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ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970 ( Contract Labour (Regulation and Abolition) Act, 1970 )


 

ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970

(1970 का अधिनियम संख्यांक 37)

[5 सितम्बर, 1970]

कतिपय स्थापनों में ठेका श्रमिकों का नियोजन विनियमित करने और कतिपय परिस्थितियों में ठेका श्रम के उत्सादन और उनसे सम्बन्धित विषयों का

उपबन्ध करने के लिए

 अधिनियम

                भारत गणराज्य के इक्कीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, प्रारम्भ और लागू होना-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम ठेका श्रम (विनियमन और उत्सादन) अधिनियम, 1970 है । 

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है । 

(3) यह ऐसी तारीख  को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकती हैं । 

(4) यह-

(क) ऐसे प्रत्येक स्थापन को लागू होता है जिसमें बीस या इससे अधिक कर्मकार ठेका श्रमिक के रूप में नियोजित हैं या पूर्ववर्ती बारह मासों के किसी भी दिन नियोजित थे; 

(ख) ऐसे प्रत्येक ठेकेदार को लागू होता है जो बीस या इससे अधिक कर्मकारों को नियोजित करता है या जिसने पूर्ववर्ती बारह मासों के किसी भी दिन बीस या इससे अधिक कर्मकार नियोजित किए थे :

                परन्तु समुचित सरकार, ऐसा करने के अपने आशय की कम से कम दो मास की सूचना देने के पश्चात्, इस अधिनियम के उपबन्ध, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे किसी भी स्थापन या ठेकेदार को लागू कर सकेगी जो बीस से कम उतने कर्मचारियों को नियोजित करता है जितने अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं । 

(5) (क) यह ऐसे स्थापनों को लागू नहीं होगा जिनमें केवल आन्तरायिक या आकस्मिक प्रकृति का काम किया जाता है । 

(ख) यदि यह प्रश्न उठता है कि किसी स्थापन में किया गया कोई काम आन्तरायिक या आकस्मिक प्रकृति का है या नहीं तो समुचित सरकार, यथास्थिति, केन्द्रीय बोर्ड या राज्य बोर्ड से परामर्श करके उस प्रश्न का विनिश्चय करेगी और उसका विनिश्चय         अन्तिम होगा । 

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए, किसी स्थापन में किया गया काम उस दशा में आन्तरायिक प्रकृति का नहीं           समझा जाएगा-

(i) जब कि वह पूर्ववर्ती बारह मासों में एक सौ बीस से अधिक दिन किया गया था; अथवा

(ii) जब कि वह सामयिक प्रकृति का है और एक वर्ष में साठ से अधिक दिन किया जाता है । 

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो- 

 [(क) समुचित सरकार" से अभिप्रेत है- 

(i) ऐसे स्थापन के संबंध में, जिसकी बाबत औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) के अधीन समुचित सरकार केन्द्रीय सरकार है, केन्द्रीय सरकार;              

(ii) किसी अन्य स्थापन के संबंध में, उस राज्य की सरकार, जिसमें वह अन्य स्थापन स्थित है;]

 (ख) कर्मकार को किसी स्थापन के काम में या काम के सम्बन्ध में ठेका श्रमिक" के रूप में नियोजित तब समझा जाएगा जब वह प्रधान नियोजक की जानकारी में या के बिना, किसी ठेकेदार द्वारा या उसके माध्यम से, ऐसे किसी काम में या के सम्बन्ध में भाड़े पर रखा जाता है;

(ग) “ठेकेदार" से, किसी स्थापन के सम्बन्ध में, ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी स्थापन को केवल माल या विनिर्माण-वस्तुओं का प्रदाय करने से भिन्न कोई निश्चित परिणाम ठेका श्रमिकों के माध्यम से उस स्थापन के लिए सम्पन्न कराने का जिम्मा लेता है या जो उस स्थापन के किसी काम के लिए ठेका श्रमिक उपलब्ध कराता है और इसके अन्तर्गत उपठेकेदार भी है; 

(घ) नियंत्रित उद्योग" से ऐसा कोई उद्योग अभिप्रेत है जिसके बारे में किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा यह घोषित किया गया है कि संघ द्वारा उस पर नियंत्रण रखना लोक हित में समीचीन है; 

(ङ) “स्थापन" से निम्नलिखित अभिप्रेत है- 

(i) सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी का कोई कार्यालय या विभाग, अथवा 

(ii) ऐसा कोई स्थान, जहां कोई विनिर्माण किया जाता है या कोई उद्योग, व्यापार, कारबार, या उपजीविका चलाई जाती है; 

(च) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है; 

(छ) प्रधान नियोजक" से निम्नलिखित अभिप्रेत है- 

(i) सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी के किसी कार्यालय या विभाग के सम्बन्ध में उस कार्यालय या विभाग का प्रधान या ऐसा अन्य अधिकारी जिसे, यथास्थिति, सरकार या स्थानीय प्राधिकारी इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, 

(ii) किसी कारखाने में, उस कारखाने का स्वामी या अधिष्ठाता और जहां कि कोई व्यक्ति कारखाना अधिनियम, 1948 (1948 का 63) के अधीन उस कारखाने का प्रबन्धक नामित किया गया है वहां, इस प्रकार नामित व्यक्ति,

(iii) किसी खान में, उस खान का स्वामी या अभिकर्ता और जहां कि कोई व्यक्ति उस खान का प्रबन्धक नामित किया गया है वहां, इस प्रकार नामित व्यक्ति,

(iv) किसी अन्य स्थापन में, उस स्थापन के पर्यवेक्षण और नियंत्रण के लिए उत्तरदायी कोई व्यक्ति । 

