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संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 ( Guardians and Wards Act, 1890 )


 

संसद्‌ के अधिनियम

संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890

(1890 का अधिनियम संख्यांक 8)1

[21 मार्च, 1890]

संरक्षक और प्रतिपाल्य से सम्बन्धित

विधि का समेकन और संशोधन

करने के लिए

अधिनियम

संरक्षक और प्रतिपाल्य से सम्बन्धित विधि का समेकन और संशोधन करना समीचीन है, अतः एतद्‌द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है: -

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. नाम, विस्तार और प्रारम्भ - (1) यह अधिनियम संरक्षक और प्रतिपाल्य अधिनियम, 1890 कहा जा सकेगा ।

(2) इसका विस्तार २जम्मू -कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है । 3॥।; 4॥। ।

 

 

 

 

  1. 1 यह अधिनियम 1963 के विनियम 6 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा दादरा और नगर हवेली पर, 1965 के विनियम 8 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा सम्पूर्ण लक्षद्वीप संघ राज्यक्षेत्र पर और अधिसूचना सं. का. नि. 644 (), तारीख 24-8-1984, भारत के राज्यपत्र, असाधारण, भाग 2, खंड 3 (त्त्) द्वारा (1-9-1984 से) सिक्किम, पर विस्तारित किया गया:

(यह अधिनियम निम्नलिखित उपांतरणों के साथ 1968 के अधिनियम सं. 26 द्वारा पांडिचेरी पर विस्तारित किया गया :)

(धारा 1 में, उपधारा (2) के पश्चात्निम्नलिखित अन्तःस्थापित करें :)

परन्तु इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई बात पांडिचेरी के संघ राज्यक्षेत्र के रेनोसाओं को लागू नहीं होगी

  1. 2 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा भाग राज्यों के सिवाय के स्थान पर प्रतिस्थापित
  2. 3 भारतीय स्वतंत्रता (केन्द्रीय अधिनियम और अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948 द्वारा ब्रिटिश बलुचिस्तान को सम्मिलित करते हुए शब्द निरसित      
  3. 4 1949 के अधिनियम सं. 40 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा और शब्द का लोप किया गया

 

 

 

 

 

(3) यह 1890 की जुलाई के प्रथम दिन को प्रवृत्त होगा ।

 

 2. [ निरसन ।] निरसन अधिनियम, 1938 (1938 का 1) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित ।

 

3. प्रतिपाल्य अधिकरण और चार्टरित उच्च न्यायालयों की अधिकारिता की व्यावृत्ति -यह अधिनियम किसी भी राज्य के, 12 जिस पर इस अधिनियम का विस्तार है, किसी सक्षम विधान-मण्डल, प्राधिकारी या व्यक्ति द्वारा किसी प्रतिपाल्य अधिकरण से सम्बन्धित एतद्‌पूर्व या एतद्‌पश्चात्‌ पारित हर अधिनियमिति के अध्यधीन रहते हुए पढ़ा जाएगा, और इस अधिनियम की किसी बात का यह अर्थ न लगाया जाएगा कि वह किसी प्रतिपाल्य अधिकरण की अधिकारिता या प्राधिकार पर प्रभाव डालती है अथवा उसे किसी प्रकार से अल्पीकृत करती है, अथवा उस शक्ति को, जो ३ उच्च न्यायालय 4॥। के पास है, ले लेती है ।

 

  1. परिभाषाएं - इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो,

 

  1. अप्राप्तवय से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसके बारे में भारतीय प्राप्तवयता अधिनियम, 1875 (1875 का 9) के उपबन्धों के अधीन यह समझा जाता है कि वह प्राप्तवयता को नहीं पहुंचा है;

 

 

  1. संरक्षक से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो अप्राप्तवय के शरीर की या उसकी सम्पत्ति की, या उसके शरीर और संपत्ति दोनों की देखरेख रखता है; 

 

 

 

  1. प्रतिपाल्य से ऐसा अप्राप्तवय अभिप्रेत है, जिसके शरीर या सम्पत्ति, या दोनों के लिए कोई संरक्षक है;

 

 

 

 

 

 

  1. भारत सरकार (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा सपरिषद्गवर्नर जनरल अथवा सपरिषद्गवर्नर या लेफ्टिनेंट गवर्नर द्वारा के स्थान पर प्रतिस्थापित
  2. 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा भाग राज्यों और भाग राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित
  3. भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा विक्टोरिया स्टेट्यूट 24 और 25, अध्याय 104 (भारत में उच्च न्यायालय स्थापित करने के लिए अधिनियम) के अधीन कोई उच्च न्यायालय स्थापित के स्थान पर प्रतिस्थापित
  4. 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा भाग राज्यों तथा भाग राज्यों में स्थापित शब्दों का लोप किया गया

 

 

  1. जिला न्यायालय का वही अर्थ है, जो डिस्ट्रिक्ट कोर्ट को कोड आफ सिविल प्रोसीजर, 1882 (1882 का 14)1 में समनुदेशित है; और मामूली आरम्भिक सिविल अधिकारिता के प्रयोग में उच्च न्यायालय इसके अन्तर्गत आता है; 

 

  1. “न्यायालय” से –

 

  • वह जिला न्यायालय अभिप्रेत है जो किसी व्यक्ति को संरक्षक नियुक्त या घोषित करने वाले आदेश के लिए इस अधिनियम के अधीन आवेदन को ग्रहण करने की अधिकारिता रखता है; अथवा

 

  • जहां कि ऐसे किसी आवेदन के अनुसरण में कोई संरक्षक नियुक्त या घोषित किया जा चुका है, वहां

 

 

  1.  वह न्यायालय, जिसने या उस आफिसर का न्यायालय, जिसने संरक्षक को नियुक्त या घोषित किया है या जो इस अधिनियम के अधीन संरक्षक को नियुक्त या घोषित करने वाला समझा जाता है, अभिप्रेत है; अथवा

 

  1.  प्रतिपाल्य के शरीर से सम्बन्धित किसी भी मामले में, वह जिला न्यायालय अभिप्रेत है, जिसकी अधिकारिता ऐसे स्थान पर है, जहां प्रतिपाल्य तत्समय मामूली तौर पर निवास करता है ; अथवा

 

 

  • धारा 4क के अधीन अन्तरित किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में उस आफिसर का न्यायालय अभिप्रेत है जिसे ऐसी कार्यवाही अन्तरित की गई है;

 

 

  1. (“कलक्टर” से जिले के राजस्व प्रशासन का भारसाधक मुख्य आफिसर अभिप्रेत है, और ऐसा कोई भी आफिसर इसके अन्तर्गत आता है, जिसे राज्य सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा किसी भी स्थानीय क्षेत्र में, या व्यक्तियों के किसी वर्ग के बारे में, इस अधिनियम के समस्त या किन्हीं प्रयोजनों के लिए नाम से या पदेन कलक्टर होने के लिए नियुक्त करे;

 

 

 

 

 

 

  1. अब देखिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5)
  2.  1926 के अधिनियम सं. 4 की धारा 2 द्वारा खण्ड (5) के स्थान पर प्रतिस्थापित

 

 

 

 

1।                      ।                     ।                 ।; तथा

  1. विहित से इस अधिनियम के अधीन उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।

 

2[4क. अधीनस्थ न्यायिक आफिसरों को अधिकारिता प्रदत्त करने की और ऐसे आफिसरों को कार्यवाहियां अन्तरित करने की शक्ति - (1) उच्च न्यायालय आरंभिक सिविल अधिकारिता का प्रयोग करने वाले किसी ऐसे अधिकारी को, जो जिला न्यायालय के अधीनस्थ है, यह शक्ति कि अथवा जिला न्यायालय के न्यायाधीश को उसके अधीनस्थ किसी ऐसे आफिसर को यह शक्ति देने का प्राधिकार कि ऐसा आफिसर इस, धारा के अधीन उसे अन्तरित इस अधिनियम के अधीन की किन्हीं भी कार्यवाहियों को निपटाए, साधारण या विशेष आदेश द्वारा दे सकेगा ।

 

(2) जिला न्यायालय का न्यायाधीश, इस अधिनियम के अधीन की किसी भी ऐसी कार्यवाही का, जो उसके न्यायालय में लंबित है, लिखित आदेश द्वारा किसी भी प्रक्रम में अन्तरण अपने अधीनस्थ किसी भी ऐसे आफिसर को जो उपधारा (1) के अधीन सशक्त किया गया है उसे निपटाने के लिए कर सकेगा ।

 

(3) जिला न्यायालय का न्यायाधीश अपने न्यायालय को या अपने अधीनस्थ किसी आफिसर को, जो उपधारा (1) के अधीन सशक्त किया गया है, इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही को, जो ऐसे किसी अन्य आफिसर के न्यायालय में लम्बित है, किसी भी प्रक्रम में अन्तरित कर सकेगा ।

 

