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शत्रु-सम्पत्ति अधिनियम, 1968 ( Enemy Property Act, 1968 )


 

शत्रु-सम्पत्ति अधिनियम, 1968

(1968 का अधिनियम संख्यांक 34)

झ्र्20 अगस्त, 1968ट

भारत रक्षा नियम, 1962  झ्र्और भारत रक्षा नियम, 1971ट के अधीन भारत के शत्रु-सम्पत्ति अभिरक्षक

में निहित शत्रु-सम्पत्ति को निहित बनाए रखने का तथा तत्संसक्त

बातों का उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के उन्नीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :द्भद्भ

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, लागू होना और प्रारम्भद्भद्भ(1) यह अधिनियम शत्रु-सम्पत्ति अधिनियम, 1968 कहा जा सकेगा ।

(2) इसका विस्तार, जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय, संपूर्ण भारत पर है और यह भारत से बाहर के सब भारतीय नागरिकों को तथा उन कम्पनियों या निगमित निकायों की, जो भारत में रजिस्ट्रीकृत या निगमित है, भारत से बाहर की शाखाओं और अभिकरणों को भी लागू होता है ।

(3) यह 1968 की जुलाई के दसवें दिन प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।

2. परिभाषाएंद्भद्भइस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,द्भद्भ

(क) अभिरक्षकञ्ज् से धारा 3 के अधीन नियुक्त किया गया था नियुक्त किया गया समझा जाने वाला भारत का शत्रु-सम्पत्ति अभिरक्षक अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत उस धारा के अधीन नियुक्त किए गए या नियुक्त किए गए समझे जाने वाले शत्रु-सम्पत्ति उप-अभिरक्षक तथा शत्रु-सम्पत्ति सहायक-अभिरक्षक आते हैं ;

(ख) शत्रुञ्ज् या शत्रु-प्रजाञ्ज् या शत्रु-फर्मञ्ज् से ऐसा व्यक्ति या देश अभिप्रेत है जो भारत रक्षा अधिनियम, 1962 (1962 का 51) और भारत रक्षा नियम, 1962  झ्र्या भारत रक्षा अधिनियम, 1971 (1971 का 42) और भारत रक्षा नियम, 1971ट के अधीन, यथास्थिति, शत्रु, शत्रु-प्रजा या शत्रु-फर्म था, किन्तु इसके अन्तर्गत भारत का नागरिक नहीं आता है ;

(ग) शत्रु-सम्पत्तिञ्ज् से ऐसी सम्पत्ति अभिप्रेत है जो तत्समय शत्रु, शत्रु-प्रजा या शत्रु-फर्म की है या उसकी ओर से धारित या प्रबन्धित है :

परन्तु जहां कि किसी व्यष्टि शत्रु-प्रजा की ऐसे राज्यक्षेत्र में मृत्यु हो जाती है, जिस पर इस अधिनियम का विस्तार है, वहां कोई सम्पत्ति जो ऐसी मृत्यु के अव्यवहित पूर्व उसकी थी या उसके द्वारा धारित थी या उसकी ओर से प्रबन्धित थी, उसकी मृत्यु हो जाने पर भी इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए शत्रु-सम्पत्ति मानी जाती रहेगी ;

(घ) विहितञ्ज् से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है । 

3. भारत के शत्रु-सम्पत्ति अभिरक्षक और उप-अभिरक्षक, आदि की नियुक्तिद्भद्भकेन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, भारत शत्रु-सम्पत्ति अभिरक्षक की और ऐसे स्थानीय क्षेत्रों के लिए जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं एक या अधिक शत्रु-सम्पत्ति उप-अभिरक्षकों तथा शत्रु-सम्पत्ति सहायक-अभिरक्षकों की नियुक्ति कर सकेगी :

परन्तु  झ्र्यथास्थिति, भारत रक्षा नियम, 1962 या भारत रक्षा नियम, 1971ट के अधीन नियुक्त किए गए भारत का                 शत्रु-सम्पत्ति अभिरक्षक और शत्रु-सम्पत्ति उप-अभिरक्षक या शत्रु-सम्पत्ति सहायक अभिरक्षक इस धारा के अधीन नियुक्त किए गए                  समझे जाएंगे ।

