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विश्व भारती अधिनियम, 1951 ( Visva-Bharati Act, 1951 )


 

विश्व भारती अधिनियम, 1951

(1951 का अधिनियम संख्यांक 29)

[9 मई, 1951]

विश्व भारती" नामक संस्था को राष्ट्रीय महत्व की

संस्था घोषित करने के लिए और अध्यापन तथा

निवासीय ऐकिक विश्वविद्यालय के

रूप में उसके कार्य करने का

उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विश्व भारती अधिनियम, 1951 है

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे  

2. विश्व भारती का राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित किया जाना-पश्चिमी बंगाल के वीरभूम जिले में शान्ति निकेतन में स्वर्गीय रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा स्थापित विश्व भारती नामक संस्था के उद्देश्य ऐसे हैं कि वे उसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था बना देते हैं, अतः इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि उपर्युक्त विश्व भारती" नामक संस्था राष्ट्रीय महत्व की एक संस्था है [और इसके द्वारा एक विश्वविद्यालय के रूप में उसका गठन किया जाता है]

 [3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में और इसके अधीन बनाए गए सभी परिनियमों में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो, -

() शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द" से ऐसे प्रवर्ग के कर्मचारिवृन्द अभिप्रेत हैं जो परिनियमों द्वारा शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के रूप में अभिहित किए जाएं;

() आचार्य (चांसलर)" और उपाचार्य (वाइस-चांसलर)" से विश्वविद्यालय का आचार्य (चांसलर) और उपाचार्य (वाइस-चांसलर) अभिप्रेत है;  

() अध्यापक" के अन्तर्गत प्रोफेसर, रीडर, लैक्चरर और ऐसा कोई अन्य व्यक्ति है जो किसी अधिगम प्रक्रिया के संबंध में शिक्षा देने में लगा हुआ है और जो अध्यादेशों द्वारा अध्यापक के रूप में अभिहित किया जाए;

() भूतपूर्व छात्र संगम" से इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन गठित विश्वविद्यालय का भूतपूर्व छात्र संगम अभिप्रेत है

() अनुमोदित संस्था" से विश्वविद्यालय द्वारा उच्च शिक्षा या अध्ययन के लिए अनुमोदित कोई संस्था (जो विश्वविद्यालय द्वारा चलाई जाने वाली संस्था नहीं है) अभिप्रेत है

() भवन" से विश्वविद्यालय द्वारा चलाई जाने वाली ऐसी शैक्षणिक संस्था अभिप्रेत है जिसे इस प्रकार नामित किया जाए;  

() कैम्पस" से ऐसी इकाई अभिप्रेत है जो शिक्षा देने या अनुसंधान का पर्यवेक्षण करने या दोनों के लिए विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित या गठित की जाए

() छात्र वास" से विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों के लिए निवास की या सामूहिक जीवन की ऐसी कोई इकाई अभिप्रेत है जिसकी विश्वविद्यालय द्वारा व्यवस्था की जाती है, और जो उसके द्वारा चलाई जाती है या जो उसके द्वारा मान्यताप्राप्त है

() विभाग" से कोई अध्ययन विभाग अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत परिनियमों द्वारा या उनके अधीन स्थापित कोई अध्ययन केन्द्र है;  

() विश्वविद्यालय का कर्मचारी" से विश्वविद्यालय या किसी संस्था द्वारा नियुक्त कोई व्यक्ति अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत किसी भवन का कोई कर्मचारी है

() संस्थान बोर्ड" से किसी संस्थान के प्रबन्ध के लिए विश्वविद्यालय द्वारा गठित कोई बोर्ड अभिप्रेत है

() संस्था" से विश्वविद्यालय द्वारा चलाई जाने वाली कोई संस्था अभिप्रेत है

() कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल)" से विश्वविद्यालय की कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) अभिप्रेत है

() पाठ-समिति (बोर्ड आफ स्टडीज)" से अध्ययन के विनियमन के लिए विश्वविद्यालय द्वारा गठित कोई बोर्ड अभिप्रेत है

() विहित" से परिनियमों, अध्यादेशों या विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है

() संसद् (कोर्ट)" से विश्वविद्यालय की संसद् (कोर्ट) अभिप्रेत है

() शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल)" से विश्वविद्यालय की शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल) अभिप्रेत है

() परिनियम", अध्यादेश" और विनियम" से विश्वविद्यालय के ऐसे परिनियम, अध्यादेश और विनियम अभिप्रेत हैं जो तत्समय प्रवृत्त हैं

() विश्वविद्यालय" से विश्व भारती नामक और इस अधिनियम के अधीन विश्वविद्यालय के रूप में निगमित संस्था अभिप्रेत है ]

विश्वविद्यालय

4. निगमन-विश्वविद्यालय के प्रथम आचार्य (चान्सलर) और उपाचार्य (वाइस-चान्सलर), जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियुक्त व्यक्ति होंगे, और संस्था के प्रथम सदस्यगण और वे सभी व्यक्ति, जो आगे चलकर ऐसे अधिकारी या सदस्य बनें या नियुक्त किए जाएं, जब तक वे ऐसा पद या सदस्यता धारण किए रहते हैं, इसके द्वारा  [अध्यापन और निवासीय ऐकिक विश्वविद्यालय] के रूप में विश्व भारती नाम से निगमित निकाय के रूप में गठित किए जाते हैं, तथा उनका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी तथा इस नाम से वे वाद लाएंगे और उनके विरुद्ध वाद लाए जाएंगे  

5. विश्वविद्यालय के निगमन का कुछ मामलों में प्रभाव-इस अधिनियम के प्रारम्भ से ही, -

(i) किसी भी अधिनियमिति में उन सभी निर्देशों का, जो सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन 16 मई, 1922 को रजिस्ट्रीकृत विश्व भारती नाम की सोसाइटी के प्रति है, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे विश्वविद्यालय के प्रति निर्देश हैं

 [(ii) उक्त सोसाइटी की सभी सम्पत्ति, आस्तियां, अधिकार और दायित्व विश्वविद्यालय की सम्पत्ति, आस्तियां, अधिकार और दायित्व होंगे और इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् बनाई या निष्पादित की गई किसी ऐसी वसीयत, लिखत या अन्य दस्तावेज का, जिसमें उक्त सोसाइटी के पक्ष में कोई वसीयत, दान, न्यास, धन का संदाय है या होना तात्पर्यित है अथवा किसी अधिकार का अथवा स्थावर या जंगम सम्पत्ति का अन्तरण या समनुदेशन है या होना तात्पर्यित है, ऐसे अर्थ लगाया जाएगा मानो उसमें उक्त सोसाइटी के बजाय विश्ववि़द्यालय का नाम है;

(iii) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उक्त सोसाइटी में इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व नियोजित प्रत्येक व्यक्ति विश्वविद्यालय में उसी सेवाधृति के आधार पर और उन्हीं शर्तों और निबन्धनों पर तथा पेंशन और उपदान के बारे में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों सहित नियोजित रहेगा जैसे वह यदि यह अधिनियम पारित नहीं किया जाता तो उक्त सोसाइटी के अधीन रहता:

                परन्तु यदि विश्वविद्यालय ऐसे किसी कर्मचारी की सेवा की शर्तों और निबन्धनों में परिवर्तन करने का विनिश्चय करता है तो, उस प्रयोजन के लिए एक नई संविदा निष्पादित की जाएगी, और यदि कर्मचारी नई शर्तों और निबन्धनों के अधीन कार्य करने के लिए सहमत नहीं है तो उसकी सेवाएं उसके नियोजन की मूल संविदा के अनुसार या उसमें इस निमित्त कोई उपबन्ध नहीं किया गया है तो, उसको प्रतिकर के रूप में उसकी छह मास के वेतन के बराबर राशि संदाय करके समाप्त की जा सकेंगी

 [5. विश्वविद्यालय के उद्देश्य-(1) विश्वविद्यालय का उद्देश्य शिक्षा, अनुसंधान की सुविधाएं प्रदान करके और अपने संगठित जीवन के उदाहरण और प्रभाव द्वारा ज्ञान और समझदारी का प्रसार और अभिवृद्धि करना होगा और विश्वविद्यालय अपने क्रियाकलापों का संचालन करते समय निम्नलिखित उद्देश्यों को ध्यान में रखेगा, जिनके लिए रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा शांति निकेतन में विश्व भारती की स्थापना की गई थी जो उनके अपने शब्दों में इस प्रकार अभिव्यक्त किए गए हैं, अर्थात्: -

(i) विविध दृष्टिकोणों से सत्य के विभिन्न पहलुओं को जानने के लिए मानव मस्तिष्क का अध्ययन करना;  

(ii) विभिन्न प्राच्य संस्कृतियों के, उनकी अन्तर्निहित एकता के आधार पर, धैर्यपूर्वक अध्ययन और अनुसंधान के माध्यम से एक-दूसरे के संबंधों को और अधिक प्रगाढ बनाना

(iii) एशिया के जीवन और विचारधारा की ऐसी एकता को ध्यान में रखते हुए पाश्चात्य की ओर अग्रसर होना

(iv) प्राच्य और पश्चात्य संगम को पारस्परिक मैत्रीभाव से अध्ययन करके जानने का प्रयास करना और इस प्रकार अन्ततोगत्वा दो गोलार्धों के बीच विचारों का स्वतन्त्र आदान-प्रदान स्थापित करके विश्व-शान्ति की मौलिक परिस्थितियों को सुदृढ़ करना; और 

