बंगाल इम्यूनिटी कंपनी लिमिटेड (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1984
(1984 का अधिनियम संख्यांक 57)
[29 अगस्त, 1984]
जनसाधारण के हित में, मैसर्स बंगाल इम्यूनिटी कंपनी लिमिटेड
के उपक्रमों के अर्जन और अन्तरण का तथा
उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक
विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
मैसर्स बंगाल इम्यूनिटी कंपनी लिमिटेड, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट वस्तुओं के, अर्थात्, रसायनों (उर्वरकों को छोड़कर), ओषधियों और भेषजों के, जो जनसाधारण की जरूरतों की पूर्ति के लिए आवश्यक हैं, उत्पादन और वितरण में लगी हुई थी;
और केन्द्रीय सरकार ने, कंपनी के कार्यकलापों का अन्वेषण करने के पश्चात् अपनी यह राय होने पर कि कंपनी के कार्यकलापों का प्रबंध ऐसी रीति से किया जा रहा है जो लोक हित के लिए अत्यधिक अहितकर है, व्यक्तियों के एक निकाय को कंपनी का प्रबंध-ग्रहण करने के लिए उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18क के अधीन प्राधिकृत किया था;
और कंपनी के स्वामित्व वाले उपक्रमों के इस दृष्टि से पुनर्गठन और पुनरुद्धार के प्रयोजन के लिए, जिससे उक्त कंपनी द्वारा उत्पादित विभिन्न प्रकार के रसायनों (उर्वरकों को छोड़कर), ओषधियों और भेषजों के, जो जनसाधारण की जरूरतों के लिए आवश्यक हैं, उत्पादन और वितरण की वृद्धि द्वारा जनसाधारण का हितसाधन हो सके और उसका निरंतर प्रदाय सुनिश्चित हो सके, यह आवश्यक है कि कंपनी के उपक्रमों का अर्जन कर लिया जाए;
भारत गणराज्य के पैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम बंगाल इम्यूनिटी कंपनी लिमिटेड (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1984 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख अभिप्रेत है;
(ख) आयुक्त" से धारा 15 के अधीन नियुक्त संदाय आयुक्त अभिप्रेत है;
(ग) कंपनी" से बंगाल इम्यूनिटी कंपनी लिमिटेड अभिप्रेत है, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित कंपनी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय, 153, लेनिन सरणी, कलकत्ता-700013 में है;
(घ) विद्यमान सरकारी कंपनी" से ऐसी कोई कंपनी अभिप्रेत है जो नियत दिन को कारबार चला रही है;
(ङ) नई सरकारी कंपनी" से ऐसी कोई कंपनी अभिप्रेत है जो नियत दिन को या उसके पश्चात् बनाई गई है और रजिस्ट्रीकृत की गई है;
(च) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित कोई अधिसूचना अभिप्रेत है;
(छ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ज) विनिर्दिष्ट तारीख" से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के किसी उपबंध के प्रयोजन के लिए, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी;
(झ) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में हैं ।
अध्याय 2
कंपनी के उपक्रमों का अर्जन और अंतरण
3. कंपनी के उपक्रमों का केन्द्रीय सरकार को अंतरण और उसमें निहित होना-नियत दिन को कंपनी के उपक्रम और उसके उपक्रमों के संबंध में कंपनी के अधिकार, हक और हित, इस अधिनियम के आधार पर, केन्द्रीय सरकार को अंतरित और उसमें निहित हो जाएंगे ।
4. निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) कंपनी के उपक्रमों के बारे में यह समझा जाएगा कि उनके अंतर्गत सभी आस्तियां, अधिकार, पट्टाधृतियां, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा सभी स्थावर और जंगम संपत्ति, जिनके अंतर्गत भूमि, भवन, कार्यालय, कारखाने, कर्मशालाएं, स्टोर, उपकरण, संयंत्र, मशीनरी और उपस्कर, प्रतिष्ठापन, प्रयोगशालाएं, कार्यालय-फर्नीचर, लेखन सामग्री और उपस्कर, यान, पेटेंट, व्यापार चिह्न, रोकड़ बाकी, हाथ की रोकड़, आरक्षित निधियां, विनिधान, बही-ऋण और ऐसी संपत्ति में या उससे उत्पन्न होने वाले सभी अन्य अधिकार और हित हैं, जो नियत दिन से ठीक पहले कंपनी के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में थे, चाहे वे भारत में या भारत के बाहर थे और तत्संबंधी सभी लेखा बहियां, रजिस्टर और अन्य सभी दस्तावेजें हैं, चाहे वे किसी भी प्रकार की हों ।
(2) यथापूर्वोक्त सभी संपत्ति और आस्तियां, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई हैं, ऐसे निहित होने के बल पर, किसी भी न्यास, बाध्यता, बंधक, भार, धारणाधिकार और उन्हें प्रभावित करने वाले सभी अन्य विल्लंगमों से मुक्त और उन्मोचित हो जाएंगी और किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण की किसी कुर्की, व्यादेश, डिक्री या आदेश के बारे में, जो ऐसी संपत्तियों या आस्तियों के उपयोग को किसी भी रीति से निर्बन्धित करता है या जो ऐसी समस्त संपत्तियों या आस्तियों या उनके किसी भाग की बाबत कोई रिसीवर नियुक्त करता है, यह समझा जाएगा कि वह वापस ले लिया गया है ।
(3) ऐसी किसी संपत्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है, प्रत्येक बंधकदार और ऐसी किसी संपत्ति में या उसके संबंध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति, ऐसे समय के भीतर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, ऐसे बंधक, भार, धारणाधिकार या अन्य हित की सूचना आयुक्त को देगा ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी सम्पत्ति का बंधकदार या ऐसी किसी संपत्ति में या उसके संबंध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित रखने वाला कोई अन्य व्यक्ति, धारा 8 में विनिर्दिष्ट रकमों में से और धारा 9 के अधीन अवधारित रकमों में से भी, बंधक धन या अन्य शोध्य धन के पूर्णतः या भागतः संदाय के लिए, अपने अधिकारों और हितों के अनुसार दावा करने का हकदार होगा किन्तु ऐसा कोई बंधक, भार, धारणाधिकार या अन्य हित किसी ऐसी संपत्ति के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा जो केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है ।