4. शत्रु-सम्पत्ति निरीक्षकों की नियुक्तिद्भद्भकेन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, या तो साधारण तौर पर, या किसी विशिष्ट क्षेत्र के लिए, एक या अधिक शत्रु-सम्पत्ति निरीक्षक इस अधिनियम के उपबन्धों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए नियुक्त कर सकेगी तथा ऐसा अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए उनके द्वारा किए जाने वाले काम के वितरण और आबंटन का उपबन्ध, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, कर सकेगी :

परन्तु  झ्र्यथास्थिति, भारत रक्षा नियम, 1962 या भारत रक्षा नियम, 1971ट के अधीन नियुक्त किया गया हर शत्रु-फर्म निरीक्षक इस धारा के अधीन नियुक्त किया गया शत्रु-सम्पत्ति निरीक्षक समझा जाएगा ।

 

5. भारत रक्षा नियम, 1962 के अधीन भारत के शत्रु-सम्पत्ति अभिरक्षक में निहित सम्पत्ति का उस निरीक्षक में निहित बना रहनाद्भद्भ झ्र्(1)ट भारत रक्षा अधिनियम, 1962 (1962 का 51) और भारत रक्षा नियम, 1962 का अवसान जो जाने पर भी, सब         शत्रु-सम्पत्ति, जो ऐसे अवसान से पूर्व उक्त नियमों के अधीन नियुक्त भारत के शत्रु-सम्पत्ति अभिरक्षक में निहित थी और जो इस अधिनियम के प्रारम्भ से अव्यवहित पूर्व ऐसे निहित बनी रही, ऐसे प्रारम्भ से अभिरक्षक में निहित होगी ।

 झ्र्(2) भारत रक्षा अधिनियम, 1971 (1971 का 42) और भारत रक्षा नियम, 1971 का अवसान हो जाने पर भी, सब        शत्रु-सम्पत्ति, जो उक्त नियमों के अधीन नियुक्त भारत के शत्रु-सम्पत्ति अभिरक्षक में ऐसे अवसान के पूर्व निहित थी और जो शत्रु सम्पत्ति (संशोधन) अधिनियम, 1977 के प्रारम्भ के अव्यवहितपूर्व ऐसे निहित बनी रही, ऐसे प्रारम्भ से अभिरक्षक में निहित हो    जाएगी ।ट

6. अभिरक्षक में निहित सम्पत्ति का शत्रु या शत्रु-प्रजा या शत्रु-फर्म द्वारा अन्तरणद्भद्भजहां कि अभिरक्षक में इस अधिनियम के अधीन निहित सम्पत्ति किसी शत्रु या शत्रु-प्रजा या शत्रु-फर्म द्वारा, चाहे अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात्, अन्तरित की गई हो, और जहां कि केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत हो कि ऐसा अन्तरण लोकहित के लिए क्षतिकर है या इस दृष्टि से किया गया था कि उस सम्पत्ति को अभिरक्षक में निहित होने से बचाए जाए या ऐसे निहित होने को विफल किया जाए, वहां केन्द्रीय सरकार, अन्तरिती को उस मामले में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् ऐसे अन्तरण को आदेश द्वारा शून्य घोषित कर सकेगी और ऐसे आदेश को किए जाने पर वह सम्पत्ति अभिरक्षक में निहित बनी अथवा उसमें निहित समझी जाएगी ।

7. अभिरक्षक को ऐसे धन का संदाय जो अन्यथा शत्रु, शत्रु-प्रजा या शत्रु-फर्म को संदेय हैद्भद्भ(1) शत्रु या शत्रु-प्रजा या शत्रु-फर्म को या उसके फायदे के लिए लाभांश, ब्याज या अंशीय लाभ के रूप में या अन्यथा संदेय कोई धनराशि, जब तक केन्द्रीय सरकार द्वारा अन्यथा आदिष्ट न किया जाए, उस व्यक्ति द्वारा, जिसके द्वारा वह  झ्र्यथास्थिति, भारत रक्षा नियम, 1962 या भारत रक्षा नियम, 1971ट के अधीन के प्रतिषेध के अभाव में संदेय होती, अभिरक्षक को या ऐसे व्यक्ति को, जो उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया जाए, संदत्त की जाएगी और अभिरक्षक या ऐसे व्यक्ति द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए धारित की जाएगी ।

