प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 1961
(1961 का अधिनियम संख्यांक 59)
[19 दिसम्बर, 1961]
कुछ प्रौद्योगिकी संस्थाओं को राष्ट्रीय महत्व की संस्थाएं घोषित करने के लिए तथा ऐसी
संस्थाओं और इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी,
खड़गपुर से सम्बन्धित कुछ विषयों का
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बारहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम प्रौद्योगिकी संस्थान अधिनियम, 1961 है ।
(2) यह ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकती हैं ।
2. कुछ संस्थाओं का राष्ट्रीय महत्व की संस्थाएं घोषित किया जाना-इण्डियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, मुम्बई, [कालेज ऑफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नालाजी, दिल्ली, [इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, गुवाहाटी, असमय], इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, [कानपुर, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, मद्रास] [इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, भुवनेश्वर, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, गांधीनगर, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, हैदराबाद, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, इंदौर, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, जोधपुर, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, मंडी, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, पटना, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, रोपड़ [इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, (काशी हिंदू विश्वविद्यालय), वाराणसी, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, तिरुपति, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, पलक्कड़, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, गोवा, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, धारवाड़, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, भिलाई, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, जम्मू और इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद] नामक संस्थाओं के उद्देश्य इस प्रकार के हैं कि वे उन्हें राष्ट्रीय महत्व की संस्थाएं बनाते हैं, अतः इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि इनमें से प्रत्येक संस्था राष्ट्रीय महत्व की संस्था है ।
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) बोर्ड" से किसी संस्थान के सम्बन्ध में उसका शासक बोर्ड अभिप्रेत है;
(ख) अध्यक्ष" से बोर्ड का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ग) तत्समान संस्थान" से अभिप्रेत है, -
(i) इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, मुम्बई नामक सोसाइटी के सम्बन्ध में, इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, मुम्बई;
[(iक) कालेज आफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नालाजी, दिल्ली नामक सोसाइटी के सम्बन्ध में, इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, दिल्ली;]
[(iख) इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, गुवाहाटी, असम नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, गुवाहाटी;]
(ii) इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी (कानपुर) नामक सोसाइटी के सम्बन्ध में इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, कानपुर; [॥।]
(iii) इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, मद्रास नामक सोसाइटी के सम्बन्ध में इंडियन इन्स्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, मद्रास; [और]
2[(iv) रुड़की विश्वविद्यालय, रुड़की के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की;]
[(v) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, भुवनेश्वर नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, भुवनेश्वर;
(vi) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, गांधीनगर नामक सोसाइटी के संबंध में इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, गांधीनगर;
(vii) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, हैदराबाद नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, हैदराबाद;
(viii) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, इंदौर नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, इंदौर;
(ix) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, राजस्थान नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, जोधपुर;
(x) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, मंडी नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, मंडी;
(xi) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, पटना नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, पटना;
(xii) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, पंजाब नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, रोपड़;
(xiii) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1915 (1915 का 16) की अनुसूची में उपवर्णित परिनियमों के परिनियम 25(क) (1) में निर्दिष्ट इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के संबंध में इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी;]
[(xiv) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, तिरुपति नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, तिरुपति;
(xv) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, पलक्कड़ नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, पलक्कड़;
(xvi) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, गोवा नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, गोवा;
(xvii) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, धारवाड़ नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, धारवाड़;
(xviii) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, भिलाई नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, भिलाई;
(xix) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, जम्मू नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, जम्मू;
(xx) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद नामक सोसाइटी के संबंध में, इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद ;]
(घ) परिषद्" से धारा 31 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित परिषद् अभिप्रेत है;
(ङ) उपनिदेशक" से किसी संस्थान के सम्बन्ध में उसका उपनिदेशक अभिप्रेत है;
(च) निदेशक" से किसी संस्थान के सम्बन्ध में उसका निदेशक अभिप्रेत है;
(छ) संस्थान" से धारा 2 में उल्लिखित संस्थानों में से कोई अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, (खड़गपुर) अधिनियम, 1956 (1956 का 5) के अधीन निगमित इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, खड़गपुर भी है;
[(छक) इंडियन इंस्टीच्यूट आफ टेक्नालाजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय" के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1915 (1915 का 16) की अनुसूची में उपवर्णित परिनियमों के परिनियम, 25(क)(1) में निर्दिष्ट इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अभिप्रेत है;]
[(छख) इंडियन स्कूल आफ माइन्स, धनबाद" से इंडियन स्कूल आफ माइन्स, धनबाद नामक सोसाइटी अभिप्रेत है;]
(ज) कुलसचिव" से किसी संस्थान के सम्बन्ध में उसका कुलसचिव अभिप्रेत है;
(झ) सिनेट" से किसी संस्थान के सम्बन्ध में उसका सिनेट अभिप्रेत है;
(ञ) सोसाइटी" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत निम्नलिखित सोसाइटियों में से कोई अभिप्रेत है, अर्थात् :-
(i) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, मुम्बई;
[(iक) कालेज आफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नालाजी, दिल्ली;]
[(iख) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गुवाहाटी, असम;]
(ii) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, (कानपुर) सोसाइटी;
(iii) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, मद्रास;
1[(iv) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, भुवनेश्वर;
(v) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गांधीनगर;
(vi) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, हैदराबाद;
(vii) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, इंदौर;
(viii) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, राजस्थान;
