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भारतीय सामुद्रिक विश्वविद्यालय अधिनियम, 2008 ( Indian Maritime University Act, 2008 )


 

भारतीय सामुद्रिक विश्वविद्यालय अधिनियम, 2008

(2008 का अधिनियम संख्यांक 22)

[11 नवम्वर, 2008]

सामुद्रिक अध्ययनों तथा अनुसंधान को सुकर बनाने तथा उनका संवर्धन

करने और समुद्री विज्ञान तथा प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में, समुद्री पर्यावरण और अन्य संबद्ध क्षेत्रों में उत्कृष्टता प्राप्त करने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर अध्यापन तथा संबद्धक

विश्वविद्यालय की स्थापना और उसका

निगमन करने तथा उससे संबंधित या

उसके आनुषंगिक विषयों का

उपबंध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के उनसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय सामुद्रिक विश्वविद्यालय अधिनियम, 2008 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में और इसके अधीन बनाए गए सभी परिनियमों में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो, -

(क) विद्या परिषद्" से विश्वविद्यालय की विद्या परिषद् अभिप्रेत है;

(ख) शैक्षणिक कर्मचारिवृंद" से कर्मचारिवृंद के ऐसे प्रवर्ग अभिप्रेत हैं जो अध्यादेशों द्वारा शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के रूप में अभिहित किए जाएं;

(ग) सहबद्धता और मान्यता बोर्ड" से विश्वविद्यालय का सहबद्धता और मान्यता बोर्ड अभिप्रेत है;

(घ) अध्ययन बोर्ड" से विश्वविद्यालय का अध्ययन बोर्ड अभिप्रेत है;

(ङ) कैंपस" से शिक्षण, अनुसंधान, शिक्षा और प्रशिक्षण की व्यवस्था करने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा स्थापित या गठित इकाई अभिप्रेत है;  

(च) सक्षमता प्रमाणपत्र" से वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1958 (1958 का 44) के अधीन सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी किया गया प्रमाणपत्र अभिप्रेत है;

(छ) कुलाधिपति", कुलपति" और प्रतिकुलपति" से क्रमशः विश्वविद्यालय के कुलाधिपति, कुलपति और प्रतिकुलपति अभिप्रेत हैं;

(ज) महाविद्यालय" से ऐसा महाविद्यालय अभिप्रेत है जो सामुद्रिक अध्ययनों में या उनसे सहयुक्त विधाओं में शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान करने के लिए विश्वविद्यालय द्वारा चलाया जा रहा है या विश्वविद्यालय का विशेषाधिकार प्राप्त है;

(झ) सभा" से विश्वविद्यालय की सभा अभिप्रेत है;

(ञ) विभाग" से अध्ययन विभाग अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत अध्ययन केन्द्र भी है;

(ट) महानिदेशक" से वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1958 (1958 का 44) की धारा 7 के अधीन भारत सरकार द्वारा नियुक्त पोत परिवहन महानिदेशक अभिप्रेत है;

(ठ) दूर शिक्षा पद्धति" से संचार के किसी माध्यम जैसे कि प्रसारण, टेलीविजन प्रसारण, पत्राचार पाठ्यक्रमों, सेमिनार, संपर्क कार्यक्रमों, ई-लर्निंग अथवा ऐसे किन्हीं दो या अधिक माध्यमों के संयोजन द्वारा शिक्षा देने की पद्धति अभिप्रेत है;

(ड) कर्मचारी" से विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त कोई व्यक्ति अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत विश्वविद्यालय के प्रतिनियुक्त व्यक्तियों सहित शिक्षक और अन्य कर्मचारिवृन्द भी हैं;

(ढ) कार्य परिषद्" से विश्वविद्यालय की कार्य परिषद् अभिप्रेत है;

(ण) वित्त समिति" से विश्वविद्यालय की वित्त समिति अभिप्रेत है;

(त) किसी महाविद्यालय या संस्था के संबंध में शासी निकाय" से ऐसा शासी निकाय या कोई अन्य निकाय चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो, अभिप्रेत है, जिस पर, यथास्थिति, ऐसे महाविद्यालय या संस्था के कार्यों के प्रबंध का भार है और जो विश्वविद्यालय द्वारा उसी रूप में मान्यताप्राप्त हो;

(थ) छात्र निवास" से विश्वविद्यालय के या विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे किसी महाविद्यालय या संस्था के छात्रों के लिए निवास की इकाई अभिप्रेत है;

(द) संस्था" से सामुद्रिक अध्ययनों या उसकी सहयुक्त विधा में शिक्षा और प्रशिक्षण प्रदान करने हेतु विश्वविद्यालय द्वारा चलाई जा रही या विश्वविद्यालय का विशेषाधिकार प्राप्त संस्था, विद्यापीठ, महाविद्यालय या अध्ययन केन्द्र अभिप्रेत है;

(ध) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

(न) अपतट कैंपस" से विश्वविद्यालय की ऐसी संस्था, महाविद्यालय केन्द्र, विद्यापीठ या कैंपस अभिप्रेत है जो देश के बाहर स्थापित किया जा सकेगा;

(प) योजना बोर्ड" से विश्वविद्यालय का योजना बोर्ड अभिप्रेत है;

(फ) प्राचार्य" से किसी महाविद्यालय या किसी संस्था का प्रधान अभिप्रेत है;

(ब) मान्यताप्राप्त संस्था" से सामुद्रिक अध्ययनों या उनकी सहयुक्त विधाओं में शिक्षा देने के लिए विश्वविद्यालय की विशेषाधिकार प्राप्त कोई संस्था अभिप्रेत है;

(भ) मान्यताप्राप्त शिक्षक" से ऐसे व्यक्ति अभिप्रेत हैं जो विश्वविद्यालय का विशेषाधिकार प्राप्त महाविद्यालय या संस्था में शिक्षण देने के प्रयोजन के लिए विश्वविद्यालय द्वारा मान्यताप्राप्त हैं;

(म) विद्यापीठ" से विश्वविद्यालय में अध्यापन विद्यापीठ अभिप्रेत है;

(य) परिनियमों", अध्यादेशों" और विनियमों" से क्रमशः इस अधिनियम के अधीन बनाए गए परिनियम, अध्यादेश और विनियम अभिप्रेत हैं; 

(यक) विश्वविद्यालय" से इस अधिनियम के अधीन स्थापित भारतीय सामुद्रिक विश्वविद्यालय अभिप्रेत है;

(यख) विश्वविद्यालय के शिक्षक" से आचार्य, सह-आचार्य, सहायक आचार्य, उपाचार्य, ज्येष्ठ प्राध्यापक, प्राध्यापक और ऐसे अन्य व्यक्ति अभिप्रेत हैं जो विश्वविद्यालय में या विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे किसी महाविद्यालय या संस्था में शिक्षण देने या अनुसंधान करने के लिए नियुक्त किए जाएं; और

(यग) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग" से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 4 के अधीन स्थापित आयोग अभिप्रेत है ।

3. विश्वविद्यालय-(1) भारतीय सामुद्रिक विश्वविद्यालय के नाम से एक विश्वविद्यालय स्थापित किया जाएगा

(2) विश्वविद्यालय का मुख्यालय इसके मुंबई, कोलकाता, चैन्नई, विशाखापट्टनम और उसकी अधिकारिता के भीतर ऐसे स्थानों पर जो वह ठीक समझे कैंपसों सहित चैन्नई में होगा ।

(3) प्रथम कुलाधिपति, प्रथम कुलपति सभा के प्रथम सदस्य, कार्य परिषद्, शिक्षा परिषद्, योजना बोर्ड और वे सभी व्यक्ति, जो इसके पश्चात् ऐसे अधिकारी या सदस्य बनें, जब तक वे ऐसा पद या सदस्यता धारण करते रहें, विश्वविद्यालय का गठन करेंगे ।

(4) विश्वविद्यालय का शाश्वत् उत्तराधिकार होगा और उसकी सामान्य मुद्रा होगी तथा उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।

(5) विश्वविद्यालय अध्यापन और संबद्धक विश्वविद्यालय दोनों ही होगा ।

4. विश्वविद्यालय के उद्देश्य-विश्वविद्यालय के निम्नलिखित उद्देश्य होंगे :-

(i) समुद्र विज्ञान, सामुद्रिक इतिहास, समुद्री विधि, समुद्री सुरक्षा, तलाश और बचाव, खतरनाक स्थोरा का परिवहन, पर्यावरणीय अध्ययनों और अन्य संबंधित क्षेत्र जैसे अध्ययनों के नए-नए क्षेत्रों पर ध्यान देने के साथ सामुद्रिक अध्ययनों, प्रशिक्षण अनुसंधान और विस्तार कार्य को सुकर बनाना और संवर्धन करना और इन क्षेत्रों और संबंधित क्षेत्रों और उनसे संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों में उत्कृष्टता भी प्राप्त करना;

(ii) विद्या की ऐसी शाखाओं में, जो वह ठीक समझे, संस्थागत और अनुसंधान की सुविधाएं प्रदान करके ज्ञान की अभिवृद्धि करना और विज्ञान और प्रौद्योगिकी के प्रमुख और सीमांत क्षेत्रों में और विश्वविद्यालय के शैक्षिक कार्यक्रमों में संबद्ध विधाओं में समेकित पाठ्यक्रमों की व्यवस्था करना;

(iii) अध्यापन-विद्या की प्रक्रिया, अंतरविषयक अध्ययन और अनुसंधान में उतरोत्तर नवीनता लाने के लिए समुचित उपाय करना; और भारत के लोगों के शैक्षिक और आर्थिक हितों का संवर्धन तथा कल्याण पर विशेष ध्यान देना;

(iv) भारत के संविधान में यथा उल्लेखित स्वतंत्रता, धर्म निरपेक्षता, समानता और सामाजिक न्याय का संवर्धन करना और राष्ट्रीय विकास के लिए आधारित दृष्टिकोणों और मर्म के मूल्यों का संवर्धन करके सामाजिक, आर्थिक, रूपान्तरण के उत्प्रेरक के रूप में कार्य करना; और 

(v) स्थानीय, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय विकास के विषयों से विश्वविद्यालय को संबद्ध करके व्यष्टियों और समाज के विकास के लिए ज्ञान और दक्षता के फायदे का विस्तार करना ।

5. विश्वविद्यालय की शक्तियां-विश्वविद्यालय को निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात्: -

(i) विद्या की ऐसी शाखाओं में, जो विश्वविद्यालय समय-समय पर अवधारित करे, शिक्षण की व्यवस्था करना तथा अनुसंधान के लिए और ज्ञान की अभिवृद्धि और प्रसार के लिए व्यवस्था करना;

(ii) विशेष अध्ययनों की जिम्मेदारी के लिए मान्यताप्राप्त संस्थाओं का उपबंध करना;

(iii) अनुसंधान, प्रशिक्षण और विशेषीकृत अध्ययन के कैंपस, महाविद्यालय, संस्थाएं, विभाग, प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, संग्रहालय, केन्द्र स्थापित करना और उनको चलाना;

(iv) छात्रावास, स्वास्थ्य केन्द्र और सभा भवन, खेल के मैदान, व्यायामशाला, तैरने के तालाब, प्रशिक्षण पोत जैसी अन्य संबंधित प्रसुविधाएं स्थापित करना और उनको चलाना;

(v) मान्याप्राप्त महाविद्यालयों के किसी समूह की सेवा करने के लिए कैंपसों की स्थापना करने का उपबंध करना और ऐसे कैंपसों में पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं, कम्प्यूटर केन्द्रों तथा उसी तरह के अध्ययन केन्द्रों के रूप में सामान्य संसाधन केन्द्रों के लिए उपबंध करना और उनको चलाना;

(vi) ऐसी शर्तों के अधीन जो विश्वविद्यालय अवधारित करे, समुद्री यात्राओं की सक्षमताओं के प्रमाणपत्रों से भिन्न ऐसे प्रमाणपत्रों के लिए डिप्लोमा प्रदान करना, जो केन्द्रीय सरकार के अन्यथा विनिश्चित किए जाने तक पोत परिवहन महानिदेशक, भारत सरकार द्वारा जारी किए जाते रहेंगे और परीक्षा, मूल्यांकन या परीक्षण की किसी अन्य प्रणाली के आधार पर व्यक्तियों को उपाधियां या अन्य विद्या संबंधी विशिष्ट उपाधियां प्रदान करना तथा उचित और पर्याप्त कारण होने पर ऐसे डिप्लोमाओं, प्रमाणपत्रों, उपाधियों या अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियों को वापस लेना;

(vii) परिनियमों द्वारा विहित रीति से मानद उपाधियां या अन्य विशेष उपाधियां प्रदान करना;

(viii) निवेश बाह्य अध्ययनों, प्रशिक्षण और विस्तार सेवाओं का आयोजन करना और उनका भार अपने ऊपर लेना;

(ix) विश्वविद्यालय द्वारा अपेक्षित निदेशक पद, प्रधानाचार्य पद, आचार्य पद, सह आचार्य पद, सहायक आचार्य पद और अन्य अध्यापन या शैक्षणिक पद संस्थित करना और ऐसे प्रधानाचार्य पद, आचार्य पद, सह आचार्य पद, सहायक आचार्य पद या शैक्षणिक पदों पर व्यक्तियों की नियुक्ति करना;

(x) निम्नलिखित की सेवा के निबन्धन और शर्तों का उपबंध करना-

(i) विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त निदेशकों, प्रधानाचार्यों और शिक्षकों तथा शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के अन्य सदस्य;

(ii) किसी महाविद्यालय या संस्था द्वारा नियुक्त शिक्षक और शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के अन्य सदस्य; और

(iii) मान्यताप्राप्त महाविद्यालय या संस्था का कोई अन्य कर्मचारी, चाहे वह विश्वविद्यालय द्वारा नियुक्त किया गया हो या ऐसे महाविद्यालय या संस्था द्वारा नियुक्त किया गया हो;

(xi) किसी अन्य विश्वविद्यालय या संगठन में कार्य करने वाले व्यक्तियों को विनिर्दिष्ट अवधि के लिए विश्वविद्यालय के शिक्षकों के रूप में नियुक्त करना;

(xii) उच्चतर विद्या की किसी संस्था को ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विश्वविद्यालय अवधारित करे, मान्यता देना और ऐसी मान्यता को वापस लेना;

(xiii) शिक्षकों, मूल्यांककों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के लिए पुनश्चर्या पाठ्यक्रम, कर्मशालाएं, सेमिनार और अन्य कार्यक्रमों का आयोजन और संचालन करना;

(xiv) अभ्यागत आचार्यों, प्रतिष्ठित आचार्यों, परामर्शदाताओं, विद्वानों तथा ऐसे अन्य व्यक्तियों को संविदा पर या अन्यथा नियुक्त करना जो विश्वविद्यालय के उद्देश्यों की अभिवृद्धि में योगदान दे सकें;

(xv) विश्वविद्यालय में शिक्षण, गैर-शिक्षण, प्रशासनिक, अनुसचिवीय और अन्य पदों का सृजन करना और उन पर नियुक्तियां करना;

(xvi) भारत या विदेश में किसी अन्य विश्वविद्यालय या प्राधिकारी या उच्चतर विद्या की संस्था के साथ ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए जो विश्वविद्यालय अवधारित करे, सहकार या सहयोग करना या सहयुक्त होना;

(xvii) विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार प्राप्त किसी संस्था में शिक्षण देने के लिए व्यक्तियों की नियुक्ति का अनुमोदन करना और ऐसे अनुमोदन को वापस लेना;

(xviii) मान्यताप्राप्त संस्थाओं का उक्त प्रयोजन के लिए स्थापित समुचित मशीनरी के माध्यम से निरीक्षण करना और यह सुनिश्चित करने के लिए उपाय करना कि उनके द्वारा शिक्षण, अध्यापन और प्रशिक्षण के उचित मानकों का पालन किया जा रहा है और उसके लिए यथायोग्य पुस्तकालय, प्रयोगशाला, अस्पताल, कर्मशाला और अन्य शैक्षणिक सुविधाएं प्रदान की जा रही हैं;

(xix) स्ववित्त पोषित महाविद्यालयों और संस्थाओं के छात्रों पर उद्गृहीत किए जाने वाली फीस और अन्य प्रभार विहित करना;

(xx) एक ही और समान क्षेत्रों में कार्य करने वाले विभिन्न महाविद्यालयों और संस्थाओं के कार्य का समन्वय करना;

(xxi) कम्प्यूटर केन्द्र, प्रशिक्षण केन्द्र, सहायता केन्द्र, पुस्तकालय, अनुरूपक जैसी केन्द्रीय प्रसुविधाओं की स्थापना करना;

(xxii) विभिन्न विषयों के लिए पाठ्यक्रम विकास केन्द्रों की स्थापना करना;

(xxiii) ऐसे महाविद्यालयों और संस्थाओं को, जो विश्वविद्यालय द्वारा नहीं चलाई जाती हैं; विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार देना; उन सभी या उनमें से किन्हीं विशेषाधिकारों को ऐसी शर्तों के अनुसार, जो परिनियमों द्वारा, विहित की जाएं, वापस लेना; 

(xxiv) ऐसे छात्र निवासों को, जो विश्वविद्यालय द्वारा नहीं चलाए जाते हैं और छात्रों के लिए अन्य वास सुविधाओं को मान्यता देना, उनका मार्गदर्शन, पर्यवेक्षण और नियंत्रण करना और ऐसी किसी मान्यता को वापस लेना;

(xxv) अनुसंधान और सलाहकार सेवाओं की व्यवस्था करना और उस प्रयोजन के लिए अन्य संस्थाओं या निकायों से ऐसे ठहराव करना जो विश्वविद्यालय आवश्यक समझे;

(xxvi) महाविद्यालयों और संस्थाओं को मान्यता देने के लिए फीस विहित करना;

(xxvii) विश्वविद्यालय में प्रवेश के लिए मानक अवधारित करना जिनके अंतर्गत परीक्षा, मूल्यांकन या परीक्षण की कोई अन्य पद्धति भी है;

(xxviii) अध्येतावृत्ति, छात्रवृत्ति, अध्ययनवृत्ति, सहायता वृत्ति, पदक और पुरस्कार संस्थित करना और प्रदान करना;

(xxix) फीसों और अन्य प्रभारों के संदाय की मांग करना और उन्हें प्राप्त करना;

(xxx) विश्वविद्यालय के छात्रों के आवासों का पर्यवेक्षण करना और उनके स्वास्थ्य और सामान्य कल्याण की अभिवृद्धि के लिए प्रबंध करना;

(xxxi) महिला छात्रों के संबंध में ऐसे विशेष इंतजाम करना, जो विश्वविद्यालय वांछनीय समझे;

(xxxii) विश्वविद्यालय के तथा महाविद्यालयों और संस्थाओं के छात्रों के आचरण को विनियमित करना;

(xxxiii) विभागों, मान्यताप्राप्त संस्थाओं, विद्यापीठों और अध्ययन केन्द्रों में अध्ययन के विभिन्न पाठ्यक्रमों के लिए छात्रों के प्रवेश का नियन्त्रण और विनियमन करना;

(xxxiv) विश्वविद्यालय के कर्मचारियों और महाविद्यालयों और संस्थाओं के कर्मचारियों के कार्य और आचरण को विनियमित करना;

(xxxv) विश्वविद्यालय के कर्मचारियों और छात्रों में अनुशासन को विनियमित करना और उसका पालन कराना तथा इस संबंध में ऐसे अनुशासन संबंधी उपाय करना जो आवश्यक समझे जाएं;

(xxxvi) मान्यताप्राप्त महाविद्यालयों और संस्थाओं के प्रबन्ध-मंडलों के लिए आचार संहिता विहित करना;

(xxxvii) विश्वविद्यालय के और उन महाविद्यालयों और संस्थाओं के कर्मचारियों के स्वास्थ्य और सामान्य कल्याण की अभिवृद्धि के लिए प्रबन्ध करना;

(xxxviii) व्यक्तियों से उपकृति, संदान और दान प्राप्त करना और ऐसे पदों, संस्थाओं, भवनों, तथा इसी प्रकार के स्थानों पर उनका नामांकन करना जैसा विश्वविद्यालय अवधारित करे, विश्वविद्यालय को उनके दान या संदान की राशि वह होगी जैसा विश्वविद्यालय विनिश्चित करे;

