इंडियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (शेयरों का अर्जन) अधिनियम, 1976
(1976 का अधिनियम संख्यांक 89)
[2 सितम्बर, 1976]
कम्पनी के कामकाज का उचित प्रबन्ध और देश की आवश्यकताओं
के लिए महत्वपूर्ण माल का उत्पादन जारी रखने और उसका
विकास सुनिश्चित करने की दृष्टि से इंडियन आयरन
एण्ड स्टील कम्पनी लिमिटेड के कुछ शेयरों के
अर्जन का और उससे संबंधित या उसके
आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
इंडियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी लिमिटेड के उपक्रम का उचित प्रबन्ध सुनिश्चित करने की दृष्टि से, केन्द्रीय सरकार द्वारा उसका प्रबन्ध इंडियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (प्रबन्ध ग्रहण) अधिनियम, 1972 (1972 का 50) के अधीन सीमित अवधि के लिए ग्रहण किया गया था;
कम्पनी का शीर्षस्थ प्रबन्ध मण्डल कम्पनी के कामकाज के कुप्रबन्ध का दोषी था । उक्त सीमित अवधि की समाप्ति के पश्चात् कम्पनी के कामकाज का प्रबन्ध ऐसे शीर्षस्थ प्रबन्ध मण्डल को प्रत्यावर्तित करना कम्पनी के हितों पर और लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला होगा;
कम्पनी के उपक्रमों के उत्पादन को बनाए रखने और उसके विकास के लिए एक भारी रकम का विनिधान आवश्यक है :
उक्त विनिधान करने में केन्द्रीय सरकार को समर्थ बनाने के लिए यह आवश्यक है कि केन्द्रीय सरकार का कम्पनी के कामकाज पर प्रभावी नियंत्रण हो ;
भारत गणराज्य के सत्ताईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम इंडियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (शेयरों का अर्जन) अधिनियम, 1976 है ।
(2) यह 17 जुलाई, 1976 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से 17 जुलाई, 1976 अभिप्रेत है;
(ख) बैंक" से बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के अर्थ में कोई बैंककारी कम्पनी अभिप्रेत है ;
(ग) कम्पनी" से इंडियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी लिमिटेड अभिप्रेत है जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अर्थ में एक कम्पनी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय इसको हाउस, 50 चौंरगी रोड, कलकत्ता में है ;
(घ) आयुक्त" से धारा 5 के अधीन नियुक्त संदाय आयुक्त अभिप्रेत है;
(ङ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(च) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(छ) शेयर" से कम्पनी की पूंजी में शेयर, चाहे वह साधारण हो या अधिमानी, अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत किसी बैंक या अन्य लेनदार को गिरवी रखा गया शेयर है, किन्तु कम्पनी की पूंजी में निम्नलिखित द्वारा धारित, कोई शेयर इसके अन्तर्गत नहीं है :-
(i) कोई राज्य सरकार;
(ii) भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय स्टेट बैंक और उसके समनुषंगी बैंक;
(iii) स्टील अथोरिटी आफ इंडिया लिमिटेड जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाई गई और रजिस्ट्रीकृत एक कम्पनी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय, हिन्दुस्तान टाइम्स हाउस, कस्तूरबा गांधी मार्ग, नई दिल्ली में है ;
(iv) भारतीय जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय जीवन बीमा निगम;
(v) भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट;
(vi) बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) के अर्थ में कोई तत्स्थानी नया बैंक;
(vii) साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) द्वारा राष्ट्रीयकृत कोई साधारण बीमा कम्पनी;
(ज) शेयर धारक" से अभिप्रेत है :-
(i) वह व्यक्ति जो नियत दिन से ठीक पूर्व कम्पनी द्वारा किसी शेयर धारक के रूप में रजिस्ट्रीकृत था और इसके अन्तर्गत उसका विधिक प्रतिनिधि भी है; या