(ix) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, मंडी;
(x) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, पटना;
(xi) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, पंजाब;]
[(xii) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, तिरुपति;
(xiii) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, पलक्कड़;
(xiv) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गोवा;
(xv) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, धारवाड़;
(xvi) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, भिलाई;
(xvii) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, जम्मू;
(xviii) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, धनबाद;]
(ट) किसी संस्थान के सम्बन्ध में, परिनियमों" और अध्यादेशों" से उस संस्थान के, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए, परिनियम और अध्यादेश अभिप्रेत हैं;
[(ठ) रुड़की विश्वविद्यालय" से रुड़की विश्वविद्यालय अधिनियम, 1947 (1947 का यू० पी० अधि० सं० 9) के अधीन स्थापित रुड़की विश्वविद्यालय अभिप्रेत है;]
[(ड) किसी संस्थान के संबंध में क्षेत्र" से राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों का ऐसा समूह अभिप्रेत है, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।]
अध्याय 2
संस्थान
4. संस्थानों का निगमन-(1) धारा 2 में उल्लिखित संस्थानों में से प्रत्येक शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला निगमित निकाय होगा और उक्त के नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
[(1क) ऐसे निगमन पर कालेज आफ इन्जीनियरिंग एण्ड टेक्नालाजी, दिल्ली को इण्डियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, दिल्ली कहा जाएगा ।]
[(1ख) ऐसे निगमन पर, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गुवाहाटी असम को इण्डियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी गुवाहटी कहा जाएगा ।]
[(1ग) रुड़की विश्वविद्यालय, रुड़की को, ऐसे निगमन पर, इण्डियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की कहा जाएगा ।]
[(1घ) ऐसे निगमन पर इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय को इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी कहा जाएगा ।]
[(1ङ) ऐेसे निगमन पर, इंडियन स्कूल आफ माइन्स, धनबाद को इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद कहा जाएगा ।]
(2) उक्त संस्थानों में से प्रत्येक को गठित करने वाले निगमित निकाय में एक अध्यक्ष, एक निदेशक और संस्थान के उस समय के बोर्ड के अन्य सदस्य होंगे ।
5. संस्थानों के निगमन का प्रभाव-इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही-
(क) (इस अधिनियम से भिन्न) किसी विधि में या किसी संविदा या किसी अन्य लिखत में किसी सोसाइटी के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह तत्समान संस्थान के प्रति निर्देश है;
(ख) सोसाइटी की या उसके स्वामित्व में की सभी सम्पत्ति, चाहे स्थावर हो या जंगम, तत्समान संस्थान में निहित होगी;
(ग) सोसाइटी के सभी अधिकार और दायित्व तत्समान संस्थान को अन्तरित हो जाएंगे और वे उसके अधिकार और दायित्व होंगे;
(घ) ऐसे प्रारम्भ से ठीक पहले सोसाइटी द्वारा नियोजित प्रत्येक व्यक्ति अपना पद या सेवा तत्समान संस्थान में उसी सेवावृत्ति के अनुसार, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं शर्तों और निबन्धनों पर और पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य निधि और अन्य मामलों के बारे में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों पर धारण करेगा जैसा कि वह उस दशा में धारण करता जिसमें यह अधिनियम पारित नहीं किया जाता और तब तक इसी प्रकार धारण करता रहेगा जब तक उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उसकी सेवावृत्ति, पारिश्रमिक और निबंधन और शर्तें परिनियमों द्वारा सम्यक्तः परिवर्तित नहीं कर दी जाती हैं :
परन्तु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो उसका नियोजन संस्थान द्वारा कर्मचारी से की गई संविदा के निबन्धनों के अनुसार समाप्त किया जा सकता है या, यदि उसमें इस निमित्त कोई उपबन्ध नहीं किया गया है तो, स्थायी कर्मचारियों के सम्बन्ध में तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारियों के सम्बन्ध में एक मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर देकर संस्थान द्वारा समाप्त किया जा सकता है ।
[स्पष्टीकरण [1] -इस धारा में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गुवाहाटी संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस तारीख के प्रति निर्देश है, जिसको, प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 1994 के उपबंध प्रवृत्त होते हैं ।]
[स्पष्टीकरण 2-इस धारा में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, भुवनेश्वर, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गांधीनगर, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, हैदराबाद, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, इंदौर, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, जोधपुर, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, मंडी, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, पटना, और इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रोपड़ के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस तारीख के प्रति निर्देश है जिसको प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के उपबंध प्रवृत्त होते हैंट ।
[स्पष्टीकरण 3-इस धारा में, इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी विरुपति, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, पलक्कड़, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गोवा, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, धारवाड़, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, भिलाई, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, जम्मू, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस तारीख के प्रति निर्देश है, जिसको प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2016 के उपबंध प्रवृत्त होते हैं ।]
[5क. इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की के निगमन का प्रभाव-प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ से ही, -
(क) (इस अधिनियम से भिन्न) किसी विधि में या किसी संविदा या किसी अन्य लिखत में रुड़की विश्वविद्यालय के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की के प्रति निर्देश है;
(ख) रुड़की विश्वविद्यालय की या उसके स्वामित्व में की सभी संपत्ति, चाहे स्थावर हो या जंगम, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की में निहित होंगी;
(ग) रुड़की विश्वविद्यालय के सभी अधिकार और दायित्व, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की को अंतरित हो जाएंगे और वे उसके अधिकार और दायित्व होंगे;
(घ) ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले रुड़की विश्वविद्यालय द्वारा नियोजित प्रत्येक व्यक्ति अपना पद या सेवा इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की में उसी सेवा धृत्ति पर, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं शर्तों और निबंधनों पर और पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य निधि और अन्य मामलों के बारे में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों पर धारण करेगा जैसा कि वह उस दशा में धारण करता जिसमें यह अधिनियम पारित नहीं किया गया होता और तब तक इसी प्रकार धारण करता रहेगा जब तक उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उसकी ऐसी धृत्ति, पारिश्रमिक और निबंधन तथा शर्तें परिनियमों द्वारा सम्यक्तः परिवर्तित नहीं कर दी जाती :
परन्तु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो उसका नियोजन इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की द्वारा कर्मचारी से की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार समाप्त किया जा सकता है या, यदि उसमें इस निमित्त कोई उपबन्ध नहीं किया गया है तो, स्थायी कर्मचारियों के संबंध में तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारियों के संबंध में एक मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर देकर इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की द्वारा समाप्त किया जा सकता है :
परन्तु यह और कि तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में या किसी लिखत में या अन्य दस्तावेज में रुड़की विश्वविद्यालय के कुलपति और प्रतिकुलपति के प्रति किसी निर्देश का, चाहे वे किन्हीं शब्द रूपों में हो, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की के क्रमशः निदेशक और उप निदेशक के प्रति निर्देश हैं; और
