नौसैनिक और वायुयान प्राइज अधिनियम, 1971
(1971 का अधिनियम संख्यांक 59)
[16 दिसम्बर, 1971]
प्राइज न्यायालय की स्थापना और प्रक्रिया का तथा उससे संबंधित
या उसके आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बाईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम नौसैनिक और वायुयान प्राइज अधिनियम, 1971 है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) वायुयान" का वही अर्थ है जो वायुसेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) की धारा 4 के खण्ड (त्त्) में दिया गया है;
(ख) वायुयान कागजपत्र" के अन्तर्गत ऐसी सब पुस्तकें, पास, पोत भाटक पत्र, वहन-पत्र, सीमाशुल्क रसीदें, माल सूची, प्रमाणपत्र, अनुज्ञप्तियां, सूचियां, टिकट, नोट, पत्र तथा अन्य दस्तावेज और लेखे हैं जो पकड़े गए वायुयान पर समर्पित किए जाएं या उसमें पाए जाएं;
(ग) सशस्त्र बल" से अभिप्रेत है सेना, नौसैना और वायुसेना अथवा उनमें से एक या अधिक का कोई भाग तथा इनके अन्तर्गत संघर्ष के दौरान सेना, नौसैना या वायुसेना की सेवा में का या उसमें नियोजित कोई अन्य सशस्त्र बल भी है;
(घ) माल" के अन्तर्गत ऐसी सब चीजें हैं जिनका प्राइज के रूप में न्यायनिर्णय किया जा सकता है, किन्तु नौसैनिक प्राइज की दशा में इसके अन्तर्गत ऐसा कोई वायुयान या नौका नहीं है जो किसी पोत के स्थोरा का भाग न हो;
(ङ) प्राइज न्यायालय" से धारा 3 के अधीन स्थापित प्राइज न्यायालय अभिप्रेत है;
(च) भारतीय नागरिक" के अन्तर्गत ऐसी कम्पनी भी है जो भारत में रजिस्ट्रीकृत है और जिसके कार्यालय का प्रधान स्थान भारत में है;
(छ) सैनिक वायुयान" से सशस्त्र बल का कोई वायुयान अभिप्रेत है और सशस्त्र बल की सेवा में का सशस्त्र वायुयान और कोई अन्य ऐसा वायुयान इसके अन्तर्गत है जिसका उपयोग संघर्ष कार्य या उसमें सहायता करने के प्रयोजनार्थ परिवहन या सहायक के रूप में या किसी अन्य रूप में किया जाता है;
(ज) प्राइज" के अन्तर्गत ऐसी कोई भी चीज है जो इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए न्यायनिर्णयन का विषय हो सकेगी और इसके अन्तर्गत कोई पोत या वायुयान और उसमें ले जाया जाने वाला माल भी है चाहे वह पोत समुद्र में पकड़ा गया हो या पत्तन में अभिगृहीत किया गया हो या चाहे वह वायुयान पकड़े जाने या अभिग्रहण के समय भूमि पर या उसके ऊपर हो या समुद्र में या उसके ऊपर हो;
(झ) पोत" के अन्तर्गत जलयान और पोत, जलयान या नाव के टैकिल, फर्नीचर और सज्जा सहित जलयान और नाव है;
(ञ) युद्ध पोत" से सशस्त्र बल का पोत अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत सशस्त्र बल की सेवा में का सशस्त्र पोत और कोई अन्य ऐसा पोत भी है जिसका उपयोग संघर्ष कार्य या उसमें सहायता करने के प्रयोजनार्थ परिवहन या सहायक के रूप में या किसी अन्य रूप में किया जाता है;
(ट) पोत के कागज" के अन्तर्गत ऐसी सब पुस्तकें, पास, तटस्थपोत विवरणपत्र, पोत भाटकपत्र, वहन-पत्र, सीमा-शुल्क रसीदें, मालसूची, प्रमाणपत्र, अनुज्ञप्तियां, सूचियां, टिकट, नोट, पत्र तथा अन्य दस्तावेज और लेखे भी हैं जो समुद्र में पकड़े या पत्तन में अभिगृहीत पोत के फलक पर समर्पित किए जाएं या पाए जाएं ।
3. प्राइज न्यायालय की स्थापना-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम द्वारा प्राइज न्यायालय को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए समय-समय पर उतने प्राइज न्यायालय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा गठित कर सकेगी जितने वह सरकार अवधारित करे और ऐसा प्रत्येक प्राइज न्यायालय ऐसे स्थानीय क्षेत्र या क्षेत्रों में, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, अधिकारिता का प्रयोग करेगा ।
