रिचर्डसनसन एण्ड क्रूडास लिमिटेड (उपक्रम का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1972
(1972 का अधिनियम संख्यांक 78)
[30 दिसम्बर, 1972]
रिचर्डसन एण्ड क्रूडास लिमिटेड के उपक्रम के अर्जन और अन्तरण,
उसके सदस्यों के रजिस्टर को पुनः तैयार करने और उससे
सम्बन्धित या उसके आनुषंगिक विषयों का
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
रिचर्डसन एण्ड क्रूडास लिमिटेड, जो इंडियन कम्पनीज़ ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) के अधीन बनाई गई और रजिस्ट्रीकृत कम्पनी है, रक्षा स्थापनों, रेलों, इस्पात संयंत्रों और विद्युत परियोजनाओं द्वारा अपेक्षित माल के उत्पादन में लगी हुई है ;
और उक्त कम्पनी के पिछले प्रबन्ध अभिकर्ताओं और निदेशक बोर्ड द्वारा उसके कुप्रबन्ध का उक्त कम्पनी द्वारा माल के उत्पादन और प्रदाय पर गंभीर रूप से प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है ;
और उक्त कम्पनी की पूंजी में बहुत बड़ी संख्या में दोहरे शेयरों के विद्यमान होने के कारण उक्त कम्पनी के लिए यह संभव नहीं है कि वह सम्यक् रूप से गठित निदेशक बोर्ड द्वारा अपने उचित प्रबन्ध की व्यवस्था कर सके ;
और समाज के हित में उक्त कम्पनी द्वारा माल का लगातार उत्पादन और प्रदाय सुनिश्चित करने के लिए उक्त कम्पनी के उपक्रम का अर्जन करना लोकहित में समीचीन है ;
अतः भारत गणराज्य के तेईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
भाग 1
रिचर्डसन एण्ड क्रूडास लिमिटेड के उपक्रम का अर्जन और अन्तरण
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. सक्षिप्त नाम- इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम रिचर्डसन एण्ड क्रूडास लिमिटेड (उपक्रम का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1972 है ।
2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से वह तारीख अभिप्रेत है, जिसे केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा नियत करे ;
(ख) अभिरक्षक" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है, जो धारा 10 के अधीन, पुरानी कम्पनी का अभिरक्षक नियुक्त किया जाए;
(ग) राष्ट्रीयकृत बैंक" से बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) में यथापरिभाषित तत्स्थानी नया बैंक अभिप्रेत है ;
(घ) नई कम्पनी" से धारा 9 के उपबन्धों के अनुसरण में, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाई गई और रजिस्ट्रीकृत सरकारी कम्पनी अभिप्रेत है ;
(ङ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;
(च) पुरानी कम्पनी" से रिचर्डसनसन एण्ड क्रूडास लिमिटेड अभिप्रेत है जो इण्डियन कम्पनीज़ ऐक्ट, 1913(1913 का 7) के अधीन बनाई गई और रजिस्ट्रीकृत कम्पनी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय पश्चिमी बंगाल राज्य में है ;
(छ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ज) अनुसूचित बैंक" का वही अर्थ है जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) में है और इसके अन्तर्गत कोई राष्ट्रीयकृत बैंक भी है ;
(झ) शेयर" से पुरानी कम्पनी की पूंजी में शेयर अभिप्रेत है ;
(ञ) अधिकरण" से धारा 13 के अधीन गठित अधिकरण अभिप्रेत है ।
(2) उन शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं, किन्तु कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं, इस अधिनियम में अन्यथा अभिव्यक्ततः उपबन्धित के सिवाय, वे ही अर्थ हैं जो उस अधिनियम में हैं ।
अध्याय 2
रिचर्डसन एण्ड क्रूडास लिमिटेड के उपक्रम का अर्जन
3. पुरानी कम्पनी के उपक्रम का केन्द्रीय सरकार में निहित होना-नियत दिन को पुरानी कम्पनी का उपक्रम केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएगा और वह सरकार तत्पश्चात् तुरंत, अधिसूचना द्वारा, ऐसे उपक्रम के नई कम्पनी को अन्तरण और उसमें निहित करने के लिए उपबन्ध करेगी ।
4. निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) यह समझा जाएगा कि पुरानी कम्पनी के उपक्रम के अन्तर्गत सभी आस्तियां, अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा जंगम और स्थावर सभी सम्पत्ति, रोकड़ बाकी, आरक्षित निधियां, विनिधान तथा ऐसी सम्पत्ति में या उससे पैदा होने वाले अन्य समस्त अधिकार और हित, जो नियत दिन से ठीक पूर्व भारत में या भारत के बाहर, उस उपक्रम के सम्बन्ध में पुरानी कम्पनी के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में थे तथा उनसे सम्बन्धित सभी लेखाबहियां (सदस्यों के रजिस्टर और उससे सम्बन्धित दस्तावेजों से भिन्न), रजिस्टर, अभिलेख और किसी भी प्रकार की अन्य सब दस्तावेजें होंगी और यह भी समझा जाएगा कि उनके अन्तर्गत उस उपक्रम के सम्बन्ध में पुरानी कम्पनी के उस समय विद्यमान किसी भी प्रकार के सब उधार, दायित्व और बाध्यताएं भी होंगी ।
(2) उस दशा के सिवाय जबकि इस अधिनियम द्वारा स्पष्ट रूप से अन्यथा उपबन्धित है, पुरानी कम्पनी के उपक्रम के सम्बन्ध में सभी संविदाएं, विलेख, बन्धपत्र, करार, मुख्तारनामे, विधिक प्रतिनिधित्व के अधिकार-पत्र और किसी भी प्रकार की अन्य लिखतें जो नियत दिन से ठीक पूर्व विद्यमान हैं या प्रभावी हैं, केन्द्रीय सरकार के पक्ष में और ऐसे उपक्रम के नई कम्पनी को अन्तरण पर ऐसी नई कम्पनी के पक्ष में वैसे ही पूर्णतः प्रवृत्त और प्रभावी होंगी और वैसे ही पूर्ण रूप से और प्रभावी तौर पर प्रवर्तित या क्रियान्वित की जा सकेंगी मानो वे, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी से सम्बन्धित हों ।
(3) (क) यदि नियत दिन को धारा 3 में निर्दिष्ट उपक्रम के सम्बन्ध में पुरानी कम्पनी द्वारा संस्थित कोई कार्यवाही लम्बित है तो उस दिन से ऐसी कार्यवाही केन्द्रीय सरकार द्वारा अथवा उपक्रम के नई कम्पनी को अन्तरण पर, नई कम्पनी द्वारा चालू रखी जा सकेगी ।
(ख) यदि नियत दिन को धारा 3 में निर्दिष्ट उपक्रम के सम्बन्ध में पुरानी कम्पनी के विरुद्ध कोई वाद-हेतुक विद्यमान है तो उस दिन से ऐसा वाद हेतुक केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध अथवा उपक्रम के नई कम्पनी को अन्तरण पर, नई कम्पनी के विरुद्ध प्रवर्तित किया जा सकेगा ।
(ग) खण्ड (क) और (ख) में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय पुरानी कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध कोई भी वाद, कार्यवाही या वाद-हेतुक केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध न तो चालू रखा जाएगा और न प्रवर्तित किया जाएगा ।
5. अर्जित सम्पत्ति और उससे सम्बन्धित दस्तावेजों का कब्जा देने का कर्तव्य-(1) जब कोई सम्पत्ति धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है तब प्रत्येक व्यक्ति जिसके कब्जे या अभिरक्षा में या जिसके नियंत्रण के अधीन वह सम्पत्ति है, उस सम्पत्ति को तुरन्त केन्द्रीय सरकार को दे देगा ।
(2) कोई व्यक्ति जिसके कब्जे में या नियंत्रण के अधीन, उस उपक्रम से, जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गया है सम्बन्धित कोई बहियां, दस्तावेज या अन्य कागजपत्र नियत दिन को हैं और जो पुरानी कम्पनी के हैं या जो ऐसे होते यदि पुरानी कम्पनी का उपक्रम केन्द्रीय सरकार में निहित न हुआ होता, उन बहियों, दस्तावेजों या अन्य कागजपत्रों का लेखा-जोखा केन्द्रीय सरकार को और ऐसे उपक्रम के नई कम्पनी को अन्तरण पर, उस कम्पनी को देने के दायित्वाधीन होगा और उन्हें, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी को अथवा ऐसे अन्य व्यक्ति को, जिसे केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, दे देगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार उस समस्त सम्पत्ति का जो धारा 3 के अधीन उस सरकार में निहित हो गई है कब्जा लेने के लिए सभी आवश्यक कार्रवाई कर सकेगी या करा सकेगी ।