(ङ) प्रौद्योगिक संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ पर, रुड़की विश्वविद्यालय अधिनियम, 1947 (1948 का उत्तर प्रदेश अधिनियम संख्यांक 9) के उपबंधों के अधीन नियुक्त रुड़की विश्वविद्यालय के कुलपति को अधिनियम के अधीन निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया समझा जाएगा और वह तीन मास की अवधि तक या निदेशक नियुक्त किए जाने तक, जो भी पूर्वतर हो, अपना पद धारण करेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस तारीख के प्रति निर्देश है जिसको प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रबंध प्रवृत्त होते हैं ।
[5ख. इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के निगमन का प्रभाव-प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ से ही, -
(क) (इस अधिनियम से भिन्न) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में या किसी संविदा या किसी अन्य लिखत में इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के प्रति निर्देश है;
(ख) इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की या उसके स्वामित्व में की सभी संपत्ति, चाहे वे स्थावर हो या जंगम, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी में निहित होगी;
(ग) इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के सभी अधिकार और दायित्व, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी को अंतरित हो जाएंगे और वे उसके अधिकार और दायित्व होंगे;
(घ) इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में ऐसे प्रारंभ से ठीक पहले नियोजित प्रत्येक व्यक्ति अपना पद या सेवा इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी में उसी सेवाधृति पर, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं शर्तों और निबंधनों पर और पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य-निधि और अन्य मामलों के बारे में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों सहित धारण करेगा जैसा कि वह उस दशा में धारण करता यदि यह अधिनियम पारित नहीं किया गया होता और तब तक उसी प्रकार धारण करता रहेगा जब तक उसका नियोजन समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उसकी ऐसी सेवाधृति, पारिश्रमिक और निबंधन तथा शर्तें परिनियमों द्वारा सम्यक्तः, परिवर्तित नहीं कर दी जाती हैं :
परन्तु यदि इस प्रकार किया गया परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो उसके नियोजन को इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी द्वारा उस कर्मचारी के साथ की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार या, यदि उसमें इस निमित्त कोई उपबंध नहीं किया जाता है तो, उसे इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी द्वारा स्थायी कर्मचारियों की दशा में तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर और अन्य कर्मचारियों की दशा में एक मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर देकर समाप्त किया जा सकेगा :
परन्तु यह और कि तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में या किसी लिखत में या अन्य दस्तावेज में इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के निदेशक के प्रति किसी निर्देश का, चाहे वे किन्हीं शब्द रूपों में हो, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के निदेशक के प्रति निर्देश है; और
(ङ) प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ पर,-
(i) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1915 (1915 का 16) के उपबंधों के अधीन नियुक्त काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति को इस अधिनियम के अधीन इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के शासी बोर्ड के पदेन अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया समझा जाएगा और वह ऐसे प्रारंभ से तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा;
(ii) काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1915 (1915 का 16) के उपबंधों के अधीन नियुक्त इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के निदेशक को इस अधिनिमय के अधीन इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया समझा जाएगा और वह, इस अधिनियम के अधीन निदेशक नियुक्त किए जाने तक अपना पद धारण करेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस तारीख के प्रति निर्देश है जिसको प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के उपबंध प्रवृत्त होते हैं ।]
6. संस्थानों की शक्तियां-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक संस्थान निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग और निम्नलिखित कर्तव्यों का पालन करेगा, अर्थात्: -
(क) इंजीनियरी और प्रौद्यागिकी, विज्ञान और कला की ऐसी शाखाओं में जो संस्थान ठीक समझे; शिक्षण और अनुसंधान की और ऐसी शाखाओं में विद्या की अभिवृद्धि और ज्ञान के प्रसार की व्यवस्था करना;
(ख) परीक्षाएं लेना और उपाधियां, डिप्लोमा और अन्य विद्या संबंधी विशिष्ट उपाधियां या पदवियां प्रदान करना;
(ग) सम्मानिक उपाधियां या अन्य विशिष्ट उपाधियां प्रदान करना;
(घ) फीस और अन्य प्रभार नियत करना, उनकी मांग करना और प्राप्त करना;
(ङ) छात्रों के आवास के लिए छात्रनिवास और छात्रावास स्थापित करना, उनका अनुरक्षण और प्रबन्ध करना;
(च) संस्थान के छात्रों के आवास का पर्यवेक्षण और नियंत्रण और उनके अनुशासन का विनियमन और उनके स्वास्थ्य, सामान्य कल्याण और सांस्कृतिक तथा सामूहिक जीवन के संवर्धन की व्यवस्था करना;
(छ) संस्थान के छात्रों के लिए राष्ट्रीय कैडेट कोर के यूनिटों के अनुरक्षण के लिए व्यवस्था करना;
(ज) अध्यापन और अन्य पदों की स्थापना करना और (निदेशक के पद को छोड़कर) उन पदों पर नियुक्तियां करना;
(झ) परिनियम और अध्यादेश बनाना और उनका परिवर्तन, उपान्तरण और विखण्डन करना;
(ञ) संस्थान की या उसमें निहित किसी सम्पत्ति का ऐसी रीति से व्यवहार करना जो संस्थान अपने उद्देश्यों को आगे बढ़ाने के लिए ठीक समझे;
(ट) सरकार से दान, अनुदान, संदान या उपकृति प्राप्त करना और, यथास्थिति, वसीयतकर्ताओं, संदानकर्ताओं या अन्तरकों से स्थावर या जंगम सम्पत्ति की वसीयत, संदान और अन्तरण प्राप्त करना;
(ठ) विश्व के किसी भी भाग के ऐसे शैक्षणिक या अन्य संस्थानों से, जिनके उद्देश्य संस्थानों के उद्देश्यों से पूर्णतः या भागतः समान हैं, शिक्षकों और विद्वानों के आदान-प्रदान द्वारा और साधारणतः ऐसी रीति से सहयोग करना जो उनके समान उद्देश्यों के लिए सहायक हों;
(ड) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, छात्र सहायता वृत्तियां, पुरस्कार और मैडल संस्थित करना और प्रदान करना; और
(ढ) ऐसी अन्य सभी बातें करना जो संस्थान के सभी या किन्हीं उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।
[(1क) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक संस्थान-
(क) अपली क्वालिटी और क्षमता में वृद्धि करने के उद्देश्य से, उस क्षेत्र में अवस्थित तकनीकी शिक्षा संस्थाओं का समर्थन करके और उनके साथ सहयोग करके;
(ख) तकनीकी शिक्षा के विषय में और उनके द्वारा संस्थान को सलाह देने के लिए निर्दिष्ट किसी प्रौद्योगिकी बिन्दु पर, उसके क्षेत्र में सम्मिलित राज्य सरकारों और संघ राज्यक्षेत्रों को सलाह देकर,
अपने क्षेत्र में सम्मिलित राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों की प्रौद्योगिकी आवश्यकताओं की पूर्ति करने का प्रयास कर सकेगा ।]
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई संस्थान कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन के बिना किसी स्थावर संपत्ति का किसी रीति से व्ययन नहीं करेगा ।
7. संस्थानों का सभी मूलवंश, पंथ और वर्गों के लिए खुला होना-(1) प्रत्येक संस्थान सभी स्त्रियों और पुरुषों के लिए खुला होगा, चाहे वे किसी भी मूलवंश, पंथ, जाति या वर्ग के हों और सदस्यों, छात्रों, शिक्षकों या कर्मकारों को प्रवेश या उनकी नियुक्ति करने में या किसी भी अन्य बात के सम्बन्ध में धार्मिक विश्वास या मान्यता का मानदण्ड या शर्त अधिरोपित नहीं की जाएगी ।
(2) कोई संस्थान किसी संपत्ति की कोई ऐसी वसीयत, संदान या अन्तरण स्वीकार नहीं करेगा जिसमें परिषद् की राय में इस धारा के भाव और उद्देश्य के विरुद्ध कोई शर्त या बाध्यता अन्तर्गस्त है ।
8. संस्थान में शिक्षा-प्रत्येक संस्थान में शिक्षण-कार्य, संस्थान द्वारा या उसके नाम से इस निमित्त बनाए गए परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार किया जाएगा ।
9. कुलाध्यक्ष-(1) भारत का राष्ट्रपति प्रत्येक संस्थान का कुलाध्यक्ष होगा ।
