दिल्ली नागरी कला आयोग अधिनियम, 1973
(1974 का अधिनियम संख्यांक 1)
[1 जनवरी, 1974]
दिल्ली में नगरीय और पर्यावरणीय स्वरूप की सौंदर्यपरकता के परिरक्षण,
विकास और बनाए रखने के उद्देश्य से दिल्ली नागरी कला आयोग
की स्थापना का उपबंध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के चौबीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दिल्ली नागरी कला आयोग अधिनियम,1973 है ।
(2) इसका विस्तार समस्त दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) भवन" के अन्तर्गत ऐसी सरंचना या परिनिर्माण या ऐसी संरचना या परिनिर्माण का भाग है, जो आवासी, औद्योगिक, वाणिज्यिक या अन्य प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाए जाने के लिए आशयित है, चाहे वह वास्तविक उपयोग में हो या न हो ;
(ख) निर्माण संक्रिया" के अन्तर्गत पुनर्निर्माण क्रिया, भवनों में संरचनात्मक परिवर्तन या परिवर्धन और ऐसी अन्य संक्रियाएं हैं जो भवनों के निर्माण के सम्बन्ध में सामान्यता की जाती हैं ;
(ग) आयोग" से धारा 3 के अधीन स्थापित दिल्ली नागरी कला आयोग अभिप्रेत है ;
(घ) दिल्ली" से दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ;
(ङ) विकास" से, उसके व्याकरणिक रूपभेदों सहित, भूमि में, भूमि पर, भूमि के ऊपर या भूमि के नीचे, निर्माण, इंजीनियरी, खनन या अन्य क्रियाएं, अथवा किसी भवन या भूमि में कोई महत्वपूर्ण परिवर्तन करना अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत पुनर्विकास भी है ;
(च) इंजीनियरी संक्रिया" के अन्तर्गत किसी सड़क तक पहुंच के साधनों का बनाना या उनकी रचना अथवा जल प्रदाय के साधनों की रचना भी है ;
(छ) स्थानीय निकाय" से दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) के अधीन स्थापित दिल्ली नगर निगम, दिल्ली में यथाप्रवृत्त पंजाब नगरपालिका अधिनियम, 1911 (1911 का पंजाब अधिनियम 3) के अधीन गठित नई दिल्ली नगरपालिका समिति, दिल्ली विकास अधिनियम, 1957 (1957 का 61) के अधीन गठित दिल्ली विकास प्राधिकरण, अथवा दिल्ली के नगरीय विकास से सम्बद्ध कोई अन्य स्थानीय प्राधिकरण अभिप्रेत है ;
(ज) सदस्य" से आयोग का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत उसका अध्यक्ष भी है ;
(झ) सार्वजनिक सुख-सुविधा" के अन्तर्गत सड़क, जल-प्रदाय, सड़कों पर प्रकाश, जल निकास, मलवहन प्रणाली, लोक संकर्म और ऐसी अन्य सुविधाएं हैं जिन्हें केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, सार्वजनिक सुख-सुविधा के रूप में विनिर्दिष्ट करे ;
(ञ) विनियम" से आयोग द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया विनियम अभिप्रेत है ;
(ट) नियम" से केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाया गया नियम अभिप्रेत है ।
अध्याय 2
आयोग की स्थापना
3. आयोग की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, दिल्ली नागरी कला आयोग के नाम से एक आयोग स्थापित किया जाएगा ।
(2) आयोग शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा जिसे सम्पत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन तथा संविदा करने की शक्ति होगी और जो उक्त नाम से वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
4. आयोग की संरचना-आयोग में एक अध्यक्ष और दो से अन्यून तथा चार से अनधिक इतने अन्य सदस्य होंगे जितने केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे व्यक्तियों में से नियुक्त करे जिन्हें, केन्द्रीय सरकार की राय में, सुघट्य और चाक्षुष कलाओं तथा नगरीय पर्यावरण का भाव, बोध तथा उसमें रुचित हो या स्थापत्य अथवा कला के बारे में विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव हो ।
5. सदस्यों की सेवा के निबन्धन और शर्तें-(1) सदस्य, यदि केन्द्रीय सरकार द्वारा उसकी नियुक्ति पहले ही समाप्त नहीं कर दी जाती है, अपनी नियुक्ति की तारीख से तीन वर्ष के लिए पद धारण करेगा ।