6. विशिष्टियां देने का कर्तव्य-(1) पुरानी कम्पनी इतनी अवधि के भीतर जितनी केन्द्रीय सरकार इस निमित्त अनुज्ञात करे, उस सरकार और नई कम्पनी को, उन समस्त सम्पत्तियों और आस्तियों की (जिनके अन्तर्गत विनिधानों की विशिष्टियां भी हैं), जो नियत दिन को पुरानी कम्पनी की हों, पुरानी कम्पनी के उस दिन विद्यमान सभी दायित्वों और बाध्यताओं तथा उन सभी करारों की भी जो पुरानी कम्पनी द्वारा किए गए हों और उस दिन प्रवृत्त हों, जिनके अन्तर्गत पुरानी कम्पनी के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी की छुट्टी, पेंशन, उपदान और सेवा के अन्य निबन्धनों से सम्बन्धित अभिव्यक्त या विवक्षित करार भी हैं जिनके अधीन इस अधिनियम के आधार पर केन्द्रीय सरकार के दायित्व हैं या होंगे या हो सकते हैं, एक पूरी तालिका देगी तथा केन्द्रीय सरकार और नई कम्पनी, इस प्रयोजन के लिए पुरानी कम्पनी को सभी उचित सुविधाएं देगी ।
(2) यदि केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी द्वारा पुरानी कम्पनी से ऐसा करने की अपेक्षा की जाए तो वह धारा 3 में निर्दिष्ट उपक्रम या ऐसे उपक्रम के प्रयोजन के लिए पुरानी कम्पनी द्वारा नियोजित किसी व्यक्ति से सम्बन्धित ऐसी विवरणियां या जानकारी देगी जो ऐसी अध्यपेक्षा में विनिर्दिष्ट की जाए ।
7. पुरानी कम्पनी के कर्मचारियों का अन्तरण-(1) पुरानी कम्पनी का [निदेशक या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 197क में विनिर्दिष्ट किसी प्रबन्ध कार्मिक अथवा पुरानी कम्पनी के साथ किए गए विशेष करार के अधीन उस कम्पनी के संपूर्ण कारबार या उसके पर्याप्त भाग का प्रबन्ध करने के हकदार किसी अन्य व्यक्ति के सिवायट प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी जो नियत दिन के ठीक पूर्व पुरानी कम्पनी द्वारा नियोजित है, वहां तक जहां तक कि ऐसा अधिकारी या अन्य कर्मचारी पुरानी कम्पनी के उपक्रम के कामकाज के सम्बन्ध में नियोजित है, नियत दिन से केन्द्रीय सरकार का और ऐसे उपक्रम के नई कम्पनी को अंतरण पर उस कम्पनी का, यथास्थिति, अधिकारी या अन्य कर्मचारी हो जाएगा और वैसे ही निबन्धनों और शर्तों पर और पेंशन, उपदान और अन्य बातों के बारे में वैसे ही अधिकारों के साथ अपना पद धारण करेगा जो उसे अनुज्ञेय होते यदि पुरानी कम्पनी का उपक्रम केन्द्रीय सरकार को या नई कम्पनी को अन्तरित न किया गया होता और उसमें निहित न किया गया होता और तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी में उसका नियोजन सम्यक् रूप से समाप्त नहीं कर दिया जाता या जब तक पारिश्रमिक, सेवा के निबन्धन या शर्तें, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जाती :
परन्तु यदि इस प्रकार किया गया कोई परिवर्तन किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी को स्वीकार्य न हो तो उसका नियोजन उसको, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी द्वारा, स्थायी कर्मचारियों की दशा में तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारियों की दशा में एक मास के पारिश्रमिक के बराबर रकम का संदाय करके समाप्त किया जाएगा :
परन्तु यह और कि इस उपधारा की कोई भी बात ऐसे किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी को लागू न होगी जिसने नियत दिन के ठीक आगामी तीस दिन के भीतर, केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी को लिखित सूचना देकर, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी का अधिकारी या अन्य कर्मचारी न बनने के अपने आशय की सूचना दे दी है ।
(2) उन व्यक्तियों के स्थान पर जो नियत दिन के ठीक पूर्व पुरानी कम्पनी के अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों के लिए गठित किसी पेंशन, भविष्य-निधि, उपदान या वैसी ही अन्य निधि के न्यासी थे, न्यासियों के रूप में ऐसे व्यक्ति रखे जाएंगे जिन्हें केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।
(3) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी की सेवाओं का पुरानी कम्पनी से केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी को अन्तरण किसी ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को उस अधिनियम या अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