स्पष्टीकरण-इस खंड के उपखंड (iii) के प्रयोजनों के लिए खान", स्वामी" और अभिकर्ता" शब्दों के वही अर्थ होंगे जो खान अधिनियम, 1952 (1952 का 35) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ञ), खंड (ठ) और खंड (ग) में हैं; 

(ज) “मजदूरी" का वही अर्थ होगा जो मजदूरी संदाय अधिनियम, 1936 (1936 का 4) की धारा 2 के खंड (ध्त्) में है;

(झ) “कर्मकार" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो भाड़े या पारिश्रमिक के लिए कोई कुशल, अर्द्धकुशल या अकुशल शारीरिक, पर्यवेक्षकीय, तकनीकी या लिपिकीय काम करने के लिए किसी स्थापन के काम में या के सम्बन्ध में नियोजित है, चाहे नियोजन के निबन्धन अभिव्यक्त या विवक्षित हों, किन्तु इसके अन्तर्गत कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है, जो-

                क-मुख्यतया प्रबन्धकीय या प्रशासनिक हैसियत में नियोजित है, अथवा

                ख-पर्यवेक्षकीय हैसियत में नियोजित है और पांच सौ रुपए मासिक से अधिक मजदूरी पाता है अथवा पद से सम्बन्धित कर्तव्यों की प्रकृति या अपने में निहित शक्तियों के कारण मुख्यतया प्रबन्धकीय प्रकृति के कृत्य करता है, अथवा 

                ग-ऐसा बाह्य कर्मकार है अर्थात् ऐसा व्यक्ति है जिसे प्रधान नियोजक के व्यापार या कारबार के प्रयोजनार्थ प्रधान नियोजक द्वारा या उसकी ओर से कोई वस्तु या सामग्री विक्रय के लिए ठीक करने, साफ करने, धोने, परिवर्तित करने, अलंकृत करने, परिसाधित करने, मरम्मत करने या अनुकूलित करने या अन्यथा प्रसंस्कृत करने के लिए दी जाती है और वह प्रक्रिया या तो बाह्य कर्मकार के घर में या ऐसे किसी अन्य परिसर में की जाती है जो प्रधान नियोजक के नियंत्रण और प्रबन्ध के अधीन नहीं है ।

(2) जम्मू-कश्मीरी राज्य में अप्रवृत्त किसी विधि के प्रति इस अधिनियम में किसी निर्देश का उस राज्य के सम्बन्ध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस राज्य में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के प्रति, यदि कोई हो, निर्देश है । 

 

 

अध्याय 2

सलाहकार बोर्ड

3. केन्द्रीय सलाहकार बोर्ड-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रशासन से उद्भूत होने वाले ऐसे मामलों पर, जो उसे निर्दिष्ट किए जाएं, उसे सलाह देने के लिए, तथा इस अधिनियम के अधीन उसे सौंपे गए अन्य कृत्यों को कार्यान्वित करने के लिए केन्द्रीय सलाहकार (ठेका श्रम) बोर्ड नामक एक बोर्ड (जिसे इसमें इसके पश्चात् केन्द्रीय बोर्ड कहा गया है), यथाशक्य शीघ्र,                    गठित करेगी ।

(2) केन्द्रीय बोर्ड निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-

(क) एक अध्यक्ष, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा; 

(ख) मुख्य श्रम आयुक्त (केन्द्रीय), पदेन; 

(ग) सतरह से अनधिक किन्तु ग्यारह से अन्यून उतने सदस्य जितने केन्द्रीय सरकार उस सरकार, रेल, कोयला उद्योग, खनिज उद्योग, ठेकेदारों, कर्मकारों और ऐसे अन्य हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए नामनिर्देशित करे, जिनका केन्द्रीय सरकार की राय में केन्द्रीय बोर्ड में प्रतिनिधित्व होना चाहिए ।

(3) उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट प्रत्येक प्रवर्ग में से केन्द्रीय बोर्ड के सदस्यों के रूप में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की संख्या, सदस्यों की पदावधि तथा सेवा की अन्य शर्तें, उनके द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया तथा उनकी रिक्तियों के भरने की रीति ऐसी होगी जो विहित की जाए :

परन्तु कर्मकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए नामनिर्देशित सदस्यों की संख्या प्रधान नियोजकों और ठेकेदारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए नामनिर्देशित सदस्यों की संख्या से कम न होगी । 

4. राज्य सलाहकार बोर्ड-(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के प्रशासन से उद्भूत होने वाले ऐसे मामलों पर, जो उसे निर्दिष्ट किए जाएं उसे सलाह देने के लिए, तथा इस अधिनियम के अधीन उसे सौंपे गए अन्य कृत्यों को कार्यान्वित करने के लिए राज्य सलाहकार (ठेका श्रम) बोर्ड नामक एक बोर्ड (जिसे इसमें इसके पश्चात् राज्य बोर्ड कहा गया है) गठित कर सकेगी । 

(2) राज्य बोर्ड निम्नलिखित से मिलकर बनेगा- 

(क) एक अध्यक्ष, जो राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा; 

(ख) श्रम आयुक्त, पदेन, या उसकी अनुपस्थिति में ऐसा कोई अन्य अधिकारी जो राज्य सरकार द्वारा उस निमित्त नामनिर्देशित किया गया है; 

(ग) ग्यारह से अनधिक किन्तु नौ से अन्यून उतने सदस्य जितने राज्य सरकार उस सरकार, उद्योग, ठेकेदारों, कर्मकारों और ऐसे अन्य हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए नामनिर्देशित करे जिनका राज्य सरकार की राय में राज्य बोर्ड में प्रतिनिधित्व होना चाहिए । 

