कम्पनी (लाभ) अतिकर अधिनियम, 1964
(1964 का अधिनियम संख्यांक 7)
झ्र्2 मई, 1964ट
कतिपय कम्पनियों के लाभों पर
एक विशेष कर अधिरोपित
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के पन्द्रहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :श्न्
1. संक्षिप्त नाम और विस्तारश्न्(1) यह अधिनियम कम्पनी (लाभ) अतिकर अधिनियम, 1964 कहा जा सकेगा ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
2. परिभाषाएंश्न्इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,श्न्
झ्र्(1) अग्रिम अतिकरञ्ज् से अभिप्रेत है धारा 7क के अधीन संदेय अतिकर ;ट
झ्र्(1क)ट निर्धारितीञ्ज् से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसके द्वारा इस अधिनियम के अधीन अतिकर या धन की कोई अन्य राशि संदेय है और इसके अन्तर्गत हर ऐसा व्यक्ति भी है जिसके बारे में उसके प्रभार्य लाभों के या उसे प्रतिदाय योग्य रकम के या किसी अन्य व्यक्ति के प्रभार्य लाभों के, जिनके बारे में वह निर्धार्य है या ऐसे अन्य व्यक्ति को प्रतिदाय योग्य रकम के निर्धारण के लिए इस अधिनियम के अधीन कोई कार्यवाही की गई है ;
(2) निर्धारणञ्ज् के अन्तर्गत पुनर्निर्धारण भी है ;
(3) निर्धारण वर्षञ्ज् से बारह मास की वह कालावधि अभिप्रेत है जो हर वर्ष अप्रैल के प्रथम दिन प्रारम्भ होती है ;
(4) बोर्डञ्ज् से केन्द्रीय राजस्व बोर्ड अधिनियम, 1963 (1963 का 54) के अधीन गठित केन्द्रीय प्रत्यक्ष-कर बोर्ड अभिप्रेत है ;
(5) प्रभार्य लाभञ्ज् से निर्धारिती की वह कुल आय अभिप्रेत है जो आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अधीन, यथास्थिति, किसी पूर्ववर्ष या वर्षों के लिए संगणित तथा प्रथम अनुसूची के उपबन्धों के अनुसार समायोजित हो ;
(6) आय-कर अधिनियमञ्ज् से आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) अभिप्रेत है ;
(7) विहितञ्ज् से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
1झ्र्(7क) नियमित निर्धारणञ्ज् से अभिप्रेत है धारा 6 के अधीन निर्धारण ;ट
(8) कानूनी कटौतीञ्ज् से द्वितीय अनुसूची के उपबन्धों के अनुसार संगणित कम्पनी की पूंजी के झ्र्पन्द्रह प्रतिशतट के बराबर रकम या दो लाख रुपए की रकम, जो भी अधिक हो, अभिप्रेत है :
परन्तु जहां पूर्ववर्ष बारह मास की कालावधि से अधिक या कम है, वहां, यथास्थिति, पूर्वोक्त 3झ्र्पन्द्रह प्रतिशतट की रकम या दो लाख रुपए की रकम में आनुपातिक वृद्धि या कमी कर दी जाएगी :
परन्तु यह और कि जहां किसी कम्पनी की आय, लाभों और अभिलाभों के बारे में उसके पूर्ववर्ष भिन्न-भिन्न हैं वहां, यथास्थिति, पूर्वोक्त वृद्धि या कमी का परिकलन सब से लम्बे पूर्ववर्ष की लम्बाई के प्रति निर्देश से किया जाएगा ; तथा
(9) अन्य सभी शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और आय-कर अधिनियम में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उन्हें क्रमशः उस अधिनियम में समनुदिष्ट हैं ।
झ्र्3. कर प्राधिकारीश्न्(1) आय-कर अधिनियम की धारा 116 में विनिर्दिष्ट आय-कर प्राधिकारी, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्राधिकारी होंगे और प्रत्येक ऐसा प्राधिकारी, किसी कंपनी की बाबत इस अधिनियम के अधीन किसी कर प्राधिकारी की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का पालन करेगा और इस प्रयोजन के लिए इस अधिनियम के अधीन उसकी अधिकारिता वही होगी जो उसे आय-कर अधिनियम की धारा 120 के अधीन जारी किए गए आदेशों या निदेशों के आधार पर (जिनके अंतर्गत समवर्ती अधिकारिता सौंपने वाले आदेश या निदेश हैं) उस अधिनियम के अधीन या उस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अधीन हैं ।
(2) बोर्ड, समय-समय पर, अन्य प्राधिकारियों को ऐसे आदेश, अनुदेश और निदेश जारी कर सकेगा जो वह इस अधिनियम के उचित प्रशासन के लिए ठीक समझे तथा ऐसे प्राधिकारी और इस अधिनियम के निष्पादन में नियोजित सभी अन्य व्यक्ति, बोर्ड के ऐसे आदेशों, अनुदेशों और निदेशों का पालन और अनुसरण करेंगे :
परन्तु कोई ऐसे आदेश, अनुदेश या निदेश जारी नहीं किए जाएंगे जिनसेश्न्
(क) किसी कर प्राधिकारी से कोई विशिष्ट निर्धारण करने के लिए या किसी विशिष्ट मामले का किसी विशिष्ट रीति से निपटारा करने की अपेक्षा की जाए ; या
(ख) आयुक्त (अपील) के, अपने अपीली कृत्यों के प्रयोग में, विवेकाधिकार में कोई बाधा पड़े ।ट
4. कर का प्रभारणश्न्इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, हर कम्पनी पर अप्रैल, 1964 के प्रथम दिन को और उससे झ्र्किन्तु 1988 के अप्रैल के प्रथम दिन के पूर्वट प्रारम्भ होने वाले हर निर्धारण वर्ष के लिए, यथास्थिति, पूर्ववर्ष या पूर्व वर्षों के उसके प्रभार्य लाभों में से उतने के बारे में, जितने कानूनी कटौती से अधिक हैं, तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट दर या दरों पर एक कर (जो अधिनियम में अतिकर नाम से निर्देशित है) प्रभारित किया जाएगा ।
5. प्रभार्य लाभों की विवरणीश्न्(1) हर ऐसी कम्पनी की दशा में जहां इस अधिनियम के अधीन उसके निर्धार्य प्रभार्य लाभ पूर्ववर्ष के दौरान कानूनी कटौती की रकम से अधिक हो जाते हैं, वहां, उसका प्रधान अधिकारी, या जहां अनिवासी कम्पनी की दशा में, किसी व्यक्ति को आय-कर अधिनियम की धारा 163 के अधीन उसका अभिकर्ता माना गया है, वहां ऐसा व्यक्ति, पूर्ववर्ष के दौरान कम्पनी के प्रभार्य लाभों की विहित प्ररूप में और विहित रीति में सत्यापित और ऐसी अन्य विशिष्टियां, जैसी विहित की जाएं, उपवर्णित करने वाली एक विवरणी निर्धारण वर्ष के 30 सितम्बर से पूर्व देगा :
परन्तु झ्र्निर्धारण अधिकारीट विवरणी देने की तारीख, इस निमित्त किए गए आवेदन पर, स्वविवेकानुसार बढ़ा सकेगा ।
(2) किसी ऐसी कम्पनी की दशा में जो 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट की राय में इस अधिनियम के अधीन निर्धार्य है, वहां उसके प्रधान अधिकारी पर, या जहां अनिवासी कम्पनी की दशा में किसी व्यक्ति को आय-कर अधिनियम की धारा 163 के अधीन उसका अभिकर्ता माना गया है, वहां ऐसे व्यक्ति पर, 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट एक सूचना की तामील, सुसंगत निर्धारण वर्ष की समाप्ति के पूर्व, करा सकेगा, जिसमें उससे यह अपेक्षा की जाएगी कि वह उस सूचना की तामील की तारीख के तीस दिन के भीतर पूर्ववर्ष के दौरान कम्पनी के प्रभार्य लाभों की विहित प्ररूप में और विहित रीति में सत्यापित और ऐसी अन्य विशिष्टियां, जैसी विहित की जाएं, उपवर्णित करने वाली एक विवरणी दे :
परन्तु 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट विवरणी देने की तारीख, इस निमित्त किए गए आवेदन पर, स्वविवेकानुसार बढ़ा सकेगा ।
(3) कोई निर्धारिती, जिसने उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञात समय के दौरान विवरणी नहीं दी है, या जिसे उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन विवरणी देने के पश्चात् उसमें किसी लोप या गलत कथन का पता लगे, निर्धारण किए जाने से पूर्व किसी भी समय, यथास्थिति, विवरणी या पुनरीक्षित विवरणी दे सकेगा ।
6. निर्धारणश्न्(1) 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट किसी व्यक्ति पर, जिसने धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन विवरणी दी है या जिस पर धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन सूचना की तामील की गई है (चाहे विवरणी दी गई है या नहीं), इस अधिनियम के अधीन निर्धारण करने के प्रयोजनों के लिए एक सूचना की तामील करा सकेगा जिसमें उससे यह अपेक्षा की जाएगी कि वह उस तारीख को जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाएगी ऐसे लेखा या दस्तावेजें या साक्ष्य पेश करे या पेश कराए जिनकी 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अपेक्षा करे और समय-समय पर ऐसे अतिरिक्त लेखाओं या दस्तावेजों या अन्य साक्ष्य को, जिनकी वह अपेक्षा करे, पेश करने की अपेक्षा करने वाली अतिरिक्त सूचनाओं की तामील करा सकेगा ।
(2) 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट ऐसे लेखाओं, दस्तावेजों या साक्ष्यों पर, यदि कोई हों, जो उपधारा (1) के अधीन उसने अभिप्राप्त किए हों, विचार करने के पश्चात् तथा किसी सुसंगत सामग्री पर, जो उसने एकत्र की हो, ध्यान देने के पश्चात्, प्रभार्य लाभों का निर्धारण और ऐसे निर्धारण के आधार पर संदेय अतिकर की रकम का निर्धारण, लिखित आदेश द्वारा करेगा ।
7. अनन्तिम निर्धारणश्न्(1) 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट धारा 6 के अधीन निर्धारण (जो इस धारा में नियमित निर्धारण नाम से निर्देशित है) करने के लिए अग्रसर होने के पूर्व, विवरणी देने के लिए धारा 5 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अनुज्ञात कालावधि के अवसान के पश्चात् किसी भी समय, और चाहे विवरणी दी गई हो या न दी गई हो, प्रभार्य लाभों और उन पर संदेय अतिकर की रकम से संक्षिप्त रीति में अनन्तिम निर्धारण की कार्यवाही कर सकेगा ।