(2) कोई व्यक्ति जो अध्यक्ष या सदस्य के रूप में पद धारण करता है या जिसने उस रूप में पद धारण किया है, उस पद के लिए पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा किन्तु केवल एक बार ।
(3) कोई भी सदस्य केन्द्रीय सरकार को सम्बोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा किन्तु वह तब तक पद पर बना रहेगा जब तक उसका त्यागपत्र केन्द्रीय सरकार द्वारा स्वीकार न कर लिया जाए ।
(4) उपधारा (3) के अधीन किसी सदस्य के पद-त्याग से अथवा किसी अन्य कारण से हुई आकस्मिक रिक्ति नई नियुक्ति द्वारा भरी जाएगी ।
(5) सदस्य की नियुक्ति या तो पूर्णकालिक या अंशकालिक, जैसी भी केन्द्रीय सरकार ठीक समझे, होगी ।
(6) पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की सेवा के निबंधन और शर्तें वे होंगी जो नियमों द्वारा विहित की जाएं ।
6. आयोग की बैठकें-आयोग की बैठकें ऐसे समयों और ऐसे स्थानों पर होंगी और वह अपनी बैठकों में कामकाज करने के सम्बन्ध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
7. सदस्यों का स्थान रिक्त होने अथवा गठन में किसी त्रुटि के होने के कारण आयोग के कार्यों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-आयोग का कोई भी कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं समझी जाएगी कि आयोग में कोई रिक्ति थी अथवा उसके गठन में कोई त्रुटि थी ।
8. आयोग के साथ व्यक्तियों का विशिष्ट प्रयोजनों के लिए अस्थायी रूप से सहयुक्त होना-(1) आयोग किसी भी व्यक्ति को, जिसकी सहायता या सलाह वह इस अधिनियम के उपबन्धों में किसी को कार्यान्वित करने के लिए लेना चाहे, ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, सहयुक्त कर सकेगा ।
(2) आयोग द्वारा किसी भी प्रयोजन के लिए उपधारा (1) के अधीन अपने साथ सहयुक्त व्यक्ति को उस प्रयोजन से संगत चर्चा में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु उसे आयोग की बैठक में मत देने का अधिकार नहीं होगा, और वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होगा ।
9. आयोग के कर्मचारिवृन्द की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार आयोग से परामर्श करके आयोग का एक सचिव नियुक्त करेगी जो केन्द्रीय सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा :
परन्तु प्रथम सचिव की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा आयोग से परामर्श किए बिना ही की जा सकेगी ।
(2) सचिव की सेवा के निबंधन और शर्तें वे होंगी जो नियमों द्वारा विहित की जाएं ।
(3) नियमों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, आयोग इस अधिनियम के अधीन अपने कार्यों के दक्षतापूर्ण पालन के लिए ऐसे अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकेगा जैसे वह आवश्यक समझे और इस प्रकार नियुक्त कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें वे होंगी जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं ।
10. आयोग के आदेशों तथा अन्य लिखतों की अधिप्रमाणन-(1) आयोग के सभी आदेश और विनिश्चय तथा अन्य लिखतें सचिव अथवा इस निमित्त आयोग द्वारा सम्यक्तः प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी ।
अध्याय 3
आयोग के कार्य और शक्तियां
11. आयोग के कार्य-(1) आयोग का साधारण कर्तव्य होगा कि वह दिल्ली में नगरीय और पर्यावरणीय स्वरूप की सौंदर्यपरकता के परिरक्षण, विकास और बनाए रखने के मामले में केन्द्रीय सरकार को सलाह दे और निर्माण संक्रियाओं या इंजीनियरी संक्रियाओं की किसी परियोजना अथवा किसी विकास प्रस्ताव की बाबत, जिसका गगन-रेखा या आसपास की सौंदर्यपरकता अथवा वहां उपलब्ध की गई किसी सार्वजनिक सुख-सुविधा पर प्रभाव पड़ता हो या पड़ना संभाव्य हो, किसी स्थानीय निकाय को सलाह दे और उसका मार्गदर्शन करे ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह निम्नलिखित विषयों की बाबत प्रस्तावों की संवीक्षा करे, उन्हें अनुमोदित करे, नामंजूर करे या उपांतरित करे, अर्थात् :-