(3) उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट प्रत्येक प्रवर्ग में से राज्य बोर्ड के सदस्यों के रूप में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की संख्या, सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें, उनके द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया तथा उनकी रिक्तियों को भरने की रीति ऐसी होगी जो विहित की जाए :

परन्तु कर्मकारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए नामनिर्देशित सदस्यों की संख्या प्रधान नियोजकों और ठेकेदारों का प्रतिनिधित्व करने के लिए नामनिर्देशित सदस्यों की संख्या से कम न होगी । 

5. समितियां गठित करने की शक्ति-(1) यथास्थिति, केन्द्रीय बोर्ड या राज्य बोर्ड ऐसी समितियां, ऐसे प्रयोजन या प्रयोजनों के लिए गठित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।  

(2) उपधारा (1) के अधीन गठित समिति का अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होगा, और वह अपने अधिवेशनों में कामकाज करने के सम्बन्ध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी, जो विहित किए जाए । 

(3) समिति के सदस्यों को उसके अधिवेशनों में हाजिर होने के लिए ऐसी फीस और भत्ते दिए जाएंगे जो विहित किए जाएं :

परन्तु ऐसे किसी सदस्य को कोई फीस संदेय न होगी जो सरकार का या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा स्थापित किसी निगम का अधिकारी है ।

अध्याय 3

ठेका श्रमिकों को नियोजित करने वाले स्थापनों का रजिस्ट्रीकरण

6. रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारियों की नियुक्ति-समुचित सरकार, राजपत्र में अधिसूचित आदेश द्वारा,-

(क) ऐसे व्यक्तियों को, जो सरकार के राजपत्रित अधिकारी होंगे, और जिन्हें वह ठीक समझे, इस अध्याय के प्रयोजन के लिए रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी नियुक्त कर सकेगी; तथा 

(ख) उन सीमाओं को परिनिश्चित कर सकेगी जिनके अन्दर रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा । 

7. कतिपय स्थापनों का रजिस्ट्रीकरण-(1) ऐसे किसी स्थापन का, जिसे यह अधिनियम लागू होता है, प्रत्येक प्रधान नियोजक, उस स्थापन के रजिस्ट्रीकरण के लिए रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी से ऐसी अवधि के भीतर, जो समुचित सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, साधारणतया स्थापनों के बारे में या उनके किसी वर्ग के बारे में इस निमित्त नियत करे, विहित रीति से                           आवेदन करेगा :

परन्तु यदि रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी का समाधान हो जाता है कि आवेदक समय से आवेदन करने में पर्याप्त कारणवश निवारित हो गया था तो वह रजिस्ट्रीकरण के लिए कोई ऐसा आवेदन इस निमित्त नियत की गई अवधि के अवसान के पश्चात् भी ग्रहण                   कर सकेगा ।  

(2) यदि रजिस्ट्रीकरण का आवेदन सभी प्रकार से पूर्ण है तो रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी उस स्थापन की रजिस्ट्री करेगा और स्थापन के प्रधान नियोजक को रजिस्ट्रीकरण का एक प्रमाणपत्र देगा जिसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं ।

8. कतिपय मामलों में रजिस्ट्रीकरण का प्रतिसंहरण-यदि रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी का या तो उसे इस निमित्त किए गए किसी निर्देश पर या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि किसी स्थापन का रजिस्ट्रीकरण दुर्व्यपदेशन द्वारा या किसी तात्त्विक तथ्य को दबाकर अभिप्राप्त किया गया है या रजिस्ट्रीकरण किसी अन्य कारण से बेकार या प्रभावहीन हो गया है और इस कारण उसका प्रतिसंहरण अपेक्षित है तो रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी स्थापन के प्रधान नियोजक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और समुचित सरकार के पूर्व अनुमोदन से रजिस्ट्रीकरण का प्रतिसंहरण कर सकेगा । 

9. अरजिस्ट्रीकरण का प्रभाव-ऐसे स्थापन का, जिसे यह अधिनियम लागू होता है, प्रधान नियोजक- 

(क) उस स्थापन की दशा में, जिसकी धारा 7 के अधीन रजिस्ट्री की जानी अपेक्षित है, किन्तु जिसकी उस धारा के अधीन उस प्रयोजन के लिए नियत समय के भीतर रजिस्ट्री नहीं हुई है; 

(ख) उस स्थापन की दशा में, जिसके बारे में रजिस्ट्रीकरण का प्रतिसंहरण धारा 8 के अधीन कर दिया गया है,

यथास्थिति, खंड (क) में निर्दिष्ट अवधि के अवसान के पश्चात् या खंड (ख) में निर्दिष्ट रजिस्ट्रीकरण के प्रतिसंहरण के पश्चात् उस स्थापन में ठेका श्रमिकों को नियोजित नहीं करेगा ।

                10. ठेका श्रमिकों के नियोजन का प्रतिषेध-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, समुचित सरकार, यथास्थिति, केन्द्रीय बोर्ड या राज्य बोर्ड से परामर्श करके किसी भी स्थापन की किसी प्रक्रिया, संक्रिया या अन्य काम में ठेका श्रमिकों का नियोजन, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, प्रतिषिद्ध कर सकेगी । 

(2) किसी स्थापन के सम्बन्ध में उपधारा (1) के अधीन कोई अधिसूचना निकालने से पूर्व समुचित सरकार उस स्थापन में ठेका श्रमिकों के लिए काम की परिस्थितियों और प्रसुविधाओं का, जिनकी व्यवस्था की गई है, तथा अन्य सुसंगत बातों का ध्यान                      रखेगी जैसे कि-