(2) ऐसा अनन्तिम निर्धारण करने के पूर्व, 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट उस व्यक्ति को, जिस पर अनन्तिम निर्धारण किया जाना है, ऐसा करने के अपने आशय की सूचना विहित प्ररूप में देगा और सूचना के साथ प्रस्थापित निर्धारण की रकम का एक विवरण भेजेगा, और उक्त व्यक्ति उक्त सूचना की तामील के चौदह दिन के भीतर किसी भी समय प्रस्थापित निर्धारण की रकम के बारे में अपने आक्षेपों का, यदि कोई हों, एक कथन आय-कर अधिकारी को परिदत्त करने का हकदार होगा ।
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट सूचना की तामील की तारीख को और उससे उक्त चौदह दिन का अवसान हो जाने के पश्चात् या यदि निर्धारिती प्रस्थापित अनन्तिम निर्धारण के लिए सहमत हो जाता है तो उसके पहले ही, झ्र्निर्धारण अधिकारीट उपधारा (2) के अधीन किए गए आक्षेपों पर, यदि कोई हों, विचार करने के पश्चात् अनन्तिम निर्धारण कर सकेगा और निर्धारण के आदेश की एक प्रति निर्धारिती को देगा :
परन्तु अनन्तिम निर्धारण की रकम के लिए अनुमत होने से या उस पर आक्षेप करने में असफल रहने से उसका नियमित निर्धारण के संबंध में निर्धारिती पर किसी भी प्रकार का प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।
(4) इस धारा के अधीन किए गए अनन्तिम निर्धारण के विरुद्ध अपील का कोई भी अधिकार नहीं होगा ।
(5) इस धारा के अधीन किए गए अनन्तिम निर्धारण लेखे संदत्त या संदत्त समझी गई कोई रकम, नियमित निर्धारण हो जाने के पश्चात् नियमित निर्धारण लेखे संदत्त समझी जाएगी; और जहां अनन्तिम निर्धारण लेखे संदत्त या संदत्त समझी गई रकम नियमित निर्धारण के अधीन संदेय रकम से अधिक हो जाती है वहां ऐसा आधिक्य निर्धारिती को प्रतिदत्त कर दिया जाएगा ।
झ्र्7क. अतिकर का अग्रिम संदायश्न्(1) इस धारा में,श्न्
(क) किसी पूर्ववर्ष के सम्बन्ध में प्रभार्य रकमञ्ज् से उस पूर्ववर्ष के प्रभार्य लाभ का उतना भाग अभिप्रेत है जो कानूनी कटौती से अधिक है ;
(ख) किसी वित्तीय वर्ष के दौरान किसी कम्पनी द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर के सम्बन्ध में चालू प्रभार्य रकमञ्ज् से अभिप्रेत है उस अवधि के लिए उस कम्पनी को प्रभार्य रकम, जो उस वित्तीय वर्ष के ठीक बाद के निर्धारण वर्ष के लिए पूर्ववर्ष होगी ।
(2) अतिकर, इस धारा के उपबंधों के अनुसार, उस वित्तीय वर्ष के दौरान उस अवधि की प्रभार्य रकम की बाबत अग्रिम रूप से संदेय होगा जो अवधि उसके ठीक बाद के निर्धारण वर्ष के लिए पूर्ववर्ष होगी ।
(3) निर्धारिती द्वारा वित्तीय वर्ष में संदेय अग्रिम अतिकर की रकम की संगणना निम्नलिखित रूप से की जाएगी, अर्थात् :श्न्
(क) सबसे अन्त के पूर्ववर्ष की प्रभार्य रकम जिसकी बाबत निर्धारिती का नियमित निर्धारण हो चुका है, पहले अभिनिश्चित की जाएगी ;
(ख) उस दशा में जहां अन्तिम पूर्ववर्ष की प्रभार्य रकम झ्र्जो खण्ड (क) में निर्दिष्ट पूर्ववर्ष के बाद का पूर्ववर्ष हैट जिसके आधार पर धारा 7 के अधीन निर्धारण किया गया है, खण्ड (क) में निर्दिष्ट प्रभार्य रकम से अधिक है, वहां खण्ड (क) में निर्दिष्ट प्रभार्य रकम के स्थान पर वह प्रभार्य रकम रख दी जाएगी जिसके आधार पर अनन्तिम निर्धारण किया गया है ;
(ग) यथास्थिति, खण्ड (क) या खण्ड (ख) में निर्दिष्ट प्रभार्य रकम पर अतिकर तृतीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट दरों पर परिकलित किया जाएगा ।
(4) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अग्रिम अतिकर वित्तीय वर्ष के दौरान तीन समान किस्तों में निम्नलिखित तारीखों को संदेय होगा, अर्थात् :श्न्
(क) ऐसे निर्धारिती की दशा में जिसकी प्रभार्य रकम का 75 प्रतिशत तक या उससे अधिक ऐसे स्रोत या स्रोतों से व्युत्पन्न होता है जिसके लिए पूर्ववर्ष (जो पूर्वोक्त वित्तीय वर्ष के ठीक बाद के निर्धारण वर्ष से सुसंगत है) 31 दिसम्बर को या उससे पूर्व समाप्त होता है, जून का 15वां दिन, सितम्बर का 15वां दिन और दिसम्बर का 15वां दिन ;
(ख) किसी अन्य दशा में, सितम्बर का 15वां दिन, दिसम्बर का 15वां दिन और मार्च का 15वां दिन :
परन्तु जहां निर्धारितियों के किसी वर्ग की बाबत बोर्ड ने आय-कर अधिनियम की धारा 211 की उपधारा (1) के परन्तुक द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में, ऐसे निर्धारितियों की दशा में अग्रिम अतिकर की अंतिम किस्त का संदाय दिसम्बर के 15वें दिन के बदले वित्तीय वर्ष के दौरान मार्च के 15वें दिन करने के लिए प्राधिकृत कर दिया है वहां ऐसे निर्धारितियों की दशा में अग्रिम अतिकर की अंतिम किस्त वित्तीय वर्ष के दौरान 15 मार्च को संदेय होगी ।
(5) प्रत्येक कम्पनी उपधारा (4) के अधीन, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में उस तारीख को, जिसको उसकी अग्रिम अतिकर की प्रथम किस्त देय होती है या उसके पूर्व अथवा जहां उसका इस अधिनियम के अधीन नियमित निर्धारण के तौर पर पहले निर्धारण नहीं किया गया है वहां उस तारीख को जिसको उसकी अन्तिम किस्त देय होती है या उसके पूर्व, यदि उसकी कोई चालू प्रभार्य रकम होने की सम्भाव्यता है तो 1झ्र्निर्धारण अधिकारीट को,श्न्
(क) जहां उसका इस अधिनियम के अधीन नियमित निर्धारण के तौर पर तत्पूर्व निर्धारण हो चुका है वहां उपधारा (3) में अधिकथित रीति से संगणित, उसके द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का कथन भेजेगी; या
(ख) जहां उसका इस अधिनियम के अधीन नियमित निर्धारण के तौर पर पहले निर्धारण नहीं किया गया है, वहांश्न्
(त्) चालू प्रभार्य रकम का, और
(त्त्) ऊपर (त्) में विनिर्दिष्ट रकम पर उपधारा (3) में अधिकथित रीति से परिकलित, उसके द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का प्राक्कलन भेजेगी,
और अग्रिम अतिकर की ऐसी रकम का,श्न्
(त्) जैसी खण्ड (क) में आने वाली दशा में, कथन के अनुसार है, उपधारा (4) के अधीन उसके मामले में लागू होने वाली तारीखों को समान किस्तों में संदाय करेगी; और
(त्त्) जैसी खण्ड (ख) में आने वाली दशा में, प्राक्कलन के अनुसार है, उसके मामले में लागू होने वाली ऐसी तारीखों को जो समाप्त नहीं हुई हैं, समान किस्तों में, अथवा यदि ऐसी तारीखों में से केवल अंतिम तारीख समाप्त नहीं हुई है तो एकमुश्त राशि में, संदाय करेगी ।
(6) जहां कोई कंपनी जिससे उपधारा (5) के खंड (क) के अधीन कथन भेजने की अपेक्षा है, अपने मामले में उपधारा (4) के अधीन अग्रिम अतिकर की प्रथम किस्त के देय होने की तारीख को या उसके पूर्व यह प्राक्कलित करती है कि उसकी चालू प्रभार्य रकम उस आय से, जिस पर उपधारा (5) के अधीन उसके द्वारा अग्रिम अतिकर संदेय है, कम होने की संभाव्यता के कारण या किसी अन्य कारण, चालू प्रभार्य रकम पर उपधारा (3) में अधिकथित रीति से संगणित अग्रिम अतिकर की रकम, उसके द्वारा उपधारा (5) के अधीन संदेय अग्रिम अतिकर की रकम से कम होगी वहां वह झ्र्निर्धारण अधिकारीट को, ऐसे कथन के बदले मेंश्न्
(त्) चालू प्रभार्य रकम का, और
(त्त्) चालू प्रभार्य रकम पर उपधारा (3) में अधिकथित रीति से परिकलित, उसके द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का,
प्राक्कलन भेज सकेगी और अग्रिम अतिकर की ऐसी रकम का, जैसी उसके प्राक्कलन के अनुसार है, समान किस्तों में उन तारीखों को संदाय करेगी जो उपधारा (4) के अधीन उसके मामले में लागू हैं ।
(7) जहां कोई कम्पनी जिसने उपधारा (5) के खण्ड (क) के अधीन कथन भेजा है, अपने मामले में अग्रिम अतिकर की अंतिम किस्त के देय होने की तारीख को या उसके पूर्व यह परिकलित करती है कि उसकी चालू प्रभार्य रकम के, उस प्रभार्य रकम से जिस पर उपधारा (5) के अधीन उसके द्वारा अग्रिम अतिकर संदेय है कम होने की संभाव्यता के कारण या किसी अन्य कारण, चालू प्रभार्य रकम पर उपधारा (3) में अधिकथित रीति से संगणित अग्रिम अतिकर की रकम, उसके द्वारा, उपधारा (5) के अधीन संदेय अग्रिम अतिकर की रकम से कम होगी वहां वह अपने विकल्प पर, 1झ्र्निर्धारण अधिकारीट को,श्न्
(त्) चालू प्रभार्य रकम का, और
(त्त्) चालू प्रभार्य रकम पर उपधारा (3) के अधीन अधिकथित रीति से परिकलित, उसके द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का,
प्राक्कलन भेज सकेगी और अग्रिम अतिकर की ऐसी रकम का, जैसी उसके प्राक्कलन के अनुसार है, समान किस्तों में उन तारीखों में से जो उपधारा (4) के अधीन उसके मामले में लागू हैं, ऐसी तारीखों को जो समाप्त नहीं हुई हैं अथवा यदि ऐसी तारीखों में से केवल अन्तिम तारीख समाप्त नहीं हुई है, तो एकमुश्त राशि में, संदाय करेगी ।
(8) ऐसी कम्पनी की दशा में जो, यथास्थिति, उपधारा (5) या उपधारा (6) या उपधारा (7) के अधीन अग्रिम अतिकर का संदाय करने की दायी है, यदि प्रभार्य चालू रकम के उस प्रभार्य रकम से जिस पर उसके द्वारा इस प्रकार अग्रिम अतिकर संदेय है, अधिक होने की संभाव्यता के कारण या किसी अन्य कारण, अग्रिम अतिकर की रकम, जो चालू प्रभार्य रकम पर (जिसका प्राक्कलन कम्पनी द्वारा किया जाएगा) उपधारा (3) में अधिकथित रीति से संगणित की गई है, उसके द्वारा इस प्रकार संदेय अग्रिम अतिकर की रकम से पश्चात्वर्ती रकम के बीस प्रतिशत से अधिक बढ़ जाती है तो वह उस तारीख को या उसके पूर्व, जिसको अग्रिम अतिकर की अंतिम किस्त उसके द्वारा संदेय है, 1झ्र्निर्धारण अधिकारीट कोश्न्