(5) ऐसे किसी उपक्रम के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गया है, कंपनी को नियत दिन से पहले किसी समय अनुदत्त और नियत दिन से ठीक पहले प्रवृत्त कोई अनुज्ञप्ति या अन्य लिखत, ऐसे उपक्रम के संबंध में और उसके प्रयोजनों के लिए ऐसी तारीख को और उसके पश्चात् अपने प्रकट शब्दानुसार प्रवृत्त बनी रहेगी और ऐसे उपक्रमों के धारा 6 के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में या धारा 7 के अधीन किसी नई सरकारी कंपनी में निहित होने की तारीख से ही, यथास्थिति, विद्यमान या नई सरकारी कंपनी के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसी अनुज्ञप्ति या अन्य लिखत में उसी प्रकार प्रतिस्थापित हो गई है मानो ऐसी अनुज्ञप्ति या अन्य लिखत ऐसी विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को अनुदत्त की गई हो और ऐसी विद्यमान या नई सरकारी कंपनी उसे ऐसी शेष अवधि के लिए धारण करेगी जिसके लिए उसे वह कंपनी उसके निबंधनों के अनुसार धारण करती ।
(6) यदि नियत दिन को, किसी संपत्ति या आस्ति के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई है, कंपनी द्वारा संस्थित या उसके विरुद्ध लाया गया कोई वाद, अपील या अन्य कार्यवाही, चाहे वह किसी भी प्रकार की हो, लंबित है तो कंपनी के उपक्रमों के अंतरण या इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के कारण, उसका उपशमन नहीं होगा, वह बन्द नहीं होगी या उस पर किसी भी रूप में प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा किन्तु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध अथवा जहां कंपनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं या धारा 7 के उपबंधों के आधार पर किसी नई सरकारी कंपनी को अंतरित हो जाते हैं वहां उस सरकारी कंपनी द्वारा या उसके विरुद्ध चालू रखी जा सकेगी, चलाई जा सकेगी या प्रवर्तित की जा सकेगी ।
5. कुछ पूर्व दायित्वों के लिए केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी का दायी न होना-(1) 1 अप्रैल, 1983 से पहले की किसी अवधि के संबंध में, कंपनी का प्रत्येक दायित्व कंपनी का दायित्व होगा और उसके विरुद्ध प्रवर्तनीय होगा और केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या जहां कंपनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं या धारा 7 के उपबंधों के आधार पर किसी नई सरकारी कंपनी को अंतरित हो जाते हैं वहां ऐसी सरकारी कंपनी के विरुद्ध, प्रर्वतनीय नहीं होगा ।
(2) 1 अप्रैल, 1983 को या उसके पश्चात्, कंपनी द्वारा उपगत या उसके विरुद्ध उत्पन्न हुआ कोई दायित्व, जिसके अंतर्गत उस तारीख को या उसके पश्चात् केन्द्रीय सरकार द्वारा कम्पनी को दिए गए किन्हीं उधारों के प्रतिदाय का दायित्व है, उस पर शोध्य ब्याज सहित,-
(क) जहां कम्पनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं, वहां उस विद्यमान सरकारी कंपनी का; या
(ख) जहां कम्पनी के उपक्रम धारा 7 के उपबंधों के आधार पर किसी नई सरकारी कंपनी को अंतरित हो जाते हैं वहां उस नई सरकारी कंपनी का,
दायित्व हो जाएगा और उसका उन्मोचन ऐसी सरकारी कंपनी वैसे ही और तब करेगी जैसे ही और जब ऐसे दायित्व का उन्मोचन शोध्य हो जाए ।
(3) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि-
(क) इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, 1 अप्रैल, 1983 से पहले की किसी अवधि की बाबत कंपनी का अपने उपक्रमों के संबंध में कोई दायित्व, केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या जहां कंपनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं या धारा 7 के उपबंधों के आधार पर किसी नई सरकारी कंपनी को अंतरित हो जाते हैं वहां सरकारी कंपनी के विरुद्ध, प्रवर्तनीय नहीं होगा ;
(ख) कंपनी के उपक्रमों के संबंध में किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण का कोई अधिनिर्णय, डिक्री या आदेश, जो 1 अप्रैल, 1983 से पहले उत्पन्न हुए किसी ऐसे मामले, दावे या विवाद के बारे में नियत दिन को या उसके पश्चात् पारित किया गया है, केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या जहां कंपनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं या धारा 7 के उपबंधों के आधार पर किसी नई सरकारी कंपनी को अंतरित हो जाते हैं वहां ऐसी सरकारी कंपनी के विरुद्ध, प्रवर्तनीय नहीं होगा;
(ग) तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी उपबंध के उल्लंघन के लिए 1 अप्रैल, 1983 से पहले उपगत कंपनी का कोई दायित्व केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध या जहां कंपनी के उपक्रम धारा 6 के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं या धारा 7 के उपबंधों के आधार पर किसी नई सरकारी कंपनी को अंतरित हो जाते हैं वहां ऐसी सरकारी कंपनी के विरुद्ध, प्रवर्तनीय नहीं होगा ।