(ii) वह व्यक्ति जिसने कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 108 के अधीन विहित प्ररूप में और उस धारा के उपबन्धों के अनुसरण में निष्पादित किसी शेयर के अन्तरण की समुचित लिखत कम्पनी को नियत दिन के पूर्व दे दी थी; या
(iii) वह व्यक्ति जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 108 के अधीन विहित प्ररूप में किसी शेयर के अन्तरण की ऐसी समुचित लिखत के अधीन, जो नियत दिन के पूर्व निष्पादित की गई थी, दावा करता है और ऐसी लिखत आयुक्त को [इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी (शेयरों का अर्जन) संशोधन अधिनियम, 1981 के प्रारंभ की तारीख से एक सौ बीस दिन के अवसान के पूर्व परिदत्त करता है ;]
(झ) विनिर्दिष्ट तारीख" से वह तारीख अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के प्रयोजन के लिए अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।
अध्याय 2
कम्पनी के शेयरों का अर्जन
3. कम्पनी के शेयरों का केन्द्रीय सरकार को अन्तरण और उसमें निहित होना-(1) नियत दिन को इस अधिनियम के आधार पर कम्पनी के सभी शेयर केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार नियत दिन से कम्पनी के सदस्यों के रजिस्टर में ऐसे प्रत्येक शेयर के धारक के रूप में, जो उपधारा (1) के उपबंधों के आधार पर उसको अन्तरित और उसमें निहित हो गया है, दर्ज हुई समझी जाएगी ।
(3) उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित सभी शेयर, ऐसे निहित होने के बल पर, सभी न्यासों, दायित्वों, बाध्यताओं, बंधकों, भारों, धारणाधिकारों और उन्हें प्रभावित करने वाले अन्य विल्लंगमों से मुक्त और उन्मोचित हो जाएंगे और किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण की कोई ऐसी कुर्की, व्यादेश या कोई ऐसी डिक्री या आदेश, जो किन्हीं ऐसे शेयरों के उपयोग को किसी प्रकार निर्बन्धित करता है, वापस ले लिया गया समझा जाएगा ।
(4) शंकाओं के निराकरण के लिए घोषित किया जाता है कि उपधारा (1) और (2) के उपबन्ध निम्नलिखित को प्रभावित करने वाले नहीं समझे जाएंगे-
(क) कम्पनी का कोई अधिकार, जो किसी शेयरधारक के विरुद्ध ऐसे शेयरधारक से किसी धन की वसूली के लिए इस आधार पर, कि शेयरधारक ने उसके द्वारा धारित शेयरों के सम्पूर्ण मूल्य या उसके किसी भाग का संदाय कम्पनी को नहीं किया है या कम्पनी के नाम में जमा नहीं किया है या किसी भी अन्य आधार पर, विद्यमान है; या
(ख) शेयरधारक का कोई अधिकार जो, नियत दिन के ठीक पूर्व कम्पनी से शोध्य कोई लाभांश या अन्य संदाय प्राप्त करने के लिए कम्पनी के विरुद्ध विद्यमान है ।
4. रकमों का संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, धारा 3 के अधीन कम्पनी के शेयर केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित किए जाने के लिए, कम्पनी के शेयरधारकों को सात करोड़, तेईस लाख, पच्चानवें हजार एक सौ सैंतीस रुपए और पन्द्रह पैसे की रकम नकद और ऐसी रीति से देगी जो धारा 6 में विनिर्दिष्ट है ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट रकम पर, नियत दिन को प्रारम्भ होकर और उस तारीख को, जिसको ऐसी रकम का संदाय केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि के लिए चार प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज लगेगा ।
5. संदाय आयुक्त की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार धारा 4 के अधीन कम्पनी को संदेय रकमों के संवितरण के प्रयोजन के लिए अधिसूचना द्वारा संदाय आयुक्त नियुक्त करेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार आयुक्त की सहायता के लिए ऐसे अन्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह ठीक समझे और तब आयुक्त ऐसे व्यक्तियों में से एक या अधिक को, इस अधिनियम के अधीन अपने द्वारा प्रयोक्तव्य सभी या किसी शक्ति का प्रयोग करने के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगा और विभिन्न शक्तियों का प्रयोग करने के लिए भिन्न व्यक्तियों को प्राधिकृत किया जा सकेगा ।