(4) जब कि किसी ऐसे मामले में, जिसमें कोई संरक्षक नियुक्त या घोषित किया जा चुका है, कोई कार्यवाहियां इस धारा के अधीन अन्तरित की जाती हैं तब जिला न्यायालय का न्यायाधीश लिखित आदेश द्वारा घोषणा कर सकेगा कि उस न्यायाधीश का न्यायालय अथवा वह आफिसर जिसे वे अन्तरित की गई हैं इस अधिनियम के सभी प्रयोजनों या उनमें से किन्हीं के लिए वह न्यायालय समझा जाएगा जिसने संरक्षक की नियुक्ति या घोषणा की थी ।   

 

  अध्याय 2

संरक्षकों की नियुक्ति और घोषणा

5. [यूरोपीय ब्रिटिश प्रजा की दशा में माता-पिता को नियुक्त करने की शक्ति ]

 

 

 

 

    1. 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा खण्ड (7) का लोप किया गया
    2. 1926 के अधिनियम सं. 4 की धारा 3 द्वारा अन्तःस्थापित

 

 

- भाग ख राज्य (विधि) अधिनियम, 1951 (1951 का 3) की धारा 3 और अनुसूची द्वारा निरसित ।

 

 

6. अन्य दशाओं में नियुक्त करने की शक्ति की व्यावृत्ति - अप्राप्तवय की दशा में 1॥। इस अधिनियम की किसी बात का यह अर्थ न लगाया जाएगा कि वह उसके शरीर या सम्पत्ति या दोनों का संरक्षक नियुक्त करने की किसी ऐसी शक्ति को लेती है या अल्पीकृत करती है, जो उस विधि की दृष्टि से विधिमान्य है, जिसके वह अप्राप्तवय अध्यधीन है ।

 

 

7. संरक्षकता के बारे में न्यायालय की आदेश करने की शक्ति - (1) जहां कि न्यायालय का समाधान हो जाता है कि अप्राप्तवय का इसमें कल्याण है कि

(क) उसके शरीर या सम्पत्ति, या दोनों के लिए संरक्षक की नियुक्ति करने वाला; अथवा

 (ख) किसी व्यक्ति को ऐसा संरक्षक घोषित करने वाला;

आदेश किया जाए, वहां न्यायालय तदनुसार आदेश कर सकेगा ।

 (2) इस धारा के अधीन दिए गए आदेश से यह विवक्षित होगा कि कोई भी संरक्षक, जो विल या अन्य लिखत द्वारा नियुक्त या न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित नहीं किया गया है, हटा दिया गया है ।

(3) जहां कि कोई संरक्षक विल या अन्य लिखत द्वारा नियुक्त या न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किया गया है, वहां उसके स्थान पर दूसरे व्यक्ति को संरक्षक नियुक्त या घोषित करने का इस धारा के अधीन कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक पूर्वोक्त नियुक्त या घोषित संरक्षक की शक्तियां इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन परिविरत न हो गई हों ।

 

 

8. आदेश के लिए आवेदन करने के हकदार व्यक्ति - अन्तिम पूर्वगामी धारा के अधीन कोई आदेश निम्नलिखित के आवेदन पर किए जाने के सिवाय न किया जाएगा

 

(क) अप्राप्तवय का संरक्षक बनने के लिए वांछा या होने का दावा करने वाला व्यक्ति; अथवा

 

 

 

 

1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा जो यूरोपीय ब्रिटिश प्रजा नहीं है शब्दों का लोप किया गया है

 

 

(ख) अप्राप्तवय का कोई भी नातेदार या मित्र; अथवा

 

  • उस जिले या अन्य स्थानीय क्षेत्र का कलक्टर जिसके भीतर अप्राप्तवय मामूली तौर से निवास करता है या जिसमें उसकी सम्पत्ति है; अथवा

 

(घ) जिस वर्ग का अप्राप्तवय है, उसके बारे में प्राधिकार रखने वाला कलक्टर ।

 

9. आवेदन ग्रहण करने की अधिकारिता रखने वाला न्यायालय (1) यदि आवेदन अप्राप्तवय के शरीर की संरक्षकता के बारे में है तो वह उस जिला न्यायालय में किया जाएगा जिसकी उस स्थान में अधिकारिता है जहां अप्राप्तवय मामूली तौर से निवास करता है ।

 

(2) यदि आवेदन अप्राप्तवय की सम्पत्ति की संरक्षकता के बारे में है तो वह या तो उस जिला न्यायालय में किया जा सकेगा, जिसकी उस स्थान में अधिकारिता है जहां अप्राप्तवय मामूली तौर से निवास करता है या उस जिला न्यायालय में किया जा सकेगा, जिसकी अधिकारिता ऐसे स्थान में है, जहां उसकी सम्पत्ति है ।

 

(3) यदि अप्राप्तवय की सम्पत्ति की संरक्षकता के बारे में आवेदन ऐसे जिला न्यायालय में किया गया है, जो उस स्थान में अधिकारिता रखने वाला जिला न्यायालय से भिन्न है, जिसमें अप्राप्तवय मामूली तौर से निवास करता है, तो यदि उस न्यायालय की यह राय है कि उसका निपटारा अधिकारिता रखने वाले किसी अन्य जिला न्यायालय द्वारा अधिक न्यायसंगत तौर पर या सुविधा से किया जा सकेगा तो वह उस आवेदन को लौटा सकेगा ।

 

10. आवेदन का प्रारूप - (1) यदि आवेदन कलक्टर द्वारा नहीं किया जाता, तो वह उस प्रकार से, जो वादपत्र के हस्ताक्षर और सत्यापन के लिए कोड आफ सिविल प्रोसीजर,1882 (1882 का 14)1 द्वारा विहित है, हस्ताक्षर और सत्यापित अर्जी द्वारा किया जाएगा जिसमें निम्नलिखित का कथन होगा जहां तक कि वे अभिनिश्चित किए जा सकें

 

(क) अप्राप्तवय का नाम, लिंग, धर्म, जन्म तिथि और मामूली निवास-स्थान;

 

 

 

 

1 अब देखिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5)

 

 

 

(ख) जहां कि अप्राप्तवय नारी है, वहां यह कि वह विवाहिता है या नहीं, और यदि है, तो उसके पति का नाम और आयु ;

 

(ग) अप्राप्तवय की सम्पत्ति की, यदि कोई हो, प्रकृति, स्थिति और लगभग मूल्य ;

 

  • अप्राप्तवय के शरीर या सम्पत्ति की अभिरक्षा या कब्जा रखने वाले व्यक्ति का नाम और निवास-स्थान ;

 

  • अप्राप्तवय के निकट नातेदार कौन हैं और वे कहां निवास करते हैं ; 

 

 

  • यह कि अप्राप्तवय के शरीर या सम्पत्ति या दोनों का संरक्षक किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा नियुक्त किया गया है या नहीं, जो उस विधि से, जिसके अध्यधीन अप्राप्तवय है, ऐसी नियुक्ति करने का हक रखता है या हक रखने का दावा करता है;

 

 

  • यह कि अप्राप्तवय के शरीर या सम्पत्ति, या दोनों की संरक्षकता के बारे में आवेदन उस न्यायालय या किसी अन्य न्यायालय से किसी समय किया गया है या नहीं, और यदि किया गया है, तो कब, और किस न्यायालय से किया गया और उसका परिणाम क्या हुआ;

 

 

  • यह कि क्या आवेदन अप्राप्तवय के शरीर या उसकी सम्पत्ति या दोनों के संरक्षक की नियुक्ति या घोषणा के लिए है; 

 

  • जहां कि आवेदन संरक्षक नियुक्त करने के लिए है, वहां प्रस्थापित संरक्षक की अर्हताएं;

 

 

  • जहां कि आवेदन किसी व्यक्ति को संरक्षक घोषित करने के लिए है, वहां वे आधार जिन पर वह व्यक्ति दावा करता है;

 

  • वे हेतुक जिनसे प्रेरित होकर आवेदन किया गया है, तथा

 

 

  • ऐसी अन्य विशिष्टियां, यदि कोई हों, जैसी विहित की जाएं या जिनका कथन किया जाना आवेदन की प्रकृति आवश्यक बना देती है ।

 

 

(2) यदि आवेदन कलक्टर द्वारा किया जाता है, तो वह न्यायालय को

 

 

 

संबोधित और डाक द्वारा ऐसे अन्य प्रकार से, जो सुविधाजनक पाया जाए, भेजे गए पत्र द्वारा होगा और उपधारा (1) में वर्णित विशिष्टियों का यावत्संभव कथन करेगा ।

 

(3) प्रस्थापित संरक्षक की कार्य करने के लिए रजामंदी की घोषणा आवेदन के साथ देनी होगी और उस घोषणा को उसे हस्ताक्षरित करना होगा और वह न्यूनतम दो साक्षियों द्वारा अनुप्रमाणित होगी ।

 

11. आवेदन के ग्रहण किए जाने पर प्रक्रिया - (1) यदि न्यायालय का समाधान हो जाता है कि आवेदन पर कार्यवाही करने के लिए आधार है, तो वह उसकी सुनवाई के लिए दिन नियत करेगा, और आवेदन की और सुनवाई के लिए नियत तारीख की सूचना