8. रकम का संदाय-(1) धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार को पुरानी कम्पनी के उपक्रम के अंतरण के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा अभिरक्षक को तीस लाख रुपए की रकम दी जाएगी ।
(2) अभिरक्षक, पुरानी कम्पनी के नाम से किसी अनुसूचित बैंक में खाता खोलेगा और उक्त रकम को उस खाते में जमा करेगा तथा उक्त रकम को पुरानी कम्पनी की ओर से और उसके निमित्त न्यासतः धारित करेगा ।
अध्याय 3
नई कम्पनी का प्रबन्ध और प्रशासन
9. नई कम्पनी का बनाया जाना और रजिस्ट्रीकरण-उस उपक्रम के, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित होगा, दक्ष प्रबन्ध और प्रशासन के लिए कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबन्धों के अनुसार नियत दिन से पूर्व रिचर्डसनसन एण्ड क्रूडास (1972) लिमिटेड" नाम से एक सरकारी कम्पनी बनाई और रजिस्ट्रीकृत की जाएगी ।
अध्याय 4
पुरानी कम्पनी का प्रबन्ध
10. पुरानी कम्पनी का प्रबन्ध-(1) पुरानी कम्पनी के कामकाज का प्रबन्ध केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त नियुक्त किए जाने वाले अभिरक्षक द्वारा किया जाएगा :
परन्तु, यदि अभिरक्षक ऐसा अभिरक्षक बनने से या उस रूप में कृत्य करते रहने से इंकार करता है अथवा यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी अन्य व्यक्ति को पुरानी कम्पनी का अभिरक्षक नियुक्त करना पुरानी कम्पनी के हित में आवश्यक है तो वह वैसा कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त अभिरक्षक पुरानी कम्पनियों की निधियों में से ऐसी उपलब्धियां प्राप्त करेगा जैसी केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।
(3) अभिरक्षक, केन्द्रीय सरकार के प्रसाद पर्यन्त पद धारण करेगा ।
11. अभिरक्षक का लोक सेवक होना-(1) अभिरक्षक भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक होगा ।
12. पुरानी कम्पनी के निदेशकों आदि द्वारा पद को रिक्त करना-(1) अभिरक्षक की नियुक्ति पर प्रत्येक व्यक्ति जो ऐसी नियुक्ति के ठीक पूर्व पुरानी कम्पनी के निदेशक या प्रबन्धक के रूप में पद धारण करता था, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अथवा किसी न्यायालय या अधिकरण की किसी डिक्री या आदेश में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा पद रिक्त कर देगा ।
(2) अभिरक्षक धारा 8 में निर्दिष्ट राशि प्राप्त करेगा और वह उस राशि का प्रयोग किसी ऐसे दायित्व को पूरा करने के लिए करेगा जो पुरानी कम्पनी द्वारा नियत दिन के पश्चात् उपगत किया गया है, और यदि उक्त दायित्व को पूरा करने के पश्चात् कोई अतिशेष रहे तो उसका प्रयोग पुरानी कम्पनी के सदस्यों की, अभिरक्षक द्वारा बुलाए गए साधारण अधिवेशन में अभिव्यक्त इच्छा के अनुसार करेगा तथा कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबन्ध जहां तक हो सकें ऐसे अधिवेशन को लागू होंगे ।
(3) यदि पुरानी कम्पनी के सदस्य चाहें तो अभिरक्षक उपधारा (2) में निर्दिष्ट अतिशेष को ऐसे सदस्यों के बीच उनके अधिकारों और हितों के अनुसार वितरित कर सकेगा और तत्पश्चात् पुरानी कम्पनी के न्यायालय द्वारा परिसमापन के लिए न्यायालय को आवेदन कर सकेगा ।
भाग 2
पुरानी कम्पनी के सदस्यों के रजिस्टर का परिशोधन
अध्याय 1
अधिकरण का गठन
13. अधिकरण का गठन-(1) पुरानी कम्पनी के सदस्यों के रजिस्टर के परिशोधन के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसे एक व्यक्ति वाला अधिकरण गठित करेगी जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रह चुका है ।
(2) यदि किसी कारण से अधिकरण के पीठासीन अधिकारी के पद में (अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न) कोई रिक्ति होती है तो केन्द्रीय सरकार उस रिक्ति को भरने के लिए, इस धारा के उपबन्धों के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करेगी और कार्यवाही, अधिकरण के समक्ष उस प्रक्रम से आगे चालू रखी जा सकेगी जिस प्रक्रम पर वह रिक्ति भरी जाती है ।