(क) क्या वह प्रक्रिया, संक्रिया या अन्य काम उस स्थापन में किए जाने वाले विनिर्माण या चलाए जाने वाले उद्योग, व्यापार, कारबार, या उपजीविका के आनुषंगिक या उसके लिए आवश्यक हैं; 

(ख) क्या वह वर्षानुवर्षी प्रकार का है अर्थात् क्या वह उस स्थापन में किए जाने वाले विनिर्माण या चलाए जाने वाले उद्योग, व्यापार, कारबार, या उपजीविका का ध्यान रखते हुए पर्याप्त समय के लिए है; 

(ग) क्या वह उस स्थापन में या उससे मिलते जुलते स्थापन में नियमित कर्मकारों के माध्यम से मामूली तौर से किया जाता है; 

(घ) क्या प्रचुर संख्या में पूर्णकालिक कर्मकारों को नियोजित करना पर्याप्त है ।

स्पष्टीकरण-यदि यह प्रश्न उठता है कि कोई प्रक्रिया या संक्रिया या अन्य काम वर्षानुवर्षी प्रकार का है या नहीं तो उस पर समुचित सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।  

अध्याय 4

ठेकेदारों का अनुज्ञापन

11. अनुज्ञापन अधिकारियों की नियुक्ति-समुचित सरकार राजपत्र में अधिसूचित आदेश द्वारा- 

(क) ऐसे व्यक्तियों को, जो सरकार के राजपत्रित अधिकारी होंगे और जिन्हें वह ठीक समझे, इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए अनुज्ञापन अधिकारी नियुक्त कर सकेगी; तथा 

(ख) ऐसी सीमाओं को परिनिश्चित कर सकेगी जिनके अन्दर अनुज्ञापन अधिकारी उन शक्तियों का प्रयोग करेगा जो अनुज्ञापन अधिकारियों को इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदान की गई हैं । 

12. ठेकेदारों का अनुज्ञापन-(1) ऐसे तारीख से, जो समुचित सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, कोई भी ठेकेदार, जिसे वह अधिनियम लागू होता है, ठेका श्रमिकों के माध्यम से कोई काम अनुज्ञापन अधिकारी द्वारा उस निमित्त प्रदान की गई अनुज्ञप्ति के अधीन और अनुसरण में ही कराने का जिम्मा लेगा या उसका निष्पादन करेगा, अन्यथा नहीं ।

(2) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए यह है कि उपधारा (1) अधीन अनुज्ञप्ति में ऐसी शर्तें होंगी, जिनके अन्तर्गत विशिष्टतया ठेका श्रमिकों के सम्बन्ध में काम में घंटों, मजदूरी नियत की जाने तथा अन्य आवश्यक सुविधाओं के बारे में शर्तें भी हैं, जो समुचित सरकार धारा 35 के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार, यदि कोई हों, अधिरोपित करना ठीक समझे और वह अनुज्ञप्ति ऐसी फीस देने पर और शर्तों के सम्यक् पालन के लिए प्रतिभूति के रूप में ऐसी राशि, यदि कोई हो, जो विहित की जाए, जमा करने पर प्रदान की जाएगी ।

13. अनुज्ञप्तियों का प्रदान किया जाना-(1) धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञप्ति प्रदान की जाने के लिए प्रत्येक आवेदन विहित प्ररूप में किया जाएगा और उसमें स्थापन की अवस्थिति तथा उस प्रक्रिया, संक्रिया या काम की, जिसके लिए ठेका श्रमिकों का नियोजन किया जाना है, प्रकृति से सम्बन्धित विशिष्टियां और ऐसी अन्य विशिष्टियां होंगी जो विहित की जाएं । 

(2) अनुज्ञापन अधिकारी उपधारा (1) के अधीन प्राप्त आवेदन के बारे में ऐसा अन्वेषण कर सकेगा और ऐसा कोई अन्वेषण करते समय अनुज्ञापन अधिकारी ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा जो विहित की जाए । 

(3) इस अध्याय के अधीन प्रदान की गई अनुज्ञप्ति उसमें विनिर्दिष्ट अवधि के लिए विधिमान्य होगी और उसका समय-समय पर नवीकरण ऐसी अवधि के लिए और ऐसी फीस देने पर तथा ऐसी शर्तों पर किया जा सकेगा जो विहित की जाएं ।

14. अनुज्ञप्तियों का प्रतिसंहरण, निलम्बन और संशोधन-(1) यदि अनुज्ञापन अधिकारी का, या तो उसे उस निमित्त किए गए निर्देश पर या अन्यथा, समाधान हो जाता है कि- 

(क) धारा 12 के अधीन प्रदान की गई अनुज्ञप्ति दुर्व्यपदेशन द्वारा या किसी महत्वपूर्ण तथ्य को छिपा कर अभिप्राप्त की गई है; अथवा 

(ख) अनुज्ञप्तिधारक, उचित हेतुक के बिना, उन शर्तों का पालन करने में असफल रहता है जिनके अधीन रहते हुए अनुज्ञप्ति प्रदान की गई है या उसने इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के किन्हीं उपबन्धों का                         उल्लंघन किया है, 

तो ऐसी किसी अन्य शास्ति पर, जिसके लिए अनुज्ञप्तिधारक इस अधिनियम के अधीन जिम्मेदार हो, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना अनुज्ञापन अधिकारी, अनुज्ञप्तिधारक को हेतुक दर्शित करने करने का अवसर देने के पश्चात्, अनुज्ञप्ति का प्रतिसंहरण या निलम्बन कर सकेगा या प्रतिभूति के रूप में जमा की गई राशि का, यदि कोई हो, या उसके किसी प्रभाग का उन शर्तों के सम्यक् पालन के लिए, जिनके अधीन रहते हुए अनुज्ञप्ति प्रदान की गई है, समपहरण कर सकेगा । 