 

  • की तामील कोड आफ सिविल प्रोसीजर, 1882 (1882 का 14) में निदेशित प्रकार से

 

(त्) अप्राप्तवय की माता या पिता पर कराएगा, यदि वे किसी ऐसे राज्य में निवास करते हों, जिस पर इस अधिनियम का विस्तार है,

 

(त्त्) उस व्यक्ति पर, यदि कोई हो, कराएगा जो अर्जी में या पत्र में अप्राप्तवय के शरीर या सम्पत्ति की अभिरक्षा या कब्जा रखने वाले के तौर पर नामित है,

 

(त्त्त्) उस व्यक्ति पर कराएगा, जो आवेदन या पत्र में संरक्षक नियुक्त या घोषित किए जाने के लिए प्रस्थापित है, जब तक कि वह व्यक्ति स्वयं ही आवेदक न हो, तथा

 

(त्ध्) अन्य किसी व्यक्ति पर कराएगा जिसे न्यायालय की राय में आवेदन की विशेष सूचना दी जानी चाहिए ; तथा

 

 

(ख) न्याय सदन के और अप्राप्तवय के निवास-स्थान के किसी सहजदृश्य भाग पर लगवाएगा, और अन्यथा ऐसे प्रकार से प्रकाशित कराएगा, जैसा उच्च न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए

 

 

 

  1. अब देखिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5)
    1. 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा किसी भाग राज्य या किसी भाग राज्य के स्थान पर प्रतिस्थापित

 

 

 नियमों के अध्यधीन रहते हुए वह न्यायालय ठीक समझे ।

 

 

(2) राज्य सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा अपेक्षित कर सकेगी कि जब धारा 10 की उपधारा (1) के अधीन की अर्जी में वर्णित सम्पत्ति का कोई भाग ऐसी भूमि है जिसका अधीक्षण प्रतिपाल्य अधिकरण ले सकता है ; तब न्यायालय उस कलक्टर पर, जिसके जिले में अप्राप्तवय मामूली तौर से निवास करता है, और हर कलक्टर पर, जिसके जिले में ऐसी भूमी का कोई भी प्रभाग स्थित है, पूर्वोक्त सूचना की भी तामील कराएगा, और कलक्टर ऐसे प्रकार से, जिसे वह ठीक समझे, उस सूचना को प्रकाशित कराएगा ।

 

 

(3) उपधारा (2) के अधीन तामील या प्रकाशित की गई किसी सूचना की तामील या प्रकाशन के लिए कोई प्रभार न्यायालय या कलक्टर द्वारा नहीं लिया जाएगा ।

 

 

12. अप्राप्तवय के पेश किए जाने और शरीर तथा सम्पत्ति के अन्तरिम संरक्षण के लिए अन्तर्वर्ती आदेश देने की शक्ति -  (1) न्यायालय निदेश दे सकेगा कि वह व्यक्ति, यदि कोई हो, जिसकी अभिरक्षा में अप्राप्तवय है उसे ऐसे स्थान और समय पर और ऐसे व्यक्ति के समक्ष, जिसे उस न्यायालय ने नियुक्त किया है, पेश करे या कराए और न्यायालय अप्राप्तवय के शरीर या सम्पत्ति की अस्थायी अभिरक्षा और संरक्षण के लिए ऐसा आदेश दे सकेगा जैसा वह उचित समझे ।

 

 

(2) यदि अप्राप्तवय ऐसी लड़की है, जिसे लोक समक्ष आने के लिए विवश नहीं किया जाना चाहिए, तो उपधारा (1) के अधीन उसके पेश किए जाने के निदेश में यह अपेक्षा होगी कि वह देश की रूढ़ियों और रीतियों के अनुसार पेश की जाए ।

 

 

(3) इस धारा की कोई भी बात 

 

  • किसी अप्राप्तवय लड़की को ऐसे व्यक्ति को, जो इस आधार पर कि वह उसका पति है उसका संरक्षक होने का दावा करता है, अस्थायी अभिरक्षा में रखने को न्यायालय को तब के सिवाय, प्राधिकृत न करेगी जब कि वह लड़की अपने माता-पिता की, यदि कोई हो, सम्पत्ति से अभिरक्षा में पहले से ही है, अथवा

 

(ख) उस व्यक्ति को, जिसे अप्राप्तवय की सम्पत्ति की अस्थायी अभिरक्षा और संरक्षण न्यस्त है, प्राधिकृत न करेगी कि वह किसी व्यक्ति को, जो भी ऐसी सम्पत्ति पर कब्जा रखता है, विधि के सम्यक्‌ अनुक्रम से

 

अन्यथा बेकब्जा करे ।

 

13. आदेश करने से पहले साक्ष्य की सुनवाई - आवेदन की सुनवाई के लिए नियत दिन को, या तत्पश्चात्‌ यथाशक्य शीघ्र न्यायालय वह साक्ष्य सुनेगा, जो आवेदन के समर्थन में या विरोध में दिया जाए ।

 

14. विभिन्न न्यायालयों में साथ-साथ कार्यवाहियां - (1) यदि अप्राप्तवय के संरक्षक की नियुक्ति या घोषणा के लिए कार्यवाहियां एक से अधिक न्यायालयों में की जाती हैं तो उन न्यायालयों में से हर एक अन्य न्यायालय या न्यायालयों में की कार्यवाहियों से अवगत कराए जाने पर, अपने समक्ष की कार्यवाहियों को रोक देगा ।

 

(2) यदि वे दोनों या सभी न्यायालय एक ही उच्च न्यायालय के अधीनस्थ हैं, तो वे मामले की रिपोर्ट उस उच्च न्यायालय को करेंगे, और वह उच्च न्यायालय अवधारित करेगा कि इन न्यायालयों में से किसमें अप्राप्तवय के संरक्षक की नियुक्तियों या घोषणा के बारे में कार्यवाहियां की जाएंगी ।  

 

1(3) अन्य किसी दशा में, जिसमें उपधारा (1) के अधीन कार्यवाहियां रोकी जाती हैं, न्यायालय अपनी-अपनी राज्य सरकार को मामले की रिपोर्ट करेंगे और उससे मिले आदेशों से मार्गदर्शित होंगे ।

 

15. कई संरक्षकों की नियुक्ति या घोषणा - (1) यदि उस विधि के अनुसार, जिसके अप्राप्तवय अध्यधीन है, उसके शरीर या सम्पत्ति या दोनों के लिए दो या अधिक संयुक्त संरक्षक हो सकते हैं, तो न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, उन्हें नियुक्त या घोषित कर सकेगा ।

 

2।                           ।                    ।                   ।                   

(4) अप्राप्तवय के शरीर के लिए और सम्पत्ति के लिए पृथक्‌-पृथक्‌ संरक्षक नियुक्त या घोषित किए जा सकेंगे ।

 

(5) यदि अप्राप्तवय की कई सम्पत्तियां हैं, तो न्यायालय यदि वह ठीक समझे, उन सम्पत्तियों में से किसी एक या अधिक के लिए पृथक्‌-पृथक्‌ संरक्षक की नियुक्ति या घोषणा कर सकेगा ।

 

 

 

 

    1. भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा मूल उपधारा (3) के स्थान पर प्रतिस्थापित
    2. 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा उपधारा (2) और (3) का लोप किया गया

 

 

16. न्यायालय की अधिकारिता से परे की सम्पत्ति के लिए संरक्षक की नियुक्ति या घोषणा - यदि न्यायालय अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के परे स्थित किसी सम्पत्ति के लिए संरक्षक नियुक्त या घोषित करता है तो, जिस स्थान में सम्पत्ति स्थित है, वहां अधिकारिता रखने वाला न्यायालय संरक्षक नियुक्त या घोषित करने वाले आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि के पेश किए जाने पर उसे सम्यक्‌ नियुक्त या घोषित संरक्षक के तौर पर प्रतिगृहीत करेगा और आदेश को प्रभावशील करेगा ।

 

 

17. संरक्षक नियुक्त करने में न्यायालय द्वारा विचारणीय बातें -  (1) अप्राप्तवय का संरक्षक नियुक्त या घोषित करने में इस धारा के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, न्यायालय उस विधि से संगत, जिसके अप्राप्तवय अध्यधीन है, उस बात से मार्गदर्शित होगा, जो उन परिस्थितियों में अप्राप्तवय के कल्याण के लिए प्रतीत हो ।

 

(2) यह विचार करने में कि अप्राप्तवय के लिए क्या कल्याणकर होगा, न्यायालय अप्राप्तवय की आयु, लिंग और धर्म, प्रस्थापित, संरक्षक शील और सामर्थ्य तथा अप्राप्तवय से रक्त संबंध में उसकी निकटता, मृत जनक की इच्छाओं को, यदि कोई हों और अप्राप्तवय से या उसकी सम्पत्ति से प्रस्थापित संरक्षक के किसी वर्तमान या पूर्वतम संबंधों को ध्यान में रखेगा ।

 