(त्) चालू प्रभार्य रकम का, और
(त्त्) चालू प्रभार्य रकम पर उपधारा (3) में अधिकथित रीति से परिकलित, उसके द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का,
प्राक्कलन भेज सकेगी और अग्रिम अतिकर की ऐसी रकम का, जैसी उसके प्राक्कलन के अनुसार है, उन तारीखों में से, जो उपधारा (4) के अधीन उसके मामले में लागू हैं, ऐसी तारीखों को, जो समाप्त नहीं हुई हैं, ऐसी किस्तों द्वारा संदाय करेगी जो उपधारा (9) के अनुसार संशोधित की जा सकेगी :
परन्तु जहां किसी कम्पनी की बाबत आयुक्त ने आय-कर अधिनियम की धारा 209क की उपधारा (4) के प्रथम परन्तुक या धारा 212 की उपधारा (3क) के प्रथम परन्तुक द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में, यथास्थिति, उक्त उपधारा (4) या उक्त उपधारा (3क) में निर्दिष्ट प्राक्कलन देने की तारीख बढ़ा दी है और कम्पनी उस अग्रिम अतिकर का जिसका वह, यथास्थिति, उपधारा (5) या उपधारा (6) या उपधारा (7) के अधीन संदाय करने की दायी है, ऐसी तारीख को या उसके पूर्व संदाय कर देती है जिसको अग्रिम अतिकर की अन्तिम किस्त उसके मामले में देय है, वहां कम्पनी इस प्रकार बढ़ाई गई तारीख को या उसके पूर्व उतनी रकम का संदाय करेगी जितनी उसके द्वारा पहले प्रदत्त अग्रिम अतिकर की रकम, उसके प्राक्कलन के अनुसार, संदेय अग्रिम रकम से कम हो ।
(9) कम्पनी अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का संशोधित प्राक्कलन उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट तारीखों में से किसी तारीख को या उसके पूर्व भेज सकेगी और पहले ही संदत्त किसी किस्त से सम्बन्धित किसी आधिक्य या कमी को किसी पश्चात्वर्ती किस्त या किस्तों में समायोजित कर सकेगी ।
(10) इस धारा के अधीन कथन या प्राक्कलन विहित प्ररूप में भेजा जाएगा और विहित रीति से सत्यापित किया जाएगा ।
7ख. सरकार द्वारा संदेय ब्याजश्न्केन्द्रीय सरकार उतनी रकम पर जितनी से अग्रिम अतिकर की ऐसी किन्हीं किस्तों की संकलित राशि, जिनका संदाय ऐसे किसी वित्तीय वर्ष के दौरान किया गया हो जिसमें वे धारा 7क के अधीन संदेय हैं, नियमित निर्धारण पर अवधारित कर की रकम से अधिक है, उक्त वित्तीय वर्ष के निकट आगामी अप्रैल के प्रथम दिन से उक्त वित्तीय वर्ष के ठीक आगामी निर्धारण वर्ष के लिए नियमित निर्धारण की तारीख तक झ्र्पंद्रह प्रतिशतट प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज देगी ।
7ग. निर्धारिती द्वारा संदेय ब्याजश्न्(1) जहां किसी वित्तीय वर्ष में किसी कम्पनी ने अग्रिम अतिकर का संदाय धारा 7क के अधीन अपने स्वयं के प्राक्कलन के (जिसके अन्तर्गत संशोधित प्राक्कलन भी है) आधार पर किया है और इस प्रकार संदत्त अग्रिम अतिकर निर्धारित अतिकर के तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत से कम है, वहां उक्त वित्तीय वर्ष के निकट आगामी अप्रैल के प्रथम दिन से नियमित निर्धारण की तारीख तक 1झ्र्पंद्रह प्रतिशतट प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज कम्पनी द्वारा उतनी रकम पर संदेय होगा जितनी से इस प्रकार संदत्त अग्रिम अतिकर, निर्धारित अतिकर से कम पड़ता है ।
(2) जहां नियमित निर्धारण करने पर झ्र्निर्धारण अधिकारीट को पता चलता है किश्न्
(क) ऐसी कम्पनी ने जो धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) में निर्दिष्ट है, उस खण्ड में निर्दिष्ट कथन या उस धारा की उपधारा (6) में निर्दिष्ट कथन के बदले में प्राक्कलन नहीं भेजा है; या
(ख) ऐसी कम्पनी ने जो धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट है, उस खण्ड में निर्दिष्ट प्राक्कलन नहीं भेजा है,
वहां उस वित्तीय वर्ष के निकट आगामी अप्रैल के प्रथम दिन से जिसमें उक्त उपधारा (5) या उपधारा (6) के अनुसार अग्रिम अतिकर संदेय या, नियमित निर्धारण की तारीख तक 1झ्र्पंद्रह प्रतिशतट प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज कम्पनी द्वारा उतनी रकम पर संदेय होगा जितनी निर्धारित अतिकर की रकम के बराबर है ।
(3) जहां नियमित निर्धारण करने पर 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट को पता चलता है कि ऐसी कम्पनी ने जो धारा 7क की उपधारा (8) के अधीन प्राक्कलन भेजने के लिए अपेक्षित है, उसमें निर्दिष्ट प्राक्कलन नहीं भेजा है, वहां उस वित्तीय वर्ष के निकट आगामी अप्रैल के प्रथम दिन से जिसमें उक्त उपधारा (8) के अनुसार अग्रिम अतिकर संदेय था, नियमित निर्धारण की तारीख तक 1झ्र्पंद्रह प्रतिशतट प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज कम्पनी द्वारा उतनी रकम पर संदेय होगा जितनी से उसके द्वारा संदत्त अग्रिम अतिकर, निर्धारित अतिकर से कम पड़ता है ।
(4) पूर्वगामी उपधाराओं में किसी बात के होते हुए भी, जहां धारा 7 के अधीन अनन्तिम निर्धारण किया जाता है वहांश्न्
(त्) ब्याज, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा (3) के उपबन्धों के अनुसार उस तारीख तक परिकलित किया जाएगा जिसको अनन्तिम रूप से निर्धारित अतिकर का संदाय किया जाता है; और
(त्त्) उसके पश्चात् ब्याज 1झ्र्पंद्रह प्रतिशतट प्रतिवर्ष की दर से उस रकम पर परिकलित किया जाएगा जिससे अनन्तिम रूप से निर्धारित अतिकर, निर्धारित अतिकर से कम है ।
(5) ऐसी दशाओं में और ऐसी परिस्थितियों के अधीन जैसी विहित की जाएं, 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट कम्पनी द्वारा इस धारा के अधीन संदेय ब्याज को घटा सकेगा या अधित्यजित कर सकेगा ।
(6) जहां आय-कर अधिनियम की धारा 260 या धारा 262 के साथ पठित धारा 11, या धारा 12, या धारा 13, या धारा 17, या धारा 18, के अधीन आदेश के परिणामस्वरूप वह रकम जिस पर इस धारा के अधीन ब्याज संदेय था, घटा दी गई है, वहां ब्याज तद्नुसार घटा दिया जाएगा और संदत्त किए गए अधिक ब्याज का, यदि कोई हो, प्रतिदाय किया जाएगा ।
(7) इस धारा में और धारा 9 में निर्धारित अतिकरञ्ज् से नियमित निर्धारण के आधार पर अवधारित अतिकर, उसमें से बिना कोई कटौती किए, अभिप्रेत है ।
7घ. अवप्राक्कलन आदि की दशा में निर्धारिती द्वारा संदेय ब्याजश्न्जहां नियमित निर्धारण करने पर झ्र्निर्धारण अधिकारीट को पता चलता है कि किसी कम्पनी ने धारा 7क के अधीन अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का अवप्राक्कलन किया है और तद्द्वारा पहली दो किस्तों में से किसी में संदेय रकम को घटा दिया है तो वह यह निर्दिष्ट कर सकेगा कि निर्धारिती झ्र्पंद्रह प्रतिशतट प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज का संदाय उस कालावधि के लिए जिसके दौरान संदाय कम था उस अन्तर पर करेगा जो ऐसी हर एक किस्त में संदत्त की गई रकम और उस रकम के बीच है, जो उस वर्ष के दौरान वास्तव में संदत्त किए गए, संकलित अग्रिम अतिकर को ध्यान में रखते हुए संदत्त की जानी चाहिए थी ।
स्पष्टीकरणश्न्इस धारा के प्रयोजनों के लिए, ऐसी किसी किस्त के बारे में जो ऐसे पूर्ववर्ष के प्रारम्भ से जिसकी बाबत वह संदत्त की जानी है छह मास की समाप्ति के पूर्व देय होती है, यह समझा जाएगा कि वह उक्त छह मास की समाप्ति के पन्द्रह दिन पश्चात् देय हुई है ।ट
8. निर्धारण से छूट गए लाभश्न्यदिश्न्
(क) 1झ्र्निर्धारण अधिकारीट के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी निर्धारण वर्ष के लिए धारा 5 के अधीन निर्धारिती की ओर से विवरणी दिए जाने में, या किसी निर्धारण वर्ष के लिए उसके निर्धारण के लिए आवश्यक सभी तात्त्विक तथ्यों के पूर्णतया और ठीक-ठीक प्रकट किए जाने में, लोप या असफलता के कारण उस वर्ष के लिए प्रभार्य लाभ निर्धारण से छूट गए हैं या अवनिर्धारित हुए हैं या बहुत ही कम दर पर निर्धारित हुए हैं या इस अधिनियम के अधीन उन पर अत्यधिक राहत दे दी गई है, अथवा
(ख) इस बात के होते हुए भी कि खण्ड (क) में यथावर्णित कोई लोप या असफलता निर्धारिती की ओर से नहीं हुई है, 1झ्र्निर्धारण अधिकारीट के अपने कब्जे में की जानकारी के परिणामस्वरूप यह विश्वास करने का कारण है कि किसी निर्धारण वर्ष के लिए निर्धार्य प्रभार्य लाभ निर्धारण से छूट गए हैं या अवनिर्धारित हुए हैं या बहुत ही कम दर पर निर्धारित हुए हैं या इस अधिनियम के अधीन उन पर अत्यधिक राहत दे दी गई है,
तो वह खण्ड (क) के अधीन आने वाले मामलों में किसी भी समय, और खण्ड (ख) के अधीन आने वाले मामलों में उस निर्धारण वर्ष की समाप्ति के चार वर्ष के भीतर किसी भी समय निर्धारिती पर एक सूचना की तामील करा सकेगा जिसमें ऐसी सभी या कोई भी अपेक्षाएं, जो धारा 5 के अधीन किसी सूचना में की जाएं, अन्तर्विष्ट होंगी और अतिकर के लिए प्रभार्य रकम निर्धारित या पुर्निर्धारित करने की कार्यवाही कर सकेगा, और इस अधिनियम के उपबन्ध यावत्शक्य उसी प्रकार लागू होंगे मानो वह सूचना उस धारा के अधीन निकाली गई सूचना हो ।