6. कंपनी के उपक्रमों के किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित किए जाने का निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) धारा 3 और धारा 4 में किसी बात के होते हुए भी और धारा 7 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि कोई विद्यमान सरकारी कंपनी ऐसे निबंधनों और शर्तों का, जिन्हें अधिरोपित करना वह सरकार ठीक समझे, अनुपालन करने के लिए रजामंद है या उसने उनका अनुपालन कर दिया है तो वह, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि कंपनी के उपक्रम और कंपनी के उपक्रमों के संबंध में उसके अधिकार, हक और हित, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, केन्द्रीय सरकार में निहित बने रहने के बजाय, अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख को अथवा ऐसी किसी पूर्ववर्ती या पश्चात्वर्ती तारीख को (जो नियत दिन से पहले की तारीख न हो), जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, उस विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित हो जाएंगे ।
(2) जहां कंपनी के उपक्रमों के संबंध में उसके अधिकार, हक और हित उपधारा (1) के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित हो जाते हैं वहां वह सरकारी कंपनी ऐसे निहित होने की तारीख से ही और धारा 7 के उपबंधों के आधार पर उपक्रमों का किसी नई सरकारी कम्पनी को अंतरण होने तक, ऐसे उपक्रमों के संबंध में स्वामी समझी जाएगी और ऐसे उपक्रमों के संबंध में केंद्रीय सरकार के समस्त अधिकार और दायित्व, ऐसे निहित होने की तारीख से ही और ऐसे अंतरण की तारीख तक, उस विद्यमान सरकारी कंपनी के अधिकार और दायित्व समझे जाएंगे ।
7. कंपनी के उपक्रमों का किसी विद्यमान सरकारी कंपनी से किसी नई सरकारी कंपनी को अंतरण-(1) धारा 3 और धारा 4 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां कंपनी के उपक्रम धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं वहां यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि कोई नई सरकारी कंपनी ऐसे निबंधनों और शर्तों का, जिन्हें अधिरोपित करना वह सरकार ठीक समझे, अनुपालन करने के लिए रजामंद है या उसने उनका अनुपालन कर दिया है तो वह, अधिसूचना द्वारा, यह घोषणा कर सकेगी कि कंपनी के उपक्रम उस नई सरकारी कंपनी को अंतरित कर दिए जाएं और ऐसी घोषणा के जारी कर दिए जाने पर, कंपनी के उपक्रमों के संबंध में उसके अधिकार, हक और हित, जो धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं, उस विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित बने रहने के बजाय, ऐसी घोषणा के किए जाने की तारीख से, उस नई सरकारी कंपनी में निहित हो जाएंगे ।
(2) जहां कंपनी के उपक्रमों के संबंध में विद्यमान सरकारी कंपनी के अधिकार, हक और हित, उपधारा (1) के अधीन किसी नई सरकारी कम्पनी में निहित हो जाते हैं वहां वह नई सरकारी कंपनी, ऐसे निहित होने की तारीख से ही, ऐसे उपक्रमों के संबंध में स्वामी समझी जाएगी और ऐसे उपक्रमों के संबंध में उस विद्यमान सरकारी कंपनी के सभी अधिकार और दायित्व, ऐसे निहित होने की तारीख से ही, उस नई सरकारी कंपनी के अधिकार और दायित्व समझे जाएंगे ।
अध्याय 3
रकमों का संदाय
8. रकम का संदाय-केन्द्रीय सरकार, कंपनी के उपक्रमों का और कंपनी के उपक्रमों के संबंध में कंपनी के अधिकार, हक और हित का धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार को अन्तरण करने और उन्हें उसमें निहित करने के लिए कंपनी को सात करोड़ छियासठ लाख नब्बे हजार रुपए की रकम नकद और अध्याय 6 में विनिर्दिष्ट रीति से देगी ।
9. अतिरिक्त रकम का संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, कंपनी को उसके उपक्रमों के प्रबंध से उसे वंचित किए जाने के लिए दो हजार रुपए प्रतिमास की दर से संगणित रकम, ऐसी तारीख को, जिसको कंपनी के उपक्रमों का प्रबंध उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18क के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत व्यक्तियों द्वारा ग्रहण किया गया था, प्रारम्भ होने वाली और नियत दिन को समाप्त होने वाली अवधि के लिए, देगी ।
(2) धारा 8 में विनिर्दिष्ट रकम और उपधारा (1) के अधीन अवधारित रकम पर चार प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज, नियत दिन को प्रारम्भ होने वाली और ऐसी तारीख को, जिसको ऐसी रकम का संदाय केंद्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि के लिए, दिया जाएगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार अवधारित रकमें कंपनी को उस रकम के अतिरिक्त देगी जो धारा 8 में विनिर्दिष्ट है ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि कंपनी के ऐसे उपक्रमों के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, उसके दायित्वों का उन्मोचन, कंपनी के लेनदारों के अधिकारों और हितों के अनुसार धारा 8 में विनिर्दिष्ट रकम में से और उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन अवधारित रकमों में से भी किया जाएगा ।
अध्याय 4
कंपनी के उपक्रमों का प्रबंध आदि
10. कंपनी के उपक्रमों का प्रबंध आदि-कंपनी के ऐसे उपक्रमों के, जिनके संबंध में अधिकार, हक और हित धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, कार्यकलाप और कारबार का साधारण अधीक्षण, निदेशन, नियंत्रण और प्रबंध,-
(क) जहां केन्द्रीय सरकार ने धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश दिया है वहां ऐसे निदेश में विनिर्दिष्ट तारीख से ही, उस निदेश में विनिर्दिष्ट सरकारी कंपनी में निहित हो जाएगा; या
(ख) जहां धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन कोई घोषणा की गई है वहां ऐसी घोषणा में विनिर्दिष्ट तारीख से ही, उस घोषणा में विनिर्दिष्ट नई सरकारी कंपनी में निहित हो जाएगा,