(3) कोई व्यक्ति जो किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए आयुक्त द्वारा प्राधिकृत किया गया है, उन शक्तियों का प्रयोग उसी रीति से कर सकेगा और उनका वही प्रभाव होगा माने वे शक्तियां उस व्यक्ति को सीधे इस अधिनियम द्वारा प्रदान की गई हैं, प्राधिकार के रूप में नहीं ।
(4) इस धारा के अधीन नियुक्त आयुक्त और अन्य व्यक्तियों के वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि में से चुकाए जाएंगे
6. केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार कम्पनी के शेयरधारकों को संदाय करने के लिए विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के अन्दर आयुक्त को उतनी रकम नकद देगी जो-
(क) धारा 4 की उपधारा (1) की विनिर्दिष्ट रकम के बराबर है; और
(ख) धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन अवधारित रकम के बराबर है ।
(2) केन्द्रीय सरकार भारत के लोक खाते में आयुक्त के नाम एक निक्षेप खाता खोलेगी और आयुक्त इस अधिनियम के अधीन उसे दी गई प्रत्येक रकम उक्त खाते में जमा करेगा और उक्त निक्षेप खाते को चलाएगा ।
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट निक्षेप खाते में जमा रकमों पर प्रोद्भूत होने वाला ब्याज कम्पनी के शेयरधारकों के फायदे के लिए काम आएगा ।
7. आयुक्त के समक्ष दावों का किया जाना-(1) प्रत्येक शेयरधारक जिसका, इस अधिनियम द्वारा अर्जित प्रत्येक शेयर के संबंध में दावा है, ऐसा दावा [इंडियन आयरन एंड स्टील कंपनी (शेयरों का अर्जन) संसोधन अधिनियम, 1981 के प्रारंभ की तारीख से एक सौ बीस दिन के अवसान के पूर्व] आयुक्त के समक्ष करेगा :
1[परंतु यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि दावेदार पर्याप्त कारण से, उक्त एक सौ बीस दिन की अवधि के अवसान के पूर्व दावा करने से निवारित रहा था तो वह एक सौ बीस दिन की अतिरिक्त अवधि के भीतर दावा ग्रहण कर सकता है, किंतु उसके पश्चात् नहीं ।]
1[(1क) प्रत्येक ऐसा दावा जो उपधारा (1) के अधीन, जिस रूप में वह इण्डियन आयरन एंड स्टील कंपनी (शेयरों का अर्जन) संशोधन अधिनियम, 1981 के प्रारंभ के पूर्व थी, उसमें विनिर्दिष्ट अवधि या तारीख के अवसान के पश्चात् किया गया है, उक्त संशोधन अधिनियम द्वारा या संशोधित उक्त उपधारा के अधीन प्रस्तुत किया गया समझा जाएगा, और उसका (यद्यपि वह ऐसे प्रारंभ के पहले नामंजूर कर दिया गया हो) इस प्रकार निपटारा किया जाएगा मानो वह समय पर प्रस्तुत कर दिया गया था। ]
(2) किसी अधिमानी शेयर के प्रत्येक शेयरधारक का, केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को संदत्त की गई रकम के संबंध में, अधिमानी दावा होगा ।
7क. किसी रकम के लिए हकदार व्यक्तियों की बाबत विवादों की जांच करने की आयुक्त की शक्ति-जहां ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों की बाबत, जो इस अधिनियम के अधीन संदेय किसी रकम के हकदार हैं, कोई विवाद है (जिसके अन्तर्गत इस बारे में कोई विवाद भी है कि किसी रकम के लिए किसी मृत दावेदार के कौन विधिक प्रतिनिधित्व हैं) वहां आयुक्त ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, ऐसे व्यक्ति को संदाय कर सकेगा जो उसे रकम प्राप्त करने के लिए सर्वाधिक हकदार अभिप्रेत हो :
परन्तु यदि आयुक्त यह अवधारित करने में असमर्थ है कि रकम के लिए कौन सा व्यक्ति हकदार है और वह समझता है कि मामले पर ऐसे आरम्भिक अधिकारिता वाले प्रधान सिविल न्यायालय द्वारा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर कम्पनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है, अधिक समुचित रूप से कार्यवाही की जा सकती है तो वह ऐसा विवाद उक्त न्यायालय को निर्देशित कर सकेगा जिसका उस पर विनिश्चय अंतिम होगा :