(3) यदि अप्राप्तवय इतनी आयु का है कि वह बुद्धिमत्तापूर्ण अधिमान कर सकता है तो न्यायालय उस अधिमान पर विचार कर सकेगा ।  

 

1।                       ।                      ।                   ।                    

(5) न्यायालय किसी व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध संरक्षक नियुक्त या घोषित नहीं करेगा ।

 

 

18. कलक्टर के पद के आधार पर नियुक्ति या घोषणा - जहां कि कलक्टर अपने पद के आधार पर अप्राप्तवय के शरीर या सम्पत्ति या दोनों का संरक्षक होने के लिए न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किया जाता है, वहां उसकी नियुक्ति या घोषणा करने वाला आदेश वह पद तत्समय धारण करने वाले व्यक्ति को, यथास्थिति, अप्राप्तवय के शरीर या सम्पत्ति, या दोनों के बारे में अप्राप्तवय के संरक्षक के तौर पर कार्य करने को प्राधिकृत और अपेक्षित

 

 

 

 

 

1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा उपधारा (4) का लोप किया गया

 

करने वाला समझा जाएगा ।

19. कतिपय दशाओं में न्यायालय द्वारा संरक्षक नियुक्त किया जाना - इस अध्याय की कोई भी बात न्यायालय को प्राधिकृत न करेगी कि वह ऐसे अप्राप्तवय की, जिसकी सम्पत्ति प्रतिपाल्य अधिकरण के अधीक्षण के अधीन है, सम्पत्ति का संरक्षक नियुक्त या घोषित करे, अथवा

(क) उस अप्राप्तवय के, जो विवाहिता नारी है और जिसका पति न्यायालय की राय में उसके शरीर का संरक्षक होने के अयोग्य नहीं है, अथवा

(ख) 1॥। उस अप्राप्तवय के, जिसका पिता जीवित है और न्यायालय की राय में अप्राप्तवय के शरीर का संरक्षक होने के अयोग्य नहीं है, अथवा

(ग) उस अप्राप्तवय के, जिसकी सम्पत्ति उसके शरीर का संरक्षक नियुक्त करने के लिए सक्षम प्रतिपाल्य अधिकरण के अधीक्षण के अधीन है, शरीर का संरक्षक नियुक्त या घोषित करे ।

.......क्रमशः

 

 

 

 

 

1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए यूरोपीय ब्रिटिश प्रजा के संबंध में शब्दों का लोप किया गया

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

 

गतांक से आगे......

अध्याय 3

संरक्षकों के कर्तव्य, अधिनियम और दायित्व

साधारण

 

20. संरक्षक का प्रतिपाल्य से वैश्वासिक संबंध - (1) संरक्षक का अपने प्रतिपाल्य से वैश्वासिक सम्बन्ध होता है और विल या अन्य लिखत द्वारा, यदि कोई हो, जिसमें वह नियुक्त किया गया है, या इस अधिनियम द्वारा, यथा उपबंधित के सिवाय, वह अपने पद से कोई लाभ नहीं उठाएगा ।

 

(2) अपने प्रतिपाल्य के प्रति संरक्षक के इस वैश्वासिक सम्बन्ध का विस्तार और प्रभाव संरक्षक द्वारा प्रतिपाल्य की सम्पत्ति के, और प्रतिपाल्य द्वारा संरक्षक की सम्पत्ति के ऐसे क्रयों पर होता है, जो प्रतिपाल्य की अप्राप्तवयता समाप्त होने के अव्यवहित या शीघ्र पश्चात्‌ किए गए हैं, और साधारणतया उनके बीच तब किए गए सब संव्यवहारों पर होता है, जब संरक्षक का असर बना हुआ था या कुछ ही पहले तक बना रहा था ।

 

21. संरक्षक के तौर पर कार्य करने की अप्राप्तवय की सामर्थ्य - अप्राप्तवय, अपनी पत्नी या सन्तान के, या जहां कि वह अविभक्त हिन्दू कुटुम्ब का कर्ता है वहां उस कुटुम्ब के दूसरे अप्राप्तवय सदस्य की पत्नी या सन्तान के संरक्षक के तौर पर कार्य करने के सिवाय किसी भी अप्राप्तवय के संरक्षक के तौर पर कार्य करने के लिए अक्षम है ।

 

 

22. संरक्षक का पारिश्रमिक - (1) न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित संरक्षक उस भत्ते का, यदि कोई हो, हकदार होगा, जिसे न्यायालय उसके कर्तव्यों के निष्पादन में उसकी सतर्कता और परिश्रम के लिए ठीक समझे ।

 

 

(2) जब कि सरकार का कोई आफिसर ऐसे आफिसर की हैसियत में, ऐसा संरक्षक होने के लिए नियुक्त या घोषित किया जाता है, तब प्रतिपाल्य की सम्पत्ति में से सरकार को ऐसी फीसें दी जाएंगी जैसी राज्य सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा निर्दिष्ट करे ।

 

 

23. संरक्षक के तौर पर कलक्टर पर नियंत्रण - न्यायालय द्वारा अप्राप्तवय के शरीर या संपत्ति, या दोनों का संरक्षक होने के लिए नियुक्त या घोषित कलक्टर, अपने प्रतिपाल्य की संरक्षकता से सम्बन्धित, सब बातों में राज्य सरकार के या उस प्राधिकारी के, जैसा वह सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना1 द्वारा इस निमित्त नियुक्त करे, नियंत्रण के अध्यधीन होगा ।

 

शरीर का संरक्षक

 

24. शरीर के संरक्षक के कर्तव्य - प्रतिपाल्य के शरीर के संरक्षक पर प्रतिपाल्य की अभिरक्षा का भार है और उसे उसके संभाल, स्वास्थ्य और शिक्षा की और प्रतिपाल्य जिस विधि के अध्यधीन है उस द्वारा अपेक्षित अन्य बातों की ओर ध्यान देना होगा ।

 

25. प्रतिपाल्य की अभिरक्षा का संरक्षक का हक - (1) यदि प्रतिपाल्य अपने शरीर के संरक्षक की अभिरक्षा को छोड़ देता है या उससे हटा दिया जाता है, तो, यदि न्यायालय इस राय का है कि प्रतिपाल्य के लिए यह कल्याणकर होगा कि वह संरक्षक की अभिरक्षा में लौट आए, तो वह उसके लौट आने के लिए आदेश कर सकेगा और उस आदेश का प्रवर्तन कराने के प्रयोजन से प्रतिपाल्य को गिरफ्तार करा सकेगा और संरक्षक की अभिरक्षा में रखे जाने के लिए उसे परिदत्त करा सकेगा ।

 

(2) प्रतिपाल्य की गिरफ्तारी के प्रयोजन से न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता, 1882 (1882 का 10)2 की धारा 100 द्वारा प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को प्रदत्त शक्ति का प्रयोग कर सकेगा ।

 

 

(3) ऐसे व्यक्ति के पास, जो उसका संरक्षक नहीं है, प्रतिपाल्य का अपने संरक्षक की इच्छा के विरुद्ध निवास, स्वतः संरक्षकता का पर्यवसान नहीं कर देता ।

 

26. प्रतिपाल्य का अधिकारिता से हटाया जाना - (1) जो व्यक्ति न्यायालय द्वारा शरीर का संरक्षक नियुक्त या घोषित है, जब तक वह कलक्टर न हो अथवा विल या अन्य लिखत द्वारा नियुक्त संरक्षक न हो, वह उस न्यायालय की इजाजत के बिना जिसके द्वारा वह नियुक्त या घोषित किया गया था प्रतिपाल्य को उन प्रयोजनों के सिवाय, जो विहित किए जाएं, उस न्यायालय की अधिकारिता की सीमाओं से बाहर नहीं हटाएगा ।

 

 

(2) न्यायालय द्वारा उपधारा (1) के अधीन अनुदत्त इजाजत विशेष या साधारण हो सकेगी, और उसे अनुदत्त करने वाले आदेश द्वारा परिभाषित की जा सकेगी ।

 

 

 

 

    1. नियुक्ति करने वाले ऐसे प्राधिकारियों की बाबत अधिसूचनाओं के लिए जिनके नियंत्रण में अधिनियम के अधीन नियुक्त आयुक्त होंगे, देखिए विभिन्न स्थानीय नियम और आदेश
    2. अब देखिए दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5)

 

संपत्ति का संरक्षक

 

 

27. सम्पत्ति के संरक्षक के कर्तव्य - प्रतिपाल्य की सम्पत्ति का संरक्षक उस सम्पत्ति से ऐसी सतर्कता से बरतने के लिए आबद्ध है, जैसी से मामूली प्रज्ञा वाला व्यक्ति उससे बरतता यदि वह सम्पत्ति उसी की अपनी होती, और इस अध्याय के उपबंधों के अध्यधीन यह है कि वह वे सब कार्य कर सकेगा जो उसे सम्पत्ति के आपन, संरक्षा या फायदे के लिए युक्तियुक्त और उचित हैं ।

 

 