(v) ऐसे आदर्शों को दृष्टि में रखते हुए पूर्वोक्त शान्ति निकेतन में एक संस्कृति-केन्द्र की व्यवस्था करना, जहां पाश्चात्य संस्कृति के साथ हिन्दू, बौद्ध, जैन, इस्लाम, सिख, ईसाई और अन्य सभ्यताओं के धर्म, साहित्य, इतिहास, विज्ञान और कला में अनुसंधान और उनका अध्ययन ऐसी आडम्बर रहित सादगी के साथ किया जा सके, जो मूलवंश राष्ट्रिकता, पंथ या जाति संबंधी सभी प्रतिद्वंद्विताओं से मुक्त प्राच्य और पाश्चात्य देशों के विचारकों और विद्वानों के बीच सौहार्द्ध सुदृढ़ मैत्रीभाव और सहयोग के वातावरण में और उस महान शक्ति के नाम में, जो शान्तम् शिवम्, अद्धैतम् है, यथार्थ आध्यात्मिक अनुभूति के लिए आवश्यक है

(2) विश्वविद्यालय के उद्देश्यों के अन्तर्गत, अन्य बातों के साथ, भारत के विभिन्न प्रदेशों और विश्व के विभिन्न देशों के छात्रों को प्रवेश देकर तथा अध्यापकों की नियुक्ति करके और उसके लिए प्रोत्साहन देकर भारत, प्राच्य और पाश्चात्य देशों की संस्कृतियों में भी तादात्मय स्थापित करना होगा  

5. विश्वविद्यालय के क्रियाकलापों का संचालन करने में अनुसरण किए जाने वाले सिद्धांत-विश्वविद्यालय अपने क्रियाकलापों का संचालन करने में और अपने शैक्षणिक कार्यक्रमों को कार्यान्वित करने में रवीन्द्र नाथ टैगोर द्वारा अपने लेखों में परिकल्पित शिक्षा पद्धति का सम्यक् ध्यान रखेगा ]

 [6. विश्वविद्यालय की शक्तियां-विश्वविद्यालय की निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात्: -

(1) विद्या की ऐसी शाखाओं में, जो विश्वविद्यालय द्वारा वांछनीय समझी जाएं और साध्य पाई जाएं, अध्ययन, शिक्षण, सामाजिक रूप से लाभदायक उत्पादक कार्य और सामुदायिक सेवा और अनुसंधान के लिए तथा प्राच्य और पाश्चात्य देशों के बीच सांस्कृतिक सद्भा वना की अभिवृद्धि के लिए तथा विद्या के अभिवर्धन और ज्ञान के प्रसार के लिए साधारणतया व्यवस्था करना

(2) विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए शैक्षिक प्रयोग करना और शिक्षा की विषय-वस्तुएं, पद्धतियां और प्रणालियां विकसित करना

(3) अनुसंधान और सलाहकारी सेवाओं के लिए व्यवस्था करना और उस प्रयोजन के लिए अन्य संस्थाओं या निकायों से ऐसे ठहराव करना, जो विश्वविद्यालय आवश्यक समझे

(4) किसी अन्य विश्वविद्यालय, प्राधिकरण या विद्या-संस्था के साथ ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विश्वविद्यालय अवधारित करे, सहकार करना, सहयोग करना या सहयुक्त होना

(5) उच्चतम विद्या या अध्ययन की किसी संस्था को ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विश्वविद्यालय अवधारित करे, अनुमोदित करना और ऐसे अनुमोदन को वापस लेना

(6) विश्वविद्यालय में स्वस्थ सामूहिक जीवन के विकास के लिए समय-समय पर ऐसे भवन, अध्ययन और अनुसंधान केन्द्र, छात्रावास, व्यायामशालाएं और ऐसी अन्य संस्थाएं स्थापित करना और उन्हें चलाना, जो आवश्यक समझी जाएं तथा ऐसे किसी भवन, केन्द्र, छात्र वास, व्यायामशाला या अन्य संस्था का उत्सादन करना;

(7) भारत में किसी स्थान पर ऐसे कैम्पस, विशेष केन्द्र, विशेषित प्रयोगशालाएं या अनुसंधान और शिक्षण के लिए अन्य इकाइयां स्थापित करना, जो विश्वविद्यालय की राय में उसके उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए आवश्यक हैं

(8) कक्षा, पुस्तकालय और प्रयोगशाला अधिगम का पाठ्यक्रम के भाग के रूप में ग्रामों की समस्याओं के संबंध में उपयोजन संचालित करना

(9) प्रौढ़ शिक्षा, ग्रामीण पुनर्निर्माण, सहकारी संगठनों, समाज कल्याण, कुटीर उद्योगों के विकास तथा जनता के फायदे के लिए राष्ट्र निर्माण संबंधी सभी अन्य क्रियाकलापों और कार्यों की अभिवृद्धि करना;

(10) ऐसे परीक्षा केन्द्र स्थापित करना और ऐसे प्रमाणपत्रों को मान्यता देना जो धारा 7 के उपबन्धों को कार्यांन्वित करने के लिए आवश्यक है;

(11) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विश्वविद्यालय अवधारित करे (परीक्षा, मूल्यांकन या परीक्षण के अन्य ढंगों के आधार पर) व्यक्तियों को डिप्लोमा या प्रमाणपत्र देना और उन्हें उपाधियां या अन्य विद्या संबंधी विशिष्टताएं प्रदान करना

(12) परिनियमों द्वारा विहित रीति में सम्मानिक उपाधियां या अन्य विशिष्टताएं प्रदान करना;

(13) विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए स्तरमान और पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए प्रणालियां अवधारित करना और इन प्रणालियों के अन्तर्गत परीक्षाएं, मूल्यांकन और परीक्षण के अन्य ढंग हैं;

(14) विश्वविद्यालय के छात्रों के निवास स्थानों का पर्यवेक्षण करना तथा उनके स्वास्थ्य और साधारण कल्याण की अभिवृद्धि के लिए इंतजाम करना;

(15) छात्राओं के संबंध में ऐसे विशेष इंतजाम करना, जो विश्वविद्यालय वांछनीय समझे;  

(16) विश्वविद्यालय के छात्रों के आचरण का विनियमन करना और इस संबंध में ऐसे अनुशासन संबंधी उपाय करना, जो आवश्यक समझे जाएं

(17) ऐसे अध्यापन और अन्य शैक्षणिक पदों का सृजन करना, जो विश्वविद्यालय द्वारा अपेक्षित हों और ऐसे पदों व्यक्तियों को नियुक्त करना

(18) अभ्यागत प्रोफेसरों, प्रतिष्ठित प्रोफेसरों, फैलो, विद्वानों, निवासी कलाकारों, निवासी लेखकों या ऐसे अन्य व्यक्तियों को नियुक्त करना, जो विश्वविद्यालय के उद्देश्यों की उपलब्धि में योगदान कर सकें;

(19) विश्वविद्यालय के प्रोफेसरों, रीडरों और लैक्चररों में या अन्यथा अध्यापकों के रूप में व्यक्तियों को नियुक्त करना या उन्हें मान्यता देना;

(20) ऐसे व्यक्तियों का, जो-

() विश्वविद्यालय से सहकार, सहयोग या सहयोजन करने वाली किसी संस्था; या 

() किसी अनुमोदित संस्था

में कार्यरत है, शिक्षा देने या अनुसंधान का पर्यवेक्षण करने या दोनों के लिए अनुमोदन करना और ऐसे अनुमोदन को वापस लेना;

(21) विश्व की विभिन्न संस्कृतियों को अच्छी तरह से समझने के लक्ष्य से साहित्यिक, वैज्ञानिक, शैक्षिक और विद्वतापूर्ण कार्यों तथा कला, सौन्दर्यशास्त्र और अन्य विषयों पर पुस्तकों का प्रकाशन करना और उसके द्वारा विश्वविद्यालय के उद्देश्यों को अग्रसर करना

(22) किसी अन्य विश्वविद्यालय, संस्था या संगठन में कार्यरत व्यक्तियों को विनिर्दिष्ट अवधि के लिए विश्वविद्यालय के अध्यापकों के रूप में नियुक्त करना;

(23) विश्वविद्यालय में प्रशासनिक, अनुसचिवीय और अन्य पदों का सृजन करना और उन पर नियुक्तियां करना

(24) विश्वविद्यालय या किसी संस्था द्वारा नियोजित कर्मचारियों की सेवा के निबन्धनों और शर्तों का उपबंध करना;

(25) विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के आचरण और कर्तव्यों का विनियमन करना

(26) विश्वविद्यालय के कर्मचारियों में अनुशासन का विनियमन करना और उसका पालन करना तथा इस संबंध में ऐसे अनुशासन संबंधी उपाय करना, जो आवश्यक समझे जाएं;

(27) विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के स्वास्थ्य और साधारण कल्याण की अभिवृद्धि के लिए इंतजाम करना;

(28) फीसों और अन्य प्रभारों के संदाय की मांग करना और उसे प्राप्त करना

(29) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, पदक और पारितोषिक संस्थित करना और प्रदान करना;

(30) विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए उपकृति, संदान और दान प्राप्त करना तथा ऐसी किसी जंगम या स्थावर संपत्ति को, जिसके अन्तर्गत न्यास और विन्यास संपत्ति है, अर्जित करना, धारण करना, उसका प्रबंध करना और व्ययन करना;