(2) कुलाध्यक्ष किसी संस्था के कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन करने के लिए और उसके कार्यकलापों की जांच करने के लिए और उन पर रिपोर्ट ऐसी रीति से देने के लिए, जैसी कुलाध्यक्ष निदेश दे, एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकता है ।
(3) ऐसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर, कुलाध्यक्ष ऐसी कार्यवाही कर सकता है और ऐसे निदेश जारी कर सकता है जो वह रिपोर्ट में, चर्चित किन्हीं विषयों के सम्बन्ध में आवश्यक समझे और संस्थान उन निदेशों का अनुपालन करने के लिए बाध्य होगा ।
10. संस्थानों के प्राधिकरण-संस्थान के निम्नलिखित प्राधिकरण होंगे, अर्थात्: -
(क) शासक बोर्ड;
(ख) सिनेट; और
(ग) ऐसे अन्य प्राधिकरण जो परिनियमों द्वारा संस्थान के प्राधिकरण घोषित किए जाएं ।
11. शासक बोर्ड-किसी संस्थान के बोर्ड में निम्नलिखित व्यक्ति होंगे, अर्थात्: -
(क) अध्यक्ष जो कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;
(ख) निदेशक, पदेन;
(ग) जिस क्षेत्र में स्थान स्थित है उसमें समाविष्ट राज्यों में से प्रत्येक राज्य की सरकार द्वारा उन व्यक्तियों में से, जो उस सरकार की राय में, ख्याति प्राप्त प्रौद्योगिकीविद् या उद्योगपति है, नामनिर्दिष्ट एक-एक व्यक्ति;
(घ) शिक्षा, इन्जीनियरी या विज्ञान का विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले चार व्यक्ति जो परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे; और
(ङ) संस्थान को दो आचार्य जो सिनेट द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे:
[परन्तु इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी की दशा में, -
(क) ऐसे संस्थान का बोर्ड, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1915 (1915 का 16) की धारा 2 के खंड (घ) में निर्दिष्ट कार्य परिषद् द्वारा, प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ से तीन वर्ष की अवधि के पश्चात् उसके सदस्यों में से, जिसके अंतर्गत उसका कुलपति भी है, नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले उपाध्यक्ष से मिलकर बनेगा;
(ख) खंड (घ) के अंतर्गत नामनिर्दिष्ट चार व्यक्ति, जिनमें से दो व्यक्ति काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1915 (1951 का 16) की धारा 2 के खंड (घ) में निर्दिष्ट कार्य परिषद् द्वारा उसके सदस्यों में से, जिसके अंतर्गत उसका कुलपति भी है, नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे;]
। । । । । ।
12. बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, रिक्तियां और उन्हें संदेय भत्ते-(1) इस धारा में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, बोर्ड के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य की पदावधि उसके नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष होगी ।
(2) पदेन सदस्य की पदावधि तब तक होगी जब तक वह उस पद को धारण किए रहता है जिसके आधार पर वह सदस्य है ।
(3) धारा 11 के [खण्ड (ङ)] के अधीन नामनिर्दिष्ट सदस्य की पदावधि उस वर्ष की जनवरी के पहले दिन से दो वर्ष होगी जिस वर्ष में वह नामनिर्दिष्ट किया जाता है ।
(4) किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्दिष्ट सदस्य की पदावधि उस सदस्य की पदावधि के शेष भाग तक होगी जिसके स्थान पर उसे नामनिर्दिष्ट किया गया है ।
(5) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी पदावरोही सदस्य, परिषद् द्वारा अन्यथा निदेश न दिए जाने की दशा में तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक उसके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट नहीं कर दिया जाता है ।
(6) बोर्ड के सदस्य, संस्थान से ऐसे भत्ते लेने के, यदि कोई हों, हकदार होंगे जो परिनियमों में उपबन्धित किए जाएं किन्तु धारा 11 के खण्ड (ख) और (ङ) में निर्दिष्ट व्यक्तियों से भिन्न कोई सदस्य इस उपधारा के कारण किसी वेतन का हकदार नहीं होगा ।
13. बोर्ड के कृत्य-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए किसी संस्थान का बोर्ड संस्थान के कार्यकलापों के साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी होगा और संस्थान की उन सभी शक्तियों का प्रयोग करेगा जिनका इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा अन्यथा उपबन्ध नहीं किया गया है और उसको सिनेट के कार्यों का पुनर्विलोकन करने की शक्ति होगी ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, किसी संस्थान का बोर्ड, -
(क) संस्थान के प्रशासन और कार्यकरण से सम्बन्धित नीति के प्रश्नों का विनिश्चय करेगा;
(ख) संस्थान में पाठ्यक्रम संस्थित करेगा;
(ग) परिनियम बनाएगा;
(घ) संस्थान में शैक्षणिक और अन्य पद संस्थित करेगा और उन पर व्यक्तियों को नियुक्त करेगा;
(ङ) अध्यादेशों पर विचार करेगा और उन्हें उपान्तरित या रद्द करेगा;
(च) संस्थान की वार्षिक रिपोर्ट, वार्षिक लेखाओं और आगामी वित्तीय वर्ष के बजट प्राक्कलनों पर विचार करेगा और ऐसे संकल्प पारित करेगा, जो वह ठीक समझे, और उन्हें अपनी विकास योजनाओं के विवरण सहित परिषद् को प्रस्तुत करेगा;
(छ) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे प्रदत्त या उस पर अधिरोपित किए जाएं ।
(3) बोर्ड को ऐसी समितियां नियुक्त करने की शक्ति होगी जो वह इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन के लिए आवश्यक समझे ।
14. सिनेट-प्रत्येक संस्थान के सिनेट में निम्नलिखित व्यक्ति होंगे, अर्थात्: -
(क) निदेशक, पदेन, जो सिनेट का अध्यक्ष होगा;
(ख) उपनिदेशक; पदेन;
(ग) संस्थान में शिक्षा देने के प्रयोजन के लिए संस्थान द्वारा नियुक्त या उस रूप में मान्यप्राप्त आचार्य;
(घ) ऐसे तीन व्यक्ति, जो संस्थान के कर्मचारी न हों, और जिन्हें निदेशक के परामर्श से अध्यक्ष द्वारा, विज्ञान, इंजीनियरी और मानविकी के क्षेत्रों में से प्रत्येक क्षेत्र के लिए ख्यातिप्राप्त शिक्षाविदों में से नामनिर्दिष्ट किया जाएगा; और
(ङ) कर्मचारिवृन्द में से ऐसे अन्य सदस्य जिन्हें परिनियमों में अधिकथित किया जाए:
[परंतु इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी की दशा में तीन सदस्य, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1915 (1915 का 16) की धारा 2 के खंड (घ) में निर्दिष्ट कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे ।]
15. सिनेट के कृत्य-इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए किसी संस्थान की सिनेट संस्थान में शिक्षण, शिक्षा और परीक्षा के स्तरों का नियन्त्रण और साधारण विनियमन करेगी और उनको बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगी और ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगी जो परिनियमों द्वारा प्रदत्त या अधिरोपित किए जाएं ।
16. बोर्ड का अध्यक्ष-(1) अध्यक्ष सामान्यतया बोर्ड के अधिवेशनों की और संस्थान के दीक्षान्त समारोहों की अध्यक्षता करेगा ।
(2) अध्यक्ष का यह कर्तव्य होगा कि वह यह सुनिश्चित करे कि बोर्ड द्वारा किए गए विनिश्चयों का क्रियान्वयन हो रहा है ।
(3) अध्यक्ष ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे सौंपे जाएं ।
17. निदेशक-(1) परिषद् प्रत्येक संस्थान के निदेशक की नियुक्ति कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन से करेगी ।
(2) निदेशक संस्थान का मुख्य शैक्षणिक और कार्यपालक अधिकारी होगा और संस्थान के उचित प्रशासन के लिए और शिक्षा प्रदान करने और उसमें अनुशासन बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगा ।
(3) निदेशक, बोर्ड को वार्षिक रिपोर्ट और लेखा प्रस्तुत करेगा ।
(4) निदेशक ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा उसे सौंपे जाएं ।
18. उपनिदेशक-प्रत्येक संस्थान का उपनिदेशक ऐसी शर्तों और निबन्धनों पर नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा अधिकथित किए जाएं और ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो इस अधिनियम या परिनियमों या निदेशक द्वारा उसे सौंपे जाएं ।
19. कुलसचिव-(1) प्रत्येक संस्थान का कुलसचिव ऐसी शर्तों और निबन्धनों पर नियुक्त किया जाएगा और परिनियमों द्वारा अधिकथित किए जाएं और वह संस्थान के अभिलेख, उसकी सामान्य मुद्रा, निधि और ऐसी अन्य सम्पत्ति का अभिरक्षक होगा जो बोर्ड उसके भारसाधन में सौंपे ।
(2) कुलसचिव बोर्ड, सिनेट और ऐसी समितियों का सचिव होगा जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं ।
(3) कुलसचिव अपने कृत्यों के उचित निर्वहन के लिए निदेशक के प्रति उत्तरदायी होगा ।
(4) कुलसचिव ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे अधिनियम या परिनियमों या निदेशक द्वारा सौंपे जाएं ।
20. अन्य प्राधिकरण और अधिकारी-इसमें इसके पूर्व वर्णित प्राधिकरणों और अधिकारियों से भिन्न प्राधिकरणों और अधिकारियों की शक्तियां और कर्तव्य परिनियमों द्वारा अवधारित किए जाएंगे ।
21. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-संस्थान को इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा सम्यक् विनियोजन किए जाने के पश्चात् प्रत्येक संस्थान को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशि ऐसी रीति से संदाय करेगी जो वह ठीक समझे ।
22. संस्थान की निधि-(1) प्रत्येक संस्थान एक निधि बनाए रखेगा जिसमें निम्नलिखित धन जमा किए जाएंगे: -
(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए सभी धन;
(ख) संस्थान द्वारा प्राप्त सभी फीस और अन्य प्रभार;
(ग) अनुदान, दान, संदान, उपकृति, वसीयत या अन्तरण के रूप में संस्थान द्वारा प्राप्त सभी धन; और
(घ) किसी अन्य रीति या किसी अन्य स्रोत से प्राप्त संस्थान द्वारा सभी धन ।
(2) किसी भी संस्थान की निधि में जमा किए गए सभी धन ऐसे बैंकों में जमा किए जाएंगे या ऐसी रीति से विनिहित किए जाएंगे जो संस्थान, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, विनिश्चित करे ।
(3) संस्थान की निधि का उपयोग संस्थान के व्यय की पूर्ति के लिए किया जाएगा जिसके अन्तर्गत इस अधिनियम के अधीन संस्थान की शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के निर्वहन में उपगत व्यय भी हैं ।
23. लेखा और लेखापरीक्षा-(1) प्रत्येक संस्थान लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखा का एक वार्षिक विवरण, जिसके अन्तर्गत तुलन-पत्र भी है, ऐेसे प्ररूप में तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित किया जाए ।
(2) प्रत्येक संस्थान के लेखाओं की परीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा की जाएगी और ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा उपगत कोई व्यय संस्थान द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के तथा संस्थान के लेखाओं की परीक्षा के सम्बन्ध में उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति के, ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की परीक्षा के सम्बन्ध में होते हैं और विशिष्टतया उसे बहियों, लेखाओं, सम्बद्ध वाउचरों तथा अन्य दस्तावेजों और कागज पत्र को पेश किए जाने की मांग करने और संस्थान के कार्यालयों का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रत्येक संस्थान के यथाप्रमाणित लेखे तद्विषयक लेखापरीक्षा-रिपोर्ट सहित केन्द्रीय सरकार को प्रतिवर्ष भेजे जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
24. पेंशन और भविष्य निधि-(1) प्रत्येक संस्थान अपने कर्मचारियों के, जिनके अन्तर्गत निदेशक भी हैं, फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, ऐसी पेंशन बीमा और भविष्य निधियां स्थापित करेगा जो वह ठीक समझे ।
(2) जहां ऐसी कोई भविष्य निधि इस प्रकार स्थापित की गई है वहां, केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकती है कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबन्ध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्य निधि है ।
25. नियुक्तियां-किसी संस्थान के कर्मचारिवृन्द की सभी नियुक्तियां निदेशक की नियुक्ति को छोड़कर परिनियमों द्वारा अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार, निम्नलिखित के द्वारा की जाएंगी: -
(क) यदि नियुक्ति शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द में प्राध्यापक के या उसके ऊपर के पद पर की जाती है या यदि नियुक्ति शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द से भिन्न किसी ऐसे काडर में की जाती है जिसका अधिकतम वेतनमान छह सौ रुपए प्रतिमास से अधिक है तो बोर्ड द्वारा;
(ख) किसी अन्य दशा में निदेशक द्वारा ।
26. परिनियम-इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, परिनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं बातों के लिए उपबन्ध कर सकते हैं, अर्थात्: -
(क) सम्मानित उपाधियों का प्रदान किया जाना;
(ख) शिक्षण विभागों का बनाया जाना;
(ग) संस्थानों में पाठ्यकमों के लिए प्रभार्य फीस और संस्थान की उपाधियों और डिप्लोमाओं की परीक्षाओं में प्रवेश के लिए प्रभार्य फीस;
(घ) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, छात्र सहायता वृत्तियों, मैडल और पुरस्कारों का संस्थित किया जाना;
(ङ) संस्थान के अधिकारियों की पदावधि और उनकी नियुक्ति का ढ़ंग;
(च) संस्थान के शिक्षकों की अर्हताएं;
(छ) संस्थान के शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृन्द का वर्गीकरण, नियुक्ति का ढ़ंग और उनकी सेवा की शर्तों और निबन्धनों का अवधारण;
(ज) संस्थान के अधिकारियों, शिक्षकों और अन्य कर्मचारिवृन्द के फायदे के लिए पेंशन बीमा और भविष्य निधियों की स्थापना;
(झ) संस्थान के प्राधिकरणों का गठन, उनकी शक्तियां और कर्तव्य;
(ञ) छात्र-निवास और छात्रावासों की स्थापना और उनका अनुरक्षण;
(ट) संस्थान के छात्रों के आवास की शर्तें और छात्र-निवासों तथा छात्रावासों में निवास के लिए फीस और अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण;
(ठ) बोर्ड के सदस्यों में रिक्तियों को भरने की रीति;
(ड) बोर्ड के अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय भत्ते;
(ढ) बोर्ड के आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन;
(ण) बोर्ड, सिनेट या किसी समिति के अधिवेशन, ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति और उनके कामकाज के संचालन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(त) कोई अन्य बात जो इस अधिनियम के अधीन परिनियमों द्वारा विहित की जानी है या की जा सकती है ।
27. परिनियम किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) प्रत्येक संस्थान के प्रथम परिनियम कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन से परिषद् द्वारा बनाए जाएंगे और उनकी एक प्रति संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष यथाशक्य शीघ्र रखी जाएगी ।
(2) बोर्ड, समय-समय पर नया या अतिरिक्त परिनियम बना सकता है या इस धारा में इसके पश्चात् उपबन्धित रीति से परिनियमों को संशोधित या निरसित कर सकता है ।
(3) प्रत्येक नए परिनियम के लिए या परिनियमों में वृद्धि या किसी परिनियम के किसी संशोधन या निरसन के लिए कुलाध्यक्ष का पुर्वानुमोदन अपेक्षित होगा । कुलाध्यक्ष उसके लिए सहमति दे सकता है या सहमति रोक सकता है, या उसे बोर्ड को विचारण के लिए भेज सकता है ।
(4) कोई नया परिनियम या विद्यमान परिनियम को संशोधित या निरसित करने वाला परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कुलाध्यक्ष उसके लिए सहमति नहीं दे देता है ।
28. अध्यादेश-इस अधिनियम और परिनियमों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक संस्थान के अध्यादेश निम्नलिखित सभी या किन्हीं बातों के लिए उपबन्ध कर सकते हैं, अर्थात्: -
(क) संस्थान में छात्रों का प्रवेश;
(ख) संस्थान के सभी उपाधियों और डिप्लोमाओं के लिए अधिकथित किए जाने वाले पाठ्यक्रम;
(ग) वे शर्तें जिनके अधीन छात्रों को उपाधि तथा डिप्लोमा के पाठ्यक्रमों में और संस्थान की परीक्षाओं में प्रवेश दिया जाएगा और वे उपाधि तथा डिप्लोमाओं के लिए पात्र होंगे;
(घ) अध्येतावृत्तियों, छात्रवृत्तियों, छात्र सहायता वृत्तियों, पदक और पुरस्कारों के दिए जाने के लिए शर्तें;
(ङ) परीक्षा निकायों, परीक्षकों और अनुसीमकों की नियुक्ति की शर्तें और ढंग और उनके कर्तव्य;
(च) परीक्षाओं का संचालन;
(छ) संस्थान के विद्यार्थियों में अनुशासन बनाए रखना; और
(ज) कोई अन्य बात जो इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन अध्यादेशों द्वारा उपबन्धित की जानी है या की जा सकती है ।
29. अध्यादेश किस प्रकार बनाए जाएंगे-(1) इस धारा में जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, अध्यादेश सिनेट द्वारा बनाए जाएंगे ।
(2) सिनेट द्वारा बनाए गए सभी अध्यादेश उस तारीख से प्रभावी होंगे जो वह निर्दिष्ट करे किन्तु इस प्रकार बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश बोर्ड को, यथाशक्य शीघ्र, प्रस्तुत किया जाएगा और बोर्ड अपने आगामी अधिवेशन में उस पर विचार करेगा ।
(3) बोर्ड को ऐसा कोई अध्यादेश संकल्प द्वारा उपान्तरित या रद्द करने की शक्ति होगी और संकल्प की तारीख से ऐसा अध्यादेश, यथास्थिति, तद्नुसार उपान्तरित या रद्द हो जाएगा ।
30. माध्यस्थम् अधिकरण-(1) किसी संस्थान और उसके किसी कर्मचारी के बीच संविदा से उद्भूत होने वाला विवाद, संपृक्त कर्मचारी के अनुरोध पर या संस्थान की प्ररेणा पर, माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा जिसमें संस्थान द्वारा नियुक्त एक सदस्य, कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य और कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक अधिनिर्णायक होगा ।