28. वसीयती संरक्षक की शक्तियां - जहां कि संरक्षक विल या अन्य लिखत द्वारा नियुक्त किया गया है वहां अपने प्रतिपाल्य की स्थावर सम्पत्ति को बंधक या भारित करने या विक्रय, दान, विनिमय द्वारा या अन्यथा अन्तरित करने की उसकी शक्ति, उस निर्बन्धन के अध्यधीन, जो लिखत द्वारा अधिरोपित किया गया हो, तब के सिवाय होगी जब कि वह इस अधिनियम के अधीन संरक्षक घोषित कर दिया गया है और उस घोषणा को करने वाले न्यायालय ने लिखित आदेश द्वारा वह स्थावर सम्पत्ति जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट हो, आदेश द्वारा अनुज्ञात रीति से व्ययनित करने के लिए अनुज्ञा ऐसे निबंधन के होते हुए भी दे दी है ।

 

 

29. न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किए गए सम्पत्ति के संरक्षक की शक्तियों की परिसीमा -जहां कि कलक्टर से, या विल या अन्य लिखत द्वारा नियुक्त संरक्षक से विभिन्न कोई व्यक्ति प्रतिपाल्य की सम्पत्ति का संरक्षक होने के लिए न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किया गया है, वहां वह न्यायालय की पूर्व अनुज्ञा के बिना,

 

  • अपने प्रतिपाल्य की स्थावर सम्पत्ति के किसी भी भाग को बंधक या भारित नहीं करेगा, या विक्रय, दान, विनिमय द्वारा, या अन्यथा अन्तरित नहीं करेगा, अथवा

 

  • उस सम्पत्ति के किसी भाग को पांच वर्ष से अधिक की अवधि के लिए, या उस तारीख से, जिसको वह प्रतिपाल्य अप्राप्तवय न रहेगा, आगे एक वर्ष तक विस्तृत किसी अवधि के लिए पट्‌टे पर नहीं देगा ।

 

 

30. धारा 28 या धारा 29 के उल्लंघन में किए गए अन्तरणों की शून्यकरणीयता - संरक्षक द्वारा दोनों अन्तिम पूर्वगामी धाराओं में से किसी के उल्लंघन में स्थावर सम्पत्ति का व्ययन तद्‌द्वारा प्रभारित किसी भी अन्य व्यक्ति की प्रेरणा पर शून्यकरणीय है ।

 

 

31. धारा 29 के अधीन अन्तरणों के लिए अनुज्ञा देने विषयक पद्धति - (1) संरक्षक को धारा 29 में वर्णित कार्यों में से किसी को करने की अनुज्ञा न्यायालय आवश्यकता की दशा में देने के सिवाय या तब देने के सिवाय जबकि वह प्रतिपाल्य की सुव्यक्त भलाई के लिए हों, न देगा ।

 

(2) अनुज्ञा प्रदान करने वाले आदेश में, यथास्थिति, आवश्यकता या भलाई का परिवर्णन होगा, उस सम्पत्ति का वर्णन होगा जिसके सम्बन्ध में अनुज्ञा कार्य किया जाता है, और ऐसी शर्तें, यदि कोई हों, विनिर्दिष्ट होंगी, जैसी न्यायालय अनुज्ञा से संलग्न करना ठीक समझे, और वह उस न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा स्वयं अपने हाथ से अभिलिखित, दिनांकित और हस्ताक्षरित किया जाएगा अथवा जब किसी कारण से वह हाथ से आदेश को अभिलिखित करने से निवारित हो तब वह उसके बोलने के अनुसार लिखा जाएगा तथा उस द्वारा दिनांकित और हस्ताक्षरित किया जाएगा ।

 

(3) न्यायालय अनुज्ञा के साथ स्वविवेक में शर्तें संलग्न कर सकेगा जिनमें अन्य शर्तों के अतिरिक्त निम्नलिखित शर्तें भी हो सकेंगी, अर्थात्‌:

 

  • यह कि विक्रय न्यायालय की मंजूरी के बिना पूर्ण नहीं किया जाएगा ;

 

  • यह कि विक्रय उस आशयित विक्रय की ऐसी उद्‌घोषणा के पश्चात्‌ जैसी उच्च न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अध्यधीन रहते हुए न्यायालय ने निर्दिष्ट की है, उस समय और स्थान पर, जो न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाएगा, लोक नीलामी द्वारा उस व्यक्ति को किया जाएगा जिसने न्यायालय के या न्यायालय द्वारा उस प्रयोजन के लिए विशेषतया नियुक्त व्यक्ति के समक्ष सब से ऊंची बोली लगाई हो ; 

 

 

  • यह कि पट्‌टा किसी प्रीमियम के प्रतिफल में न किया जाएगा या इतने वर्षों की अवधि के लिए और ऐसे भाटकों और प्रसंविदाओं के अध्यधीन किया जाएगा जो न्यायालय निर्दिष्ट करें ; 

 

 

  • यह कि संरक्षक अनुज्ञात कार्य के सम्पूर्ण आगम या उनका कोई भाग न्यायालय से संवितरण किए जाने या विहित प्रतिभूतियों में न्यायालय द्वारा विनिहित किए जाने को अथवा अन्यथा ऐसे व्ययनित किए जाने को, जैसे न्यायालय निर्दिष्ट करे, न्यायालय में जमा करेगा ।

 

 

 

(4) संरक्षक को धारा 29 में वर्णित कार्य के करने की अनुज्ञा अनुदत्त करने से पहले न्यायालय अनुज्ञा देने के आवेदन की सूचना का प्रतिपाल्य के नातेदार या मित्र को दिलाया जाना कारित कर सकेगा जिसे न्यायालय की राय में उसकी सूचना मिलनी चाहिए, और आवेदन के विरोध में उपसंजात होने वाले किसी भी व्यक्ति को सुनेगा और उसका कथन अभिलिखित करेगा ।

 

 

32. सम्पत्ति के संरक्षक की जो न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किया गया है, शक्तियों में फेरफार - जहां कि प्रतिपाल्य की सम्पत्ति का संरक्षक न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किया गया है और ऐसा संरक्षक कलक्टर नहीं है, वहां न्यायालय प्रतिपाल्य की संपत्ति के बारे में उस संरक्षक की शक्तियों को आदेश द्वारा उस रीति से और उस विस्तार तक समय-समय पर परिभाषित, निर्बन्धित या विस्तारित कर सकेगा जिसे वह प्रतिपाल्य के फायदे के लिए और जिस विधि के अध्यधीन वह अप्राप्तवय है उस विधि से संगत समझे ।

 

 

33. प्रतिपाल्य की संपत्ति के प्रबन्ध के लिए राय लेने को न्यायालय से आवेदन करने का ऐसे नियुक्त या घोषित संरक्षक का अधिकार - (1) न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित संरक्षक उस न्यायालय से, जिसने उसे नियुक्त या घोषित किया है, अपने प्रतिपाल्य की संपत्ति के प्रबन्ध या प्रशासन विषयक किसी भी वर्तमान प्रश्न के संबंध में उस न्यायालय की राय, सलाह या निदेश के लिए अर्जी द्वारा आवेदन कर सकेगा ।

 

 

(2) यदि न्यायालय का यह विचार है कि वह प्रश्न संक्षिप्ततः निपटाए जाने योग्य है, तो वह अर्जी की प्रतिलिपि की तामील आवेदन में हितबद्ध ऐसे व्यक्तियों पर, जिन्हें न्यायालय ठीक समझे, कराएगा तथा वे उसकी सुनवाई में हाजिर रह सकेंगे ।

 

 

(3) जो संरक्षक अर्जी में तथ्यों का सद्‌्‌भावपूर्वक कथन करता है और न्यायालय द्वारा दी गई राय, सलाह या निदेश पर कार्य करता है, जहां तक कि उसका अपना उत्तरदायित्व है, यह समझा जाएगा कि उसने आवेदन की विषयवस्तु के बारे में अपने उन कर्तव्यों का पालन कर दिया है जो संरक्षक के नाते उसके हैं ।

 

 

34. संपत्ति के उस संरक्षक की बाध्यताएं जो न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किया गया है - जहां कि प्रतिपाल्य की संपत्ति का संरक्षक न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किया गया है, और ऐसा संरक्षक कलक्टर नहीं है, वहां वह,

 

 

(क) यदि उससे न्यायलय द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाए, तो तत्समय न्यायाधीश के फायदे के लिए प्रवृत्त बन्धपत्र, प्रतिभुओं सहित या रहित जैसा विहित किया जाए, न्यायालय के न्यायाधीश को यथाशक्य निकटतम विहित प्ररूप में देगा, जिसमें यह वचनबन्ध होगा कि प्रतिपाल्य की संपत्ति की बाबत जो कुछ उसे प्राप्त हो, उसका सम्यक्‌ तौर पर लेखा-जोखा देगा;  

 

 

 

 

