(1923 का अधिनियम संख्यांक 7)
[5 मार्च, 1923]
नौसैनिक सशस्त्रीकरण को परिसीमित करने के निमित्त संधि
को *** प्रभावशील करने के लिए
अधिनियम
[यतः नौसैनिक सशस्त्रीकरण को परिसीमित करने और नौसैनिक सन्निर्माण से सम्बद्ध सूचना के आदान-प्रदान के लिए 1936 की मार्च के पच्चीसवें दिन को हिज मजेस्टी की ओर से लन्दन में हस्ताक्षरित संधि] को *** प्रभावशील करना समीचीन है;
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है : -
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ - (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय नौसैनिक सशस्त्रीकरण अधिनियम, 1923 है ।
[(2) इसका विस्तार उन राज्यक्षेत्रों को छोड़कर, [जो पहली नवम्बर, 1956 के ठीक पूर्व भाग ख राज्यों में समाविष्ट थे,] सम्पूर्ण भारत पर है ।]
(3) यह ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो,-
(क) "सक्षम न्यायालय" से उच्च न्यायालय या असीमित आरम्भिक सिविल अधिकारिता वाला ऐसा अन्य न्यायालय अभिप्रेत है जिसे केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सक्षम न्यायालय घोषित करे;
(ख) "पोत" से पूर्णतः अथवा अंशतः निर्मित ऐसी कोई नाव, जलयान, बैटरी या देशी नाव अभिप्रेत है, जो पानी में तैरने के लिए आशयित या तैरने के योग्य हो, और इसके अन्तर्गत किसी पोत के सभी उपस्कर आते हैं;
[(खख) "राज्य" उन सभी राज्यक्षेत्रों का द्योतक है झ्र्जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है;]] और
[(ग) "संधि" से नौसेना सशस्त्रीकरण के परिसीमन और नौसैनिक सन्निर्माण से सम्बद्ध सूचना के आदान-प्रदान के लिए 1936 की मार्च के पच्चीसवें दिन हिज मजेस्टी की ओर से लन्दन में हस्ताक्षरित संधि अभिप्रेत है ।]
3. युद्ध जलयानों के निर्माण या लैस करने पर निर्बन्धन-इस अधिनियम के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति के अधीन और उसकी शर्तों के अनुसरण में होने के अलावा, कोई व्यक्ति,-
(क) किसी युद्ध जलयान का निर्माण नहीं करेगा और न ही किन्हीं पोतों को इस प्रकार परिवर्तित, सशस्त्र या लैस करेगा जिससे उसे युद्ध जलयान के रूप में प्रयोग के लिए अनुकूलित किया जा सके, अथवा
(ख) किसी ऐसे पोत को, जो हिज मजेस्टी के डोमिनियनों के या [भारत के] किसी भाग में, पूर्णतः या अंशतः, निर्मित, परिवर्तित, सशस्त्र या लैस किया गया है, *** उस भाग में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन और अनुसरण में होने से अन्यथा, राज्यों में किसी स्थान से प्रेषित या परिदत्त नहीं करेगा और न ही प्रेषित या परिदत्त होने देगा ।
4. अनुज्ञप्तियां-(1) [केंद्रीय सरकार] द्वारा इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञप्ति, धारा 3 में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों में से किसी के लिए भी दी जा सकेगी और उसे देने से तब तक इन्कार नहीं किया जाएगा जब तक [केंद्रीय सरकार ] को यह प्रतीत न हो कि इस प्रकार इंकार करना संधि द्वारा अधिरोपित बाध्यताओं का अनुपालन सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक है; और जहां कोई अनुज्ञप्ति शर्तों के अधीन रहते हुए दी जाए वहां शर्तें केवल वही होंगी जिन्हें [केंद्रीय सरकार] पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझे ।
(2) इस धारा के अधीन अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन ऐसे प्ररूप में होगा और उसके साथ ऐसी डिजाइनें तथा विशिष्टियां दी जाएंगी जिनकी [केंद्रीय सरकार], सामान्य या विशेष आदेश द्वारा, अपेक्षा करे ।