(क) जिला केन्द्रों, नागरिक केन्द्रों, सरकारी प्रशासनिक भवनों के लिए, तथा आवासी प्रक्षेत्रों, सार्वजनिक पार्कों और सार्वजनिक उद्यानों के लिए आरक्षित क्षेत्रों का विकास ;
(ख) नई दिल्ली नगरपालिका समिति की अधिकारिता के अन्दर के क्षेत्र का पुनर्विकास जिसके अन्तर्गत कनाट प्लेस प्रक्षेत्र और उससे संलग्न क्षेत्र, केन्द्रीय वीथिका, ल्यू्ट्यन की नई दिल्ली का समस्त बंगलों वाला क्षेत्र और अन्य ऐसे क्षेत्र हैं, जिन्हें केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे ;
(ग) खण्ड (क) और (ख) में विनिर्दिष्ट केन्द्रों, क्षेत्रों, पार्कों और उद्यानों में नए भवनों के रेखांक, स्थापत्य और दृश्य छवि, जिसके अन्तर्गत वहां मूर्तियों और फव्वारों के लिए माडल चुनना भी है ;
(घ) जामा मस्जिद, लाल किला, कुतुब, हुमायूं का मकबरा, पुराना किला, तुगलकाबाद के आसपास के क्षेत्रों और ऐतिहासिक महत्व के ऐसे अन्य स्थानों का पुनर्विकास, जिन्हें केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे ;
(ङ) संस्मारक भवनों, सार्वजनिक पार्कों और सार्वजनिक उद्यानों का संरक्षण, परिरक्षण और सौन्दर्यवर्धन, जिसके अन्तर्गत वहां पर मूर्तियों या फव्वारों का अवस्थान या प्रतिष्ठापन भी है ;
(च) निचले पार-मार्ग तथा ऊपरी पार-मार्ग और मार्ग-फर्नीचर तथा विज्ञापन पटों का विनियमन ;
(छ) बिजली घरों, पानी की टंकियों, टेलीविजन तथा अन्य संचार टावरों और अन्य सम्बद्ध संरचनाओं का अवस्थान और उनके रेखांक ;
(ज) कोई अन्य परियोजना या अभिन्यास जिसका उद्देश्य दिल्ली को रमणीक बनाना अथवा उसके सांस्कृतिक जीवन में वृद्धि करना अथवा उसके वातावरण के सौन्दर्य में विकास करना है ;
(झ) ऐसे अन्य विषय जो नियमों द्वारा विहित किए जाएं ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए-
(i) नागरिक केन्द्र" से किसी स्थानीय निकाय का मुख्यालय अभिप्रेत है जिसमें उसके कार्यालय-भवन तथा सांस्कृतिक क्रियाकलापों के लिए आशयित भवन भी समाविष्ट हैं ;
(ii) कनाट प्लेस प्रक्षेत्र" से वह क्षेत्र अभिप्रेत है जिसमें कनाट प्लेस और उसका विस्तार समाविष्ट है, जिसकी माप लगभग 140 हैक्टर है और जो दिल्ली की महायोजना में जोन डी-1 (पुनरीक्षित) के रूप में वर्णित क्षेत्र है ;
(iii) जिला केन्द्र" से दिल्ली की महायोजना में बनाया गया अपने आप में पूरा यूनिट अभिप्रेत है जिसमें फुटकर दुकानों, साधारण कारबार, वाणिज्यिक और वृत्तिक कार्यालयों, अग्रेषण, बुकिंग और सरकारी कार्यालयों, सिनेमा, उपाहार गृह और मनोरंजनों के अन्य स्थानों के लिए क्षेत्र समाविष्ट हैं ।
(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, आयोग दिल्ली के ऐसे किन्हीं क्षेत्रों का जिनकी बाबत किसी स्थानीय निकाय से उस निमित्त कोई प्रस्ताव प्राप्त नहीं हुए हैं, स्वप्रेरणा से विकास, पुनर्विकास या सौन्दर्यवर्धन संप्रवर्तित तथा सुनिश्चित कर सकेगा ।
12. विकास प्रस्तावों आदि को आयोग को निर्देशित करने का स्थानीय निकायों का कर्तव्य-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, प्रत्येक स्थानीय निकाय, किन्हीं ऐसी निर्माण संक्रियाओं, इंजीनियरी संक्रियाओं या विकास प्रस्तावों के सम्बन्ध में, जो धारा 11 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट हैं अथवा जो उस धारा की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट क्षेत्र या स्थान में किए जाने के लिए आशयित हैं, अनुमोदन देने से पूर्व उन्हें संवीक्षा के लिए आयोग को निर्देशित करेगा और उनकी बाबत आयोग का विनिश्चय ऐसे स्थानीय निकाय के लिए आबद्धकर होगा ।
13. कुछ मामलों में केन्द्रीय सरकार को अपील-यदि कोई स्थानीय निकाय किसी निर्माण संक्रिया, इंजीनियरी संक्रिया या विकास प्रस्ताव के सम्बन्ध में, जो उस स्थानीय निकाय द्वारा, यथास्थिति, कार्यान्वित या अधिसूचित किए जाने के लिए आशयित है और धारा 12 के अधीन आयोग को निर्दिष्ट किया गया है, आयोग के विनिश्चय से व्यथित है तो वह स्थानीय निकाय ऐसे विनिश्चय की तारीख से साठ दिन के अन्दर केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकेगा और केन्द्रीय सरकार उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगी जो वह ठीक समझे ।
