राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग अधिनियम, 2004
(2005 का अधिनियम संख्यांक 2)
[6 जनवरी, 2005]
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग का
गठन करने और उससे संबंधित या उसके
आनुषंगिक विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के पचपनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग अधिनियम, 2004 है ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह 11 नवम्बर, 2004 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) किसी महाविद्यालय के संबंध में, सहबद्धता" के अंतर्गत, उसके व्याकरणिक रूपभेदों सहित, ऐसे महाविद्यालय की किसी । । । विश्वविद्यालय द्वारा मान्यता, उसके साथ ऐसे महाविद्यालय का सहयोजन और उसके विशेषाधिकारों के लिए ऐसे महाविद्यालय का प्रवेश है;
[(कक) समुचित सरकार" से अभिप्रेत है, -
(i) संसद् के किसी अधिनियम के अधीन अपने अध्ययन कार्यक्रमों का संचालन करने के लिए मान्यताप्राप्त किसी शैक्षणिक संस्था के संबंध में, केंद्रीय सरकार; और
(ii) किसी राज्य अधिनियम के अधीन अपने अध्ययन कार्यक्रमों का संचालन करने के लिए मान्यताप्राप्त किसी अन्य शैक्षणिक संस्था के संबंध में, कोई ऐसी राज्य सरकार, जिसकी अधिकारिता में ऐसी संस्था स्थापित है;];
। । । । । ।
(ग) आयोग" से धारा 3 के अधीन गठित राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग अभिप्रेत है;
2[(गक) सक्षम प्राधिकारी" से अल्पसंख्यकों द्वारा अपनी पसंद की कोई शैक्षणिक संस्था स्थापित करने के लिए अनापत्ति प्रमाणपत्र देने के लिए समुचित सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी अभिप्रेत है;];
(घ) उपाधि" से ऐसी कोई उपाधि अभिप्रेत है जो केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए;
2[(घक) अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों" से अल्पसंख्यकों की अपनी रुचि की शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित और प्रशासित करने के अधिकार अभिप्रेत हैं;];
(ङ) सदस्य" से आयोग का कोई सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत अध्यक्ष है;
(च) अल्पसंख्यक" से इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए वह समुदाय अभिप्रेत है जो केंद्रीय सरकार द्वारा उस रूप में अधिसूचित किया जाए;
[(छ) अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था" से ऐसा कोई महाविद्यालय या शैक्षणिक संस्था अभिप्रेत है, जो किसी अल्पसंख्यक या अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित और प्रशासित हो;]
(ज) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(झ) अर्हता" से किसी विश्वविद्यालय द्वारा दी गई कोई उपाधि या कोई अन्य अर्हता अभिप्रेत है;
। । । । । ।
(ट) तकनीकी शिक्षा" का वही अर्थ है जो उसका अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् अधिनियम, 1987 (1987 का 52) की धारा 2 के खंड (छ) में है;
(ठ) विश्वविद्यालय" से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 2 के खंड (च) के अधीन परिभाषित कोई विश्वविद्यालय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत उस अधिनियम की धारा 3 के अधीन विश्वविद्यालय समझी जाने वाली कोई संस्था या उपाधि प्रदान करने या देने के लिए संसद् के किसी अधिनियम द्वारा विनिर्दिष्ट रूप से सशक्त कोई संस्था भी है ।
अध्याय 2
राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग
3. राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग का गठन-(1) केंद्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, राष्ट्रीय अल्पसंखयक शैक्षणिक संस्था आयोग के नाम से ज्ञात एक निकाय का, इस अधिनियम के अधीन उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने और उसे समनुदिष्ट कृत्यों का पालन करने के लिए, गठन करेगी ।
(2) आयोग, एक अध्यक्ष और [तीन सदस्यों] से मिलकर बनेगा, जिन्हें केंद्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ।
4. अध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) कोई व्यक्ति, अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिए, तभी अर्हित होगा जब वह, -
