वैयक्तिक क्षति (प्रतिकर बीमा) अधिनियम, 1963
(1963 का अधिनियम संख्यांक 37)
[8 अक्तूबर, 1963]
उन कर्मकारों को, जिन्हें कोई वैयक्तिक क्षति हुई है, प्रतिकर संदत्त
करने का दायित्व नियोजकों पर अधिरोपित करने और ऐसे
दायित्व के विरुद्ध नियोजकों के बीमे का
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के चौदहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ -(1) यह अधिनियम वैयक्तिक क्षति (प्रतिकर बीमा) अधिनियम, 1963 कहा जा सकेगा ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख1 को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभाषाएं - इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,
(क) नियोजक" के अन्तर्गत कोई व्यक्ति-निकाय, चाहे वह निगमित हो या नहीं, और नियोजक का कोई प्रबन्ध-अभिकर्ता तथा मृत नियोजक का विधिक प्रतिनिधि आते हैं और जब कि किसी कर्मकार की सेवाएं उस व्यक्ति द्वारा, जिसके साथ कर्मकार ने सेवा या शिक्षुता की संविदा की है, अन्य व्यक्ति को अस्थायी तौर पर उधार दे दी गई है या भाड़े पर दी गई है, तब नियोजक" से उस समय तक, जब तक वह कर्मकार उस अन्य व्यक्ति के लिए काम करता रहता है, वह पश्चात््कथित व्यक्ति अभिप्रेत है ;
(ख) निधि" से धारा 13 के अधीन गठित वैयक्तिक क्षति (प्रतिकर बीमा) निधि अभिप्रेत है;
(ग) अभिलाभपूर्वक लगे हुए व्यक्ति” और वैयक्तिक क्षति" के वे ही अर्थ होंगे जो वैयक्तिक क्षति (आपात उपबन्ध) अधिनियम, 1962 (1962 का 59) में उन पदों को व्रमशः समनुदिष्ट हैं;
(घ) अधिसूचना" से शासकीय राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(ङ) आंशिक निःशक्तता" से जहां कि निःशक्तता अस्थायी प्रकृति की है वहां, ऐसी निःशक्तता अभिप्रेत है जिससे कर्मकार की उस नियोजन में उपार्जन करने की सामर्थ्य कम हो जाती है जिसमें वह उस समय, जब क्षति हुई, लगा हुआ था और जहां कि निःशक्तता स्थायी प्रकृति है वहां ऐसी निःशक्तता अभिप्रेत है जिससे किसी भी ऐसे नियोजन में उसकी उपार्जन करने की सामर्थ्य कम हो जाती है जिसे ग्रहण करने के लिए वह उस समय समर्थ था :
परन्तु अनुसूची में विनिर्दिष्ट हर क्षति के या क्षतियों के किसी समुच्चय के बारे में वहां, जहां कि निःशक्तता का प्रतिशत या संकलित प्रतिशत, जैसा वह अनुसूची में ऐसी क्षति या क्षतियों के समुच्चय के सामने विनिर्दिष्ट है, सौ प्रतिशत से कम होता है, यह समझा जाएगा कि उसके परिणामस्वरूप स्थायी आंशिक निःशक्तता हुई है;
1[(च) आपात की कालावधि" से, संविधान के अनुच्छेद 352 के खण्ड (1) के अधीन
(i) 26 अक्तूबर, 1962 को निकाली गई आपात की उद्घोषणा के संबंध में, 26 अक्तूबर, 1962 को आरम्भ होने वाली और 10 जनवरी, 1968 को, अर्थात् उस तारीख को जिसको कि भारत सरकार के गृह मंत्रालय की अधिसूचना सं. सा. का. नि. 93, तारीख 10 जनवरी, 1968 द्वारा उक्त आपात समाप्त हुआ घोषित किया गया था, समाप्त होने वाली कालावधि अभिप्रेत है;
(ii) 3 दिसम्बर, 1971 को निकाली गई आपात की उद्घोषणा के संबंध में, 3 दिसम्बर, 1971 को आरम्भ होने वाली और ऐसी तारीख को जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस तारीख के रूप में घोषित करे जिसको कि उक्त आपात समाप्त हो जाएगा, समाप्त होने वाली कालावधि अभिप्रेत है;]
(छ) विहित" से धारा 22 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ज) पूर्ण निःशक्तता" से ऐसी निःशक्तता अभिप्रेत है, चाहे वह अस्थायी प्रकृति की हो या स्थायी प्रकृति की, जो किसी कर्मकार को ऐसे सब काम के लिए असमर्थ कर देती है जिसे करने के लिए वह उस समय समर्थ था जब क्षति हुई थी:
परन्तु अनुसूची में विनिर्दिष्ट हर क्षति के या क्षतियों के समुच्चय के बारे में वहां, जहां कि निःशक्तता का प्रतिशत या संकलित प्रतिशत, जैसा वह अनुसूची में ऐसी क्षति या क्षतियों के समुच्चय के सामने विनिर्दिष्ट है, सौ प्रतिशत या उससे अधिक होता है, यह समझा जाएगा कि उसके परिणामस्वरूप स्थायी पूर्ण निःशक्तता हुई है;
(झ) स्कीम” से धारा 8 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट वैयक्तिक क्षति (प्रतिकर बीमा) स्कीम अभिप्रेत है;
(ञ) मजदूरी" से कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) में यथापरिभाषित मजदूरी अभिप्रेत है, और मासिक मजदूरी का वही अर्थ है जो इस पद को कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 की धारा 5 द्वारा समनुदिष्ट है और इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए इसका हिसाब उस रीति से किया जाएगा जो उक्त धारा में अधिकथित है;
(ट) कर्मकार" से (उस व्यक्ति से, जिसका नियोजन नैमित्तिक प्रकृति का है और जो नियोजक के व्यापार या कारबार के प्रयोजनों के लिए नियोजित होने से अन्यथा नियोजित है, भिन्न) कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो धारा 3 में विनिर्दिष्ट नियोजनों में से किसी में नियोजित है ।