14. कुछ मामलों में विनिश्चय पुनरीक्षित करने की शक्ति-इस अधिनियम की कोई बात केन्द्रीय सरकार को यदि वह लोक हित में ऐसा करना आवश्यक समझे तो, किसी ऐसे मामले को जिसमें धारा 12 के अधीन आयोग द्वारा विनिश्चय दे दिया गया है किन्तु जिसकी अपील नहीं हो सकती है, स्वप्रेरणा से, मंगाने और उसकी जांच करने तथा उस पर ऐसा आदेश करने से जैसा वह ठीक समझे, प्रवारित नहीं करेगी :
परन्तु किसी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला ऐसा कोई भी आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक उसे उस मामले में अभ्यावेदन करने का अवसर न दे दिया गया हो ।
15. आयोग की शक्तियां-इस अधिनियम के अधीन अपने कार्य करने के प्रयोजन के लिए आयोग को निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और उसे हाजिर कराना तथा उसकी परीक्षा करना ;
(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना ;
(ग) शपथ-पत्र पर साक्ष्य लेना ;
(घ) किसी कार्यालय से कोई लोक अभिलेख अथवा उसकी प्रतियों की अध्यपेक्षा करना ;
(ङ) कोई अन्य विषय जो नियमों द्वारा विहित किया जाए ।
अध्याय 4
निधि, लेखा और लेखा परीक्षा
16. आयोग को संदाय-केन्द्रीय सरकार, प्रत्येक वित्तीय वर्ष से ऐसी राशियां, जिन्हें वह इस अधिनियम के अधीन आयोग के कार्यों के पालन के लिए आवश्यक समझे, इस निमित्त संसद् द्वारा विधि द्वारा सम्यक् विनियोग किए जाने के पश्चात्, आयोग को दे सकेगी ।
17. आयोग की निधि-(1) आयोग की अपनी निधि होगी और वे सभी राशियां, जो उसे समय-समय पर केन्द्रीय सरकार द्वारा दी जाएं, आयोग की निधि में जमा की जाएंगी और आयोग द्वारा सभी संदाय उस निधि में से किए जाएंगे ।
(2) आयोग ऐसी राशियां खर्च कर सकेगा जिन्हें वह इस अधिनियम के अधीन अपने कार्यों के पालन के लिए खर्च करना ठीक समझे और ऐसी राशियां आयोग की निधि में से संदेय व्यय समझी जाएंगी ।
(3) निधि का समस्त धन ऐसे बैंक में जमा किया जाएगा या ऐसी रीति से निहित किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के अधीन रहते हुए आयोग द्वारा विनिश्चित की जाए ।
18. बजट-आयोग प्रतिवर्ष ऐसे प्ररूप में और इतने समय के अन्दर, जो नियमों द्वारा विहित किया जाए, आगामी वित्तीय वर्ष का बजट तैयार करेगा जिसमें प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दिखाए जाएंगे और उसकी प्रतियां केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएंगी ।
19. वार्षिक रिपोर्ट-आयोग प्रतिवर्ष एक बार ऐसे प्ररूप में और इतने समय के अन्दर, जो नियमों द्वारा विहित किया जाए, वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा, जिसमें पूर्वगामी वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलाप का सही और पूरा विवरण दिया जाएगा, और उसकी प्रतियां केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएंगी तथा केन्द्रीय सरकार ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
20. लेखा और लेखापरीक्षा-(1) आयोग अपने लेखाओं के सम्बन्ध में ऐसी लेखा-बहियां और अन्य बहियां ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से रखवाएगा जो, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से, नियमों द्वारा विहित की जाए ।
(2) आयोग एक लेखा-विवरण ऐसे प्ररूप में, जो नियमों द्वारा विहित किया जाए, उसकी वार्षिक लेखाबन्दी के पश्चात् यथासम्भव शीघ्र, तैयार करेगा और उसे भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को ऐसी तारीख तक भेजेगा जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके केन्द्रीय सरकार अवधारित करे ।
(3) आयोग के लेखाओं की भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे समयों पर और ऐसी रीति से परीक्षा की जाएगी जो वह ठीक समझे ।