(ख) यदि उससे न्यायालय द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाए, प्रतिपाल्य की स्थावर संपत्ति का विवरण, ऐसे धन और ऐसी अन्य जंगम संपत्ति का विवरण, जिसे उसने प्रतिपाल्य की ओर से विवरण के परिदान की तारीख तक प्राप्त किया है, और प्रतिपाल्य को या प्रतिपाल्य द्वारा उस तारीख को शोध्य ऋणों का विवरण, न्यायालय द्वारा उसकी नियुक्ति या घोषणा की तारीख से छह माह के भीतर या इतने अन्य समय के भीतर, जितना न्यायालय द्वारा निर्दिष्ट किया जाए, न्यायालय को परिदत्त कर देगा ;

 

 

 

 

  • यदि उससे न्यायालय द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाए, अपने लेखाओं को न्यायालय में ऐसे समय पर और ऐसे प्ररूप में, जैसा न्यायालय समय-समय पर निर्दिष्ट करे, प्रदर्शित करेगा;

 

 

 

 

  • यदि उससे न्यायालय द्वारा ऐसी अपेक्षा की जाए, उन लेखाओं में अपने द्वारा शोध्य बाकी या, उसका उतना भाग, जितना न्यायालय निर्दिष्ट करे, न्यायालय में उस समय जमा कर देगा, जिसे न्यायालय निर्दिष्ट करे ; तथा

 

 

 

 

  • प्रतिपाल्य और ऐसे व्यक्तियों के, जो उस पर आश्रित हों, भरण-पोषण, शिक्षा और अभिवर्धन के लिए, तथा उन गृह कर्मों के अनुष्ठान के लिए जिनमें प्रतिपाल्य या उन व्यक्तियों में से कोई एक पक्षकार है, प्रतिपाल्य की संपत्ति की आय का उतना भाग जितना न्यायालय समय-समय पर निर्दिष्ट करे, और उस दशा में, जब कि न्यायालय ऐसा निर्दिष्ट करे, तो संपूर्ण संपत्ति या उसका कोई भाग उपयोजित करेगा ।

 

 

 

 

34क. लेखाओं की संपरीक्षा करने के लिए पारिश्रमिक अधिनिर्णीत करने की शक्ति - जब कि प्रतिपाल्य की संपत्ति के संरक्षक द्वारा लेखा धारा 34 के खंड (ग) के अधीन की गई अपेक्षा के अनुसरण में या अन्यथा प्रदर्शित किए जाएं, तब न्यायालय लेखाओं की संपरीक्षा करने के लिए एक व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगा और निदेश दे सकेगा कि उस काम के लिए पारिश्रमिक संपत्ति की आय में से दिया जाए ।

 

 

 

  1. 1929 के अधिनियम सं. 17 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित

35. संरक्षक के विरुद्ध वाद, जहां कि प्रशासन बंधपत्र लिया गया था - जहां कि न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित संरक्षक ने यह बंधपत्र दिया है कि उसे प्रतिपाल्य की संपत्ति की बाबत जो कुछ प्राप्त होगा, वह उसका सम्यक्‌ तौर पर लेखा-जोखा देगा, वहां न्यायालय अर्जी द्वारा किए गए आवेदन पर, और अपना यह समाधान हो जाने पर कि बंधपत्र वचनबंध का पालन नहीं किया गया है और प्रतिभूति के बारे में ऐसे निबन्धनों पर, अथवा यह उपबंध करके कि प्राप्त होने वाले सब धन न्यायालय में जमा कर दिए जाएं या अन्यथा, जैसे न्यायालय ठीक समझे, वह बंधपत्र किसी उचित व्यक्ति को समनुदेशित कर सकेगा, जो तदुपरि उस बंधपत्र के आधार पर स्वयं अपने नाम में ऐसे बाद लाने का हकदार होगा मानो वह बंधपत्र न्यायालय ने न्यायाधीश के बजाय आरम्भतः उसी को दिया गया था और प्रतिपाल्य के न्यासी की हैसियत में वह उसके, किसी भंग की बाबत उस पर वसूली करने का हकदार होगा ।

 

 

36. संरक्षक के विरुद्ध वाद, जहां कि प्रशासन बंधपत्र नहीं लिया गया था - (1) जहां कि न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित संरक्षक ने यथापूर्वोक्त बंधपत्र नहीं दिया है वहां कोई भी व्यक्ति प्रतिपाल्य की संपत्ति की बाबत संरक्षक को हुई प्राप्ति के लिए वाद न्यायालय की इजाजत से वादमित्र के तौर पर संरक्षक के विरुद्ध या उस दशा में जिसमें उसकी मृत्यु हो चुकी हो, उसके प्रतिनिधि के विरुद्ध प्रतिपाल्य की अप्राप्तवयता के दौरान किसी समय संस्थित कर सकेगा और वाद में ऐसी रकम, जो यथास्थिति, संरक्षक या उसके प्रतिनिधि द्वारा देय पाई जाए प्रतिपाल्य के न्यासी के रूप में वसूल कर सकेगा ।

 

 

(2) जहां तक उपधारा (1) के उपबंध संरक्षक के विरुद्ध वाद से संबंधित हैं, वहां तक वे कोड आफ सिविल प्रोसीजर, 1882 (1882 का 14)1 के इस अधिनियम के द्वारा यथासंशोधित धारा 440 के उपबंधों के अध्यधीन रहेंगे ।

 

 

37.  संरक्षक का न्यासी के तौर पर साधारण दायित्व - पूर्वगामी अन्तिम दो धाराओं में से किसी धारा की किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह प्रतिपाल्य को या उसके प्रतिनिधि को संरक्षक या उसके प्रतिनिधि के विरुद्ध किसी ऐसे उपचार से वंचित करती है जो इन दोनों धाराओं में तो अभिव्यक्त तौर पर उपबंधित नहीं है किन्तु किसी भी अन्य हिताधिकारी या उसके प्रतिनिधि को अपने न्यासी या उसके प्रतिनिधि के विरुद्ध प्राप्त हों ।

 

 

 

 

 

    1. अब देखिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की प्रथम अनुसूची में आदेश 32, नियम 1 और 4(2)

 

 

संरक्षकता का पर्यवसान

38. संयुक्त संरक्षकों के बीच उत्तरजीविताधिकार - दो या अधिक संयुक्त संरक्षकों में से एक की मृत्यु पर संरक्षकता उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों में तब तक बनी रहती है, जब तक न्यायालय द्वारा अतिरिक्त नियुक्ति नहीं कर दी जाती ।

39. संरक्षक का हटाया जाना - न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित संरक्षक को, या विल या अन्य लिखत द्वारा नियुक्त संरक्षक को न्यायालय किसी हितबद्ध व्यक्ति के आवेदन पर या स्वप्रेरणा से निम्नलिखित हेतुकों में से किसी या किन्हीं के लिए, अर्थात्‌:

(क) अपने न्यास के दुरुपयोग के लिए;

(ख) अपने न्यास के कर्तव्यों के पालन में निरन्तर असफलता के लिए;

(ग) अपने न्यास के कर्तव्यों के पालन में असमर्थता के लिए;

(घ) अपने प्रतिपाल्य से बुरे बर्ताव, या उसकी उचित देखरेख करने में उपेक्षा के लिए;

(ङ) उस अधिनियम के किसी उपबंध या न्यायालय के किसी आदेश की धृष्टतापूर्ण अवहेलना के लिए ;

(च) ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्धि के लिए जिसमें न्यायालय की राय में शील की ऐसी त्रुटि विवक्षित है, जिसे वह अपने प्रतिपाल्य का संरक्षक रहने के अयोग्य हो जाता है;

(छ) ऐसा हित रखने के लिए जो उसके कर्तव्यों के निष्ठापूर्वक पालन के प्रतिकूल है ;

(ज) न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर निवास करना बन्द कर देने के लिए;

(झ) संपत्ति का संरक्षक होने की दशा में शोध-अक्षमता या दिवाले के लिए;

(ञ) जिस विधि के अध्यधीन अप्राप्तवय है, उसके अधीन संरक्षक की संरक्षकता के समाप्त हो जाने या समाप्त होने के कारण, हटा सकेगा:

परन्तु विल या अन्य लिखत द्वारा नियुक्त संरक्षक चाहे वह इस अधिनियम के अधीन घोषित किया गया हो, या नहीं

(क) खंड (छ) में वर्णित हेतुक के लिए तब के सिवाय हटाया न जाएगा जब कि उसकी नियुक्ति करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के पश्चात्‌ प्रतिकूल हित प्रोद्‌भूत हुआ हो या वह दर्शित कर दिया गया हो कि उस व्यक्ति ने प्रतिकूल हित की अनभिज्ञता में वह नियुक्ति की थी और बनाए रखी थी; अथवा

(ख) खंड (ज) में वर्णित हेतुक के लिए तब के सिवाय हटाया न जाएगा जब कि ऐसा संरक्षक ऐसे निकास करने लगा हो, जिससे न्यायालय की राय में उस संरक्षक के लिए यह साध्य नहीं रह गया है कि वह संरक्षक के कर्तव्यों का निर्वहन कर सके ।