(क) किसी अल्पसंख्यक समुदाय का सदस्य है; और
(ख) किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश रहा है ।
(2) कोई व्यक्ति, सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए, तभी अर्हित होगा जब वह, -
(क) किसी अल्पसंख्यक समुदाय का सदस्य है; और
(ख) विख्यात, योग्य और ईमानदार व्यक्ति है ।
5. अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि और सेवा की शर्तें-(1) प्रत्येक सदस्य उस तारीख से, जिसको वह पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा ।
(2) कोई सदस्य, केंद्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा किसी भी समय, यथास्थिति, अध्यक्ष या सदस्य के पद को त्याग सकेगा ।
(3) केंद्रीय सरकार सदस्य के पद से किसी व्यक्ति को हटा देगी यदि वह व्यक्ति, -
(क) अनुन्मोचित दिवालिया हो जाता है;
(ख) किसी ऐसे अपराध के लिए, जिसमें केंद्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अन्तर्वलित है, सिद्धदोष और कारावास से दंडादिष्ट किया जाता है;
(ग) विकृतचित हो जाता है और किसी सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित किया जाता है;
(घ) कार्य करने से इंकार करता है या कार्य करने में असमर्थ हो जाता है;
(ङ) आयोग से अनुपस्थित रहने की इजाजत लिए बिना आयोग के लगातार तीन अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है; या
(च) केंद्रीय सरकार की राय में अध्यक्ष या सदस्य के पद का ऐसा दुरुपयोग करता है जिससे उस व्यक्ति का पद पर बना रहना लोकहित में अहितकर हो गया है:
परंतु कोई व्यक्ति इस खंड के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक उसे उस मामले में सुनवाई का उचित अवसर न दे दिया गया हो ।
(4) उपधारा (2) के अधीन या अन्यथा होने वाली कोई रिक्ति नए नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और इस प्रकार नामनिर्देशित व्यक्ति उस पदावधि की अनवसित अवधि के लिए पद धारण करेगा जिसके लिए उसका पद पूर्ववर्ती, यदि ऐसी रिक्ति न हुई होती तो, पद धारण करता ।
(5) अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं ।
6. आयोग के अधिकारी और अन्य कर्मचारी-(1) केंद्रीय सरकार आयोग के लिए एक सचिव और उतने अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की व्यवस्था करेगी, जितने इस अधिनियम के अधीन आयोग के कृत्यों का दक्षतापूर्ण पालन करने के लिए आवश्यक हों ।
(2) आयोग के प्रयोजन के लिए नियुक्त सचिव, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।
7. वेतन और भत्तों का अनुदानों में से संदाय किया जाना-अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा प्रशासनिक व्यय, जिनके अंतर्गत धारा 6 में निर्दिष्ट सचिव, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन भी हैं धारा, 14 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट अनुदानों में से संदत्त किए जाएंगे ।
8. रिक्तियों आदि से आयोग की कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-आयोग के किसी कार्य या कार्यवाही को आयोग में किसी रिक्ति के होने या उसके गठन में किसी त्रुटि के आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा और न ही वह अविधिमान्य होगी ।
9. प्रक्रिया का आयोग द्वारा विनियमित किया जाना-(1) आयोग का अधिवेशन आवश्यकतानुसार ऐसे समय और स्थान पर होगा जो अध्यक्ष ठीक समझे ।
(2) आयोग अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करेगा ।
(3) आयोग के सभी आदेश और विनिश्चय सचिव द्वारा या इस निमित्त सचिव द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत आयोग के किसी अन्य अधिकारी द्वारा अधिप्रमाणित किए जाएंगे ।
[अध्याय 3
अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था का अधिकार
10. अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था की स्थापना करने का अधिकार- [(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अन्तर्विष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई व्यक्ति, जो अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था की स्थापना करना चाहता है, उक्त प्रयोजन के लिए अनापति प्रमाणपत्र दिए जाने के लिए सक्षम प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगा ।]