(2) प्रत्येक प्राइज न्यायालय में ऐसा एक सदस्य या अधिक सदस्य होंगे जिसे या जिन्हें केन्द्रीय सरकार नियुक्त करना समय-समय पर आवश्यक समझे ।
(3) कोई व्यक्ति प्राइज न्यायालय के सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारत का नागरिक हो और या तो उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा हो या उस रूप में नियुक्त किए जाने के लिए अर्हित हो ।
(4) धारा 18 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्राइज न्यायालय के सदस्य की सेवा की शर्तें वे होंगी जो केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा अवधारित करे ।
4. प्राइज मामलों में प्राइज न्यायालयों की अधिकारिता-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, प्रत्येक प्राइज की और किसी सम्पत्ति को प्राइज के रूप में जब्तनिर्णीत करने के लिए प्रत्येक कार्यवाही की बाबत प्रत्येक प्राइज न्यायालय को अनन्य अधिकारिता उस दशा में प्राप्त होगी (चाहे वह प्राइज इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व लिया जाए या उसके पश्चात्) जब वह प्राइज, -
(क) भारत के राज्यक्षेत्र में लाया या अभिगृहीत किया जाए;
(ख) संघ से सशस्त्र बल के अस्थायी या स्थायी कब्जे या दखल किए हुए परिक्षेत्र में लाया जाए या अभिगृहीत किया जाए; अथवा
(ग) केन्द्रीय सरकार के उपयोग के लिए विनियोजित किया जाए,
और उस प्राइज न्यायालय की राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर लाया जाए:
परन्तु नौसैनिक प्राइज की दशा में प्राइज न्यायालय की केवल तब अधिकारिता होगी जब पकड़ा गया या अभिगृहीत किया गया प्राइज प्राइज न्यायालय की राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर के पत्तन या स्थान पर लाया जाए ।
(2) प्रत्येक प्राइज न्यायालय को ऐसे प्राइज की बाबत भी अनन्य अधिकारिता होगी जब कि प्राइज सम्पत्ति-
(क) खो जाए या पूर्ण रूप से नष्ट हो जाए; अथवा
(ख) अपनी प्रकृति और दशा के कारण न्यायनिर्णयन के लिए न लाई जा सकती हो ।
(3) उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राइज न्यायालय सब पकड़े गए या अभिगृहीत किए गए पोतों, जलयानों, वायुयानों और माल को पकड़ने, अभिगृहीत करने, प्राइज के तौर पर लेने और प्रतिशोधवश लेने के सब प्रकार के मामलों का संज्ञान करेगा और उनके विषय में न्यायिक कार्यवाही करेगा, और उनकी सुनवाई तथा उनका अवधारण करेगा और किसी देश या राज्य के या उनके राष्ट्रिकों, नागरिकों या प्रजा के ऐसे सब पोतों, जलयानों, वायुयानों और माल को, जो युद्ध में प्राइज के रूप में या सशस्त्र संघर्ष के दौरान प्रतिशोधवश या आत्मरक्षा के अधिकार के प्रयोग में पकड़े जाएं या अभिगृहीत किए जाएं इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार न्यायनिर्णीत और जब्तनिर्णीत करेगा ।
(4) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, प्राइज न्यायालय किसी ऐसे विषय की बाबत, जिसके लिए इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन कोई उपबन्ध न किया गया हो या अपर्याप्त उपबन्ध किया गया हो, उस विषय का विनियमन करने वाली अंतर्राष्ट्रीय विधि के सिद्धांत लागू कर सकेगा ।