अध्याय 2
अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर
3. कर्मकार जिन्हें यह अधिनियम लागू होता है - वे कर्मकार, जिन्हें यह अधिनियम लागू होता है, ये हैं
(क) किसी ऐसे नियोजन या नियोजन-वर्ग में नियोजित कर्मकार जो 1[भारत रक्षा नियम, 1962 के नियम, 126कक या भारत रक्षा नियम, 1971 के नियम 119], के अधीन आवश्यक सेवा है या घोषित किया गया है;
(ख) कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) की धारा 2 के खण्ड (ड) में यथापरिभाषित कारखाने में नियोजित कर्मकार;
(ग) खान अधिनियम, 1952 (1952 का 35) के अर्थ के अंदर की किसी खान में नियोजित कर्मकार ;
(घ) किसी महापत्तन में नियोजित कर्मकार;
(ङ) बागान श्रम अधिनियम, 1951 (1951 का 69) की धारा 2 के खण्ड (च) में यथापरिभाषित बागान में नियोजित कर्मकार;
(च) केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट नियोजन में नियोजित कर्मकार ।
4. अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर किसके द्वारा और कैसे संदेय होगा -(1) ऐसी शर्तों के अध्यधीन जैसी कि स्कीम में विनिर्दिष्ट की जाएं, अभिलाभपूर्वक लगे हुए व्यक्ति को, जो ऐसा कर्मकार हो, जिसे यह अधिनियम लागू होता है, हुई वैयक्तिक क्षति की बाबत, वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 (1962 का 59) के अधीन उपबंधित किसी अनुतोष के आतरिक्त, नियोजक द्वारा वह प्रतिकर संदेय होगा जिसकी रकम और किस्म धारा 7 द्वारा उपबंधित है :
परन्तु जहां कि किसी नियोजक ने धारा 9 की उपधारा (1) द्वारा अपेक्षित रूप में बीमा पालिसी ली हुई हो और उस पर प्रीमियम के रूप में सब संदाय, जो तत्पश्चात् उसके द्वारा शोध्य हों, स्कीम के उपबंधों के अनुसार कर दिए हों, अथवा जहां कि धारा 9 की उपधारा (1) के या धारा 10 की उपधारा (2) के उपबंधों के द्वारा नियोजक से बीमा कराने की अपेक्षा नहीं की गई है, वहां केन्द्रीय सरकार, नियोजक की ओर से, इस उपधारा के अधीन प्रतिकर संदत्त करने के नियोजक के दायित्व को ग्रहण करेगी और उसका निर्वहन करेगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर स्कीम में इस निमित्त किए गए उपबंधों के अनुसार संदेय होगा ।
(3) यह धारा सरकार पर आबद्धकर होगी ।
5. इस अधिनियम के और 1962 के अधिनियम 59 के अधीन से अन्यथा प्रतिकर प्राप्त करने के अधिकार पर परिसीमा - जहां कि किसी व्यक्ति को किसी ऐसी वैयक्तिक क्षति की बाबत, जिसकी बाबत प्रतिकर इस अधिनियम के अधीन संदेय है, नियोजक से इस अधिनियम के और वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 (1962 का 59) के उपबंधों के अलावा प्रतिकर चाहे वह उपदान, पेन्शन या अनुकंपा-संदाय के रूप में हो या अन्यथा या नुकसानी प्राप्त करने का अधिकारी हो, वहां उस अधिकार का विस्तार ऐसे प्रतिकर या नुकसानी के केवल उतने भाग तक होगा जितना इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर की रकम से अधिक हो ।
6. सरकार के कर्मचारियों के संबंध में विशेष उपबंध - जहां कि सरकार के नियोजन में के किसी व्यक्ति को, सरकार से, अपनी सेवा की शर्तों को विनियमित करने वाले नियमों के अधीन, उस अधिनियम के या वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 (1962 का 59) के उपबंधों के अलावा, किसी ऐसी वैयक्तिक क्षति की बाबत, जिसकी बाबत प्रतिकर इस अधिनियम के अधीन संदेय हो, कोई धनराशि चाहे वह असाधारण पेन्शन, उपदान या अनुकंपा-संदाय के रूप में हो या नुकसानी के रूप में, प्राप्त करने का अधिकार हो, वहां इस अधिनियम या वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, उस व्यक्ति को उन नियमों के अधीन अनुज्ञेय धनराशि प्राप्त करने का अधिकार होगा और यदि ऐसे अनुज्ञेय धनराशि इस अधिनियम और वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 के अधीन संदेय रकम से कम हो, तो उसको यह आतरिक्त अधिकार भी होगा कि वह न नियमों के अधीन अनुज्ञेय धनराशि और इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर की रकम के अन्तर के बराबर रकम प्राप्त करे ।
7. प्रतिकर की रकम - (1) इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर इस प्रकार होगा :
(क) जहां कि क्षति के परिणामस्वरूप मृत्यु हो जाती है वहां वैसे ही मामले में कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) के अधीन संदेय रकम में से वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 (1962 का 59) के अधीन संदेय रकम का एकमुश्त मूल्य घटाकर शेष रकम ;
(ख) जहां कि क्षति के परिणामस्वरूप पूर्ण निःशक्तता हो जाती है, वहां वैसे ही मामले में कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) के अधीन संदेय रकम में से वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 (1962 का 59) के अधीन संदेय रकम का एकमुश्त मूल्य घटाकर शेष रकम ;