(2) सक्षम प्राधिकारी, -
(क) दस्तावेजों, शपथपत्रों या अन्य साक्ष्य, यदि कोई हो, का परिशीलन करने पर; और
(ख) आवेदक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्,
उपधारा (1) के अधीन फाइल किए गए प्रत्येक आवेदन का, यथासंभव शीघ्रता से, विनिश्चय करेगा और आवेदन को, यथास्थिति, मंजूर या नामंजूर करेगा:
परन्तु जहां किसी आवेदन को नामंजूर किया जाता है, वहां सक्षम प्राधिकारी उसकी संसूचना आवेदक को देगा ।
(3) जहां उपधारा (1) के अधीन अनापति प्रमाणपत्र देने के लिए आवेदन की प्राप्ति से नब्बे दिन की अवधि के भीतर-
(क) सक्षम प्राधिकारी ऐसा प्रमाणपत्र नहीं देता है; या
(ख) जहां कोई आवेदन नामंजूर कर दिया जाता है और उसकी संसूचना उस व्यक्ति को, जिसने ऐसा प्रमाणपत्र दिए जाने के लिए आवेदन किया है, नहीं दी जाती है,
वहां यह समझा जाएगा कि सक्षम प्राधिकारी ने आवेदक को अनापत्ति प्रमाणपत्र दे दिया है ।
(4) आवेदक, अनापत्ति प्रमाणपत्र दे दिए जाने पर या जहां सक्षम प्राधिकारी के बारे में यह समझा गया है कि उसने अनापत्ति प्रमाणपत्र दे दिया है वहां, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन अधिकथित किए गए, यथास्थिति, नियमों और विनियमों के अनुसार अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था की स्थापना प्रारंभ करने और उस संबंध में कार्यवाही करने का हकदार होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) आवेदक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो कोई अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था स्थापित करने के लिए उपधारा (1) के अधीन आवेदन करता है;
(ख) अनापत्ति प्रमाणपत्र" से ऐसा प्रमाणपत्र अभिप्रेत है, जिसमें यह कथन हो कि सक्षम प्राधिकारी को अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था की स्थापना के संबंध में कोई आपत्ति नहीं है ।
10क. अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था का सहबद्धता चाहने का अधिकार-(1) कोई अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था अपनी रुचि के किसी विश्वविद्यालय से इस बात के अधीन रहते हुए सहबद्ध होने की मांग कर सकेगी कि ऐसी सहबद्धता उस अधिनियम के अधीन अनुज्ञेय है जिसके अधीन उक्त विश्वविद्यालय स्थापित किया गया है ।
(2) कोई व्यक्ति, जो अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया गया है, उपधारा (1) के अधीन सहबद्ध होने के लिए किसी विश्वविद्यालय को कोई आवेदन, उस विश्वविद्यालय के परिनियम, अध्यादेश, नियमों या विनियमों द्वारा विहित रीति से फाइल कर सकेगा:
परंतु ऐसे प्राधिकृत व्यक्ति को, ऐसा आवेदन फाइल करने की तारीख से साठ दिन के अवसान के पश्चात्, ऐसे आवेदन की प्रास्थिति के बारे में जानने का अधिकार होगा ।]
अध्याय 4
आयोग के कृत्य और शक्तियां
11. आयोग के कृत्य-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी आयोग, -
(क) अल्पसंख्यकों की शिक्षा से संबंधित किसी प्रश्न पर जो उसे निर्देशित किया जाए, केंद्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार को सलाह देगा:
[(ख) अल्पसंख्यकों को अपनी रुचि की शैक्षणिक संस्थाएं स्थापित और प्रशासित करने के अधिकारों से वंचित किए जाने या उनका अतिक्रमण किए जाने से संबंधित शिकायतों की और किसी विश्वविद्यालय से सहबद्ध होने से संबंधित किसी विवाद की, स्वप्रेरणा से या किसी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था द्वारा या उसकी ओर से किसी व्यक्ति द्वार उसे प्रस्तुत की गई किसी याचिका पर जांच पड़ताल करेगा और समुचित सरकार को अपने निष्कर्ष की उसके कार्यान्वयन के लिए रिपोर्ट करेगा:
(ग) किसी न्यायालय के समक्ष अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों के किसी वंचन या अतिक्रमण से संबंधित किसी कार्यवाही में, उस न्यायालय की इजाजत से, हस्तक्षेप करेगा;