(2) उन दशाओं में जिनमें कि 3झ्र्यथास्थिति, भारत रक्षा नियम, 1962 या भारत रक्षा नियम, 1971ट के अधीन के प्रतिषेध के अभाव में कोई धन किसी शत्रु या शत्रु-प्रजा या शत्रु-फर्म को या उसके फायदे के लिए विदेशी करेंसी में संदेय हो (और जो ऐसी दशाएं न हों जिनमें कि धन किसी संविदा के अधीन संदेय है जिसमें विनिर्दिष्ट विनिमय-दर का उपबन्ध किया गया है), वह संदाय अभिरक्षक को भारत के रिजर्व बैंक द्वारा नियत उस तारीख की मध्य शासकीय विनिमय-दर से जब वह संदाय उस शत्रु, शत्रु-प्रजा या शत्रु-फर्म को शोध्य हुआ, रुपयों में किया जाएगा ।

(3) अभिरक्षक भारत रक्षा नियम, 1962 के अधीन 2झ्र्या माध्य यथास्थिति, भारत रक्षा नियम, 1971ट या इस अधिनियम के अधीन अपने को संदत्त किसी धन या इस अधिनियम के अधीन अपने में निहित किसी सम्पत्ति के संबंध में, धारा 8 के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, ऐसी रीति से कार्रवाई करेगा जिसे केन्द्रीय सरकार निर्दिष्ट करे ।

8. अपने में निहित शत्रु-सम्पत्ति के बारे में अभिरक्षक की शक्तियांद्भद्भ(1) अभिरक्षक में इस अधिनियम के अधीन निहित सम्पत्ति के बारे में अभिरक्षक ऐसे अध्युपाय कर सकेगा या उनका किया जाना प्राधिकृत कर सकेगा जो वह उस सम्पत्ति के परिरक्षण के लिए आवश्यक या समीचीन समझे, और जहां कि ऐसी सम्पत्ति व्यष्टि शत्रु-प्रजा की हो वहां वह उस सम्पत्ति में से ऐसा व्यय उपगत कर सकेगा जिसे वह भारत में उस व्यष्टि के या उसके कुटुम्ब के भरण-पोषण के लिए आवश्यक या समीचीन समझे ।

(2) पूर्वगामी उपबन्ध की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, अभिरक्षक या ऐसा व्यक्ति, जो उसके द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट रूप से प्राधिकृत किया जाए, उक्त प्रयोजन के लिएद्भद्भ

(त्) शत्रु का कारबार चला सकेगा ;

(त्त्) शत्रु के प्रति शोध्य धन वसूल करने के लिए  कार्रवाई कर सकेगा ;

(त्त्त्) शत्रु के नाम में और उसकी ओर से कोई संविदा कर सकेगा तथा कोई दस्तावेज निष्पादित कर सकेगा ;

(त्ध्) कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही संस्थित कर सकेगा, उसमें प्रतिवाद कर सकेगा या उसे चालू रख सकेगा, किसी विवाद को माध्यस्थम् के लिए निर्देशित कर सकेगा तथा किन्हीं ऋणों, दावों या दायित्वों का समझौता कर सकेगा ;

(ध्) उस सम्पत्ति की प्रतिभूति पर ऐसे उधार, जो आवश्यक हों, ले सकेगा ;

(ध्त्) उस सम्पत्ति में से कोई व्यय उपगत कर सकेगा, जिसके अन्तर्गत सरकार को या किसी स्थानीय प्राधिकारी को करों, शुल्कों, उपकरों और रेटों का संदाय और शत्रु के किसी कर्मचारी को या उसके बारे में कोई मजदूरी, सम्बलम्, पेंशन, भविष्य-निधि-अभिदायों का संदाय तथा शत्रुओं से भिन्न किन्हीं व्यक्तियों को शत्रु द्वारा शोध्य ऋणों का प्रतिसदांय आते हैं ;

(ध्त्त्) सम्पत्तियों में से किसी को विक्रय, बन्धक या पट्टा द्वारा अंतरित या अन्यथा व्ययनित कर सकेगा ;

(ध्त्त्त्) शत्रुओं की ओर से अपने द्वारा धारित किसी धन को राजहुंडियों या ऐसी अन्य सरकारी प्रतिभूतियों के, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस प्रयोजन के लिए अनुमोदित की जाएं, क्रय के लिए विनिहित कर सकेगा ;

(त्न्) शत्रु और उसके आश्रितों को संदाय कर सकेगा ;

(न्) 25 अक्तूबर, 1962  झ्र्या 3 दिसंबर, 1971ट को परादेय शोध्यों का शत्रु की ओर से संदाय शत्रुओं से भिन्न व्यक्तियों को कर सकेगा ; तथा