और तब इस प्रकार विनिर्दिष्ट विद्यमान या नई सरकारी कंपनी, सभी अन्य व्यक्तियों का अपवर्जन करके, ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे सभी कार्य करने की हकदार होगी जिन शक्तियों का प्रयोग और जिन कार्यों को अपने उपक्रमों के संबंध में करने के लिए कंपनी प्राधिकृत है ।
11. कंपनी के उपक्रमों के प्रबंध के भारसाधक व्यक्तियों का सभी आस्तियां आदि परिदत्त करने का कर्तव्य-(1) कंपनी के उपक्रमों का प्रबंध किसी विद्यमान या नई सरकारी कंपनी में निहित हो जाने पर, ऐसे निहित होने से ठीक पहले कंपनी के उपक्रमों के प्रबंध के भारसाधक सभी व्यक्ति, ऐसी सरकारी कम्पनी को ऐसे उपक्रमों से संबंधित सभी आस्तियां, लेखा बहियां, रजिस्टर और अन्य दस्तावेजें, जो उनकी अभिरक्षा में हों, परिदत्त करने के लिए बाध्य होंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार, विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को, ऐसे निदेश दे सकेगी जो वह मामले की परिस्थितियों में वांछनीय समझे और ऐसी सरकारी कंपनी भी, यदि ऐसा करना आवश्यक समझा जाए तो केन्द्रीय सरकार को किसी भी समय उस रीति के बारे में, जिससे कंपनी के उपक्रमों का प्रबंध संचालित किया जाएगा, या ऐसे किसी अन्य विषय के बारे में, जो ऐसे प्रबंध के दौरान उत्पन्न हो, अनुदेश देने के लिए आवेदन कर सकेगी ।
(3) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसके कब्जे या नियंत्रण में नियत दिन को कंपनी के ऐसे उपक्रमों से संबंधित, जो केन्द्रीय सरकार में अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी में निहित हो गए हैं, कोई बहियां, दस्तावेजें या अन्य कागज-पत्र हैं, जो कंपनी के हैं, या जो उस दशा में उसके होते यदि कंपनी के उपक्रम केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी में निहित न हुए होते, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार को अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को उक्त बहियों, दस्तावेजों या अन्य कागज-पत्रों का लेखा-जोखा देने के लिए दायी होगा और वह उन्हें केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को या ऐसे व्यक्ति या व्यक्ति-निकाय को, जिसे केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कंपनी इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, परिदत्त करेगा ।
(4) केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी ऐसे सभी उपक्रमों का, जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी में निहित हो गए हैं, कब्जा प्राप्त करने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा सकेगी या उठवा सकेगी ।
(5) कंपनी, ऐसी अवधि के भीतर, जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त अनुज्ञात करे, उस सरकार को उन उपक्रमों के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, और नियत दिन को यथाविद्यमान अपनी समस्त संपत्ति और आस्तियों की एक पूर्ण सूची देगी और इस प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी, कंपनी को सभी उचित सुविधाएं प्रदान करेगी ।
12. कंपनी या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा दिया जाने वाला लेखा-(1) जहां किसी न्यायालय की किसी डिक्री, आदेश या व्यादेश के अनुसरण में या अन्यथा,-
(क) प्राधिकृत व्यक्तियों को, उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18क के अधीन कंपनी के उपक्रमों के प्रबंध-ग्रहण की तारीख के पश्चात् और नियत दिन से पहले कंपनी के उपक्रमों के किसी भाग का प्रबंध-ग्रहण करने से निवारित किया गया था; या
(ख) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को, नियत दिन को या उसके पश्चात्, कंपनी के उपक्रमों के किसी भाग का प्रबंध-ग्रहण करने से निवारित कर दिया जाता है,
वहां वह कंपनी या कोई अन्य व्यक्ति, जिसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में ऐसा कोई भाग है, ऐसे ग्रहण किए जाने की तारीख को आरम्भ होने वाली और उस तारीख को, जिसको ऐसा भाग प्राधिकृत व्यक्तियों को या, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को सौंपा गया था या सौंपा गया है, समाप्त होने वाली अवधि के संबंध में, नियत दिन से साठ दिन की अवधि के भीतर या जहां ऐसा भाग नियत दिन के पश्चात् सौंपा गया था वहां ऐसे सौंपे जाने की तारीख से साठ दिन की अवधि के भीतर,-
(i) उपक्रमों या उनके किसी भाग की आस्तियों और स्टोर, जिनका उक्त अवधि के दौरान अर्जन, उपयोग या विक्रय किया जाता है ; और
(ii) उक्त अवधि के दौरान उपक्रमों या उनके किसी भाग से कंपनी या किसी अन्य व्यक्ति को व्युत्पन्न आय,
की बाबत लेखा, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार को अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को देगा ।
(2) यदि उपधारा (1) में निर्दिष्ट लेखाओं की जांच किए जाने पर, किसी आय या अन्य धनराशियों के बारे में यह पाया जाता है कि वह उस उपधारा में निर्दिष्ट अवधि के दौरान ऐसे उपक्रमों या उनके किसी भाग से, कंपनी या किसी व्यक्ति को व्युत्पन्न हुई हैं या अन्य धनराशियों के बारे में यह पाया जाता है कि वह कंपनी को संदेय हैं तो ऐसे आय या अन्य धनराशियां केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी द्वारा, यथास्थिति, ऐसी कंपनी या ऐसे अन्य व्यक्ति से और उस रकम में से, जो इस अधिनियम के अधीन कंपनी को संदेय है, वसूल की जा सकेंगी और इस मद्धे केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को शोध्य ऋण, अप्रतिभूत ऋण होगा ।