(3) केन्द्रीय सरकार, अधिकरण को ऐसा कर्मचारिवृन्द उपलभ्य करेगी, जो इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हो ।
(4) अधिकरण के सम्बन्ध में हुए सभी व्यय भारत की संचित निधि से चुकाए जाएंगे ।
(5) अधिकरण को उसके कृत्यों के निर्वहन से उत्पन्न सभी मामलों में जिनके अन्तर्गत वह स्थान या वे स्थान भी हैं जहां वह अपनी बैठकें करेगा, अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करने की शक्ति होगी :
परन्तु अधिकरण जहां तक हो सके सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में दावों के अन्वेषण के लिए नियत प्रक्रिया का अनुसरण करेगा और अधिकरण का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
6) इस अधिनियम के अधीन कोई जांच करने के प्रयोजन के लिए अधिकरण को निम्नलिखित विषयों के बारे में वे ही शक्तियां प्राप्त होंगी जो किसी वाद का विचारण करते समय, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्ः-
(क) किसी साक्षी को समन करना और उसे हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज या साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य अन्य सामग्री का प्रकटीकरण और पेश किया जाना;
(ग) शपथ-पत्र पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख की अध्यपेक्षा करना;
(ङ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कोई कमीशन निकालना ।
(7) अधिकरण के समक्ष कोई कार्यवाही भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और अधिकरण को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 195 और अध्याय 35 के प्रयोजन के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
अध्याय 2
अधिकरण की शक्तियां और कर्तव्य
14. अधिकरण द्वारा व्यक्तियों से दावे करने की अपेक्षा करना-(1) अधिकरण, अधिसूचना द्वारा और ऐसी अन्य रीति से जैसी विहित की जाए, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति से जो किसी शेयर में किसी हित का दावा करता है यह अपेक्षा करेगा कि वह ऐसी तारीख से, जैसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, तीस दिन के भीतर, अपना दावा प्रस्तुत करे ।
(2) किसी शेयर में किसी हित का दावा करने वाला प्रत्येक व्यक्ति अधिकरण के समक्ष अपना दावा, ऐसे प्ररूप में करेगा जो विहित किया जाए, और शेयर में उसके द्वारा दावा किए गए अधिकारों का और उस रीति का जिसमें और उस तारीख का जिस को उसने ऐसा अधिकार अर्जित किया था उसमें कथन होगा ।
(3) यदि अधिकरण का समाधान हो जाता है कि किसी दावेदार के पास अधिसूचना में विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर दावा प्रस्तुत न करने का पर्याप्त कारण था, तो वह ऐसे दावे को तीस दिन की अतिरिक्त अवधि के भीतर ग्रहण कर सकेगा ।
15. असली शेयरों का अवधारण-अधिकरण ऐसे साक्ष्य को लेने के पश्चात् जो उसके समक्ष पेश किया जाए और ऐसी जांच करने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, तथा ऐसे व्यक्तियों को सुनने के पश्चात् जो यह चाहें कि उन्हें सुना जाए, यह अवधारित करेगा कि शेयर होने के लिए तात्पर्यित दस्तावेजों में से कौन सी दस्तावेज, वास्तव में, पुरानी कम्पनी की पूंजी में अंशदान दर्शित करती है और ऐसे अवधारण पर शेयर होने के लिए तात्पर्यित सभी अन्य दस्तावेजें, नकली घोषित हो जाएंगी और रद्द हो जाएंगी ।
16. नकली शेयरों के रद्द किए जाने के लिए किसी प्रतिकर का न दिया जाना-(1) शेयर होने के लिए तात्पर्यित किसी दस्तावेज का कोई भी धारक केन्द्रीय सरकार से अथवा पुरानी या नई कम्पनी से, ऐसी दस्तावेज के धारा 15 के उपबन्धों के आधार पर रद्द किए जाने के लिए नुकसानी का दावा करने का हकदार नहीं होगा ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए प्रत्येक व्यक्ति जिसने शेयर होने के लिए तात्पर्यित कोई दस्तावेज सद्भावपूर्वक मूल्यार्थ और इस बात की सूचना के बिना अर्जित की थी कि उससे पुरानी कम्पनी की पूंजी में कोई अंशदान दर्शित नहीं होता, उस व्यक्ति से जिससे उसने ऐसी दस्तावेज अर्जित की थी, प्रतिपूर्ति का दावा करने का हकदार होगा और ऐसी प्रतिपूर्ति के लिए किसी कार्रवाई के हेतु परिसीमाकाल उस तारीख को प्रारंभ हुआ समझा जाएगा जिसको उसके द्वारा शेयर के रूप में धारित दस्तावेज धारा 15 के अधीन रद्द हो जाती है ।
