पोत परिवहन विकास निधि समिति (उत्सादन) अधिनियम, 1986
(1986 का अधिनियम संख्यांक 66)
[24 दिसम्बर, 1986]
वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1958 के अधीन गठित पोत परिवहन
विकास निधि समिति का उत्सादन करने के लिए और उससे
आनुषंगिक कुछ विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पोत परिवहन विकास निधि समिति (उत्सादन) अधिनियम, 1986 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में तब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) अधिनियम" से वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1958 (1958 का 44) अभिप्रेत है ;
(ख) नियत दिन" से इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख अभिप्रेत है ;
(ग) समिति" से अधिनियम की धारा 15 के अधीन गठित पोत परिवहन विकास निधि समिति अभिप्रेत है ;
(घ) पदाभिहित व्यक्ित" से इस अधिनियम की धारा 16 के अधीन उस रूप में नियुक्त व्यक्ति अभिप्रेत है ;
(ङ) निधि" से इस अधिनियम की धारा 14 के अधीन बनाई गई पोत परिवहन विकास निधि अभिप्रेत है ;
(च) अधिसूचित आदेश" से राजपत्र में अधिसूचित आदेश अभिप्रेत है ;
(छ) पोतस्वामी" से अधिनियम की धारा 21 में उल्लिखित विवरण का कोई व्यक्ति जिसने समिति से उधार या किसी अन्य रूप में वित्तीय सहायता अभिप्राप्त की है, अभिप्रेत है ;
(ज) पोत परिवहन समुत्थान" से किसी पोतस्वामी के स्वामित्व, नियंत्रण या प्रबंध के अधीन पोत परिवहन के कारबार में लगा हुआ कोई समुत्थान अभिप्रेत है ।
अध्याय 2
पोत परिवहन विकास निधि समिति का उत्सादन तथा समिति की आस्तियों और दायित्वों का
केन्द्रीय सरकार में निहित होना
3. पोत परिहवन विकास निधि समिति का उत्सादन और अधिनियम में पारिणामिक संशोधन-नियत दिन से ही अधिनियम की धारा 15 के अधीन गठित पोत परिवहन विकास निधि समिति का उत्सादन हो जाएगा और तद्नुसार अधिनियम का निम्नलिखित रूप में संशोधन हो जाएगा :-
(क) बृहत् नाम में से तथा एक पोत परिवहन विकास निधि" शब्दों का लोप किया जाएगा ;
(ख) भाग 4 का लोप किया जाएगा ।
4. पारिणामिक उपबन्ध-समिति के उत्सादन पर,-
(क) समिति के सभी अधिकार और विशेषाधिकार केन्द्रीय सरकार के अधिकार और विशेषाधिकार हो जाएंगे ;
(ख) सभी जंगम और स्थावर सम्पत्ति, जिनके अन्तर्गत रोकड़-बाकी, आरक्षित निधियां, लिखतें और ऐसी धनराशियां हैं, जो समिति के नाम में जमा हैं, और ऐसी सम्पत्तियों में, या उनसे पैदा होने वाले सभी अधिकार और हित जो नियत दिन के ठीक पूर्व समित के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में थे, तथा उनसे संबंधित किसी भी प्रकार की सभी लेखाबहियां, रजिस्टर, अभिलेख तथा सभी अन्य दस्तावेज, केन्द्रीय सरकार में निहित हो जाएंगे ;
(ग) समिति के सभी प्रकार के उधार, दायित्व और बाध्यताएं, जो नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान हैं, ऐसे दिन से ही केन्द्रीय सरकार के उधार, दायित्व और बाध्यताएं समझी जाएंगी ; और
(घ) समिति द्वारा, उसके साथ या उसके लिए की गई सभी संविदाएं और किए जाने के लिए वचनबंध सभी विषय और बातें, जो नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान हैं, ऐसे दिन से ही, केन्द्रीय सरकार द्वारा, उसके साथ, या उसके लिए की गई, या किए जाने के लिए वचनबंध, समझी जाएंगी ।
5. केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध वाद, आदि का चालू रहना-(1) यदि, नियत दिन को, निधि या समिति के संबंध में कोई वाद, अपील या किसी भी प्रकार की अन्य कार्यवाही ऐसी समिति द्वारा या उसके विरुद्ध लम्बित है तो उसका समिति के उत्सादन के कारण उपशमन नहीं होगा, वह बन्द नहीं होगी, या उस पर किसी भी रूप में प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ; किन्तु ऐसा वाद, अपील या अन्य कार्यवाही केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध चालू रखी जा सकेगी, चलाई जा सकेगी और प्रवृत्त की जा सकेगी ।
(2) जहां नियत दिन के पूर्व, समिति के पक्ष में या उसके विरुद्ध किसी वाद या कार्यवाही के लिए कोई वाद हेतुक या अपील का कोई अधिकार उद्भूत हुआ है और ऐसे वाद हेतुक पर किसी वाद या कार्यवाही का संस्थित किया जाना अथवा ऐसी अपील का फाइल किया जाना नियत दिन के पूर्व वर्जित नहीं था वहां केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके विरुद्ध ऐसा वाद या कार्यवाही संस्थित की जा सकेगी या ऐसी अपील फाइल की जा सकेगी ।
6. समिति की धनराशियों, आदि का भारत की संचित निधि में जमा किया जाना-नियत दिन को, समिति के खाते में जमा सभी धनराशियां और रोकड़-बाकी भारत की संचित निधि का भाग होंगी और उसमें जमा की जाएंगी ।
7. समिति के विद्यमान कर्मचारियों की सेवाओं का अन्तरण-(1) प्रत्येक व्यक्ति, जो नियत दिन के ठीक पूर्व, समिति के अधीन नियोजित है, नियत दिन से ही, केन्द्रीय सरकार का कर्मचारी हो जाएगा और केन्द्रीय सरकार के अधीन पेंशन, उपदान और अन्य बातों के बारे में वैसे ही अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ पद धारण करेगा जो उसे तब अनुज्ञेय होते जब ऐसा निधान नहीं हुआ होता और वह तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक केन्द्रीय सरकार के अधीन उसका नियोजन सम्यक् रूप से समाप्त नहीं कर दिया जाता या जब तक उसका पारिश्रमिक और सेवा की अन्य शर्तें केन्द्रीय सरकार द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जाती ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, समिति के अधीन नियोजित किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की सेवाओं का अन्तरण, ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
(3) जहां, सेवा की किसी संविदा के निबंधनों के अधीन या अन्यथा, कोई ऐसा व्यक्ति, जिसकी सेवाएं इस अधिनियम के उपबंधों के कारण केन्द्रीय सरकार को अन्तरित हो जाती हैं, वेतन या मजदूरी के किन्हीं बकाया का या न ली गई किसी छुट्टी के लिए किन्हीं संदाय का या किसी अन्य संदाय का, जो उपदान या पेंशन के रूप में संदाय नहीं है, हकदार है, वहां ऐसा व्यक्ति अपना दावा केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध कर सकेगा ।
अध्याय 3
केन्द्रीय सरकार की विशेष शक्तियां
8. केन्द्रीय सरकार की करार पाई गई अवधि के पूर्व प्रतिसंदाय की मांग करने की शक्ति-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी करार में तत्प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, लिखित सूचना द्वारा किसी ऐसे पोतस्वामी से जिसको समिति ने नियत दिन के पूर्व किसी समय कोई वित्तीय सहायता दी थी, केन्द्रीय सरकार को उसके पूर्ण शोध्यों और अन्य दायित्वों का भी पूर्ण रूप से तुरन्त उन्मोचन करने की अपेक्षा कर सकेगी, यदि-
(क) केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत होता है कि ऐसी वित्तीय सहायता का फायदा उपाप्त करने या उपाप्त करते रहने के प्रयोजन के लिए पोतस्वामी द्वारा किसी तात्त्विक विशिष्टि में कोई मिथ्या या भ्रामक जानकारी दी गई थी ; या