(2) ऐसे किन्हीं नियमों के, जो इस निमित्त बनाए जाएं, अधीन रहते हुए यह है कि अनुज्ञापन अधिकारी धारा 12 के अधीन प्रदान की गई अनुज्ञप्ति में परिवर्तन या संशोधन कर सकेगा । 

15. अपील-(1) धारा 7, धारा 8, धारा 12 या धारा 14 के अधीन किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई भी व्यक्ति, उस तारीख से, जिसको वह आदेश उसे संसूचित किया गया था, तीस दिन के भीतर ऐसे किसी अपील अधिकारी को अपील कर सकता है जो समुचित सरकार द्वारा इस निमित्त नामनिर्देशित व्यक्ति होगा : 

परन्तु यदि अपील अधिकारी का सामधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय से अपील फाइल करने से पर्याप्त कारणवश निवारित हुआ था तो वह तीस दिन की उक्त अवधि के अवसान के पश्चात् भी अपील ग्रहण कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन अपील की प्राप्ति पर, अपील अधिकारी अपीलार्थी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् अपील का यथासम्भव शीघ्र निपटारा करेगा ।

अध्याय 5

ठेका श्रमिकों का कल्याण और स्वास्थ्य

16. कैन्टीनें-(1) समुचित सरकार ऐसे नियम बना सकेगी जिनमें यह अपेक्षा की जाएगी कि ऐसे प्रत्येक स्थापन में- 

(क) जिसे यह अधिनियम लागू होता है; 

(ख) जिसमें ऐसा कोई काम, जिसके लिए ठेका श्रमिकों का नियोजन अपेक्षित है, उस अवधि के लिए, जो विहित की जाए, चलता रहना सम्भाव्य है; तथा 

(ग) जिसमें ठेकेदार द्वारा एक सौ या उससे अधिक ठेका श्रमिक मामूली तौर से नियोजित किए जाते हैं, 

ऐसे ठेका श्रमिकों द्वारा उपयोग किए जाने के लिए ठेकेदार एक या अधिक कैन्टीनों की व्यवस्था करेगा और उन्हें बनाए रखेगा ।

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ये नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे- 

(क) किस तारीख तक कैन्टीनों की व्यवस्था की जाएगी;

(ख) उन कैन्टीनों की संख्या जिनकी व्यवस्था की जाएगी, तथा कैन्टीनों के निर्माण, जगह, फर्नीचर तथा अन्य उपस्कर के मानक; तथा 

(ग) वहां दिए जाने वाले खाद्य पदार्थ और उनकी कीमत । 

17. विश्राम कक्ष-(1) ऐसे प्रत्येक स्थान में, जहां किसी ऐसे स्थापन के-

(क) जिसे यह अधिनियम लागू होता है; तथा 

(ख) जिसमें ऐसा कोई काम, जिसके लिए ठेका श्रमिकों का नियोजन अपेक्षित है, उस अवधि के लिए जो विहित की जाए, चलता रहना सम्भाव्य है,

काम के सम्बन्ध में ठेका श्रमिकों से रात में रुकने की अपेक्षा की जाती है, ठेका श्रमिकों द्वारा उपयोग किए जाने के लिए ठेकेदार उतने विश्राम कक्षों या अन्य उपयुक्त आनुकल्पिक आवास की, जितने विहित किए जाएं, ऐसे समय के भीतर, जो विहित किया जाए, व्यवस्था करेगा और उन्हें बनाए रखेगा । 

(2) ऐसे विश्रमा कक्ष या आनुकल्पिक आवास, जिनकी व्यवस्था उपधारा (1) के अधीन की जानी है, पर्याप्त प्रकाश वाले और हवादार होंगे और उन्हें साफ तथा आरामदेह बनाए रखा जाएगा ।

18. अन्य सुविधाएं-ऐसे किसी स्थापन के, जिसे यह अधिनियम लागू होता है, काम में या के सम्बन्ध में ठेका श्रमिकों को नियोजित करने वाले प्रत्येक ठेकेदार का यह कर्तव्य होगा कि वह निम्नलिखित की व्यवस्था करे और उन्हें बनाए रखे- 

(क) ठेका श्रमिकों के लिए सुविधाजनक स्थानों में स्वास्थ्यप्रद पेय जल का पर्याप्त प्रदाय; 

(ख) विहित प्रकार के पर्याप्त संख्या में शौचालय तथा मूत्रालय, जो इस प्रकार स्थित हों कि स्थापन के ठेका श्रमिकों के लिए सुविधाजनक हों और जहां वे पहुंच सकें; और 

(ग) धुलाई की सुविधाएं ।

19. प्राथमिक उपचार की सुविधाएं-ऐसे प्रत्येक स्थान में, जहां किसी ठेकेदार द्वारा ठेका श्रमिकों का नियोजन किया जाता है, ठेकेदार ऐसी एक प्राथमिक उपचार पेटिका की, जिसमें विहित वस्तुएं होंगी, इस तरह से व्यवस्था करेगा और उसे बनाए रखेगा कि काम के सभी घंटों में उस तक तुरन्त पहुंच हो सके । 

20. कतिपय मामलों में प्रधान नियोजक की जिम्मेदारी-(1) यदि ठेकेदार किसी स्थापन में नियोजित ठेका श्रमिकों की प्रसुविधा के लिए धारा 16, धारा 17, धारा 18 या धारा 19 के अधीन अपेक्षित सुख-सुविधा की व्यवस्था विहित समय के भीतर नहीं करता है तो नियोजक ऐसी सुख-सुविधा की व्यवस्था ऐसे समय के भीतर करेगा जो विहित किया जाए ।