40. संरक्षक का उन्मोचन - (1) यदि न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित संरक्षक अपना पद त्यागना चाहे, तो वह उन्मोचित किए जाने के लिए न्यायालय से आवेदन कर सकेगा ।

(2) यदि न्यायालय इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि आवेदन के लिए पर्याप्त कारण है, तो वह उसे उन्मोचित करेगा और यदि आवेदन करने वाला संरक्षक कलक्टर है, और राज्य सरकार उसके उन्मोचित किए जाने के लिए आवेदन करने का अनुमोदन करती है, तो न्यायालय हर दशा में उसे उन्मोचित करेगा ।

41. संरक्षक के प्राधिकार का अन्त हो जाना - (1) शरीर के संरक्षक की शक्तियों का अन्त

(क) उसकी मृत्यु, उसके हटाए जाने या उसके उन्मोचन से ;

(ख) प्रतिपाल्य के शरीर का अधीक्षण प्रतिपाल्य अधिकरण द्वारा संभाल लिए जाने से;

 

(ग) प्रतिपाल्य की अप्राप्तवयता के अन्त हो जाने से;

 

(घ) नारी प्रतिपाल्य की दशा में उसका ऐसे पति से विवाह हो जाने से, जो उसके शरीर का संरक्षक होने के अयोग्य नहीं है या यदि संरक्षक न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किया गया है तो, ऐसे पति से, जो न्यायालय की राय में ऐसे अयोग्य नहीं है, विवाह हो जाने से; अथवा

 

(ङ) ऐसे प्रतिपाल्य की दशा में जिसका पिता प्रतिपाल्य के शरीर का संरक्षक होने के अयोग्य था, पिता के ऐसा न रहने से या, यदि पिता, न्यायालय द्वारा ऐसे अयोग्य समझा गया था, तो न्यायालय की राय में उसके ऐसा न रहने से, हो जाता है ।

 

(2) संपत्ति के संरक्षक की शक्तियों का अन्त

(क) उसकी मृत्यु, उसके हटाए जाने या उसके उन्मोचन से,

                (ख) प्रतिपाल्य की संपत्ति का अधीक्षण प्रतिपाल्य अधिकरण द्वारा संभाल लिए जाने से, अथवा

(ग) प्रतिपाल्य की अप्राप्तवयता के अन्त हो जाने से,

हो जाता है ।

 

(3) जब कि संरक्षक की शक्तियों का किसी हेतुकवश अन्त हो जाता है तब न्यायालय उससे या, यदि वह मर चुका हो तो, उसके प्रतिनिधि से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह प्रतिपाल्य की संपत्ति, जो उसके अपने कब्जे या नियंत्रण में है, अथवा प्रतिपाल्य की भूतपूर्व या वर्तमान संपत्ति से संबद्ध कोई लेखा, जो उसके अपने कब्जे या नियंत्रण में है, ऐसे परिदत्त कर दे जैसे न्यायालय निर्दिष्ट करे । 

 

                (4) जब कि वह न्यायालय द्वारा अपेक्षित तौर पर संपत्ति या लेखाओं का परिदान कर चुका हो तब न्यायालय उस कपट के बारे में के सिवाय जिसके तत्पश्चात्‌ पता चले यह घोषित कर सकेगा कि वह अपने दायित्वों से उन्मोचित कर दिया गया है ।

 

42. मृत, उन्मोचित या हटाए गए संरक्षक के उत्तरवर्ती की नियुक्ति - जब कि न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित संरक्षक उन्मोचित कर दिया गया है, या उस विधि के अधीन, जिसके प्रतिपाल्य अध्यधीन है, कार्य करने का हकदार नहीं रह जाता या जब कि कोई ऐसा संरक्षक या विल या अन्य लिखत द्वारा नियुक्त संरक्षक हटा दिया जाता है या मर जाता है, तब यदि प्रतिपाल्य तब भी अप्राप्तवय हो तो न्यायालय स्वप्रेरणा से, या अध्याय 2 के अधीन आवेदन पर, यथास्थिति, अप्राप्तवय के शरीर या संपत्ति या दोनों का दूसरा संरक्षक नियुक्त या घोषित कर सकेगा ।

 

 

अध्याय 4

 

अनुपूरक उपबंध

 

43. संरक्षकों के आचरण या कार्यवाहियों के विनियमन के लिए आदेश और उन आदेशों का प्रवर्तन कराना 

 

- (1) न्यायालय किसी ऐसे संरक्षक के, जो न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किया गया है, आचरण या कार्यवाहियों के विनियमन के लिए आदेश किसी हितबद्ध व्यक्ति के आवेदन पर, या स्वप्रेरणा से, कर सकेगा ।

 

 

(2) जहां कि प्रतिपाल्य के एक से अधिक संरक्षक हैं, और वे ऐसे प्रश्न पर, जो उसके कल्याण पर प्रभाव डालने वाला है, एकमत होने में असमर्थ है, वहां उनमें से कोई भी न्यायालय से उसके निदेश के लिए आवेदन कर सकेगा, और न्यायालय मतभेदग्रस्त विषय के बारे में ऐसा आदेश कर सकेगा जैसा वह ठीक समझे ।

 

 

(3) वहां के सिवाय, जहां कि यह प्रतीत होता है कि उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन आदेश करने का उद्देश्य विलम्ब होने से विफल हो जाएगा, न्यायालय यह आदेश करने के पहले, यथास्थिति, तदर्थ किए गए आवेदन की, या वैसा आदेश करने के न्यायालय के आशय की, सूचना, उपधारा (1) की दशा में, संरक्षक को या उपधारा (2) की दशा में संरक्षक को, जिसने आवेदन नहीं किया है, दिए जाने का निदेश देगा ।

 

 

(4) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किए गए आदेश की अवज्ञा की दशा में उस आदेश का प्रवर्तन उसी रीति से, जो कोड आफ सिविल प्रोसीजर, 1882 (1882 का 14)1 की धारा 492 या धारा 493 के अधीन अनुदत्त व्यादेश का प्रवर्तन कराने के लिए उपधारा (1) के अधीन की दशा में ऐसे कराया जा सकेगा, मानो प्रतिपाल्य वादी हो या संरक्षक प्रतिवादी हो और उपधारा (2) के अधीन की दशा में ऐसे कराया जा सकेगा मानो वह संरक्षक, जिसने आवेदन किया है, वादी हो और अन्य संरक्षक प्रतिवादी हो ।

 

 

 

    1. अब देखिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की प्रथम अनुसूची में आदेश 39, नियम 1 और 2

 

 

 

(5) उपधारा (2) के अधीन की दशा के सिवाय, इस धारा की कोई भी बात कलक्टर को, जो कलक्टर होने के नाते संरक्षक है, लागू नहीं होगी ।

 

 

44. अधिकारिता में से प्रतिपाल्य के हटाए जाने की शास्ति - यदि न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित संरक्षक, न्यायालय को प्रतिपाल्य के बारे में अपने प्राधिकार का प्रयोग करने से निवारित करने के प्रयोजन से या तत्परिणाम सहित न्यायालय की अधिकारिता की सीमाओं में से प्रतिपाल्य को धारा 26 के उपबंधों का उल्लंघन करके हटा लेगा तो वह न्यायालय के आदेश द्वारा एक हजार रुपए से अनधिक जुर्माने से, या ऐसी अवधि के लिए, जो छह मास तक की हो सकेगी, सिविल जेल में कारावास से दंडनीय होगा ।

 

 

45. धृष्टता के लिए शास्ति - (1) निम्नलिखित दशाओं में, अर्थात्‌ :

 

 

  • यदि अप्राप्तवय की अभिरक्षा रखने वाला व्यक्ति धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन निदेश के अनुपालन में उसे पेश करने या कराने में या धारा 25 की उपधारा (1) के अधीन के आदेश के अनुपालन में अप्राप्तवय को उसके संरक्षक की अभिरक्षा में लौटने के लिए विवश करने का अपना पूरा प्रयास करने में असफल रहेगा, अथवा.

