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तेलक्षेत्र (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 1948 ( Oilfields (Regulation & Development) Act, 1948 )


 

तेलक्षेत्र (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 1948

(1948 का अधिनियम संख्यांक 53)

[8 सितम्बर, 1948]

*** तेलक्षेत्रों के विनियमन के लिए और  [खनिज तेल साधनोंट  *** के विकास के

लिए उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

यतः तेलक्षेत्रों के विनियमन के लिए और खनिजों तेल साधनों के विकास के लिए उपबन्ध करना लोकहित में समीचीन है;

अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता हैः-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम  [तेलक्षेत्र] (विनियमन तथा विकास) अधिनियम, 1948 कहा                  जा सकेगा ।

 [(2) इसका विस्तार  *** सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख  को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त नियत करे ।

2. [केन्द्रीय सरकार द्वारा नियंत्रण की समीचीनता की घोषणा ।]-खान और खनिज (विनियमन और विकास) अधिनियम, 1957 (1957 का 67) की धारा 32 और अनुसूची 3 द्वारा (1-6-1958 से) निरसित ।

3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो,-

                (क) “पट्टाकर्ता" और “पट्टेदार" पदों के अंतर्गत क्रमशः अनुज्ञापक और अनुज्ञाप्तिधारी आते हैं;

                (ख) “खनन पट्टा" से 3[खनिज तेलों] की तलाश या अभिप्राप्ति के प्रयोजनार्थ उत्खात अभिप्रेत है और तेल-कूप इसके अन्तर्गत आता है;

                (ग) 3[खनिज तेलों"] के अन्तर्गत प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम आते हैं;

                (घ) “खनन पट्टा" से 3[खनिज तेलों] की तलाश करने, उन तक पहुंचने, उनके कार्यकरण या प्राप्ति, या उन्हें वाणिज्य योग्य बनाने, या ले जाने, या उनका व्ययन करने के प्रयोजन के लिए अथवा तत्संसक्त प्रयोजनों के लिए अनुदत्त पट्टा अभिप्रेत है और खोज या पूर्वेक्षण की अनुज्ञप्ति इसके अन्तर्गत आती है;

(ङ) “तेलक्षेत्र" से कोई ऐसा क्षेत्र अभिप्रेत है जहां प्राकृतिक गैस और पेट्रोलियम, कच्चा तेल, परिष्कृत तेल और अंशतः परिष्कृत तेल तथा पेट्रोलियम के उत्पादों में से किसी द्रव या ठोस अवस्था वाले उत्पाद की अभिप्राप्ति के प्रयोजन के लिए कोई संक्रिया चलाई जानी है या चलाई जा रही है ।

4. किसी खनन पट्टे का तब तक विधिमान्य होना जब तक कि वह इस अधिनियम के अनुसार हो-(1) इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के पश्चात् कोई भी खनन पट्टा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार अनुदत्त किए जाने से अन्यथा अनुदत्त नहीं किया जाएगा ।

(2) कोई खनन पट्टा, जो उपधारा (1) के उपबन्धों के प्रतिकूल अनुदत्त किया गया हो, शून्य और प्रभावहीन होगा ।

5. खनन पट्टों के बारे में नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार खनन पट्टों का अनुदान विनियमित करने के लिए अथवा किसी 3[खनिज तेलट के बारे में या किसी क्षेत्र में ऐसे पट्टों का अनुदान प्रतिषिद्ध करने के लिए नियम  शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सब बातों के लिए या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-

(क) वह रीति जिससे, वे  [खनिज तेल] या क्षेत्र जिनके बारे में, और वे व्यक्ति जिनके द्वारा, खनन पट्टों के लिए आवेदन किए जा सकेंगे और ऐसे किन्हीं आवेदनों पर दी जाने वाली फीसें;

(ख) वह प्राधिकारी जिसके द्वारा, वे निबन्धन जिन पर, और वे शर्तें जिनके अध्यधीन खनन पट्टे अनुदत्त किए                  जा सकेंगे;

(ग) वह अधिकतम या न्यूनतम क्षेत्र और वह कालावधि जिसके लिए कोई खनन पट्टा अनुदत्त किया जा सकेगा, और वे निबन्धन जिन पर कि लगे हुए क्षेत्रों के बारे में पट्टे समामेलित किए जा सकेंगे;

(घ) पट्टेदार द्वारा संदेय अधिकतम और न्यूनतम भाटक नियत करना, चाहे खान चलाई जाए या न चलाई जाए ।

6. खनिज तेल के विकास के बारे में नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार 1[खनिज तेलों] के संरक्षण और विकास के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ये नियम, निम्नलिखित सब बातों के लिए या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-

                 ।                                             ।                                              ।                                              ।

                (ग) किन्हीं इंजनों, मशीनरी या अन्य उपस्कर का प्रयोग विहित या विनियमित करके किसी क्षेत्र में किन्हीं  [खनिज तेल साधनों] का विकास;