(न्त्) शत्रु की निधियों में से ऐसे अन्य संदाय कर सकेगा जिन्हें केन्द्रीय सरकार निदिष्ट करे ।

                स्पष्टीकरणद्भद्भइस उपधारा में तथा धाराओं 10 और 17 में शत्रुञ्ज् के अन्तर्गत शत्रु-प्रजा और शत्रु-फर्म आते हैं ।

                9. कुर्की आदि से छूटद्भद्भइस अधिनियम के अधीन अभिरक्षक में निहित सब शत्रु-सम्पत्ति किसी सिविल न्यायालय की डिक्री या किसी अन्य प्राधिकारी के आदेशों के निष्पादन में कुर्की, अभिग्रहण या विक्रय से छूट-प्राप्त होगी ।

                10. शत्रु की प्रतिभूतियों का अन्तरणद्भद्भ(1) जहां कि धारा 8 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करके अभिरक्षक किसी कम्पनी द्वारा पुरोधृत और किसी शत्रु की कोई प्रतिभूति बेचने की प्रस्थापना करता है, वहां कम्पनी, किसी विधि में या कम्पनी के किन्हीं विनियमों में किसी तत्प्रतिकूल बात के होते हुए भी, अभिरक्षक की सम्पत्ति से उन प्रतिभूतियों का क्रय कर सकेगी, और इस प्रकार क्रय की गई प्रतिभूतियां, जब जब कम्पनी ऐसा करना ठीक समझे, उस कम्पनी द्वारा पुनः पुरोधृत की जा सकेंगी ।

                (2) जहां कि अभिरक्षक कम्पनी द्वारा पुरोधृत किन्हीं प्रतिभूतियों को निष्पादित और अन्तरित करता है वहां कम्पनी, इस बात के होते हुए भी कि कम्पनी के विनियम अन्तरित प्रतिभूतियों के सम्बन्ध में प्रमाणपत्र, स्क्रिप, या हक के अन्य साक्ष्य के अभाव में ऐसा रजिस्ट्रीकरण अनुज्ञात नहीं करते, उन प्रतिभूतियों को, अन्तरण की तथा अभिरक्षक के इस निमित्त आदेश की प्राप्ति पर अन्तरिती के नाम में रजिस्ट्रीकृत कर लेगी :

                परन्तु ऐसा कोई रजिस्ट्रीकरण कम्पनी के पक्ष में के किसी धारणाधिकार या भार पर, तथा किसी ऐसे धारणाधिकार या भार पर, जिसकी अभिरक्षक कम्पनी को अभिव्यक्त सूचना दे, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा ।

                स्पष्टीकरणद्भद्भइस धारा में प्रतिभूतियोंञ्ज् के अन्तर्गत अंश, स्टाक, बन्धपत्र, डिबेंचर और डिबेंचर-स्टाक आते हैं, किन्तु विनिमयपत्र नहीं आते ।

                11. व्यक्तियों को समन करने और दस्तावेजें मांगने की अभिरक्षक की शक्तिद्भद्भ(1) अभिरक्षक किसी ऐसे व्यक्ति से, जिसके बारे में उसे यह विश्वास हो कि वह शत्रु-सम्पत्ति से संपृक्त जानकारी देने में समर्थ है, लिखित सूचना द्वारा अपेक्षा कर सकेगा कि वह उसके समक्ष ऐसे समय और स्थान पर, जो सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, हाजिर हो, और अभिरक्षक ऐसे किसी व्यक्ति की उसके बारे में परीक्षा कर सकेगा, उसके कथन को लेखबद्ध कर सकेगा और उससे अपेक्षा कर सकेगा कि वह उस पर हस्ताक्षर करे ।

                (2) अभिरक्षक लिखित सूचना द्वारा किसी ऐसे व्यक्ति से, जिसके बारे में उसे यह विश्वास हो कि उसके कब्जे या नियन्त्रण में शत्रु-सम्पत्ति से सम्बन्धित कोई लेखाबही, पत्र-पुस्तक, बीजक, रसीद या अन्य किसी भी प्रकृति की दस्तावेज है, यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह उसे अभिरक्षक के समक्ष उस समय और स्थान पर जो सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, पेश करे, या पेश कराए और उसे उसके द्वारा परीक्षा के लिए प्रस्तुत करे, तथा अभिरक्षक को उसमें की किसी प्रविष्टि की या उसके किसी भाग की प्रतिलिपियां लेने दे ।