9. शास्तियांश्न्यदि, इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के दौरान 1झ्र्निर्धारण अधिकारीट का यह समाधान हो जाए कि कोई व्यक्ति, युक्तियुक्त हेतुक के बिना, धारा 5 के अधीन अपेक्षित विवरणी देने में, या धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन 1झ्र्निर्धारण अधिकारीट द्वारा अपेक्षित लेखाओं, दस्तावेजों या अन्य साक्ष्य पेश करने या पेश कराने में असफल रहा है या उसने प्रभार्य लाभों की विशिष्टियों को छिपाया है या ऐसे लाभों की अशुद्ध विशिष्टियां दी हैं, तो वह यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा व्यक्ति, संदेय अतिकर की रकम के अतिरिक्त शास्ति के रूप में ऐसी राशि भी संदत्त करेगा जोश्न्
(क) उस दशा में, जिसमें कि वह व्यक्ति धारा 5 के अधीन अपेक्षित विवरणी देने में असफल रहा है, झ्र्इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन प्रभार्य अतिकरट की रकम से अधिक न होगी ;
(ख) किसी अन्य दशा में, अतिकर की उस रकम से अधिक न होगी जो बचा ली गई होती यदि दी गई विवरणी ठीक मानकर स्वीकृत कर ली जाती :
परन्तु 1झ्र्निर्धारण अधिकारीट झ्र्उपायुक्तट के पूर्व प्राधिकार के बिना, इस धारा के अधीन कोई शास्ति अधिरोपित नहीं करेगा ।
झ्र्9क. अग्रिम अतिकर का मिथ्या प्राक्कलन या उसके संदाय में असफलताश्न्(1) यदि 1झ्र्निर्धारण अधिकारीट का किसी निर्धारण वर्ष के लिए नियमित निर्धारण से सम्बन्धित कार्यवाहियों के दौरान समाधान हो जाता है किश्न्
(क) किसी निर्धारिती ने अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) के अधीन ऐसा कथन दिया है जिसके बारे में वह जानता था या उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि वह मिथ्या है, अथवा
(ख) कोई निर्धारिती अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) के उपबन्धों के अनुसार कथन देने में युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहा है,
तो वह निदेश दे सकेगा कि ऐसा निर्धारिती अपने द्वारा संदेय अतिकर की रकम के अतिरिक्त, यदि कोई हो, शास्ति के रूप में ऐसी राशि संदत्त करेगा,श्न्
(त्) जो खण्ड (क) में निर्दिष्ट दशा में, उतनी रकम के दस प्रतिशत से कम किन्तु ड्योढ़े से अधिक न होगी, जितनी से निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान धारा 7क के उपबन्धों के अधीन वस्तुतः संदत्त अतिकर निम्नलिखित में से जो भी कम हो, उससे कम पड़ता है अर्थात् :श्न्
(1) निर्धारित अतिकर का तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत, अथवा
(2) वह रकम जो अग्रिम अतिकर के रूप में संदेय होती, यदि निर्धारिती ने धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) के उपबन्धों के अनुसार सही और पूर्ण कथन दिया होता ;
(त्त्) जो खण्ड (ख) में निर्दिष्ट दशा में, निर्धारित अतिकर के दस प्रतिशत से कम और तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत के ड्योढे़ से अधिक नहीं होगी ।
(2) यदि झ्र्निर्धारण अधिकारीट का किसी निर्धारण वर्ष के लिए नियमित निर्धारण से सम्बन्धित किन्हीं कार्यवाहियों के दौरान यह समाधान हो जाता है किश्न्
(क) किसी निर्धारिती ने अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (ख) या उपधारा (6) या उपधारा (7) या उपधारा (9) के अधीन ऐसा प्राक्कलन दिया है जिसके बारे में वह जानता था या उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि वह मिथ्या है, अथवा
(ख) किसी निर्धारिती ने अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (8) के अधीन ऐसा प्राक्कलन दिया है जिसके बारे में वह जानता था या उसके पास यह विश्वास करने का कारण था कि वह मिथ्या है, अथवा
(ग) कोई निर्धारिती अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (ख) के उपबन्धों के अनुसार प्राक्कलन देने में युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहा है, अथवा
(घ) कोई निर्धारिती अपने द्वारा संदेय अग्रिम अतिकर का धारा 7क की उपधारा (8) के उपबन्धों के अनुसार प्राक्कलन देने में युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहा है,
तो वह यह निदेश दे सकेगा कि वह व्यक्ति अपने द्वारा संदेय अतिकर की रकम के, यदि कोई हो, अतिरिक्त, शास्ति के रूप में ऐसी राशि संदत्त करेगा,श्न्
(त्) जो खण्ड (क) में निर्दिष्ट दशा में, उतनी रकम के दस प्रतिशत से कम और ड्योढे़ से अधिक न होगी, जितनी से निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान धारा 7क के उपबंधों के अधीन वस्तुतः संदत्त अतिकर, निम्नलिखित में से जो भी कम हो उससे कम पड़ता है, अर्थात् :श्न्
(1) निर्धारित अतिकर का तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत, अथवा
(2) जहां निर्धारिती द्वारा धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) के अधीन कथन दिया गया था, ऐसे कथन के अधीन संदेय रकम ;
(त्त्) जो खण्ड (ख) में निर्दिष्ट दशा में, उतनी रकम के दस प्रतिशत से कम किन्तु ड्योढे़ से अधिक न होगी जितनी से निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान धारा 7क के उपबन्धों के अधीन वस्तुतः संदत्त अतिकर, निर्धारित अतिकर के तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत से कम पड़ता है ;
(त्त्त्) जो खण्ड (ग) में निर्दिष्ट दशा में, दस प्रतिशत से कम नहीं होगी किन्तु निर्धारित अतिकर के तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत के ड्योढे़ से अधिक नहीं होगी ; और
(त्ध्) जो खण्ड (घ) में निर्दिष्ट दशा में, उतनी रकम के दस प्रतिशत से कम किन्तु ड्योढे़ से अधिक नहीं होगी जितनी से धारा 7क की उपधारा (5) के खण्ड (क) के अधीन कथन या खण्ड (ख) के अधीन प्राक्कलन या उक्त धारा की उपधारा (6) के अधीन कथन के बदले प्राक्कलन के अनुसार संदेय अतिकर की रकम, निर्धारित अतिकर के तिरासी सही एक बटा तीन प्रतिशत से कम पड़ती है ।
स्पष्टीकरणश्न् झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट ने, आय-कर अधिनियम की धारा 209क की उपधारा (4) के प्रथम परन्तुक या धारा 212 की उपधारा (3क) के प्रथम परन्तुक द्वारा प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में, यथास्थिति, उक्त उपधारा (4) या उक्त उपधारा (3क) में निर्दिष्ट प्राक्कलन देने की तारीख बढ़ा दी है और इस प्रकार बढ़ाई गई तारीख उस निर्धारण वर्ष के ठीक पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के बाद पड़ती है तो इस प्रकार विस्तारित तारीख को या उसके पूर्व निर्धारिती द्वारा संदत्त अतिकर की रकम उपधारा (2) के खण्ड (त्त्) के प्रयोजनों के लिए भी उस वित्तीय वर्ष के दौरान वास्तव में संदत्त अतिकर की रकम समझी जाएगी ।ट
10. सुनवाई का अवसरश्न् झ्र्धारा 9 या धारा 9क के अधीनट शास्ति अधिरोपित करने वाला कोई भी आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि निर्धारिती को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।
11. आयुक्त (अपील) से अपीलेंश्न्(1) कोई व्यक्ति, जो झ्र्निर्धारण अधिकारीट द्वारा अतिकर अतिकर की रकम के लिए दायी के रूप में निर्धारित है, आक्षेप करता है या इस बात से इंकार करता है कि वह इस अधिनियम के अधीन निर्धारित किए जाने का दायी है या 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट द्वारा अधिरोपित शास्ति या जुर्माने पर झ्र्या धारा 7घ के अधीन 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट द्वारा उद्गृहीत ब्याज परट या इस अधिनियम के किन्हीं उपबन्धों के अधीन राहत के रूप में 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट द्वारा अनुज्ञात रकम पर, या 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट द्वारा किसी रहित रकम के नामंजूर किए जाने पर, या निर्धारण में वृद्धि या प्रतिदाय में कमी करने के प्रभाव वाले परिशुद्धि या संशोधन के आदेश पर, या धारा 13 के अधीन परिशुद्धि के लिए या धारा 14 के अधीन संशोधन के लिए निर्धारिती द्वारा किए गए दावे को नामंजूर करने वाले आदेश पर आक्षेप करता है, वह झ्र्आयुक्त (अपील)ट से अपील कर सकेगा ।
(2) हर अपील विहित प्ररूप में होगी और विहित रीति से सत्यापित की जाएगी ।
(3) अपील निम्नलिखित तारीख को और उससे तीस दिन के भीतर उपस्थित की जाएगी, अर्थात् :श्न्
(क) जहां अपील का संबंध किसी निर्धारण या शास्ति या जुर्मान से है वहां निर्धारण या शास्ति या जुर्माने से संबंधित मांग की सूचना की तामील की तारीख, या
(ख) किसी अन्य दशा में, वह तारीख जिसको, उस आदेश का जिसके विरुद्ध अपील ईप्सित है, प्रज्ञापन तामील किया गया है :
परन्तु यदि 4झ्र्आयुक्त (अपील)ट का समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी के पास उस कालावधि के भीतर अपील उपस्थित न किए जाने के लिए पर्याप्त हेतुक था तो वह उक्त कालावधि के अवसान के पश्चात् भी अपील ग्रहण कर सकेगा ।
(4) 4झ्र्आयुक्त (अपील)ट अपील की सुनवाई और अवधारण करेगा और इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, ऐसे आदेश पारित करेगा जैसे वह ठीक समझे और ऐसे आदेशों के अन्तर्गत निर्धारण या शास्ति में वृद्धि करने वाला आदेश भी हो सकेगा :