(3) यदि उपक्रमों या उनके किसी भाग की बाबत कंपनी या ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा उपधारा (1) में निर्दिष्ट अवधि के भीतर कोई लेखा नहीं दिया जाता है, या, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी के पास यह विश्वास करने का कोई कारण है कि कंपनी या ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा दिया गया लेखा किसी तात्त्विक विशिष्टि में गलत या मिथ्या है तो, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी ऐसा मामला, आयुक्त को निर्देशित कर सकेगी और तब आयुक्त उपधारा (1) में निर्दिष्ट अवधि के दौरान ऐसे उपक्रमों या उनके किसी भाग से उस कंपनी या ऐसे अन्य व्यक्ति को व्युत्पन्न हुई आय अवधारित करेगा और उक्त आय या अन्य धनराशियां कंपनी या ऐसे अन्य व्यक्ति से, और इस अधिनियम के अधीन कंपनी को संदेय रकम में से, वसूल करने के लिए इस प्रकार कार्रवाई मानो इस मद्धे, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को शोध्य ऋण, अप्रतिभूत ऋण हो ।
(4) कंपनी के उपक्रमों या उनके किसी भाग के संबंध में कोई बंधक, भार, धारणाधिकार या अन्य विल्लंगम, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी पर आबद्धकर नहीं होगा यदि ऐसा बंधक, भार, धारणाधिकार या अन्य विल्लंगम उस अवधि के दौरान किसी भी समय सर्जित किया गया था जब किसी न्यायालय की किसी डिक्री, आदेश या व्यादेश द्वारा या अन्यथा ऐसे उपक्रमों या उनके किसी भाग का प्रबंध-ग्रहण करने से प्राधिकृत व्यक्ति निवारित थे और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी निवारित है ।
अध्याय 5
कंपनी के कर्मचारियों के बारे में उपबंध
13. कुछ कर्मचारियों के नियोजन का जारी रहना-(1) प्रत्येक व्यक्ति, जो नियत दिन से ठीक पहले कंपनी के किसी उपक्रम में नियोजित रहा है,-
(क) नियत दिन से ही, केन्द्रीय सरकार का कर्मचारी हो जाएगा; और
(ख) जहां कंपनी के उपक्रम धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन किसी विद्यमान सरकारी कंपनी में निहित किए जाने के लिए निदेशित हैं या जहां उन्हें धारा 7 के उपबंधों के आधार पर किसी नई सरकारी कंपनी को अंतरित किया गया है वहां ऐसे निहित होने या अंतरण की तारीख से ही, ऐसी सरकारी कंपनी का कर्मचारी हो जाएगा,
और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी के अधीन पेंशन, उपदान और अन्य बातों के बारे में वैसे ही अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ पद या सेवा धारण करेगा जो उसे उस स्थिति में अनुज्ञेय होते यदि ऐसा निधान या अंतरण न हुआ होता और वह तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी में उसका नियोजन सम्यक् रूप से समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उसका पारिश्रमिक और सेवा की अन्य शर्तें, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जाती है ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कंपनी के उपक्रमों में नियोजित किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की सेवाओं का, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को अंतरण, ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
14. भविष्य निधि और अन्य निधियां-(1) जहां कंपनी ने, कंपनी के उपक्रमों में नियोजित व्यक्तियों के फायदे के लिए कोई भविष्य निधि, अधिवार्षिकी निधि, कल्याण निधि या अन्य निधि स्थापित की है वहां ऐसे कर्मचारियों से, जिनकी सेवाएं, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अंतरित हो गई हैं, संबंधित धनराशियां, ऐसी भविष्य निधि, अधिवार्षिकी निधि, कल्याण निधि या अन्य निधि में, नियत दिन को जमा धनराशियों में से, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को अंतरित और उसमें निहित हो जाएंगी ।
(2) उन धनराशियों के संबंध में, जो उपधारा (1) के अधीन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को अंतरित हो जाती हैं, उस सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी द्वारा ऐसी रीति से कार्रवाई की जाएगी जो विहित की जाए ।
अध्याय 6
संदाय आयुक्त
15. संदाय आयुक्त की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, धारा 8 और धारा 9 के अधीन संदेय रकमों के संवितरण के प्रयोजन के लिए, अधिसूचना द्वारा, एक संदाय आयुक्त नियुक्त करेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार, आयुक्त की सहायता के लिए ऐसे अन्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह ठीक समझे और तब आयुक्त ऐसे व्यक्तियों में से एक या अधिक को भी इस अधिनियम के अधीन अपने द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा और भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया जा सकेगा ।
(3) कोई व्यक्ति, जो आयुक्त द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए आयुक्त द्वारा प्राधिकृत किया जाता है, उन शक्तियों का प्रयोग उसी रीति से कर सकेगा और उनका वही प्रभाव होगा मानो वे उस व्यक्ति को इस अधिनियम द्वारा प्रत्यक्षतः प्रदान की गई हैं, प्राधिकार के रूप में नहीं ।
(4) इस धारा के अधीन नियुक्त आयुक्त और अन्य व्यक्तियों के वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि में से चुकाए जाएंगे ।
16. केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, कंपनी को संदाय करने के लिए आयुक्त को, विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर, उतनी रकम नकद देगी जो-
(क) धारा 8 में विनिर्दिष्ट रकम के बराबर है; और
(ख) धारा 9 के अधीन कंपनी को संदेय रकमों के बराबर है ।