(xxxix) विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए किसी स्थावर या जंगम संपत्ति को, जिसके अंतर्गत न्यास और विन्यास संपत्ति भी है, अर्जित करना, धारण करना, उसका प्रबंध और व्ययन करना;

(xl) विश्वविद्यालय के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से विश्वविद्यालय की संपत्ति की प्रतिभूति पर धन उधार लेना;

(xli) विषयों, विशेषज्ञता के क्षेत्रों, तकनीकी जनशक्ति की शिक्षा और प्रशिक्षण के स्तरों के निबधंनों के अनुसार छात्रों की आवश्यकताओं का अल्पकालीन और दीर्घकालीन दोनों आधारों पर निर्धारण करना और इन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक कार्यक्रम आरंभ करना;

(xlii) पूरक सुविधाओं की व्यवस्था करने के लिए उद्योग का सहयोग प्राप्त करने के उपाय प्रारम्भ करना;

(xliii) दूर शिक्षण" और मुक्त विचारधारा" के माध्यम से शिक्षण का अनौपचारिक मुक्त शिक्षण धारा से औपचारिक धारा में और विपर्ययेन में बनाने के लिए उपबंध करना;

(xliv) अनुसंधान और शिक्षण के लिए ऐसे कैंपस, विशेष केन्द्र, विशेषित प्रयोगशालाएं या अन्य इकाइयां स्थापित करना, जो विश्वविद्यालय की राय में उसके उद्देश्यों को अग्रसर करने के लिए आवश्यक हों;

(xlv) यथास्थिति, किसी महाविद्यालय या संस्था या विभाग को, परिनियमों के अनुसार स्वायत्त प्रास्थिति प्रदान करना;

(xlvi) उद्योग और संस्थाओं के कर्मचारियों के सामुद्रिक मानक को उन्नत करने के लिए प्रशिक्षण की व्यवस्था करना और ऐसे प्रशिक्षण के लिए फीस उद्गृहीत करना जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए;

(xlvii) विश्वविद्यालय के लक्ष्यों और उद्देश्यों की उन्नति के लिए जब कभी आवश्यक समझे, देश के बाहर किसी स्थान पर अपतट कैंपस की स्थापना करना;

(xlviii) ऐसे अन्य सभी कार्य और बातें करना जो उसके सभी या किन्हीं उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए आवश्यक, आनुषंगिक या सहायक हों;

6. अधिकारिता-विश्वविद्यालय की अधिकारिता का विस्तार संपूर्ण भारत पर होगा ।

7. विश्वविद्यालय का सभी वर्गों, जातियों और पंथों के लिए खुला होना-विश्वविद्यालय सभी स्त्रियों और पुरूषों के लिए चाहे वे किसी भी जाति, पंथ, मूलवंश या वर्ग के हों, खुला होगा और विश्वविद्यालय के लिए यह विधिपूर्ण नहीं होगा कि वह किसी व्यक्ति को विश्वविद्यालय के शिक्षक के रूप में नियुक्त किए जाने या उसमें कोई अन्य पद धारण करने या विश्वविद्यालय में छात्र के रूप में प्रवेश पाने या उसमें उपाधि प्राप्त करने या उसके किसी विशेषाधिकार का उपभोग या प्रयोग करने का हकदार बनाने के लिए किसी धार्मिक विश्वास या मान्यता संबंधी मानदंड अपनाए या उन पर अधिरोपित करे :

परंतु इस धारा की कोई बात विश्वविद्यालय को, महिलाओं, शारीरिक रूप से असुविधाग्रस्त या समाज के कमजोर वर्गों और विशिष्टतया अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के व्यक्तियों के नियोजन या शिक्षा संबंधी हितों की अभिवृद्धि के लिए विशेष उपबंध करने से निवारित करने वाली नहीं समझी जाएगी ।

8. विश्वविद्यालय की निधि-(1) विश्वविद्यालय की एक निधि होगी, जिसमें निम्नलिखित सम्मिलित होगा,-

(क) केन्द्रीय सरकार या केन्द्रीय सरकार के परिकरण द्वारा किया गया कोई अंशदान या अनुदान;

(ख) राज्य सरकारों द्वारा दिया गया कोई अंशदान या अनुदान;

(ग) पोत-परिवहन कंपनियों, अपतट सन्निर्माण कंपनियों और निमज्जन-कंपनियों से मिला कोई अंशदान;

(घ) किसी प्राइवेट व्यष्टि या संस्था द्वारा की गई कोई वसीयत, संदान, विन्यास या अन्य अनुदान;

(ङ) फीसों और प्रभारों से विश्वविद्यालय को प्राप्त आय;

(च) किसी अन्य स्रोत से प्राप्त धनराशियां ।

(2) उक्त निधि विश्वविद्यालय के ऐसे प्रयोजनों के लिए और ऐसी रीति में उपयोग की जाएगी जो परिनियमों और अध्यादेशों द्वारा विहित की जाए ।

9. कुलाध्यक्ष-(1) भारत का राष्ट्रपति विश्वविद्यालय का कुलाध्यक्ष होगा ।

(2) कुलाध्यक्ष, विश्वविद्यालय के, जिसके अंतर्गत उसके द्वारा संचालित महाविद्यालय और संस्थाएं भी हैं, कार्य और प्रगति का पुनर्विलोकन करने के लिए और उस पर अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए, समय-समय पर, एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा; और रिपोर्ट की प्राप्ति पर कुलाध्यक्ष, उस पर कुलपति के माध्यम से कार्य परिषद् का विचार अभिप्राप्त करने के पश्चात् ऐसी कार्रवाई कर सकेगा और ऐसे निदेश जारी कर सकेगा जो वह रिपोर्ट में चर्चित विषयों में से किसी के बारे में आवश्यक समझे और विश्वविद्यालय ऐसे निदेशों का पालन करने के लिए आबद्ध होगा ।

(3) कुलाध्यक्ष को ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा, जिन्हें वह निदेश दे, विश्वविद्यालय, उसके भवनों, प्रयोगशालाओं तथा उपस्कर का और विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जाने वाले या उसके विशेषाधिकार प्राप्त किसी महाविद्यालय, संस्था या कैंपस का और विश्वविद्यालय द्वारा संचालित की गई परीक्षाओं, दिए गए शिक्षण और अन्य कार्य का भी निरीक्षण कराने का और विश्वविद्यालय, महाविद्यालयों या संस्थाओं के प्रशासन या वित्त से संबंधित किसी मामले की बाबत उसी रीति से जांच कराने का अधिकार होगा ।

(4) कुलाध्यक्ष, उपधारा (3) में निर्दिष्ट प्रत्येक मामले में निरीक्षण या जांच कराने के अपने आशय की सूचना, -

(क) विश्वविद्यालय को देगा, यदि ऐसा निरीक्षण या जांच, विश्वविद्यालय या उसके द्वारा चलाए जाने वाले महाविद्यालय या संस्था के संबंध में है; या

(ख) महाविद्यालय या संस्था के प्रबंध-मंडल को देगा, यदि निरीक्षण या जांच विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार प्राप्त महाविद्यालय या संस्था के संबंध में है,

और, यथास्थिति, विश्वविद्यालय या प्रबंध-मंडल को, कुलाध्यक्ष को ऐसे अभ्यावेदन करने का अधिकार होगा जो वह आवश्यक समझे ।

(5) कुलाध्यक्ष, यथास्थिति, विश्वविद्यालय या प्रबंध-मंडल द्वारा किए गए अभ्यावेदनों पर, यदि कोई हों, विचार करने के पश्चात्, ऐसा निरीक्षण या जांच करा सकेगा जो उपधारा (3) में निर्दिष्ट है ।

(6) जहां कुलाध्यक्ष द्वारा कोई निरीक्षण या जांच कराई गई है वहां, यथास्थिति, विश्वविद्यालय या प्रबंध-मंडल एक प्रतिनिधि नियुक्त करने का हकदार होगा जिसे ऐसे निरीक्षण या जांच में वैयक्तिक रूप में उपस्थित होने और सुने जाने का अधिकार होगा ।

(7) यदि निरीक्षण या जांच, विश्वविद्यालय या उसके द्वारा चलाए जाने वाले किसी महाविद्यालय या संस्था के संबंध में की जाती है तो कुलाध्यक्ष ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणाम के संदर्भ में कुलपति को संबोधित कर सकेगा और उस पर कार्रवाई करने के संबंध में ऐसे विचार और ऐसी सलाह दे सकेगा जो कुलाध्यक्ष देना चाहे, और कुलाध्यक्ष से संबोधन की प्राप्ति पर कुलपति, तुरंत कार्य परिषद् को निरीक्षण या जांच के परिणाम और कुलाध्यक्ष के विचार तथा ऐसी सलाह संसूचित करेगा जो कुलाध्यक्ष द्वारा उस पर की जाने वाली कार्रवाई के संबंध में दी गई हो ।

(8) यदि निरीक्षण या जांच, विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार प्राप्त किसी महाविद्यालय या संस्था के संबंध में की जाती है तो कुलाध्यक्ष, ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणाम के संदर्भ में, उस पर अपने विचार और ऐसी सलाह जो वह उस पर की जाने वाली कार्रवाई के संबंध में देना चाहे कुलपति के माध्यम से संबंधित प्रबंध-मंडल को संबोधित कर सकेगा ।

(9) यथास्थिति, कार्य परिषद् या प्रबंध-मंडल, कुलपति के माध्यम से कुलाध्यक्ष को वह कार्रवाई, यदि कोई हो, संसूचित करेगा जो वह ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणामस्वरूप करने की प्रस्थापना करता है या की गई है ।

(10) जहां कार्य परिषद् या प्रबंध-मंडल, कुलाध्यक्ष के समाधानप्रद रूप में कोई कार्रवाई उचित समय के भीतर नहीं करता है वहां कुलाध्यक्ष, कार्य परिषद् या प्रबंध-मंडल द्वारा दिए गए स्पष्टीकरण या किए गए अभ्यावेदन पर विचार करने के पश्चात् ऐसे निदेश जारी कर सकेगा जो वह ठीक समझे और, यथास्थिति, कार्य परिषद् या प्रबंध-मंडल ऐसे निदेशों का पालन करेगा ।

(11) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कुलाध्यक्ष विश्वविद्यालय की किसी ऐसी कार्यवाही को, जो इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों के अनुरूप नहीं है, लिखित आदेश द्वारा, निष्प्रभाव कर सकेगा:

परन्तु कोई ऐसा आदेश करने से पहले, कुलाध्यक्ष कुलसचिव से इस बात का कारण बताने की अपेक्षा करेगा कि ऐसा आदेश क्यों किया जाए और यदि उचित समय के भीतर कोई कारण बताया जाता है तो वह उस पर विचार करेगा

(12) पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी कुलाध्यक्ष विश्वविद्यालय को सनुवाई का अवसर देने के पश्चात् विश्वविद्यालय को ऐसा निदेश दे सकेगा जो परिस्थितियों के आधार पर उचित हो ।

(13) कुलाध्यक्ष को ऐसी अन्य शक्तियां होंगी जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं ।

10. विश्वविद्यालय के अधिकारी-विश्वविद्यालय के निम्नलिखित अधिकारी होंगे-

(1) कुलाधिपति;

(2) कुलपति;

(3) प्रतिकुलपति;

(4) विद्यापीठों के संकायाध्यक्ष;

(5) निदेशक;

(6) कुलसचिव;

(7) वित्त अधिकारी; और

(8) ऐसे अन्य अधिकारी जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के अधिकारी घोषित किए जाएं ।

11. कुलाधिपति-(1) कुलाधिपति की नियुक्ति, कुलाध्यक्ष के द्वारा ऐसी रीति से की जाएगी जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए ।

(2) कुलाधिपति, अपने पदाभिधान से, विश्वविद्यालय का प्रधान होगा ।

(3) यदि कुलाधिपति उपस्थित है तो उपाधियां प्रदान करने के लिए आयोजित विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोहों की अध्यक्षता करेगा ।

12. कुलपति-(1) कुलपति की नियुक्ति कुलाध्यक्ष द्वारा ऐसी रीति से की जाएगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए

(2) कुलपति, विश्वविद्यालय का प्रधान कार्यपालक और शैक्षणिक अधिकारी होगा और विश्वविद्यालय के कार्यकलापों पर साधारण पर्यवेक्षण और नियंत्रण रखेगा और विश्वविद्यालय के सभी प्राधिकारियों के विनिश्चयों को कार्यान्वित करेगा ।  

(3) यदि कुलपति की यह राय है कि किसी मामले में तुरन्त कार्रवाई करना आवश्यक है तो वह किसी ऐसी शक्ति का प्रयोग कर सकेगा जो विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी को इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त है और अपने द्वारा उस मामले में की गई कार्रवाई की रिपोर्ट उस प्राधिकारी को देगा:

परन्तु यदि संबंधित प्राधिकारी की यह राय है कि ऐसी कार्रवाई नहीं की जानी चाहिए थी तो वह ऐसा मामला कुलाध्यक्ष को निर्देशित कर सकेगा, जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा :

परन्तु यह और कि विश्वविद्यालय की सेवा में किसी ऐसे व्यक्ति को, जो इस उपधारा के अधीन कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई से व्यथित है, यह अधिकार होगा कि जिस तारीख को ऐसी कार्रवाई का विनिश्चय उसे संसूचित किया जाता है उससे तीन मास के भीतर वह उस कार्रवाई के विरुद्ध अपील, कार्य परिषद् को करे और तब कार्य परिषद्, कुलपति द्वारा की गई कार्रवाई को पुष्ट कर सकेगी, उपांतरित कर सकेगी या उसे उलट सकेगी ।

(4) यदि कुलपति की यह राय है कि विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी का कोई विनिश्चय इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों के उपबंधों द्वारा प्रदत्त प्राधिकारी की शक्तियों के बाहर है या किया गया विनिश्चय विश्वविद्यालय के हित में नहीं है तो वह संबंधित प्राधिकारी से अपने विनिश्चय का, ऐसे विनिश्चय के साठ दिन के भीतर पुनर्विलोकन करने के लिए कह सकेगा और यदि वह प्राधिकारी उस विनिश्चय का पूर्णतः या भागतः पुनर्विलोकन करने से इंकार करता है या उसके द्वारा उक्त साठ दिन की अवधि के भीतर कोई विनिश्चय नहीं किया जाता है तो वह मामला कुलाध्यक्ष को निर्दिष्ट किया जाएगा जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।

(5) कुलपति किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा, जैसा वह निदेश करे, किसी ऐसे महाविद्यालय या किसी संस्था, जो विश्वविद्यालय द्वारा नहीं चलाई जा रही हो, उसके भवनों, पुस्तकालयों, प्रयोगशालाओं और उपस्कार का और महाविद्यालय और संस्था द्वारा संचालित की जा रही परीक्षाओं, अध्यापन और किए जा रहे अन्य कार्य का भी निरीक्षण करवा सकेगा और महाविद्यालय या संस्थाओं के प्रशासन और वित्त से संबद्ध किसी विषय के संबंध में, उसी रीति में कोई जांच करवा सकेगा ।

(6) कुलपति ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग और ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगा जो परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा विहित किए जाएं ।

13. प्रतिकुलपति- प्रतिकुलपति की नियुक्ति ऐसी रीति से और सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

14. विद्यापीठों के संकायाध्यक्ष-प्रत्येक विद्यापीठ के संकायाध्यक्ष की नियुक्ति ऐसी रीति से की जाएगी और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

15. निदेशक-प्रत्येक निदेशक की नियुक्ति ऐसी रीति से और सेवा के ऐसे निबंधनों और शर्तों पर की जाएगी और वह ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

16. कुलसचिव-(1) प्रत्येक कुलसचिव की नियुक्ति ऐसी रीति से की जाएगी जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए

(2) कुलसचिव को विश्वविद्यालय की ओर से करार करने, दस्तावेजों पर हस्ताक्षर करने और अभिलेखों को अधिप्रमाणित करने की शक्ति होगी ।

(3) प्रत्येक कुलसचिव ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं

17. वित्त अधिकारी-वित्त अधिकारी की नियुक्ति ऐसी रीति से की जाएगी और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

18. अन्य अधिकारी-विश्वविद्यालय के अन्य अधिकारियों की नियुक्ति की रीति और उनकी शक्तियां तथा कर्तव्य परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंगे ।

19. विश्वविद्यालय के प्राधिकारी-विश्वविद्यालय के निम्नलिखित प्राधिकारी होंगे-

(1) सभा;

(2) कार्य परिषद्; 

(3) विद्या परिषद्;

(4) योजना बोर्ड;

(5) सहबद्ध और मान्यता बोर्ड;

(6) विद्यापीठों का बोर्ड;

(7) वित्त समिति; और

(8) ऐसे अन्य प्राधिकारी जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के प्राधिकारी घोषित किए जाएं ।

20. सभा-(1) सभा का गठन तथा उसके सदस्यों की पदावधि परिनियमों द्वारा विहित की जाएगी ।

(2) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, सभा की निम्नलिखित शक्तियां और कृत्य होंगे, अर्थात्: - 

(क) विश्वविद्यालय की व्यापक नीतियों और कार्यक्रमों का समय-समय पर पुनर्विलोकन करना तथा विश्वविद्यालय के सुधार और विकास के लिए उपाय सुझाना;

(ख) विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट और वार्षिक लेखाओं पर तथा ऐसे लेखाओं की लेखापरीक्षा रिपोर्ट पर विचार करना और संकल्प पारित करना;

(ग) कुलाध्यक्ष को किसी ऐसे मामले की बाबत सलाह देना जो उसे सलाह के लिए निर्देशित किया जाए; और

(घ) ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करना जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

21. कार्य परिषद्-(1) कार्य परिषद्, विश्वविद्यालय की प्रधान कार्यपालक निकाय होगी ।

(2) कार्य परिषद् का गठन, उसके सदस्यों की पदावधि तथा उसकी शक्तियां और कृत्य परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंगे

22. विद्या परिषद्-(1) विद्या परिषद्, विश्वविद्यालय की प्रधान शैक्षणिक निकाय होगी और इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, विश्वविद्यालय के भीतर शिक्षण, शिक्षा और परीक्षा के मानकों पर नियंत्रण और पर्यवेक्षण रखेगी और उनको बनाए रखने के लिए जिम्मेदार होगी और ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करेगी जो उसे प्रदत्त की जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं

(2) विद्या परिषद् को सभी शैक्षिक विषयों पर कार्यकारी परिषद् को सलाह देने का अधिकार होगा ।

(3) विद्या परिषद् का गठन और उसके सदस्यों की पदावधि वह होगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए ।

23. सहबद्ध और मान्यता बोर्ड-(1) सहबद्ध और मान्यता बोर्ड, महाविद्यालयों और संस्थाओं को विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार देने के लिए उत्तरदायी होगा ।

(2) सहबद्ध और मान्यता बोर्ड का गठन, उसके सदस्यों की पदावधि तथा उसकी शक्तियां और कर्तव्य ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

24. योजना बोर्ड-(1) योजना बोर्ड, विश्वविद्यालय का प्रधान योजना निकाय होगा ।

(2) योजना बोर्ड, विश्वविद्यालय के विकास को मानीटर करने के लिए उत्तरदायी होगा ।

(3) योजना बोर्ड का गठन, उसके सदस्यों की पदावधि तथा उसकी शक्तियां और कृत्य परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंगे

25. विद्यापीठों का बोर्ड-(1) विद्यापीठों के उतने बोर्ड होंगे जितने विश्वविद्यालय समय-समय पर अवधारित करे

(2) विद्यापीठों के बोर्डों का गठन, शक्तियां और कृत्य वे होंगे जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

26. वित्त समिति-वित्त समिति का गठन, उसकी शक्तियां और कृत्य परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंगे ।

27. विश्वविद्यालय के अन्य प्राधिकारी-ऐसे अन्य प्राधिकारियों का, जो परिनियमों द्वारा विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों के रूप में घोषित किए जाएं, गठन, उनकी शक्तियां और कृत्य, परिनियमों द्वारा विहित किए जाएंगे

28. परिनियम बनाने की शक्ति-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, परिनियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों और अन्य निकायों का, जो समय-समय पर गठित किए जाएं, गठन उनकी शक्तियां और कृत्य;