(2) अधिकरण का विनिश्चय अन्तिम होगा और किसी भी न्यायालय में उस पर कोई आक्षेप नहीं किया जा सकेगा ।
(3) उपधारा (1) द्वारा माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देश किए जाने के लिए अपेक्षित किसी मामले की बाबत किसी न्यायालय में कोई वाद या कार्यवाही नहीं होगी ।
(4) माध्यस्थम् अधिकरण को अपनी प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।
(5) माध्यस्थम् से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की कोई बात इस धारा के अधीन माध्यस्थमों को लागू नहीं होगी ।
अध्याय 3
परिषद्
31. परिषद् की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, एक केन्द्रीय निकाय स्थापित किया जाएगा जिसे परिषद् कहा जाएगा ।
(2) परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्: -
(क) केन्द्रीय सरकार में तकनीकी शिक्षा का भारसाधक मंत्री, पदेन, अध्यक्ष के रूप में;
(ख) प्रत्येक संस्थान का अध्यक्ष, पदेन;
(ग) प्रत्येक संस्थान का निदेशक, पदेन;
(घ) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष, पदेन;
(ङ) वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद् का महानिदेशक, पदेन;
(च) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ सांइस, बंगलौर की परिषद् का अध्यक्ष, पदेन;
(छ) इंडियन इंस्टीट्यूट आफ सांइस, बंगलौर का निदेशक, पदेन;
(ज) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट तीन व्यक्ति, एक तकनीकी शिक्षा से सम्बद्ध मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने वाला, दूसरा वित्त मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने वाला और तीसरा किसी अन्य मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने वाला;
(झ) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट एक व्यक्ति;
(ञ) कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले कम से कम तीन या अधिक से अधिक पांच व्यक्ति जो शिक्षा, उद्योग, विज्ञान या प्रौद्योगिकी का विशेष ज्ञान या व्यावहारिक अनुभव रखने वाले व्यक्ति होंगे;
(ट) तीन संसद् सदस्य जिनमें से दो लोक सभा द्वारा अपने सदस्यों में से निर्वाचित होंगे और एक राज्य सभा द्वारा अपने सदस्यों में से निर्वाचित होगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार द्वारा अपने तकनीकी शिक्षा से सम्बद्ध मंत्रालय का एक अधिकारी परिषद् के सचिव के रूप में कार्य करने के लिए नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ।
32. परिषद् के सदस्यों की पदावधि, रिक्तियां और उन्हें संदेय भत्ते-(1) इस धारा में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, परिषद् के सदस्य की पदावधि, यथास्थिति, उसके नामनिर्देशन या निर्वाचन की तारीख से तीन वर्ष होगी ।
(2) पदेन सदस्य की पदावधि तब तक रहेगी जब तक वह उस पद को धारण करता है जिसके आधार पर वह सदस्य है ।
(3) धारा 31 की उपधारा (2) के खण्ड (ज) में निर्दिष्ट परिषद् का सदस्य केन्द्रीय सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।
(4) धारा 31 की उपधारा (2) के खण्ड (ट) के अधीन सदस्य की पदावधि, उसके उस सदन का, जिसने उसे निर्वाचित किया था, सदस्य न रहने पर तत्काल समाप्त हो जाएगी ।
(5) किसी आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित सदस्य की पदावधि उस सदस्य की पदावधि के शेष भाग तक होगी जिसके स्थान पर वह नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित किया गया है ।
(6) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, पदावरोही सदस्य केन्द्रीय सरकार द्वारा अन्यथा निदेश न दिए जाने की दशा में तब तक पद धारण करता रहेगा जब तक कोई अन्य व्यक्ति उसके स्थान पर सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित नहीं कर दिया जाता है ।
(7) परिषद् के सदस्यों को केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे यात्रा और अन्य भत्ते दिए जाएंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित किए जाएं, किन्तु इस उपधारा के कारण कोई सदस्य किसी वेतन का हकदार नहीं होगा ।
33. परिषद् के कृत्य-(1) परिषद् का यह साधारण कर्तव्य होगा कि वह सभी संस्थानों के क्रियाकलापों का समन्वय करे ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, परिषद् निम्नलिखित कृत्य करेगी, अर्थात्: -
(क) पाठ्यक्रमों की अवधि, संस्थानों द्वारा प्रदान की जाने वाली उपाधियां और अन्य विद्या सम्बन्धी विशिष्ट उपाधियों, प्रवेश स्तर और अन्य शैक्षिक विषयों से सम्बन्धित बातों पर सलाह देना;
(ख) कर्मचारियों के काडर, उनकी भर्ती के ढंग और सेवा की शर्तें, छात्रवृत्तियां देने और फीस माफ करने, फीस के उद्ग्रहण और समान हित के अन्य मामलों के बारे में नीति अधिकथित करना;
(ग) प्रत्येक संस्थान की विकास योजनाओं की जांच करना और उनमें से ऐसी योजनाओं का अनुमोदन करना जो आवश्यक समझी जाएं और ऐसी अनुमोदित योजनाओं के वित्तीय परिणामों को भी मोटे तौर से उपदर्शित करना;
(घ) प्रत्येक संस्थान के वार्षिक बजट प्राक्कलनों की जांच करना और केन्द्रीय सरकार से इस प्रयोजन के लिए निधि आबंटन करने की सिफारिश करना;
(ङ) कुलाध्यक्ष को इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा किए जाने वाले किसी कृत्य के सम्बन्ध में उस दशा में सलाह देना जिसमें ऐसी अपेक्षा की जाए; और
(च) ऐसे अन्य कृत्य करना जो उसे इस अधिनियम द्वारा या के अधीन सौंपे जाएं ।
34. परिषद् का अध्यक्ष-(1) परिषद् का अध्यक्ष परिषद् की बैठक की अध्यक्षता सामान्यतया करेगा ।
(2) परिषद् के अध्यक्ष का यह कर्तव्य होगा कि वह यह सुनिश्चित करे कि परिषद् द्वारा किए गए विनिश्चयों का क्रियान्वयन होता है ।
(3) अध्यक्ष ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे इस अधिनियम द्वारा सौंपे गए हैं ।
35. इस अध्याय के विषयों के बारे में नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अध्याय के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम [राजपत्र में अधिसूचना द्वारा] बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं बातों के लिए उपबन्ध कर सकते हैं, अर्थात्: -
(क) परिषद् के सदस्यों में रिक्तियों को भरने की रीति;
(ख) परिषद् के सदस्य के रूप में चुने जाने और बने रहने के संबंध में निरर्हताएं;
(ग) वे परिस्थितियां जिनमें और वे प्राधिकारी जिनके द्वारा सदस्य हटाए जा सकते हैं;
(घ) परिषद् के अधिवेशन और उनमें कामकाज के संचालन की प्रक्रिया;
(ङ) परिषद् के सदस्यों को संदेय यात्रा और अन्य भत्ते; और
(च) परिषद् के कृत्य और वह रीति जिससे ऐसे कृत्य किए जा सकते हैं ।
1[(3) इस अध्याय के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
अध्याय 4
प्रकीर्ण
36. रिक्तियों आदि के कारण कार्यों और कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-इस अधिनियम या परिनियमों के अधीन गठित परिषद् या किसी संस्थान या बोर्ड या सिनेट या किसी अन्य निकाय का कोई कार्य निम्नलिखित कारणों से अविधिमान्य नहीं होगा: -
(क) उसमें कोई रिक्ति या उसके गठन में कोई त्रुटि, अथवा
(ख) उसके सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के निर्वाचन, नामनिर्देशन या नियुक्ति में कोई त्रुटि, अथवा
(ग) उसकी प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता जो मामले के गुणागुण को प्रभावित नहीं करती है ।
37. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसा उपबन्ध कर सकती है, या ऐसा निदेश दे सकती है जो इस अधिनियम के प्रयोजनों से अंसगत न हो और जो कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ।
38. संक्रमणकालीन उपबन्ध-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, -
(क) इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पहले किसी संस्थान के शासक बोर्ड के रूप में कार्य करने वाला शासक बोर्ड उसी रूप में तब तक कार्य करता रहेगा जब तक इस अधिनियम के अधीन उस संस्थान के लिए कोई नया बोर्ड गठित नहीं कर दिया जाता है किन्तु इस अधिनियम के अधीन नए बोर्ड के गठन पर बोर्ड के ऐसे सदस्य, जो ऐसे गठन के पहले पद धारण कर रहे हों, पद धारण नहीं करेंगे;
(ख) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पहले [कालेज आफ इंजीनियरिंग एण्ड टेक्नालाजी, दिल्ली के सम्बन्ध में गठित कर्मचारी समिति और किसी अन्य संस्थान के सम्बन्ध में गठित किसी विद्या परिषद्] को अधिनियम के अधीन गठित सिनेट तब तक समझा जाएगा जब तक उस संस्थान के लिए इस अधिनियम के अधीन सिनेट गठित नहीं कर दिया जाता है;
(ग) जब तक इस अधिनियम के अधीन प्रथम परिनियम और अध्यादेश नहीं बनाए जाते हैं तब तक, इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पहले यथाप्रवृत्त इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, खड़गपुर के परिनियम और अध्यादेश, उस संस्थान को लागू होते रहेंगे और वे आवश्यक उपान्तरों और अनुकूलनों सहित किसी अन्य संस्थान को भी उस विस्तार तक लागू होंगे जहां तक वे इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत नहीं हैं;