परन्तु निर्धारण या शास्ति में वृद्धि करने वाला आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि उस व्यक्ति को, जिस पर उसका प्रभाव पड़ता हो, ऐसी वृद्धि के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।
(5) अपीलों की सुनवाई और अवधारण के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया ऐसे आवश्यक उपान्तर के साथ होगी, जो आय-कर के संबंध में लागू प्रक्रिया के अनुसार हो ।
झ्र्11क. कुछ लम्बित अपीलों का अन्तरणश्न्इस अधिनियम के अधीन प्रत्येक अपील जो नियत दिन के ठीक पहले किसी सहायक आयुक्त (अपील) या आयुक्त के समक्ष लंबित है और ऐसी अपील से उद्भूत होने वाला या सम्बद्ध कोई मामला जो इस प्रकार लंबित है उस दिन आयुक्त (अपील) को अन्तरित हो जाएगा और आयुक्त (अपील) ऐसी अपील या मामले पर उस प्रक्रम से आगे कार्यवाही करेगा जिस पर वह उस दिन था :
परन्तु अपीलार्थी यह मांग कर सकेगा कि अपील या मामले में आगे कार्यवाही करने से पहले पूर्वतर कार्यवाही या उसका कोई भाग नए सिरे से किया जाए या उसकी फिर से सुनवाई की जाए ।
स्पष्टीकरणश्न्इस धारा में नियत दिनञ्ज् से वित्त (सं० 2) अधिनियम, 1977 की धारा 39 के अधीन नियत तारीख अभिप्रेत है ।ट
12. अपील अधिकरण में अपीलेंश्न्(1) धारा 16 के अधीन आयुक्त द्वारा पारित आदेश अथवा इस अधिनियम के किसी उपबंध के अधीन 4झ्र्आयुक्त (अपील)ट द्वारा पारित आदेश से व्यथित निर्धारिती, ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील अधिकरण में अपील कर सकेगा ।
(2) यदि झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट 6झ्र्आयुक्त (अपील)ट द्वारा इस अधिनियम के किसी उपबंध के अधीन पारित आदेश पर आक्षेप करता है तो 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट को निदेश दे सकेगा कि वह उस आदेश के विरुद्ध अपील अधिकरण में अपील करे ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन हर अपील उस तारीख को और उससे साठ दिन के भीतर फाइल की जाएगी जिसको वह आदेश, जिसके विरुद्ध अपील ईप्सित है, यथास्थिति, निर्धारिती को या आयुक्त को संसूचित किया जाता है ।
(4) यथास्थिति 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट या निर्धारिती, यह सूचना प्राप्त होने पर कि 4झ्र्आयुक्त (अपील)ट के आदेश के विरुद्ध उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन दूसरे पक्षकार द्वारा कोई अपील प्रस्तुत की गई है, इस बात के होते हुए भी कि उसने ऐसे आदेश या उसके किसी भाग के विरुद्ध कोई अपील नहीं की है, 4झ्र्आयुक्त (अपील)ट के आदेश के किसी भी भाग के विरुद्ध प्रत्याक्षेपों का एक ज्ञापन, जो विहित रीति से सत्यापित हो, सूचना की प्राप्ति को और उससे तीस दिन के भीतर फाइल कर सकेगा, और ऐसा ज्ञापन अपील अधिकरण द्वारा उसी प्रकार निपटाया जाएगा मानो वह उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट समय के भीतर उपस्थित की गई कोई अपील हो ।
(5) अपील अधिकरण, उपधारा (3) या उपधारा (4) में निर्दिष्ट सुसंगत कालावधि के अवसान के पश्चात् भी अपील ग्रहण कर सकेगा या प्रत्याक्षेपों के ज्ञापन को फाइल करने की अनुज्ञा दे सकेगा यदि उसका समाधान हो जाए कि उस कालावधि के भीतर उसे उपस्थित न किए जाने के लिए पर्याप्त हेतुक था ।
(6) अपील अधिकरण में अपील विहित प्ररूप में होगी और विहित रीति से सत्यापित की जाएगी तथा, उपधारा (2) में निर्दिष्ट अपील के या उपधारा (4) में निर्दिष्ट प्रत्याक्षेपों के ज्ञापन की दशा के सिवाय, उसके साथ झ्र् झ्र्दौ सौ रुपएट की फीसट दी जाएगी ।
(7) इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, इस धारा के अधीन किसी अपील की सुनवाई में और उस पर कोई आदेश करने में अपील अधिकरण उन्हीं शक्तियों का प्रयोग और उसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जिनका प्रयोग और अनुसरण आय-कर अधिनियम के अधीन किसी अपील की सुनवाई में और उस पर आदेश करने में वह करता है ।
13. भूलों की परिशुद्धिश्न्(1) झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट, झ्र्निर्धारण अधिकारीट, झ्र्आयुक्त (अपील)ट और अपील अधिकरण, स्वप्रेरणा पर, अथवा निर्धारिती द्वारा इस निमित्त किए गए आवेदन पर, इस अधिनियम के अधीन की किसी कार्यवाही में अपने द्वारा पारित आदेश को, अभिलेख से प्रकट किसी भूल की परिशुद्धि करने की दृष्टि से झ्र्उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें ऐसा आदेश पारित किया गया था, अंत से चार वर्ष के भीतरट संशोधित कर सकेगा ।
(2) ऐसा संशोधन, जिसका प्रभाव निर्धारण में वृद्धि करना या प्रतिदाय में कमी करना या निर्धारिती के दायित्व में अन्य प्रकार से वृद्धि करना हो, इस धारा के अधीन नहीं किया जाएगा जब तक सम्बन्धित प्राधिकारी ने ऐसा करने के अपने आशय की सूचना निर्धारिती को न दे दी हो और निर्धारिती को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर अनुज्ञात न कर दिया हो ।
(3) जहां इस धारा के अधीन कोई संशोधन किया जाता है वहां आदेश सम्बन्धित प्राधिकारी द्वारा लिखित रूप में पारित किया जाएगा ।
(4) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अध्यधीन, जहां ऐसे किसी संशोधन का प्रभाव निर्धारण में कमी करना है वहां 4झ्र्निर्धारण अधिकारीट कोई ऐसा प्रतिदाय करेगा जो ऐसे निर्धारिती को देय हो ।
(5) जहां किसी ऐसे संशोधन का प्रभाव निर्धारण में वृद्धि करना या पहले ही किए जा चुके प्रतिदाय में कमी करना है, वहां 4झ्र्निर्धारण अधिकारीट निर्धारिती पर विहित प्ररूप में मांग की सूचना तामील कराएगा जिसमें संदेय राशि विनिर्दिष्ट होगी ।
14. अन्य संशोधनश्न्जहां आय-कर अधिनियम की झ्र्धारा 154, 155, 250, 254, 260, 262, 263 या 264ट के अधीन किए गए किसी आदेश के परिणामस्वरूप इस अधिनियम के अधीन के किसी निर्धारण में अवधारित प्रभार्य लाभों को पुनः संगणित करना आवश्यक है वहां 4झ्र्निर्धारण अधिकारीट प्रभार्य लाभों को पुनः संगणित करने और ऐसी पुनः संगणना के आधार पर संदेय या प्रतिदेय अतिकर अवधारित करने तथा आवश्यक संशोधन करने के लिए कार्यवाही कर सकेगा और इसे धारा 13 के उपबन्ध यावत्शक्य लागू होंगे, तथा उस धारा की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट चार वर्षों की कालावधि की संगणना झ्र्उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें आय-कर अधिनियम की पूर्वोक्त धाराओं के अधीन आदेश पारित किया गया था, अंत से की जाएगी ट ।
15. आय-कर अधिनियम के अधीन वितरणीय आय की संगणना करने में अतिकर का कटौती योग्य होनाश्न्आय-कर अधिनियम की धारा 109 के खंड (त्) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी कम्पनी की वितरणीय आय की, उस अधिनियम के अध्याय 11घ के प्रयोजनों के लिए संगणना करने में उस कम्पनी द्वारा किसी निर्धारण वर्ष के लिए संदेय अतिकर कम्पनी की उस निर्धारण वर्ष के लिए निर्धार्य कुल आय में से कटौती-योग्य होगा ।
16. राजस्व पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले आदेशों का पुनरीक्षणश्न्(1) 3झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट इस अधिनियम के अधीन किसी भी कार्यवाही के अभिलेख को मंगा सकेगा और उसकी जांच कर सकेगा, और यदि उसका यह विचार हो कि 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट द्वारा उसमें पारित आदेश वहां तक गलत है जहां तक कि वह राजस्व के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है तो वह निर्धारिती को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् तथा ऐसी जांच करने या कराने के पश्चात्, जैसी वह आवश्यक समझे, उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जैसा मामले की परिस्थितियों में न्यायोचित हो, जिसके अन्तर्गत निर्धारण में वृद्धि या उपान्तर करने का या, निर्धारण को रद्द करके नए सिरे से निर्धारण करने का निदेश देने का आदेश भी है ।
झ्र्स्पष्टीकरणश्न्शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए झ्र्निर्धारण अधिकारीट द्वारा पारित किए गए किसी आदेश के अन्तर्गत ऐसा कोई आदेश होगा जो झ्र्उपायुक्तट द्वारा आय-कर अधिनियम की धारा 125 की उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन या धारा 125क की उपधारा (1) के अधीन, जैसे वह इस अधिनियम की धारा 18 द्वारा लागू होती है, उसको प्रदत्त आय-कर अधिकारी की शक्तियों के प्रयोग में या उसको सौंपे गए 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट के कृत्यों के अनुपालन में पारित किया जाता है ।ट
झ्र्(2) उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश उस वित्तीय वर्ष के, जिसमें वह आदेश जिसका पुनरीक्षण चाहा गया है, पारित किया गया था, अंत से दो वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।ट
(3) उपधारा (2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस धारा के अधीन पुनरीक्षण का कोई आदेश, किसी भी समय किसी ऐसे आदेश की दशा में पारित किया जा सकेगा, जो अपील अधिकरण, उच्च न्यायालय या उच्चतम न्यायालय के किसी आदेश में अन्तर्विष्ट किसी निष्कर्ष या निदेश के परिणामस्वरूप, या उसे प्रभावशील बनाने के लिए पारित किया गया है ।