(2) केन्द्रीय सरकार, भारत के लोक लेखा में आयुक्त के नाम एक निक्षेप खाता खोलेगी और आयुक्त, इस अधिनियम के अधीन उसे संदत्त की गई प्रत्येक रकम को, उक्त निक्षेप खाते में जमा करेगा और उक्त निक्षेप खाते को चलाएगा ।
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट निक्षेप खाते में जमा रकमों पर प्रोद्भूत होने वाला ब्याज उक्त खाते के फायदे के लिए काम आएगा ।
17. केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी की कुछ शक्तियां-(1) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी, नियत दिन के पश्चात् वसूल किया गया ऐसा कोई धन, जो कंपनी को उसके ऐसे उपक्रमों के संबंध में शोध्य है जो केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी में निहित हो गए हैं, अन्य सभी व्यक्तियों का अपवर्जन करके, विनिर्दिष्ट तारीख तक प्राप्त करने की हकदार, इस बात के होते हुए भी, होगी कि ऐसी वसूली नियत दिन से पहले की किसी अवधि से संबंधित है ।
(2) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी, आयुक्त को ऐसे प्रत्येक संदाय के संबंध में दावा कर सकेगी जो 1 अप्रैल, 1983 से पहले की किसी अवधि के संबंध में कंपनी के किसी दायित्व का उन्मोचन करने के लिए केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी ने नियत दिन के पश्चात् किया है और ऐसे प्रत्येक दावे को उन पूर्विकताओं के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी जो उस विषय को, जिसके संबंध में ऐसे दायित्व का उन्मोचन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी ने किया है, इस अधिनियम के अधीन प्राप्त है ।
(3) इस अधिनियम में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, 1 अप्रैल, 1983 से पहले के किसी संव्यवहार के संबंध में कंपनी के ऐसे दायित्व, जिनका विनिर्दिष्ट तारीख को या उसके पूर्व उन्मोचन नहीं किया गया है, कंपनी के दायित्व होंगे ।
18. आयुक्त के समक्ष दावों का किया जाना-प्रत्येक व्यक्ति, जिसका कंपनी के विरुद्ध कोई दावा है, ऐसा दावा विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर आयुक्त के समक्ष करेगा :
परन्तु यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि दावेदार पर्याप्त कारण से तीस दिन की उक्त अवधि के भीतर दावा करने से निवारित रहा था तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि के भीतर दावा ग्रहण कर सकेगा, किन्तु उसके पश्चात् नहीं ।
19. दावों की पूर्विकता-अनुसूची में विनिर्दिष्ट विषयों से उद्भूत होने वाले दावों को निम्नलिखित सिद्धांतों के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी, अर्थात् :-
(क) प्रवर्ग 1 को अन्य सभी प्रवर्गों पर अग्रता दी जाएगी और प्रवर्ग 2 को प्रवर्ग 3 पर अग्रता दी जाएगी, और इसी प्रकार आगे भी;
(ख) प्रत्येक प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दावे समान पंक्ति के होंगे और उनका पूर्णतः संदाय किया जाएगा, किन्तु यदि रकम ऐसे दावों को पूर्णतः चुकाने के लिए अपर्याप्त है तो वे समान अनुपात में कम कर दिए जाएंगे और उनका तदनुसार संदाय किया जाएगा ;
(ग) किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट विषय की बाबत किसी दायित्व के उन्मोचन का प्रश्न केवल तभी उठेगा जब उसके ठीक उच्चतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट सभी दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अधिशेष रह जाए ।
20. दावों की परीक्षा-(1) आयुक्त, धारा 18 के अधीन किए गए दावों की प्राप्ति पर, उन्हें अनुसूची में विनिर्दिष्ट पूर्विकताओं के अनुसार क्रमबद्ध करेगा और ऐसे पूर्विकता क्रम से उनकी परीक्षा करेगा ।
(2) यदि दावों की परीक्षा करने पर आयुक्त की यह राय है कि इस अधिनियम के अधीन उसे संदत्त रकम किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दायित्वों को चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं है तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह ऐसे निम्नतर प्रवर्ग की बाबत किसी दावे की परीक्षा करे ।
21. दावों का स्वीकार या अस्वीकार किया जाना-(1) अनुसूची में उपवर्णित पूर्विकताओं के प्रति निर्देश से दावों की परीक्षा करने के पश्चात्, आयुक्त कोई ऐसी तारीख नियत करेगा जिसको या जिससे पहले प्रत्येक दावेदार अपने दावे का सबूत फाइल करेगा जिसके न हो सकने पर उसे आयुक्त द्वारा किए जाने वाले संवितरण के फायदे से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(2) इस प्रकार नियत तारीख के बारे में कम से कम चौदह दिन की सूचना, अंग्रेजी भाषा के किसी दैनिक समाचारपत्र के ऐसे एक अंक में और ऐसी प्रादेशिक भाषा के किसी दैनिक समाचारपत्र के ऐसे एक अंक में, जो आयुक्त उपयुक्त समझे, विज्ञापन द्वारा दी जाएगी और ऐसी प्रत्येक सूचना में दावेदार से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अपने दावे का सबूत विज्ञापन में विनिर्दिष्ट समय के भीतर आयुक्त के समक्ष फाइल करे ।
(3) प्रत्येक दावेदार, जो आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट समय के भीतर अपने दावे का सबूत फाइल करने में असफल रहता है, आयुक्त द्वारा किए जाने वाले संवितरणों से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(4) आयुक्त, ऐसा अन्वेषण करने के पश्चात्, जो उसकी राय में आवश्यक है, और कंपनी को दावे का खंडन करने का अवसर देने के पश्चात् और दावेदार को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने की पश्चात्, लिखित आदेश द्वारा, दावे को पूर्णतः या भागतः स्वीकार या अस्वीकार करेगा ।