                12. अभिरक्षक के आदेशों के अनुपालन के लिए परित्राणद्भद्भजहां कि किसी धन या सम्पत्ति के बारे में कोई आदेश अभिरक्षक द्वारा किसी व्यक्ति को संबोधित किया जाता है और उसके साथ में अभिरक्षक का यह प्रमाणपत्र रहता है कि वह धन या सम्पत्ति इस अधिनियम के अधीन उसमें निहित धन या सम्पत्ति है, वहां वह प्रमाणपत्र उसमें कथित तथ्यों का साक्ष्य होगा और यदि वह व्यक्ति अभिरक्षक के आदेशों का अनुपालन करता है तो वह ऐसे अनुपालन के कारण ही किसी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही के दायित्वाधीन न होगा ।

                13. अभिरक्षक के आदेशों के अनुसररण में की गई कार्रवाई की विधिमान्यताद्भद्भजहां कि इस अधिनियम के अधीनद्भद्भ

(क) कोई धन अभिरक्षक को संदत्त किया जाता है; अथवा

(ख) अभिरक्षक में कोई सम्पत्ति निहित होती है या किसी व्यक्ति को अभिरक्षक द्वारा किसी ऐसी सम्पत्ति के बारे में कोई ऐसा आदेश दिया जाता है जो अभिरक्षक को इस अधिनियम के अधीन अपने में निहित शत्रु-सम्पत्ति प्रतीत होती है,

वहां न तो वह संदाय, निहित होना, या अभिरक्षक का आदेश और न उसके परिणामस्वरूप की गई कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य या प्रभावित होगी कि किसी तात्त्विक समय परद्भद्भ

(त्) कोई व्यक्ति, जो उस धन या सम्पत्ति में हितबद्ध था या हो सकता था और जो शत्रु या शत्रु-फर्म था, मर गया था अथवा शत्रु या शत्रु-फर्म नहीं रह गया था ; अथवा

(त्त्) कोई व्यक्ति, जो ऐसे हितबद्ध था और जिसके बारे में अभिरक्षक को यह विश्वास था कि वह शत्रु या शत्रु-फर्म है, शत्रु या शत्रु-फर्म नहीं था ।

                14. उन कम्पनियों के विरुद्ध कार्यवाहियां जिनकी आस्तियां अभिरक्षक में निहित हैंद्भद्भजहां कि इस अधिनियम के अधीन अभिरक्षक में निहित शत्रु-सम्पत्ति में किसी कम्पनी की आस्तियां हों वहां उस कम्पनी के विरुद्ध या उसके किसी निदेशक, प्रबन्धक या अन्य आफिसर के विरुद्ध कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन कोई भी सिविल या दाण्डिक कार्यवाही अभिरक्षक की लिखित सम्मति से संस्थित की जाने के सिवाय संस्थित नहीं की जाएगी ।

                15. शत्रु-सम्पत्ति के बारे में विवरणियांद्भद्भ(1) अभिरक्षक ऐसे व्यक्तियों से, जो उसकी राय में इस अधिनियम के अधीन उसमें निहित शत्रु-सम्पत्ति में हित रखते हों या उस पर नियंत्रण रखते हों ऐसी विवरणियां मांग सकेगा जो विहित की जाएं ।

                (2) हर व्यक्ति जिससे उपधारा (1) के अधीन कोई विवरणी मांगी जाती है ऐसी विवरणी विहित कालावधि के भीतर प्रस्तुत करने को आबद्ध होगा ।

                16. विवरणियों के रजिस्टरद्भद्भ(1) इस अधिनियम के अधीन अभिरक्षक को प्रस्तुत की गई शत्रु-सम्पत्ति सम्बन्धी सब विवरणियां ऐसे रजिस्टरों में अभिलिखित की जाएंगी जो विहित किए जाएं ।

                (2) ऐसे सब रजिस्टर, ऐसी फीस के संदाय पर, जो विहित की जाए, तथा ऐसे युक्तियुक्त निर्बन्धनों के अध्यधीन रहते हुए जो अभिरक्षक अधिरोपित करे, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा निरीक्षण के लिए उपलब्ध रहेंगे जो अभिरक्षक की राय में किसी विशिष्ट          शत्रु-सम्पत्ति में उसके लेनदार के रूप में या अन्यथा हितबद्ध हो और ऐसा कोई व्यक्ति रजिस्टरों में से सुसंगत प्रभाग की प्रतिलिपि भी विहित फीस के संदाय पर अभिप्राप्त कर सकेगा ।