स्पष्टीकरणश्न्उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए परिसीमा काल की संगणना करने में वह कालावधि जिसके दौरान किसी न्यायालय के आदेश या व्यादेश से इस धारा के अधीन की कोई कार्यवाही रोकी गई हो, अपवर्जित कर दी जाएगी ।
17. आयुक्त द्वारा आदेशों का पुनरीक्षणश्न्(1) झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट या तो स्वप्रेरणा पर, या निर्धारिती द्वारा पुनरीक्षण के लिए आवेदन पर, इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसी कार्यवाही का अभिलेख मंगा सकेगा जो उसके अधीनस्थ किसी 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट ॥। द्वारा की गई है और ऐसी जांच कर सकेगा या ऐसी जांच करा सकेगा, तथा इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन, उस पर ऐसा आदेश, जैसा वह ठीक समझे, जो निर्धारिती पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला आदेश न हो, पारित कर सकेगा ।
(2) यदि कोई आदेश एक वर्ष के पहले किया गया हो तो 5झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट स्वप्रेरणा पर ऐसे आदेश का पुनरीक्षण इस धारा के अधीन नहीं करेगा ।
(3) निर्धारिती द्वारा, इस धारा के अधीन पुनरीक्षण के लिए आवेदन की दशा में आवेदन उस तारीख को और उससे, जिसको उसे प्रश्नगत आदेश संसूचित किया गया था या उस तारीख को और उससे, जिसको उसे उसके बारे में अन्य प्रकार से ज्ञात हुआ था, जो भी पूर्वतर हो, एक वर्ष के भीतर किया जाएगा :
परन्तु यदि 5झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट का समाधान हो जाता है कि निर्धारिती उक्त कालावधि के भीतर आवेदन करने से पर्याप्त हेतुक द्वारा निवारित रहा था तो वह उस कालावधि के अवसान के पश्चात् किए गए आवेदन को ग्रहण कर सकेगा ।
(4) 5झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट निम्नलिखित दशाओं में किसी भी आदेश का पुनरीक्षण इस धारा के अधीन नहीं करेगाश्न्
झ्र्(क) जहां उस आदेश के विरुद्ध अपील, आयुक्त (अपील) को हो सकती है किन्तु की नहीं गई है और उस समय का जिसके भीतर ऐसी अपील की जा सकती है, अवसान नहीं हुआ है अथवा निर्धारिती ने अपील करने के अपने अधिकार का अधित्यजन नहीं किया है; या
(ख) जहां आदेश, आयुक्त (अपील) को अपील का विषय वस्तु बनाया गया है ।ट
(5) इस धारा के अधीन पुनरीक्षण के लिए हर आवेदन निर्धारिती द्वारा पच्चीस रुपए की फीस सहित दिया जाएगा ।
स्पष्टीकरण 1श्न्हस्तक्षेप करने से इंकार करने का 5झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट का आदेश इस धारा के प्रयोजनों के लिए निर्धारिती पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला आदेश नहीं समझा जाएगा ।
। । । । ।
18. आय-कर अधिनियम के उपबंधों का लागू होनाश्न्आय-कर अधिनियम की निम्नलिखित धाराओं तथा अनुसूचियों के उपबन्ध और समय-समय पर यथा प्रवृत्त आय-कर (प्रमाणपत्र कार्यवाही) नियम, 1962, ऐसे उपान्तरों सहित, यदि कोई हों, जैसे विहित किए जाएं, उसी प्रकार लागू होंगे मानो उक्त उपबन्धों तथा नियमों में आय-कर के स्थान पर अतिकर ॥। के प्रति निर्देश होंश्न्
झ्र्2(44)ट, झ्र्116, 117, 118, 119, 120, 129ट, 131, 132, 132क, झ्र्132खट, 133 से 136 तक (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं)ट, 138, 140, 156, 160, 161, 162, 163, 166, 167, 170, 173, 175, 176, 178, 179, झ्र्218 से 229 तकट (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं), 231, 232, 233, 237 से 242 तक (जिनके अन्तर्गत ये दानों धाराएं भी हैं), 244, 245, 254 से 262 तक (जिनके अन्तर्गत ये दानों धाराएं भी हैं), 265, 266, 268, 269, 281, 3झ्र्281खट, 282, 284, झ्र्287, 288, 288क, 288ख, 289 से 293 तक (जिनके अन्तर्गत ये दोनों धाराएं भी हैं)ट, द्वितीय अनुसूची और तृतीय अनुसूची :
परन्तु उक्त उपबन्धों और नियमों में निर्धारितीञ्ज् के प्रति निर्देशों का अर्थ यह किया जाएगा कि वे इस अधिनियम में यथापरिभाषित निर्धारिती के प्रति निर्देश हैं ।
19. इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आय-कर कागजपत्रों का उपलभ्य होनाश्न्(1) आय-कर अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किए गए किसी कथन या दी गई किसी विवरणी में अन्तर्विष्ट या उस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अभिप्राप्त या संगृहीत सभी जानकारी का उपयोग इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए किया जा सकेगा ।
(2) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किए गए किसी कथन या दी गई किसी विवरणी में अन्तर्विष्ट या इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अभिप्राप्त या संगृहीत सभी जानकारी का उपयोग आय-कर अधिनियम के प्रयोजनों के लिए किया जा सकेगा ।
20. विवरणियां आदि परिदत्त करने में असफलताश्न्यदि कोई व्यक्ति, युक्तियुक्त हेतुक के बिना, धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन कोई विवरणी सम्यक् समय में देने में, या धारा 6 के अधीन पेश किए जाने के लिए अपेक्षित कोई लेखा या दस्तावेजें पेश करने, या पेश कराने में असफल रहेगा तो वह जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा और हर दिन के लिए जिसके दौरान वह व्यतिक्रम चालू रहता है, अतिरिक्त जुर्माने से, जो दस रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
21. मिथ्या कथनश्न्यदि कोई व्यक्ति धारा 5 के अधीन दी गई किसी विवरणी में कोई ऐसा कथन करेगा जो मिथ्या है और जिसका मिथ्या होना या तो वह जानता है या जिसके मिथ्या होने का वह विश्वास करता है या जिसके सत्य होने का वह विश्वास नहीं करता है, तो वह सादा कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
22. मिथ्या विवरणियां, आदि का दुष्प्रेरणश्न्यदि कोई व्यक्ति अतिकर के दायी प्रभार्य लाभों के संबंध में कोई लेखा, कथन या घोषणा, जो मिथ्या हो, जिसका मिथ्या होना या तो वह जानता है या जिसके सत्य होने का वह विश्वास नहीं करता है, बनाएगा या करेगा, या किसी अन्य व्यक्ति को किसी भी रीति से बनाने या करने और परिदत्त करने को उत्प्रेरित करेगा, तो वह सादा कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
23. कार्यवाहियों का संस्थित किया जाना और अपराधों का शमनश्न्(1) धारा 20 या धारा 21 या धारा 22 के अधीन या भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) के अधीन किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई कार्यवाही, झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट की प्रेरणा पर के सिवाय, नहीं की जाएगी ।
(2) 6झ्र्मुख्य आयुक्त या आयुक्तट, धारा 20 या धारा 21 या धारा 22 के अधीन दण्डनीय अपराध का शमन, कार्यवाहियों के संस्थित होने के पूर्व या पश्चात् कर सकेगा ।
24. कतिपय संघ राज्यक्षेत्रों के संबंध में छूट, आदि देने की शक्तिश्न्यदि किसी ऐसे कष्ट या विषमता को, जो दादरा और नागर हवेली, गोवा, दमण और दीव तथा पांडिचेरी के संघ राज्यक्षेत्रों पर इस अधिनियम के लागू होने के परिणामस्वरूप उत्पन्न हो, दूर करने या किसी ऐसी कठिनाई का निराकरण करने के लिए, केन्द्रीय सरकार के विचार में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है, तो वह निर्धारितियों के किसी वर्ग के पक्ष में या निर्धारितियों के किसी वर्ग के प्रभार्य लाभों के सम्पूर्ण या उनके किसी भाग के बारे में साधारण या विशेष आदेश द्वारा अतिकर की बाबत छूट दे सकेगी, दर में कमी कर सकेगी या कोई अन्य उपान्तर कर सकेगी ।
झ्र्24क. विदेशों से करारश्न्केन्द्रीय सरकार भारत से बाहर किसी देश की सरकार से,श्न्
(क) ऐसे प्रभार्य लाभों की बाबत जिन पर इस अधिनियम के अधीन अतिकर और उस देश में ऐसे लाभों पर इसी प्रकार का कर या आय-कर संदत्त किया जा चुका है, राहत के लिए, या
(ख) इस अधिनियम के अधीन और आय या लाभ के कराधान के संबंध में उस देश में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन प्रभार्य लाभों के दोहरे कराधान का परिवर्जन करने के लिए, या
(ग) इस अधिनियम के अधीन प्रभार्य अतिकर के या उस देश में प्रवृत्त तत्समान विधि के अधीन प्रभार्य कर के अपवंचन या अपवर्जन को रोकने के लिए जानकारी के आदान-प्रदान या ऐसे अपवंचन या अपवर्जन के मामलों के अन्वेषण के लिए, या
(घ) इस अधिनियम के अधीन और आय या लाभ के कराधान के संबंध में उस देश में प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन कर की वसूली के लिए,
करार कर सकती है, और राजपत्र में अधिसूचा द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकती है जो ऐसे करार को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हों ।ट