(ग) जहां कि भूमि के परिणामस्वरूप स्थायी आंशिक निःशक्तता हो जाती है, वहां
(i) ऐसी क्षति की दशा में जो अनुसूची में विनिर्दिष्ट है उस प्रतिकर का, जो स्थायी पूर्ण निःशक्तता की दशा में संदेय होता, ऐसा प्रतिशत जैसा निःशक्तता के प्रतिशत के रूप में उसमें विनिर्दिष्ट है ;
(ii) ऐसी क्षति की दशा में जो अनुसूची में विनिर्दिष्ट नहीं है, उस प्रतिकर का ऐसी निःशक्तता के लिए अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्रतिशत जैसी वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 (1962 का 59) के अधीन बनाई गई स्कीम के अधीन कार्य कर रहे सक्षम चिकित्सा प्राधिकारी द्वारा तत्समान कोटि की ठहराई जाए ;
(iii) जहां कि एक से अधिक क्षतियां होती हैं, वहां उन क्षतियों की बाबत संदेय संकलित प्रतिकर, किन्तु ऐसे कि यह प्रतिकर किसी भी दशा में उस प्रतिकर से अधिक न हो, जो तब संदेय होता जब उन क्षतियों के परिणामस्वरूप स्थायी पूर्ण निःशक्तता हो गई होती ;
(घ) जहां कि क्षति के परिणामस्वरूप अस्थायी निःशक्तता, चाहे पूर्ण या आंशिक हो जाती है, वहां कर्मकार प्रतिकर अधिनियम, 1923 (1923 का 8) के अधीन वैसे ही मामले में संदेय अर्धमासिक संदाय, किन्तु हर एक मामले में जब तक वह वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 (1962 का 59) के अधीन बनाई गई स्कीम के अधीन संदाय प्राप्त करता रहे तब तक उस संदाय में से वह रकम घटाकर जो उक्त स्कीम के अधीन संदेय हो ।
(2) जहां कि कर्मकार की मासिक मजदूरी पांच सौ रुपए से अधिक है, वहां इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर वह रकम होगी जो उस कर्मकार की दशा में, जिसकी मासिक मजदूरी चार सौ रुपए से अधिक है, उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन संदेय हो ।
अध्याय 3
वैयक्तिक क्षति (प्रतिकर बीमा) स्कीम
8. वैयक्तिक क्षति (प्रतिकर बीमा) स्कीम - (1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, एक स्कीम प्रवर्तन में लाएगी जो वैयक्तिक क्षति (प्रतिकर बीमा) स्कीम कही जाएगी, जिसके द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक सब बातों के लिए उपबंध किया जाए और जिसके द्वारा केन्द्रीय सरकार, उन कर्मकारों के नियोजकों के संबंध में, जिन्हें यह अधिनियम लागू होता है, इस अधिनियम के और स्कीम के अधीन उनके द्वारा कर्मकारों के प्रति उपगत दायित्वों के विरुद्ध ऐसे नियोजकों का बीमा करने का जिम्मा ले :
1[परन्तु आपात की विभिन्न कालावधियों के संबंध में विभिन्न स्कीमें प्रवर्तित की जाएंगी ।]
(2) स्कीम यह सुनिश्चित करेगी कि केन्द्रीय सरकार का स्कीम के अधीन बीमाकर्ता के रूप में कोई भी दायित्व केन्द्रीय सरकार की ओर से कार्य करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा दी गई विहित प्ररूप की बीमा पालिसी द्वारा अवधारित कर दिया जाए ।
(3) स्कीम यह उपबंध कर सकेगी कि वह उस तारीख को, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाए, प्रवर्तन में आएगी या प्रवर्तन में आ गई समझी जाएगी ।
(4) स्कीम केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी भी समय संशोधित की जा सकेगी ।
(5) उपधारा (1) के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, स्कीम
(क) इस अधिनियम और स्कीम के अधीन संदेय प्रतिकर के संदाय को विनियमित करने वाले उपबंध बना सकेगी, जिनके अंतर्गत स्कीम की किसी अपेक्षा के उल्लंघन के लिए दो हजार रुपए से अनधिक जुर्माने द्वारा दंड का उपबंध आता है ;
(ख) वे व्यक्ति जिनको और वे अनुपात और रीति जिनमें इस अधिनियम के अधीन संदाय किए जाएंगे, विनिर्दिष्ट करने वाले उपबंध बना सकेगी ।
(ग) वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 (1962 का 59) के अधीन संदेय रकम का एकमुश्त मूल्य अवधारित करने के लिए उपबंध बना सकेगी;
(घ) वे दशाएं या परिस्थितियां विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिनमें कर्मकार इस अधिनियम के अधीन संदेय प्रतिकर के लिए निर्हकित हो जाएगा, और स्कीम के अधीन दी गई बीमा पालिसी की इसे एक अभिव्यक्त या विवक्षित शर्त बना सकेगी कि ऐसी विनिर्दिष्ट की अवज्ञा में किया गया प्रतिकर का संदाय पालिसी के अंतर्गत नहीं आएगा ;
(ङ) वे दशाएं या परिस्थितियां विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिनमें किसी कर्मकार को संदेय प्रतिकर उस दशा में विधारित किया, रद्द किया, घटाया या पुनर्विलोकित किया जा सकेगा जिसमें वैयक्तिक क्षति (आपात उपबंध) अधिनियम, 1962 (1962 का 59) के अधीन बनाई गई स्कीम के अधीन किया गया अधिनिर्णय विधारित किया, रद्द किया, घटाया या पुनर्विलोकित किया जाए;
(च) उन दशाओं के लिए उपबंध कर सकेगी जिनमें किसी नियोजक ने, इस अधिनियम द्वारा अधिरोपित पूरे दायित्व का या उसके किसी भाग का जिम्मा स्वेच्छा से लिया हो;