(ख) उक्त प्राधिकारियों और निकायों के सदस्यों का निर्वाचन और उनका पदों पर बने रहना, सदस्यों के पदों की रिक्तियों का भरा जाना तथा उन प्राधिकारियों और अन्य निकायों से संबंधित अन्य सभी विषय जिनके लिए उपबंध करना आवश्यक या वांछनीय हों;

(ग) विश्वविद्यालय के अधिकारियों की नियुक्ति की रीति, सेवा के निबंधन और शर्तें, उनकी शक्तियां और कर्तव्य तथा उनकी उपलब्धियां;

() विश्वविद्यालय के शिक्षकों, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति की रीति और उनकी उपलब्धियां;

(ङ) किसी संयुक्त परियोजना को कार्यान्वित करने के लिए किसी अन्य विश्वविद्यालय या संगठन में काम करने वाले शिक्षकों और शैक्षणिक कर्मचारिवृंद की विनिर्दिष्ट अवधि के लिए नियुक्ति की रीति, उनकी सेवा के निबन्धन और शर्तें तथा उपलब्धियां;

(च) कर्मचारियों की सेवा की शर्तें, जिनके अन्तर्गत पेंशन, बीमा और भविष्य-निधि का उपबंध भी है, सेवा समाप्ति और अनुशासनिक कार्रवाई की रीति;

(छ) विश्वविद्यालय के कर्मचारियों की सेवा में ज्येष्ठता को शासित करने वाले सिद्धांत;

(ज) कर्मचारियों या छात्रों और विश्वविद्यालय के बीच विवाद के मामलों में माध्यस्थम् की प्रक्रिया;

(झ) विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी या प्राधिकारी की कार्रवाई के विरुद्ध किसी कर्मचारी या छात्र द्वारा कार्य परिषद् को अपील करने की प्रक्रिया;

(ञ) किसी महाविद्यालय या किसी संस्था या किसी विभाग को स्वायत्त प्रास्थिति प्रदान करना;

(ट) विद्यापीठों, विभागों, केन्द्रों, छात्र-निवासों, महाविद्यालयों और संस्थाओं की स्थापना और समाप्ति;

(ठ) मानद उपाधियों का प्रदान किया जाना;

(ड) उपाधियों, डिप्लोमा, प्रमाणपत्रों और अन्य विद्या संबंधी विशिष्टताओं का वापस लिया जाना;

(ढ) वे शर्तें जिनके अधीन महाविद्यालयों और संस्थाओं को विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार दिए जा सकेंगे और ऐसे विशेषाधिकारों का वापस लिया जाना;

(ण) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, सहायक वृत्तियां, पदकों और पुरस्कारों को संस्थित करना;

(त) विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों या अधिकारियों में निहित शक्तियों का प्रत्यायोजन;

(थ) कर्मचारियों और छात्रों में अनुशासन बनाए रखना; और

() ऐसे सभी अन्य विषय जो इस अधिनियम के अनुसार परिनियमों द्वारा उपबंधित किए जाने हैं या किए जाएं

29. परिनियम कैसे बनाए जाएंगे-(1) प्रथम परिनियम वे हैं जो अनुसूची में उपवर्णित हैं ।

(2) कार्य परिषद्, समय-समय पर, नए या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगी या उपधारा (1) में निर्दिष्ट परिनियमों का संशोधन या निरसन कर सकेगी:

परन्तु कार्य परिषद्, विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी की प्रास्थिति, शक्तियों या गठन पर प्रभाव डालने वाले कोई परिनियम तब तक नहीं बनाएगी, उनका संशोधन नहीं करेगी या उनका निरसन नहीं करेगी जब तक उस प्राधिकारी को प्रस्थापित परिवर्तनों पर अपनी राय लिखित रूप में अभिव्यक्त करने का अवसर नहीं दे दिया गया हो और इस प्रकार अभिव्यक्त किसी राय पर कार्य परिषद् द्वारा विचार किया जाएगा ।

(3) प्रत्येक नए परिनियम या किसी परिनियम में परिवर्धन या उसके किसी संशोधन या निरसन के लिए कुलाध्यक्ष की अनुमति अपेक्षित होगी जो उस पर अनुमति दे सकेगा या अनुमति विधारित कर सकेगा या उसे कार्य परिषद् को उसके विचार के लिए वापस भेज सकेगा ।

(4) किसी नए परिनियम या विद्यमान परिनियम का संशोधन या निरसन करने वाला कोई परिनियम तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कुलाध्यक्ष द्वारा उसकी अनुमति न दे दी गई हो ।

(5) पूर्वगामी उपधाराओं में किसी बात के होते हुए भी, कुलाध्यक्ष इस अधिनियम के प्रारंभ से ठीक पश्चात्वर्ती तीन वर्ष की अवधि के दौरान नए या अतिरिक्त परिनियम बना सकेगा या उपधारा (1) में निर्दिष्ट परिनियमों का संशोधन या निरसन कर सकेगा:

परन्तु कुलाध्यक्ष, तीन वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति पर, ऐसी समाप्ति की तारीख से एक वर्ष के भीतर ऐसे विस्तृत परिनियम, जो वह आवश्यक समझे, बना सकेगा और ऐसे विस्तृत परिनियम संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखे जाएंगे

(6) पूर्वगामी उपधारा में किसी बात के होते हुए भी, कुलाध्यक्ष अपने द्वारा विनिर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में परिनियमों में उपबंध करने के लिए विश्वविद्यालय को निदेश दे सकेगा और यदि कार्य परिषद् किसी ऐसे निदेश को उसकी प्राप्ति के साठ दिन के भीतर कार्यान्वित करने में असमर्थ रहती है तो कुलाध्यक्ष, कार्य परिषद् द्वारा ऐसे निदेश का अनुपालन करने में उसकी असमर्थता के लिए संसूचित कारणों पर, यदि कोई हों, विचार करने के पश्चात्, यथोचित रूप से परिनियमों को बना सकेगा या उन्हें संशोधित कर सकेगा ।

30. अध्यादेश बनाने की शक्ति-(1) इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अध्यादेशों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

(क) विश्वविद्यालय में छात्रों का प्रवेश और उस रूप में उनका नाम दर्ज किया जाना;

() विश्वविद्यालय की सभी उपाधियों, डिप्लोमाओं और प्रमाणपत्रों के लिए अधिकथित किए जाने वाले पाठ्यक्रम;

(ग) शिक्षण और परीक्षा का माध्यम;

(घ) उपाधियों, डिप्लोमाओं, प्रमाणपत्रों और अन्य विद्या संबंधी विशेष उपाधियों का प्रदान किया जाना, उनके लिए अर्हताएं और उन्हें प्रदान करने और प्राप्त करने के बारे में किए जाने वाले उपाय;

(ङ) विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रमों के लिए और विश्वविद्यालय की परीक्षाओं, उपाधियों और डिप्लोमाओं में प्रवेश के लिए ली जाने वाली फीस;

() अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, सहायता वृत्तियां, पदक और पुरस्कार प्रदान किए जाने के लिए शर्तें

(छ) परीक्षाओं का संचालन, जिसके अंतर्गत परीक्षा निकायों, परीक्षकों और अनुसीमकों की पदावधि और नियुक्ति की रीति और उनके कर्तव्य भी हैं;

(ज) विश्वविद्यालय के छात्रों के निवास की शर्तें;

(झ) छात्राओं के निवास, अनुशासन और अध्यापन के लिए किए जाने वाले विशेष प्रबंध यदि कोई हों और उनके लिए विशेष अध्ययन पाठ्यक्रम विहित करना;

() उन कर्मचारियों से भिन्न जिनके लिए परिनियमों में उपबंध किए गए हैं, कर्मचारियों की नियुक्ति और उपलब्धियां;

(ट) अध्ययन केन्द्रों, अध्ययन बोर्डों, विशेष केन्द्रों, विशेषित प्रयोगशालाओं और अन्य समितियों की स्थापना;

(ठ) भारत में या विदेश के अन्य विश्वविद्यालयों और प्राधिकारियों के साथ, जिनके अंतर्गत विद्वत निकाय या संगम हैं, सहकार और सहयोग करने की रीति;

(ड) किसी अन्य ऐसे निकाय का, जो विश्वविद्यालय के शैक्षणिक स्तर में सुधार के लिए आवश्यक समझा जाए, सृजन, संरचना और उसके कृत्य;

(ढ) शिक्षकों और अन्य शैक्षिक कर्मचारिवृंद की सेवा के ऐसे अन्य निबंधन और शर्तें, जो परिनियमों द्वारा विहित नहीं की गई हैं;

(ण) विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे महाविद्यालयों और संस्थाओं का प्रबंध;

(त) विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार प्राप्त महाविद्यालयों और संस्थाओं का पर्यवेक्षण और प्रबंध;

(थ) कर्मचारियों की शिकायतों को दूर करने के लिए किसी तंत्र की स्थापना; और

() ऐसे सभी अन्य विषय जो इस अधिनियम या परिनियमों के अनुसार अध्यादेशों द्वारा उपबंधित किए जाएं या किए जाने हैं

(2) प्रथम अध्यादेश, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, कुलपति द्वारा बनाए जाएंगे, और इस प्रकार बनाए गए अध्यादेश, परिनियमों द्वारा विहित रीति से कार्य परिषद् द्वारा किसी भी समय संशोधित, निरसित या परिवर्धित किए जा सकेंगे ।

31. विनियम-विश्वविद्यालय के प्राधिकारी, स्वयं अपने और अपने द्वारा नियुक्त समितियों के, यदि कोई हों, कार्य संचालन के लिए, जनका इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा उपबंध नहीं किया गया है, परिनियमों द्वारा विहित रीति से ऐसे विनियम बना सकेंगे, जो इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों से संगत है

32. वार्षिक रिपोर्ट-(1) विश्वविद्यालय की वार्षिक रिपोर्ट, कार्य परिषद् के निदेशों के अधीन तैयार की जाएगी जिसमें, अन्य विषयों के साथ-साथ विश्वविद्यालय द्वारा अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए किए गए उपाय होंगे और वह सभा को उस तारीख को या उसके पश्चात् भेजी जाएगी, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाए और सभा अपने वार्षिक अधिवेशन में उस रिपोर्ट पर विचार करेगी ।

(2) सभा, अपनी टीका-टिप्पणी सहित, यदि कोई हो, वार्षिक रिपोर्ट कुलाध्यक्ष को भेजेगी ।

(3) उपधारा (1) के अधीन तैयार की गई वार्षिक रिपोर्ट की एक प्रति, केन्द्रीय सरकार को भी प्रस्तुत की जाएगी, जो यथाशीघ्र उसे संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।

33. वार्षिक लेखे-(1) विश्वविद्यालय के वार्षिक लेखे और तुलनपत्र, कार्य परिषद् के निदेशों के अधीन तैयार किए जाएंगे और भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या ऐसे व्यक्तियों द्वारा जिन्हें वह इस निमित्त प्राधिकृत करे, प्रत्येक वर्ष कम से कम एक बार और पन्द्रह मास से अनधिक के अंतरालों पर उनकी लेखापरीक्षा की जाएगी

(2) वार्षिक लेखाओं की एक प्रति, उन पर लेखापरीक्षा की रिपोर्ट और कार्य परिषद् के संप्रेक्षणों के साथ, सभा और कुलाध्यक्ष को, प्रस्तुत की जाएगी ।

(3) वार्षिक लेखाओं पर कुलाध्यक्ष द्वारा किए गए संप्रेक्षण सभा के ध्यान में लाए जाएंगे और सभा के संप्रेक्षण, यदि कोई हों, कार्य परिषद् द्वारा विचार किए जाने के पश्चात् कुलाध्यक्ष को प्रस्तुत किए जाएंगे ।

(4) वार्षिक लेखाओं की एक प्रति, कुलाध्यक्ष को यथा प्रस्तुत की गई लेखापरीक्षा रिपोर्ट के साथ केन्द्रीय सरकार को भी प्रस्तुत की जाएगी जो यथाशीघ्र उसे संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।

(5) संपरीक्षित वार्षिक लेखे संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखे जाने के पश्चात् भारत के राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे

34. कर्मचारियों की सेवा की शर्तें-(1) विश्वविद्यालय, नियमित आधार पर या अन्यथा नियुक्त विश्वविद्यालय के प्रत्येक कर्मचारी के साथ लिखित में सेवा की संविदा करेगा, लिखित संविदा और संविदा के निबंधन और शर्तें इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों से असंगत नहीं होंगी ।

(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट संविदा की एक प्रति विश्वविद्यालय के पास रहेगी और उसकी एक प्रति संबंधित कर्मचारी को भी दी जाएगी ।

35. माध्यस्थम् अधिकरण-(1) विश्वविद्यालय और किसी कर्मचारी के बीच संविदा से उद्भूत होने वाला कोई विवाद कर्मचारी के अनुरोध पर, माध्यस्थम् अधिकरण को निर्दिष्ट किया जाएगा जिसमें कार्य परिषद् द्वारा नियुक्त एक सदस्य, संबंधित कर्मचारी द्वारा नामनिर्दिष्ट एक सदस्य और कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त एक अधिनिर्णायक होगा ।

(2) माध्यस्थम् अधिकरण का विनिश्चय अंतिम होगा और पक्षकारों पर आबद्धकर होगा ।

(3) उपधारा (1) के अधीन कर्मचारी द्वारा किया गया प्रत्येक अनुरोध माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 (1996 का 26) के अर्थ में इस धारा के निबंधनों पर माध्यस्थम् के लिए निवेदन समझा जाएगा ।

(4) अधिकरण के कार्य को विनियमित करने की प्रक्रिया परिनियमों द्वारा विहित की जाएगी ।

36. छात्रों के विरुद्ध अनुशासनिक मामलों में अपील और माध्यस्थम् की प्रक्रिया-(1) कोई छात्र या परीक्षार्थी, जिसका नाम विश्वविद्यालय की नामावली से, कुलपति के आदेशों या संकल्प द्वारा हटाया गया है और जिसे विश्वविद्यालय की परीक्षाओं में बैठने से एक वर्ष से अधिक के लिए विवर्जित किया गया है, उसके द्वारा ऐसे आदेशों की या ऐसे संकल्प की प्रति की प्राप्ति की तारीख से दस दिन के भीतर कार्य परिषद् को अपील कर सकेगा और कार्य परिषद्, यथास्थिति, कुलपति या समिति के विनिश्चय को पुष्ट या उपांतरित कर सकेगी या उलट सकेगी

(2) विश्वविद्यालय द्वारा किसी छात्र के विरुद्ध की गई अनुशासनिक कार्रवाई से उत्पन्न होने वाला कोई विवाद उस छात्र के अनुरोध पर, माध्यस्थम् अधिकरण को निर्देशित किया जाएगा और धारा 35 के उपबंध, इस उपधारा के अधीन किए गए निर्देश को यथाशक्य लागू होंगे ।

37. अपील करने का अधिकार-इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, विश्वविद्यालय या विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे महाविद्यालय या संस्था के प्रत्येक कर्मचारी या छात्र को, यथास्थिति, विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी या प्राधिकारी अथवा किसी महाविद्यालय या संस्था के प्राचार्य के किसी विनिश्चय के विरुद्ध अपील ऐसे समय के भीतर, जो परिनियमों द्वारा विहित किया जाए, कार्य परिषद् को करने का अधिकार होगा और तब कार्य परिषद् उस विनिश्चय को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्ट या उपांतरित कर सकेगी या उलट सकेगी ।

38. भविष्य निधि और पेंशन निधि-(1) विश्वविद्यालय अपने कर्मचारियों के फायदे के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो परिनियमों द्वारा विहित की जाएं, ऐसी भविष्य निधि या पेंशन निधि का गठन करेगा या ऐसी बीमा स्कीमों की व्यवस्था करेगा जो वह ठीक समझे ।

 (2) जहां ऐसी भविष्य निधि या पेंशन निधि का इस प्रकार गठन किया गया है वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषित कर सकेगी कि भविष्य निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबंध ऐसी निधि को इस प्रकार लागू होंगे मानो वह सरकारी भविष्य निधि   हो ।

39. विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों और निकायों के गठन के बारे में विवाद-यदि यह प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या अन्य निकाय के सदस्य के रूप में सम्यक् रूप से निर्वाचित या नियुक्त किया गया है या उसका सदस्य होने का हकदार है तो वह मामला कुलाध्यक्ष को निर्देशित किया जाएगा, जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।

40. समितियों का गठन-जहां विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी को, इस अधिनियम या परिनियमों द्वारा समितियां नियुक्त करने की शक्ति दी गई है, वहां ऐसी समितियां, जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, संबद्ध प्राधिकारी के सदस्यों और ऐसे अन्य व्यक्तियों से, यदि कोई हो मिलकर बनेगी जैसा प्रत्येक मामले में, प्राधिकारी उचित समझे ।

41. आकस्मिक रिक्तियों का भरा जाना-विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या अन्य निकाय के सदस्यों में (पदेन सदस्यों से भिन्न) सभी आकस्मिक रिक्तियां, यथाशीघ्र, ऐसे व्यक्ति या निकाय द्वारा भरी जाएंगी जिसने उस सदस्य को, जिसका स्थान रिक्त हुआ है, नियुक्त, निर्वाचित या सहयोजित किया था और आकस्मिक रिक्ति में नियुक्त, निर्वाचित या सहयोजित व्यक्ति, ऐसे प्राधिकारी या निकाय का सदस्य उस शेष अवधि के लिए होगा, जिस तक वह व्यक्ति, जिसका स्थान वह भरता है, सदस्य रहता । 

42. विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों या निकायों की कार्यवाहियों का रिक्तियों के कारण अविधिमान्य होना-विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या अन्य निकाय का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि उसके सदस्यों में कोई रिक्ति या रिक्तियां हैं ।

43. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या परिनियमों या अध्यादेशों के उपबंधों में से किसी उपबंध के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाहियां विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होंगी ।

44. विश्वविद्यालय के अभिलेखों को साबित करने का ढंग-भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1)  या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या समिति की किसी रसीद, आवेदन, सूचना आदेश, कार्यवाही, संकल्प या अन्य दस्तावेज की, या विश्वविद्यालय के कब्जे में अन्य दस्तावेजों, या विश्वविद्यालय द्वारा सम्यक् रूप से रखे गए किसी रजिस्टर की किसी प्रविष्टि की प्रतिलिपि, यदि कुलसचिव द्वारा सत्यापित कर दी जाती है, तो उसे उस दशा में, जिसमें उसकी मूल प्रति पेश की जाने पर साक्ष्य में ग्राह्य होती, उस रसीद, आवेदन, सूचना, आदेश, कार्यवाही, संकल्प या दस्तावेज के या रजिस्टर की प्रविष्टि के अस्तित्व के प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य के रूप में ले ली जाएगी और उससे संबंधित मामलों और संव्यवहारों के साक्ष्य के रूप में ग्रहण की जाएगी ।

45. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत हों, और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:

परन्तु इस धारा के अधीन ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से तीन वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

46. संक्रमणकालीन उपबंध-इस अधिनियम और परिनियमों में किसी बात के होते हुए भी, -

(क) प्रथम कुलाधिपति और प्रथम कुलपति, कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त किए जाएंगे और उक्त प्रत्येक अधिकारी तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा; 

(ख) प्रथम कुलसचिव और प्रथम वित्त अधिकारी, कुलपति की सिफारिश पर कुलाध्यक्ष द्वारा नियुक्त किए जाएंगे और उक्त प्रत्येक अधिकारी दो वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा;

(ग) प्रथम सभा और प्रथम कार्य परिषद् में पन्द्रह से अनधिक सदस्य होंगे जो कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे और वे दो वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे;

 (घ) (i) प्रथम योजना बोर्ड में पन्द्रह से अनधिक सदस्य होंगे जो कुलपति द्वारा प्रस्तुत किए गए पैनल से, कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे और वे दो वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे; और

(ii) प्रथम योजना बोर्ड, इस अधिनियम द्वारा उसे प्रदत्त शक्तियों और कृत्यों के अतिरिक्त, जब तक इस अधिनियम या परिनियमों के उपबंधों के अधीन विद्या परिषद् का गठन नहीं होता है तब तक विद्या परिषद् की शक्तियों का प्रयोग करेगा और योजना बोर्ड ऐसी शक्तियों के प्रयोग में ऐसे सदस्यों को सहयोजित कर सकेगा जिनका वह विनिश्चय करे:

परन्तु यदि उपरोक्त पदों या प्राधिकारियों में कोई रिक्ति होती है तो वह कुलाध्यक्ष द्वारा, यथास्थिति, नियुक्ति या नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और इस प्रकार नियुक्त या नामनिर्दिष्ट व्यक्ति तब तक पद धारण करेगा जब तक वह अधिकारी या सदस्य, जिसके स्थान पर उसकी नियुक्ति या नामनिर्देशन किया गया है, पद धारण करता यदि ऐसी रिक्ति नहीं हुई होती ।

47. परिनियमों, अध्यादेशों और विनियमों का राजपत्र में प्रकाशित किया जाना और संसद् के समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम, अध्यादेश या विनियम राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा

(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक परिनियम, अध्यादेश या विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस परिनियम, अध्यादेश या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो, तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह परिनियम, अध्यादेश या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु परिनियम, अध्यादेश या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

(3) परिनियम, अध्यादेश या विनियम बनाने की शक्ति के अंतर्गत परिनियमों, अध्यादेशों या विनियमों या उनमें से किसी को उस तारीख से, जो इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से पूर्वतर हों, भूतलक्षी प्रभाव देने की शक्ति भी होगी किन्तु किसी परिनियम, अध्यादेश या विनियम का भूतलक्षी प्रभाव इस प्रकार नहीं दिया जाएगा जिससे कि किसी ऐसे व्यक्ति के, जिसको ऐसा परिनियम, अध्यादेश या विनियम लागू हो, हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े

48. विश्वविद्यालय के सहबद्ध महाविद्यालयों या संस्थाओं में अध्ययन पाठ्यक्रम को पूरा करना-इस अधिनियम या परिनियमों या अध्यादेशों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी महाविद्यालय या संस्था के ऐसे छात्र को जो विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार प्राप्त ऐसे महाविद्यालय या संस्था में प्रवेश से ठीक पहले, किसी अधिनियम के अधीन गठित किसी विश्वविद्यालय की उपाधि, डिप्लोमा या प्रमाणपत्र के लिए अध्ययन कर रहा था, विश्वविद्यालय द्वारा, यथास्थिति, उस उपाधि, डिप्लोमा या प्रमाणपत्र हेतु उसे अपना पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए अनुज्ञात किया जाएगा और विश्वविद्यालय, यथास्थिति, ऐसे महाविद्यालय या संस्था या विश्वविद्यालय के अध्ययन पाठ्यक्रम के अनुसार ऐसे छात्र के शिक्षण और परीक्षा की व्यवस्था करेगा ।

49. आस्तियों का अंतरण और कर्मचारियों का विकल्प-इस अधिनियम या परिनियमों या अध्यादेशों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, प्रशिक्षण पोत चाणक्य, मुंबई, सामुद्रिक इंजीनियरी और अनुसंधान संस्थान, मुंबई, सामुद्रिक इंजीनियरी और अनुसंधान संस्थान, कोलकाता, लाल बहादुर शास्त्री उन्नत सामुद्रिक अध्ययन महाविद्यालय, मुंबई, राष्ट्रीय सामुद्रिक अकादमी, चैन्नई, भारतीय पत्तन प्रबंधन संस्थान, कोलकाता और राष्ट्रीय पोत डिजाइन और अनुसंधान केन्द्र, विशाखापत्तनम का भारतीय सामुद्रिक विश्वविद्यालय में विलयन के परिणामस्वरूप सभी आस्तियां और कर्मचारी विश्वविद्यालय को अंतरित हो जाएंगे और ऐसे कर्मचारियों के पास निम्नलिखित विकल्प होंगे :-

(i) भारतीय सामुद्रिक अध्ययन संस्थान के अधीन चारों प्रशिक्षण संस्थानों के कर्मचारी जो भारतीय सामुद्रिक विश्वविद्यालय को अंतरित हो जाएंगे; केन्द्रीय सरकार में प्रवृत्त निबंधनों और शर्तों पर भारतीय सामुद्रिक विश्वविद्यालय में सम प्रतिनियुक्ति पर बने रहने का और सरकारी निवास स्थान को जारी रखने या बारी पर आबंटित किए जाने का तथा अपनी सेवानिवृत्ति तक केन्द्रीय सरकार स्वास्थ्य स्कीम प्रसुविधाओं के उपभोग का भी विकल्प होगा;

(ii) राष्ट्रीय सामुद्रिक अकादमी, चैन्नई, भारतीय पत्तन प्रबंधन संस्थान, कोलकाता और राष्ट्रीय पोत डिजाइन और अनुसंधान केन्द्र, विशाखापत्तनम के कर्मचारियों के पास अपनी सेवानिवृत्ति तक अपने-अपने संस्थानों के निबंधनों और शर्तों पर बने रहने का विकल्प होगा; और

(iii) सभी कर्मचारियों के पास विश्वविद्यालय की सेवा-शर्तों के अनुसार विश्वविद्यालय में पदभार ग्रहण करने का अधिकार होगा

50. केन्द्रीय सरकार और पोत परिवहन महानिदेशक की भूमिका-(1) विश्वविद्यालय इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में, नीति के प्रश्नों पर ऐसे निदेशों द्वारा आबद्ध होगा, जो केन्द्रीय सरकार समय-समय पर उसको लिखित में दे ।

(2) केन्द्रीय सरकार का इस बारे में विनिश्चय कि कोई प्रश्न नीति विषयक है या नहीं, अंतिम होगा ।

अनुसूची

(धारा 29 देखिए)

विश्वविद्यालय के परिनियम

1. कुलाधिपति-(1) कुलाधिपति की नियुक्ति कुलाध्यक्ष द्वारा देश के शैक्षणिक, सामुद्रिक, लोक प्रशासन के क्षेत्र में या सार्वजनिक जीवन में विख्यात व्यक्तियों में से कार्य परिषद् द्वारा सिफारिश किए गए तीन व्यक्तियों में से की जाएगी:

परन्तु यदि कुलाध्यक्ष इस प्रकार सिफारिश किए गए व्यक्तियों में से किसी का अनुमोदन नहीं करता है तो वह कार्य परिषद् से नई सिफारिशें मांग करेगा ।

(2) कुलाधिपति तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा और पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा:

परन्तु अपनी पदावधि के अवसान होने पर भी कुलाधिपति तब तक पद पर बना रहेगा जब तक कि उसका उत्तरवर्ती अपना पदग्रहण नहीं कर लेता ।

2. कुलपति-(1) कुलपति की नियुक्ति, कुलाध्यक्ष द्वारा मानव संसाधन प्रबंधन, सामुद्रिक, लोक प्रशासन, समुद्री या पत्तन प्रशासन के क्षेत्र में अनुभव रखने वाले तीन से अन्यून व्यक्तियों के पैनल में से की जाएगी:

परन्तु यदि कुलाध्यक्ष पैनल में सम्मिलित व्यक्तियों में से किसी का अनुमोदन नहीं करता है तो वह नए पैनल की मांग कर सकेगा ।

(2) खंड (1) में निर्दिष्ट समिति में तीन व्यक्ति होंगे, जिनमें से कोई भी व्यक्ति विश्वविद्यालय या विद्या परिषद् का कर्मचारी या सभा, कार्य परिषद्, योजना बोर्ड का सदस्य या विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी का सदस्य या विश्वविद्यालय द्वारा मान्यताप्राप्त अथवा विश्वविद्यालय से सहबद्ध किसी संस्था से संबंधित व्यक्ति नहीं होगा और तीन व्यक्तियों में से, एक व्यक्ति कार्य परिषद् द्वारा, एक व्यक्ति सभा द्वारा और एक कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा तथा कुलाध्यक्ष का नामनिर्देशिती समिति का संयोजक  होगा ।

(3) कुलपति विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा ।

(4) कुलपति अपना पदग्रहण करने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि तक या पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, जो भी पहले हो, पद धारण करेगा और, यथास्थिति, वह पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगा:

परन्तु उक्त पांच वर्ष की अवधि की समाप्ति पर भी वह अपने पद पर तब तक बना रहेगा जब तक उनका उत्तरवर्ती नियुक्त नहीं किया जाता है और वह अपना पदग्रहण नहीं कर लेता है:

परन्तु यह और कि कुलाध्यक्ष यह निदेश दे सकेगा कि जिस कुलपति की पदावधि समाप्त हो गई है वह कुल मिलाकर एक वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि तक, जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, पद पर बना रहेगा ।

(5) कुलपति की उपलब्धियां और सेवा की अन्य शर्तें निम्नलिखित होंगी-

(i) कुलपति को केन्द्रीय सरकार द्वारा, समय-समय पर, नियत दर से मासिक वेतन और मकान किराया भत्ते से भिन्न भत्ते दिए जाएंगे और वह अपनी पदावधि के दौरान किरायामुक्त सुसज्जित निवास-स्थान का हकदार होगा तथा ऐसे निवास-स्थान के रखरखाव की बाबत कुलपति को कोई प्रभार नहीं देना होगा;

(ii) कुलपति ऐसे सेवांत फायदों और भत्तों का हकदार होगा जो कुलाध्यक्ष के अनुमोदन से कार्य परिषद् द्वारा समय-समय पर नियत किए जाएं:

परन्तु जहां विश्वविद्यालय या उसके द्वारा चलाए जा रहे या उससे संबद्ध महाविद्यालय या संस्था का अथवा किसी अन्य विश्वविद्यालय या ऐसे अन्य विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे या उससे संबद्ध किसी संस्था का कर्मचारी कुलपति नियुक्त किया जाता है, वहां उसे ऐसी भविष्य-निधि में, जिसका वह सदस्य है, अभिदाय करते रहने के लिए अनुज्ञात किया जा सकेगा और विश्वविद्यालय उस भविष्य निधि में ऐसे व्यक्ति के खाते में उसी दर से अभिदाय करेगा जिससे वह व्यक्ति कुलपति के रूप में अपनी नियुक्ति के ठीक पहले अभिदाय कर रहा था:

परन्तु यह और कि जहां ऐसा कर्मचारी किसी पेंशन स्कीम का सदस्य रहा था, वहां विश्वविद्यालय ऐसी स्कीम में आवश्यक अभिदाय करेगा;

(iii) कुलपति ऐसी दरों से, जो कार्य परिषद् द्वारा नियत की जाएं, यात्रा भत्ते का हकदार होगा;

(iv) कुलपति किसी कलेंडर वर्ष में तीस दिन की दर से पूर्ण वेतन पर छुट्टी का हकदार होगा और छुट्टी, पन्द्रह दिन की दो अर्धवार्षिक किस्तों में प्रत्येक वर्ष जनवरी तथा जुलाई के प्रथम दिन को अग्रिम रूप से उसके खाते में जमा कर दी जाएगी:

परन्तु यदि कुलपति किसी आधे वर्ष के चालू रहने के दौरान कुलपति का पदभार ग्रहण करता है या छोड़ता है तो अनुपाततः सेवा के प्रत्येक संपूरित मास के लिए अढ़ाई दिन की दर से छुट्टी को जमा किया जाएगा;

(v) कुलपति, उपखंड (iv) में निर्दिष्ट छुट्टी के अतिरिक्त, सेवा के प्रत्येक संपूरित वर्ष के लिए बीस दिन की दर से अर्ध-वेतन छुट्टी का भी हकदार होगा । इस अर्ध-वेतन छुट्टी का उपभोग चिकित्सीय प्रमाणपत्र के आधार पर पूर्ण वेतन पर परिवर्तित छुट्टी के रूप में भी किया जा सकेगा । जब ऐसी परिवर्तित छुट्टी का उपभोग किया जाता है तो अर्ध-वेतन छुट्टी की दुगुनी मात्रा बाकी अर्थ-वेतन छुट्टी से विकलित की जाएगी ।

(6) यदि कुलपति का पद मृत्यु, पदत्याग के कारण या अन्यथा रिक्त हो जाता है, अथवा यदि वह अस्वस्थता के कारण या किसी अन्य कारण से अपने कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है, तो प्रतिकुलपति, कुलपति के कर्तव्यों का पालन करेगा:

परन्तु यदि प्रतिकुलपति उपलब्ध नहीं है, तो ज्येष्ठतम आचार्य कुलपति के कर्तव्यों का तब तक पालन करेगा जब तक, यथास्थिति, नया कुलपति पदग्रहण नहीं कर लेता या विद्यमान कुलपति अपने पद के कर्तव्यों को फिर से संभाल नहीं लेता ।

3. कुलपति की शक्तियां और कर्तव्य-(1) कुलपति, कार्य परिषद्, विद्या परिषद्, योजना बोर्ड, सहबद्ध और मान्यताप्राप्त बोर्ड और वित्त समिति का पदेन अध्यक्ष होगा और कुलाधिपति की अनुपस्थिति में उपाधियां प्रदान करने के लिए आयोजित दीक्षांत समारोहों की अध्यक्षता करेगा ।

(2) कुलपति, विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या अन्य निकाय के किसी अधिवेशन में उपस्थित रहने और उसे संबोधित करने का हकदार होगा किन्तु वह उसमें मत देने का तब तक हकदार नहीं होगा जब तक वह ऐसे प्राधिकारी या निकाय का सदस्य न   हो ।

(3) यह देखना कुलपति का कर्तव्य होगा कि इस अधिनियम, परिनियमों, अध्यादेशों और विनियमों का सम्यक् रूप से पालन किया जाता है और उसे ऐसा पालन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक सभी शक्तियां प्राप्त होंगी ।

(4) कुलपति विश्वविद्यालय के कामकाज पर नियंत्रण रखेगा और विश्वविद्यालय के सभी प्राधिकारियों के विनिश्चयों को प्रभाव में लाएगा ।

(5) कुलपति को विश्वविद्यालय में समुचित अनुशासन बनाए रखने के लिए आवश्यक सभी शक्तियां होंगी और वह किन्हीं ऐसी शक्तियों का किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को, जिन्हें वह ठीक समझे, प्रत्यायोजन कर सकेगा

(6) कुलपति को कार्य परिषद्, विद्या परिषद्, योजना बोर्ड और वित्त समिति का अधिवेशन बुलाने या बुलवाने की शक्ति होगी

(7) कुलपति को विश्वविद्यालय के कृत्यों को करने के लिए, ऐसे व्यक्तियों की जिन्हें वह आवश्यक समझे, छह मास की अवधि के लिए, कार्य परिषद् के अनुमोदन से अल्पकालीन नियुक्तियां करने की शक्ति होगी ।

4. प्रतिकुलपति-(1) प्रत्येक प्रतिकुलपति की नियुक्ति कार्य परिषद् द्वारा कुलपति की सिफारिश पर की जाएगी:

परन्तु जहां कुलपति की सिफारिश कार्य परिषद् द्वारा स्वीकार नहीं की जाती है वहां उस मामले को कुलाध्यक्ष को निर्दिष्ट किया जाएगा जो कुलपति द्वारा सिफारिश किए गए व्यक्ति को या तो नियुक्त करेगा या कुलपति से कार्य परिषद् के लिए किसी अन्य व्यक्ति की सिफारिश करने के लिए कह सकेगा:

परन्तु यह और कि कार्य परिषद्, कुलपति की सिफारिश पर, किसी आचार्य को आचार्य के रूप में अपने कर्तव्यों के अतिरिक्त प्रतिकुलपति के कर्तव्यों का निर्वहन करने के लिए नियुक्त कर सकेगी ।

(2) प्रतिकुलपति की पदावधि वह होगी जो कार्य परिषद् विनिश्चित करे किन्तु किसी भी दशा में वह पांच वर्ष से अधिक नहीं होगी या कुलपति की पदावधि की समाप्ति तक होगी, इनमें से जो भी पहले हो:

परन्तु ऐसा प्रतिकुलपति, जिसकी पदावधि समाप्त हो गई है, पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा:

परन्तु यह और कि प्रतिकुलपति हर दशा में पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त करने पर सेवानिवृत्त हो जाएगा:

परन्तु यह भी कि प्रतिकुलपति, परिनियम 2 के खंड (6) के अधीन कुलपति के कर्तव्यों का निर्वहन करने के दौरान, प्रतिकुलपति के रूप में अपनी पदावधि की समाप्ति पर भी पद पर तब तक बना रहेगा जब तक, यथास्थिति, नया कुलपति अपना पदग्रहण नहीं कर लेता:

परन्तु यह भी कि जब कुलपति का पद रिक्त हो गया है और कुलपति के कृत्यों का निर्वहन करने के लिए कोई प्रतिकुलपति नहीं है तब कार्य परिषद् प्रतिकुलपति को नियुक्त कर सकेगी और इस प्रकार नियुक्त किया गया प्रतिकुलपति, जैसे ही कुलपति की नियुक्ति हो जाती है और वह पद धारण कर लेता है, उस पद पर नहीं रहेगा ।

(3) (क) प्रतिकुलपति की उपलब्धियां और सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी जो अध्यादेशों द्वारा अधिकथित की जाएं ।

(ख) प्रतिकुलपति का वेतन कुलाध्यक्ष के अनुमोदन से कार्य परिषद् द्वारा विनिश्चित किया जाएगा ।

(ग) प्रतिकुलपति अपनी पदावधि के दौरान किरायामुक्त, सुसज्जित निवास-स्थान का हकदार होगा तथा ऐसे निवास-स्थान के रखरखाव के संबंध में प्रतिकुलपति को व्यक्तिगत रूप से कोई प्रभार नहीं देना होगा ।

(घ) प्रतिकुलपति, उपखंड (ख) में विनिर्दिष्ट वेतन के अतिरिक्त, ऐसी छुट्टी, फायदों और अन्य भत्तों का हकदार होगा, जो विश्वविद्यालय के कर्मचारियों को समय-समय पर अनुज्ञेय हों ।

(ङ) प्रतिकुलपति ऐसे सेवांत फायदों का हकदार होगा जो कार्य परिषद् द्वारा समय-समय पर नियत किए जाएं ।

(च) प्रतिकुलपति अपनी पदावधि की समाप्ति तक विश्वविद्यालय की अंशदायी भविष्य-निधि में अभिदाय करने का हकदार होगा:

परंतु जब विश्वविद्यालय या किसी महाविद्यालय या किसी संस्था का या किसी अन्य विश्वविद्यालय का या अन्य विश्वविद्यालय द्वारा चलाई जा रही या उससे सहबद्ध संस्था का कोई कर्मचारी, प्रतिकुलपति के रूप में नियुक्त किया जाता है, तो उसका वेतन ऐसे व्यक्ति के वेतन पर विचार करने के पश्चात् नियत किया जाएगा ।

(4) प्रतिकुलपति, कुलपति की ऐसे विषयों के संबंध में सहायता करेगा जो इस निमित्त कुलपति द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किए जाएं और ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन भी करेगा जो कुलपति द्वारा उसे सौंपे या प्रत्यायोजित किए जाएं ।

5. कुलसचिव-(1) प्रत्येक कुलसचिव की नियुक्ति, इस प्रयोजन के लिए गठित चयन समिति की सिफारिश पर कार्य परिषद् द्वारा की जाएगी और वह विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतनिक अधिकारी होगा:

परंतु चयन समिति में सभा के नामनिर्देशिती को भी सम्मिलित किया जाएगा ।

(2) कुलसचिव की नियुक्ति पांच वर्ष की अवधि के लिए की जाएगी और वह एक और अवधि के लिए पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा

(3) कुलसचिव की उपलब्धियां तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी जो अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएं:

परंतु कुलसचिव बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने पर सेवानिवृत्त हो जाएगा ।

(4) जब कुलसचिव का पद रिक्त हो या जब कुलसचिव रुग्णता, अनुपस्थिति के कारण या किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो तब उस पद के कर्तव्यों का पालन उस व्यक्ति द्वारा किया जाएगा जिसे कुलपति उस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे ।

(5) () कुलसचिव को, अध्यापकों और शैक्षणिक कर्मचारिवृंद को छोड़कर ऐसे कर्मचारियों के विरुद्ध जो कार्य परिषद् के आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, अनुशासनिक कार्रवाई करने की तथा जांच होने तक उन्हें निलंबित करने, उन्हें चेतावनी देने या उन पर परिनिंदा की या वेतनवृद्धि रोकने की शास्ति अधिरोपित करने की शक्ति होगी:

परंतु ऐसी कोई शास्ति तब तक अधिरोपित नहीं की जाएगी जब तक संबंधित व्यक्ति को उसके संबंध में की जाने के लिए प्रस्थापित कार्रवाई के विरुद्ध कारण बताने का उचित अवसर नहीं दे दिया जाता है

() उपखंड () में विनिर्दिष्ट कोई शास्ति अधिरोपित करने के कुलसचिव के आदेश के विरुद्ध अपील कुलपति को होगी

() ऐसे मामले में, जहां जांच से यह प्रकट हो कि कुलसचिव की शक्ति के बाहर का कोई दंड अपेक्षित है वहां, कुलसचिव, जांच के पूरा होने पर, कुलपति को अपनी सिफारिशों सहित एक रिपोर्ट देगा:

परन्तु किसी कर्मचारी पर शास्ति अधिरोपित करने के कुलपति के आदेश के विरुद्ध अपील कार्य परिषद् को होगी

(6) कार्य परिषद् किसी कुलसचिव को निम्नलिखित एक या अधिक हैसियत में पदेन कार्य करने के लिए पदाभिहित करेगी, अर्थात्: -

(i) सभा का सचिव;

(ii) कार्य परिषद् का सचिव;

(iii) विद्या परिषद् का सचिव;

(iv) सहबद्ध और मान्यताप्राप्त बोर्ड का सचिव;

(v) योजना बोर्ड का सचिव ।

(7) इस प्रकार नामनिर्दिष्ट कुलसचिव का संबंधित प्राधिकारी के संबंध में यह कर्तव्य होगा कि वह-

(क) विश्वविद्यालय के अभिलेख, सामान्य मुद्रा और ऐसी अन्य संपत्ति को, जो कार्य परिषद् उसके भारसाधन में सौंपे, अभिरक्षा में रखे;

(ख) उस प्राधिकारी और उसके द्वारा नियुक्त समितियों के अधिवेशन बुलाने की सभी सूचनाएं निकाले;

(ग) उस प्राधिकारी और उसके द्वारा नियुक्त समितियों के सभी अधिवेशनों के कार्यवृत्त रखे;

(घ) सभा, कार्य परिषद्, विद्या परिषद्, योजना बोर्ड और सहबद्धता और मान्यता बोर्ड के शासकीय पत्र-व्यवहार का संचालन करे,

(ङ) अध्यादेशों द्वारा विहित की गई रीति के अनुसार विश्वविद्यालय की परीक्षाओं का प्रबंध और अधीक्षण करे;

(च) कुलाध्यक्ष को विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों के अधिवेशनों की कार्य सूची की प्रतियां, जैसे ही वे जारी की जाएं, और इन अधिवेशनों के कार्यवृत्त दें;

(छ) विश्वविद्यालय द्वारा उसके विरुद्ध वादों या कार्यवाहियों में विश्वविद्यालय का प्रतिनिधित्व करे, मुख्तारनामों पर हस्ताक्षर करे तथा अभिवचनों को सत्यापित करे या इस प्रयोजन के लिए अपना प्रतिनिधि प्रतिनियुक्त करे; और

(ज) ऐसे अन्य कर्तव्यों का पालन करे जो परिनियमों, अध्यादेशों या विनियमों में विनिर्दिष्ट किए जाएं अथवा जिनकी कार्य परिषद् या कुलपति द्वारा, समय-समय पर, अपेक्षा की जाए ।

6. वित्त अधिकारी-(1) वित्त अधिकारी की नियुक्ति इस प्रयोजन के लिए गठित चयन समिति की सिफारिशों पर कार्य परिषद् द्वारा की जाएगी और वह विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक वैतानिक अधिकारी होगा ।

(2) उसकी नियुक्ति पांच वर्ष की अवधि के लिए की जाएगी और वह एक और अवधि के लिए पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा:

(3) वित्त अधिकारी की उपलब्धियां तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी जो अध्यादेशों द्वारा अधिकथित की जाएं:

परन्तु वित्त अधिकारी बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने पर सेवानिवृत्त हो जाएगा ।

(4) जब वित्त अधिकारी का पद रिक्त हो या जब वित्त अधिकारी रुग्णता, अनुपस्थिति के कारण या किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ हो तब उस पद के कर्तव्यों का पालन उस व्यक्ति द्वारा किया जाएगा जिसे कुलपति उस प्रयोजन के लिए नियुक्त करे ।

(5) वित्त अधिकारी, वित्त समिति का पदेन सचिव होगा किंतु वह ऐसी समिति का सदस्य नहीं माना जाएगा ।

(6) वित्त अधिकारी-

() विश्वविद्यालय की निधियों पर साधारण पर्यवेक्षण करेगा और उसकी वित्तीय नीति के संबंध में उसे सलाह देगा; और 

(ख) ऐसे अन्य वित्तीय कृत्यों का पालन करेगा जो उसे कार्य परिषद् द्वारा सौंपे जाएं या जो परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा विहित किए जाएं:

परंतु वित्त अधिकारी, कार्य परिषद् के पूर्व अनुमोदन के बिना, एक लाख रुपए से अधिक का कोई व्यय या कोई विनिधान नहीं करेगा ।

(7) कार्य परिषद् के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, वित्त अधिकारी-

(क) विश्वविद्यालय की संपत्ति और विनिधानों को, जिनके अंतर्गत न्यास और विन्यास की संपत्ति भी है, धारित करेगा और उनका प्रबंध करेगा;

(ख) यह सुनिश्चित करेगा कि कार्य परिषद् द्वारा एक वर्ष के लिए नियत आवर्ती और अनावर्ती व्यय की नियत की गई सीमाओं से अधिक व्यय न किया जाए और सभी धन का व्यय उसी प्रयोजन के लिए किया जाए, जिनके लिए वह मंजूर या आबंटित किया गया है;

(ग) विश्वविद्यालय के वार्षिक लेखे और बजट तैयार किए जाने के लिए और उनको, वित्त समिति द्वारा उन पर विचार किए जाने के पश्चात् कार्य परिषद् को प्रस्तुत करने के लिए उत्तरदायी होगा;

(घ) नकद और अतिशेषों तथा विनिधानों की स्थिति पर बराबर नजर रखेगा;

() राजस्व के संग्रहण की प्रगति पर नजर रखेगा और संग्रहण करने के लिए अपनाए जाने वाले तरीकों के विषय में सलाह देगा;

(च) यह सुनिश्चित करेगा कि भवन, भूमि, फर्नीचर और उपस्कर के रजिस्टर अद्यतन रखे जाएं तथा विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे सभी कार्यालयों, विशेष केन्द्रों, विशेषित प्रयोगशालाओं के उपस्कर तथा अन्य उपयोज्य सामग्री के स्टाक की जांच की जाए;

(छ) अप्राधिकृत व्यय या अन्य वित्तीय अनियमितताओं को कुलपति की जानकारी में लाएगा तथा व्यतिक्रमी व्यक्तियों के विरुद्ध समुचित कार्रवाई का सुझाव देगा;

(ज) विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे किसी कार्यालय, केन्द्र, प्रयोगशाला, महाविद्यालय या संस्था से कोई ऐसी जानकारी या विवरणियां मांगेगा जो वह अपने कर्तव्यों के पालन के लिए आवश्यक समझे ।

(8) वित्त अधिकारी द्वारा या कार्य परिषद् द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा विश्वविद्यालय को संदेय किसी धन के बारे में दी गई किसी रसीद, उस धन के संदाय के लिए पर्याप्त उन्मोचन होगी

7. विद्यापीठों के संकायाध्यक्ष-(1) विद्यापीठ के प्रत्येक संकायाध्यक्ष की नियुक्ति, कुलपति द्वारा उस विद्यापीठ के आचार्यों में से तीन वर्ष की अवधि के लिए की जाएगी और वह पुनः नियुक्ति का पात्र होगा:

परंतु संकायाध्यक्ष साठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने पर उस पद पर नहीं रहेगा:

परंतु यह और कि यदि किसी समय किसी विद्यापीठ में आचार्य नहीं है तो कुलपति या कुलपति द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत संकायाध्यक्ष, विद्यापीठ के संकायाध्यक्ष की शक्तियों का प्रयोग करेगा ।

(2) जब संकायाध्यक्ष का पद रिक्त है या जब संकायाध्यक्ष, रुग्णता, अनुपस्थिति के कारण या किसी अन्य कारण से अपने पद के कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है तब उस पद के कर्तव्यों का पालन ऐसे व्यक्ति द्वारा किया जाएगा जिसे कुलपति उस प्रयोजनार्थ नियुक्त करे ।

(3) संकायाध्यक्ष विद्यापीठ का अध्यक्ष होगा और विद्यापीठ में अध्यापन और अनुसंधान के संचालन तथा उनका स्तर बनाए रखने के लिए उत्तरदायी होगा और उसके ऐसे अन्य कृत्य भी होंगे, जो अध्यादेशों द्वारा विहित किए जाएं

(4) संकायाध्यक्ष को, यथास्थिति, अध्ययन बोर्डों या विद्यापीठ की समितियों के किसी अधिवेशन में उपस्थित होने और बोलने का अधिकार होगा, किंतु जब तक वह उसका सदस्य हो, उसे उसमें मतदान करने का अधिकार नहीं होगा

8. विभागाध्यक्ष-(1) ऐसे विभागों के मामले में, जिनमें एक से अधिक आचार्य हैं, विभागाध्यक्ष की नियुक्ति आचार्यों में से चक्रानुक्रम के आधार पर कुलपति की सिफारिश पर कार्य परिषद् द्वारा की जाएगी ।

(2) ऐसे विभागों के मामले में, जहां केवल एक आचार्य है, कार्य परिषद् के पास, कुलपति की सिफारिश पर या तो आचार्य को या किसी उपाचार्य को विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्त करने का विकल्प होगा:

परंतु आचार्य या उपाचार्य को विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति को अस्वीकार करने की स्वतंत्रता होगी ।

(3) विभागाध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया व्यक्ति उस रूप में तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा और पुनः नियुक्ति का पात्र होगा ।

(4) विभागाध्यक्ष अपनी पदावधि के दौरान किसी भी समय अपना पद त्याग सकेगा ।

(5) विभागाध्यक्ष ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा, जो अध्यादेशों द्वारा विहित किए जाएं ।

9. कुलानुशासक-(1) प्रत्येक कुलानुशासक की नियुक्ति कार्य परिषद् द्वारा कुलपति की सिफारिश पर की जाएगी और वह ऐसी शक्तियों का प्रयोग तथा ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा, जो उसे कुलपति द्वारा सौंपे जाएं ।

(2) प्रत्येक कुलानुशासक दो वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा और पुनः नियुक्ति का पात्र होगा ।

10. पुस्तकालय अध्यक्ष-(1) पुस्तकालय अध्यक्ष की नियुक्ति कार्य परिषद् द्वारा इस प्रयोजन के लिए गठित चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी और वह विश्वविद्यालय का पूर्णकालिक अधिकारी होगा ।

(2) पुस्तकालय अध्यक्ष, ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो उसे कार्य परिषद् द्वारा सौंपे जाएं

11. कार्य परिषद् की सदस्यता, गठन, गणपूर्ति और अवधि-(1) कार्य परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्: -

(क) कुलपति, जो पदेन अध्यक्ष होगा;

(ख) प्रतिकुलपति; पदेन;

(ग) सचिव, पोत परिवहन, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (पोत परिवहन विभाग), भारत सरकार या उसका नामनिर्देशिती, जो संयुक्त संचिव की पंक्ति से निम्न पंक्ति का न हो;

(घ) महानिदेशक, पोत परिवहन या उसका नामनिर्देशिती, जो संयुक्त सचिव की पंक्ति से निम्न पंक्ति का न हो;

(ङ) अध्यक्ष, भारतीय पत्तन संगम, नई दिल्ली;

(च) वित्त सलाहकार, पोत परिवहन, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (पोत परिवहन विभाग), भारत सरकार या उसका नामनिर्देशिती, जो संयुक्त सचिव की पंक्ति से निम्न पंक्ति का न हो;

(छ) कुलपति की सिफारिश पर, कम से कम ऐसे दस व्यक्तियों के पैनल में से कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले ऐसे पांच सदस्य, जो सामुद्रिक शिक्षा, उद्योग, विज्ञान या प्रौद्योगिकी और अन्य संबंधित विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान और/या व्यावहारिक अनुभव रखते हों;

(ज) केन्द्रीय सरकार के रक्षा मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने के लिए, केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाने वाला एक ऐसा सदस्य, जो संयुक्त सचिव की पंक्ति से निम्न पंक्ति का न हो;

(झ) कुलपति द्वारा ज्येष्ठता के आधार पर चक्रानुक्रम से नामनिर्दिष्ट विद्यापीठ का एक संकायाध्यक्ष;

(ञ) कुलपति द्वारा ज्येष्ठता के आधार पर चक्रानुक्रम से नामनिर्दिष्ट दो निदेशक;

(ट) कार्य परिषद् द्वारा चक्रानुक्रम से नामनिर्दिष्ट संबद्ध महाविद्यालयों और शिक्षा संस्थाओं के तीन प्राचार्य:

(ठ) किसी तकनीकी विश्वविद्यालय का वर्तमान या पूर्व कुलपति;

(ड) उस राज्य सरकार का एक प्रतिनिधि जहां विश्वविद्यालय अवस्थित है ।

(2) कुलसचिव, कार्य परिषद् का पदेन सचिव होगा ।

(3) कार्य परिषद् के अधिवेशन की गणपूर्ति सात सदस्यों से होगी ।

(4) कार्य परिषद् के पदेन सदस्यों से भिन्न, सदस्य, तीन वर्ष की अवधि तक पद धारण करेंगे ।

(5) कार्य परिषद् के एक वर्ष में, चार से कम अधिवेशन नहीं होंगे और किसी अधिवेशन में कामकाज का संचालन करने के लिए अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया के नियम तथा अधिवेशन के संबंध में ऐसे अन्य विषय, जो आवश्यक हों, ऐसे होंगे, जो परिनियमों द्वारा विहित किए जाएं ।

12. कार्य परिषद् की शक्तियां और कृत्य-(1) कार्य परिषद् को विश्वविद्यालय के राजस्व और संपत्ति के प्रबंध और प्रशासन की तथा विश्वविद्यालयों के सभी ऐसे प्रशासनिक कार्यकलापों के, जिनके लिए अन्यथा उपबन्ध नहीं किया गया है, संचालन की शक्ति होगी ।

(2) इस अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कार्य परिषद् को, उसमें निहित अन्य सभी शक्तियों के अतिरिक्त, निम्नलिखित शक्तियां प्राप्त होंगी, अर्थात्: -

(i) अध्यापन और शैक्षणिक पदों का सृजन करना, ऐसे पदों की संख्या तथा उनकी उपलब्धियां अवधारित करना और आचार्यों, सह-आचार्यों, सहायक आचार्यों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद तथा विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे महाविद्यालयों और संस्थाओं के प्राचार्यों के कर्तव्यों और सेवा की शर्तों को परिभाषित करना:

परंतु अध्यापकों और शैक्षणिक कर्मचारिवृंद की संख्या, अर्हताओं और उपलब्धियों के संबंध में कोई कार्रवाई कार्य परिषद् द्वारा विद्या परिषद् की सिफारिश पर विचार किए बिना नहीं की जाएगी;

(ii) उतने आचार्यों, सह-आचार्यों, सहायक आचार्यों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद, जितने आवश्यक हों, तथा विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे महाविद्यालयों और संस्थाओं के प्राचार्यों को इस प्रयोजन के लिए गठित चयन समिति की सिफारिश पर नियुक्त करना तथा उनमें अस्थायी रिक्तियों का भरना;

(iii) प्रशासनिक, अनुसचिवीय और अन्य आवश्यक पदों का सृजन करना तथा अध्यादेशों द्वारा विहित रीति से उन पर नियुक्तियां करना;

(iv) कुलाधिपति और कुलपति से भिन्न विश्वविद्यालय के किसी अधिकारी को अनुपस्थिति छुट्टी देना तथा ऐसे अधिकारी की अनुपस्थिति में उसके कृत्यों के निवर्हन के लिए आवश्यक व्यवस्था करना;

(v) परिनियमों और अध्यादेशों के अनुसार कर्मचारियों में अनुशासन का विनियमन करना और उसका पालन कराना;

(vi) विश्वविद्यालय के वित्त, लेखाओं, विनिधानों, संपत्ति, कामकाज तथा सभी अन्य प्रशासनिक कार्यकलापों का प्रबंध तथा विनियमन करना और उस प्रयोजन के लिए उतने अभिकर्ता नियुक्त करना, जितने वह ठीक समझे;

(vii) वित्त समिति की सिफारिशों पर वर्ष भर के कुल आवर्ती और कुल अनावर्ती व्यय की सीमाएं नियत करना;

(viii) विश्वविद्यालय के धन को, जिसके अंतर्गत अनुपयोजित आय भी है, समय-समय पर ऐसे स्टाकों, निधियों, शेयर या प्रतिभूतियों में विनिधान करना जो वह ठीक समझे या भारत में स्थावर संपत्ति के क्रय में विनिधान करना, जिसमें ऐसे विनिधान में समय-समय पर परिवर्तन करने की शक्ति भी है;

(ix) विश्वविद्यालय की ओर से किसी जंगम या स्थावर संपत्ति का अंतरण करना या अंतरण स्वीकार करना;

(x) विश्वविद्यालय के कार्य को चलाने के लिए भवनों, परिसरों, फर्नीचर, साधित्रों और अन्य साधनों की व्यवस्था करना;

(xi) विश्वविद्यालय की ओर से संविदाएं करना, उनमें परिवर्तन करना, उन्हें कार्यान्वित और रद्द करना;

(xii) विश्वविद्यालय के ऐसे कर्मचारियों और छात्रों की, जो किसी कारण से, व्यथित अनुभव करें, किन्हीं शिकायतों को ग्रहण करना, उनका न्यायनिर्णयन करना और यदि ठीक समझा जाता है तो उन शिकायतों को दूर करना;

(xiii) परीक्षकों और अनुसीमकों को नियुक्त करना और यदि आवश्यक हो तो उन्हें हटाना तथा उनकी फीसें, उपलब्धियों और यात्रा भत्ते तथा अन्य भत्ते, विद्या परिषद् से परामर्श करने के पश्चात् नियत करना;

(xiv) विश्वविद्यालय के लिए सामान्य मुद्रा का चयन करना और ऐसी मुद्रा की अभिरक्षा और उपयोग की व्यवस्था करना;

(xv) छात्राओं के निवास और उनमें अनुशासन के लिए आवश्यक विशेष इंतजाम करना;

(xvi) विश्वविद्यालयों के कुलपति, प्रतिकुलपति, संकायाध्यक्षों, कुलसचिव या वित्त अधिकारी या ऐसे अन्य कर्मचारी या प्राधिकारी को या उसके द्वारा नियुक्त किसी समिति को, जैसा वह उचित समझे, अपनी किसी शक्ति का प्रत्यायोजन करना;

(xvii) अध्येतावृत्तियां, छात्रवृत्तियां, अध्ययनवृत्तियां, सहायता वृत्तियां, पदकों और पुरस्कारों को संस्थित करना;

(xviii) अभ्यागत आचार्यों, प्रतिष्ठित आचार्यों, परामर्शदाताओं तथा विद्वानों की नियुक्ति का उपबंध करना और ऐसी नियुक्तियों के निबंधनों और शर्तों का अवधारण करना; और

(xix) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग करना और ऐसे अन्य कृत्यों का पालन करना जो अधिनियम या परिनियमों द्वारा उसे प्रदत्त किए जाएं या उस पर अधिरोपित किए जाएं ।

13. सभा के अधिवेशन-(1) सभा का वार्षिक अधिवेशन, उस दशा के सिवाय, जब किसी वर्ष के संबंध में सभा ने कोई अन्य तारीख नियत की हो, कार्य परिषद् द्वारा नियत तारीख को होगा ।