(घ) अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों के संरक्षण के लिए, संविधान या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन उपबंधित सुरक्षोपायों का पुनर्विलोकन करेगा और उनके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए उपयों की सिफारिश करेगा;
(ङ) अल्पसंख्यकों द्वारा स्थापित अपनी रुचि की संस्थाओं की अल्पसंख्यक प्रास्थिति और स्वरूप के संवर्धन और परिरक्षण के लिए उपाय विनिर्दिष्ट करेगा;
(च) अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था के रूप के किसी संस्था की प्रास्थिति से संबंधित सभी प्रश्नों का विनिश्चय करेगा और उस रूप में उसकी प्रास्थिति की घोषणा करेगा;
(छ) अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थाओं से संबंधित कार्यक्रमों और स्कीमों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए समुचित सरकार की सिफारिशें करेगा; और
(ज) ऐसे अन्य कार्य और बातें करेगा, जो आयोग के सभी या किसी उद्देश्य की प्राप्ति के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों ।] ।
12. आयोग की शक्तियां-(1) यदि किसी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था और किसी । । । विश्वविद्यालय के बीच उसके ऐसे विश्वविद्यालय से सहबद्ध होने के संबंध में कोई विवाद उठता है तो उस पर आयोग का विनिश्चय अंतिम होगा ।
(2) आयोग को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए, किसी वाद का विचारण करते समय और विशिष्टतया निम्नलिखित विषयों के संबंध में सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी, अर्थात्: -
(क) भारत के किसी भाग से किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख की प्रति या दस्तावेज की अपेक्षा करना;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना; और
(च) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।
[(3) आयोग के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत और धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और आयोग दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।] ।
[12क. सक्षम प्राधिकारी के आदेशों के विरुद्ध अपील-(1) किसी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था की स्थापना करने के लिए सक्षम प्राधिकारी द्वारा धारा 10 की उपधारा (2) के अधीन अनापत्ति प्रमाणपत्र देने से इंकार करने वाले आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति उस आदेश के विरुद्ध आयोग को अपील कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अपील, उपधारा (1) में निर्दिष्ट आदेश के आवेदक को संसूचित किए जाने की तारीख से तीस दिन के भीतर फाइल की जाएगी:
परंतु आयोग, तीस दिन की उक्त अपधि की समाप्ति के पश्चात् किसी अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर उसके फाइल न किए जाने के लि पर्याप्त कारण था ।
(3) आयोग को अपील ऐसे प्ररूप में की जाएगी, जो विहित किया जाए और उसके साथ उस आदेश की एक प्रति होगी, जिसके विरुद्ध अपील फाइल की गई है ।
(4) आयोग, पक्षकारों को सुनने के पश्चात्, यथासाध्य शीघ्रता से, आदेश पारित करेगा और ऐसे निदेश देगा, जो उसके आदेशों को प्रभावी करने या उसकी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने या न्याय के उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए आवश्यक या समीचीन हों ।
(5) उपधारा (4) के अधीन आयोग द्वारा किया गया आदेश, आयोग द्वारा किसी सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पादनीय होगा और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के उपबंध, जहां तक हो सके, इस प्रकार लागू होंगे, जैसे वे किसी सिविल न्यायालय की डिक्री के संबंध में लागू होते हैं ।
12ख. किसी शैक्षणिक संस्था की अल्पसंख्यक प्रास्थिति के संबंध में विनिश्चय करने की आयोग की शक्ति-(1) राष्ट्रीय अल्पसंख्यक आयोग अधिनियम, 1992 (1992 का 19) में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां किसी शैक्षणिक संस्था को अल्पसंख्यक प्रास्थिति देने के लिए, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा स्थापित कोई प्राधिकारी, ऐसी प्रास्थिति दिए जाने के लिए आवेदन को नामंजूर करता है, वहां व्ययित व्यक्ति, प्राधिकारी के उस आदेश के विरुद्ध आयोग को अपील कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अपील, आदेश के आवेदक को संसूचित किए जाने की तारीख से तीस दिन के भीतर फाइल की जाएगी:
परंतु आयोग तीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात्, किसी अपील को ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर उसके फाइल न किए जाने के लिए पर्याप्त कारण था ।
(3) आयोग को अपील, ऐसे प्ररूप में की जाएगी, जो विहित किया जाए और उसके साथ उस आदेश की एक प्रति होगी, जिसके विरुद्ध अपील फाइल की गई है ।
(4) उपधारा (3) के अधीन अपील की प्राप्ति पर आयोग, अपील के पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् । । । शैक्षणिक संस्था की अल्पसंख्यक प्रास्थिति के बारे में विनिश्चय करेगा और ऐसे निदेश देने के लिए कार्यवाही करेगा, जो वह ठीक समझे और ऐसे सभी निदेश पक्षकारों पर आबद्धकारी होंगे ।
स्पष्टीकरण-इस धारा और धारा 12ग के प्रयोजनों के लिए, प्राधिकारी" से ऐसा कोई प्राधिकारी या अधिकारी या आयोग अभिप्रेत है, जो किसी शैक्षणिक संस्था को अल्पसंख्यक प्रास्थिति का प्रमाणपत्र देने के प्रयोजन के लिए, तत्समय प्रवृत किसी विधि के अधीन या समुचित सरकर के किसी आदेश के अधीन स्थापित किया गया है ।
12ग. रद्द करने की शक्ति-आयोग, ऐसी अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था को, जिसे यथास्थिति, किसी प्राधिकारी या आयोग द्वारा अल्पसंख्यक प्रास्थिति प्रदान की गई है, सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् निम्नलिखित परिस्थितियों में ऐसी प्रास्थिति को रद्द कर सकेगा, अर्थात्: -
(क) यदि शैक्षणिक संस्था की संरचना, उसके लक्ष्यों और उद्देश्यों को, जिन्होंने उसे अल्पसंख्यक प्रास्थिति अभिप्राप्त करने में समर्थ बनाया है, बाद में इस रूप में संशोधित किया गया है कि वे अब अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था के प्रयोजन या विशेषता को प्रदर्शित नहीं करते हैं;
(ख) यदि निरीक्षण या अन्वेषण के दौरान अभिलेखों के सत्यापन पर यह पाया जाता है कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था किसी शैक्षणिक वर्ष के दौरान नियमों और प्रवेश को शासित करने वाले विहित प्रतिशत के अनुसार अल्पसंख्यक समुदाय के छात्रों को संस्था में प्रवेश देने में असफल रही है ।
12घ. अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों के वंचन से संबंधित मामलों का अन्वेषण करने की आयोग की शक्ति-(1) आयोग, को अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों के वंचन से संबंधित शिकायतों का अन्वेषण करने की शक्ति होगी ।
(2) आयोग, इस अधिनियम के अधीन किसी शिकायत से संबंधित कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार की सहमति से, केंद्रीय सरकार या उस राज्य सरकार के किसी अधिकारी की सेवाओं का उपयोग कर सकेगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन अन्वेषण के प्रयोजन के लिए ऐसा अधिकारी, जिसकी सेवाओं का उपयोग किया गया है, आयोग के निदेश और नियंत्रण के अधीन रहते हुए, -
(क) किसी व्यक्ति को समन कर सकेगा और हाजिर करा सकेगा तथा उसकी परीक्षा कर सकेगा;
(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और प्रस्तुतीकरण की अपेक्षा कर सकेगा;
(ग) किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अध्यपेक्षा कर सकेगा ।
(4) ऐसा अधिकारी, जिसकी सेवाओं का उपयोग उपधारा (2) के अधीन किया गया है, आयोग द्वारा उसे सौंपे गए किसी मामले का अन्वेषण कर सकेगा और ऐसी अवधि के भीतर, जो इस निमित्त आयोग द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, आयोग को उस पर रिपोर्ट प्रस्तुत करेगा ।
(5) आयोग, उपधारा (4) के अधीन उसे प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में कथित तथ्यों और निकाले गए निष्कर्ष की, यदि कोई हो, शुद्धता के बारे में अपना समाधान करेगा और इस प्रयोजन के लिए आयोग ऐसी और जांच कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