(31) केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, विश्वविद्यालय की संपत्ति की प्रतिभूति पर या अन्यथा, विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए, धन उधार लेना;

(32) विश्वविद्यालय की ऐसी क्षेत्रीय सीमाओं के भीतर कैम्पस स्थापित करना, जो द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं

(33) विश्वविद्यालय की किसी परीक्षा में भारत के या भारत के बाहर के किसी अन्य विश्वविद्यालय या महाविद्यालय के छात्रों को ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए प्रवेश देना, जो विश्वविद्यालय इस प्रयोजन के लिए अधिकथित करे;

(34) ऐसे सभी कार्य और बातें करना, जो विश्वविद्यालय की सभी या किन्हीं शक्तियों के प्रयोग के लिए आवश्यक या आनुषंगिक हैं या जो विश्वविद्यालय के सभी या किन्हीं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक या सहायक हैं ]  

7. विश्वविद्यालय की क्षेत्रीय अधिकारिता-इस अधिनियम में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन विश्वविद्यालय को प्रदत्त शक्तियां उस क्षेत्र तक निर्बन्धित होंगी जो द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं   

 [7. क्षेत्रीय सीमाओं के बाहर परीक्षा केन्द्र चलाया जाना-धारा 7 में किसी बात के होते हुए भी, विश्वविद्यालय भारत में किसी भी स्थान पर अपनी लोक शिक्षा संसद् (पीपुल्स एड्यूकेशन काउंसिल) द्वारा संचालित गृह शिक्षा पाठ्यक्रम के लिए परीक्षा केन्द्रों की स्थापना कर सकेगा और उन्हें चलाएगा तथा उक्त लोक शिक्षा संसद् द्वारा संचालित परीक्षाओं के परिणाम पर दिए गए प्रमाणपत्रों को उन प्रयोजनों के लिए, जिनका अध्यादेशों में उपबन्ध किया जाए, मान्यता प्रदान कर सकेगा ]

8. विश्वविद्यालय का सभी मूलवंशों, पंथों और वर्गों के लिए खुला होना-विश्वविद्यालय सभी स्त्रियों और पुरुषों  के लिए खुला होगा चाहे वे किसी भी राष्ट्र, मूलवंश, पंथ, जाति या वर्ग के हों और सदस्यों, छात्रों, शिक्षकों और कर्मकारों को प्रवेश देने या नियुक्त करने में, या किसी अन्य बात के सम्बन्ध में, चाहे वह जो भी हो, धार्मिक विश्वास या मान्यता सम्बन्धी कोई मापदण्ड या शर्त अधिरोपित नहीं की जाएगी, किन्तु यदि विश्वविद्यालय द्वारा स्वीकृत किसी ऐसी विशिष्ट उपकृति के लिए ऐसा मापदण्ड उस उपकृति का सृजन करने वाली लिखत में शर्त के रूप में है तो उसे अधिरोपित किया जा सकेगा :

परन्तु अब से किसी ऐसी उपकृति की स्वीकृति नहीं दी जाएगी जिसमें कोई ऐसी शर्त या बाध्यता है जो विश्वविद्यालय के प्राधिकारणों की राय में इस धारा की भावना और उद्देश्यों के विपरीत है

परन्तु यह और कि इस धारा की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह ऐसी धार्मिक शिक्षा दिए जाने को रोकती है जो सम्बन्धित प्राधिकरणों द्वारा अनुमोदित रीति से उन व्यक्तियों को, जिन्होंने इसके लिए अपनी सहमति दे दी है, इस प्रयोजन के लिए सम्यक् और उचित रूप से प्राधिकृत [अध्यापकों] द्वारा दी जाए

9. विश्वविद्यालय में अध्यापन-विश्वविद्यालय में सभी अध्यापन का संचालन इस निमित्त बनाए गए परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार विश्वविद्यालय द्वारा और उसके नाम में होगा  

परिदर्शक (विजिटर)

 [10. परिदर्शक (विजिटर)-(1) भारत का राष्ट्रपति विश्वविद्यालय का परिदर्शक (विजिटर) होगा  

(2) उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबंधों के अधीन रहते हुए परिदर्शक (विजिटर) को ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा, जो वह विनिर्दिष्ट करें, विश्वविद्यालय का और उसकी इमारतों, प्रयोगशालाओं और उपस्करों का तथा किसी भवन या अन्य संस्था का और विश्वविद्यालय, भवन या अन्य संस्था द्वारा संचालित की जाने वाली परीक्षाओं या किए जाने वाले अध्यापन और अन्य कार्य का भी निरीक्षण करवाने तथा विश्वविद्यालय के प्रशासन या वित्त व्यवस्था से संबंधित किसी विषय के बारे में, उसी रीति से जांच करवाने का अधिकार होगा   

(3) परिदर्शक (विजिटर) निरीक्षण या जांच करवाने के अपने आशय की सूचना विश्वविद्यालय को देगा और विश्वविद्यालय को यह अधिकार होगा कि वह ऐसी सूचना प्राप्त होने पर, सूचना प्राप्त होने की तारीख से तीस दिन या ऐसी अन्य अवधि के भीतर जो परिदर्शक (विजिटर) अवधारित करे, परिदर्शक (विजिटर) को ऐसे अभ्यावेदन करे जो वह आवश्यक समझे  

(4) विश्वविद्यालय द्वारा किए गए अभ्यावेदनों पर, यदि कोई हों, विचार करने के पश्चात् परिदर्शक (विजिटर) ऐसा ऐसा निरीक्षण या जांच करवा सकेगा जो उपधारा (2) में निर्दिष्ट है

(5) जहां परिदर्शक (विजिटर) द्वारा कोई निरीक्षण या जांच करवाई गई है वहां विश्वविद्यालय ऐसा प्रतिनिधि नियुक्त करने का हकदार होगा जिसे ऐसे निरीक्षण या जांच में उपस्थित होने और सुने जाने का अधिकार होगा  

(6) परिदर्शक (विजिटर) ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणामों के संदर्भ में, उन पर की जाने वाली कार्रवाई के संबंध में ऐसे विचार और सलाह सहित, जो परिदर्शक (विजिटर) देना चाहे, उपाचार्य (वाइस चांसलर) को पत्र लिख सकेगा और परिदर्शक (विजिटर) का पत्र प्राप्त होने पर उपाचार्य (वाइस-चांसलर) ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणाम तथा परिदर्शक (विजिटर) के विचार और उन पर की जाने वाली कार्रवाई के संबंध में उसके द्वारा दी गई सलाह कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को तुरन्त संसूचित करेगा  

(7) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) उपाचार्य (वाइस चांसलर) के माध्यम से परिदर्शक (विजिटर) को ऐसी कार्यवाही की, यदि कोई हो, संसूचना देगी जिसके ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणामों पर किए जाने का उसका प्रस्ताव है या उसके द्वारा की गई है  

(8) जहां कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल), युक्तियुक्त समय के भीतर परिदर्शक (विजिटर) के समाधानप्रद रूप में कोई कार्रवाई नहीं करती है वहां परिदर्शक (विजिटर) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा दिए गए किसी स्पष्टीकरण या किए गए किसी अभ्यावेदन पर विचार करने के पश्चात् ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह ठीक समझे और कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) ऐसे निदेशों का अनुपालन करने के लिए बाध्य होगी  

(9) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, परिदर्शक (विजिटर), लिखित आदेश द्वारा, विश्वविद्यालय की ऐसी किसी कार्यवाही को निष्प्रभाव कर सकेगा जो इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों के अनुरूप नहीं है:

परन्तु ऐसा कोई आदेश करने से पूर्व वह विश्वविद्यालय से इस बात का हेतुक दर्शित करने के लिए कहेगा कि क्यों ऐसा आदेश किया जाए और यदि उचित समय के भीतर कोई हेतुक दर्शित कर दिया जाता है तो वह उस पर विचार करेगा  

(10) परिदर्शक (विजिटर) को ऐसी अन्य शक्तियां होंगी जो परिनियमों में विनिर्दिष्ट की जाएं ]  

प्रधान (रेक्टर)

11. प्रधान (रेक्टर)-पश्िचमी बंगाल का राज्यपाल विश्वविद्यालय का प्रधान (रेक्टर) होगा  

विश्वविद्यालय के अधिकारी

 [12. विश्वविद्यालय के अधिकारी- विश्वविद्यालय के निम्नलिखित अधिकारी होंगे, अर्थात्: -

(1) आचार्य (चांसलर);

(2) उपाचार्य (वाइस-चांसलर);

(3) अध्ययन, शैक्षिक नवोद्भावन और ग्रामीण पुनर्निर्माण निदेशक

(4) संस्कृति और सांस्कृतिक संबंध निदेशक

(5) शारीरिक शिक्षा, क्रीड़ा, राष्ट्रीय सेवा और छात्र कल्याण निदेशक

(6) कर्म-सचिव (रजिस्ट्रार); 

(7) वित्त अधिकारी (फाइनेंस आफिसर); 

(8) भवनों के अध्यक्ष; और 

(9) ऐसे अन्य अधिकारी जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के अधिकारी घोषित किए जाएं

13. आचार्य (चांसलर)- [(1) आचार्य (चांसलर), अपने पद के आधार पर, विश्वविद्यालय का प्रधान होगा  