(छ) स्कीम के अधीन किसी बीमा पालिसी पर शोध्य कुल प्रीमियम का अंतिम निर्धारण या तो नियोजक द्वारा पहले ही किए जा चुके सब प्रीमियम के आग्रम संदायों के समतुल्य के रूप में, या नियोजक द्वारा दिए गए आग्रम संदायों की रकम जिन कालावधियों के संबंध में नियत की गई थी उनके लिए नियोजक के कुल मजदूरी बिलों के प्रतिशत के रूप में, या आपात की कालावधि के अवसान के अव्यवहित पूर्वगामी बारह से अन्यून और पन्द्रह से अनधिक मास की कालावधि के लिए नियोजक के कुल मजदूरी बिल के प्रतिशत के रूप में किए जाने का उपबंध कर सकेगी और किसी ऐसी पालिसी पर शोध्य कुल प्रीमियम के निर्धारण के लिए उपबंध कर सकेगी जिसका प्रवृत्त रहना आपात की कालावधि के अवसान के पूर्व ही इस कारण समाप्त हो गया हो कि नियोजक इस कारबार से निकल गया है ;
(ज) किसी बीमा पालिसी पर शोध्य कुल प्रीमियम की किसी नियोजक से वसूली के लिए उपबंध कर सकेगी, जिसके अंतर्गत किसी विहित कालावधि के लिए उसके कुल मजदूरी बिलों के प्रतिशत पर अधिारित रकम के कालिक आग्रम संदायों द्वारा वसूली के लिए, हर एक नियोजक द्वारा ऐसे किए गए संदायों के अलग-अलग निधियों में रखे जाने के लिए, और अंतिम रूप से निर्धारित कुल प्रीमियम का ऐसे कालिक संदायों के योग के विरुद्ध अंतिम समायोजन किए जाने के लिए उपबंध आता है:
परन्तु जहां कि विहित कालावधि के कुल मजदूरी बिलों पर अधिारित कालिक संदाय की रकम आठ रुपए से कम हो वहां उसे बढ़ाकर आठ रुपए कर दिया जाएगा:
परन्तु यह और कि ऐसे कालिक संदायों में से प्रथम संदाय, पूर्वोक्त आठ रुपए के न्यूनतम के अध्यधीन रहते हुए उस दर से होगा जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे:
परन्तु यह और कि ऐसे कालिक संदाय वर्ष की हर एक तिमाही में एक बार से अधिक बार नहीं होंगे:
परन्तु यह और कि प्रथम कालिक संदाय के पश्चात् के किसी भी कालिक संदाय के दर, पूर्वोक्त आठ रुपए के न्यूनतम के अध्यधीन रहते हुए, वह होगी जो कि केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन के अपने दायित्व पर विचार करने के पश्चात् समय-समय पर नियत करे, और केन्द्रीय सरकार, जहां कि निधि में की कुल रकम को ध्यान में रखते हुए यह अपेक्षा हो वहां किसी कालिक संदाय को या तो अधित्यक्त या मुल्तवी कर सकेगी ।
9. अनिवार्य बीमा - (1) ऐसे कर्मकारों का हर नियोजक जिन्हें यह अधिनियम लागू होता है या बाद में लागू कर दिया जाए, किसी ऐसे नियोजक के सिवाय जिसका इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के पश्चात् किसी तिमाही के लिए कुल मजदूरी बिल पन्द्रह सौ रुपए से कभी अधिक न हुआ हो, उस तारीख के पूर्व जो विहित की जाएं या उसके प्रथम बार ऐसा नियोजक बनने के पश्चात् उस कालावधि के अवसान के पूर्व, जो विहित की जाए, इस स्कीम के अनुसार निकाली गई एक बीमा पालिसी लेगा, जिसके द्वारा वह, अपने पर इस अधिनियम द्वारा अधिरोपित सब दायित्वों के विरुद्ध बीमा, आपात की कालावधि के अवसान के पूर्व की उस तारीख तक के लिए, यदि कोई हो, जिसको वह ऐसा नियोजक न रह जाए जिससे यह धारा लागू होती है, किया जाए ।
(2) जो कोई उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, या उस उपधारा द्वारा यथा अपेक्षित बीमा पालिसी लेकर उस पर प्रीमियम के रूप में ऐसा संदाय करने में, जो स्कीम के उपबंधों के अनुसार उसके द्वारा तत्पश्चात् शोध्य हो, असफल रहेगा, वह जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा और ऐसे दोषसिद्ध किए जाने के पश्चात् के हर ऐसे दिन के लिए, जिसको वह उल्लंघन या असफलता चालू रहे, आतरिक्त जुर्माने से भी दंडनीय होगा जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा ।
(3) यह धारा सरकार पर आबद्धकर न होगी ।
10. मालिक और ठेकेदार - (1) जहां कि कोई व्यक्ति (जिसे इस धारा में मालिक कहा गया है) अपने व्यापार या कारबार के अनुव्रम में या के प्रयोजनों के लिए, उन कर्मकारों की सेवाओं का उपयोग करे जिनकी सेवाएं अस्थायी रूप से उसे उधार या भाड़े पर किसी अन्य ऐसे व्यक्ति के साथ ठहराव द्वारा, जिससे कि उन कर्मकारों ने सेवा या शिक्षुता की संविदाएं की हों, दी गई हों, अथवा अपने व्यापार या कारबार के अनुव्रम में या के प्रयोजनों के लिए, किसी अन्य व्यक्ति के साथ उस अन्य व्यक्ति द्वारा या के अधीन किसी ऐसे सम्पूर्ण कार्य या उसके किसी भाग के निष्पादन के लिए संविदा करे, जो मामूली तौर पर मालिक के व्यापार या कारबार का भाग हो (जिन ऐसे दोनों अन्य व्यक्तियों में से हर एक को इस धारा में ठेकेदार कहा गया है) वहां मालिक ठेकेदार से, धारा 11 के अधीन कार्य करने वाले केन्द्रीय सरकार के उस अभिकर्ता का नाम अभिप्राप्त करेगा जिससे बीमा कराने का वह आशय रखता हो और ठेकेदार के साथ अपने ठहराव या संविदा के असितत्व की रिपोर्ट उस अभिकर्ता को देगा ।