(5) आयुक्त को, अपने कृत्यों के निर्वहन से उत्पन्न होने वाले सभी मामलों में, जिनके अंतर्गत वह या वे स्थान हैं जहां वह अपनी बैठकें करेगा, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी और इस अधिनियम के अधीन कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए उसे वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निम्नलिखित विषयों की बाबत वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-
(क) किसी साक्षी को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज या अन्य तात्त्विक पदार्थ का, जो साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य हो, प्रकटीकरण और पेश किया जाना;
(ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।
(6) आयुक्त के समक्ष कोई अन्वेषण भारतीय दंड संहिता, 1860 (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और आयुक्त को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(7) कोई दावेदार, जो आयुक्त के विनिश्चय से असंतुष्ट है, उस विनिश्चय के विरुद्ध अपील, आरंभिक अधिकारिता वाले उस प्रधान सिविल न्यायालय में कर सकता है, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर कंपनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है:
परन्तु जहां ऐसा कोई व्यक्ति, जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है, आयुक्त नियुक्त किया जाता है वहां अपील कलकत्ता उच्च न्यायालय को होगी और वह अपील उच्च न्यायालय के कम से कम दो न्यायाधीशों द्वारा सुनी और निपटाई जाएगी ।
22. आयुक्त द्वारा दावेदारों को धन का संवितरण-इस अधिनियम के अधीन दावा स्वीकार करने के पश्चात् ऐसे दावे की बाबत शोध्य रकम आयुक्त ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को संदत्त करेगा जिसको या जिनको ऐसी रकम शोध्य है और ऐसा संदाय कर दिए जाने पर ऐसे दावे की बाबत कंपनी के दायित्व का उन्मोचन हो जाएगा ।
23. कंपनी को रकमों का संवितरण और कुछ मशीनरी, उपस्कर आदि पर कब्जा-(1) यदि कंपनी के उपक्रमों के संबंध में आयुक्त को संदत्त धनराशियों में से, अनुसूची में विनिर्दिष्ट पूर्विकताओं के अनुसार दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अतिशेष रह जाता है तो आयुक्त ऐसे अतिशेष का संवितरण कंपनी को करेगा ।
(2) जहां किसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य संपत्ति का कब्जा, इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी में निहित हो गया है, किन्तु ऐसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य संपत्ति उस कंपनी की नहीं है वहां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसी मशीनरी, उपस्कर और अन्य संपत्ति पर कब्जा उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर बनाए रखे जिनके अधीन वे नियत दिन से ठीक पहले कंपनी के कब्जे में थी ।
24. असंवितरित या अदावाकृत रकम का साधारण राजस्व खाते में जमा किया जाना-यदि आयुक्त को संदत्त कोई धन, उस तारीख से, जिसको आयुक्त का पद अंतिम रूप से परिसमाप्त किया जाता है, ठीक पूर्ववर्ती तारीख को असंवितरित या अदावाकृत रह जाता है तो आयुक्त उसे केन्द्रीय सरकार के साधारण राजस्व खाते को अंतरित करेगा किन्तु इस प्रकार अंतरित किसी धन के लिए कोई दावा ऐसे संदाय के हकदार व्यक्ति द्वारा केन्द्रीय सरकार को किया जा सकेगा और उस संबंध के कार्रवाई इस प्रकार की जाएगी मानो ऐसा अंतरण न किया गया हो और दावे के संदाय के लिए आदेश, यदि कोई हो, राजस्व के प्रतिदाय के लिए किया गया आदेश माना जाएगा ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
25. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में या किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण की किसी डिक्री या आदेश में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
26. संविदाओं का तब तक प्रभावी न होना जब तक उनका केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी द्वारा अनुसमर्थन नहीं कर दिया जाता-कंपनी द्वारा अपने उपक्रमों के संबंध के किसी सेवा, विक्रय या प्रदाय के लिए की गई और नियत दिन से ठीक पहले प्रवृत्त प्रत्येक संविदा, नियत दिन से एक सौ अस्सी दिन की समाप्ति से ही तब तक प्रभावी नहीं रहेगी जब तक ऐसी संविदा का उक्त अवधि की समाप्ति से पहले, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी, लिखित रूप में, अनुसमर्थन नहीं कर देती है और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी ऐसी संविदा का अनुसमर्थन करने में उसमें ऐसे परिवर्तन या उपांतरण कर सकेगी जो वह ठीक समझे :
परन्तु, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी किसी संविदा का अनुसमर्थन करने में लोप और उसमें कोई परिवर्तन या उपांतरण तब तक नहीं करेगी जब तक-
(क) उसका यह समाधान नहीं हो जाता है कि ऐसी संविदा असम्यक् रूप से दुर्भर है या असद्भावपूर्वक की गई है या, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या ऐसी सरकारी कंपनी के लिए अहितकर है; और
(ख) वह ऐसी संविदा के पक्षकारों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे देती है और संविदा का अनुसमर्थन करने से इंकार करने या उसमें कोई परिवर्तन या उपांतरण करने के अपने कारण अभिलिखित नहीं कर देती है ।
27. शास्तियां-जो कोई व्यक्ति-
(क) कंपनी के उपक्रमों की भागरूप किसी संपत्ति को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी से या उस सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति या व्यक्ति-निकाय से सदोष विधारित करेगा; या