(2) आचार्य (चांसलर) को, परिदर्शक (विजिटर) द्वारा व्यक्तियों के ऐसे पैनल में से नियुक्त किया जाएगा जो उपधारा (2) के अधीन कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा तैयार किया जाता है और जिसकी सिफारिश की जाती है

(2) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) कम से कम तीन ऐसे व्यक्तियों का, जिनमें से प्रत्येक देश के शैक्षणिक या सार्वजनिक जीवन में प्रतिष्ठित व्यक्ति होगा, और जो कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) की राय में, विश्वविद्यालय के आचार्य (चांसलर) के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए उपयुक्त और उचित व्यक्ति है, पैनल तैयार करेगी और उसकी सिफारिश करेगी

परन्तु यदि परिदर्शक (विजिटर) ऐसे पैनल में, जो कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा तैयार किया जाता है, और जिसकी सिफारिश की जाती है, विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति का अनुमोदन नहीं करता है तो वह कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) के व्यक्तियों का नया पैनल तैयार करने के लिए कह सकेगा  

(2) आचार्य (चांसलर) तीन वर्ष के लिए पद धारण करेगा और वह पुनः नियुक्ति का पात्र होगा:

परन्तु आचार्य (चांसलर) अपनी पदावधि के समाप्त हो जाने पर भी तब तक ऐसा पद धारण करता रहेगा जब तक उसका उत्तराधिकारी नियुक्त नहीं कर दिया जाता है और अपना पद ग्रहण नहीं कर लेता है

(3) यदि आचार्य (चांसलर) उपस्थित है तो वह विश्वविद्यालय के दीक्षान्त समारोह की और संसद् (कोर्ट) [तथा कर्म-समिति] (एक्जीक्यूटिव काउंसिल)] के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा  

(4) सम्मानिक उपाधि प्रदान करने का प्रत्येक प्रस्ताव आचार्य (चान्सलर) की पृष्टि के अधीन होगा  

(5) आचार्य (चान्सलर) को ऐसी अन्य शक्तियां होंगी जो उसे इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा प्रदान की जाएं  

 [14. उपाचार्य (वाइस-चांसलर) -(1) उपाचार्य (वाइस-चांसलर) को परिदर्शक (विजिटर) द्वारा ऐसी रीति से, ऐसी अवधि के लिए और ऐसी उपलब्धियों और सेवा की अन्य शर्तों पर नियुक्त किया जाएगा जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं  

(2) उपाचार्य (वाइस-चांसलर) विश्वविद्यालय का प्रधान कार्यपालक शैक्षणिक अधिकारी होगा और वह विश्वविद्यालय तथा सभी भवनों और अन्य संस्थाओं के शैक्षणिक कार्यकलापों का साधारण पर्यवेक्षण और नियंत्रण करेगा तथा विश्वविद्यालय के सभी प्राधिकरणों के विनिश्चियों को प्रभावी करेगा  

(3) यदि उपाचार्य (वाइस-चांसलर) की यह राय है कि किसी विषय में तुरन्त कार्रवाई करना आवश्यक है तो वह इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण को प्रदत्त किसी शक्ति का प्रयोग कर सकेगा और ऐसे विषय पर अपने द्वारा की गई कार्रवाई की रिपोर्ट ऐसे प्राधिकरण को देगा:

परन्तु यदि संबंधित प्राधिकरण की यह राय है कि ऐसी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी तो वह उस विषय को परिदर्शक (विजिटर) को निर्देशित कर सकेगा और उस पर उसका विनिश्चय अन्तिम होगा:

परन्तु यह और कि विश्वविद्यालय के ऐसे किसी कर्मचारी को, जो इस उपधारा के अधीन उपाचार्य (वाइस-चांसलर) द्वारा की गई कार्रवाई से व्यथित है, ऐसी कार्रवाई के विरुद्ध ऐसी तारीख से, जिसको ऐसी कार्रवाई की उसे संसूचना दी गई है, नब्बे दिन के भीतर कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को अपील करने का अधिकार होगा और तब कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) उपाचार्य (वाइस-चांसलर) द्वारा की गई कार्रवाई को पुष्ट कर सकेगी, उपान्तरित कर सकेगी या उलट सकेगी  

(4) उपाचार्य (वाइस-चांसलर) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करेगा जो परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा विहित किए जाएं

15. [अर्थ-सचिव (ट्रेजरर)]-विश्व भारती (संशोधन) अधिनियम, 1984 (1984 का 31) की धारा 10 द्वारा (8-8-1984 से) निरसित   

 [16. कर्म-सचिव (रजिस्ट्रार)-(1) कर्म-सचिव (रजिस्ट्रार) को ऐसी रीति से तथा ऐसी उपलब्धियां और सेवा की अन्य शर्तों पर नियुक्त किया जाएगा, जो परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएं

(2) कर्म-सचिव (रजिस्ट्रार) को विश्वविद्यालय की ओर से करार करने, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने और अभिलेखों को अधिप्रमाणित करने की शक्ति होगी तथा वह ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करेगा और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करने, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जांए  

17. अन्य अधिकारी-(1) आचार्य (चांलसर), उपाचार्य (वाइस-चांलसर), कर्म-सचिव (रजिस्ट्रार) से भिन्न विश्वविद्यालय के सभी अधिकारियों को ऐसी रीति से, ऐसी अवधि के लिए तथा ऐसी उपलब्धियां और सेवा की अन्य शर्तों पर नियुक्त किया जाएगा, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं  

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त अधिकारियों की शक्तियां और कृत्य वे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं

विश्वविद्यालय के प्राधिकरण

18. विश्वविद्यालय के प्राधिकरण-विश्वविद्यालय के निम्नलिखित प्राधिकरण होंगे

(1) संसद् (कोर्ट),

(2) कर्म समिति (एक्जीक्यूटिव काउन्सिल)

(3) शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउन्सिल), ॥।

 [(4) अर्थ-समिति (फाइनेंस कमेटी), 

(5) संस्थान बोर्ड; और]

 [(6)] ऐसे अन्य प्राधिकरण, जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के प्राधिकरण घोषित किए जाएं  

 [19. संसद् (कोर्ट)-(1) संसद् (कोर्ट) का गठन और उसके सदस्यों की पदावधि वह होगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए  

(2) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, संसद् (कोर्ट) की निम्नलिखित शक्तियां और कृत्य होंगे, अर्थात्: -

() विश्वविद्यालय की व्यापक नीतियों और कार्यक्रमों का समय-समय पर, पुनर्विलोकन करना, जिसके अन्तर्गत विश्वविद्यालय के स्तरमान को बनाए रखना और उसके उद्देश्यों का दृढ़ता से पालन करना है तथा विश्वविद्यालय के विकास और सुधार के लिए ऐसे उपाय सुझाना, जिन पर विश्वविद्यालय के समुचित प्राधिकरणों द्वारा विचार किया जाएगा

() विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट और वार्षिक लेखाओं तथा ऐसे लेखाओं के संबंध में उसके लेखापरीक्षकों की रिपोर्ट पर पुनर्विचार करना और संकल्प पारित करना

() ऐसे किसी विषय के संबंध में परिदर्शक (विजिटर) को सलाह देना, जो उसे सलाह के लिए निर्देशित किया जाए; और 

() ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं  

 [22. कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) -(1) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) विश्वविद्यालय का प्रधान कार्यपालक निकाय होगी  

(2) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) का गठन और उसके सदस्यों की पदावधि ऐसी होगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए

(3) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) निम्नलिखित शक्तियों का प्रयोग करेगी और कृत्यों का पालन करेगी, अर्थात्: -

() विश्वविद्यालय की आमदनी और संपत्ति का प्रबंध और प्रशासन करना और विश्वविद्यालय के ऐसे सभी प्रशासनिक कार्यकलापों का संचालन करना, जिनके लिए इस अधिनियम या परिनियमों में अन्यथा उपबंध नहीं किया गया है;

() अध्यापन और शैक्षणिक पदों का सृजन करना और विश्वविद्यालय द्वारा नियोजित प्रोफेसरों, रीडरों, लेक्चररों तथा अन्य अध्यापकों और शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के कर्तव्यों और सेवा की शर्तों को परिनिश्चित करना:

परन्तु अध्यापकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द की संख्या, अर्हताएं और उपलब्धियां अवधारित करने के पूर्व, कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल), शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल) की सिफारिशों पर विचार करेगी;  

() इस प्रयोजन के लिए गठित चयन समिति की सिफारिशों पर, ऐसे प्रोफेसरों, रीडरों, लेक्चररों तथा अन्य अध्यापकों और शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द को, जो आवश्यक समझे जाएं, नियुक्त करना और उनकी अस्थायी रिक्तियां भरना;

() अभ्यागत प्रोफेसरों, प्रतिष्ठित प्रोफेसरों, फैलो, विद्वानों, निवासी कलाकारों और निवासी लेखकों की नियुक्ति के लिए व्यवस्था करना तथा ऐसी नियुक्ति के निबंधन और शर्तें अवधारित करना;

() विश्वविद्यालय की वित्त व्यवस्था, लेखाओं, निधियों, संपत्ति, कारबार और सभी अन्य प्रशासनिक कार्यकलापों का प्रबंध और विनियमन करना तथा उस प्रयोजन के लिए ऐसे अभिकर्ता नियुक्त करना, जो वह ठीक समझे