                (घ) किसी तेलक्षेत्र में तेल-कूपों को बर्माने, पुनः बर्माने, गहरा करने, बन्द करने, प्लग करने और परित्यक्त करने का विनियमन और ऐसी संक्रियाओं के परिसीमन या प्रतिषेध के लिए और तेल की बरबादी या नुकसान के निवारण के लिए उपचारी उपाय करने के लिए;

                (ङ) किसी तेल क्षेत्र में तेल के उत्पादन के ढंगों का विनियमन और ऐसे ढंगों का परिसीमन या प्रतिषेध;

                (च) सभी नए बोरिंगों की और कूपक गलाने की अनिवार्य अधिसूचना, और बोरिंग अभिलेखों और सभी नए बोर-छिद्रों के क्रोडों के नमूनों का परिरक्षण;

                (छ) खानों और नए बोर-छिद्रों से सैम्पल लेना;

                (ज) 1[खनिज तेलों] के भंडारकरण के इंतजामों का विनियमन और उनके स्टाक, जो किसी व्यक्ति द्वारा रखे                      जा सकेंगे;

                 [(झ) खनिज, खदानित, उत्खनित या संगृहीत खनिज तेलों के बारे में स्वामिस्वों का संग्रहण तथा फीसों या करों का उद्ग्रहण और संग्रहण;]

                (ञ) खानों के स्वामियों या पट्टेदारों द्वारा विशेष या कालिक विवरणियों और रिपोर्टों का प्रस्तुत किया जाना और वे प्ररूप जिनमें, और वे प्राधिकारी जिनको, ऐसी विवरणियां और रिपोर्टें प्रस्तुत की जाएंगी ।

 [6क. खनिज तेलों के बारे में स्वामिस्व-(1) तेलक्षेत्र (विनियमन तथा विकास) संशोधन अधिनियम, 1969 (1969 का 39) के प्रारम्भ के पूर्व अनुदत्त खनन पट्टे का धारक पट्टे की लिखत में या ऐसे प्रारम्भ के समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी, पट्टाकृत क्षेत्र से ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् अपने द्वारा खनित, खदानित, उत्खनित या संगृहीत किसी खनिज तेल के बारे में उस दर से स्वामिस्व संदत्त करेगा जो अनुसूची में उस खनिज तेल के बारे में तत्समय विनिर्दिष्ट हो ।

(2) तेलक्षेत्र (विनियमन तथा विकास) संशोधन अधिनियम, 1969 (1969 का 39) के प्रारम्भ के समय या उसके पश्चात् अनुदत्त खनन पट्टे का धारक, पट्टाकृत क्षेत्र से अपने द्वारा खनित, खदानित, उत्खनित या संगृहीत किसी खनिज तेल के बारे में उस दर से स्वामिस्व संदत्त करेगा जो अनुसूची में उस खनिज तेल के बारे में तत्समय विनिर्दिष्ट हो ।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, किसी कच्चे तेल, केसनशीर्ष द्रवण या प्राकृतिक गैस के बारे में जिसकी अनिवार्य रूप से हानि हो जाए या जिसे हौज में वापस कर दिया जाए अथवा पेट्रोलियम या प्राकृतिक गैस या दोनों के उत्पादन के सम्बन्ध में बरमाने या अन्य संक्रियाओं के लिए उपयोग में लाया जाए, कोई स्वामिस्व संदेय न होगा ।

 [(4) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस दर में वृद्धि या कमी करने के लिए जिस पर किसी खनिज तेल के बारे में स्वामिस्व उस तारीख से जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, संदेय होगा, अनुसूची का संशोधन कर सकेगी और खनन पट्टों के विभिन्न वर्गों में समावेशित क्षेत्रों से खनित, खदानित, उत्खनित या संगृहीत एक ही प्रकार के खनिज तेल के बारे में भिन्न-भिन्न दरें अधिसूचित की जा सकेंगीः

परन्तु केन्द्रीय सरकार, किसी खनिज तेल के बारे में स्वामिस्व की दर इस प्रकार नियत नहीं करेगी कि वह, यथास्थिति, तेलक्षेत्र या तेलकूप-मुख पर खनिज तेल की विक्रय कीमत के बीस प्रतिशत से अधिक हो जाए ।

(5) यदि केन्द्रीय सरकार का, अपतट क्षेत्रों में खोज करने को प्रोत्साहन देने की दृष्टि से, यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा या तो आत्यंतिक रूप से या ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसे क्षेत्रों से उत्पादित खनिज तेल को उस पर उद्ग्रहणीय स्वामिस्व से पूर्णतया या भागतः सामान्यतया छूट दे सकेगी ।]