(ख) पोतस्वामी समिति के साथ अपने करार के निबंधनों का अनुपालन करने में असफल रहा है ; या
(ग) इस बात की युक्तियुक्त आशंका है कि पोतस्वामी अपने ऋणों का संदाय करने में असमर्थ है या, उसके विरुद्ध परिसमापन के लिए कार्यवाहियां आरम्भ हो गई हैं या आरम्भ की जा सकती हैं ; या
(घ) केन्द्रीय सरकार के पास यह विश्वास करने का कारण है कि पोतस्वामी ने समिति द्वारा दी गई वित्तीय सहायता का सर्वथा ऐसे प्रयोजन के लिए उपयोग या उपयोजन नहीं किया है, जिसके लिए वह दी गई थी या अन्यथा उसने उसका दुरुपयोग या दुर्विनियोग सदोष अभिलाभ के लिए किया है ; या
(ङ) वित्तीय सहायता के लिए प्रतिभूति के रूप में समिति को समनुदेशित, भारित, आडमान की गई, बंधकित या गिरवी रखी गई सम्पत्ति का पोतस्वामी द्वारा केन्द्रीय सरकार के समाधानप्रद रूप में बीमा नहीं कराया गया है या वह बीमाकृत नहीं रखी गई है, या यदि ऐसी सम्पत्ति के मूल्य का इतना अवक्षयण हो गया है कि केन्द्रीय सरकार की राय में और प्रतिभूति केन्द्रीय सरकार के समाधानप्रद रूप में दी जानी चाहिए और ऐसी प्रतिभूति नहीं दी जाती है ; या
(च) केन्द्रीय सरकार की अनुज्ञा के बिना कोई पोत, मशीनरी, संयंत्र या अन्य सम्पत्ति, चाहे वह प्रतिभूति का भागरूप है या अन्यथा, उसको प्रतिस्थापित किए बिना ऐसे पोतस्वामी द्वारा हटा ली जाती है ; या
(छ) किसी अन्य कारण से, केन्द्रीय सरकार के हितों का संरक्षण करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है ।
स्पष्टीकरण-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, वित्तीय सहायता" के अंतर्गत नियत दिन के पूर्व किसी समय समिति द्वारा पोतस्वामी को दी गई किसी प्रत्याभूति या प्रति-प्रत्याभूति सहित कोई उधार, अग्रिम या धन संबंधी सहायता है ।
9. न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना रिसीवर की नियुक्ति-(1) जहां केन्द्रीय सरकार धारा 8 के अधीन कोई सूचना जारी करती है और पोतस्वामी ऐसी सूचना का अनुपालन करने में असफल रहता है वहां केन्द्रीय सरकार, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी करार, विलेख या प्रत्याभूति या प्रति-प्रत्याभूति की प्रकृति की किसी अन्य लिखत में तत्प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना, पोतस्वामी के किसी पोत या अन्य आस्तियों को चाहे वह बंधकित, आडमानित या भारित हो, प्रतिधृत करने या उसका कब्जा लेने के लिए किसी रिसीवर की नियुक्ति कर सकेगी और उसे निम्नलिखित शक्ति होगी,-
(i) अधिनियम की धारा 51 में तत्प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, लोक नीलामी द्वारा ऐसे पोत या अन्य आस्तियों का विक्रय करना ;
(ii) ऐसी सब आय की मांग और वसूली जिसकी बाबत वह किसी ऐसे पोत या अन्य आस्तियों का रिसीवर नियुक्त किया गया है, और उसका किराए, करों और अन्य शोध्यों तथा उसको प्रभावित करने वाले निर्गमों के उन्मोचन में तथा केन्द्रीय सरकार को किसी बंधक, आडमान या भार के अधीन पोतस्वामी के दायित्वों के संदाय में विनियोजन करना ; या
(iii) बंधक, आडमान या भार के अधीन केन्द्रीय सरकार को पोतस्वामी के दायित्वों की पूर्ति करने के लिए आय, किराया या लाभ अर्जित करने के लिए ऐसे पोत या अन्य आस्तियों का प्रयोग, प्रचालन, चार्टर या पट्टा और उसके द्वारा प्राप्त धन, यदि कोई है, के शेष भाग का ऐसे व्यक्ति को संदाय जो, रिसीवर की नियुक्ति न होने की दशा में ऐसी आय को जिसका वह रिसीवर नियुक्त किया गया है, या जो ऐसी संपत्ति का अन्यथा हकदार है, प्राप्त करने का हकदार होता ।