(2) इस अधिनियम में अन्यत्र अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसी दशा में, जैसी उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, वहां जहां कि ठहराव या संविदा एक मास से कम की अवधि के लिए हो, ठेकेदार के लिए यह आवश्यक नहीं होगा कि वह अपने द्वारा नियोजित उन कर्मकारों की बाबत इस अधिनियम द्वारा उस पर अधिरोपित दायित्वों के लिए बीमा कराए, जिनकी सेवाएं किसी ऐसे ठहराव पर उधार या भाड़े पर दी गई हों, या किसी ऐसी संविदा के अधीन के कार्य के निष्पादन में उपयोग में लाई गई हों, जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट हैं ।
(3) स्कीम, ठेकेदार द्वारा मालिक को किसी ऐसी जानकारी का प्रदाय किए जाने के लिए उपबंध कर सकेगी जो इस धारा के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने को समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हो, जिसके अंतर्गत स्कीम की किसी अपेक्षा के उल्लंघन के लिए दो हजार रुपए में अनधिक के जुर्माने द्वारा दंड का उपबंध आता है ।
11. केन्द्रीय सरकार द्वारा अभिकर्ताओं का नियोजन - केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा किसी व्यक्ति का, इस अधिनियम के किन्हीं प्रयोजनों के लिए उसके अभिकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए नियोजन कर सकेगी या ऐसा नियोजन प्राधिकृत कर सकेगी और ऐसे नियोजित व्यक्ति को उतना पारिश्रमिक दे सकेगी जितना वह सरकार ठीक समझे ।
12. कुछ बीमा कारबार का प्रतिषेध - (1) उस तारीख के पश्चात् जिसको स्कीम प्रवर्तन में लाई जाए, कोई भी व्यक्ति उस व्यक्ति के रूप में के सिवाय, जिसे स्कीम के अनुसरण में पालिसियां देने के लिए केन्द्रीय सरकार ने अपने अभिकर्ता के रूप में प्राधिकृत किया है, भारत के नियोजकों का उन दायित्वों के लिए बीमा करने का कारबार नहीं चलाएगा जिनके विरुद्ध बीमा का उपबंध स्कीम करती हो ।
(2) उपधारा (1) में की कोई भी बात, किसी ऐसी बीमा पालिसी को, जो उस तारीख के पहले की गई हो जिसको स्कीम प्रवर्तन में लाई जाए और उस तारीख के पश्चात् चालू रहे, अथवा किसी ऐसी बीमा पालिसी को, जो ऐसे दायित्वों के बारे में हो, जो इस अधिनियम द्वारा अधिरोपित दायित्वों से अधििक्य में हो, लागू नहीं होती है ।
(3) जो कोई उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा, वह जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा और आतरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम दिन के पश्चात् हर ऐसे दिन के लिए, जिसको उल्लंघन चालू रहे, एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
13. वैयक्तिक क्षति (प्रतिकर बीमा) निधि - (1) केन्द्रीय सरकार वैयक्तिक क्षति (प्रतिकर बीमा) निधि कही जाने वाली एक निधि को (जिसे एतस्मिन्् पश्चात् निधि" कहा गया है), हर एक वित्तीय वर्ष में इतनी राशियां, जितनी आवश्यक समझी जाएं, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा सम्यक् विनियोग कर दिए जाने के पश्चात् अंतरित कर सकेगी, जो राशियां केन्द्रीय सरकार द्वारा स्कीम के अधीन बीमा प्रीमियमों के रूप में या धारा 18 के अधीन अपराधों के शमन पर किए गए संदायों के रूप में, या इस अधिनियम के अधीन के किसी अभियोजन में अधिरोपित जुर्माने में से न्यायालय द्वारा दंड प्रव्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 545 के अधीन दिलवाए गए व्ययों या प्रतिकर के रूप में, या स्कीम के अधीन अधिरोपित शास्तियों के रूप में, केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राप्त राशियों से अधिक नहीं होगी ।
(2) इस निधि में से वे सब राशियां संदत्त की जाएंगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम या स्कीम के अधीन के अपने दायित्वों के निर्वहन के लिए, या स्कीम के प्रयोजनों के लिए नियोजित अभिकर्ताओं के पारिश्रमिक और व्ययों के केन्द्रीय सरकार द्वारा संदाय के लिए, या स्कीम के प्रशासन-खर्च के केन्द्रीय सरकार द्वारा संदाय के लिए अपेक्षित हों:
परन्तु निधि में से कोई भी संदाय सरकार द्वारा नियोजित कर्मकारों को प्रतिकर का संदाय करने के सरकार के किसी दायित्व के निर्वचन में नहीं किया जाएगा ।
(3) यदि किसी ऐसे समय जब निधि में से कोई संदाय किया जाना हो, निधि में जमा राशि, उस संदाय के लिए अपेक्षित राशि से कम हो तो कमी के बराबर रकम, संसद् द्वारा विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, भारत की संचित निधि में से आग्रम के रूप में निधि में जमा कर दी जाएगी ।
(4) यदि किसी समय निधि में जमा रकम उस राशि से अधिक हो, जो निधि में से संदत्त किए जाने के लिए केन्द्रीय सरकार की राय में संभाव्यतः अपेक्षित हो, तो अधििक्य का व्ययन ऐसी रीति से किया जाएगा जैसी केन्द्रीय सरकार ठीक समझे ।