7. विद्यमान पट्टों के उपान्तरण के लिए नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व अनुदत्त किसी खनन पट्टे के निबन्धनों और शर्तों का उपान्तरण या परिवर्तन, इस दृष्टि से कि ऐसा पट्टा धाराओं 5 और 6 के अधीन बनाए गए नियमों के अनुरूप हो जाए, करने के प्रयोजन के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगीः

परन्तु इस प्रकार बनाए गए नियम, जो उपधारा (2) के खंड (ग) में वर्णित बातों के लिए उपबन्ध करें, तब तक प्रवृत्त नहीं होंगे जब तक  [लोक सभा] द्वारा उनका अनुमोदन, उपान्तरों के सहित या बिना, न कर दिया गया हो ।

(2) उपधारा (1) के अधीन बनाए गए नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध करेंगे-

(क) तद्धीन किए जाने के लिए प्रस्थापित उपान्तर या परिवर्तन करने की पूर्व सूचना पट्टेदार को, और जहां कि पट्टाकर्ता केन्द्रीय सरकार नहीं है वहां पट्टाकर्ता को देना और प्रस्थापना के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का उन्हें अवसर देना;

(ख) उस पक्षकार द्वारा जिसको प्रस्थापित उपान्तरण या परिवर्तन से फायदा होगा, उस पक्षकार को, जिसके विद्यमान पट्टे के अधीन के अधिकारों पर तद्द्वारा प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा प्रतिकर का संदाय; तथा

(ग) वे सिद्धांत जिन पर, वह रीति जिससे और वह प्राधिकारी जिसके द्वारा उक्त प्रतिकर अवधारित                      किया जाएगा ।

8. प्रत्यायोजन-केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन प्रयोक्तव्य कोई शक्ति ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अध्यधीन रहते हुए जैसी उसमें विनिर्दिष्ट की जाएं ऐसे आफिसर या प्राधिकारी द्वारा प्रयुक्त की जाएगी जो उस निदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए ।

9. शास्तियां-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों में से किसी के अधीन बनाया गया कोई नियम यह उपबन्ध कर सकेगा कि उसका कोई उल्लंघन कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनी होगा ।

(2) जो कोई उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी अपराध के लिए, दोषसिद्ध किए जाने के पश्चात् ऐसा अपराध करना चालू रखेगा वह प्रथम दोषसिद्धि की तारीख के पश्चात् के हर ऐसे दिन के लिए जिसके दौरान वह इस प्रकार अपराध करना चालू रखे, जुर्माने से जो, एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।

 [10. नियमों और अधिसूचनाओं का रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और  [धारा 6क की उपधारा (4) या उपधारा (5) के अधीन] जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना, बनाए जाने या जारी की जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा या रखी जाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत जो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या होगी । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए या अधिसूचना नहीं जारी की जानी चाहिए, तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा या हो जाएगी । किन्तु नियम या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

11. निरीक्षण की शक्ति-(1) किसी खान या परित्यक्त खान के वास्तविक या पूर्वेक्षित कार्यकरण की स्थिति को अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए या इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों में वर्णित किसी अन्य प्रयोजन के लिए किसी भी आफिसर को, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत हो, अधिकार होगा कि वह-

                (क) किसी खान में प्रवेश करे और उसका निरीक्षण करे;

                (ख) किसी खान का नियंत्रण रखने वाले या उससे संसक्त किसी व्यक्ति के कब्जे या शक्ति में की किसी दस्तावेज, पुस्तक, रजिस्टर या अभिलेख को पेश करने का आदेश दे;

                (ग) किसी खान का नियंत्रण रखने वाले या उससे संसक्त किसी व्यक्ति की परीक्षा करे ।

(2) उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत आफिसर भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के अन्दर लोक सेवक समझा जाएगा ।

12. विशेष मामलों में नियमों का शिथिल किया जाना-यदि केन्द्रीय सरकार का समाधान हो जाए कि ऐसा करना लोक हित में है, तो वह किसी भी मामले में धाराओं 5 और 6 के अधीन बनाए गए नियमों में अधिकथित निबन्धनों और शर्तों से भिन्न निबन्धनों और शर्तों पर खनन पट्टे का अनुदान या खान का कार्यकरण प्राधिकृत कर सकेगी ।

 [13. अधिनियम का सरकार पर आबद्धकर होना-इस अधिनियम के उपबन्ध सरकार पर आबद्धकर होंगे ।]

14. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए परित्राण-किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए नहीं होगी ।

[अनुसूची

(धारा 6 देखिए)

स्वामिस्व की दरें

 [1. कच्चा तेल : दस रुपए प्रति मीटर टन ।

2. केसनशीर्ष द्रवण : दस रुपए प्रति मीटरी टन ।]

3. प्राकृतिक गैस : कूप-मुख पर अभिप्राप्त प्राकृतिक गैस के मूल्य का दस प्रतिशत ।]

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