परन्तु यह और कि इसमें अन्तर्विष्ट किसी बात का किसी ऐसे व्यक्ति के, जो इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञात रकम को पूर्णतः या भागतः प्राप्त करे, उस दायित्व पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा जो उस रकम के लिए विधिपूर्वक हकदार व्यक्ति को उस रकम का संदाय करने की बाबत हो ।
7ख. न्यायालय में रकम का जमा किया जाना-जहां आयुक्त ने कोई विवाद धारा 7क के अधीन ऐसे सिविल न्यायालय को, जो उस धारा में निर्दिष्ट है, निर्देशित किया है, वहां वह ऐसी रकम उस न्यायालय में जमा करेगा ।
8. दावों की परीक्षा-धारा 7 के अधीन दावों की प्राप्ति पर आयुक्त, अधिमानी शेयरों और साधारण शेयरों के संबंध में दावों को पृथक्-पृथक् क्रमबद्ध करेगा और प्रत्येक ऐसे शेयर के संबंध में दावों की परीक्षा करेगा ।
9. दावों का स्वीकार या अस्वीकार किया जाना-(1) आयुक्त दावों की परीक्षा करने के पश्चात् कोई निश्चित तारीख नियत करेगा जिसको या जिसके पहले प्रत्येक दावेदार अपने दावे का सबूत फाइल करेगा या उसे आयुक्त द्वारा किए जाने वाले वितरण के फायदे से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(2) इस प्रकार नियत की गई तारीख के बारे में कम से कम चौदह दिन की सूचना अंग्रेजी भाषा के ऐसे दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में और प्रादेशिक भाषा के ऐसे दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में जो आयुक्त उपयुक्त समझे, विज्ञापन द्वारा दी जाएगी, और ऐसी प्रत्येक सूचना में दावेदार से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह विज्ञापन में विनिर्दिष्ट समय के भीतर आयुक्त को अपने दावे का सबूत फाइल करे ।
(3) प्रत्येक दावेदार जो आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट समय के भीतर अपने दावे का सबूत फाइल करने में असफल रहता है, आयुक्त द्वारा किए गए वितरण से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(4) आयुक्त ऐसा अन्वेषण करने के पश्चात् जो उसकी राय में आवश्यक है और कम्पनी को दावे का खंडन करने का अवसर देने के पश्चात् और दावेदारों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, लिखित रूप में दावे को पूर्णतः या भागतः स्वीकार या अस्वीकार करेगा ।
(5) आयुक्त को अपने कृत्यों के निर्वहन से उत्पन्न होने वाले सभी मामलों में, जिनके अन्तर्गत वह या वे स्थान भी हैं जहां वह अपनी बैठकें करेगा, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी और इस अधिनियम के अधीन अन्वेषण करने के लिए निम्नलिखित विषयों की बाबत उसे वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-
(क) किसी साक्षी को समन करना और उसे हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज या अन्य तात्त्विक पदार्थ का, जो साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य है, प्रकटीकरण और पेश किया जाना;
(ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।
(6) आयुक्त के समक्ष कोई अन्वेषण, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 288 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और आयुक्त को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(7) कोई दावेदार जो आयुक्त के विनिश्चय से असन्तुष्ट है उस विनिश्चय के विरुद्ध अपील आरम्भिक अधिकारिता वाले उस प्रधान सिविल न्यायालय में कर सकता है जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर कम्पनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है ।
10. आयुक्त द्वारा दावेदारों को धन का संवितरण-(1) इस अधिनियम के अधीन दावा स्वीकार करने के पश्चात्, इस अधिनियम के आधार पर अर्जित प्रत्येक शेयर के सम्बन्ध में शोध्य रकम आयुक्त द्वारा प्रति अधिमानी शेयर बत्तीस रुपए और पचहतर पैसे की दर से और प्रति साधारण शेयर चार रुपए और सत्तर पैसे की दर से ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को संदत्त की जाएंगी जिसे या जिन्हें ऐसी धनराशियां शोध्य हैं और ऐसा संदाय किए जाने पर ऐसे अर्जित शेयर के सम्बन्ध में केन्द्रीय सरकार के दायित्व का निर्वहन हो जाएगा ।