(2) सभा के वार्षिक अधिवेशन में, पूर्व वर्ष के दौरान विश्वविद्यालय के कार्यकरण की रिपोर्ट, प्राप्तियों और व्यय के विवरण, यथा संपरीक्षित तुलनपत्र और अगले वर्ष के लिए वित्तीय प्राक्कलनों सहित, प्रस्तुत की जाएगी ।

(3) खंड (2) में निर्दिष्ट प्राप्तियों और व्यय का विवरण, तुलनपत्र और वित्तीय प्राक्कलनों की प्रति सभा के प्रत्येक सदस्य को वार्षिक अधिवेशन की तारीख से कम से कम सात दिन पूर्व भेजी जाएगी ।

(4) सभा के अधिवेशन के लिए गणपूर्ति सभा के बारह सदस्यों से होगी ।

(5) सभा के विशेष अधिवेशन, कार्य परिषद् या कुलपति द्वारा, या यदि कोई कुलपति नहीं है तो प्रतिकुलपति द्वारा या यदि कोई प्रतिकुलपति नहीं है तो कुलसचिव द्वारा बुलाए जा सकेंगे ।

(6) सभा में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्: -

पदेन सदस्य:

(i) कुलपति;

(ii) प्रतिकुलपति;

(iii) विद्यापीठों के संकायाध्यक्ष;

(iv) अध्यापन विभागों के प्रधान जो संकायाध्यक्ष नहीं हैं;

(v) छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष;

(vi) कुलसचिव;

(vii) पुस्तकालय अध्यक्ष;

(viii) कुलानुशासक;

(ix) वित्त अधिकारी;

अध्यापकों के प्रतिनिधिः

(x) ऐसे सभी आचार्य जो अध्यापन विभागों के प्रधान नहीं हैं;

(xi) कुलपति द्वारा ज्येष्ठता के अनुसार चक्रानुक्रम से नियुक्त किए जाने वाले ऐसे दो उपाचार्य जो अध्यापन विभागों के प्रधान नहीं हैं;

(xii) कुलपति द्वारा ज्येष्ठता के अनुसार चक्रानुक्रम से नियुक्त किए जाने वाले दो प्राध्यापक;

अध्यापनेतर कर्मचारिवृन्द के प्रतिनिधि:

(xiii) कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले, अध्यापनेतर कर्मचारिवृन्द के दो सदस्य, एक समूह स्त्र्घ कर्मचारिवृन्द में से और अन्य शेष में से होगा;

विश्वविद्यालय से संबद्ध संस्थाओं के प्रतिनिधि:

(xiv) कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला, संबद्ध संस्थाओं से एक ऐसा प्रतिनिधि जो संस्था का        प्रधान होगा;

संसद् के प्रतिनिधि:

(xv) संसद् के पांच प्रतिनिधि, जिनमें से तीन लोक सभा अध्यक्ष द्वारा और दो, राज्य सभा के सभापति द्वारा, उनके सदस्यों में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे । तथापि, संसद् के किसी सदस्य के मंत्री या लोक सभा अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अथवा राज्य सभा का उपसभापति बन जाने के परिणामस्वरूप, विश्वविद्यालय की सभा में उसका नामनिर्देशन या निर्वाचन समाप्त हुआ समझा जाएगा;

उद्योग का प्रतिनिधित्व करने वाले व्यक्ति:

(xvi) कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले सामुद्रिक उद्योगों का प्रतिनिधित्व करने वाले ग्यारह व्यक्ति, जिनमें इंडियन नेशनल शिप ओनर्स एसोसिएशन, मेरीटाइम एसोसिएशन ऑफ शिप ओनर्स एंड शिप मैनेजर्स एसोसिएशन, फारेन ओनर्स रिप्रिजेन्टेटिव्स एंड शिप मैनेजर्स एसोसिएशन, पोत निर्माण उद्योग, झमाई उद्योग, अपतट उद्योग, नाविकों का प्रतिनिधित्व करने वाले संघ, भारत के बहुरूपात्मक परिवहन प्रचालकों के संगम, इंडियन रजिस्ट्रार ऑफ शिपिंग, मेजर एण्ड माइनर पोर्ट्स प्रत्येक से एक-एक व्यक्ति होगा; 

(xvii) सामुद्रिक राज्यों के दस प्रतिनिधि, जिनमें से एक-एक प्रतिनिधि राज्यों या संघ राज्यक्षेत्रों द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा;

अन्य सदस्य:

(xviii) कार्य परिषद् के ऐसे सदस्य जो सभा के प्राधिकृत सदस्य नहीं हैं ।

(7) सभा के पदेन सदस्यों से भिन्न, सभी सदस्य तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे:

परंतु संसद् सदस्य तीन वर्ष के लिए या जब तक उस सदन का, जिसका वह प्रतिनिधित्व करता है, सदस्य बना रहता है, इनमें से जो भी कम हो, पद धारण करेगा ।

14. विद्या परिषद् की सदस्यता, गठन, गणपूर्ति और अवधि-(1) विद्या परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्: -

(क) कुलपति, जो पदेन अध्यक्ष होगा;

(ख) प्रतिकुलपति;

(ग) मुख्य सर्वेक्षक, भारत सरकार के पोत परिवहन, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (पोत परिवहन विभाग) का पोत परिवहन महानिदेशक या उसका नामनिर्देशिती;

(घ) नौ सलाहकार, भारत सरकार के, पोत परिवहन, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय (पोत परिवहन विभाग) का पोत परिवहन महानिदेशक या उसका नामनिर्देशिती;

(ङ) विद्यापीठों के संकायाध्यक्ष;

(च) विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जा रहे कैंपसों के सभी निदेशक;

(छ) विश्वविद्यालय के अध्यापन विभागों के सभी प्रधान;

(ज) कुलपति द्वारा ज्येष्ठता के आधार पर चक्रानुक्रम से नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले प्रत्येक विश्वविद्यालय के अध्यापन विभाग से एक आचार्य;

() कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट, सामुद्रिक विद्याओं और संबंधित विषयों के क्षेत्र में तीन विख्यात विशेषज्ञ; और

(ञ) मान्यताप्राप्त महाविद्यालयों के दो प्राचार्य ।

(2) कुलसचिव, विद्या परिषद् का पदेन सचिव होगा, किंतु उसको मत देने का अधिकार नहीं होगा ।

(3) विद्या परिषद् के अधिवेशनों के लिए गणपूर्ति विद्या परिषद् के नौ सदस्यों से होगी ।

(4) विद्या परिषद् के पदेन सदस्यों से भिन्न सदस्य तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे ।

(5) विद्या परिषद् एक वर्ष में कम से कम दो अधिवेशन करेगी ।

15. विद्या परिषद् की शक्तियां-अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों के अधीन रहते हुए, विद्या परिषद् को, उसमें निहित अन्य सभी शक्तियों के अतिरिक्त, निम्नलिखित शक्तियां होंगी, अर्थात्: -

() विश्वविद्यालय की शैक्षणिक नीतियों का साधारण पर्यवेक्षण करना और शिक्षण के तरीकों, महाविद्यालयों और संस्थाओं में अध्यापन का सहकार करने, अनुसंधान के मूल्यांकन या शैक्षणिक स्तरों में सुधार के बारे में निदेश देना

(ख) विद्यापीठों के बीच समन्वय स्थापित करना, अंतर विद्यापीठों के आधार पर ली जाने वाली परियोजनाओं के लिए समितियों या बोर्डों की स्थापना या नियुक्ति करना:

(ग) साधारण शैक्षणिक अभिरुचि के विषयों पर स्वप्रेरणा से या किसी विद्यापीठ या कार्य परिषद् द्वारा निर्देश किए जाने पर विचार करना और उन पर समुचित कार्रवाई करना;

(घ) परिनियमों और अध्यादेशों से संगत ऐसे विनियम और नियम बनाना, जो विश्वविद्यालय के शैक्षणिक कार्यकरण, अनुशासन, निवास, प्रवेश, अध्येतावृत्तियों, सहायतावृत्ति, अनुसंधान सहायतावृत्ति और छात्रवृत्तियों, फीस, रियायतों, सामूहिक जीवन और हाजिरी के संबंध में हों;

() कार्य परिषद् को अध्यापकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद की संख्या, अर्हता और उपलब्धि की सिफारिश करना;

(च) कार्य परिषद् को परीक्षकों और अनुसीमकों की सिफारिश करना;

(छ) कार्य परिषद् को सम्मानिक उपाधियां प्रदान करने के लिए व्यक्तियों की सिफारिश करना; और

(ज) कार्य परिषद् को पदों के गठन के लिए सिफारिश करना ।

16. योजना बोर्ड की सदस्यता, गठन, गणपूर्ति और अवधि-योजना बोर्ड में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्: -

(क) कुलपति, जो पदेन अध्यक्ष होगा;

(ख) प्रतिकुलपति;

() सचिव, पोत परिवहन विभाग, भारत सरकार या उसका नामनिर्देशिती जो संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का हो;

(घ) सचिव, रक्षा मंत्रालय, भारत सरकार या उसका नामनिर्देशिती जो संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो;

(ङ) पोत परिवहन महानिदेशक, पोत परिवहन विभाग, भारत सरकार;

(च) वित्त सलाहकार, पोत परिवहन विभाग, भारत सरकार या उसका नामनिर्देशिती जो संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो;

(छ) कुलपति की सिफारिश पर कम से कम छह व्यक्तियों के पैनल में से कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले ऐसे दो सदस्य, जो सामुद्रिक शिक्षा, उद्योग, विज्ञान या प्रौद्योगिकी और अन्य संबंधित विषयों के संबंध में विशेष ज्ञान     और/या व्यावहारिक अनुभव रखते हों;

(ज) ज्येष्ठता के आधार पर चक्रानुक्रम से कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट विद्यापीठ का एक संकायाध्यक्ष;

(झ) ज्येष्ठता के आधार पर चक्रानुक्रम से कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट विश्वविद्यालय कैंपस का निदेशक;

(ञ) चक्रानुक्रम में कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट संबद्ध महाविद्यालय का एक प्राचार्य; और

(ट) किसी तकनीकी विश्वविद्यालय का वर्तमान या पूर्ववर्ती एक कुलपति:

परंतु उपरोक्त उपखंड () से उपखण्ड () के अधीन नामनिर्दिष्ट सदस्य, यथासाध्य, भिन्न संकायों से लिए जाएंगे

(2) कुलसचिव, योजना बोर्ड का पदेन सचिव होगा ।

(3) योजना बोर्ड के अधिवेशनों का संचालन और ऐसे अधिवेशनों के लिए अपेक्षित गणपूर्ति, अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएगी ।

(4) योजना बोर्ड के, पदेन सदस्यों से भिन्न, सदस्य तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे ।

17. योजना बोर्ड-(1) योजना बोर्ड विश्वविद्यालय का प्रमुख योजना निकाय होगा और निम्नलिखित के लिए उत्तरदायी होगा-

(क) विश्वविद्यालय द्वारा प्रस्थापित शैक्षणिक कार्यक्रमों का पुनर्विलोकन करना;

(ख) विश्वविद्यालय में शिक्षा की संरचना स्थापित करना ताकि व्यक्तित्व के विकास और समाज में उपयोगी कार्य कुशलता के लिए समुचित विषयों के विभिन्न संयोजनों का प्रस्ताव करने के लिए छात्रों को अवसर प्रदान कराए जा सकें;

(ग) मूल्योन्मुखी शिक्षा के लिए सहायक वातावरण और पर्यावरण का सृजन करना;

(घ) नई अध्यापन-विद्या प्रक्रियाओं का विकास करना जो व्याख्याओं, शैक्षकीय, विचार गोष्ठियों, प्रदर्शनों, स्वतःअध्ययनों और सामूहिक व्यावहारिक परियोजनाओं को जोड़ेगी ।

(2) योजना बोर्ड को विश्वविद्यालय के विकास के संबंध में सलाह देने की और कार्यक्रमों के कार्यान्वयन की प्रगति का पुनर्विलोकन करने की शक्ति होगी ताकि यह अभिनिश्चित हो सके कि वे उसके द्वारा सिफारिश किए गए मार्ग पर है अथवा नहीं और उससे संबंधित किसी विषय पर कार्य परिषद् और विद्या परिषद् को सलाह देने की भी शक्ति होगी ।

(3) विद्या परिषद् और कार्य परिषद् योजना बोर्ड की सिफारिशों पर विचार करने के लिए आबद्ध होगी और उसके द्वारा स्वीकृत की गई सिफारिशों का क्रियान्वयन करेंगे ।

(4) योजना बोर्ड की सिफारिशें, जो खंड (3) के अधीन कार्य परिषद् या विद्या परिषद् द्वारा स्वीकृत नहीं की गई हैं, कुलपति द्वारा कार्य परिषद् या विद्या परिषद् की सिफारिशों के साथ कुलाध्यक्ष को सलाह के लिए प्रस्तुत की जाएंगी और कुलाध्यक्ष की सलाह, यथास्थिति, कार्य परिषद् या विद्या परिषद् द्वारा क्रियान्वित की जाएंगी ।

(5) योजना बोर्ड ऐसी समितियों का गठन कर सकेगा जो विश्वविद्यालय के कार्यक्रमों की योजना बनाने और उनको मानीटर करने के लिए आवश्यक हों ।

18. विद्यापीठ और विभाग-(1) विश्वविद्यालय में उतने विद्यापीठ होंगे, जितने अध्यादेशों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं

(2) प्रत्येक विद्यापीठ का एक विद्यापीठ बोर्ड होगा और प्रथम विद्यापीठ बोर्ड के सदस्य कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे और तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे ।

(3) विद्यापीठ बोर्ड की शक्तियां और उसके कृत्य अध्यादेशों द्वारा विहित किए जाएंगे ।

(4) विद्यापीठ बोर्ड के अधिवेशनों का संचालन और ऐसे अधिवेशनों के लिए अपेक्षित गणपूर्ति अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएगी ।

(5) (क) प्रत्येक विद्यापीठ में उतने विभाग होंगे, जितने अध्यादेशों द्वारा उनमें रखे जाएं ।

(ख) कोई विभाग, परिनियमों के सिवाय, स्थापित या समाप्त नहीं किया जाएगा:

परंतु कार्य परिषद्, विद्या परिषद् की सिफारिश पर, ऐसे अध्ययन केन्द्र स्थापित कर सकेगी, जिनमें विश्वविद्यालय के उतने शिक्षक लगाए जा सकेंगे, जितने कार्य परिषद् आवश्यक समझे ।

(ग) प्रत्येक विभाग में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्: -

(i) विभाग के शिक्षक;

(ii) विभाग में अनुसंधान करने वाले व्यक्ति;

(iii) विद्यापीठ का संकायाध्यक्ष;

(iv) विभाग से संलग्न मानद आचार्य, यदि कोई हों; और

(v) ऐसे अन्य व्यक्ति, जो अध्यादेशों के उपबंधों के अनुसार विभाग के सदस्य हों ।

19. अध्ययन बोर्ड-(1) प्रत्येक विभाग में एक स्नातकोत्तर अध्ययन बोर्ड और एक पूर्व स्नातक अध्ययन बोर्ड होगा

(2) स्नातकोत्तर अध्ययन बोर्ड का गठन और उसके सदस्यों की पदावधि अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएगी ।

(3) स्नातकोत्तर अध्ययन बोर्ड के कृत्य विभिन्न उपाधियों के लिए अनुसंधानार्थ विषयों और अनुसंधान उपाधियों की अन्य अपेक्षाओं का अनुमोदन करना तथा संबद्ध विद्यापीठ बोर्ड की ऐसी रीति से, जो अध्यादेशों द्वारा विहित की जाए, निम्नलिखित के बारे में सिफारिश करना होंगे-

(क) अध्ययन पाठ्यक्रम और स्नाकोत्तर पाठ्यक्रमों के लिए जिसमें अनुसंधान उपाधिया नहीं हैं, परीक्षकों की नियुक्ति;

(ख) अनुसंधान पर्यवेक्षकों की नियुक्ति; और

(ग) स्नातकोत्तर अध्यापन और अनुसंधान के स्तर में सुधार के लिए उपाय:

परंतु स्नातकोत्तर अध्ययन बोर्ड के उपर्युक्त कृत्यों का पालन, इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पश्चात् तीन वर्ष की अवधि के दौरान विभाग द्वारा किया जाएगा ।

(4) पूर्व स्नातक, स्नातकोत्तर और व्यावसायिक अध्ययन बोर्ड का गठन और कृत्य और उसके सदस्यों की पदावधि अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएंगी ।

20. वित्त समिति-(1) वित्त समिति में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात्: -

(i) कुलपति;

(ii) प्रतिकुलपति;

(iii) कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट तीन व्यक्ति जिनमें से कम से कम एक कार्य परिषद् का सदस्य होगा;

(iv) कुलाध्यक्ष द्वारा नामनिर्दिष्ट तीन व्यक्ति; और

(v) सभा द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला कम से कम एक व्यक्ति ।

(2) वित्त सीमित के अधिवेशन के लिए गणपूर्ति उसके पांच सदस्यों से होगी ।

(3) वित्त सीमित के, पदेन सदस्यों से भिन्न, सभी सदस्य तीन वर्ष की अवधि तक पद धारण करेंगे ।

(4) यदि वित्त समिति का कोई सदस्य उसके किसी विनिश्चय से सहमत नहीं है तो उसे विसम्मति का कार्यवृत्त अभिलिखित करने का अधिकार होगा ।

(5) लेखाओं की परीक्षा और व्यय की प्रस्थापनाओं की संवीक्षा करने के लिए वित्त सीमित का अधिवेशन प्रत्येक वर्ष कम से कम तीन बार होगा ।

(6) पदों के सृजन से संबंधित सभी प्रस्थापनाओं की और उन मदों की जो बजट में सम्मिलित नहीं की गई हैं, कार्य परिषद् द्वारा उन पर विचार किए जाने से पूर्व, वित्त समिति द्वारा परीक्षा की जानी चाहिए ।

(7) वित्त अधिकारी द्वारा तैयार किए गए विश्वविद्यालयों के वार्षिक लेखे और वित्तीय प्राक्कलन, वित्त समिति के समक्ष विचार तथा टीका-टिप्पणी के लिए रखे जाएंगे और तत्पश्चात् कार्य परिषद् के अनुमोदन के लिए प्रस्तुत किए जाएंगे ।

(8) वित्त समिति वर्ष के लिए कुल आवर्ती व्यय और कुल अनावर्ती व्यय के लिए सीमाओं की सिफारिश करेगी जो उस विश्वविद्यालय की आय और उसके साधनों पर आधारित होगी (जिनके अंतर्गत उत्पादक कार्यों की दशा में, उधारों के आगम भी हो सकेंगे) ।

21. चयन समितियां-(1) आचार्य, उपाचार्य, प्राध्यापक, कुलसचिव, वित्त अधिकारी, पुस्तकालय अध्यक्ष तथा विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जाने वाले महाविद्यालयों और संस्थाओं के प्राचार्यों के पदों पर नियुक्ति के लिए कार्य परिषद् को सिफारिश करने के लिए चयन समितियां होंगी ।

(2) नीचे की सारणी के स्तंभ 1 में विनिर्दिष्ट पदों पर नियुक्ति के लिए चयन सीमित में कुलपति, प्रतिकुलपति, कुलाध्यक्ष का एक नामनिर्देशिती और उक्त सारणी के स्तंभ 2 की तत्संबंधी प्रविष्टि में विनिर्दिष्ट व्यक्ति होंगे । सारणी

1

 

2

आचार्य   

 

(i) संबद्ध विभाग का अध्यक्ष यदि वह आचार्य है

(ii) कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट एक आचार्य

(iii) तीन व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की सेवा में हों, कार्य परिषद् द्वारा उन नामों के पैनल में से नामर्दिष्ट किए जाएंगे, जिनकी सिफारिश विद्या परिषद् द्वारा उस विषय में, जिससे आचार्य का संबंध होगा, उनके विशेष ज्ञान या रुचि के कारण की गई हो

उपाचार्य/प्राध्यापक

 

(i) संबद्ध विभाग का अध्यक्ष

(ii) कुलपति द्वारा नामनिर्दिष्ट एक आचार्य

(iii) दो व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की सेवा में हों, कार्य परिषद् द्वारा उन नामों के पैनल में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे जिनकी सिफारिश विद्या परिषद् द्वारा उस विषय में जिससे उपाचार्य या प्राध्यापक का संबंध होगा, उनके विशेष ज्ञान या रुचि के कारण की गई हो