5. मामलों का अन्तरण-(1) जहां किसी पोत, वायुयान या माल के विरुद्ध कोई कार्यवाही किसी प्राइज न्यायालय में लंबित हो वहां प्रइज न्यायालय उस कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम पर केन्द्रीय सरकार के समुचित अधिकारी द्वारा आवेदन किए जाने पर और अपना यह समाधान हो जाने पर कि कार्यवाही जहां तक उसका सम्बन्ध उस पोत, वायुयान, या माल या उसके किसी भाग से है, किसी अन्य प्राइज न्यायालय में अधिक सुविधापूर्वक की जा सकती है, वहां प्राइज न्यायालय आदेश कर सकेगा कि, यथास्थिति, कार्यवाही, अथवा कार्यवाही जहां तक कि उसका सम्बन्ध पोत, वायुयान, या माल से या माल के किसी भाग से है, उस अन्य प्राइज न्यायालय को भेज दी जाए ।
(2) जहां कोई कार्यवाही किसी अन्य प्राइज न्यायालय को इस प्रकार भेजी जाए वहां उस प्राइज न्यायालय को उस विषय में कार्यवाही करने की अधिकारिता होगी मानो, यथास्थिति, उस कार्यवाही की विषयवस्तु उसकी अधिकारिता में मूलतः अभिगृहीत की गई हो या पकड़े जाने या अभिगृहीत किए जाने के बाद वहां लाई गई हो और कार्यवाही को भेजने के आदेश के पूर्व उस कार्यवाही में किया गया कोई आदेश या की गई कोई बात उस न्यायालय द्वारा या उसमें किया गया या की गई समझी जाएगी ।
6. अपीलें-(1) प्राइज न्यायालय के आदेश या डिक्री से व्यथित कोई व्यक्ति उस आदेश या डिक्री के किए जाने की तारीख से 90 दिन की कालावधि के भीतर केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकेगा ।
(2) परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) की धारा 5 और 12 के उपबन्ध उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट कालावधि की संगणना को यावत्शक्य लागू होंगे ।
7. प्राइज न्यायालयों की साधारण शक्तियां-(1) प्राइज न्यायालय को इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ निम्नलिखित विषयों की बाबत वहीं शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -
(क) व्यक्तियों को समन करना और हाजिर कराना तथा उनकी शपथ पर परीक्षा करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथ-पत्र पर साक्ष्य लेना;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय में से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपियों को तलब करना;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;
(च) कोई अन्य विषय जो नियमों द्वारा विहित किया जाए ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रत्येक प्राइज न्यायालय को शक्ति होगी कि वह निम्नलिखित को प्रवर्तित करे-
(क) इस अधिनियम के अधीन प्राइज कार्यवाही में पारित किसी अन्य प्राइज न्यायालय का कोई आदेश या डिक्री;
(ख) धारा 6 के अधीन प्राइज अपील में पारित केन्द्रीय सरकार का कोई आदेश ।
8. प्राइज के पकड़ने पर प्रक्रिया-(1) प्राइज के रूप में लिया गया तथा प्राइज न्यायालय की अधिकारिता के भीतर पत्तन या स्थान में लाया गया प्रत्येक पोत और प्रत्येक वायुयान, उसके माल में से कुछ भी निकाले बिना, न्यायालय के मार्शल को तुरन्त परिदत्त कर दिया जाएगा ।
(2) यदि ऐसा मार्शल न हो तो पोत या वायुयान उसी रीति से ऐसे व्यक्ति को परिदत्त किया जाएगा जिसे केन्द्रीय सरकार इस निमित्त नियुक्त करे ।
(3) पोत या वायुयान न्यायालय के आदेश के अधीन रहते हुए, मार्शल अथवा उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किए गए व्यक्ति की अभिरक्षा में रहेगा ।
9. पोत और वायुयान के कागजपत्रों का रजिस्ट्री में लाया जाना-(1) पकड़ने वाले, पोत या वायुयान के प्राइज न्यायालय की अधिकारिता के भीतर के पत्तन या स्थान में लाए जाने के पश्चात् सुविधानुसार शीघ्रता के साथ, यथास्थिति, पोत के कागजपत्र या वायुयान के कागजपत्र प्राइज न्यायालय की रजिस्ट्री में लाएंगे ।
