानता है या उसके मिथ्या होने का उसे विश्वास है या उसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने किसी न्यायिक कार्यवाही के किसी प्रक्रम में साशय मिथ्या साक्ष्य दिया है ।

51. बारह वर्ष के लिए अदावाकृत आस्तियों का सरकार को अन्तरित किया जाना-महाप्रशासक के भारसाधन में सभी आस्तियां, जो उनका संदाय करने के लिए आवेदन के किए जाने तथा उसके द्वारा स्वीकार किए जाने के बिना इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् बारह वर्ष की अवधि के लिए, उनकी अभिरक्षा में रही हों, विहित रीति से सरकार के लेखे और खाते में अंतरित कर दी जाएंगी:

      परन्तु यह धारा उपरोक्त किन्हीं ऐसी आस्तियों का अन्तरण प्राधिकृत नहीं करेगी यदि उनके सम्बन्ध में कोई वाद या कार्यवाही किसी न्यायालय में लंबित हो ।

52. इस प्रकार अंतरित मूलधन की वूसली के लिए दावेदार द्वारा कार्यवाही का ढंग-(1) यदि इस अधिनियम के या इसके द्वारा निरसित किसी अधिनियम के उपबन्धों के अधीन सरकार के लेखे और खाते में अन्तरित की गई आस्तियों के किसी भाग का कोई दावा इसके पश्चात् किया जाता है और यदि ऐसा दावा विहित प्राधिकारी के समाधानप्रद रूप में स्थापित कर दिया जाता है तो राज्य सरकार उसके लेखे और खाते में इस प्रकार अन्तरित मूलधन की रकम या उसका उतना भाग, जो उक्त प्राधिकारी द्वारा दावेदार को शोध्य पाया जाए, दावेदार को संदत्त करेगी ।

      (2) यदि दावा विहित प्राधिकारी के समाधानप्रद रूप में स्थापित नहीं किया जाता है तो दावेदार, ऐसी आस्तियों की वसूली के लिए कोई अन्य कार्यवाही करने के अपने अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना अर्जी द्वारा राज्य सरकार के विरुद्ध उच्च न्यायालय में आवेदन करेगा और ऐसा न्यायालय ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, उक्त सम्पूर्ण मूल राशि या उसके किसी भाग के संदाय के सम्बन्ध में ऐसा आदेश करेगा वह जो ठीक समझे और ऐसा आदेश कार्यवाही के सभी पक्षकारों पर बाध्य होगा ।

      (3) उच्च न्यायालय यह भी निदेश दे सकेगा कि प्रत्येक पक्षकार के सम्पूर्ण खर्चे या उनका कोई भाग किसके द्वारा संदत्त किया जाएगा ।

53. उत्तराधिकार अधिनियम या कम्पनी अधिनियम का महाप्रशासक पर प्रभाव न डालना-भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 39) या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी महाप्रशासक के अधिकारों, कर्तव्यों और विशेषाधिकारों को प्रतिष्ठित करती है या उन पर प्रभाव डालती है ।

54. प्रेसिडेंसी नगरों के लिए पुलिस अधिनियमों के उपबन्धों की व्यावृत्ति-भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925(1925 का 39) या इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि यह प्रेसिडेंसी नगरों में से किसी में निर्वसीयत मरने वाले व्यक्तियों को चार सौ रुपए से कम मूल्य की जंगम सम्पत्ति के संबंध में, जिसको पुलिस द्वारा सुरक्षित अभिरक्षा के प्रयोजनार्थ भारसाधन में लिया जाएगा या लिया गया है, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि पर प्रभाव डालती है या उसने प्रभाव डाला है ।

55. न्यायालय के आदेश का डिक्री के समान होना-किसी न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आदेश का वैसा ही प्रभाव होगा जैसा किसी डिक्री का होता है ।

56. कतिपय परिस्थितियों में विदेशी नागरिक की मृत्यु की दशा में कौन्सुलीय अधिकारी द्वारा प्रशासन के लिए उपबन्ध-इस अधिनियम के या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी केन्द्रीय सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि जहां किसी विदेशी राज्य का कोई नागरिक  [भारत] में मर जाता है और ऐसा प्रतीत होता है कि  [भारत] में महाप्रशासक से भिन्न और कोई व्यक्ति मृतक की सम्पदा के प्रशासनपत्रों के लिए सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय को आवेदन करने का हकदार नहीं है तो ऐसे विदेशी राज्य के किसी कौन्सुलीय अधिकारी द्वारा ऐसे न्यायालय को आवेदन किए जाने पर प्रशासनपत्र ऐसे कौन्सुलीय अधिकारी को ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर अनुदत्त किए जाएंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन अधिरोपित करना न्यायालय ठीक समझे ।

