पूर्वोत्तर परिषद् अधिनियम, 1971
(1971 का अधिनियम संख्यांक 84)
[30 दिसम्बर, 1971]
भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्रों के लिए पूर्वोत्तर
परिषद् नामक एक परिषद् स्थापित
करने का और उससे सम्बद्ध
विषयों का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बाईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पूर्वोत्तर परिषद् अधिनियम, 1971 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, किन्तु जो पूर्वोत्तर क्षेत्र (पुनर्गठन) अधिनियम, 1971 की धारा 2 के खण्ड (ख) के अधीन नियत दिन के पहले की न होगी ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) परिषद्" से धारा 3 के अधीन स्थापित पूर्वोत्तर परिषद् अभिप्रेत है;
[(ख) पूर्वोत्तर क्षेत्र" से वह क्षेत्र अभिप्रेत है जिसमें अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, [नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुराट राज्य समाविष्ट हैं ।]
3. पूर्वोत्तर परिषद् की स्थापना और संरचना- [(1) एक परिषद् होगी जिसे पूर्वोत्तर परिषद् कहा जाएगा जो निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात्: -
(i) तत्समय राज्यों के राज्यपाल के रूप में पदासीन व्यक्ति;
(ii) अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम और त्रिपुरा राज्यों के मुख्यमंत्री:
परंतु यदि खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी राज्य में, कोई मंत्रिपरिषद् न हो तो राष्ट्रपति, ऐसे राज्य में मंत्रिपरिषद् के न होने तक परिषद् में उस राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक से अनधिक व्यक्ति को नामनिर्दिष्ट कर सकेगा;
(iii) राष्ट्रपति द्वारा तीन सदस्यों को नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ।]
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, यदि राष्ट्रपति ऐसा करना आवश्यक समझे तो वह संघ के किसी मंत्री को परिषद् के सदस्य के रूप में नामनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
3[(3) राष्ट्रपति परिषद् के अध्यक्ष को नामनिर्दिष्ट करेगा ।]
(4) यदि राष्ट्रपति ऐसा करना आवश्यक समझे तो वह परिषद् के किसी एक अन्य सदस्य को परिषद् के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए नामनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
4. परिषद् के कृत्य- [(1) परिषद् पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए प्रादेशिक योजना निकाय के रूप में कृत्य करेगी ।
(2) परिषद्, पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए प्रादेशिक योजनाएं बनाते समय ऐसी स्कीमों और परियोजनाओं को पूर्विकता देगी जो दो या अधिक राज्यों को लाभ पहुंचाएगी:
परन्तु सिक्किम की दशा में, परिषद्, उस राज्य के लिए विनिर्दिष्ट परियोजनाएं और स्कीमें बनाएगी जिनमें ऐसी परियोजनाओं और स्कीमों के कार्यान्वयन का पुनर्विलोकन भी है ।]
(3) परिषद्-
(क) प्रादेशिक योजना में सम्मिलित परियोजनाओं और स्कीमों के कार्यान्वयन की समय-समय पर समीक्षा करेगी तथा ऐसी परियोजनाओं और स्कीमों के कार्यान्वयन के विषय में संबंधित राज्यों की सरकारों में समन्वय लाने के उपायों की सिफारिश करेगी;
(ख) जहां कोई परियोजना दो या अधिक राज्यों के फायदे के लिए आशियत हो वहां उस रीति के बारे में सिफारिश करेगी जिससे-
(i) ऐसी परियोजना या स्कीम का निष्पादन या कार्यान्वयन और प्रबन्ध किया जाए या उसे चालू रखा जाए; अथवा
(ii) उसके फायदों का प्रभाजन हो; अथवा
(iii) उस पर व्यय उपगत किया जाए;
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(घ) संबंधित राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार से सिफारिश करेगी कि परिषद् में प्रतिनिधित्व रखने वाले किसी राज्य में परियोजनाओं का इस दृष्टि से आवश्यक सर्वेक्षण और अन्वेषण किया जाए कि प्रादेशिक योजना में नई परियोजनाओं को सम्मिलित करने की साध्यता पर विचार सुकर हो जाए ।
(4) परिषद् समय-समय पर उन उपायों की समीक्षा करेगी जो परिषद् में प्रतिनिधित्व रखने वाले राज्यों ने उनमें सुरक्षा और लोक-व्यवस्था बनाए रखने के लिए किए हों और इस विषय में आवश्यक अन्य उपायों की सिफारिश संबंधित राज्यों की सरकारों से करेगी ।
[(5) परिषद् के पास ऐसी शक्ति होगी जो उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रत्यायोजित की जाए ।]
5. परिषद् के अधिवेशन-(1) [परिषद् के अधिवेशन वर्ष में कम-से-कम दो बार ऐसे समयों पर होंगेट जो परिषद् का अध्यक्ष इस निमित्त नियत करे तथा इस धारा के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए परिषद् अपने अधिवेशनों में कार्य करने की बाबत प्रक्रिया के उन नियमों का अनुपालन करेगी जो वह समय-समय पर अधिकथित करे ।
(2) अध्यक्ष, या उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, यदि कोई हो, तथा अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों की अनुपस्थिति में उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से चुना गया कोई अन्य सदस्य परिषद् के अधिवेशन का सभापतित्व करेगा ।
(3) परिषद् के प्रत्येक अधिवेशन की कार्यवाही केन्द्रीय सरकार को, और परिषद् में प्रतिनिधित्व रखने वाले प्रत्येक राज्य की सरकार को भी, भेजी जाएगी ।
6. परिषद् के अधिवेशनों में हाजिर होने के लिए कुछ अधिकारियों का नामनिर्देशन-परिषद् को उसके कृत्यों के निवर्हन में सहायता देने के लिए केन्द्रीय सरकार के मंत्रालयों में से प्रत्येक, जो रक्षा, वित्त, गृह कार्य, [योजना और पूर्वोत्तर क्षेत्र विकास विभाग] से संबंधित विषयों में कार्यवाही करता हो, एक अधिकारी को परिषद् के अधिवेशनों में हाजिर होने के लिए नामनिर्दिष्ट करेगा ।
7. परिषद् के अधिकारी और कर्मचारिवृन्द-(1) परिषद् का सचिवीय कर्मचारिवृन्द होगा जिसमें एक सचिव, एक योजना सलाहकार, एक वित्तीय सलाहकार, एक सुरक्षा सलाहकार तथा अन्य ऐसे अधिकारी और कर्मचारी होंगे जिनका अवधारण केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, करे ।
(2) परिषद् का सचिवीय कर्मचारिवृन्द परिषद् के अध्यक्ष के निदेशन, पर्यवेक्षण और नियंत्रण के अधीन कार्य करेगा ।
(3) परिषद् का कार्यालय उस स्थान पर होगा जो परिषद् द्वारा अवधारित किया जाए ।
(4) उक्त कार्यालय के प्रशासनिक व्यय, जिनके अन्तर्गत परिषद् के सचिवीय कर्मचारिवृन्द के सदस्यों को या उनकी बाबत संदेय वेतन और भत्ते भी हैं, केन्द्रीय सरकार द्वारा उस धन में से वहन किए जाएंगे जिसकी व्यवस्था संसद् द्वारा इस प्रयोजनार्थ की जाए ।
8. निरसन-पूर्वोत्तर परिषद् अधिनियम, 1970 (1970 का 26) एतद्द्वारा निरसित किया जाता है ।
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