[(घ) जब तक इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गुवाहाटी के संबंध में प्रथम परिनियम और अध्यादेश इस अधिनियम के अधीन नहीं बनाए जाते हैं तब तक प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 1994 के प्रारंभ के ठीक पहले प्रवृत्त इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, खड़गपुर के परिनियम और अध्यादेश आवश्यक उपांतरों और अनुकूलनों सहित, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गुवाहाटी को वहां तक लागू होंगे जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं ।
[(ङ) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पहले रुड़की विश्वविद्यालय की सिंडीकेट के रूप में कार्य करने वाला सिंडीकेट उसी रूप में तब तक कार्य करती रहेगी जब तक कि इस अधिनियम के अधीन इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की के लिए कोई नया बोर्ड गठित नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नए बोर्ड के गठन पर सिंडीकेट के ऐसे सदस्य, जो ऐसे गठन के पहले पद धारण कर रहे हों, पद धारण नहीं करेंगे;
(च) इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पहले रुड़की विश्वविद्यालय की विद्या परिषद् के रूप में कार्य करने वाली विद्या परिषद् उसी रूप में तब तक कार्य करती रहेगी जब तक कि इस अधिनियम के अधीन इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की के लिए कोई नया सिनेट गठित नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नए सिनेट के गठन पर विद्या परिषद् के ऐसे सदस्य, जो ऐसे गठन के पहले पद धारण कर रहे हों, पद पर नहीं रह जाएंगे;
(छ) जब तक इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की के संबंध में प्रथम परिनियम और अध्यादेश इस अधिनियम के अधीन नहीं बनाए जाते हैं तब तक प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ के ठीक पहले प्रवृत्त इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, मुंबई के परिनियम और अध्यादेश, आवश्यक उपांतरणों और अनुकूलनों सहित, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की को वहां तक लागू होंगे जहां तक वे इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत नहीं हैं;
(ज) प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2002 में किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसे छात्र के बारे में, जिसने शैक्षणिक सत्र 1994-95 के प्रारंभ को या उसके पश्चात् रुड़की विश्वविद्यालय की कक्षाओं में जाना प्रारंभ कर दिया है, धारा 6 की उपधारा (1) के खंड (ख) के प्रयोजन के लिए यह समझा जाएगा कि उसने इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की में किसी पाठ्यक्रमानुसार अध्ययन किया है, परन्तु यह तब जबकि ऐसे छात्र को पहले से ही ऐसे ही पाठ्यक्रम अध्ययन के लिए कोई डिग्री या डिप्लोमा प्रदान नहीं किया गया हो;
(झ) यदि प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2002 के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उक्त कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत होते हों;
[(ञ) जब तक इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, भुवनेश्वर, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गांधीनगर, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, हैदारबाद, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, इंदौर, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, जोधपुर, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, मंडी, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, पटना और इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रोपड़ के संबंध में प्रथम परिनियम और अध्यादेश इस अधिनियम के अधीन नहीं बनाए जाते हैं तब तक प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ से ठीक पहले प्रवृत्त ऐसे संस्थान के परिनियम और अध्यादेश, आवश्यक उपांतरों और अनुकूलनों सहित, उन संस्थानों को वहां तक लागू होंगे जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं;
(ट) प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ से ठीक पहले कार्य करने वाली काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1915 की धारा 2 के खंड (घ) में निर्दिष्ट कार्य परिषद् उसी रूप में तब तक कार्य करती रहेगी जब तक इस अधिनियम के अधीन इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के लिए कोई नया बोर्ड गठित नहीं कर दिया जाता है, किंतु इस अधिनियम के अधीन नए बोर्ड के गठन पर काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की कार्य परिषद्, जहां तक उसका इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी से संबंध है, कार्य नहीं करेगी;
(ठ) प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ से ठीक पहले कार्य करने वाली, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय अधिनियम, 1915 की धारा 2 के खंड (क) में निर्दिष्ट विद्या परिषद् उसी रूप में तब तक कार्य करती रहेगी जब तक इस अधिनियम के अधीन इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के लिए कोई नया सिनेट गठित नहीं कर दिया जाता है किंतु इस अधिनियम के अधीन नए सिनेट के गठन पर, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय की विद्या परिषद्, जहां तक उसका इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी से संबंध है, कार्य नहीं करेगी;
(ड) जब तक इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के संबंध में प्रथम परिनियम और अध्यादेश इस अधिनियम के अधीन नहीं बनाए जाते हैं तब तक ऐसे परिनियम और अध्यादेश, जो प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ से ठीक पहले इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, कानपुर को लागू होते हैं, आवश्यक उपांतरों और अनुकूलनों सहित इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), को वहां तक लागू होंगे जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है;
(ढ) प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 में किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसे छात्र के बारे में, जिसने शैक्षणिक सत्र 2006-2007 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी विश्वविद्यालय की कक्षाओं में जाना प्रारंभ कर दिया है या जिसने शैक्षणिक सत्र 2009-2010 को या उसके पश्चात् पाठ्यक्रम पूरा किया है, धारा 6 की उपधारा (1) के खंड (ख) के प्रयोजन के लिए यह समझा जाएगा कि उसने इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी में किसी पाठ्यक्रमानुसार अध्ययन किया है, परंतु यह तब जब कि ऐसे छात्र को पहले से ही ऐसे ही पाठ्यक्रमानुसार अध्ययन के लिए कोई डिग्री या डिप्लोमा प्रदान नहीं किया गया हो;
(ण) यदि प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदोश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उक्त कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक प्रतीत होते हैं:
परन्तु इस खंड के अधीन कोई आदेश प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के प्रारंभ से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा:
परन्तु यह और कि इस खंड के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।]
[(त) जब तक इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, तिरुपति, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, पलक्कड़, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गोवा, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, धारवाड़, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, भिलाई, इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, जम्मू के प्रथम परिनियम और अध्यादेश इस अधिनियम के अधीन नहीं बनाए जाते हैं, तब तक प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2016 के प्रारंभ से ठीक पहले यथा प्रवृत्त ऐसे संस्थानों के परिनियम और अध्यादेश आवश्यक उपांतरणों और अनुकूलनों सहित उन संस्थानों को उस विस्तार तक लागू होंगे, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों के असंगत नहीं हैं;
(थ) प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2016 के प्रारंभ से ठीक पहले कार्य करने वाले इंडियन स्कूल आफ माइन्स, धनबाद के नियमों के नियम 7 औश्र विनियमों में निर्दिष्ट कार्यकारी बोर्ड उसी रूप में तब तक कार्य करता रहेगा, जब तक इस अधिनियम के अधीन इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन आफ स्कूल माइन्स), धनबाद के लिए किसी नए बोर्ड का गठन नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नए बोर्ड के गठन पर इंडियन स्कूल आफ माइन्स, धनबाद का कार्यकारी बोर्ड, जहां तक उसका संबंध इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद से है, कार्य नहीं करेगा;