(2) आयुक्त, धारा 6 की उपधारा (3) के अधीन ब्याज के रूप में उसे संदत्त की गई रकम भी शेयरधारकों के बीच प्रभाजित करेगा और ऐसा प्रभाजन प्रत्येक शेयरधारक को शोध्य रकम के आधार पर किया जाएगा ।
11. असंवितरित या अदावाकृत रकमों का साधारण राजस्व खाते में निक्षिप्त किया जाना-आयुक्त को संदत्त कोई धन जो उस अन्तिम दिन से, जिस दिन संवितरण किया गया था, [छह मास] की अवधि तक असंवितरित या अदावाकृत रहता है, आयुक्त द्वारा केन्द्रीय सरकार के साधारण राजस्व खाते में अन्तरित किया जाएगा, किन्तु इस प्रकार अन्तरित किसी धन के लिए कोई दावा ऐसे संदाय के हकदार व्यक्ति द्वारा केन्द्रीय सरकार को किया जा सकता है और उसका इस प्रकार निपटारा किया जाएगा मानो ऐसा अन्तरण नहीं किया गया था और दावे के संदाय के लिए किया गया आदेश, यदि कोई है, राजस्व के प्रतिदाय के लिए आदेश माना जाएगा ।
12. निरीक्षण की शक्ति-यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजनों के लिए कि इस अधिनियम के अधीन संदाय का दावा करने वाला कोई व्यक्ति शेयरधारक है या नहीं, आयुक्त को-
(क) कम्पनी के किसी रजिस्टर या अभिलेख का कब्जा, अभिरक्षा या नियंत्रण रखने वाले किसी व्यक्ति से ऐसा रजिस्टर या अभिलेख आयुक्त के समक्ष पेश करने की अपेक्षा करने का अधिकार होगा;
(ख) किसी व्यक्ति से कोई कथन करने की या कोई ऐसी सूचना देने की जो आयुक्त द्वारा अपेक्षित है, अपेक्षा करने का अधिकार होगा ।
अध्याय 3
प्रकीर्ण
13. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबन्ध, इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि में, या ऐसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में, किसी असंगत बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
14. शास्तियां-जो कोई व्यक्ति,-
(क) इस अधिनियम के अधीन ऐसा दावा करता है, जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह मिथ्या है या बिल्कुल गलत है; या
(ख) उससे इस अधिनियम के अधीन ऐसा करने की अपेक्षा की जाने पर,-
(i) कम्पनी का कोई रजिस्टर या अभिलेख पेश नहीं करेगा या उसे पेश करने में असफल रहेगा, या
(ii) कोई ऐसा कथन करेगा या कोई ऐसी सूचना देगा जिसकी कोई मत्वहपूर्ण विशिष्टियां मिथ्या हैं और जिसका मिथ्या होना वह जानता है या जिसके मिथ्या होने का वह विश्वास करता है या जिसके सही होने का वह विश्वास नहीं करता है;
(ग) किसी पुस्तक, लेख, अभिलेख, रजिस्टर, विवरणी या अन्य दस्तावेज में यथापूर्वोक्त कोई ऐसा कथन करेगा,
वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दण्डनीय होगा ।
15. कम्पनियों द्वारा अपराध-जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे व्यक्ति को दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा, और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, तथा
(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
16. अपराधों के संज्ञान की परिसीमा-कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान, केन्द्रीय सरकार या इस निमत्त उस सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी की पूर्व मंजूरी के सिवाय, नहीं करेगा ।
17. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
18. निरसन और व्यावृत्ति-इण्डियन आयरन एण्ड स्टील कम्पनी (शेयरों का अर्जन) अध्यादेश, 1976 (1976 का 10) इसके द्वारा निरसित किया जाता है: परन्तु ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के वर्तमान उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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