17. प्रतिपूर्ति के दावों को ग्रहण करने और उनका निपटारा करने की अधिकरण की शक्ति-(1) अधिकरण को धारा 16 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रतिपूर्ति के किसी दावे को ग्रहण करने और उसका निपटारा करने की अधिकारिता होगी ।
(2) प्रत्येक ऐसा दावा अधिकरण के समक्ष उस तारीख से, जिसको कि शेयर होने के लिए तात्पर्यित दस्तावेज धारा 15 के अधीन रद्द हो जाती है, तीस दिन के भीतर किया जाएगा ।
18. वाद और विधिक कार्यवाहियों का प्रारम्भ न किया जाना या उसमें आगे कार्यवाही न करना-(1) उस तारीख से जिसको अधिकरण गठित होता है पुरानी कम्पनी के विरुद्ध किसी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही का प्रारंभ, अथवा यदि वह ऐसे गठन की तारीख पर लम्बित हो तो उसके बारे में आगे कार्रवाई अधिकरण की इजाजत से ही और ऐसे निबन्धनों के जैसे अधिकरण अधिरोपित करे अधीन ही की जाएगी अन्यथा नहीं ।
(2) इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, इस अधिकरण को न कि किसी न्यायालय या अन्य अधिकरण को निम्नलिखित को ग्रहण करने या उसका निपटरा करने की अधिकारित होगी, अर्थात्ः-
(क) पुरानी कम्पनी द्वारा या उसकी ओर से या उसके विरुद्ध कोई वाद या कार्यवाही ;
(ख) पुरानी कम्पनी द्वारा या उसकी ओर से या उसके विरुद्ध किया गया कोई दावा ;
(ग) पूर्विकताओं का कोई प्रश्न और विधि का या तथ्य का कोई भी अन्य प्रश्न, जो किसी शेयर से सम्बन्धित हो या किसी शेयर के असली होने या न होने के सम्बन्ध में या ऐसे शेयर के अधीन किन्हीं अधिकारों या बाध्यताओं के सम्बन्ध में उत्पन्न हो,
चाहे ऐसा वाद या कार्यवाही अधिकरण के गठन के पूर्व या पश्चात् संस्थित की गई हो या संस्थित की जाए या ऐसा दावा या प्रश्न अधिकरण के गठन के पूर्व या पश्चात् उत्पन्न हुआ हो या उत्पन्न हो ।
(3) यदि नियत दिन को पुरानी कम्पनी के किसी कारबार के सम्बन्ध में कोई वाद, अपील या किसी भी प्रकार की अन्य कार्यवाही, उस कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध किसी न्यायालय में लम्बित हो तो ऐसा वाद, अपील या अन्य कार्यवाही तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी संविदा में किसी बात के होते हुए भी अधिकरण को अन्तरित हो जाएगी और उसके द्वारा निपटाई जाएगी और तब किसी अन्य न्यायालय या अन्य अधिकरण को ऐसे वाद, अपील या कार्यवाही का विचारण करने की अधिकारिता नहीं होगी ।
स्पष्टीकरण-किसी शेयर या शेयर होने के लिए तात्पर्यित किसी दस्तावेज में हक या उसमें या उसके सम्बन्ध में दावे से सम्बद्ध कोई वाद या अन्य कार्यवाही पुरानी कम्पनी के कारबार के सम्बन्ध में वाद या अन्य कार्यवाही समझी जाएगी ।
(4) उपधारा (1) या उपधारा (3) की कोई बात संविधान के अनुच्छेद 32, अनुच्छेद 226 या अनुच्छेद 227 के अधीन की गई किसी अर्जी या किसी अर्जी से उत्पन्न अपील को लागू नहीं होगी ।
19. अधिकरण के विनिश्चय का अंतिम होना-इस अधिनियम के अधीन अधिकरण का प्रत्येक विनिश्चय अन्तिम होगा और उस पर किसी न्यायालय में आपत्ति संविधान के अनुच्छेद 32 या अनुच्छेद 226 के अधीन अर्जी द्वारा ही की जाएगी अन्यथा नहीं ।
अध्याय 3
पुरानी कम्पनी के सदस्यों के रजिस्टर को पुनः तैयार करने का अभिरक्षक का कर्तव्य
20. अभिरक्षक द्वारा पुरानी कम्पनी के सदस्यों का रजिस्टर पुनः तैयार किया जाना-(1) अभिरक्षक पुरानी कम्पनी के सदस्यों का रजिस्टर पुनः तैयार करेगा और उसमें उन शेयरों के धारकों के नाम सम्मिलित करेगा जिनकी बाबत अधिकरण ने यह घोषणा की है कि उनसे वास्तव में पुरानी कम्पनी की पूंजी में अंशदान दर्शित होता है और पुरानी कम्पनी के सदस्यों के रजिस्टर से शेयर होने के लिए तात्पर्यित उन दस्तावेजों के धारकों के नाम काट देगा जो धारा 15 के अधीन अधिकरण द्वारा किए गए अवधारण के कारण रद्द हो गई हैं ।