(2) इस धारा के अधीन नियुक्त किसी रिसीवर को पोतस्वामी का अभिकर्ता समझा जाएगा और पोतस्वामी रिसीवर के कार्यों या व्यतिक्रमों के लिए अकेले ही उत्तरदायी होगा जब तक कि ऐसे कार्य या व्यतिक्रम केन्द्रीय सरकार की ओर से किसी अनुचित मध्यक्षेप के कारण न हुए हों ।
10. निदेशकों और प्रशासकों की नियुक्ति-(1) जहां केन्द्रीय सरकार, किसी पोतस्वामी से धारा 8 के अधीन जारी की गई सूचना के अनुसरण में उसके शोध्यों और दायित्वों का उन्मोचन करने की अपेक्षा करती है और पोत स्वामी ऐसी सूचना का अनुपालन करने में असफल हो जाता है, वहां केन्द्रीय सरकार, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी प्रत्याभूति या प्रति-प्रत्याभूति के रूप में किसी करार, विलेख या अन्य लिखत में तत्प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, और धारा 9 में अन्तर्विष्ट किसी बात पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, अधिसूचित आदेश द्वारा उतने व्यक्तियों को जितने को वह उचित समझे,-
(क) कंपनी के निदेशकों के रूप में नियुक्त कर सकेगी, यदि पोतस्वामी, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित कोई कंपनी है, अथवा
(ख) किसी अन्य दशा में पोत परिवहन समुत्थान के प्रशासकों के रूप में नियुक्त कर सकेगी ।
(2) इस धारा के अधीन निदेशकों या प्रशासकों की नियुक्ति करने की शक्ति में किसी व्यष्टि, फर्म या निगमित निकाय को, यथास्थिति, निदेशकों या प्रशासकों के रूप में, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जो केन्द्रीय सरकार ठीक समझे, नियुक्त करने की शक्ति भी सम्मिलित है ।
(3) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि निदेशकों या प्रशासकों की नियुक्ति की शक्ति में इस प्रकार नियुक्त व्यक्तियों को हटाने या उनको प्रतिस्थापित करने की शक्ति भी सम्मिलित है ।
(4) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या पोतस्वामी यदि वह कंपनी है, से संबंधित किसी लिखत की कोई बात, जहां तक वह किसी निदेशक के संबंध में किसी शेयर अर्हता धारण करने के लिए कोई उपबंध, आयु सीमा, निदेशकों या निदेशक मण्डल की संख्या पर निर्बंधन, चक्रानुक्रम से सेवानिवृत्ति या पद से हटाए जाने के संबंध में है, इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किसी निदेशक को लागू नहीं होगी ।
11. अधिसूचित आदेश का प्रभाव-(1) धारा 10 के अधीन किसी अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने पर-
(क) यदि पोतस्वामी, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित एक कंपनी है, तो पोतस्वामी के निदेशकों के रूप में पद धारण करने वाले सभी व्यक्ति और किसी अन्य मामले में कोई पद धारण करने वाले ऐसे सभी व्यक्ति, जिन्हें अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने के ठीक पूर्व अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण की शक्ति प्राप्त है, उस रूप में अपना पद रिक्त किए गए समझे जाएंगे ;
(ख) पोतस्वामी और खंड (क) में निर्दिष्ट किसी निदेशक या व्यक्ति, जो अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने के ठीक पूर्व उस रूप में पद धारण कर रहा है, के बीच किसी प्रबंध संविदा को समाप्त हुआ समझा जाएगा ।