(4) आयोग के वार्षिक लेखे और तत्सम्बन्धी लेखापरीक्षा रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएगी और केन्द्रीय सरकार उसे संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी तथा लेखापरीक्षा रिपोर्ट की एक प्रति आयोग को भी, लेखीपरीक्षा रिपोर्ट से उत्पन्न होने वाले विषयों पर समुचित कार्यवाही करने के लिए, भेजी जाएगी ।
अध्याय 5
प्रकीर्ण
21. विवरणियां और जानकारी-आयोग केन्द्रीय सरकार को अपनी निधि या क्रियाकलाप के सम्बन्ध में ऐसी विवरणियां तथा अन्य जानकारी देगा जिनकी केन्द्रीय सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे ।
22. छूट देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जैसी इस निमित्त नियमों द्वारा विहित की जाएं, किसी ऐसे भवन, निर्माण संक्रिया या इंजीनियरी संक्रिया को जिसकी डिजाइन स्थापत्य प्रतियोगिता के फलस्वरूप की गई हो, इस अधिनियम के सभी उपबन्धों या उनमें से किसी के प्रवर्तन से छूट दे सकेगी ।
23. शक्तियों का प्रत्यायोजन-आयोग, साधारण या विशेष लिखित आदेश द्वारा, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियां और कृत्य, जिन्हें वह आयोग के दैनन्दिन प्रशासन को दक्षतापूर्वक चलाने के लिए आवश्यक समझे, ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, आयोग के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य या अधिकारी को प्रत्यायोजित कर सकेगा ।
24. आयोग के सदस्यों और अधिकारियों का लोक सेवक होना-आयोग के सभी सदस्य और अधिकारी, जब वे इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या जब उनका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित हो, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
25. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में, जो इस अधिनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई है या की जाने के लिए आशयित है, आयोग के किसी सदस्य या अधिकारी के विरुद्ध न होगी ।
26. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) आयोग के सदस्यों के वेतन, यदि कोई हों, भत्ते और सेवा के अन्य निबन्धन तथा शर्तें ;
(ख) आयोग के सचिव की सेवा के निबन्धन और शर्तें ;
(ग) ऐसे विषय जिनकी बाबत आयोग धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार को सलाह दे सकेगा ;
(घ) ऐसा प्ररूप जिसमें और वह समय जिसके भीतर आयोग का बजट और उसकी वार्षिक रिपोर्ट तैयार की जा सकेगी और केन्द्रीय सरकार को भेजी जा सकेगी ;
(ङ) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे आयोग के लेखे रखे जा सकेंगे और वह समय जिसमें तथा वह रीति जिससे ऐसे लेखाओं की परीक्षा की जा सकेगी ;
(च) वे विवरणियां तथा जानकारी, जो केन्द्रीय सरकार को आयोग द्वारा दी जानी अपेक्षित हैं ;
(छ) वे शर्तें जिनके अधीन किसी भवन, निर्माण-संक्रिया या इंजीनियरी-संक्रिया को जिसकी डिजाइन किसी स्थापत्य प्रतियोगिता के फलस्वरूप की गई है, छूट दी जा सकेगी ;
(ज) कोई अन्य विषय, जो नियमों द्वारा विहित किया जाना है या विहित किया जा सकता है ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
27. विनियम बनाने की शक्ति- [(1)] आयोग इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों से संगत विनियम, केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए बना सकेगा, अर्थात् :-
(क) आयोग की बैठकों तथा उनमें कामकाज करने की प्रक्रिया का विनियमन ;
(ख) उस रीति का जिससे और उन प्रयोजनों का विनियमन जिनके लिए धारा 8 के अधीन व्यक्तियों को आयोग से सहयुक्त किया जा सकता है ;
(ग) धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन आयोग द्वारा नियुक्त व्यक्तियों की सेवाओं के निबन्धनों और शर्तों का अवधारण;
(घ) कोई अन्य विषय जो विनियमों द्वारा विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
[(2) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
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