(2) ऐसी सुख-सुविधा की व्यवस्था करने में प्रधान नियोजक द्वारा उपगत सभी व्यय को प्रधान नियोजक ठेकेदार से या तो किसी संविदा के अधीन उसे संदेय किसी रकम में से कटौती करके या उसके द्वारा संदेय ऋण के रूप में वसूल कर सकता है । 

21. मजदूरी के संदाय का उत्तरदायित्व-(1) ठेकेदार अपने द्वारा ठेका श्रमिक के रूप में नियोजित प्रत्येक कर्मकार को मजूदरी का संदाय करने के लिए उत्तरदायी होगा और ऐसी मजदूरी उस अवधि के अवसान से पूर्व दी जाएगी जो विहित की जाए । 

(2) प्रत्येक प्रधान नियोजक अपने द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत एक प्रतिनिधि को, ठेकेदार द्वारा मजदूरी का वितरण किए जाने के समय उपस्थित रहने के लिए नामनिर्देशित करेगा और ऐसे प्रतिनिधि का यह कर्तव्य होगा कि वह मजदूरी के रूप में संदत्त रकमों को ऐसी रीति से प्रमाणित करे जो विहित की जाए ।

(3) ठेकेदार का कर्तव्य होगा कि वह प्रधान नियोजक के प्राधिकृत प्रतिनिधि की उपस्थिति में मजदूरी का वितरण                  सुनिश्चित करे । 

(4) यदि ठेकेदार विहित अवधि के भीतर मजूदरी का संदाय करने में असफल रहता है या कम संदाय करता है तो प्रधान नियोजक ठेकेदार द्वारा नियोजित ठेका श्रमिकों को, यथास्थिति, पूरी मजदूरी या शोध्य असंदत्त अतिशेष का संदाय करने के लिए जिम्मेदार होगा तथा इस प्रकार दी गई रकम को वह ठेकेदार से या तो किसी संविदा के अधीन उसे संदेय किसी रकम में से कटौती करके या उसके द्वारा संदेय किसी ऋण के रूप में वसूल कर सकता है ।

अध्याय 6

शास्तियां और प्रक्रिया

22. बाधाएं-(1) जो कोई किसी निरीक्षक को इस अधिनियम के अधीन उसके कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा पहुंचाएगा, या ऐसे किसी स्थापन या ठेकेदार के सम्बन्ध में, जिसे यह अधिनियम लागू होता है, कोई निरीक्षण, परीक्षा, जांच या अन्वेषण जो इस अधिनियम द्वारा या के अधीन प्राधिकृत है, करने के लिए निरीक्षक को उचित सुविधा देने से इन्कार या देने में जानबूझकर उपेक्षा करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा । 

(2) जो कोई इस अधिनियम के अनुसरण में रखे गए किसी रजिस्टर या अन्य दस्तावेज को किसी निरीक्षक की मांग पर पेश करने से जानबूझकर इन्कार करेगा या इस अधिनियम के अधीन अपने कर्तव्यों के अनुसरण में कार्य करने वाले किसी निरीक्षक के समक्ष उपस्थित होने या निरीक्षक द्वारा परीक्षा की जाने से किसी व्यक्ति को निवारित करेगा या निवारित करने का प्रयत्न करेगा या ऐसा कोई कार्य करेगा जिसके बारे में वह यह विश्वास करने का कारण रखता है कि उससे किसी व्यक्ति को ऐसे निवारित करना सम्भाव्य है, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

23. ठेका श्रमिकों के नियोजन से सम्बन्धित उपबन्धों का उल्लंघन-जो कोई इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के किसी ऐसे उपबन्ध का उल्लंघन करेगा, जो ठेका श्रमिकों के नियोजन को प्रतिषिद्ध, निर्बन्धित या विनियमित करता है, या इस अधिनियम के अधीन दी गई अनुज्ञप्ति की किसी शर्त का उल्लंघन करेगा, वह कारावास से जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा, और उल्लंघन जारी रहने की दशा में ऐसे अतिरिक्त जुर्माने से, जो ऐसे प्रथम उल्लंघन के लिए दोषसिद्धि के पश्चात् ऐसे हर दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन जारी रहता है, एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।

24. अन्य अपराध-यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के किसी ऐसे उपबन्ध का उल्लंघन करेगा जिसके लिए अन्यत्र कोई अन्य शास्ति उपबन्धित नहीं है तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

25. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) यदि इस अधिनियम के अधीन अपराध करने वाला व्यक्ति कम्पनी है तो वह कम्पनी और साथ ही प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक तथा उसके प्रति उत्तरदायी था ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे : 

परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति को दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, प्रबन्ध-अभिकर्ता या अन्य किसी अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, प्रबन्ध-अभिकर्ता या अन्य कोई अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए- 

(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम                       भी है; तथा 

(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।  

26. अपराधों का संज्ञान-कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान तभी करेगा जब कोई परिवाद निरीक्षक द्वारा या लिखित रूप में उसकी पूर्व मंजूरी से किया गया हो, अन्यथा नहीं और प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट से अवर कोई  भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।

27. अभियोजनों की परिसीमा-कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान तभी करेगा जब उसका परिवाद उस तारीख से तीन मास के भीतर किया गया हो जिसको उस अपराध की, जिसका किया जाना अभिकथित है, जानकारी निरीक्षक को हुई थी, अन्यथा नहीं :