[(3) कोई ऐसा व्यक्ति, जो भारतीय नौसैनिक सशस्त्रीकरण (संशोधन) अधिनियम, 1937 (1937 का 2) के प्रारम्भ से पूर्व उपधारा (1) के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति के अनुसरण में किसी युद्ध जलयान के निर्माण में या किसी पोत को इस प्रकार परिवर्तित, सशस्त्र या लैस करने में लगा है जिससे उसे युद्ध जलयान के रूप में अनुकूलित किया जा सके, या राज्यों के अन्दर के किसी स्थान से कोई पोत, जो राज्यों के भीतर, पूर्णतः या अंशतः, इस प्रकार निर्मित, परिवर्तित, सशस्त्र या लैस किया गया है, प्रेषित या परिदत्त करने वाला है या प्रेषित या परिदत्त होने देता है, लिखित रूप में मांग की जाने पर, [केंद्रीय सरकार] को ऐसी डिजाइनें और विशिष्टियां देगा जिनकी अपेक्षा संधि द्वारा अधिरोपित बाध्यताओं के अनुपालन को सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए, [केंद्रीय सरकार] करे ।]
5. अधिनियम के विरुद्ध अपराध-(1) यदि कोई व्यक्ति धारा 3 के उपबन्धों में से किसी का उल्लंघन करेगा [या धारा 4 की उपधारा (3) के उपबन्धों का पालन नहीं करेगा,] तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हज़ार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(2) जहां उपधारा (1) के अधीन दण्डनीय कोई अपराध किसी कम्पनी या निगम द्वारा किया गया है वहां ऐसी कम्पनी या निगम का प्रत्येक निदेशक और प्रबन्धक तद्धीन दण्डनीय होगा, जब तक वह यह साबित न कर दे कि अपराध गठित करने वाला कार्य उसके ज्ञान और सहमति के बिना हुआ है ।
(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 517 या धारा 518 या धारा 520 में अन्तर्विष्ट किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह किसी पोत को, जिसका इस अधिनियम के अधीन समपहरण किया जा सकता है, अथवा ऐसे पोत के किसी भाग को, किसी दाण्डिक न्यायालय के आदेश के अधीन नष्ट करने या समपहरण करने के लिए प्राधिकृत करती है ।
6. पोतों की समपहरणीयता-कोई पोत, जो राज्यों में धारा 3 के उल्लंघन में, या हिज मजेस्टी के डोमिनियनों के या [भारत के] किसी *** भाग में प्रवृत्त किसी विधि के वैसे ही किसी उपबन्ध के उल्लंघन में उस भाग में, *** युद्ध जलयान के रूप में पूर्णतः या अंशतः, निर्मित, परिवर्तित, सशस्त्र या लैस किया गया है, यदि वह राज्यों में पाया जाए तो; इस अधिनियम के अधीन समपहरणीय होगा ।
7. पोतों का अभिग्रहण, निरोध और तलाशी-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई पोत समपहरणीय हो वहां,-
(क) कोई प्रेसिडेन्सी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट, अथवा
(ख) [संघ के सशस्त्र बलों] में पूरा वेतन पाने वाला कोई कमीशन्ड आफिसर, *** अथवा
(ग) सीमाशुल्क का कोई आफिसर या कोई पुलिसआफिसर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अभिहित रैंक से नीचे का न हो,
उस पोत को अभिगृहीत और निरुद्ध कर सकेगा और यदि पोत राज्यों की राज्यक्षेत्रीय समुद्रीय सीमा के अन्दर समुद्र पर पाया जाए तो वह उसे राज्यों के किसी सुविधाजनक पत्तन पर ला सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन कार्रवाई करने वाला कोई आफिसर इसके बारे में [केन्द्रीय सरकार] को, अपने पदीय वरिष्ठ अधिकारियों के माध्यम से, तुरन्त रिपोर्ट करेगा ।
(3) [केंद्रीय सरकार] अभिग्रहण के तीस दिन के भीतर या तो पोत को छुड़वा देगी या उसके समपहरण के लिए आवेदन, इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति से, करेगी या करवाएगी और पोत के अस्थायी व्ययन के लिए ऐसे आदेश कर सकेगी जैसे वह उचित समझे ।