झ्र्24कक. खनिज तेलों के पूर्वेक्षण, निष्कर्षण आदि के कारबार में भाग लेने के संबंध में छूट आदि देने की शक्तिश्न्(1) यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि लोक हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट विदेशी कम्पनियों के वर्ग के पक्ष में या ऐसे वर्ग की कम्पनियों के सम्पूर्ण प्रभार्य लाभ या उसके किसी भाग के बारे में अतिकर की बाबत छूट दे सकेगी, दर में कमी कर सकेगी या अन्य उपान्तर कर सकेगी ।
स्पष्टीकरणश्न्इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए विदेशी कम्पनीञ्ज् का वही अर्थ होगा जो आय-कर अधिनियम की धारा 80ख के खण्ड (4) में है ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट विदेशी कम्पनियां निम्नलिखित हैं, अर्थात् :श्न्
(क) वे विदेशी कम्पनियां जिनके साथ केन्द्रीय सरकार ने उस सरकार के या उस सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के, खनिज तेलों के लिए पूर्वेक्षण या उनके निष्कर्षण या उत्पादन के कारबार में सहयोजन या भाग लेने के लिए करार किए हैं, और
(ख) वे विदेशी कम्पनियां जो उस सरकार द्वारा या उस सरकार द्वारा इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति द्वारा, खनिज तेलों के लिए पूर्वेक्षण या उनके निष्कर्षण या उत्पादन के कारबार के संबंध में कोई सेवाएं या सुविधाएं प्रदान कर रही हैं अथवा कोई पोत, वायुयान, मशीनरी या संयंत्र प्रदाय कर रही हैं (चाहे विक्रय के रूप में हो या भाडे़ पर) ।
(3) इस धारा के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
स्पष्टीकरणश्न्इस धारा के प्रयोजनों के लिए खनिज तेलोंञ्ज् के अन्तर्गत पैट्रोलियम और प्राकृतिक गैस भी है ।ट
25. नियम बनाने की शक्तिश्न्(1) बोर्ड, केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अध्यधीन रहते हुए, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगा ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :श्न्
(क) वह प्ररूप, जिसमें धारा 5 के अधीन विवरणियां दी जा सकेंगी और वह रीति, जिससे वे सत्यापित की जा सकेंगी ;
(ख) वह प्ररूप, जिसमें अनन्तिम निर्धारण करने के लिए सूचना दी जाएगी ;
(ग) वह प्ररूप, जिसमें धारा 11 या धारा 12 के अधीन अपीलें फाइल की जा सकेंगी और वह रीति, जिससे वे सत्यापित की जाएंगी ;
झ्र्(गग) वे परिस्थितियां जिनमें, वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए और वह रीति जिसमें झ्र्आयुक्त (अपील)ट किसी अपीलार्थी को ऐसा साक्ष्य पेश करने के लिए अनुज्ञात कर सकता है जो उसने आय-कर अधिकारी के समक्ष पेश नहीं किया था या जिसे पेश करने के लिए अनुज्ञात नहीं किया गया था ;ट
(घ) वह प्रक्रिया जिसका भूलों की परिशुद्धि के आवेदनों पर और प्रतिदायों के आवेदनों पर अनुसरण किया जाना है ;
झ्र्(घघ) इस अधिनियम के अधीन निर्धारितियों द्वारा संदेय ब्याज या सरकार द्वारा निर्धारितियों को संदेय ब्याज के परिकलन के लिए अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, जिसके अन्तर्गत उस कालावधि का, जिसके लिए ब्याज का परिकलन किया जाना है, पूर्णांकन जब ऐसी कालावधि में मास का भाग सम्मिलित है, और वे परिस्थितियां जिनमें और वह मात्रा जिस तक निर्धारिती द्वारा संदेय ब्याज की छोटी-मोटी रकमें छोडी जा सकेंगी, विनिर्दिष्ट करना आता है ;ट
(ङ) कोई अन्य विषय, जो इस अधिनियम द्वारा विहित किया जाना है या किया जाए ।
झ्र्(2क) इस धारा द्वारा प्रदत्त नियम बनाने की शक्ति के अन्तर्गत नियमों को या उनमें किसी नियम को भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति भी है और जब तक (अभिव्यक्ततः या आवश्यक विवक्षा द्वारा) इसके प्रतिकूल अनुज्ञात न किया जाए तब तक किसी नियम को इस प्रकार भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा कि निर्धारितियों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े तथा इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पूर्वतर किसी तारीख से भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा ।ट
(3) केन्द्रीय सरकार, इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए, रखवाएगी । यह अवधि एक सत्र में झ्र्अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों मेंट पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के 1झ्र्या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र केट अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।
26. व्यावृत्तिश्न्इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात किसी ऐसी कम्पनी को लागू न होगी जिसकी कोई शेयर पूंजी नहीं है ।
प्रथम अनुसूची
झ्र्धारा 2(5) देखिएट
प्रभार्य लाभों की संगणना करने के लिए नियम
किसी पूर्ववर्ष के प्रभार्य लाभों की संगणना करने में आय-कर अधिनियम के अधीन इस वर्ष के लिए संगणित कुल आय निम्नलिखित रूप में समायोजित की जाएगी :श्न्
1. आय, लाभ और अभिलाभ तथा अन्य राशियां जो निम्नलिखित खंडों के अन्तर्गत आती हैं ऐसी कुल आय में से अपवर्जित की जाएंगी, अर्थात् :श्न्
(त्) आय-कर अधिनियम के अधीन पूंजी-अभिलाभञ्ज् शीर्ष के अन्तर्गत प्रभार्य कोई आय ;
(त्त्) आय-कर अधिनियम की धारा 28 के खण्ड (त्त्) में यथानिर्दिष्ट प्रतिकर या अन्य संदाय ;
(त्त्त्) जीवन बीमा के किसी कारबार के लाभ और अभिलाभ ;
(त्ध्) आय-कर अधिनियम की धारा 41 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट कोई आय ;
। । । । ।
(ध्त्) आय-कर अधिनियम के अधीन प्रतिभूतियों पर ब्याजञ्ज् शीर्ष के अधीन प्रभार्य वह आय, जो केन्द्रीय सरकार की किसी ऐसी प्रतिभूति से, जो आय-कर से मुक्त पुरोधृत या घोषित की गई हो या किसी राज्य सरकार की किसी ऐसी प्रतिभूति से, जो आय-कर से मुक्त पुरोधृत की गई हो तथा जिस पर आय-कर उस राज्य सरकार द्वारा संदेय होता हो, व्युत्पन्न हो ;
झ्र्(ध्त्त्) वह रकम जो, ऐसी राशि के पचास प्रतिशत के बराबर हो जिसके प्रति निर्देश से आय-कर अधिनियम की धारा 80छ के उपबन्धों के अधीन कम्पनी को कटौती अनुज्ञेय है ;ट
(ध्त्त्त्) किसी भारतीय कम्पनी से या ऐसी कम्पनी से, जिसने भारत के भीतर लाभांशों की घोषणा और संदाय के लिए विहित इन्तजाम किए हैं, लाभांशों के रूप में आय ;
(त्न्) सरकार से या किसी स्थानीय प्राधिकारी से या किसी भारतीय समुत्थान से स्वामिस्वों के रूप में प्राप्त आय ;
(न्) ऐसी अनिवासी कम्पनी की दशा में, जिसने भारत के भीतर लाभांशों की घोषणा और संदाय के लिए विहित इन्तजाम नहीं किए हैं, उसकी वह आय, जो सरकार से या किसी स्थानीय प्राधिकारी से या किसी भारतीय समुत्थान से ब्याज के रूप में या तकनीकी सेवाएं करने के लिए फीस के रूप में प्राप्त हो ;
(न्त्) बैंककारी कम्पनी की दशा मेंश्न्
(क) कोई ऐसी राशि, जो पूर्ववर्ष के दौरान उसके द्वारा बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन की किसी आरक्षित निधि में अन्तरित की गई है या उस अधिनियम की धारा 11 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) के उपखंड (त्त्) के अधीन उसके द्वारा भारतीय रिजर्व बैंक में निक्षिप्त की गई है और पूर्वोक्त उपबन्धों के अधीन, यथास्थिति, इस प्रकार अन्तरित या निक्षिप्त की जाने के लिए अपेक्षित रकम से अधिक नहीं है, अथवा
(ख) कोई ऐसी राशि, जो पूर्ववर्ष में उसके द्वारा भारत की किन्हीं आरक्षितियों में, जिसके अन्तर्गत ऐसी आरक्षितियां भी हैं जो उसके प्रकाशित तुलन-पत्र में इस रूप में दर्शित नहीं की गई हैं वहां तक जहां तक कि ऐसी आरक्षितियों में अन्तरित राशियां आय-कर अधिनियम के अधीन कर से प्रभार्य आय में मानी जा सकती हैं और उस अधिनियम के अधीन उसकी कुल आय संगणित करने में कटौती के रूप में अनुज्ञात नहीं की गई हैं और जहां तक कि ऐसी राशियों का योग पूर्ववर्ष से पहले के तीन वर्षों में से किसी एक वर्ष के दौरान इस प्रकार अन्तरित ऐसी राशियों के, यदि कोई हों, योग की अधिकतम राशि से अधिक नहीं है,
इन दोनों राशियों में से जो भी अधिक हो ;
(न्त्त्) वार्षिक वित्त अधिनियम के अधीन कुल आय पर प्रभार्य आय-कर ॥। में से उस कटौती की रकम, जो किसी माल या वाणिज्या को भारत से बाहर निर्यात करने या किसी विनिर्माता द्वारा किसी माल को किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उन्हें भारत के बाहर निर्यात करता है, विक्रय करने के सबंध में वार्षिक वित्त अधिनियम के अधीन अनुज्ञात है ।
झ्र्स्पष्टीकरणश्न्इस नियम के किसी खण्ड में किसी बात के होते हुए भी, किसी आय या लाभ और अभिलाभ की रकम, जो इस नियम के किसी खण्ड के अधीन कुल आय में से अपवर्जित की जानी हैं, ऐसी आय या लाभ और अभिलाभ की वह रकम मात्र होगी जो आय-कर अधिनियम के (अध्याय 6क को छोड़कर) उपबन्धों के अनुसार यथासंगणित हो, और उस दशा में जहां ऐसी आय या लाभ और अभिलाभ की बाबत उक्त अध्याय 6क के अधीन कोई कटौती अनुज्ञात की जानी है वह आय या लाभ और अभिलाभ की रकम वह होगी जो ऐसी कटौती की रकम को घटाकर पूर्वोक्त रीति से संगणना करने पर प्राप्त हो ।ट
2. नियम 1 में वर्णित अपवर्जनों के करने के पश्चात् कुल आय का जो अतिशेष निकले उसमें से निम्नलिखित को कम कर दिया जाएगाश्न्