(2) धारा 10 के अधीन नियुक्त निदेशक या प्रशासक ऐसे कदम उठाएंगे जो, सम्पत्ति, चीजबस्त और ऐसे अनुयोज्य दावों को अपनी अभिरक्षा में या नियंत्रण के अधीन लेने के लिए आवश्यक है जिनके लिए पोतस्वामी हकदार है या हकदार प्रतीत होता है,और पोतस्वामी की सब सम्पत्ति और चीजबस्त को अधिसूचित आदेश की तारीख से, यथास्थिति, निदेशकों या प्रशासकों की अभिरक्षा में रखा गया समझा जाएगा ।
(3) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, धारा 10 के अधीन नियुक्त निदेशक, सभी प्रयोजनों के लिए, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन सम्यक् रूप से गठित ऐसी कंपनी के निदेशक होंगे और ऐसे निदेशक ही, ऐसे निदेशक की सभी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए हकदार होंगे ।
12. निदेशकों और प्रशासकों की शक्तियां और कर्तव्य-केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, धारा 10 के अधीन नियुक्त, यथास्थिति, निदेशक या प्रशासक ऐसे कदम उठाएंगे जो पोतस्वामी के कारबार के दक्षतापूर्ण प्रबन्ध के प्रयोजन के लिए आवश्यक हों और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेंगे और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे जो उक्त कारबार प्रबन्ध के भारसाधक व्यक्तियों द्वारा प्रयोक्तव्य हों ।
13. प्रबन्ध आदि की संविदा को समाप्त किए जाने के लिए प्रतिकर का अधिकार न होना-(1) किसी संविदा में या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में तत्प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, कोई प्रबन्ध या पूर्णकालिक निदेशक या कोई अन्य निदेशक या प्रबन्धक या ऐसे पोतस्वामी के, जो कंपनी है, प्रबन्ध का भारसाधक कोई व्यक्ति, पद हानि या उसके द्वारा ऐसी कंपनी के साथ की गई प्रबन्ध संविदा को इस अधिनियम के अधीन समयपूर्व समाप्त कर दिए जाने के लिए किसी प्रतिकर का हकदार नहीं होगा ।
(2) उपधारा (1) की कोई बात ऐसे प्रबन्ध या पूर्णकालिक निदेशक या किसी अन्य निदेशक या प्रबन्धक या किसी ऐसे व्यक्ति के, जो प्रबन्ध का भारसाधक है, पोतस्वामी से ऐसे प्रतिकर से अन्यथा वसूलीय धन को वसूल करने के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगी ।
14. 1956 के अधिनियम संख्यांक 1 का लागू होना-(1) जहां निदेशक किसी कंपनी के संबंध में धारा 10 के अधीन नियुक्त किए गए हैं, वहां कंपनी अधिनियम, 1956 या ऐसी कंपनी के संगम ज्ञापन या संगम अनुच्छेद में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) ऐसी कंपनी के शेयरधारकों या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कंपनी के निदेशक के रूप में किसी व्यक्ति को नामनिर्देशित या नियुक्त करना विधिपूर्ण नहीं होगा ;
(ख) ऐसी कंपनी के शेयरधारकों के किसी अधिवेशन में पारित संकल्प को तब तक प्रभावी नहीं किया जाएगा जब तक कि उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित न कर दिया जाए ;
(ग) ऐसी कंपनी के परिसमापन या उसकी बाबत रिसीवर की नियुक्ति के लिए किसी न्यायालय में कोई कार्यवाही केन्द्रीय सरकार की सहमति से ही की जाएगी या जारी रखी जाएगी, अन्यथा नहीं ।
(2) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, और ऐसे अन्य अपवादों, निर्बन्धनों और सीमाओं के, यदि कोई हों, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, अधीन रहते हुए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) पोतस्वामी को जो कंपनी है, उसी रीति से लागू किया जाता रहेगा जिससे वह धारा 10 के अधीन अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने के पूर्व लागू था ।