8. पोतों के समपहरण के सम्बन्ध में प्रक्रिया-(1) इस अधिनियम के अधीन किसी पोत के समपहरण के लिए आवेदन [केंद्रीय सरकार] द्वारा, या उसके प्राधिकार के अधीन, किसी सक्षम न्यायालय को, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर पोत तत्समय है, किया जाएगा ।
(2) ऐसे आवेदन की प्राप्ति पर, न्यायालय उन सभी व्यक्तियों पर, जिनके बारे में न्यायालय को यह प्रतीत हो कि उनका पोत में हित है, आवेदन और आवेदन की सुनवाई के लिए नियत तारीख का नोटिस तामील करवाएगा, और पोत के अस्थायी व्ययन के लिए ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह उचित समझे ।
(3) इस धारा के अधीन किसी आवेदन का निपटारा करने के प्रयोजन के लिए न्यायालय को वही शक्तियां प्राप्त होंगी और वह यथासाध्य निकटतम उसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जो उसे क्रमशः सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वादों का विचारण करने के प्रयोजनार्थ प्राप्त हैं या जिनका वह अनुसरण करता है, और इस धारा के अधीन न्यायालय द्वारा किए गए किसी आदेश को डिक्री समझा जाएगा और डिक्रियों के निष्पादन के सम्बन्ध में उक्त संहिता के उपबन्ध, जहां तक वे लागू हो सकते हैं, वहां तक, तदनुसार लागू होंगे ।
(4) जहां न्यायालय का समाधान हो जाता है कि पोत इस अधिनियम के अधीन समपहरणीय है वहां, सरकार के पक्ष में पोत को समपहृत होने के आदेश पारित करेगा :
परन्तु जब पोत में हित रखने वाला कोई व्यक्ति न्यायालय के समाधानप्रद रूप में साबित कर देता है कि उसने पोत के सम्बन्ध में धारा 3 के उल्लंघन में किसी प्रकार का दुष्प्रेरण नहीं किया है, या मौनानुकूलता नहीं बरती है, या उसकी उपेक्षा करके उसे सुकर नहीं बनाया है, और ऐसे पोत को युद्ध जलयान के रूप में निर्मित नहीं किया गया है तब, वह उस पोत के बारे में और यदि उसका विक्रय किया जाता है तो उसके विक्रय-धन के बारे में ऐसे आदेश पारित कर सकेगा जैसे वह उचित समझे :
परन्तु यह और भी कि ऐसे पोत को, जिसे युद्ध जलयान के रूप में परिवर्तित सशस्त्र या लैस किया गया है, तब तक किसी भी दशा में नहीं छोड़ा जाएगा जब तक उसे केन्द्रीय सरकार के समाधानप्रद रूप में ऐसा रूप नहीं दे दिया जाता है कि पोत इस अधिनियम के अधीन समपहरणीय न रह जाए ।
(5) [केंद्रीय सरकार], या उच्च न्यायालय से भिन्न किसी न्यायालय के इस धारा के अधीन दिए गए आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे आदेश की तारीख से तीन मास के भीतर, उच्च न्यायालय में अपील कर सकेगा ।
9. समपहृत संपत्ति का व्ययन-जब धारा 8 के अधीन किसी पोत का समपहरण सरकार के पक्ष में किया गया हो तब उसका व्ययन ऐसी रीति से किया जा सकेगा जिसका निदेश [केन्द्रीय सरकार] ***करे :
परन्तु जहां किसी पोत का इस धारा के अधीन विक्रय किया जाता है वहां संधि द्वारा अधिरोपित बाध्यताओं का सम्यक् ध्यान रखा जाएगा ।
10. सुसंगत तथ्यों के बारे में विशेष सबूत-यदि इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन किसी विचारण, अपील या अन्य कार्यवाही में यह प्रश्न उठता है कि कोई पोत युद्ध जलयान है या नहीं या किसी पोत का परिवर्तन, सशस्त्रीकरण या लैस किया जाना ऐसा है या नहीं जिससे उसे युद्ध जलयान के रूप में अनुकूलित किया जा सकता है, तो वह प्रश्न केन्द्रीय सरकार को निर्दिष्ट किया जाएगा और वही सरकार उसका अवधारण करेगी तथा उसका विनिश्चय अन्तिम होगा और किसी भी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं होगा ।