 

 

  • यदि न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित संरक्षक धारा 34 के खंड (ख) के द्वारा या अधीन अनुज्ञात समय के भीतर, न्यायालय को उस उपखंड के अधीन अपेक्षित विवरण परिदान करने में या उस धारा के खंड (ग) के अधीन की अपेक्षा के अनुपालन में लेखाओं का प्रदर्शन करने में, या उन लेखाओं मद्धे उस द्वारा शोध्य बाकी उस धारा के खंड (घ) के अधीन की अपेक्षा के अनुपालन में न्यायालय में जमा करने में असफल रहेगा; अथवा

 

 

  • यदि कोई व्यक्ति, जो ऐसे व्यक्ति का संरक्षक या प्रतिनिधि नहीं रह गया है, धारा 41 की उपधारा (3) के अधीन की अपेक्षा के अनुपालन में किसी संपत्ति या लेखाओं का परिदान करने में असफल रहेगा,

 

 

 

 

तो, यथास्थिति, वह व्यक्ति, संरक्षक या प्रतिनिधि, न्यायालय के आदेश द्वारा एक सौ रुपए से अनधिक जुर्माने से, और अवज्ञा जारी रहने की दशा में

 

पहले दिन के पश्चात्‌ जितने दिन तक यह व्यतिक्रम बना रहता है, उतने हर एक दिन के लिए दस रुपए से अनधिक अतिरिक्त जुर्माने से, जो कुल मिलाकर पांच सौ रुपए से अधिक न होगा, दंडनीय होगा और सिविल जेल में तब तक निरुद्ध किए जाने के दायित्व के अधीन होगा, जब तक वह, यथास्थिति, अप्राप्तवय को पेश करने या कराने या उसे लौट आने को विवश करने, या विवरण परिदत्त करने, या लेखा प्रदर्शित करने देने, या बाकी देने, या संपत्ति या लेखाओं का परिदान करने का परिवचन न दे दे ।

 

 

(2) यदि वह व्यक्ति, जो उपधारा (1) के अधीन परिवचन देने पर विरोध से निर्मुक्त कर दिया गया है, न्यायालय द्वारा अनुज्ञात समय के अन्दर परिवचन पूरा करने में असफल रहेगा, तो न्यायालय उसकी गिरफ्तारी और सिविल जेल को उसका फिर से सुपुर्द किया जाना कारित कर सकेगा ।

 

 

46. कलक्टर और अधीनस्थ न्यायालयों के द्वारा रिपोर्ट - (1) न्यायालय कलक्टर से या अपने अधीनस्थ किसी अन्य न्यायालय से, इस अधिनियम के अधीन की किसी भी कार्यवाही में उद्‌्‌भूत किसी भी बात पर रिपोर्ट मांग सकेगा और उस रिपोर्ट को साक्ष्य के तौर पर बरत सकेगा ।

 

 

(2) यथास्थिति, कलक्टर या अधीनस्थ न्यायालय का न्यायाधीश रिपोर्ट तैयार करने के प्रयोजन के लिए ऐसी जांच करेगा, जैसी वह आवश्यक समझे, और साक्ष्य देने या दस्तावेज पेश करने के लिए साक्षी को हाजिर होने को विवश करने की शक्ति का, जो न्यायालय को कोड आफ सिविल प्रोसीजर, 1882 (1882 का 14)1 द्वारा प्रदत्त है, प्रयोग जांच के प्रयोजनों के लिए कर सकेगा ।

 

47. अपीलनीय आदेश - ऐसे आदेश की अपील उच्च न्यायालय में होगी जो 2॥। न्यायालय ने,

 

  • संरक्षक नियुक्त या घोषित करने या नियुक्त या घोषित करने से इनकार करने की धारा 7 के अधीन किया है; अथवा

 

  • आवेदन लौटाने को धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन किया है; अथवा

 

 

 

  1. अब देखिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5)
  2. 1926 के अधिनियम 4 की धारा 4 द्वारा जिला शब्द निरसित

 

 

  • प्रतिपाल्य को उसके संरक्षक की अभिरक्षा में लौट आने के लिए आदेश करने या आदेश करने से इनकार करने का धारा 25 के अधीन किया है; अथवा

 

 

  • न्यायालय की अधिकारिता की सीमाओं में से प्रतिपाल्य के हटाए जाने के लिए इजाजत देने से इनकार करने या उसके बारे में शर्तें अधिरोपित करने का धारा 26 के अधीन किया है ; अथवा

 

 

  • धारा 28 या धारा 29 में निर्दिष्ट कार्य करने की संरक्षक को उस धारा के अधीन अनुज्ञा देने से इनकार करने का किया है; अथवा

 

 

  • संरक्षक की शक्तियों को परिभाषित, निर्बन्धित या विस्तारित करने की धारा 32 के अधीन किया है, अथवा

 

 

  • संरक्षक को हटाने की धारा 39 के अधीन किया है; अथवा

 

 

  • संरक्षक को उन्मोचित करने से इनकार करने का धारा 40 के अधीन किया है; अथवा

 

 

 

  • संरक्षक के आचरण या कार्यवाहियों के विनियमन का या संयुक्त संरक्षकों के बीच में मतभेदग्रस्त विषय को तय करने या आदेश का प्रवर्तन कराने का धारा 43 के अधीन किया है, अथवा

 

 

 

  • शास्ति अधिरोपित करने की धारा 44 या धारा 45 के अधीन किया है । 

 

48. अन्य आदेशों की अन्तिमता - अन्तिम पूर्वगामी धारा द्वारा और कोड आफ सिविल प्रोसीजर, 1882 (1882 का 14)1 की धारा 622 द्वारा यथा उपबंधित के सिवाय इस अधिनियम के अधीन किया गया आदेश अन्तिम होगा, और वाद द्वारा या अन्यथा प्रतिवादनीय न होगा ।

 

 

49. खर्चे - इस अधिनियम के अधीन की किसी कार्यवाही के खर्चे, जिनके अंतर्गत सिविल जेल संरक्षक या अन्य व्यक्ति के भरण-पोषण के खर्चे आते हैं, उच्च न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अध्यधीन रहते हुए उस न्यायालय के विवेकाधीन होंगे जिसमें कार्यवाही की गई है ।

 

 

 

  • 1 अब देखिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 115

50. उच्च न्यायालय की नियम बनाने का शक्ति - (1) नियम बनाने की किसी अन्य शक्ति के अतिरिक्त, जो इस अधिनियम द्वारा अभिव्यक्त तौर पर या विवक्षित तौर पर प्रदत्त है, उच्च न्यायालय इस अधिनियम से संगत नियम निम्नलिखित के लिए समय-समय पर बना सकेगा

 

 

  • वे बातें, जिनके बारे में और वह समय जिस पर कलक्टर और अधीनस्थ न्यायालयों से रिपोर्ट मांगी जानी चाहिए;

 

  • संरक्षकों को अनुदत्त किए जाने वाले भत्ते और उनसे अपेक्षित की जाने वाली प्रतिभूति और वे दशाएं, जिनमें ऐसे भत्ते अनुदत्त किए जाने चाहिएं;

 

 

  • धारा 28 और 29 में निर्दिष्ट कार्यों को करने की अनुज्ञा के लिए संरक्षकों के आवेदनों के बारे में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;

 

  • वे परिस्थितियां जिनमें वे अपेक्षाएं की जानी चाहिएं जैसी धारा 34 के खंड (क), (ख), (ग) और (घ) में वर्णित हैं;

 

 

  • संरक्षकों द्वारा परिदत्त और प्रदर्शित विवरणों और लेखाओं का परिरक्षण;

 

  • उन विवरणों और लेखाओं का हितबद्ध व्यक्तियों द्वारा निरीक्षण;

 

 

1(चच) धारा 34क के अधीन लेखाओं की संपरीक्षा और उन व्यक्तियों का वर्ग जो लेखाओं की संपरीक्षा के लिए नियुक्त किए जाने चाहिएं और पारिश्रमिक का मापमान जो उन्हें अनुदत्त किया जाना है;

 

  • प्रतिपाल्यों के धन की अभिरक्षा और उनके धन के लिए प्रतिभूतियां;

 

  • वे प्रतिभूतियां, जिनमें प्रतिपाल्यों के धन विनिहित किए जा सकेंगे;

 

 

  • उन प्रतिपाल्यों की शिक्षा, जिनके लिए न्यायालय द्वारा, ऐसे संरक्षक नियुक्त या घोषित कर दिए गए हैं जो कलक्टर नहीं हैं, तथा

 

 

 

 

 

  1. 1929 के अधिनियम सं. 17 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित

 

(ञ) इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने में न्यायालयों का साधारणतः मार्गदर्शन ।

(2) उपधारा (1) खंड (क) और (झ) के अधीन के नियम उस समय तक प्रभावशील नहीं होंगे, जब तक वे राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित न कर दिए गए हों, और न इस धारा के अधीन का कोई नियम उस समय तक प्रभावशील होगा, जब तक वह शासकीय राजपत्र में प्रकाशित न कर दिया गया हो ।

51. न्यायालय द्वारा पहले ही नियुक्त संरक्षकों को अधिनियम का लागू होना - इस अधिनियम द्वारा निरसित किसी अधिनियमिति के अधीन सिविल न्यायालय द्वारा नियुक्त, या उससे प्राप्त प्रशासन प्रमाणपत्र धारण करने वाला संरक्षक जैसा विहित किया जाए उसके सिवाय इस अधिनियम के उपबन्धों और इसके अधीन बनाए गए नियमों के ऐसे अध्यधीन होगा मानो वह अध्याय 2 के अधीन न्यायालय द्वारा नियुक्त या घोषित किया गया हो ।

52. इंडियन मेजोरिटी ऐक्ट का संशोधन - निरसन अधिनियम, 1938 (1938 का 1) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित ।

53. कोड आफ सिविल प्रोसीजर के अध्याय 31 का संशोधन -। सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 156 तथा अनुसूची 5 द्वारा निरसित ।

अनुसूची – [निरसित अधिनियमितियां ।] - निरसन अधिनियम, 1938 (1938 का 1) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित ।

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