                17. फीस का उद्ग्रहणद्भद्भ(1) अभिरक्षक द्वारा ऐसी फीस उद्गृहीत की जाएगी जो निम्नलिखित के दो प्रतिशत के बराबर होगीद्भद्भ

(क) उसे संदत्त धनराशि की रकम ;

(ख) इस अधिनियम के अधीन उसमें निहित किसी सम्पत्ति के विक्रय या अन्तरण के आगम ; तथा

(ग) विशिष्ट सम्पत्ति का, यदि कोई हो, मूल स्वामी को या केन्द्रीय सरकार द्वारा धारा 18 के अधीन विनिर्दिष्ट अन्य व्यक्ति को अन्तरण के समय मूल्य :

                परन्तु ऐसे शत्रु की दशा में, जिसकी सम्पत्ति का प्रबन्ध इस निमित्त विशेष तौर पर प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा किया जाना अभिरक्षक द्वारा अनुज्ञात हो, शत्रु की सकल आय के दो प्रतिशत के बराबर या ऐसी कम फीस उद्गृहीत की जाएगी जो सीधे प्रबन्ध में केन्द्रीय सरकार द्वारा उपगत व्यय को, वरिष्ठ पर्यवेक्षण के खर्च को तथा प्रबन्ध के बारे में उस सरकार द्वारा उठाई गई किसी जोखिम को ध्यान में रख कर केन्द्रीय सरकार विनिर्दिष्टतः नियत करे :

                परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार इस उपधारा के अधीन उद्ग्रहणीय फीसों को किसी विशेष मामले में या मामलों के वर्ग में, ऐसे कारणों से जो लेखन द्वारा अभिलिखित किए जाएंगे, घटा सकेगी या उनका परिहार कर सकेगी ।

                स्पष्टीकरणद्भद्भइस उपधारा में शत्रु की सकल आयञ्ज् से इस अधिनियम के अधीन अभिरक्षक में निहित शत्रु की सम्पत्तियों से व्युत्पन्न आय अभिप्रेत है ।

                (2) फीसों के निर्धारण के प्रयोजन के लिए किसी सम्पत्ति का मूल्य वह कीमत होगा जो केन्द्रीय सरकार की अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त किए गए किसी प्राधिकारी की राय में उस सम्पत्ति के लिए उसके खुले बाजार में बेचे जाने पर      प्राप्त होगी ।

                (3) सम्पत्ति की बाबत फीस उसके विक्रय या अन्तरण के किन्हीं आगमों में से या उससे प्रोद्भूत किसी आय में से, या उसी शत्रु की और इस अधिनियम के अधीन अभिरक्षक में निहित किसी अन्य सम्पत्ति में से उद्गृहीत की जा सकेगी ।

                (4) इस धारा के अधीन उद्गृहीत फीस केन्द्रीय सरकर के नाम जमा की जाएगी ।

                18. अभिरक्षक में निहित शत्रु-सम्पत्ति का निर्निहित किया जानाद्भद्भकेन्द्रीय सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन अभिरक्षक में निहित और उसके पास बनी रहने वाली कोई शत्रु-सम्पत्ति उससे निर्निहित हो जाएगी और उसके स्वामी को या ऐसे अन्य व्यक्ति को, जो निदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, वापस कर दी जाएगी, और तदुपरि वह सम्पत्ति अभिरक्षक में निहित नहीं रह जाएगी और ऐसे स्वामी या अन्य व्यक्ति में पुनः निहित हो जाएगी ।

                19. इस अधिनियम के अधीन की गई कार्रवाई के लिए परित्राणद्भद्भकोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए केन्द्रीय सरकार या अभिरक्षक या       शत्रु-सम्पत्ति निरीक्षक के विरुद्ध नहीं होगी ।

                20. शास्तिद्भद्भ(1) यदि कोई व्यक्ति धारा 7 की उपधारा (1) के उपबन्धों के उल्लंघन में कोई संदाय करेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा और वह संदाय या व्यवहार शून्य होगा ।

                (2) यदि कोई व्यक्ति धारा 10 की उपधारा (2) के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।