12ङ सूचना आदि की मांग करने की आयोग की शक्ति-(1) आयोग, अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों के अतिक्रमण या वंचन की शिकायतों की जांच करते समय, केंद्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी अन्य प्राधिकारी या उसके अधीनस्थ संगठन से ऐसे समय के भीतर, जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, सूचना या रिपोर्ट मांगेगा:
परंतु, -
(क) यदि आयोग द्वारा अनुबंधित समय के भीतर सूचना या रिपोर्ट प्राप्त नहीं होती है तो वह शिकायत की जांच करने की कार्यवाही आरंभ कर सकेगा:
(ख) यदि, सूचना या रिपोर्ट की प्राप्ति पर, आयोग का या तो यह समाधान हो जाता है कि आगे जांच अपेक्षित नहीं है या यह कि संबंधित सरकार या प्राधिकारी द्वारा अपेक्षित कार्रवाई आरंभ कर दी गई है तो वह उस शिकायत पर कार्यवाही नहीं कर सकेगा और तद्नुसार शिकायतकर्ता को सूचित करेगा ।
(2) जहां जांच से किसी लोक सेवक द्वारा अल्पसंख्यकों के शैक्षणिक अधिकारों का अतिक्रमण या वंचन सिद्ध हो जाता है, वहां आयोग संबंधित सरकार या प्राधिकारी को संबंधित व्यक्ति या व्यक्तियों के विरुद्ध अनुशासनिक कार्यवाहियां, या ऐसी अन्य कार्रवाई आरंभ करने की सिफारिश कर सकेगा, जो ठीक समझी जाए ।
(3) आयोग अपनी सिफारिशों के साथ जांच रिपोर्ट की एक प्रति संबंधित सरकार या प्राधिकारी को भेजेगा और संबंधित सरकार या प्राधिकारी एक मास की अवधि या ऐसे और समय के भीतर, जो आयोग अनुज्ञात करे, उस पर की गई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई सहित रिपोर्ट पर अपनी टीका-टिप्पणियां आयोग को भेजेगा ।
(4) आयोग, अपनी जांच रिपोर्ट और आयोग की सिफारिशों पर संबंधित सरकार या प्राधिकारी द्वारा की गई या किए जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई को प्रकाशित करेगा ।
12च. अधिकारिता का वर्जन-कोई न्यायालय (उच्चतम न्यायालय और संविधान के अनुच्छेद 226 और अनुच्छेद 227 के अधीन, अधिकारिता का प्रयोग करने वाले किसी उच्च न्यायालय के सिवाय) इस अध्याय के अधीन किए गए किसी आदेश के संबंध में कोई वाद, आवेदन या अन्य कार्यवाही ग्रहण नहीं करेगा ।।
13. अध्यक्ष की वितीय और प्रशासनिक शक्तियां-अध्यक्ष, ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करेगा जो इस धारा के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा उसमें निहित की जाएं: परंतु अध्यक्ष को ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां, जो वह ठीक समझे, आयोग के ऐसे सदस्य या सचिव या अधिकारी को, इस शर्त के अधीन रहते हुए प्रत्यायोजित करने का प्राधिकार होगा कि ऐसा सदस्य या सचिव या अधिकारी, ऐसी प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग करते समय अध्यक्ष के निदेश, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करता रहेगा ।
अध्याय 5
वित्त, लेखा और लेखापरीक्षा
14. केंद्रीय सरकार द्वारा अनुदान-(1) केंद्रीय सरकार, संसद् की विधि द्वारा इस निमित्त सम्यक् विनियोग किए जाने के पश्चात्, आयोग के अनुदानों के रूप में उतनी ही धनराशि का संदाय करेगी, जितनी केंद्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने के लिए ठीक समझे ।
(2) आयोग उतनी धनराशि खर्च कर सकेगा जितनी वह इस अधिनियम के अधीन कृत्यों का पालन करने के लिए ठीक समझे और वह धनराशि उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अनुदानों में से संदेय व्यय मानी जाएगी ।
15. लेखे और लेखापरीक्षा-(1) आयोग समुचित लेखे और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और ऐसे प्ररूप में लेखाओं का वार्षिक विवरण तैयार करेगा जो केंद्रीय सरकार द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित किया जाए ।
(2) आयोग के लेखाओं की लेखापरीक्षा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे अंतरालों पर की जाएगी जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं और ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय आयोग द्वारा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) नियंत्रक-महालेखापरीक्षक तथा उसके द्वारा इस अधिनियम के अधीन आयोग के लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में नियुक्त किसी व्यक्ति को ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में वही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो साधारणतया नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को सरकारी लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में होते हैं और विशिष्टतया बहियों, खातों से संबंधित वाऊचरों तथा अन्य दस्तावेजों और कागज-पत्रों को पेश किए जाने की मांग करने और आयोग के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