(त्) आय-कर अधिनियम या वार्षिक वित्त अधिनियम के उपबन्धों के अधीन आय-कर के बारे में कम्पनी जिस किसी राहत रकम, रिबेट या कटौती की हकदार है उसके लिए मोक देने के पश्चात् आय-कर अधिनियम के उपबन्धों के अधीन अपनी कुल आय के बारे में कम्पनी द्वारा संदेय आय-कर 1॥। की जो रकम हो उसमें से निम्नलिखित का अपवर्जन किए जाने के पश्चात्श्न्
(क) आय-कर 1॥। की वह रकम, यदि कोई हो, जो नियम 1 के खण्ड (त्) या खण्ड (त्त्) या खण्ड (त्त्त्) या खण्ड (ध्त्त्त्) में निर्दिष्ट किसी ऐसी आय के बारे में, जो कुल आय में सम्मिलित की गई है, कम्पनी द्वारा संदेय है ;
झ्र्(ख) आय-कर की वह रकम, यदि कोई हो, जो कम्पनी द्वारा लाभांशों के वितरणों की सुसंगत रकम के प्रति निर्देश से वार्षिक वित्त अधिनियम के उपबन्धों के अधीन उसके द्वारा संदेय है ।
स्पष्टीकरणश्न्इस उपखण्ड में लाभांशों के वितरणों की सुसंगत रकमञ्ज् पद का वही अर्थ है जो उसे सुसंगत वर्ष के वित्त अधिनियम में समनुदिष्ट है ;ट
झ्र्(ग) आय-कर की वह रकम, यदि कोई हो, जो कम्पनी द्वारा आय-कर अधिनियम की धारा 104 के अधीन संदेय है ।
स्पष्टीकरणश्न्अप्रैल, 1964 के प्रथम दिन को प्रारंभ होने वाले निर्धारण वर्ष के संबंध में इस उपखण्ड में आय-करञ्ज् के प्रति निर्देश का यह अर्थ किया जाएगा कि वह अधिकरञ्ज् के प्रति निर्देश है ;ट
(त्त्) ऐसी कम्पनी की दशा में, जिस पर आय-कर अधिनियम के अधीन यथा संगणित उसकी कुल आय में समाविष्ट उसकी आय, लाभों और अभिलाभों के किसी प्रभाग पर भारत के बाहर के किसी देश में कर प्रभारित किया गया है, उक्त देश में प्रवृत्त विधियों के अधीन देय हर राहत रकम के लिए मोक देने के पश्चात् ऐसी आय, लाभों और अभिलाभों के बारे में उक्त विधियों के अनुसार उस देश में वास्तव में दिया गया कर :
परन्तु पूर्वोक्त कमी तब तक अनुज्ञात नहीं की जाएगी जब तक निर्धारिती उस देश में पूर्वोक्त कर के संदाय के तथ्य का साक्ष्य पेश न कर दे ।
3. नियम 2 के अनुसार परिकलित आय की शुद्ध रकम में कमीशन, मनोरंजन और विज्ञापन लेखे उपगत किसी झ्र्व्यय की रकम के बराबरट उस विस्तार तक वृद्धि की जाएगी जिस तक ऐसा व्यय, परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, झ्र्निर्धारण अधिकारीट की राय में अत्यधिक है :
परन्तु यह तब जब कि झ्र्उपायुक्तट से ऐसे व्यय को अत्यधिक घटाए जाने के लिए पूर्व प्राधिकार अभिप्राप्त कर लिया गया हो ।
द्वितीय अनुसूची
झ्र्धारा 2(8) देखिएट
किसी कम्पनी की पूंजी को अतिकर के प्रयोजनों के लिए संगणना करने के लिए नियम
1. इस अनुसूची के अन्य उपबन्धों के अध्यधीन, किसी कम्पनी की पूंजी निम्नलिखित रकमों का, जैसी वे निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के पहले दिन थी, योग होगीश्न्
(त्) उसकी समादत्त शेयरपूंजी ;
(त्त्) भारतीय आय-कर अधिनियम, 1922 (1922 का 11) की धारा 10 की उपधारा (2) के खण्ड (ध्त्ख) के परन्तुक (ख) के अधीन या आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की 1झ्र्धारा 32क की उपधारा (4) या धारा 34 की उपधारा (3)ट के अधीन सर्जित उसकी आरक्षितियां, यदि कोई हों ;
(त्त्त्) उसकी अन्य आरक्षितियां, जिनमें से ऐसी आरक्षितियों में जमा की गई वे रकमें कम कर दी गई हों जो भारतीय आय-कर अधिनियम, 1922 (1922 का 11) या आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के प्रयोजनों के लिए कम्पनी की आय संगणित करने में कटौती के रूप में अनुज्ञात की गई है :
। । । । ।
झ्र्1क. जहां किसी कम्पनी ने निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के प्रथम दिन को यथा विद्यमान अपनी बहियों में किसी ऐसे खाते में कोई जमा नहीं किया है जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की अनुसूची 6 के भाग 1 में दिए गए तुलन-पत्रञ्ज् में दायित्वञ्ज् से सम्बन्धित स्तम्भ में चालू दायित्व और उपबन्धित रकमञ्ज् शीर्ष के अन्तर्गत मद (8) या मद (9) की प्रकृति का है, या जहां 2झ्र्निर्धारण अधिकारीट की यह राय है कि ऐसे खाते में जमा की गई रकम उस रकम से कम है जो युक्तियुक्त रूप से उसके द्वारा जमा की जानी थी वहां नियम 1 के अधीन यथा संगणित उसकी पूंजी की रकम में से वह रकम घटा दी जाएगी जो, यथास्थिति, इस प्रकार जमा नहीं की गई है या जितनी उस रकम से कम है ।
स्पष्टीकरणश्न्इस नियम के प्रयोजनों के लिए, पूर्वोक्त मद (9) की प्रकृति के खाते के संबंध में किसी कम्पनी द्वारा युक्तियुक्त रूप से जमा की जाने वाली रकम से अभिप्रेत है उस निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के प्रथम दिन को या उसके पश्चात् उस कम्पनी द्वारा प्रथम उल्लिखित पूर्ववर्ष के ठीक पहले के पूर्ववर्ष के लिए घोषित या संदत्त लाभांश की रकम ।ट
2. जहां किसी कम्पनी का ऐसी आस्तियों पर स्वामित्व है, जिनसे होने वाली आय का उसके प्रभार्य लाभों की संगणना करने में प्रथम अनुसूची के नियम 1 के खण्ड (त्त्त्) या खण्ड (ध्त्) या खण्ड (ध्त्त्त्) के अनुसार उसकी कुल आय में से अपवर्जित किया जाना अपेक्षित है, वहां इस अनुसूची के नियम 1 के अधीन यथा संगणित उसकी पूंजी की रकम में से उक्त आस्तियों का उसका खर्च, जैसा कि वह निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के पहले दिन था, वहां तक कम कर दिया जाएगा जहां तक कि ऐसा खर्च निम्नलिखित के योग से अधिक होश्न्
(त्) ॥। ऋण लिए गए धन और जो उक्त पूर्ववर्ष के पहले दिन परादेय रहे हों ; तथा
(त्त्) किसी निधि, किसी अधिशेष और किसी ऐसी आरक्षिती की रकम जिसे नियम 1 के अधीन पूंजी की संगणना करने में हिसाब में न लिया जाना हो ।
स्पष्टीकरण 1श्न्समादत्त शेयर पूंजी आरक्षिती, जो किसी बही आस्ति का सृजन या वृद्धि (पुनर्मूल्यांकन द्वारा या अन्यथा) करके अस्तित्व में लाई गई हो, उस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए किसी कम्पनी की पूंजी की संगणना करने के लिए पूंजी नहीं है ।
स्पष्टीकरण 2श्न्किसी कम्पनी के शेयरों के पुरोधृत किए जाने पर उसके द्वारा नकदी में प्राप्त किसी प्रीमियम को, जो शेयर प्रीमियम खाते में जमा हो, उसकी समादत्त शेयर पूंजी का भागरूप समझा जाएगा ।
स्पष्टीकरण 3श्न्जहां किसी कम्पनी की आय, लाभों और अभिलाभों के बारे में उसके पूर्ववर्ष भिन्न-भिन्न हों, वहां नियम 1, 2 और 3 के अधीन पूंजी की संगणना उस पूर्ववर्ष के निर्देश से की जाएगी जो सब से पहले प्रारंभ हुआ था ।
3. जहां निर्धारण वर्ष से सुसंगत पूर्ववर्ष के प्रथम दिन के पश्चात् इस अनुसूची के पूर्वगामी नियमों के अनुसार यथा संगणित कम्पनी की पूंजी में, समादत्त शेयर पूंजी की वृद्धि के झ्र्कारण उस पूर्ववर्ष के दौरान किसी रकम की वृद्धि हो जाए या समादत्त शेयरपूंजी में कमी के कारणट उसमें से कोई रकम कम हो जाए तो ऐसी पूंजी में, यथास्थिति, उतनी राशि की वृद्धि या कमी कर दी जाएगी जिसका अनुपात उस रकम के साथ वही है जो पूर्ववर्ष के, उन दिनों की संख्या का, जिनके दौरान वह वृद्धि या कमी प्रभावशाली रही थी, उस पूर्ववर्ष में के दिनों की कुल संख्या से है ।
4. जहां किसी कम्पनी की आय, लाभों और अभिलाभों का कोई भाग आय-कर अधिनियम के अधीन यथा संगणित उसकी कुल आय में सम्मिलित किए जाने योग्य न हो उसकी पूंजी नियम 1, 2 और 3 के अनुसार अभिनिश्चित वह राशि होगी जिसमें से ऐसी रकम कम कर दी गई हो जिसका अनुपात उस राशि के साथ वही है जो पूर्वोक्त आय, लाभों और अभिलाभों की रकम का उसकी आय, लाभों और अभिलाभों की कुल रकम से है ।
झ्र्तृतीय अनुसूची
झ्र्धारा 4 देखिएट
अतिकर की दरें
प्रभार्य लाभों में से उतनी रकम पर (जिसे इसमें आगे प्रभार्य रकम कहा गया है) जो कानूनी कटौती से अधिक है, निम्नलिखित दरों पर अतिकर प्रभारित किया जाएगा, अर्थात् :श्न्
(त्) उतनी प्रभार्य रकम पर जितनी द्वितीय अनूसूची के अनुसार यथासंगणित पूंजी की रकम के पांच प्रतिशत से अधिक नहीं है ट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठट्ठ 25 प्रतिशत ;
(त्त्) प्रभार्य रकम के अतिशेष पर, यदि कोई हो, झ्र्40 प्रतिशत ;ट
झ्र्परन्तु जहां किसी भारतीय कम्पनी की दशा में या ऐसी कम्पनी की दशा में जिसने भारत में लाभांश की घोषणा और संदाय के लिए विहित इन्तजाम कर लिए हैं,श्न्
(त्) जो ऐसी कम्पनी है जो आय-कर अधिनियम की धारा 108 में निर्दिष्ट है, और
(त्त्) जिसकी पूर्ववर्ष के अन्तिम दिन यथाविद्यमान समादत्त शेयर पूंजी (नकद में अभिदत्त और संदत्त) इस अधिनियम की द्वितीय अनुसूची के अधीन यथासंगणित पूंजी की रकम के पच्चीस प्रतिशत से कम नहीं है, वहांश्न्
(क) आय-कर अधिनियम या वार्षिक वित्त अधिनियम के उपबंधों के अधीन आय-कर के बारे में कम्पनी जिस किसी राहत रकम, रिबेट या कटौती की हकदार है उसके लिए मोक देने के पश्चात् आय-कर अधिनियम के उपबंधों के अधीन अपनी पूर्ववर्ष की कुल आय के बारे में कम्पनी द्वारा संदेय आय-कर की रकम; और
(ख) इस अनुसूची के पूर्वगामी उपबंधों के अनुसार संगणित अतिकर की रकम,
का योग कम्पनी की कुल आय के सत्तर प्रतिशत की दर से परिकलित रकम से अधिक है तो ऐसे आधिक्य की रकम को उपरोक्त खण्ड (ख) में निर्दिष्ट अतिकर की रकम से घटा दिया जाएगा और अतिशेष उस कम्पनी द्वारा संदेय अतिकर की रकम होगा ।