() विश्वविद्यालय के किसी धन को, जिसके अंतर्गत कोई अनुपयोजित आय है, ऐसे स्टाकों, निधियों, शेयरों या प्रतिभूतियों में, जो वह ठीक समझे, या भारत में जंगम संपत्ति के क्रय में विनिहित करना

() ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना, जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा प्रदत्त या विनिर्दिष्ट किए जाएं ]

24. शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल)-(1) शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल) विश्वविद्यालय की  [प्रधान शैक्षणिक निकाय] होगी और इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए विश्वविद्यालय के अन्दर  [विद्या, शिक्षा, शिक्षण, मूल्यांकन और परीक्षाट के स्तर का नियंत्रण और साधारण विनियमन करेगी और उनके स्तर बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगी, तथा ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और अन्य कर्तव्यों का पालन करेगी, जो परिनियमों द्वारा उसे प्रदान किए जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं तथा उसे सभी शैक्षणिक मामलों में कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) की सलाह देने का अधिकार होगा  

(2) शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल) का गठन और उसके सदस्यों की पदावधि परिनियमों द्वारा विहित की जाएगी  

 [25. विश्वविद्यालय के अन्य प्राधिकरण-अर्थ समिति (फाइनेंस कमेटी), संस्थान, बोर्ड और ऐसे अन्य प्राधिकरणों का गठन, जिन्हें परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के प्राधिकरण घोषित किया जाए, उनकी शक्तियां और उनके कृत्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ]

26. भूतपूर्व छात्र संगम-विश्वविद्यालय का एक भूतपूर्व छात्र संगम होगा, जो विश्वविद्यालय के सभी भूतपूर्व छात्रों और भूतपूर्व कर्मकारों के लिए, जिनके अन्तर्गत भूतपूर्व विश्वविद्यालय सोसाइटी के आश्रमिक संघ के सदस्य भी हैं, ऐसी शर्तों पर खुला होगा जो परिनियमों द्वारा अधिकथित की जाएं  

परिनियम, अध्यादेश और विनियम

 [27. परिनियम-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, परिनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

() उपाचार्य (वाइस-चांसलर) की नियुक्ति की रीति, उसकी नियुक्ति की अवधि, उपलब्धियां और उसकी सेवा की अन्य शर्तें

() वे शक्तियां, जिनका प्रयोग और वे कृत्य, जिनका पालन उपाचार्य (वाइस-चासंलर) कर सकेगा;

() कर्म-सचिव (रजिस्ट्रार) की नियुक्ति की रीति, उपलब्धियां और उसकी सेवा की अन्य शर्तें तथा वे शक्तियां, जिनका प्रयोग और वे कृत्य, जिनका पालन उसके द्वारा किया जा सकेगा

() सभी अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की रीति, उनकी नियुक्ति की अवधि, उपलब्धियां और उनकी सेवा की अन्य शर्तें तथा ऐसे अधिकारियों की शक्तियां और कृत्य

() संसद् (कोर्ट) का गठन, उसके सदस्यों की पदावधि तथा उसकी शक्तियां और कृत्य

() कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) का गठन, उसके सदस्यों की पदावधि तथा उसकी शक्तियां और कृत्य

() विश्वविद्यालय के अन्य प्राधिकरणों या निकायों का गठन, उनके सदस्यों की पदावधि तथा उनकी शक्तियां और कृत्य

() उक्त प्राधिकरणों और निकायों के सदस्यों का निर्वाचन और पद पर बने रहना, सदस्यों की रिक्तियों को भरना और उन प्राधिकरणों और अन्य निकायों से संबंधित ऐसे सभी अन्य विषय, जिनके लिए उपबंध करना आवश्यक या वांछनीय है

() विश्वविद्यालयों के अध्यापकों तथा अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति तथा उनकी उपलब्धियां और सेवा की अन्य शर्तें:

 परन्तु जहां ऐसे किसी व्यक्ति को, जो कोई पद धारण कर चुका है और कोई पेंशन या अन्य प्रकार की सेवानिवृत्ति प्रसुविधाएं प्राप्त कर रहा है, विश्वविद्यालय के अध्यापक के रूप में या किसी अन्य शैक्षणिक पद पर नियुक्त किया जाता है, वहां ऐसे व्यक्ति का वेतन, और साथ ही पेंशन और अन्य प्रसुविधाएं परिनियमों के अनुसार उसे संदेय वेतन से अधिक नहीं होंगी;

() कोई संयुक्त परियोजना प्रारम्भ करने के लिए किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए किसी अन्य विश्वविद्यालय, संस्था या संगठन में कार्यरत अध्यापकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द की नियुक्ति;

() अभ्यागत प्रोफेसरों, प्रतिष्ठित प्रोफेसरों, फैलो, विद्वानों, निवासी कलाकारों और निवासी लेखकों की नियुक्ति तथा ऐसी नियुक्ति के निबंधन और शर्तें

() विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के फायदे के लिए किसी पेंशन या भविष्य निधि का गठन अथवा किसी बीमा स्कीम की स्थापना

() विश्वविद्यालय के कर्मचारियों की सेवा की ज्येष्ठता को शासित करने वाले सिद्धांत

() विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी या प्राधिकरण की कार्रवाई के विरुद्ध विश्वविद्यालय के किसी कर्मचारी या छात्र द्वारा किसी अपील या पुनर्विलोकन के लिए आवेदन के संबंध में प्रक्रिया, जिसके अंतर्गत ऐसा समय है, जिसके भीतर ऐसी अपील का पुनर्विलोकन के लिए आवेदन किया जा सकेगा;

() विश्वविद्यालय के कर्मचारियों या विश्वविद्यालय के छात्रों और विश्वविद्यालय के बीच विवादों के निपटारे के लिए प्रक्रिया

() सम्मानिक उपाधियां प्रदान करना

() अध्येतावृतियां, छात्रवृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, पदक और पारितोषिक संस्थित करना

() विश्वविद्यालय के छात्रों और कर्मचारियों में अनुशासन बनाए रखना

() भवनों, विभागों, छात्रावासों और अन्य संस्थाओं की स्थापना और उत्सादन तथा उनका प्रबंध, पर्यवेक्षण और निरीक्षण

() विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के आचरण और कर्तव्यों का तथा विश्वविद्यालय के छात्रों के आचरण का विनियमन

() कैम्पसों, विशेष केन्द्रों, विशेषित प्रयोगशालाओं या अनुसंधान और शिक्षण के लिए अन्य इकाइयों की स्थापना

() विश्वविद्यालय द्वारा न्यास के रूप में या अन्यथा प्राप्त निधियों का प्रशासन और विनियमन

() विश्वविद्यालय के अधिकारियों या प्राधिकरणों में निहित शक्तियों का प्रत्यायोजन;

() भूतपूर्व छात्र संगम का गठन और उसके क्रियाकलाप;   

() अवचार की ऐसी कोटियां, जिनके लिए इस अधिनियम या परिनियमों या अध्यादेशों के अधीन कार्रवाई की जा सकेगी; और  

() ऐसे सभी अन्य विषय, जो इस अधिनियम द्वारा उपबंधित किए जाने हैं या परिनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं

28. परिनियम कैसे बनाए जाएंगे- [(1) विश्व भारती (संशोधन) अधिनियम, 1984 के प्रारंभ पर, ऐसे प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रवृत्त परिनियम, जो उस अधिनियम द्वारा संशोधित किए जाएं, विश्वविद्यालय के परिनियम होंगे ]

 [(2) परिनियमों का संशोधन, निरसन या परिवर्धन कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा बनाए गए परिनियमों द्वारा किया जा सकेगा

(3) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण की प्रास्थिति, शक्तियों और गठन को प्रभावित करने वाले किसी परिनियम के प्रारूप का प्रस्ताव तब करेगा जब ऐसे प्राधिकरण को उस प्रस्ताव पर अपनी राय अभिव्यक्त करने का अवसर दिया गया है और इस प्रकार अभिव्यक्त कोई भी राय लिखित रूप में होगी और परिदर्शक (विजिटर) को प्रस्तुत की जाएगी  

(4) प्रत्येक नया परिनियम या किसी परिनियम में परिवर्धन अथवा किसी परिनियम का संशोधन या निरसन परिदर्शक (विजिटर) को प्रस्तुत किया जाएगा, जो उस पर अपनी अनुमति दे सकेगा या अपनी अनुमति रोक सकेगा या उसे कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को उस पर और विचार करने के लिए वापस भेज सकेगा  

(5) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा पारित परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कि परिदर्शक (विजिटर) उस पर अपनी अनुमति नहीं दे देता ]

 [29. अध्यादेशों में उपबंधित किए जाने वाले विषय-इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अध्यादेशों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

() विश्वविद्यालय में छात्रों का प्रवेश और इस रूप में उनका नामांकन

() अध्ययन प्रक्रिया का पैटर्न, विश्वविद्यालय की सभी उपाधियों, डिप्लोमाओं और प्रमाणपत्रों के लिए अधिकथित किया जाने वाला पाठ्यक्रम

() विश्वविद्यालय द्वारा दी जाने वाली उपाधियां, डिप्लोमें, प्रमाणपत्र और अन्य विद्या संबंधी विशिष्टताएं, उनके लिए अर्हताएं और उनके दिए जाने और प्राप्त किए जाने के संबंध में अपनाए जाने वाले साधन;