(ख) कंपनी के किसी उपक्रम की भागरूप किसी संपत्ति का कब्जा, सदोष अभिप्राप्त करेगा या उसको प्रतिधारित करेगा; या
(ग) ऐसे उपक्रम से संबंधित किसी दस्तावेज को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, जानबूझकर, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी से अथवा उस सरकार या सरकारी कंपनी द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति या व्यक्ति-निकाय से विधारित करेगा या उसको उसे देने में असफल रहेगा; या
(घ) कंपनी के उपक्रम से संबंधित किन्हीं आस्तियों, लेखा बहियों, रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हैं, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी को या उस सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति या व्यक्ति-निकाय को देने में असफल रहेगा; या
(ङ) कंपनी के उपक्रमों की भागरूप किसी संपत्ति को सदोष हटाएगा या नष्ट करेगा अथवा इस अधिनियम के अधीन कोई ऐसा दावा करेगा जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का उचित कारण है कि वह मिथ्या है या बिल्कुल गलत है,
वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
28. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक ऐसा व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक था और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी ऐसे दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था अथवा उसने ऐसे अपराध के निवारण के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है; और
(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
29. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी के अथवा उस सरकार या सरकारी कंपनी के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के अथवा उस सरकार या सरकारी कंपनी द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार अथवा विद्यमान या नई सरकारी कंपनी के अथवा उस सरकार या सरकारी कंपनी के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के अथवा उस सरकार या सरकारी कंपनी द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
30. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली ऐसी सभी या किन्हीं शक्तियों का, जो इस धारा या धारा 31 या धारा 32 द्वारा प्रदत्त शक्तियों से भिन्न हैं, प्रयोग ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा भी किया जा सकेगा जिन्हें अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।
(2) जब कभी शक्ति का कोई प्रत्यायोजन, उपधारा (1) के अधीन किया जाता है तो वह व्यक्ति, जिसको ऐसी शक्ति प्रत्यायोजित की गई है, केन्द्रीय सरकार के निदेश, नियंत्रण और पर्यवेषण के अधीन कार्य करेगा ।
31. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) वह समय, जिसके भीतर और वह रीति जिससे धारा 4 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट कोई सूचना दी जाएगी ;
(ख) वह रीति जिससे धारा 14 में निर्दिष्ट किसी भविष्य निधि या अन्य निधि में जमा धनराशियों की बाबत कार्रवाई की जाएगी ;
(ग) कोई अन्य विषय जो विहित किए जाने के लिए अपेक्षित है या विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
32. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी :
परन्तु ऐसा कोई आदेश नियत दिन से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
अनुसूची
(धारा 19, धारा 20, धारा 21 और धारा 23 देखिए)
कंपनी के दायित्वों के उन्मोचन के लिए पूर्विकताओं का क्रम
भाग क-प्रबंध ग्रहण के पूर्व और पश्चात् की अवधियां
प्रवर्ग 1
कंपनी के कर्मचारियों की, प्रबंध-ग्रहण के पश्चात् की अवधि के लिए, मजदूरी, वेतन और अन्य शोध्य धन तथा कर्मचारियों की, प्रबंध-ग्रहण के पूर्व की अवधि के लिए मजदूरी, वेतन, भविष्य-निधि और अन्य शोध्य धन के संबंध में बकाया जिनके अन्तर्गत कर्मचारी राज्य बीमा निधि में किए जाने वाले अभिदाय और कर्मचारियों को संदेय अतिरिक्त महंगाई भत्ता है ।
भाग ख-प्रबंध-ग्रहण के पश्चात् की अवधि
प्रवर्ग 2
(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए उधार और उन पर शोध्य ब्याज ।
(ख) बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिए गए उधार जो केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रत्याभूत हों और उन पर शोध्य ब्याज ।
(ग) अन्य उधार ।
प्रवर्ग 3
व्यापार या विनिर्माण संक्रियाओं के प्रयोजनों के लिए लिया गया कोई ऋण ।
प्रवर्ग 4
(क) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार को राजस्व, कर, उपकर, रेट या अन्य शोध्य धन ।
(ख) कोई अन्य शोध्य धन ।
भाग ग-प्रबंध ग्रहण के पूर्व की अवधि
प्रवर्ग 5
बैंकों और वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिए गए उधारों की मूल रकम और 18 मई, 1978 तक, जिसमें यह तारीख भी सम्मिलित है, अर्थात्, उस तारीख तक जिसको उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 18क के अधीन अधिसूचित आदेश राजपत्र में प्रकाशित किया गया था, उस पर शोध्य ब्याज ।
प्रवर्ग 6
केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकरण को संदेय राजस्व, कर, उपकर, रेट या कोई अन्य शोध्य धन ।
प्रवर्ग 7
18 मई, 1978 के पश्चात् नियत दिन की पूर्ववर्ती तारीख तक प्रवर्ग 5 में निर्दिष्ट उधारों पर ब्याज के रूप में शोध्य रकमें ।
प्रवर्ग 8
(क) व्यापार या विनिर्माण संक्रियाओं के प्रयोजनों के लिए लिया गया कोई अन्य ऋण ।
(ख) कोई अन्य शोध्य धन ।
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