(2) पकड़ने वाले पोत या वायुयान का कमान अधिकारी या कप्तान या पकड़ने वाले बल का कमान अधिकारी या किसी पतन या हवाई अड्डे पर पोत या वायुयान या अभिग्रहण करने वाला कोई अन्य अधिकारी या व्यक्ति अथवा कमान अधिकारी या उसके वरिष्ठ अधिकारी द्वारा प्राइज अधिकारी के रूप में पदाभिहित कोई अधिकारी या अन्य ऐसा अधिकारी या व्यक्ति जो पकड़ने के समय उपस्थित था और जिसने पोत के कागजपत्र या वायुयान के कागजपत्र, फलक पर समर्पित किए जाते हुए या पाए जाते हुए देखे शपथ पर कथन करेगा कि वे कपट, घटबढ़ या परिवर्तन के बिना उसी दशा में लाए गए हैं जिसमें वे लिए गए अथवा वह पोत के कागजपत्रों या वायुयान के कागजपत्रों के या उनमें से किसी के अभाव या परिवर्तित दशा का लेखाजोखा प्राइज न्यायालय को समाधान प्रदान करने वाले रूप में शपथ पर देगा ।
(3) जहां कोई पोत के कागजपत्र या वायुयान के कागजपत्र पकड़े गए पोत या पकड़े गए वायुयान के फलक पर समर्पित न किए गए हों या न पाए गए हों वहां पकड़ने वाले पोत या वायुयान का कमान अधिकारी या कप्तान या पकड़ने वाले बल का कमान अधिकारी या पोत या वायुयान का अभिग्रहण करने वाला अन्य अधिकारी या व्यक्ति या प्राइज अधिकारी या अन्य ऐसा अधिकारी या व्यक्ति जो पकड़ने के समय उपस्थित था, उस आशय का शपथ पर कथन करेगा ।
10. माल-धारा 8 और 9 के पोतों और वायुयानों से सम्बन्धित उपबन्ध पोत या वायुयान से प्राइज के रूप में लिए गए माल पर भी यावत्शक्य विस्तारित और उसको लागू होंगे और प्राइज न्यायालय निदेश दे सकेगा कि ऐसा माल उतारा जाए, उसकी तालिका बनाई जाए और उसे भाण्डागार में रखा जाए ।
11. झुफ-जहां किसी विदेशी राज्य का समुद्र पर चलता हुआ पोत या किसी विदेशी राज्य का वायुयान जो, शत्रु के नियन्त्रण में के किसी स्थान को ले जाए जाने के लिए आशयित सैनिक सामान या रसद से लदा हो, ऐसी परिस्थितियों में पकड़ा जाए कि वह प्राइज के रूप में न्यायनिर्णयन का विषय बने और भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन लाया जाए और उक्त सरकार को यह प्रतीत हो कि प्राइज न्यायालय में उसके जब्तनिर्णीत किए गए बिना ऐसे सामान को केन्द्रीय सरकार के सेवार्थ खरीदना समीचीन है वहां केन्द्रीय सरकार अपने लेखे या अपनी सेवा के लिए ऐसे सभी सामान की या उसमें से किसी को खरीद सकेगी ।
12. प्राइज कार्यवाहियों का शत्रु के युद्ध पोतों और सैनिक वायुयान को लागू न होना-इस अधिनियम की कोई बात शत्रु के युद्ध पोत या सैनिक वायुयान को या शत्रु के स्वामित्व के किसी अन्य पोत या वायुयान को या शत्रु के राज्यक्षेत्र में रजिस्ट्रीकृत किसी वायुयान या पोत को या उसमें ले जाए जाने वाले माल को लागू न होगी और ऐसे युद्ध पोत या सैनिक वायुयान या अन्य पोत या वायुयान या उनमें ले जाए जाने वाले माल को जब्तनिर्णीत करने के लिए प्राइज की कोई कार्यवाही आवश्यक न होगी ।
13. पकड़ी गई सामग्री पर केन्द्रीय सरकार का स्वामित्व-(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, संघ के सशस्त्र बल द्वारा पकड़े गए और जहां आवश्यक हो वहां प्राइज न्यायालय द्वारा जब्तनिर्णीत सब प्राइज अनन्य रूप से केन्द्रीय सरकार की सम्पत्ति होंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार प्राइज के आगमों में से ऐसी धनराशि, जो वह ठीक समझे, संघ के सशस्त्र बल को उपकारी निधि में स्वविवेकानुसार अनुदत्त कर सकेगी ।
14. प्राइज उद्धारण-(1) जहां किसी भारतीय नागरिक का कोई पोत या माल या वायुयान शत्रु द्वारा प्राइज के रूप में लिए जाने के पश्चात् शत्रु से पुनः ले लिया जाए वहां वह प्राइज न्यायालय की डिक्री से उसके स्वामी को तब वापस कर दिया जाएगा जब वह केन्द्रीय सरकार को प्राइज न्यायालय द्वारा डिक्रीत और अभिनिश्चित किए जाने वाले प्राइज के मूल्य का 1/8 भाग अथवा प्राइज के प्राक्कलित मूल्य के 1/8 भाग से अनधिक राशि जिसका स्वामी और केन्द्रीय सरकार के बीच करार हो और जो प्राइज न्यायालय के आदेश द्वारा अनुमोदित हो, दे :