16. वार्षिक रिपोर्ट-आयोग प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए अपनी वार्षिक रिपोर्ट, जिसमें पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलाप का पूर्ण विवरण होगा, ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, तैयार करेगा और उसकी एक प्रति केंद्रीय सरकार को भेजेगा ।
17. वार्षिक रिपोर्ट और लेखापरीक्षा रिपोर्ट का संसद् के समक्ष रखा जाना-केन्द्रीय सरकार वार्षिक रिपोर्ट, धारा 11 के अधीन आयोग द्वारा दी गई सलाह पर की गई कार्रवाई के ज्ञापन और ऐसी सलाह में से किसी के अस्वीकार करने के कारण, यदि कोई हो, सहित और लेखापरीक्षा रिपोर्ट को, उनके प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
अध्याय 6
प्रकीर्ण
। । । । । । ।
19. आयोग के अध्यक्ष, सदस्यों, सचिव, कर्मचारियों, आदि का लोक सेवक होना-आयोग का अध्यक्ष, सदस्य, सचिव, अधिकारी और अन्य कर्मचारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
20. केन्द्रीय सरकार द्वारा निदेश-(1) आयोग इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में राष्ट्रीय प्रयोजनों से संबंधित नीति संबंधी प्रश्नों पर ऐसे निदेश द्वारा मार्गदर्शित होगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे दिया जाए ।
(2) यदि केन्द्रीय सरकार और आयोग के बीच यह विवाद उठाता है कि कोई प्रश्न राष्ट्रीय प्रयोजनों से संबंधित नीति का है या नहीं तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
21. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार, आयोग, आयोग के अध्यक्ष, सदस्य, सचिव या किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी ।
22. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में अन्तर्विष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।
23. विवरणियां या सूचना-आयोग, केन्द्रीय सरकार को अपने क्रियाकलापों की बाबत ऐसी विवरणियां या अन्य सूचनाएं देगा जिनकी केन्द्रीय सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे ।
24. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -
(क) धारा 5 की उपधारा (5) के अधीन अध्यक्ष और सदस्यों को और धारा 6 की उपधारा (2) के अधीन सचिव, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;
[(कक) वह प्ररूप, जिसमें धारा 12क की उपधारा (3) और धारा 12ख की उपधारा (3) के अधीन अपील फाइल की जाएगी;
(ख) धारा 13 के अधीन अध्यक्ष द्वारा प्रयोग की जाने वीली वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां;
(ग) वह प्ररूप जिसमें लेखाओं का वार्षिक विवरण धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन तैयार किया जाएगा;
(घ) वह प्ररूप जिसमें और वह समय जब वार्षिक रिपोर्ट धारा 16 के अधीन तैयार की जाएगी:
(ङ) कोई अन्य विषय जिसे विहित किया जाना अपेक्षित है या किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसा नियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा तथापि, उस नियम के ऐसे प्रवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
25. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:
परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात्, नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, उसके किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
26. निरसन और व्यावृत्ति-(1) राष्ट्रीय अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्था आयोग अध्यादेश, 2004 (2004 का अध्यादेश 6) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) उक्त अध्यादेश के निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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