11. अभिग्रहण के पश्चात् समुद्र की ओर अग्रसर होने के लिए शक्तियां-(1) जहां कोई पोत, जो धारा 7 या धारा 8 के अधीन अभिगृहीत या निरुद्ध किया गया है और सक्षम प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन छोड़ा नहीं गया है, समुद्र की ओर अग्रसर होगा वहां, पोत का मास्टर जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा और वैसे ही उसका स्वामी तथा कोई ऐसा व्यक्ति भी, जो पोत को समुद्र की ओर भेजेगा, जब तक वह स्वामी या व्यक्ति यह साबित नहीं कर देता कि अपराध उसकी जानकारी और सम्मति के बिना किया गया था, दण्डनीय होगा ।
(2) जहां कोई पोत इस प्रकार समुद्र की ओर अग्रसर होते हुए, उस समय, जब इस अधिनियम के अधीन अपने कर्तव्य के निष्पादन में पोत को अभिगृहीत और निरुद्ध करने के लिए सशक्त कोई आफिसर पोत पर हो, समुद्र में जाएगा वहां उसके स्वामी और मास्टर में से प्रत्येक, उपधारा (1) के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण करने वाले न्यायालय के आदेश पर, ऐसे आफिसर के, जिसे समुद्र पर ले जाया गया हो, सभी व्यय और आनुषंगिक व्यय अदा करने का भी दायी होगा और साथ ही जुर्माने से भी दण्डनीय होगा, जो तब तक प्रत्येक दिन के लिए, जब तक ऐसा आफिसर वापस नहीं आ जाता, या उस समय तक प्रत्येक दिन के लिए जिसके भीतर वह पोत छोड़ने के पश्चात् उस पत्तन पर, जिससे उसे ले जाया गया था, वापस आने में समर्थ नहीं हो जाता, एक सौ रुपए तक हो सकेगा ।
(3) ऐसे व्यय, जिन्हें देने के लिए उपधारा (2) के अधीन आदेश किया गया है, उसी रीति से वसूल किए जाएंगे जो दंड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) में जुर्माने की वसूली के लिए उपबन्धित है ।
12. डॉकयार्ड, आदि में प्रवेश करने की शक्ति-(1) किसी पोत को अभिगृहीत और निरुद्ध करने के लिए इस अधिनियम द्वारा सशक्त कोई व्यक्ति, दिन या रात में किसी भी समुचित समय पर, किसी डॉकयार्ड, शिपयार्ड या अन्य स्थान में प्रवेश कर सकेगा, और किसी ऐसे पोत के बारे में जांच कर सकेगा जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण हो कि वह इस अधिनियम के अधीन समपहरणीय है, और यह अभिनिश्चित करने की दृष्टि से कि क्या उसके संबंध में इस अधिनियम के उपबन्धों का सम्यक्तः पालन किया गया है या किया जा रहा है, ऐसे पोत की तलाशी ले सकेगा, तथा उस स्थान का भारसाधक उसमें नियोजित प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार सशक्त व्यक्ति को ऐसे प्रवेश और तलाशी और ऐसी जांच करने के लिए सभी समुचित सुविधाएं अनुरोध किए जाने पर, देने के लिए आबद्ध होगा ।
(2) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धाराओं 101, 102 और 103 के उपबन्ध इस धारा के अधीन की गई सभी तलाशियों की दशा में लागू होंगे ।
13. वे न्यायालजय जिनके द्वारा, और वे शर्तें जिनके अधीन रह कर, अपराधों का विचारण किया जा सकेगा -किसी प्रेसिडेन्सी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट से नीचे के रैंक का कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा और न कोई न्यायालय ऐसे अपराध का विचारण, बिना [केंद्रीय सरकार] द्वारा या इसके प्राधिकार के अधीन किए गए परिवाद के, करेगा ।
14. क्षतिपूर्ति-कोई भी अभियोजन, वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में, जो इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो, किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध होगी ।
अनुसूची – [नौसैनिक सशस्त्रीकरण की परिसीमा के लिए संधि के अनुच्छेद ।]-भारतीय नौसैनिक सशस्त्रीकरण (संशोधन) अधिनियम, 1937 (1937 का 2) की धारा 6 द्वारा निरसित ।
_______________