57. कतिपय अधिनियमों के अनुसार महाप्रशासक द्वारा प्रशासित छोटी सम्पदाओं की बाबत प्रशासनपत्रों का आवश्यक न होना-महाप्रशासक के किसी मृतक व्यक्ति की सम्पदा के लिए, जिसका प्रशासन उसके द्वारा सेना और वायु सेना (प्राइवेट सम्पत्ति का व्ययन) अधिनियम, 1950 (1950 का 40) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) के उपबन्धों के अनुसार किया जा रहा है प्रशासनपत्र लेना आवश्यक नहीं होगा यदि ऐसी सम्पदा का मूल्य उस तारीख को जिसको ऐसा प्रशासन उसको सौंपा जाता है दो हजार रुपए से अधिक नहीं है किन्तु ऐसी सम्पदा के संबंध में उसकी वही शक्तियां होंगी जो उसको होतीं यदि प्रशासनपत्र उसको अनुदत्त किए गए होते ।

58. सेना और वायु सेना (प्राइवेट सम्पत्ति का व्ययन) अधिनियम, 1950 या नौसेना अधिनियम, 1957 के अनुसार आस्तियों की व्यवस्था करने के सीमित प्रयोजन के लिए पत्र महाप्रशासक को अनुदत्त करने की शक्ति-यदि महाप्रशासक सेना और वायु सेना (प्राइवेट सम्पत्ति का व्ययन) अधिनियम, 1950 (1950 का 40) या नौसेना अधिनियम, 1957(1957 का 62) के अधीन किसी व्यक्ति की सम्पदा के प्रशासनपत्रों के लिए आवेदन करता है जो सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) या वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) या नौसेना अधिनियम, 1957 के अधीन है तो न्यायालय, यथास्थिति, सेना और वायु सेना (प्राइवेट सम्पत्ति का व्ययन) अधिनियम, 1950 या नौसेना अधिनियम, 1957 के उपबन्धों के अनुसार, ऐसी सम्पदा की व्यवस्था करने के सीमित प्रयोजन के लिए प्रशासनपत्र उसको अनुदत्त कर सकेगा । 

59. अधिनियम का सेना और वायु सेना (प्राइवेट सम्पत्ति का व्ययन) अधिनियम, 1950 या नौसेना अधिनियम, 1957 पर प्रभाव न डालना-इस अधिनियम की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह सेना और वायु सेना (प्राइवेट सम्पत्ति का व्ययन) अधिनियम, 1950 (1950 का 40) या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) के उपबन्धों पर प्रभाव डालती है ।

60. भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 के उपबन्धों की व्यावृत्ति-इस अधिनियम की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908(1908 का 16) के उपबन्धों पर प्रभाव डालती है ।

61. केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम उन निबन्धनों और शर्तों के बारे में बना सकेगी जिन पर कौन्सुलीय अधिकारियों को प्रशासनपत्र धारा 56 के अधीन अनुदत्त किए जा सकेंगे ।

62. राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए और महाप्रशासक की कार्यवाहियों को विनियमित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।

      (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा-

(क) महाप्रशासक द्वारा रखे जाने वाले लेखे और उनकी संपरीक्षा और उनका निरीक्षण;

(ख) उन आस्तियों और प्रतिभूतियों की सुरक्षित अभिरक्षा, निक्षेप और विनिधान जो महाप्रशासक को प्राप्त हों;

(ग) महाप्रशासक के पास धन में से राशियों का, उन मामलों में प्रेषण जिनमें ऐसे प्रेषण अपेक्षित हैं;

(घ) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन फीस जो इस अधिनियम के अधीन संदत्त की जानी है और ऐसी किसी फीस का संग्रहण और उसका लेखा;

(ङ) वे विवरण, अनुसूचियां और अन्य दस्तावेजें जो महाप्रशासक द्वारा राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी को प्रस्तुत की जानी हैं तथा उनका प्रकाशन;

(च) किन्हीं ऐसे विवरणों, अनुसूचियों या अन्य दस्तावेजों के तैयार करने के खर्च का ज्ञापन;

(छ) वह रीति जिससे और वह व्यक्ति जिसके द्वारा अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किसी संपरीक्षा के और उसके आनुषंगिक खर्चे अवधारित किए और चुकाए जाने हैं;

(ज) वह रीति जिससे इस अधिनियम के अधीन निकाले गए समन तामील किए जाने हैं और इस अधिनियम के अधीन समन किए गए या परीक्षित किसी व्यक्ति के खर्चों और ऐसे परीक्षण के आनुषंगिक किन्हीं खर्चों का संदाय; और

(झ) कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम के अधीन विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।

       [(3) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, राज्य विधान-मण्डल के समक्ष रखा जाएगा ।]

[63. केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा, बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

64. निरसन और व्यावृत्ति-(1) एडमिनिस्ट्रेटर जनरल्स ऐक्ट, 1913 (1913 का 3) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।

      (2) निरसन के प्रभाव के संबंध में साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना इस धारा द्वारा किया गया निरसन इस अधिनियम के प्रारम्भ पर महाप्रशासक का पदधारण करने वाले किसी व्यक्ति के निगमन पर प्रभाव नहीं डालेगा ।

      (3) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी एडमिनिस्ट्रेटर जनरल्स ऐक्ट, 1913 (1913 का 3) की धारा 59ख के उपबन्ध वैसे ही लागू होंगे मानो वह अधिनियम निरसित नहीं हुआ है ।

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