                (3) यदि कोई व्यक्ति धारा 11 की उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अभिरक्षक द्वारा की गई अपेक्षा का अनुपालन करने में असफल रहेगा तो वह जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

                (4) यदि कोई व्यक्ति धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन विवरणी प्रस्तुत करने में असफल रहेगा या ऐसी विवरणी प्रस्तुत करेगा जिसमें अन्तर्विष्ट कोई विशिष्टि मिथ्या हो और जिसका मिथ्या होना वह जानता हो या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास न हो, तो वह जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

                21. कम्पनियों द्वारा अपराधद्भद्भ(1) जहां कि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध कम्पनी द्वारा किया गया है वहां हर व्यक्ति, जो अपराध किए जाने के समय कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उस कम्पनी के प्रति उत्तरदायी था, और वह कम्पनी भी, उस अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही की जाने और दंडित किए जाने के दायित्व के अधीन होंगे :

                परन्तु इस उपधारा में अन्तर्विष्ट कोई भी बात ऐसे किसी व्यक्ति को किसी दण्ड के दायित्व के अधीन न करेगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या ऐसे अपराध का किया जाना निवारित करने के लिए उसने सभी सम्यक् तत्परता बरती थी ।

                (2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां कि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित कर दिया जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य आफिसर की सम्मति या मौनानुकूलता से किया गया है या उसकी ओर से हुई किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य आफिसर भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही की जाने और दण्डित किए जाने के दायित्व के अधीन होगा ।

                स्पष्टीकरणद्भद्भइस धारा के प्रयोजनों के लिएद्भद्भ

(क) कम्पनीञ्ज् से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम आता       है ; तथा

(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशकञ्ज् से फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

                22. इस अधिनियम से असंगत विधियों का प्रभावद्भद्भ किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि में अन्तर्विष्ट तदसंगत किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम के उपबन्ध प्रभावी होंगे ।

                23. नियम बनाने की शक्तिद्भद्भ(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।

                (2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगेद्भद्भ

(क) वे विवरणियां जो अभिरक्षक द्वारा धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन मांगी जा सकेंगी और वह कालावधि जिसके भीतर ऐसी विवरणियां उस धारा की उपधारा (2) के अधीन प्रस्तुत की जाएंगी ;

(ख) वे रजिस्टर जिनमें शत्रु-सम्पत्ति सम्बन्धी विवरणियां धारा 16 के अधीन अभिलिखित की जाएंगी :

(ग) धारा 16 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्टरों के निरीक्षण के लिए तथा उनके सुसंगत प्रभागों की प्रतिलिपि अभिप्राप्त करने के लिए फीसें ;

(घ) वह रीति जिससे कि अभिरक्षक में निहित शत्रु-सम्पत्ति धारा 18 के अधीन वापस की जा सकेगी ;

(ङ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जाए ।

                 झ्र्(3) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाने जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।ट

                24. भारत रक्षा नियम, 1962 के अधीन किए गए कतिपय आदेशों का प्रवृत्त बना रहनाद्भद्भ झ्र्(1)ट हर आदेश जो भारत रक्षा नियम, 1962 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा या उन नियमों के अधीन नियुक्त भारत के शत्रु-सम्पत्ति अभिरक्षक द्वारा किसी शत्रु-सम्पत्ति के सम्बन्ध में किया गया हो और जो उक्त नियमों के अवसान के अव्यवहितपूर्व प्रवृत्त हो, वहां तक जहां तक कि उक्त आदेश इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो, प्रवृत्त बना रहा और इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किया गया समझा जाएगा ।

                 झ्र्(2) हर आदेश, जो भारत रक्षा नियम, 1971 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा या उन नियमों के अधीन नियुक्त भारत के शत्रु-सम्पत्ति अभिरक्षक द्वारा किसी शत्रु सम्पत्ति के सम्बन्ध में किया गया हो और जो उक्त नियमों के अवसान के अव्यवहितपूर्व प्रवृत्त हो, वहां जहां तक कि उक्त आदेश इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो, प्रवृत्त बना रहा और इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किया गया समझा जाए ।ट

                25. निरसन और व्यावृत्तिद्भद्भ(1) एनिमी प्रापर्टी आर्डिनेंस, 1968 (1968 का अध्यादेश 7) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है ।

                (2) ऐसे निरसन के होते हुए भी यह है कि उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबन्धों के अधीन की गई समझी जाएगी ।

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