कुलसचिव, वित्त अधिकारी     

 

(i) कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट उसके दो सदस्य

(ii) कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट ऐसा एक व्यक्ति जो विश्वविद्यालय की सेवा में हो।

पुस्तकालय अध्यक्ष

 

(i) दो व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की सेवा में हों जिन्हें पुस्तकालय विज्ञान/पुस्तकालय प्रशासन के विषय का विशेष ज्ञान हो, कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे

(ii) एक व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की सेवा में हो, कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा

विश्वविद्यालय द्वारा चलाए जाने वाले महाविद्यालय या संस्था का प्राचार्य

 

तीन व्यक्ति, जो विश्वविद्यालय की सेवा में हों, जिनमें से दो कार्य परिषद् द्वारा और एक विद्या परिषद् द्वारा उनके ऐसे किसी विषय में विशेष ज्ञान या रुचि के कारण नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे जिसमें उस महाविद्यालय या संस्था द्वारा शिक्षा दी जा रही हो  

टिप्पण:

1. जहां नियुक्ति अंतर-अनुशासनिक परियोजना के लिए की जा रही हो वहां परियोजना का प्रधान संबंधित विभाग का अध्यक्ष समझा जाएगा ।

2. नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला आचार्य उस विशिष्ट विषय से संबद्ध आचार्य होगा जिसके लिए चयन किया जा रहा है और कुलपति, किसी आचार्य को नामनिर्दिष्ट करने से पूर्व विभागाध्यक्ष और विद्यापीठ के संकायाध्यक्ष से परामर्श करेगा ।

(3) कुलपति, या उसकी अनुपस्थिति में, प्रतिकुलपति, चयन समिति के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा:

परंतु चयन समिति का अधिवेशन कुलाध्यक्ष के नामनिर्देशिती और खंड (2) के अधीन कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों के पूर्व परामर्श के पश्चात् और उनकी सुविधा के अनुसार नियत किया जाएगा:

परन्तु यह और कि चयन समिति की कार्यवाहियां तभी विद्यिमान्य होंगी, जब-

(क) जहां कुलाध्यक्ष के नामनिर्देशिती और कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों की कुल संख्या चार है, वहां उनमें से कम से कम तीन अधिवेशन में भाग लें; और

(ख) जहां कुलाध्यक्ष के नामनिर्देशिती और कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों की कुल संख्या तीन है, वहां उनमें से कम से कम दो अधिवेशन में भाग लें ।

(4) चयन समिति का अधिवेशन, कुलपति या उसकी अनुपस्थिति में प्रतिकुलपति द्वारा बुलाया जाएगा ।

(5) सिफारिशें करने में चयन समिति द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया अध्यादेशों में अधिकथित की जाएगी

(6) यदि, कार्य परिषद् चयन समिति द्वारा की गई सिफारिशें स्वीकार करने में असमर्थ हो तो वह उसके कारण अभिलिखित करेगी और मामले को अंतिम आदेश के लिए कुलाध्यक्ष को भेजेगी ।

(7) अस्थायी पदों पर नियुक्तियां नीचे उपदर्शित रीति से की जाएंगी-

(i) यदि अस्थायी रिक्ति एक शैक्षणिक सत्र से अधिक की अवधि के लिए हो तो वह पूर्वगामी खंडों में उपदर्शित प्रक्रिया के अनुसार चयन समिति की सलाह से भरी जाएगी:

परंतु यदि कुलपति का यह समाधान हो जाता है कि काम के हित में रिक्ति का भरा जाना आवश्यक है तो नियुक्ति उपखंड (ii) में निर्दिष्ट स्थानीय चयन समिति द्वारा केवल अस्थायी आधार पर छह मास से अनधिक अवधि के लिए की जा सकेगी;

(ii) यदि अस्थायी रिक्ति एक वर्ष से कम की अवधि के लिए है तो ऐसी रिक्ति पर नियुक्ति स्थानीय चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी जिसमें संबद्ध विद्यापीठ का संकायाध्यक्ष, विभागाध्यक्ष और कुलपति का एक नामनिर्देशिती होगा:

परंतु यदि एक ही व्यक्ति संकायाध्यक्ष और विभागाध्यक्ष का पद धारण करता है तो चयन समिति में कुलपति के दो नामनिर्देशिती हो सकेंगे:

परंतु यह और कि मृत्यु के कारण या अन्य किसी कारण से अध्यापन पदों में हुई अचानक आकस्मिक रिक्ति की दशा में, संकायाध्यक्ष संबंधित विभागाध्यक्ष के परामर्श से एक मास के लिए अस्थायी नियुक्ति कर सकेगा और ऐसी नियुक्ति की रिपोर्ट कुलपति और कुलसचिव को देगा;

(iii) यदि परिनियमों के अधीन अस्थायी तौर पर नियुक्त किए गए किसी शिक्षक की सिफारिश नियमित चयन समिति द्वारा नहीं की जाती है तो वह अस्थायी नियोजन पर सेवा में नहीं रहेगा जब तक कि, यथास्थिति, अस्थायी या स्थायी नियुक्ति के लिए स्थानीय चयन समिति द्वारा बाद में उसका चयन नहीं कर लिया जाता ।

22. नियुक्ति का विशेष ढंग-(1) परिनियम 21 में किसी बात के होते हुए भी, कार्य परिषद् विद्या संबंधी उच्च विशेष उपाधि और वृत्तिक योग्यता वाले व्यक्ति को ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, विश्वविद्यालय में, यथास्थिति, आचार्य या उपाचार्य का पद अथवा कोई अन्य शैक्षणिक पद स्वीकार करने के लिए आमंत्रित कर सकेगी और उस व्यक्ति के ऐसा करने के लिए सहमत होने पर वह उसे उस पद पर नियुक्त कर सकेगी

(2) कार्य परिषद्, अध्यादेशों में अधिकथित रीति के अनुसार किसी संयुक्त परियोजना का जिम्मा लेने के लिए किसी अन्य विश्वविद्यालय या संगठन में कार्य करने वाले किसी शिक्षक या अन्य शैक्षणिक कर्मचारी को नियुक्त कर सकेगी ।

23. नियत अवधि के लिए नियुक्ति-कार्य परिषद् परिनियम 21 में अधिकथित प्रक्रिया के अनुसार चयन किए गए किसी व्यक्ति को एक नियत अवधि के लिए ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह ठीक समझे, नियुक्त कर सकेगी

24. मान्यताप्राप्त शिक्षक-(1) मान्यताप्राप्त शिक्षकों की अर्हताएं वे होंगी, जो अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएं ।

(2) शिक्षकों की मान्यता के लिए सभी आवेदन ऐसी रीति से किए जाएंगे जो अध्यादेशों द्वारा अधिकथित की जाएं

(3) अध्यादेशों में इस प्रयोजन के लिए अधिकथित रीति से गठित चयन समिति की सिफारिश के बिना किसी शिक्षक को शिक्षक के रूप में मान्यता नहीं दी जाएगी । 

(4) किसी शिक्षक की मान्यता की अवधि इस निमित्त बनाए गए अध्यादेशों द्वारा अवधारित की जाएगी:

(5) विद्या परिषद्, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा पारित विशेष संकल्प द्वारा शिक्षक की मान्यता वापस ले सकेगी:

परंतु जब तक इस आशय की लिखित सूचना कि ऐसा संकल्प क्यों न पारित कर दिया जाए, उस संबद्ध व्यक्ति को, उससे सूचना में विनिर्दिष्ट समय के भीतर कारण बताने की अपेक्षा करते हुए न दे दी जाए और जब तक विद्या परिषद् द्वारा उसके आक्षेपों पर, यदि कोई हों, और किसी साक्ष्य पर, जो वह उनके समर्थन में प्रस्तुत करें, विचार नहीं कर लिया जाता तब तक ऐसा संकल्प पारित नहीं किया जाएगा ।

(6) खंड (5) के अधीन मान्यता वापस लेने के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, उसको ऐसे आदेश की संसूचना की तारीख से तीन मास के भीतर कार्य परिषद् को अपील कर सकेगा जो उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगी, जो वह उचित समझे ।

25. समितियां-(1) विश्वविद्यालय का कोई प्राधिकारी, उतनी स्थायी, विशेष समितियां या खोज समिति स्थापित कर सकेगा, जितनी वह ठीक समझे और ऐसी समितियों में उन व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा, जो उस प्राधिकारी के सदस्य नहीं हैं ।

(2) उपखंड (1) के अधीन नियुक्त ऐसी कोई समिति किसी ऐसे विषय में कार्यवाही कर सकेगी जो उससे प्रत्यायोजित किया जाए, किंतु वह नियुक्त करने वाले प्राधिकारी द्वारा बाद में पुष्टि के अधीन होगी ।

26. शिक्षकों आदि की सेवा के निबंधन और शर्तें तथा आचार संहिता-(1) विश्वविद्यालय के सभी शिक्षक और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद तत्प्रतिकूल किसी करार के अभाव में, परिनियमों, अध्यादेशों और विनियमों में विनिर्दिष्ट सेवा के निबंधनों और शर्तों तथा आचार संहिता द्वारा शासित होंगे ।

(2) विश्वविद्यालय का प्रत्येक शिक्षक और शैक्षणिक कर्मचारिवृंद का प्रत्येक सदस्य लिखित संविदा के आधार पर नियुक्त किया जाएगा, जिसका प्रारूप अध्यादेशों द्वारा विहित किया जाएगा ।

(3) खंड (2) में निर्दिष्ट प्रत्येक संविदा की एक प्रति कुलसचिव के पास रखी जाएगी ।

27. अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें तथा आचार संहिता-विश्वविद्यालय के शिक्षकों तथा अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद से भिन्न, विश्वविद्यालय के सभी कर्मचारी, तत्प्रतिकूल किसी संविदा के अभाव में, परिनियमों, अध्यादेशों और विनियमों में विनिर्दिष्ट सेवा के निबंधनों और शर्तों तथा आचार संहिता द्वारा शासित होंगे ।

28. ज्येष्ठता सूची-(1) जब कभी इन परिनियमों के अनुसार किसी व्यक्ति को ज्येष्ठता के अनुसार चक्रानुक्रम से विश्वविद्यालय का कोई पद धारण करना है या उसके किसी प्राधिकारी का सदस्य होना है, तो उस ज्येष्ठता का अवधारण उस व्यक्ति के, उसके ग्रेड में लगातार सेवाकाल और ऐसे अन्य सिद्धांतों के अनुसार होगा, जो कार्य परिषद् समय-समय पर, विहित करे ।

(2) कुलसचिव का यह कर्तव्य होगा कि जिन व्यक्तियों को इन परिनियमों के उपबंध लागू होते हैं उनके प्रत्येक वर्ग की बाबत एक पूरी और अद्यतन ज्येष्ठता सूची खंड (1) के उपबंधों के अनुसार तैयार करे और बनाए रखे ।

(3) यदि दो या अधिक व्यक्तियों का किसी विशिष्ट ग्रेड में लगातार सेवाकाल बराबर हो अथवा किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों की सापेक्ष ज्येष्ठता के विषय में अन्यथा संदेह हो तो कुलसचिव स्वप्रेरणा से वह मामला कार्य परिषद् को प्रस्तुत कर सकेगा और यदि वह व्यक्ति ऐसा अनुरोध करता है तो वह मामला कार्य परिषद् को प्रस्तुत करेगा जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा ।

29. विश्वविद्यालय के कर्मचारियों को हटाया जाना-(1) जहां विश्वविद्यालय के किसी शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के किसी सदस्य या किसी अन्य कर्मचारी के विरुद्ध किसी अवचार का अभिकथन हो वहां शिक्षक या शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य के मामले में कुलपति और अन्य कर्मचारी के मामले में नियुक्ति करने के लिए सक्षम प्राधिकारी (जिसे इसमें इसके पश्चात् नियुक्ति प्राधिकारी कहा गया है) लिखित आदेश द्वारा, यथास्थिति, ऐसे शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य या अन्य कर्मचारी को निलंबित कर सकेगा और कार्य परिषद् को उन परिस्थितियों की तुरंत रिपोर्ट देगा जिनमें वह आदेश किया गया था :

परंतु यदि कार्य परिषद् की यह राय है कि मामले की परिस्थितियां ऐसी नहीं हैं कि शिक्षक या शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य का निलंबन होना चाहिए तो वह उस आदेश को प्रतिसंहृत कर सकेगी ।

(2) कर्मचारियों की नियुक्ति की संविदा के निबंधनों में या सेवा के किन्हीं अन्य निबंधनों और शर्तों में किसी बात के होते हुए भी, शिक्षकों और अन्य शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के संबंध में कार्य परिषद् और अन्य कर्मचारियों के संबंध में नियुक्ति प्राधिकारी को, यथास्थिति, शिक्षक या शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य अथवा अन्य कर्मचारी को अवचार के आधार पर हटाने की शक्ति होगी ।

(3) यथापूर्वोक्त के सिवाय, यथास्थिति, कार्य परिषद् या नियुक्ति प्राधिकारी किसी शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य या अन्य कर्मचारी को हटाने के लिए तभी हकदार होगा जब उसके लिए उचित कारण हो, और उसे तीन मास की सूचना दे दी गई हो या सूचना के बदले में तीन मास के वेतन का संदाय किया गया हो ।

(4) किसी शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य या अन्य कर्मचारी को खंड (2) या खण्ड (3) के अधीन तभी हटाया जाएगा जब उसे उसके बारे में की जाने के लिए प्रस्तावित कार्रवाई के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो ।

(5) किसी शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद के सदस्य या अन्य कर्मचारी का हटाया जाना उस तारीख से प्रभावी होगा जिसको हटाए जाने का आदेश किया जाता है:   

परंतु वहां कोई शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद का सदस्य या अन्य कर्मचारी हटाए जाने के समय निलंबित है, वहां उसका हटाया जाना उस तारीख से प्रभावी होगा जिसको वह निलंबित किया गया था ।

(6) इस परिनियम के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, कोई शिक्षक, शैक्षणिक कर्मचारिवृंद का सदस्य या अन्य कर्मचारी-

(क) यदि वह स्थायी कर्मचारी है तो, यथास्थिति, कार्य परिषद् या नियुक्ति प्राधिकारी को तीन मास की लिखित सूचना देने या उसके बदले में तीन मास का वेतन देने के पश्चात् ही पद त्याग सकेगा; और

(ख) यदि वह स्थायी कर्मचारी नहीं है तो, यथास्थिति, कार्य परिषद् या नियुक्ति प्राधिकारी को एक मास की लिखित सूचना देने या उसके बदले में एक मास का वेतन देने के पश्चात् ही पद त्याग सकेगा:

परंतु ऐसा त्यागपत्र केवल उस तारीख से प्रभावी होगा, जिसको, यथास्थिति, कार्य परिषद् या नियुक्ति प्राधिकारी द्वारा वह त्यागपत्र स्वीकार किया जाता है ।

30. सम्मानिक उपाधि-(1) कार्य परिषद्, विद्या परिषद् की सिफारिश पर और उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित संकल्प द्वारा कुलाध्यक्ष से सम्मानिक उपाधियां प्रदान करने की प्रस्थापना कर सकेगी:

परंतु आपात स्थिति की दशा में, कार्य परिषद् स्वप्रेरणा से भी ऐसी प्रस्थापना कर सकेगी ।

(2) कार्य परिषद्, उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत से पारित संकल्प द्वारा, कुलाध्यक्ष की पूर्व मंजूरी से, विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त किसी सम्मानिक उपाधि को वापस ले सकेगी ।

31. उपाधियों, आदि को वापस लिया जाना-कार्य परिषद्, उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई से अन्यून बहुमत से पारित विशेष संकल्प द्वारा किसी व्यक्ति को विश्वविद्यालय द्वारा प्रदत्त कोई उपाधि या विद्या संबंधी विशेष उपाधि या दिए गए किसी प्रमाणपत्र या डिप्लोमा को उचित और पर्याप्त कारण से वापस ले सकेगी:

परंतु इस आशय का कोई संकल्प तभी पारित किया जाएगा, जब उस व्यक्ति को ऐसे समय के भीतर जो उस सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, यह हेतुक दर्शित करने की लिखित सूचना दे दी गई है कि ऐसा संकल्प क्यों न पारित कर दिया जाए और कार्य परिषद् द्वारा उसके आक्षेपों पर, यदि कोई हों, और किसी ऐसे साक्ष्य पर, जो वह उनके समर्थन में प्रस्तुत करे, विचार कर लिया गया हो ।

32. विश्वविद्यालयों के छात्रों में अनुशासन बनाए रखना-(1) विश्वविद्यालय के छात्रों के संबंध में अनुशासन और अनुशासनिक कार्रवाई संबंधी सभी शक्तियां कुलपति में निहित होंगी ।

(2) कुलपति अपनी सभी शक्तियां या उनमें से कोई, जो वह ठीक समझे, कुलानुशासक और ऐसे अन्य अधिकारियों को, जिन्हें वह इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, प्रत्यायोजित कर सकेगा ।

(3) कुलपति, अनुशासन बनाए रखने की तथा ऐसी कार्रवाई करने की, जो उसे अनुशासन बनाए रखने के लिए समुचित प्रतीत हो, अपनी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, अपनी शक्तियों के प्रयोग के आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा कि किसी छात्र को किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए निकाला या निष्कासित किया जाए अथवा विश्वविद्यालय के किसी महाविद्यालय, संस्था या विभाग में किसी पाठ्यक्रम में कथित अवधि के लिए प्रवेश न दिए जाए अथवा उसे उतने जुर्माने का दंड दिया जाए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट है अथवा उसे विश्वविद्यालय या महाविद्यालय, संस्था या विभाग या किसी विद्यापीठ द्वारा संचालित परीक्षा या परीक्षाओं में सम्मिलित होने से एक या अधिक वर्षों के लिए विवर्जित किया जाए अथवा संबंधित छात्र या छात्रों का, किसी परीक्षा या किन्हीं परीक्षाओं का, जिसमें वह या वे सम्मिलित हुआ है या हुए हैं, परीक्षाफल रद्द कर दिया जाए ।

(4) महाविद्यालय, संस्थाओं के प्रचार्यों, विद्यापीठों के संकायाध्यक्षों तथा विश्वविद्यालय के अध्यापन विभागों के अध्यक्षों को यह प्राधिकार होगा कि वे अपने-अपने महाविद्यालयों, संस्थाओं, विद्यापीठों और विश्वविद्यालय के अध्यापन विभागों में छात्रों पर ऐसी सभी अनुशासनिक शक्तियों का प्रयोग करें जो उन महाविद्यालयों, संस्थाओं, विद्यापीठों और विभागों में अध्यापन के उचित संचालन के लिए आवश्यक हों ।

(5) कुलपति, प्राचार्यों और खंड (4) में विनिर्दिष्ट अन्य व्यक्तियों की शक्तियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, अनुशासन और उचित आचारण संबंधी विस्तृत नियम विश्वविद्यालय द्वारा बनाए जाएंगे । महाविद्यालयों, संस्थाओं के प्राचार्य, विद्यापीठों के संकायाध्यक्ष और विश्वविद्यालय के अध्यापन विभागों के अध्यक्ष ऐसे अनुपूरक नियम बना सकेंगे, जो पूर्वोक्त प्रयोजन के लिए आवश्यक समझे जाएं ।

(6) प्रवेश के समय, प्रत्येक छात्र से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह इस आशय की घोषणा पर हस्ताक्षर करे कि वह अपने को कुलपति की तथा विश्वविद्यालय के अन्य प्राधिकारियों की अनुशासनिक अधिकारिता के अधीन अर्पित करता है

33. महाविद्यालयों, आदि के छात्रों में अनुशासन बनाए रखना-ऐसे महाविद्यालय या संस्था के बारे में, जो विश्वविद्यालय द्वार नहीं चलाई जाती है, अनुशासन तथा अनुशासनिक कार्रवाई संबंधी सभी शक्तियां, अध्यादेशों द्वारा, विहित प्रक्रिया के अनुसार, यथास्थिति, महाविद्यालय या संस्था के प्राचार्य में निहित होंगी ।