(2) पुरानी कम्पनी के सदस्यों के रजिस्टर के पुनः तैयार करने की तारीख से-
(क) इस प्रकार पुनः तैयार किया गया रजिस्टर पुरानी कम्पनी के सदस्यों का रजिस्टर समझा जाएगा, और
(ख) पुरानी कम्पनी द्वारा उक्त तारीख से ठीक पूर्व रखे गए सदस्यों के सभी रजिस्टर रद्द हो जाएंगे ।
21. अभिरक्षक का नए शेयर प्रमाणपत्र जारी करना-(1) अभिरक्षक, उन शेयरों के सम्बन्ध में, जिनकी बाबत अधिकरण ने यह घोषणा की है कि उनसे वास्तव में पुरानी कम्पनी की पूंजी में अंशदान दर्शित होता है, ऐसे प्ररूप में नए शेयर प्रमाणपत्र जारी करेगा, जो विहित किया जाए ।
(2) अधिकरण द्वारा किए गए अवधारण की तारीख से पूर्व पुरानी कम्पनी द्वारा जारी किए गए सभी शेयर प्रमाणपत्र, ऐसे अवधारण से रद्द हो जाएंगे ।
22. सदस्यों के रजिस्टर के पुनः तैयार किए जाने के पूर्व पुरानी कम्पनी का कोई वार्षिक साधारण अधिवेशन न होना-(1) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी पुरानी कम्पनी का कोई वार्षिक या अन्य साधारण अधिवेशन तब तक नहीं होगा जब तक पुरानी कम्पनी के सदस्यों का रजिस्टर इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार पुनः तैयार नहीं हो जाता ।
(2) पुरानी कम्पनी के सदस्यों के किसी अधिवेशन में पारित किया गया तात्पर्यित कोई संकल्प तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक कि उसके सदस्यों का रजिस्टर पुनः तैयार नहीं हो जाता ।
23. पुरानी कम्पनी के सदस्यों के रजिस्टर के पुनः तैयार किए जाने तक अभिरक्षक का लेखे फाइल करना-(1) जब तक पुरानी कम्पनी के सदस्यों का रजिस्टर अन्तिम रूप से पुनः तैयार नहीं हो जाता, अभिरक्षक, पुरानी कम्पनी के वार्षिक लेखे प्रत्येक वर्ष रजिस्ट्रार के पास फाइल करेगा ।
(2) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबन्ध, जहां तक हो सके, उपधारा (1) में निर्दिष्ट वार्षिक लेखाओं को लागू होंगे ।
भाग 3
अपराध और उनका विचारण
24. शास्तियां-(1) जो कोई व्यक्ति,-
(क) धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित उपक्रम की भागरूप जो सम्पत्ति उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हो, उस सम्पत्ति को केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी से दोषपूर्वक विधारित रखेगा, या
(ख) ऐसे उपक्रम की भागरूप किसी सम्पत्ति का कब्जा दोषपूर्वक अभिप्राप्त करेगा, या
(ग) किसी दस्तावेज को जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हो धारा 5 की उपधारा (2) द्वारा अपेक्षा किए जाने पर, जानबूझकर विधारित रखेगा या केन्द्रीय सरकार, नई कम्पनी अथवा उस सरकार या नई कम्पनी द्वारा विनिर्दिष्ट किसी अन्य व्यक्ति को, देने में असफल रहेगा, या
(घ) धारा 6 द्वारा यथाअपेक्षित कोई तालिका देने में जानबूझकर असफल रहेगा या ऐसी कोई तालिका देगा जिसमें ऐसी कोई विशिष्टियां हों जो गलत हैं या जिनका कोई महत्वपूर्ण अंश मिथ्या है, और जिनका मिथ्या होना वह जानता है या जिनके मिथ्या होने का वह विश्वास करता है या जिनके सही होने का वह विश्वास नहीं करता है, या
(ङ) केन्द्रीय सरकार या नई कम्पनी द्वारा लिखित अपेक्षा किए जाने पर, पुरानी कम्पनी के उपक्रम से, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गया है, संबंधित कोई विवरणी, कथन या अन्य जानकारी देने में असफल रहेगा, या
(च) किसी शेयर के स्वामित्व या उसमें किसी अधिकार की बाबत अधिकरण के समक्ष कोई मिथ्या या तुच्छ दावा करेगा, या
(छ) इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आदेश या निदेश का अनुपालन करने में असफल रहेगा,
वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दण्डनीय होगा :