(5) केन्द्रीय सरकार, निधि में प्राप्त और उसमें से संदत्त सभी राशियों का लेखा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति में, जैसी विहित की जाए, तैयार करेगी और या तो प्रतिवर्ष या ऐसे लघुतर अंतरालों पर, जैसे उसमें विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रकाशित करेगी ।
अध्याय 4
प्रकीर्ण
14. जानकारी अभिप्राप्त करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति - (1) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई व्यक्ति, यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए कि क्या इस अधिनियम की तथा स्कीमों की अपेक्षाओं का अनुपालन किया गया है, किसी नियोजक से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह उसे ऐसे लेखें, पुस्तकें या अन्य दस्तावेजें प्रस्तुत करे या से ऐसी जानकारी दे या ऐसे प्रमाणपत्र दे जैसे वह व्यक्ति युक्तियुक्त रूप से आवश्यक समझे ।
(2) जो कोई किसी व्यक्ति के इस धारा के अधीन की उसकी शक्तियों के प्रयोग में जानबूझकर बाधा डालेगा या तद््धीन की गई किसी अपेक्षा का अनुपालन करने में युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना असफल रहेगा, वह उस हर एक अवसर के बारे में, जिसको ऐसी कोई बाधा या असफलता होती है, जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(3) जो कोई इस धारा के अधीन की अपनी बाध्यताओं के तात्पर्यित अनुपालन में जानते हुए या लापरवाही से ऐसा कथन करेगा, जो किसी तात्विक विशिष्टि में मिथ्या हो, वह जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
15. असंदत्त प्रीमियम की वसूली - (1) धारा 9 की उपधारा (2) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां कि कोई व्यक्ति इस अधिनियम और स्कीम द्वारा अपेक्षित रूप में या अपेक्षित पूरी रकम तक बीमा कराने में असफल रहा है और तद््द्वारा वह प्रीमियम के रूप में किसी ऐसे धन के संदाय से, जो उसे ऐसी असफलता न होने की दशा में स्कीम के उपबंधों के अनुसार संदत्त करना होता, बच निकला है, वहां केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई आफिसर उस रकम का, जिसके संदाय से वह ऐसे बच निकला है, अवधारण कर सकेगा और ऐसे अवधारित रकम ऐसे व्यक्ति द्वारा देय होगी और उपधारा (2) में उपबंधित रूप में उससे वसूलीय होगी ।
(2) स्कीम के अधीन की गई बीमा पालिसी पर प्रीमियम के रूप में, स्कीम के उपबंधों के अनुसार देय धनराशि और उपधारा (1) के अधीन देय के रूप में अवधारित की गई रकम भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूलीय होगी ।
(3) कोई भी व्यक्ति, जिसके विरुद्ध उपधारा (1) के अधीन अवधारण किया जाए, विहित कालावधि के भीतर, ऐसे अवधारण के विरुद्ध अपील केन्द्रीय सरकार को कर सकेगा, जिसका विनिश्चय आन्तम होगा ।
16. प्रतिकर का वहां संदाय जहां कि नियोजक बीमा करने में असफल रहा हो - जहां कि कोई नियोजक, धारा 9 की उपधारा (1) द्वारा अपेक्षित रूप में बीमा पालिसी लेने में असफल रहा हो, या उस उपधारा द्वारा अपेक्षित रूप में बीमा पालिसी लेकर, उस पर के उन प्रीमियमों का संदाय करने में असफल रहा हो, जो स्कीम के उपबंधों के अनुसार तत्पश्चात् उसके द्वारा शोध्य हों, वहां किसी ऐसे प्रतिकर का संदाय, जिसके संदाय के लिए वह इस अधिनियम के अधीन दायी हो, निधि में से किया जाएगा, और ऐसे संदत्त राशि, ऐसे संदत्त राशि से अनधिक ऐसी रकम की शास्ति सहित, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत आफिसर द्वारा अवधारित की जाए, निधि में संदाय के लिए जमा किए जाने के लिए, नियोजक से भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूलीय होगी ।
17. अभियोजनों पर निर्बंधन - इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध के लिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई भी अभियोजन, केन्द्रीय सरकार या उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत प्राधिकारी द्वारा या की सम्मति से संस्थित किए जाने के सिवाय संस्थित नहीं किया जाएगा ।
18. अपराधों का शमन - धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का, केन्द्रीय सरकार या उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत प्राधिकारी द्वारा शमन, ऐसी धनराशि के जैसी, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या वह प्राधिकारी ठीक समझे, निधि में जमा किए जाने के लिए संदाय पर, अभियोजन के संस्थित किए जाने के पूर्व या पश्चात् किया जा सकेगा ।
19. कोई भी दंड अधिरोपित करने की मजिस्ट्रेट के शक्ति - जहां कि इस अधिनियम के विरुद्ध किसी अपराध का विचारण प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट द्वारा किया जाए, वहां अपराध का विचारण करने वाला मजिस्ट्रेट, इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत कोई भी दंडादेश, दंड प्रव्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, पारित कर सकेगा ।