परन्तु जहां पुनः पकड़ने का कार्य विशेष कठिनाई या खतरे की परिस्थितियों में किया जाए वहां यदि प्राइज न्यायालय ठीक समझे तो वह केन्द्रीय सरकार को प्राइज के मूल्य के 1/8 से अधिक किन्तु किसी भी दशा में 1/4 से अधिक भाग प्राइज उद्धारण के रूप में अधिनिर्णीत कर सकेगा:
परन्तु यह और कि जहां इस प्रकार लिए जाने के पश्चात् कोई पोत या वायुयान शत्रु द्वारा युद्ध पोत या सैनिक वायुयान के रूप में रखा या उपयोग में लाया जाए वहां वापसी का पूर्वोक्त उपबन्ध लागू नहीं होगा तथा स्वामी को ऐसा प्रतिकर देकर, जो प्राइज न्यायालय अवधारित करे, ऐसे पोत या वायुयान का स्वामित्व केन्द्रीय सरकार में निहित हो जाएगा ।
(2) जहां किसी भारतीय नागरिक का कोई पोत प्राइज के रूप में लिए जाने के पश्चात् शत्रु से वापस ले लिया जाए वहां ऐसा पोत पुनः पकड़ने वालों की सम्मति से अपनी यात्रा पर आगे बढ़ सकेगा और केन्द्रीय सरकार के लिए यह आवश्यक न होगा कि न्यायनिर्णयन की कार्यवाही उसके भारत में के किसी पत्तन पर लाए जाने के पूर्व करे ।
(3) पोत का मास्टर या स्वामी या उसका अभिकर्ता किसी पोत के फलक के माल को न्यायनिर्णयन के पूर्व केन्द्रीय सरकार की सम्मति से उतार सकेगा और व्ययनित कर सकेगा ।
(4) यदि पोत भारत में के किसी पत्तन पर छह मास के भीतर वापस न आए तो भी केन्द्रीय सरकार उस पोत या माल के सम्बन्ध में प्राइज न्यायालय में कार्यवाही संस्थित कर सकेगी और तब प्राइज न्यायालय यथापूर्वोवत प्राइज उद्धारण अधिनिर्णीत कर सकेगा और उसका संदाय करा सकेगा ।
(5) उपधारा (2), (3) और (4) के उपबन्ध किसी भारतीय नागरिक के वायुयान को भी प्राइज के रूप में लिए जाने के पश्चात् फिर शत्रु से ले लिया गया हो यथावश्यक परिवर्तनों सहित लागू होंगे ।
15. प्राइज की बाबत अपराध-प्रत्येक व्यक्ति, जो किसी प्राइज अपराध का दोषी हो, अर्थात् ऐसे अपराध का दोषी हो जो नौसैनिक विधि के अध्यधीन व्यक्ति द्वारा किए जाने पर नौसैना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) की धारा 63, धारा 64, धारा 65, धारा 66 या धारा 67 के अधीन दण्डनीय हो, कारावास से, जो दो वर्ष तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
16. विधिक कार्यवाहियों से संरक्षण-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए संघ के सशस्त्र बल के किसी अधिकारी या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने आशयित किसी बात से कारित या सम्भाव्य किसी नुकसान के लिए केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध न होगी ।
17. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, प्राइज न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया के विनियमन के लिए तथा साधारणतः इस अधिनियम के प्रयोजनों के कार्यान्वयन के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों के लिए या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) वादों का संस्थित किया जाना, रिटों, समनों या अन्य आदेशिकाओं का जारी किया जाना तथा उनकी तामील, और हाजिर होना तथा दावे करना;
(ख) पोत के कागजपत्र या वायुयान के कागजपत्र से सम्बन्धित शपथपत्र और अन्य शपथपत्र जो प्राइज न्यायालय में या प्राइज न्यायालय की कार्यवाही के प्रयोजनार्थ दिए जाने हैं या दिए जा सकते हैं;