() विश्वविद्यालय की लोक शिक्षा संसद् (पीपुल्स एजुकेशन काउंसिल) द्वारा जिन प्रयोजनों के लिए प्रमाणपत्र दिए जाते हैं उन्हें मान्यता देना

() विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रमों के लिए तथा विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में प्रवेश और मूल्यांकन की प्रक्रियाओं, उपाधियों, डिप्लोमाओं और प्रमाणपत्रों के लिए प्रभार्य फीस;

() अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, पदक और पारितोषिक देने के लिए शर्तें

() परीक्षणों, मूल्यांकनों और परीक्षाओं का संचालन, जिनके अंतर्गत परीक्षा निकायों, परीक्षकों, अनुसीमकों और ऐसे व्यक्तियों की, जिन्हें मूल्यांकन की जिम्मेदारी सौंपी जाती है, पदावधि और उनकी नियुक्ति की रीति और उनके कर्तव्य हैं;  

() विश्वविद्यालय के छात्रों के निवास की शर्तें और छात्राओं के निवास के लिए विशेष इंतजाम, यदि कोई हों

() ऐसे विशेष इंतजाम, यदि कोई हों, जो छात्राओं के अनुशासन और अध्यापन के लिए किए जाएं और उनके लिए विशेष पाठ्यक्रम विहित करना;

() विश्वविद्यालय के कर्मचारियों के लिए परिनियमों द्वारा विहित सेवा के निबंधनों और शर्तों से भिन्न सेवा के निबंधन और शर्तें (जिनके अंतर्गत अध्यापनेतर कर्मचारिवृन्द की उपलब्धियां हैं):  

परन्तु जहां ऐसे किसी व्यक्ति को, जो कोई पद धारण कर चुका है और कोई पेंशन या अन्य प्रकार की सेवानिवृत्ति प्रसुविधाएं प्राप्त कर रहा है, विश्वविद्यालय के किसी अध्यापनेतर पद पर नियुक्त किया जाता है, वहां ऐसे व्यक्ति का वेतन और साथ ही पेंशन और अन्य प्रसुविधाएं अध्यादेशों के अनुसार उसे संदेय वेतन से अधिक नहीं होंगी

() उच्चतर विद्या की संस्थाओं के अनुमोदन के निबंधन और शर्तें तथा ऐसे अनुमोदन को वापस लेना

() अन्य विश्वविद्यालयों, प्राधिकरणों या विद्या की संस्थाओं से सहकार या सहयोग या सहयोजन की रीति

() वे निबंधन और शर्तें, जिन पर ऐसे व्यक्तियों को, जो किसी अनुमोदित संस्था से या विश्वविद्यालय के साथ सहकार, सहयोग या सहयोजन करने वाली किसी संस्था में कार्यरत हैं, अध्यापकों के रूप में अनुमोदित किया जा सकेगा और ऐसे अनुमोदन को वापस लेने के लिए निबंधन और शर्तें;

() शिक्षा संबंधी प्रयोग और ऐसे किसी अन्य निकाय का सृजन, संरचना और कार्यकरण, जो विश्वविद्यालय के शैक्षणिक जीवन को सुधारने के लिए आवश्यक समझा जाता है; और 

() ऐसे सभी अन्य विषय जो इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा उपबंधित किए जाने हैं या अध्यादेशों द्वारा उपबंधित किए जाएं  

30. अध्यादेश बनाने की शक्ति-(1) विश्व भारती (संशोधन) अधिनियम, 1984 के प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रवृत्त अध्यादेशों को कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा किसी भी समय, संशोधित, निरसित या परिवर्धित किया जा सकेगा

परन्तु धारा 29 में प्रगणित विषयों के, जो उस धारा के खंड (), (), (), () और () में प्रगणित विषयों से भिन्न हैं, संबंध में कोई अध्यादेश तभी बनाया जाएगा जब ऐसे अध्यादेश के प्रारूप की प्रस्थापना शिक्षा समिति (एकेडेमिक काउंसिल) द्वारा की जाती है  

(2) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को यह शक्ति नहीं होगी कि वह उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल) द्वारा प्रस्थापित किसी प्रारूप का संशोधन करे, किन्तु वह प्रस्थापना को अस्वीकार कर सकेगी या प्रारूप को ऐसे किन्हीं संशोधनों सहित, जिनका कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) सुझाव दे, पूर्णतः या भागतः पुनर्विचार के लिए शिक्षा-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को वापस भेज सकेगी

(3) जहां कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) ने शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल) द्वारा प्रस्थापित किसी अध्यादेश के प्रारूप को अस्वीकार कर दिया है या वापस भेज दिया है वहां शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल) उस प्रश्न पर नए सिरे से विचार कर सकेगी और यदि मूल प्रारूप को शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल) की कुल सदस्य संख्या के कम से कम आधे बहुमत द्वारा और     शिक्षा-समिति (एकेडेमिक काउंसिल) के उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पुनःअभिपुष्ट कर दिया जाता है तो प्रारूप कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को वापस भेजा दिया जाएगा जो उसे अंगीकार कर लेगी या परिदर्शक (विजिटर) को निर्देशित कर देगी और उस पर उसका विनिश्चय अंतिम होगा

(4) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश, तुरन्त प्रभावी होगा

(5) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश, कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) के अधिवेशन की तारीख से चार सप्ताह के भीतर परिदर्शक (विजिटर) को प्रस्तुत किया जाएगा और परिदर्शक (विजिटर) को यह शक्ति होगी कि वह उस अध्यादेश के प्राप्त होने के छह सप्ताह के भीतर विश्वविद्यालय को यह निदेश दे कि वह ऐसे किसी अध्यादेश के प्रवर्तन को निलम्बित कर दे और वह प्रस्थापित अध्यादेश के संबंध में अपने आक्षेप के बारे में कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को यथासंभव शीघ्र सूचित करेगा  

(6) परिदर्शक (विजिटर) विश्वविद्यालय की टीका-टिप्पणियां प्राप्त करने के पश्चात्, अध्यादेश के निलम्बन का निदेश देने वाले आदेश को वापस ले सकेगा या अध्यादेश को नामंजूर कर सकेगा और उस पर उनका विनिश्चय अंतिम होगा ]

31. विनियम-(1) विश्वविद्यालय के प्राधिकरण इस अधिनियम, इन परिनियमों और अध्यादेशों से संगत विनियम बना सकेंगे, जिनमें: -

() उनके अधिवेशनों में पालन की जाने वाली प्रक्रिया तथा गणपूर्ति के लिए अपेक्षित सदस्य संख्या का अधिकथन हो

() ऐसे समस्त विषयों के लिए उपबन्ध हो जो इस अधिनियम, इस परिनियमों या अध्यादेशों के अनुसार, विनियमों द्वारा विहित किए जाने हैं, और 

() ऐसे समस्त अन्य विषयों के लिए उपबन्ध हों जिनका सम्बन्ध केवल उनके द्वारा नियुक्त प्राधिकरणों या समितियों से हो और जिनके बारे में इस अधिनियम, इन परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा उपबन्ध किया गया हो  

(2) विश्वविद्यालय का प्रत्येक प्राधिकरण ऐसे विनियम बनाएगा जिनमें ऐसे प्राधिकरण के सदस्यों को अधिवेशनों की तारीखों की तथा उस कार्य की जिस पर अधिवेशन में विचार किया जाना हो, सूचना देने तथा अधिवेशन की कार्यवाहियों का अभिलेख रखने के लिए उपबन्ध किया जाएगा

(3) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) इस धारा के अधीन बनाए गए किसी विनियम के या, उपधारा (1) के अधीन बनाए गए किसी विनियम के ऐसी रीति से संशोधन करने का निदेश दे सकेगी जो वह विनिर्दिष्ट करे  

 [(4) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम, अध्यादेश या विनियम राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा  

(5) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम, अध्यादेश या विनियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस परिनियम, अध्यादेश और विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं, या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं कि वह परिनियम, अध्यादेश या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसा परिनियम, अध्यादेश या विनियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि, उस परिनियम, अध्यादेश या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ]

32. निवास-विश्वविद्यालय का प्रत्येक छात्र जो उसके [लोक शिक्षा संसद् (पीपुल्स एजुकेशन काउंसिल) के छात्रों से भिन्न हो,] किसी [छात्रवास] में या ऐसी शर्तों के अधीन निवास करेगा जो विनियमों और अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएं  

प्रवेश और परीक्षाएं

33. प्रवेश-विश्वविद्यालय में छात्रों का प्रवेश ऐसी रीति से किया जाएगा जो अध्यादेशों द्वारा विहित की जाए   

34. परीक्षाएं-कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) परिनियमों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए [परीक्षणों, मूल्यांकनों और परीक्षाओं] के संचालन के लिए सभी प्रबन्ध ऐसी रीति से करेगी जो अध्यादेशों द्वारा विहित की जाए

वार्षिक रिपोर्ट और लेखे

 [35. वार्षिक रिपोर्ट-(1) विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) के निदेशन में तैयार की जाएगी जिसके अंतर्गत अन्य बातों के साथ विश्वविद्यालय द्वारा भौतिक विज्ञान और सामाजिक विज्ञान में सामाजिक दृष्टि से सुसंगत अनुसंधान, कमजोर वर्गों की आवश्यकताओं के अनुकूलन विस्तारी क्रियाकलापों और विश्वविद्यालय के सामुदायिक जीवन को समग्र विश्व के सामुदायिक जीवन के साथ एकीकरण की अभिवृद्धि के लिए उठाए गए कदम हैं  