20. विधिक कार्यवाहियों का वर्जन - (1) कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही इस अधिनियम के अधीन सद््भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।
(2) किसी ऐसे धन के प्रतिदाय के लिए, जो इस अधिनियम के अधीन ली गई या ली गई तात्पर्यित बीमा पालिसी पर प्रीमियम के रूप में संदत्त किया गया हो या संदत्त किया गया तात्पर्यित हो, किसी सिविल न्यायालय में कोई भी वाद, केन्द्रीय सरकार के या धारा 11 के अधीन उसके अभिकर्ता के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति के विरुद्ध न चल सकेगा ।
21. नियोजकों को छूट देने की शक्ति - केन्द्रीय सरकार, यदि उसका समाधान हो जाए कि बीमाकर्ताओं के साथ नियोजक ने इस अधिनियम के प्रारम्भ के पहले ऐसी संविदा कर ली है जिसमें इस अधिनियम द्वारा उस नियोजक पर अधिरोपित दायित्व सारतः आ जाते हैं, उस नियोजक को, उसकी प्रार्थना पर इस अधिनियम के उपबंधों से छूट तब तक के लिए देगी जब तक वह संविदा चालू रहे ।
22. नियम बनाने की शक्ति - (1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित विहित कर सकेंगे
(क) वे सिद्धान्त जिनका अनुसरण नियोजक का कुल मजदूरी बिल अभिनिश्चित करने में किया जाना है, जिनके अंतर्गत उसमें से मजदूरी की कतिपय कोटियों के, या मजदूरी की परिभाषा में सम्मिलित कतिपय तत्वों के अपवर्जन के लिए उपबंध आता है;
(ख) धारा 8 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट बीमा पालिसियों का प्ररूप;
(ग) धारा 8 की उपधारा (5) के खंड (छ) में निर्दिष्ट कालावधि;
(घ) धारा 9 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट तारीख और कालावधि;
(ङ) धारा 13 की उपधारा (5) में निर्दिष्ट लेखा का प्ररूप और उसे तैयार और प्रकाशित करने की रीति;
(च) धारा 15 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट कालावधियां;
(छ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जाए ।
23. कठिनाइयों के निराकरण की शक्ति - यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उद्भूत हो और विशिष्टतः यदि इस बारे में कि क्या इस अधिनियम के अधीन कोई प्रतिकर संदेय है, या उसके परिणाम के बारे में कोई संदेह उद्भूत हो, तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, ऐसा उपबंध कर सकेगी या ऐसा निदेश दे सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों, और जो उसे संदेह या कठिनाई के निराकरण के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ; और या ऐसे मामलों में केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
24. 1[प्रत्येक स्कीम और नियम का संसद् के समक्ष रखा जाना]- इस अधिनियम के अधीन बनाई गई हर स्कीम और हर नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, संसद् के हर एक सदन के समक्ष, उस समय जब वह सत्र में हो, कुल मिलाकर तीस दिन की कालावधि के लिए, जो एक सत्र में या दो या अधिक व्रमवर्ती सत्रों में समाविष्ट हो सकेगी, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के जिसमें वह ऐसे रखा गया हो या पूर्वोक्त व्रमवर्ती सत्रों के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस स्कीम या नियम में कोई उपान्तर करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह स्कीम या नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात््, यथास्थिति, वह स्कीम या नियम ऐसे उपान्तरित रूप में ही प्रभावशील होगा या उसका कोई भी प्रभाव न होगा, किन्तु ऐसे कि ऐसा कोई उपान्तर या बातिलकरण उस स्कीम या नियम के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा ।
अनुसूची
[धाराएं 2 और 7(1) देखिए]
|
क्षति का वर्णन |
निःशक्तता का प्रतिशत |
|
1 |
2 |
|
ऊर्ध्वशाखा |
|
|
दोनों हाथों की या सभी अंगुलियों और अंगूठों की हानि |
100 |
|
स्कंध से दक्षिण भुजा का विच्छेदन |
90 |
|
स्कंध से वाम भुजा का विच्छेदन |
90 |
|
स्कंध से नीचे विच्छेदन, जबकि स्थूणक अंसकूट के सिरे से 6 इंच अधिक हो (दक्षिण) |
80 |
|
स्कंध से नीचे विच्छेदन, जबकि स्थूणक 6 इंच से अधिक न हो (दक्षिण) |
90 |
|
स्कंध से नीचे विच्छेदन, जबकि स्थूणक 6 इंच से अधिक न हो (वाम) |
80 |
|
स्कंध से नीचे विच्छेदन, जबकि स्थूणक अंसकूट के सिरे से 6 इंच से अधिक हो (वाम) |
70 |
|
कोहनी से या कोहनी से नीचे विच्छेदन, जबकि स्थूणक 5 इंच से अधिक न हो (दक्षिण) |
80 |
|
कोहनी से या कोहनी के नीचे से विच्छेदन, जबकि स्थूणक 5 इंच से अधिक न हो (वाम) |
70 |
|
कोहनी से नीचे विच्छेदन, जबकि स्थूणक 5 इंच से अधिक हो (दक्षिण) |
70 |
|
कोहनी से नीचे विच्छेदन, जबकि स्थूणक 5 इंच से अधिक हो (वाम) |
50 |
|
अंगूठे की हानि (दक्षिण) |
50 |
|
अंगूठे की हानि (वाम) |
40 |
|
चार अंगुलियों की हानि (दक्षिण) |
50 |
|
चार अंगुलियों की हानि (वाम) |
40 |
|
किसी भी हाथ की दो अंगुलियों की हानि |
20 |
|
अधः शाखा |