(ग) अभिवचन, विशिष्टियां, दस्तावेजों और तथ्यों का प्रकटीकरण और निरीक्षण, साक्ष्य और सुनवाई;
(घ) प्राइज की गिरफ्तारी और प्राइज को रोक रखने के लिए वारण्ट जारी करना;
(ङ) प्राइज का विक्रय, मूल्यांकन, सुरक्षित अभिरक्षा और निरीक्षण;
(च) जमानत और छोङना;
(छ) प्राइज न्यायालय की अभिरक्षा में के पोत, वायुयान या माल का केन्द्रीय सरकार द्वारा तलब किया जाना;
(ज) असेसरों की नियुक्ति और उनकी फीसें;
(झ) डिक्रियों और आदेशों का प्रवर्तन और निष्पादन;
(ञ) कार्यवाहियों को रोकना;
(ट) प्राइज न्यायालय में की कार्यवाहियों के या उनके आनुषंगिक खर्चे और उनमें की कार्यवाहियों की बाबत ली जाने वाली फीसें तथा खर्चों की प्रतिभूति लिया जाना;
(ठ) अपीलों की सुनवाई की प्रक्रिया तथा अपीलों से सम्बन्धित अन्य विषय;
(ड) प्राइज न्यायालय के अधिकारियों की नियुक्ति, उनके कर्तव्य और आचरण और उसमें अर्जीदारों को दिलाए जाने वाले खर्चें, प्रभार और व्यय;
(ढ) वह रीति जिससे और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए किसी पोत या वायुयान या उस पर के माल को देखने, उसकी तलाशी लेने, उसे रोक रखने या पकड़ने के अधिकार का प्रयोग किया जा सकेगा तथा ऐसे किसी अधिकार के प्रयोग में अड़चन डालने के लिए शास्ति;
(ण) वह रीति जिससे संघ के सशस्त्र बल के किसी अधिकारी द्वारा उसके प्राधिकार के अधीन अभिगृहीत किसी पोत या वायुयान या माल को अभिरक्षा में रखा जाएगा या व्ययनित किया जाएगा;
(त) किसी पोत, वायुयान या उस पर के स्थोरा को शत्रु का घोषित करने के लिए और जब्तनिर्णीत करने के लिए शर्तें;
(थ) वह रीति जिससे शत्रु से पुनः पकड़े गए पोत या वायुयान का व्ययन किया जा सकेगा;
(द) वे शर्तें जिन पर कि भारत के राज्यक्षेत्र के किसी पोत या वायुयान को संघर्ष या सशस्त्र संघर्ष को प्रारम्भ हो जाने पर पारस्परिकता के आधार पर निर्बाध मार्ग का अधिकार दिया जा सकेगा;
(ध) कोई अन्य विषय जो नियमों द्वारा विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जा सकता है ।
[(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
18. प्राइज न्यायालय का विघटन-केन्द्रीय सरकार ऐसे किसी समय जब प्राइज न्यायालय के समक्ष कोई भी कार्यवाही लंबित न हो उस प्राइज न्यायालय को विघटित कर सकेगी और उस न्यायालय के अभिलेखों की अभिरक्षा के सम्बन्ध में ऐसे आदेश कर सकेगी जो आवश्यक समझे जाएं ।
19. निरसन-नेवल प्राइज ऐक्ट, 1864, नेवल एजेन्सी एण्ड डिस्ट्रिब्यूशन ऐक्ट, 1864, प्राइज कोट्र्स ऐक्ट, 1894, प्राइज कोट्र्स प्रोसीजर ऐक्ट, 1914, प्राइज कोट्र्स ऐक्ट 1915, नेवल प्राइज ऐक्ट, 1918 और प्राइज ऐक्ट, 1939, जहां तक वे भारत को लागू होते हैं, एतद्द्वारा निरसित किए जाते हैं ।
20. व्यावृत्ति-इस अधिनियम की कोई बात-
(क) भारतीय नौसैनिक पोतों के अधिकारियों या नाविकों को या भारतीय सैनिक वायुयान के अधिकारियों और वायुसैनिकों को अथवा प्राइज को पकड़ने से सम्बन्धित किसी अन्य व्यक्ति को प्राइज के रूप में लिए गए किन्ही पोतों, वायुयान या माल या उसके आगमों में कोई अधिकार या दावे का हक प्रदान नहीं करेगी; अथवा
(ख) किसी विदेशी राज्य से किसी विद्यमान संधि या अभिसमय के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी;
(ग) किसी विदेशी राज्य के साथ कोई संधि या अभिसमय करने की जिसमें ऐसा कोई अनुबन्ध हो जिसे केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम से सम्बन्धित किसी विषय के बारे में समुचित समझे, केन्द्रीय सरकार की शक्ति को न लेगी और न कम करेगी ।
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