परन्तु इस उपधारा के खण्ड (क), खण्ड (ख) या खण्ड (ग) के अधीन किसी अपराध का विचारण करने वाला न्यायालय, अभियुक्त व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराते समय, आदेश दे सकेगा कि, वह दोषपूर्वक विधारित या दोषपूर्वक अभिप्राप्त किसी सम्पत्ति या धन को या जानबूझकर विधारित या न दी गई किसी दस्तावेज को न्यायालय द्वारा नियत किए जाने वाले समय के अन्दर दे दे या वापस कर दे ।
(2) कोई न्यायालय इस धारा के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान केन्द्रीय सरकार या उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं ।
25. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था अथवा उसने ऐसे अपराध के किए जाने के निवारण के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है ; तथा
(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उसके फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
26. अपराधों का प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय होना तथा शमनीय न होना-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898(1898 का 5) में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) इस अधिनियम के विरुद्ध किया गया प्रत्येक अपराध प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा विचारणीय होगा, और
(ख) इस अधिनियम के विरुद्ध किया गया कोई भी अपराध शमनीय नहीं होगा ।
भाग 4
प्रकीर्ण
27. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी भी बात के बारे में कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही अभिरक्षक के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या अभिरक्षक या नई कम्पनी के विरुद्ध न होगी ।
28. दुर्भाव से की गई संविदाओं आदि का रद्द किया जा सकना अथवा उनमें परिवर्तन किया जा सकना-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का, ऐसी जांच के पश्चात् जो वह ठीक समझे, समाधान हो जाता है कि नियत दिन के ठीक पहले के बारह मास के भीतर किसी समय पुरानी कम्पनी तथा किसी अन्य व्यक्ति के बीच कोई संविदा अथवा करार, दुर्भाव से किया गया है, और पुरानी कम्पनी या नई कम्पनी के लिए अहितकर है, तो वह उस संविदा या करार को रद्द करने वाला या उसमें (चाहे बिना किसी शर्त के अथवा किन्हीं ऐसी शर्तों के अधीन जिन्हें अधिरोपित करना वह ठीक समझे) परिवर्तन करने वाला आदेश दे सकेगी और तत्पश्चात् वह संविदा या करार तद्नुसार प्रभावी होगा :
परन्तु कोई भी संविदा या करार उस संविदा या करार के पक्षकारों को सुने जाने का उचित अवसर दिए बिना न तो रद्द किया जाएगा और न ही उसमें कोई परिवर्तन किया जाएगा ।
(2) कोई भी व्यक्ति जो उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आदेश से व्यथित है ऐसे आदेश में परिवर्तन किए जाने या उसे उलट दिए जाने के लिए अधिकरण को आवेदन कर सकेगा और तब अधिकरण उस आदेश को पुष्ट कर सकेगा या उपान्तरित कर सकेगा या उलट सकेगा ।
29. नियोजन-संविदा को समाप्त करने की शक्ति-यदि अभिरक्षक की यह राय है कि पुरानी कम्पनी के द्वारा या उसकी ओर से नियत दिन के पूर्व किसी समय की गई कोई नियोजन-संविदा असम्यक् रूप से दुर्भर है, तो वह कर्मचारी को एक मास की लिखित सूचना देकर अथवा उसके बदले में एक मास का वेतन या मजदूरी देकर ऐसी नियोजक-संविदा को समाप्त कर सकेगा ।
30. कठिनाई दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा जो, इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी :
परन्तु ऐसा कोई भी आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
31. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-
(क) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे अधिकरण के समक्ष प्रत्येक दावा किया जाएगा ;
(ख) वह प्ररूप जिसमें अभिरक्षक द्वारा नए शेयर जारी किए जाएंगे;
(ग) कोई अन्य विषय जिसका विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के, या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् बह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा ।
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