15. शोध्यों की भू-राजस्व के बकाया के रूप में वसूली-(1) कोई रकम, जो पोतस्वामी द्वारा धारा 8 के अधीन जारी की गई सूचना के अनुसरण में केन्द्रीय सरकार को संदेय हो, उसी रीति से वसूल की जाएगी जैसे भू-राजस्व का बकाया वसूल किया जाता है ।
(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, किसी अधिकारी को एक प्रमाणपत्र जिसमें ऐसे पोतस्वामी से शोध्य रकम विनिर्दिष्ट होगी, तैयार करने के लिए नियुक्त कर सकेगी और उस प्रमाणपत्र को उस जिला कलक्टर को भेजेगी जिसमें पोतस्वामी किसी सम्पत्ति का स्वामी है या कारबार करता है, परन्तु इस प्रकार नियुक्त अधिकारी, कलक्टर को प्रमाणपत्र भेजने के पूर्व,पोतस्वामी को सुनवाई का अवसर देगा ।
(3) कलक्टर, ऐसे प्रमाणपत्र के प्राप्त होने पर, ऐसे पोतस्वामी से प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट रकम को वसूल करने की कार्यवाही करेगा ।
16. पदाभिहित व्यक्ति को शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और ऐसी शर्तों, निर्बन्धनों और सीमाओं, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाएं, के अधीन रहते हुए या अन्यथा, [इस अधिनियमट के अधीन अपनी सभी शक्तियों और कृत्यों या उनमें से किसी को पदाभिहित व्यक्ति को प्रत्यायोजित कर सकेगी ।
(2) जहां कोई अधिसूचना उपधारा (1) के अधीन जारी की गई है, वहां इस अधिनियम के उपबन्ध पदाभिहित व्यक्ति के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे कि वे किसी ऐसे विषय की बाबत, जिसके संबंध में केन्द्रीय सरकार की शक्तियों और कृत्यों को पदाभिहित व्यक्ति को प्रत्यायोजित किया गया है, केन्द्रीय सरकार के संबंध में लागू होते हैं ।
अध्याय 4
प्रकीर्ण
17. अधिनियम का अन्य विधियों पर प्रभाव-इस अधिनियम के उपबन्ध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या किसी कंपनी के, जो पोतस्वामी है, संगम ज्ञापन या संगम अनुच्छेद या इस अधिनियम से भिन्न किसी अन्य विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाले किसी करार, विलेख या अन्य लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।
18. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, इस अधिनियम के या किसी अन्य विधि के या विधि का बल रखने वाले किसी उपबन्ध के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुई या संभाव्य किसी भी हानि या नुकसान के लिए केन्द्रीय सरकार, या केन्द्रीय सरकार या पदाभिहित व्यक्ति द्वारा नियुक्त किसी निदेशक या प्रशासक या केन्द्रीय सरकार अथवा पदाभिहित व्यक्ति के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी ।
19. निदेशकों, आदि की क्षतिपूर्ति-केन्द्रीय सरकार, धारा 10 के अधीन नियुक्त प्रत्येक निदेशक या प्रशासक और धारा 16 के अधीन नियुक्त पदाभिहित व्यक्ति की ऐसी हानियों और व्ययों के सिवाय जो उसके द्वारा जानबूझकर किए गए कार्य या व्यतिक्रम के कारण हों, ऐसी सभी हानियों और व्ययों के लिए क्षतिपूर्ति करेगी, जो उसके द्वारा अपने कर्तव्यों के निर्वहन के संबंध में उपगत किए जाते हैं ।
20. निदेशकों आदि का लोक सेवक होना-धारा 10 के अधीन नियुक्त प्रत्येक निदेशक या प्रशासक और धारा 16 के अधीन नियुक्त पदाभिहित व्यक्ति को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।
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