34. महाविद्यालयों आदि को विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार देना-विश्वविद्यालय की अधिकारिता में स्थित महाविद्यालयों और अन्य संस्थाओं को विश्वविद्यालय के ऐसे विशेषाधिकार जो कार्य परिषद् विनिश्चित करे निम्नलिखित शर्तों पर दिए जा सकेंगे, अर्थात्: -

(i) प्रत्येक ऐसे महाविद्यालय या संस्था का नियमित रूप से गठित एक शासी निकाय होगा जिसमें कार्य परिषद् द्वारा अनुमोदित पन्द्रह से अनधिक व्यक्ति होंगे तथा जिनमें, अन्य व्यक्तियों सहित कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट विश्वविद्यालय के दो शिक्षक और अध्यापन कर्मचारिवृंद के तीन प्रतिनिधि होंगे जिनमें से एक महाविद्यालय या संस्था का प्राचार्य होगा । शासी निकाय के सदस्यों की नियुक्ति और महाविद्यालय या संस्था के प्रबंध पर प्रभाव डालने वाले अन्य मामलों के लिए प्रक्रिया अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएगी:

परंतु सरकार द्वारा चलाए जाने वाले महाविद्यालयों और संस्थाओं की दशा में उक्त शर्त लागू नहीं होगी, तथापि, उनकी एक सलाहकार समिति होगी जिसमें पन्द्रह से अनधिक व्यक्ति होंगे तथा जिनमें अन्य व्यक्तियों सहित तीन शिक्षक होंगे जिनमें से एक महाविद्यालय या संस्था का प्राचार्य और कार्य परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट विश्वविद्यालय के दो शिक्षक होंगे;

(ii) प्रत्येक ऐसा महाविद्यालय या ऐसी संस्था निम्नलिखित मामलों में कार्य परिषद् का समाधान करेगी, अर्थात्ः-

(क) उसकी वास-सुविधा की तथा अध्यापन के लिए उपस्कर की उपयुक्तता और पर्याप्तता;

(ख) अध्यापन कर्मचारिवृंद की अर्हताएं तथा उनकी पर्याप्तता और उनकी सेवा की शर्तें;

(ग) छात्रों के निवास, कल्याण, अनुशासन और पर्यवेक्षण के लिए प्रबंध;

(घ) महाविद्यालय या संस्था को निरंतर चलाने के लिए की गई वित्तीय व्यवस्था की पर्याप्तता; और

(ङ) ऐसे अन्य मामले, जो विश्वविद्यालय में शिक्षा का स्तर बनाए रखने के लिए आवश्यक हों;

(iii) विद्या परिषद् की सिफारिश के बिना किसी भी महाविद्यालय या संस्था को विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार नहीं दिए जाएंगे जो विद्या परिषद् द्वारा इस प्रयोजनार्थ नियुक्त की गई निरीक्षण समिति की रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् ही की जाएगी;

(iv) विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार प्राप्त करने के इच्छुक महाविद्यालयों और संस्थाओं से यह अपेक्षा की जाएगी कि वे ऐसा करने के अपने आशय की लिखित सूचना इस प्रकार दें ताकि वह उस वर्ष से जिससे आवेदित अनुज्ञा प्रभावी होनी है, पूर्ववर्ती पन्द्रह अगस्त तक कुल सचिव के पास पहुंच जाए;

(v) महाविद्यालय या संस्था, कार्य परिषद् और विद्या परिषद् की पूर्व अनुज्ञा के बिना ऐसे किसी विषय या पाठ्यक्रम में शिक्षण देना स्थगित नहीं करेगी, जिसका अध्यापन करने के लिए वह प्राधिकृत है और जिसका वह अध्यापन करती है

(2) विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार प्राप्त महाविद्यालयों या संस्थाओं में अध्यापन कर्मचारिवृंद और प्राचार्यों की नियुक्ति अध्यादेशों द्वारा विहित रीति से की जाएगी:

परंतु इस खंड की कोई बात सरकार द्वारा चलाए जाने वाले महाविद्यालयों और संस्थाओं को लागू नहीं होगी ।

(3) खंड (2) में निर्दिष्ट प्रत्येक महाविद्यालय या संस्था के प्रशासनिक तथा अन्य अशैक्षणिक कर्मचारिवृंद की सेवा की शर्तें वे होंगी, जो अध्यादेशों में अधिकथित की जाएं:

परंतु इस खंड की कोई बात सरकार द्वारा चलाए जाने वाले महाविद्यालयों और संस्थाओं को लागू नहीं होगी ।

(4) विश्वविद्यालय के विशेषाधिकार प्राप्त प्रत्येक महाविद्यालय या संस्था का निरीक्षण विद्या परिषद् द्वारा नियुक्त समिति प्रत्येक दो शैक्षणिक वर्षों में कम से कम एक बार करेगी और इस समिति की रिपोर्ट विद्या परिषद् को प्रस्तुत की जाएगी जो उसे अपनी ऐसी सिफारिशों के साथ, जिन्हें वह उचित समझे, कार्य परिषद् को भेजेगी

(5) रिपोर्ट तथा विद्या परिषद् की सिफारिशों, यदि कोई हों, पर विचार करने के पश्चात् कार्य परिषद् अपनी टिप्पणियों सहित, यदि कोई हों, जिन्हें वह उचित समझे, रिपोर्ट की एक प्रति महाविद्यालय या संस्था के शासी निकाय को यथोचित कार्रवाई के लिए भेजेगी ।

(6) कार्य परिषद्, विद्या परिषद् से परामर्श करने के पश्चात् किसी महाविद्यालय या संस्था को दिए गए किन्हीं विशेषाधिकारों को वापस ले सकेगी यदि किसी भी समय उसका यह विचार है कि महाविद्यालय या संस्था उन शर्तों में से किन्हीं को पूरा नहीं कर रही है जिनके आधार पर महाविद्यालय या संस्था को ऐसे विशेषाधिकार दिए गए थे:

परंतु किन्हीं विशेषाधिकारों को इस प्रकार वापस लेने के पहले संबंधित महाविद्यालय या संस्था के शासी निकाय को कार्य परिषद् के समक्ष यह अभ्यावेदन करने का अवसर प्रदान किया जाएगा कि ऐसी कार्रवाई क्यों नहीं की जानी चाहिए

(7) खंड (1) में दी गई शर्तों के अधीन रहते हुए, अध्यादेशों द्वारा, -

(i) ऐसी अन्य शर्तें, जो आवश्यक समझी जाएं;

(ii) विश्वविद्यालय के विशेषाधिकारों को महाविद्यालयों तथा संस्थाओं को देने और इन विशेषाधिकारों को वापस लेने से संबंधित प्रक्रिया,विहित की जा सकेंगी ।

(8) संबद्ध तथा मान्यता बोर्ड का गठन और उसके सदस्यों की पदावधि अध्यादेशों द्वारा विहित की जाएगी ।

35. दीक्षांत समारोह-उपाधियां प्रदान करने या अन्य प्रयोजनों के लिए विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह उस रीति से किए जाएंगे जो अध्यादेशों द्वारा विहित की जाए ।

36. अधिवेशनों का कार्यकारी अध्यक्ष-जहां विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या ऐसे प्राधिकारी की किसी समिति के अधिवेशन की अध्यक्षता करने के लिए किसी अध्यक्ष या सभापति का उपबंध नहीं किया गया है अथवा जिस अध्यक्ष या सभापति के लिए इस प्रकार का उपबंध किया गया है, वह अनुपस्थित है तो उपस्थित सदस्य ऐसे अधिवेशन की अध्यक्षता करने के लिए अपने में से एक सदस्य को निर्वाचित कर लेंगे ।

37. त्यागपत्र-सभा, कार्य परिषद्, विद्या परिषद् या विश्वविद्यालय के किसी अन्य प्राधिकारी या ऐसे प्राधिकारी की किसी समिति के पदेन सदस्य से भिन्न, कोई सदस्य, कुलसचिव को संबोधित पत्र द्वारा पद त्याग कर सकेगा और ऐसा पत्र कुलसचिव को प्राप्त होते ही त्यागपत्र प्रभावी हो जाएगा ।

38. निरर्हताएं-(1) कोई भी व्यक्ति विश्वविद्यालय के प्राधिकारियों में से किसी का सदस्य चुने जाने और बने रहने के लिए निरर्हित होगा यदि-

(i) वह विकृतचित है;

(ii) वह अनुन्मोचित दिवालिया है; और

(iii) वह किसी ऐसे अपराध के लिए, जिसमें नैतिक अधमता अंतर्वलित है, किसी न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध किया गया है और उसकी बाबत छह मास से अन्यून कारावास से दंडादिष्ट किया गया है ।

(2) यदि यह प्रश्न उठता है कि क्या कोई व्यक्ति खंड (1) में वर्णित निरर्हताओं में से किसी एक के अधीन है या रहा है तो वह प्रश्न कुलाध्यक्ष को विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा और ऐसे विनिश्चय के विरुद्ध किसी सिविल न्यायालय में कोई वाद या अन्य कार्यवाही नहीं होगी ।

39. सदस्यता और पद के लिए निवास की शर्तें-परिनियमों में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा कोई व्यक्ति, जो भारत में मामूली तौर पर निवासी नहीं है, विश्वविद्यालय का कोई अधिकारी या विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी का सदस्य बनने के लिए पात्र नहीं होगा ।

40. अन्य निकायों की सदस्यता के आधार पर प्राधिकारियों की सदस्यता-परिनियमों में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति जो किसी विशिष्ट प्राधिकारी या निकाय के सदस्य होने के नाते या किसी विशिष्ट नियुक्ति पर होने के नाते विश्वविद्यालय के किसी प्राधिकारी या निकाय का सदस्य है ऐसा पद या सदस्यता तब तक धारण करेगा जब तक वह, यथास्थिति, उस विशिष्ट प्राधिकारी या निकाय का सदस्य या उस विशिष्ट नियुक्ति पर बना रहता है

41. पूर्व छात्र संगम-(1) विश्वविद्यालय का एक पूर्व छात्र संगम होगा ।

(2) पूर्व छात्र संगम की सदस्यता के लिए अभिदाय अध्यादेशों द्वारा विहित किया जाएगा ।

(3) पूर्व छात्र संगम को कोई भी सदस्य मतदान करने या निर्वाचन में खड़े होने का तभी हकदार होगा जब वह निर्वाचन की तारीख के पहले कम से कम एक वर्ष तक संगम का सदस्य रहा है और विश्वविद्यालय की कम से कम पांच वर्ष तक की डिग्री का धारक है: परंतु पहले निर्वाचन की दशा में एक वर्ष की सदस्यता पूरी होने संबंधी शर्त लागू नहीं होगी ।

42. छात्र परिषद्-(1) विश्वविद्यालय में प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष के लिए एक छात्र परिषद् गठित की जाएगी, जिसमें निम्नलिखित होंगे-

(i) छात्र कल्याण संकायाध्यक्ष, जो कि छात्र परिषद् का अध्यक्ष होगा;

(ii) वे सभी छात्र, जिन्होंने पूर्ववर्ती शैक्षणिक वर्ष में अध्ययन, ललित कला, खेलकूद और विस्तार कार्य में पुरस्कार जीते हैं;

(iii) दस ऐसे छात्र, जो अध्ययन, खेलकूद और व्यक्तिगत के सर्वांगीण विकास में योग्यता के आधार पर छात्र परिषद् में नामनिर्दिष्ट किए जाएं:

परंतु विश्वविद्यालय के किसी छात्र को विश्वविद्यालय से संबंधित किसी विषय को यदि अध्यक्ष द्वारा अनुज्ञात किया जाए, छात्र परिषद् के समक्ष लाने का अधिकार होगा और उसे किसी भी अधिवेशन में चर्चा में भाग लेने का उस समय अधिकार होगा जब उस विषय के बारे में विचार किया जाए ।

(2) छात्र परिषद् के ये कृत्य होंगे कि वह अध्ययन, छात्र कल्याण कार्यक्रमों और विश्वविद्यालय के साधारण कार्यकरण से संबंधित अन्य महत्वपूर्ण विषयों के संबंध में विश्वविद्यालय के समुचित प्राधिकारी को सुझाव दे और ऐसे सुझाव सर्वसम्मति के आधार पर दिए जाएंगे ।

(3) छात्र परिषद् शैक्षणिक वर्ष में कम से कम एक बार अधिमानतः उस वर्ष के प्रारम्भ में अपना अधिवेशन करेगी

43. अध्यादेश कैसे बनाए जाएंगे-(1) धारा 30 की उपधारा (2) के अधीन बनाए गए प्रथम अध्यादेश, कार्य परिषद् द्वारा नीचे विनिर्दिष्ट रीति से किसी भी समय संशोधित, निरसित या परिवर्धित किए जा सकेंगे ।

(2) धारा 30 की उपधारा (1) के खंड (ढ) में प्रगणित मामलों से भिन्न उस धारा में प्रगणित मामलों के संबंध में कार्य परिषद् द्वारा कोई अध्यादेश तभी बनाया जाएगा जब ऐसे अध्यादेश का प्रारूप विद्या परिषद् द्वारा प्रस्थापित किया गया हो ।

(3) कार्य परिषद् को इस बात की शक्ति नहीं होगी कि वह विद्या परिषद् द्वारा खंड (2) के अधीन प्रस्थापित किसी अध्यादेश के प्रारूप का संशोधन करे किंतु वह प्रस्थापना को नामंजूर कर सकेगी या विद्या परिषद् के पुनर्विचार के लिए उस संपूर्ण प्रारूप को या उसके किसी भाग को ऐसे किन्हीं संशोधनों सहित, जिनका सुझाव कार्य परिषद् दे, वापस भेज सकेगी ।

(4) जहां कार्य परिषद् ने विद्या परिषद् द्वारा प्रस्थापित किसी अध्यादेश के प्रारूप को नामंजूर कर दिया है या उसे वापस कर दिया है वहां विद्या परिषद् उस प्रश्न पर नए सिरे से विचार कर सकेगी और उस दशा में, जब मूल प्रारूप उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के कम से कम दो-तिहाई और विद्या परिषद् के सदस्यों की कुल संख्या के आधे से अधिक बहुमत से पुनः अभिपुष्ट कर दिया जाता है, प्रारूप कार्य परिषद् को वापस भेजा जा सकेगा जो या तो उसे मान लेगी या उसे कुलाध्यक्ष को निर्देशित कर देगी, जिसका विनिश्चय अंतिम होगा ।

(5) कार्य परिषद् द्वारा बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश तुरंत प्रभावी होगा ।

(6) कार्य परिषद् द्वारा बनाया गया प्रत्येक अध्यादेश उसके अंगीकार किए जाने की तारीख से दो सप्ताह के भीतर कुलाध्यक्ष को प्रस्तुत किया जाएगा । कुलाध्यक्ष को अध्यादेश की प्राप्ति के चार सप्ताह के भीतर ऐसे किसी अध्यादेश के प्रवर्तन को निलंबित करने के लिए विश्वविद्यालय को निदेश देने की शक्ति होगी और वह कार्य परिषद् को, यथाशीघ्र प्रस्तावित अध्यादेश पर अपने आक्षेप के बारे में सूचित करेगा । कुलाध्यक्ष विश्वविद्यालय से टिप्पणी प्राप्त कर लेने के पश्चात् या तो अध्यादेश का निलंबन करने वाले आदेश को वापस ले लेगा या अध्यादेश को नांमजूर कर देगा और उसका विनिश्चय अंतिम होगा ।

44. विनियम-(1) विश्वविद्यालय के प्राधिकारी निम्नलिखित विषयों के बारे में अधिनियम, परिनियमों और अध्यादेशों से संगत विनियम बना सकेंगे, अर्थात्: -

(i) अपने अधिवेशनों में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया और गणपूर्ति के लिए अपेक्षित सदस्यों की संख्या अधिकथित करना;

(ii) उन सभी विषयों के लिए जिनका इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा विनियमों द्वारा उपबंध करना, विहित किया जाना अपेक्षित है;

(iii) ऐसे सभी अन्य विषयों के लिए उपबंध करना, जो केवल ऐसे प्राधिकारियों या उनके द्वारा नियुक्त समितियों से संबंधित हों और जिनके लिए इस अधिनियम, परिनियमों या अध्यादेशों द्वारा उपबंध न किया गया हो ।

(2) विश्वविद्यालय का प्रत्येक प्राधिकारी, ऐसे प्राधिकारी के सदस्यों को अधिवेशनों की तारीखों की और उन अधिवेशनों में विचारार्थ कार्य की सूचना देने और अधिवेशनों की कार्यवाही का अभिलेख रखने के लिए विनियम बनाएगा

(3) कार्य परिषद् इन परिनियमों के अधीन बनाए गए किसी विनियम का ऐसी रीति से, जो वह विनिर्दिष्ट करे, संशोधन या किसी ऐसे विनियम के निष्प्रभाव किए जाने का निदेश दे सकेगी ।

45. शक्तियों का प्रत्यायोजन-इस अधिनियम और परिनियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विश्वविद्यालय का कोई अधिकारी या प्राधिकारी अपनी कोई शक्ति, अपने या उसके नियंत्रण में के किसी अन्य अधिकारी या प्राधिकारी या व्यक्ति को इस शर्त के अधीन रहते हुए प्रत्यायोजित कर सकेगा कि इस प्रकार प्रत्यायोजित शक्तियों के प्रयोग का संपूर्ण उत्तरदायित्व ऐसी शक्तियों का प्रत्यायोजन करने वाले अधिकारी या प्राधिकारी में निहित बना रहेगा ।

46. समतुल्यता कमेटी-(1) सामुद्रिक विद्या में अर्हता की उत्कृष्ट प्रकृति को ध्यान में रखते हुए भारत सरकार के पोत परिवहन, सड़क परिवहन और राजमार्ग मंत्रालय ने, चार सरकारी सामुद्रिक संस्थानों (सामुद्रिक इंजीनियरी और अनुसंधान संस्थान, कोलकाता और मुंबई, लाल बहादुर शास्त्री उच्च सामुद्रिक अध्ययन और अनुसंधान महाविद्यालय, मुंबई, प्रशिक्षण पोत चाणक्य, नवी मुंबई), जो वर्तमान में भारतीय सामुद्रिक अध्ययन संस्थान के अधीन है, में विद्यमान अध्यापन पदों की प्रस्तावित विश्वविद्यालय में समतुल्य पदों सहित सापेक्षता पर विचार करने की दृष्टि से एक  समतुल्यता समिति" का गठन किया था । समिति की सिफारिश नीचे सारणी में दी गई है :-

अनुसूची

(1)

 

(2)

राजपत्र में अधिसूचना के अनुसार वर्तमान पदों का नाम और वेतनमान और भर्ती नियम

 

विश्वविद्यालय में पद की मान्यता के लिए समतुल्यता समिति द्वारा सिफारिश

कैप्टन अधीक्षक/प्राचार्य/निदेशक

(रु० 18400-500-22400)

 

आचार्य

उप प्राचार्य/उप/मुख्य अधिकारी/ज्येष्ठ इंजीनियर अधिकारी/ज्येष्ठ नौ-अधिकारी                                            

(रु० 14300-400-18300)

 

सह आचार्य

इंजीनियर अधिकारी/नौ-अधिकारी

(रु० 12000-375-16500)

 

सहायक आचार्य

ज्येष्ठ प्राध्यापक

(रु० 12000-375-16500)

 

सहायक आचार्य

(एम० ई० आर० आई०)

ज्येष्ठ प्राध्यापक

(रु० 10000-375-15000)      

 

ज्येष्ठ प्राध्यापक

 

प्राध्यापक

(रु० 8000-275-13500)

 

प्राध्यापक

 (2) सामुद्रिक विद्या में स्नातकोत्तर और डाक्टरेट अध्ययनों की अनुपस्थिति में संस्थानों में विद्यमान पदों को विश्वविद्यालय के समुचित वेतमान पदों के समतुल्य समझे जाएंगे ।

                (3) आगामी सीधे भर्ती किए जाने वाले व्यक्तियों के लिए अर्हताएं विश्वविद्यालय द्वारा विरचित किए जाने वाले पृथक् अध्यादेशों द्वारा शासित होंगी ।

47. फीस का पुनर्विलोकन-फीस का प्रत्येक तीन वर्ष के पश्चात् पुनर्विलोकन किया जाएगा ।

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