परन्तु जहां अपराध निरीक्षक द्वारा किए गए किसी लिखित आदेश की अवज्ञा करने के रूप में है वहां उसका परिवाद उस उस तारीख से, जिसको उस अपराध का किया जाना अभिकथित है, छह मास के भीतर किया जा सकता है ।

 

 

अध्याय 7

प्रकीर्ण

28. निरीक्षण कर्मचारिवृन्द-(1) समुचित सरकार ऐसे व्यक्तियों को, जिन्हें वह ठीक समझे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी और उन स्थानीय सीमाओं को परिनिश्चित कर सकेगी जिनके भीतर वे इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करेंगे । 

(2) इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए यह है कि निरीक्षक उन स्थानीय सीमाओं के भीतर जिनके लिए वह नियुक्त किया गया है,-

(क) ऐसे सहायकों के साथ (यदि कोई हों), जो सरकार या किसी स्थानीय या अन्य लोक प्राधिकारी की सेवा में लगे हुए व्यक्ति हों और जिन्हें वह ठीक समझे, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों द्वारा या के अधीन रखे जाने या प्रदर्शित किए जाने के लिए अपेक्षित किसी रजिस्टर या अभिलेख या किन्हीं सूचनाओं की परीक्षा करने के प्रयोजन के लिए सभी उचित घन्टों में ऐसे किसी परिसर या स्थान में प्रवेश कर सकेगा जहां ठेका श्रमिक नियोजित हैं और निरीक्षण के लिए उनके पेश किए जाने की अपेक्षा कर सकेगा ; 

(ख) ऐसे किसी व्यक्ति की परीक्षा कर सकेगा जिससे वह ऐसे किसी परिसर या स्थान में पाए और जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का उचित हेतुक है कि वह उसमें नियोजित कोई कर्मकार है; 

(ग) काम बांटने वाले किसी व्यक्ति से और किसी भी कर्मकार से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह उन व्यक्तियों के, जिन्हें या जिनके लिए काम बांटा जाता है या जिनसे काम प्राप्त होता है, नाम और पत्ते के संबंध में तथा काम के लिए पेश किए जाने वाले संदायों के संबंध में ऐसी जानकारी दे जिनका देना उसकी शक्ति में हो; 

(घ) ऐसे रजिस्टर, मजदूरी के अभिलेख या सूचनाओं या उनके प्रभागों, जिन्हें वह इस अधिनियम के अधीन किसी ऐसे अपराध के संबंध में संगत समझे, जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह अपराध प्रधान नियोजक या ठेकेदार द्वारा किया गया है, अभिग्रहण कर सकेगा या उनकी प्रतिलिपियां ले सकेगा;

(ङ) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो विहित की जाएं । 

(3) ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में, जिससे उपधारा (2) के अधीन निरीक्षक द्वारा अपेक्षित कोई दस्तावेज या चीज पेश करने या कोई जानकारी देने की अपेक्षा की गई है, यह समझा जाएगा कि वह भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 175 और 176 के अर्थ के अन्दर वैसा करने के लिए वैध रूप से आबद्ध है ।

(4) उपधारा (2) के अधीन किसी तलाशी या अभिग्रहण के संबंध में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) के उपबन्ध यावत्शक्य उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे उक्त संहिता की धारा 98 के अधीन निकाले गए किसी वारंट के प्राधिकार के अधीन किसी तलाशी या अभिग्रहण को लागू होते हैं । 

29. रजिस्टरों और अन्य अभिलेखों का बनाए रखे जाना-(1) प्रत्येक प्रधान नियोजक और प्रत्येक ठेकेदार ऐसे रजिस्टरों और अभिलेखों को रखेगा जिनमें नियोजित ठेका श्रमिकों के बारे में ऐसी विशिष्टियां, उनके द्वारा किए गए काम की प्रकृति, उन्हें दी गई मजदूरी की दरें तथा अन्य ऐसी विशिष्टियां ऐसे प्ररूप में रखी जाएंगी जो विहित की जाएं ।  

(2) प्रत्येक प्रधान नियोजक और प्रत्येक ठेकेदार उस स्थापन के परिसर के भीतर, जहां ठेका श्रमिक नियोजित किए जाते हैं, विहित प्ररूप में सूचनाएं ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, प्रदर्शित करता रहेगा जिनमें काम के घन्टों और कर्तव्य की प्रकृति के संबंध में विशिष्टियां तथा ऐसी अन्य जानकारी दी गई होगी, जो विहित की जाए ।

30. इस अधिनियम से असंगत विधियों और करारों का प्रभाव-(1) इस अधिनियम के उपबन्ध, स्थापन को लागू किसी अन्य विधि में या किसी करार या सेवा की संविदा के निबन्धनों या किन्हीं स्थायी आदेशों में, चाहे वे इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व किए गए हों या पश्चात्, उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी रहेंगे :

परन्तु जहां स्थापन में नियोजित ठेका श्रमिक ऐसे किसी करार, सेवा की संविदा या स्थायी आदेशों के अधीन किसी मामले के संबंध में उन प्रसुविधाओं के हकदार हैं जो ऐसी प्रसुविधाओं की अपेक्षा उनके अधिक अनुकूल हैं जिनके हकदार वे इस अधिनियम के अधीन होते, वहां ठेका श्रमिक इस बात के होते हुए भी कि वे इस अधिनियम के अधीन अन्य मामलों के संबंध में प्रसुविधाएं प्राप्त करते हैं, उस मामले के संबंध में अधिक अनुकूल प्रसुविधाओं के हकदार बने रहेंगे । 