|
|
दो या अधिक अंगों की हानि |
100 |
|
दोनों पादों का विच्छेदन |
100 |
|
नितम्ब पर या नितम्ब से नीचे एक टांग का विच्छेदन, जबकि स्थूणक 5 इंच से अधिक न हो |
90 |
|
दोनों पादों का लिसफ्रेंक आपरेशन |
80 |
|
नितम्ब से नीचे विच्छेदन, जबकि स्थूणक 5 इंच से अधिक हो |
80 |
|
प्रपदांगुल्यस्थि संधि के निकट से दोनों पादों का विच्छेदन |
80 |
|
प्रपदांगुल्यास्थि संधि से दोनों पादों की सब अंगुलियों की हानि |
40 |
|
निकटस्थ अंतरागुल्यस्थि संधि के निकट दोनों पादों की सब अंगुलियों की हानि |
30 |
|
निकटस्थ अंतरागुल्यस्थि संधि से दूर दोनों पादों की सब अंगुलियों की हानि |
20 |
|
मध्य-उरु से नीचे घुटनों से या घुटनों के नीचे से टांग का विच्छेदन, जबकि स्थूणक 4 इंच से अधिक न हो |
70 |
|
घुटने से नीचे टांग का विच्छेदन, जबकि स्थूणक 4 इंच से अधिक हो |
60 |
|
एक पाद का लिसफ्रेंक विच्छेदन |
40 |
|
प्रपदांगुल्यस्थि संधि के निकट एक पाद से विच्छेदन |
30 |
|
निकटस्थ अंतरागुल्यस्थि संधि के निकट से एक पाद की सब अंगुलियों की हानि, जिसके अंतर्गत प्रपदांगुल्यस्थि संधि से विच्छेदन आता है |
20 |
|
अन्य विनिर्दिष्ट क्षति |
|
|
हाथ और पाद की हानि |
100 |
|
अन्य निःशक्तताएं |
|
|
चेहरे की बहुत गम्भीर विद्रुपिता |
100 |
|
वाक् शक्ति की पूर्ण हानि |
70 |
|
वेधन के बिना क्षति से संधि-गति का सीमित निर्बन्धन, या अस्थिभंग से अंग की सीमित व्रिया, या ह्रासित व्रिया के साथ किसी भी हाथ के अंगूठे या 2 या अधिक अंगुलियों का विवृत्त आस्थभंग |
20 |
अनुकूलनतम, अर्थात् अधिकतम उपयोगिता की स्थिति में संधिग्रह
|
भुजा स्कंध |
दक्षिण 40% |
वाम 30% |
|
कोहनी |
40% |
30% |
|
मणिबंध |
30% |
20% |
|
टांग |
|
|
|
नितम्ब |
|
60% |
|
घुटना |
|
40% |
|
टखना |
|
30% |
त्रुटिपूर्ण दृक् शक्ति
|
दृष्टि की हानि |
100% |
|
एक नेत्र की हानि, जबकि कोई अन्य उपद्रव न हो और दूसरा नेत्र प्रसामान्य हो |
40% |
|
एक नेत्र की दृष्टि की हानि, उपद्रव या विद्रूपिता सहित, जब दूसरा नेत्र प्रसामान्य हो |
40% |
|
एक नेत्र की दृष्टि की हानि, जब कि उपद्रव या विद्रूपिता न हो और दूसरा नेत्र प्रसामान्य हो |
30% |
दृक् शक्ति की त्रुटि की अन्य मात्राएं
|
जबकि अधिकतम अभिप्राप्य तीक्ष्णता निम्नलिखित हो एक नेत्र में दूसरे नेत्र में |
निर्धारण प्रतिशत |
जबकि एक नेत्र निकाल दिया जाए, बचे हुए नेत्र में चश्मे के साथ या बिना अभिप्राप्य अधिकतम तीक्ष्णता निम्नलिखित हो |
निर्धारण प्रतिशत |
|||
|
1. |
6/6 |
6/24 |
15.19 |
1. |
6/6 |
40 |
|
|
या |
6/36 |
20 |
2. |
6/9 |
|
|
2. |
6/9 |
6/60 |
3. |
6/12 |
||
|
|
या |
3/60 |
|
|
|
|
|
3. |
6/12 |
कुछ नहीं |
30 |
4. |
6/18 |
50 |
|
4. |
6/18 |
6/18 |
15.19 |
5. |
6/24 |
70 |
|
5. |
6/18 |
6/24 |
30 |
6. |
6/36 |
80 |
|
6. |
6/18 |
6/36 |
40 |
7. |
6/60 |
90 |
|
7. |
6/18 |
6/60 |
8. |
3/60 |
||
|
8. |
6/18 |
6/60 |
|
|
|
|
|
9. |
6/18 |
कुछ नहीं |
50 |
|
|
|
|
10. |
6/24 |
6/24 |
30 |
9. |
कुछ नहीं |
100 |
|
11. |
6/24 |
6/36 |
40 |
|
|
|
|
12. |
6/24 |
6/60 |
50 |
|
|
|
|
13. |
6/24 |
3/60 |
|
|
|
|
|
14. |
6/24 |
कुछ नहीं |
70 |
|
|
|
|
15. |
6/36 |
6/36 |
50 |
|
|
|
|
16. |
6/36 |
6/60 |
60 |
|
|
|
|
17. |
6/36 |
3/60 |
|
|
|
|
|
18. |
6/36 |
कुछ नहीं |
80 |
|
|
|
|
19. |
6/60 |
6/60 |
80 |
|
|
|
|
20. |
6/60 |
3/60 |
|
|
|
|
|
21. |
6/60 |
कुछ नहीं |
90 |
|
|
|
|
22. |
3/60 |
3/60 |
80 |
|
|
|
|
23. |
5/60 |
कुछ नहीं |
90 |
|
|
|
|
24. |
कुछ नहीं |
कुछ नहीं |
100 |
|
|
|
त्रुटिपूर्ण श्रवण शक्ति
निर्धारण दोनों कर्णों का एक साथ उपयोग करके प्राप्त श्रेणी पर अधिारित होना चाहिए; इस प्रकार प्राप्त श्रेणी के लिए समुचित निर्धारण प्रतिशत अंतिम स्तम्भ में दिया गया है ।
|
प्राप्त श्रवण शक्ति की श्रेणी |
एक साथ उपयोग करके, दोनों कर्णों का निर्धारण |
|
1. पूर्ण बधिरता 2. उद््ध्वनि 3 फुट के परे न हो 3. बातचीत की आवाज, 1 फुट से अधिक दूर नहीं 4. बातचीत की आवाज, 3 फुट से अधिक दूर नहीं 5. बातचीत की आवाज, 6 फुट से अधिक दूर नहीं 6. बातचीत की आवाज, 9 फुट से अधिक दूर नहीं - (क) एक कर्ण पूर्णतया बधिर (ख) अन्यथा |
80% 70% 60% 40% 20% 20% 20% से कम
|
इसलिए वह मामला जिसमें दक्षिण कर्ण ने श्रेणी 4 प्राप्त की हो, वाम कर्ण ने श्रेणी 2 प्राप्त की हो और दोनों कर्णों ने मिलकर श्रेणी 3 प्राप्त की हो, इस प्रकार अभिलिखित किया जाना चाहिए
द4 वा2 द+वा3 निर्धारण 60 प्रतिशत ।
ऊपर दिए हुए निर्धारण में, छोटी-छोटी व्याधियों को, जैसे शिरोवेदना, चक्कर आना, कर्ण क्ष्वेड, अनिद्रा आदि, जो कि साधारणतया बधिरता के साथ रहती हैं, ध्यान में रखा गया है ।
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