(द) प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2016 के प्रारंभ से ठीक पहले कार्य करने वाली इंडियन स्कूल आफ माइन्स, धनबाद के नियमों के नियम 9 और विनियमों में निर्दिष्ट विद्या परिषद् उसी रूप में तब तक कार्य करती रहेगी, जब तक इस अधिनियम के अधीन इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद के लिए किसी नई सिनेट का गठन नहीं कर दिया जाता है, किन्तु इस अधिनियम के अधीन नई सिनेट के गठन पर इंडियन स्कूल आफ माइन्स, धनबाद की विद्या परिषद्, जहां तक उसका संबंध इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद से है, कार्य नहीं करेगी;
(ध) जब तक इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद के संबंध में प्रथम परिनियम और अध्यादेश, इस अधिनियम के अधीन नहीं बनाए जाते हैं, तब तक ऐसे परिनियम और अध्यादेश, जो प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2016 के प्रारंभ से ठीक पहले इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की को लागू होते हैं, आवश्यक उपांतरणों और अनुकूलनों सहित इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद को उस विस्तार तक लागू होंगे, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों के असंगत नहीं हैं;
(न) प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2016 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसे छात्र के बारे में, जिसने शैक्षणिक सत्र 2015-2016 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् इंडियन स्कूल आफ माइन्स, धनबाद की कक्षाओं में जाना प्रारंभ कर दिया है या जिसने शैक्षणिक सत्र 2015-2016 में या उसके पश्चात् पाठ्यक्रम पूरा किया है, धारा 6 की उपधारा (1) के खंड (ख) के प्रयोजनों के लिए इंडियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद में अध्ययन पाठ्यक्रम किया गया समझा जाएगा, परंतु यह तब जब, ऐसे छात्र को उसी अध्ययन पाठ्यक्रम के लिए पहले ही डिग्री या डिप्लोमा प्रदान नहीं कर दिया गया है;
(प) यदि प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2016 के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों के असंगत न हो और जो कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों:
परन्तु इस खंड के अधीन कोई आदेश प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2016 के प्रारंभ से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा:
परन्तु यह और कि इस खंड के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा:]
परन्तु इस खंड के अधीन कोई आदेश प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा:
परन्तु यह और कि इस खंड के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
स्पष्टीकरण [1]-इस धारा के खंड (क) में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, गुवाहाटी के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस तारीख के प्रति निर्देश है, जिसको प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 1994 के उपबंध प्रवृत्त होते हैं ।]
[स्पष्टीकरण 2-इस धारा के खंड (ङ) और खंड (च) में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, रुड़की के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस तारीख के प्रति निर्देश है, जिसको प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2002 के उपबंध प्रवृत्त होते हैं ।]
[स्पष्टीकरण 3-इस धारा के खंड (ट), खंड (ठ) और खंड (ड) में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (काशी हिन्दू विश्वविद्यालय), वाराणसी के संबंध में, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस तारीख के प्रति निर्देश है जिसको प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2012 के उपबंध प्रवृत्त होते हैं ।]
[स्पष्टीकरण 4-इस धारा के खंड (थ), खंड (द) और खंड (ध) में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का, इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (इंडियन स्कूल आफ माइन्स), धनबाद के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस तारीख के प्रति निर्देश है, जिसको प्रौद्योगिकी संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2016 के उपबंध प्रवृत्त होते हैं ।]
39. निरसन और व्यावृत्ति-(1) इसके द्वारा इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (खड़गपुर) अधिनियम, 1956 (1956 का 5) निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अधिनियम के उपबन्ध, जो अनुसूची में दिए गए हैं, प्रभावी बने रहेंगे:
परन्तु उक्त उपबन्धों में इस अधिनियम" पद से उक्त उपबन्ध अभिप्रेत हैं ।
अनुसूची
(धारा 39 देखिए)
इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (खड़गपुर) अधिनियम, 1956 के वे उपबन्ध जो प्रवृत्त रहेंगे
2. इण्डियन इन्स्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी (खड़गपुर) को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया जाना-पश्चिमी बंगाल राज्य के मिदनापुर जिले में खड़गपुर में इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी के नाम से ज्ञात संस्था के उद्देश्य इस प्रकार के हैं कि वे संस्था को राष्ट्रीय महत्व का बनाते हैं, अतः इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, खड़गपुर के नाम से ज्ञात संस्था राष्ट्रीय महत्व की संस्था है ।
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, तब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो: -
(ख) बोर्ड" से संस्थान का शासक बोर्ड अभिप्रेत है;
(ग) अध्यक्ष" से बोर्ड का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ङ) निदेशक" से संस्थान का निदेशक अभिप्रेत है;
(छ) संस्थान" से इस अधिनियम के अधीन निगमित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, खड़गपुर के नाम से ज्ञात संस्थान अभिप्रेत है ।
4. निगमन-(1) बोर्ड के प्रथम अध्यक्ष, प्रथम निदेशक और प्रथम सदस्य, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति होंगे, और सभी व्यक्ति, जो बोर्ड के अधिकारी या सदस्य इसके पश्चात् हो जाते हैं या नियुक्त किए जाते हैं, जब तक वे ऐसे पद या सदस्यता को धारण करते रहेंगे, उनको सम्मिलित करके इसके द्वारा इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी, खड़गपुर के नाम से निगमित निकाय गठित किया जाता है ।
(2) संस्थान का शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और वह उक्त नाम से वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
5. खड़गपुर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी के विद्यमान कर्मचारियों की सेवा का अन्तरण-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए प्रत्येक व्यक्ति, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पहले खड़गपुर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी में स्थायी रूप से नियोजित है, ऐसे प्रारम्भ से ही, संस्थान का कर्मचारी हो जाएगा और उससे अपना पद या सेवा उसी सेवा-वृत्ति के अनुसार, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं शर्तों और निबन्धनों पर और पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य निधि और अन्य बातों के बारे में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों सहित धारण करेगा जैसा कि वह इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख पर उस दशा में धारण करता जिसमें वह अधिनियम पारित नहीं किया जाता ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, संस्थान, कुलाध्यक्ष के पूर्वानुमोदन से, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट किसी कर्मचारी की शर्तों और निबन्धनों को परिवर्तित कर सकता है और यदि परिवर्तन ऐसे कर्मचारी को स्वीकार्य नहीं है तो संस्थान उसका नियोजन, कर्मचारी के साथ की गई संविदा के निबंधनों के अनुसार या, यदि इस निमित्त कोई उपबन्ध नहीं किया गया है, तो उसको तीन मास के पारिश्रमिक के बराबर प्रतिकर देकर समाप्त कर सकता है ।
(3) खड़गपुर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट आफ टेक्नालाजी में नियोजित ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्ति से भिन्न है, इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही ऐसी शर्तों और निबन्धनों पर, जो परिनियमों द्वारा उपबन्धित की जाएं और जब तक ऐसा उपबन्ध नहीं कर दिया जाता है तब तक ऐसे प्रारम्भ के ठीक पहले उसको लागू होने वाली शर्तों और निबन्धनों पर, संस्थान का कर्मचारी हो जाएगा ।
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