(2) इस प्रकार तैयार की गई वार्षिक रिपोर्ट ऐसी तारीख को जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए, या उसके पूर्व, संसद् (कोर्ट) को प्रस्तुत की जाएगी और उस पर संसद् (कोर्ट) द्वारा अपने वार्षिक अधिवेशन में विचार किया जाएगा  

(3) संसद् (कोर्ट) वार्षिक रिपोर्ट पर अपनी टीका-टिप्पणियां कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) और परिदर्शक (विजिटर) को संसूचित कर सकेगी

(4) उपधारा (1) के अधीन तैयार की गई वार्षिक रिपोर्ट की प्रति केन्द्रीय सरकार को भी प्रस्तुत की जाएगी, जो उसे यथाशीघ्र, संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी। 

36. वार्षिक लेखे-(1) विश्वविद्यालय के वार्षिक लेखे और तुलन-पत्र कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) के निदेशन के अधीन तैयार किया जाएंगे और उनकी लेखापरीक्षा प्रत्येक वर्ष में कम से कम एक बार और अधिक से अधिक पन्द्रह मास के अन्तराल पर, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा अथवा ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा की जाएगी, जो वह इस निमित्त प्राधिकृत करे  

(2) लेखाओं की प्रति और साथ ही लेखापरीक्षा रिपोर्ट जिनके साथ कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) के संप्रेक्षण होंगे, संसद् (कोर्ट) और परिदर्शक (विजिटर) को प्रस्तुत की जाएगी  

(3) वार्षिक लेखाओं पर परिदर्शक (विजिटर) द्वारा किए गए किसी संप्रेक्षण की ओर संसद् (कोर्ट) का ध्यान आकर्षिक किया जाएगा और संसद् (कोर्ट) के संप्रेक्षण, यदि कोई हों, कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा विचार कर लिए जाने के पश्चात्, परिदर्शक (विजिटर) को प्रस्तुत किए जाएंगे  

(4) लेखाओं की प्रति और साथ ही लेखापरीक्षा रिपोर्ट, जो परिदर्शक (विजिटर) को प्रस्तुत की जाती है, केन्द्रीय सरकार को भी प्रस्तुत की जाएगी जो उसे यथाशक्यशीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी  

(5) संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखे जाने के पश्चात् लेखापरीक्षित वार्षिक लेखा भारत के राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे ]

अनुपूरक उपबन्ध

 [37. विश्वविद्यालय के अध्यापकों का लिखित संविदा के अधीन नियुक्त किया जाना-(1) विश्वविद्यालय के किसी अध्यापक को किसी स्थायी पद पर किसी लिखित संविदा के अधीन ही नियुक्त किया जाएगा, अन्यथा नहीं और ऐसी संविदा इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों के उपबंधों से असंगत नहीं होगी  

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट संविदा विश्वविद्यालय के पास रखी जाएगी और उसकी प्रति संबंधित अध्यापक को दी जाएगी  

(3) विश्व भारती (संशोधन) अधिनियम, 1984 के प्रारंभ के पूर्व विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त किसी अध्यापक की दशा में, उसकी उपलब्धियों के संबंध में, ऐसे प्रारंभ के ठीक पूर्व प्रवृत्त संविदा, इस अधिनियम या परिनियमों या अध्यादेशों के उपबंधों से किसी असंगतता की मात्रा तक, उक्त उपबन्धों द्वारा उपांतरित की गई समझी जाएगी और जहां ऐसी कोई संविदा नहीं है और अध्यापक किसी स्थायी पद पर नियुक्त वैतनिक अध्यापक है, वहां विश्व भारती (संशोधन) अधिनियम, 1984 के प्रारंभ के छह मास की अवधि के भीतर ऐसे अध्यापक और विश्वविद्यालय द्वारा और उनके बीच लिखित संविदा निष्पादित की जाएगी  

38. माध्यस्थम् अधिकरण-(1) धारा 37 में निर्दिष्ट नियोजन की किसी संविदा से उत्पन्न किसी विवाद को, जिसके अंतर्गत इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के अननुपालन से संबंधित कोई विवाद है, अध्यापक के अनुरोध पर माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देशित किया जाएगा, जो कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) द्वारा नामनिर्देशित एक सदस्य, संबंधित अध्यापक द्वारा नामनिर्देशित एक सदस्य और परिदर्शक (विजिटर) द्वारा नामनिर्देशित ऐसे एक सदस्य से (जो अधिनिर्णायक के रूप में कार्य करेगा) मिलकर बनेगी  

(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए प्रत्येक अनुरोध के बारे में यह समझा जाएगा कि वह माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 (1940 का 10) के अर्थ में इस धारा के निबंधनों पर माध्यस्थम् के लिए निवेदन है और उस अधिनियम की धारा 2 के सिवाय इसके सभी उपबंध तदनुसार लागू होंगे

(3) यदि माध्यस्थम् अधिकरण के किसी सदस्य का पद किसी कारण से रिक्त हो जाता है तो समुचित निकाय या संबंधित व्यक्ति उस रिक्ति को भरने के लिए उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति को नामनिर्देशित करेगा और कार्यवाहियां अधिकरण के समक्ष उसी प्रक्रम से चालू रहेंगी जिस पर रिक्ति भरी जाती है

(4) माध्यस्थम् अधिकरण का विनिश्चय अन्तिम और पक्षकारों पर आबद्धकर होगा

(5) माध्यस्थम् अधिकरण को निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात्: -

() अपनी प्रक्रिया का विनियमन करना

() संबंधित अध्यापक के पुनःस्थापन का आदेश करना

() संबंधित अध्यापक के वेतन में से ऐसी आय घटाकर, जो संपत्ति से आय नहीं है, उसे ऐसा वेतन देना जिसे ऐसा अध्यापक, अपने निलम्बन की अवधि के दौरान अथवा ऐसी तारीख के, जिसको, यथास्थिति, उसे सेवा से हटाया या पदच्युत किया गया था अथवा उसकी सेवा समाप्त की गई थी, और ऐसी तारीख के, जिसको उसे पुनःस्थापित किया जाता है, बीच पड़ने वाली अवधि के दौरान प्राप्त करता:

                परन्तु ऐसी आय को, जिसे संबंधित अध्यापक प्राप्त करता, हिसाब में नहीं लिया जाएगा यदि उस समय जब ऐसी आय प्राप्त हुई थी, वह ऐसी आय प्राप्त करता यदि उसे निलंबितन किया गया होता या उसे सेवा से हटाया गया होता या पदच्युत किया गया होता या यदि उसकी सेवा समाप्त की गई होती

                (6) ऐसे किसी विषय के संबंध में, जिसे उपधारा (1) की अपेक्षानुसार माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देशित किया जाना है, किसी न्यायालय में कोई वाद या अन्य कार्यवाही नहीं होगी  

38. अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के अन्य सदस्य को निलम्बित करने की शक्ति-(1) उपाचार्य (वाइस चांसलर) किसी अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के अन्य सदस्य को, लिखित आदेश द्वारा, निम्नलिखित दशाओं में निलम्बित कर सकेगा, अर्थात्: -

() जब ऐसे अध्यापक या अन्य सदस्य के विरुद्ध कोई अनुशासनिक कार्यवाही अनुध्यात है या लम्बित है; या 

() जब किसी दांडिक अपराध के संबंध में उसके विरुद्ध कोई मामला अन्वेषण या विचारण के अधीन है  

(2) जहां उपधारा (1) के अधीन निलम्बन का कोई आदेश किया जाता है, वहां ऐसी परिस्थितियों की, जिनमें, ऐसा आदेश किया गया है, तुरंत कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को रिपोर्ट की जाएगी  

(3) यदि कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) की यह राय है कि मामले की परिस्थितियों के अनुसार निलम्बन उचित नहीं है तो वह उपधारा (2) में निर्दिष्ट रिपोर्ट की प्राप्ति की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर निलम्बन आदेश को वापस ले सकेगी  

(4) कोई व्यक्ति, जो ऐसे किसी निलम्बन आदेश से, जिसे उपधारा (3) के अधीन वापस नहीं लिया गया है, व्यथित है, उस तारीख से, जिसको ऐसा आदेश उसे संसूचित किया जाता है, तीन दिन के भीतर कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को अपील कर सकेगा और कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) उस आदेश को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्ट कर सकेगी, उपान्तरित कर सकेगी या उलट सकेगी  

38. प्राधिकरण, जो अध्यापक आदि को हटाने या पदच्युत करने का आदेश कर सकेंगे और उसके लिए                        प्रक्रिया-(1) विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त किसी अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के अन्य सदस्य को कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) से भिन्न किसी प्राधिकरण द्वारा सेवा से पदच्युत नहीं किया जाएगा या हटाया नहीं जाएगा अथवा किसी अन्य रीति दंडित नहीं किया जाएगा

(2) विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त किसी अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के अन्य सदस्य को ऐसी जांच के, जिसमें उसे उसके विरुद्ध आरोप सूचित कर दिए गए हैं और उन आरोपों के बारे में सुने जाने का उचित अवसर दे दिया गया है, पश्चात् ही सेवा से पदच्युत किया जाएगा या हटाया जाएगा अथवा किसी अन्य रीति से दंडित किया जाएगा, अन्यथा नहीं:

परन्तु जहां ऐसी जांच के पश्चात् किसी अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के किसी अन्य सदस्य पर कोई दंड अधिरोपित करने की प्रस्थापना है वहां ऐसा दंड ऐसी जांच के दौरान दिए गए साक्ष्य के आधार पर अधिरोपित किया जा सकेगा और यह आवश्यक नहीं होगा कि ऐसे अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के अन्य सदस्य को प्रस्थापित दंड के विरुद्ध अभ्यावेदन करने का अवसर दिया जाए

(3) कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल), उपधारा (2) में निर्दिष्ट कोई जांच किए बिना विश्वविद्यालय के किसी अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के अन्य सदस्य को, उस दशा में सेवा से पदच्युत करने या हटाने की हकदार होगी जहां कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) का, ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह समाधान हो जाता है कि ऐसा अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द का अन्य सदस्य

() विकृत चित्त है या मूक-बधिर है या सांसर्गिक कुष्ठ से पीड़ित है; या 

() अनुन्मोचित दिवालिया है

() नैतिक अधमता वाले किसी अपराध के लिए किसी न्यायालय द्वारा सिद्धदोष ठहराया गया है  

(4) विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त किसी अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के अन्य सदस्य का सेवा से पदच्युत किया जाना या हटाया जाना या उस पर अधिरोपित कोई अन्य दंड उस तारीख से प्रभावी होगा जिसको सेवा से पदच्युत किए जाने या हटाए जाने का आदेश किया जाता है या अन्य दंड अधिरोपित किया जाता है:  

परन्तु जहां अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द या अन्य सदस्य उस समय निलम्बनाधीन है जब उसे सेवा से पदच्युत किए जाने या हटाए जाने का आदेश किया जाता है या उस पर अन्य दंड अधिरोपित किया जाता है वहां ऐसा आदेश, यदि कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) ऐसा निदेश देती है तो उस तारीख से प्रभावी होगा जिसको उसका निलम्बन किया गया था   

(5) विश्वविद्यालय और विश्वविद्यालय द्वारा किसी अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द के अन्य सदस्य के बीच संविदा के निबंधनों के होते हुए भी, ऐसा अध्यापक या शैक्षणिक कर्मचारिवृन्द का अन्य सदस्य-

() जहां वह स्थायी है, कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को तीन मास की लिखित सूचना देकर या ऐसी सूचना के बदले विश्वविद्यालय को तीन मास का वेतन देकर; या

() जहां वह स्थायी नहीं है, कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) को एक मास की लिखित सूचना देकर या ऐसी सूचना के बदले विश्वविद्यालय को एक मास का वेतन देकर,

अपना पद त्याग सकेगा:

परन्तु यदि कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) ऐसी अनुज्ञा देती है तो, यथास्थिति, तीन मास की सूचना या एक मास की सूचना की अवधि को कम किया जा सकेगा या उसका अधित्यजन किया जा सकेगा:

परन्तु यह और कि ऐसा त्यागपत्र उस तारीख से प्रभावी होगा जिसको कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) उसे स्वीकार करती है

स्पष्टीकरण-निलम्बन" को, इस धारा के अर्थ में, दंड नहीं समझा जाएगा  

39. पेंशन और भविष्य निधि-(1) विश्वविद्यालय अपने अधिकारियों, [अध्यापकों] और अन्य सेवकों के फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, ऐसी पेंशन, बीमा और भविष्य निधियां स्थापित करेगा जो वह ठीक समझे  

(2) जहां ऐसी कोई पेंशन, बीमा या भविष्य निधि इस प्रकार स्थापित की गई है वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबन्ध ऐसी निधि को ऐसे लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्य निधि हो  

40. आकस्मिक रिक्तियों का भरा जाना-(1) इस अधिनियम और परिनियमों में किसी उपबन्ध के अधीन रहते हुए कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) परिदर्शक (विजिटर) के अनुमोदन से किसी व्यक्ति को उपाचार्य (वाइस-चान्सलर) के पद की आकस्मिक रिक्ति भरने के लिए नियुक्त करेगी और इस प्रकार नियुक्त व्यक्ति तब तक पद धारण करेगा [जब तक उसका उत्तरवर्ती अपना पदधारण नहीं कर लेता]

(2) किसी प्राधिकरण के (पदेन सदस्यों से भिन्न) सदस्यों में या विश्वविद्यालय के अन्य निकायों में आकस्मिक रिक्तियां, यथाशीघ्र सुविधानुसार ऐसे व्यक्ति या निकाय द्वारा भरी जाएंगी जिसने उस व्यक्ति को, जिसका स्थान रिक्त हुआ है, नियुक्त, निर्वाचित या सहयोजित किया था, और जो व्यक्ति आकस्मिक रिक्ति में नियुक्त, निर्वाचित या सहयोजित किया जाएगा उसकी सदस्यता की अवधि उस सदस्य की अवशिष्ट अवधि होगी, जिसका स्थान वह भरता है

 [41. विश्वविद्यालय की सदस्यता से हटाया जाना-कर्म-समिति (एक्जीक्यूटिव काउंसिल) अपने कम से कम दो तिहाई सदस्यों की सिफारिश पर किसी व्यक्ति को, यदि वह नैतिक अधमता वाले गम्भीर अपराध का दोषी रहा है या यदि वह कलंकात्मक आचारण का दोषी रहा है, तो विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या बोर्ड की सदस्यता से हटा सकेगी और उन्हीं कारणों से कोई डिग्री या डिप्लोमा वापस ले सकेगी जो किसी व्यक्ति को विश्वविद्यालय द्वारा प्रदान की गई हो:

परन्तु किसी व्यक्ति के विरुद्ध इस धारा के अधीन कोई कार्रवाई तब तक नहीं की जाएगी जब तक उसे प्रस्तावित कार्रवाई के बारे में सुनवाई का उचित अवसर नहीं दे दिया जाता ]

42. विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या निकाय के गठन के बारे में विवाद-यदि यह प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या अन्य निकाय के सदस्य के रूप में सम्यक्तः निर्वाचित या नियुक्त हुआ है या उसका सदस्य होने का हकदार है तो वह मामला परिदर्शक (विजिटर) को निर्दिष्ट किया जाएगा जिसका उस पर विनिश्चय अन्तिम होगा  

43. समितियों का गठन-जहां विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण को समितियां नियुक्त करने की शक्ति इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा दी गई है, वहां ऐसी समिति, जब तक इसके प्रतिकूल कोई विशेष उपबन्ध हो, सम्बन्धित प्राधिकरण के सदस्यों से और ऐसे अन्य सदस्यों से (यदि कोई हों) जिन्हें, प्राधिकरण प्रत्येक दशा में ठीक समझे, मिलकर बनेगी  

44. विश्वविद्यालय के प्राधिकरण की कार्यवाही का रिक्तियों के कारण अविधिमान्य होना-विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या अन्य निकाय का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि उसके सदस्यों मे कोई रिक्ति या रिक्तियां हैं  

 [44. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों के उपबंधों के अनुसरण में सद्भा वपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी या कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी  

44. विश्वविद्यालय के अभिलेख को साबित करने का ढंग-विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण या समिति की किसी रसीद, आवेदन, सूचना, आदेश, कार्यवाही या संकल्प अथवा विश्वविद्यालय के कब्जे में की अन्य दस्तावेजों अथवा विश्वविद्यालय द्वारा सम्यक् रूप से रखे गए  किसी रजिस्टर की किसी प्रविष्टि की प्रतिलिपि, यदि कर्म-सचिव (रजिस्ट्रार) प्रमाणित कर देता है, तो भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) या उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, उसमें विनिर्दिष्ट विषयों और संव्यवहारों के साक्ष्य के रूप में तब ग्रहण की जाएगी जब उसकी मूल प्रति, यदि प्रस्तुत की जाती है तो; साक्ष्य में ग्राह्य होती

45. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-यदि विश्वविद्याल की या विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण की स्थापना के सम्बन्ध में या विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण के प्रथम अधिवेशन के सम्बन्ध में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो परिदर्शक (विजिटर) उपाचार्य (वाइस-चान्सलर) के परामर्श से आदेश द्वारा कोई नियुक्ति या कोई बात कर सकेगा जो उस विश्वविद्यालय या उसके किसी प्राधिकरण की समुचित स्थापना के लिए या विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकरण के प्रथम अधिवेशन के लिए आवश्यक या समीचीन अभिप्रेत हो  

प्रथम अनुसूची

प्रथम अनुसूची-1984 के अधिनियम सं० 31 की धारा 25 द्वारा (8-8-1994 से) लोप किया गया  

द्वितीय अनुसूची

(धारा 7 देखिए)

विश्वविद्यालय की क्षेत्रीय सीमाएं

पश्चिमी बंगाल के वीरभूम जिले में शान्ति निकेतन नामक क्षेत्र जो लम्बाई चौड़ाई में [3000 हैक्टर] है और चारों और निम्नलिखित से घिरा हुआ है: -

उत्तर में, कोपाई नदी से,

पश्चिम में, बल्लवपुर और बनोरी ग्रामों से बन्दगोरा को जाने वाली लाईन से,

दक्षिण में, बन्दगोरा से बोलपुर डाक बंगला से ईस्ट इंडिया रेलवे कटिंग पर पुल तक जाने वाली लाइन से, और

पूर्व में, [पूर्वी रेल] लाइन से

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