(2) इस अधिनियम में किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह ऐसे ठेका श्रमिकों को, यथास्थिति, प्रधान नियोजक या ठेकेदार के साथ किसी मामले के संबंध में ऐसे अधिकार या विशेषाधिकार प्रदान करने के लिए, जो उन प्रसुविधाओं की अपेक्षा उनके अधिक अनुकूल हैं जिनके हकदार वे इस अधिनियम के अधीन होते, कोई करार करने से प्रवारित करती है ।

31. विशेष दशाओं में छूट देने की शक्ति-समुचित सरकार आपात की दशा में, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि ऐसी शर्तों और निर्बन्धनों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए तथा ऐसी अवधि या अवधियों के लिए, जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के सभी या कोई उपबन्ध किसी स्थापन या स्थापनों के किसी वर्ग या ठेकेदारों के किसी वर्ग को लागू नहीं होंगे । 

32. इस अधिनियम के अधीन की गई कार्रवाई का संरक्षण-(1) कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में, जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियम या किए गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो, किसी रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी, अनुज्ञापन अधिकारी या किसी अन्य सरकारी सेवक या, यथास्थिति, केन्द्रीय बोर्ड या राज्य बोर्ड के किसी सदस्य के विरुद्ध न होगी ।

(2) कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात से, जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी गए किसी आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए आशयित हो, किसी नुकसान के लिए, जो कारित हुआ है, या जिसका उस बात से कारित होना सम्भाव्य है, सरकार के विरुद्ध न होगी । 

33. निदेश देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार किसी राज्य में इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के बारे में उस राज्य की सरकार को निदेश दे सकेगी ।

34. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबन्धों से अंसगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों ।

35. नियम बनाने की शक्ति-(1) समुचित सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम उनका पूर्व प्रकाशन करके ही बना सकेगी । 

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-

(क) केन्द्रीय बोर्ड और राज्य बोर्ड में विभिन्न हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों के रूप में नियुक्त किए जाने वाले व्यक्तियों की संख्या, उनकी पदावधि तथा सेवा की अन्य शर्तें, उनके कृत्यों के निर्वहन में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया और रिक्तियां भरने की रीति; 

(ख) इस अधिनियम के अधीन गठित किसी समिति के अधिवेशनों के समय और स्थान, ऐसे अधिवेशनों में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया, जिसके अन्तर्गत कामकाज करने के लिए आवश्यक गणपूर्ति भी है, और समिति के सदस्यों को दी जाने वाली फीस तथा भत्ते; 

(ग) वह रीति, जिससे स्थापनों की रजिस्ट्री धारा 7 के अधीन की जा सकती है, उसके लिए फीस का उद्ग्रहण तथा रजिस्ट्रीकरण के प्रमाणपत्र का प्ररूप; 

(घ) धारा 13 के अधीन अनुज्ञप्ति प्रदान करने या उसके नवीकरण के लिए आवेदन का प्ररुप और वे विशिष्टियां जो उसमें होनी चाहिएं; 

(ङ) अनुज्ञप्ति प्रदान करने के लिए किसी आवेदन के संबंध  में किए जाने वाले अन्वेषण की रीति तथा वे बातें, जिनका अनुज्ञप्ति प्रदान या इन्कार करते समय ध्यान रखा जाएगा;

(च) उस अनुज्ञप्ति का प्ररूप, जो धारा 12 के अधीन प्रदान या नवीकृत की जा सकेगी, और वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए अनुज्ञप्ति प्रदान या नवीकृत की जा सकेगी, अनुज्ञप्ति के प्रदान या नवीकरण के लिए उद्ग्रहणीय फीस और ऐसी शर्तों के पालन के लिए प्रतिभूति के रूप में किसी राशि का जमा किया जाना; 

(छ) वे परिस्थितियां, जिसमें अनुज्ञप्तियों में धारा 14 के अधीन परिवर्तन या संशोधन किया जा सकेगा; 

(ज) वह प्ररूप जिसमें और रीति जिससे धारा 15 के अधीन अपीलें फाइल की जा सकती हैं तथा अपीलों का निपटारा करने में अपील अधिकारियों द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया ;

(झ) वह समय, जिसके भीतर ठेकेदार द्वारा ऐसी सुविधाओं की उस प्रकार से व्यवस्था की जा सकती है जिस प्रकार से उनकी व्यवस्था करना और उन्हें बनाए रखना इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित है और ठेकेदार की ओर से व्यक्तिक्रम होने की दशा में प्रधान नियोजक द्वारा उस प्रकार से व्यवस्था की जाएगी; 

(ञ) कितनी और किस प्रकार की कैन्टीनों, विश्राम कक्षों, शौचालयों और मूत्रालयों की व्यवस्था की जाएगी और बनाए रखा जाएगा; 

(ट) प्राथमिक उपचार पेटिका में किस प्रकार की वस्तुएं होनी चाहिएं ;

(ठ) वह अवधि, जिसके भीतर ठेका श्रमिकों को संदेय मजदूरी धारा 21 की उपधारा (1) के अधीन ठेकेदार                  द्वारा दी जाएगी;

(ड) प्रधान नियोजकों और ठेकेदारों द्वारा रखे जाने वाले रजिस्टरों और अभिलेखों के प्ररूप; 

(ढ) विवरणियों का भेजा जाना तथा वे प्ररूप जिनमें और वे अधिकारी जिन्हें ऐसी विवरणियां भेजी जा सकती हैं; 

(ण) ठेका श्रमिकों के संबंध में किसी जानकारी या किन्हीं आंकड़ों का संग्रहण ; तथा 

(त) कोई अन्य विषय, जो इस अधिनियम के अधीन विहित किया जाना है या विहित किया जा सकता है । 

(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए, रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने के पूर्व उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

 [(4) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा |] 

 

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