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संसद‌ के अधिनियम जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1850 ( Caste Disablities Removal Act, 1850 )


 

संसद‌ के अधिनियम

जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1850

[1850 का अधिनियम संख्यांक 21]

  [11 अप्रैल, 1850]

बंगाल संहिता के विनियम VII ,1832 की धारा 9 के

सिद्धांत का समस्त 2[भारत] में विस्तार

करने के लिए

अधिनियम

उद्देशिका - यतः बंगाल संहिता के विनियम VII, 1832 (1832 का बंगाल विनियम VII)3 की धारा 9 द्वारा यह अधिनियमित हैं कि जब कभी किसी सिविल वाद में उस वाद के पक्षकार विभिन्न मतावलम्बी हों, जब एक पक्षकार हिन्दू और दूसरा मुसलमान मत

1 संक्षिप्त नाम, भारतीय संक्षिप्त नाम अधिनियम, 1897 (1897 का 14) द्वारा दिया गया । यह अधिनियम बरार विधि अधिनियम, 1941 (1941 का 4) द्वारा बरार को विस्तारित किया गया और विधि स्थानीय विस्तार अधिनियम, 1874 (1874 का 15) की धारा 3 द्वारा अनुसूचित जिलों को छोड़कर भारत के सभी प्रान्तों पर प्रवृत्त हुआ घोषित किया गया हैं । संथाल परगना व्यवस्थापन विनियमन, 1872 (1872 का 3) की धारा 3 द्वारा संथाल परगना पर प्रवृत्त घोषित किया गया । यह अधिनियम, 1963 के विनियम सं.6 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा (1-7-1965 से) दादरा और नागर हवेली पर और 1968 के अधिनियम सं. 26 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र पर, विस्तारित और प्रवृत्त किया गया । यह अधिनियम अनुसूचित जिला अधिनियम, 1874 (1874 का 14) की धारा 3(क) के अधीन अधिसूचना द्वारा निम्नलिखित अनुसूचित क्षेत्रों पर प्रवृत्त घोषित किया गया, अर्थात्‌:

                पश्चिम जलपाई गुड़ी.................................. देखिए भारत का राजपत्र, 1881, भाग 1, पृष्ठ 74 ।

                हजारीबाग, लौहारडागा (अब जिलारांची, कलकत्ता राजपत्र, 1899,

                भाग 1, पृष्ठ 44 देखिए) तथा मानभूम जिले और सिंहभूम जिले में

                परगना डालभूम तथा कोल्हन....................... देखिए भारत का राजपत्र 1881, भाग 1, पृष्ठ 504 ।

                मिर्जापुर जिले का अनुसूचित भाग........................देखिए भारत का राजपत्र 1879, भाग 1, पृष्ठ 383 ।

                जोनसर बाबर............................................देखिए भारत का राजपत्र 1879, भाग 1, पृष्ठ 382 ।

                लाहौल जिला.................................................देखिए भारत का राजपत्र 1886, भाग 1, पृष्ठ 301 ।

                मध्य प्रान्त के अनुसूचित जिले.............................देखिए भारत का राजपत्र 1879, भाग 1, पृष्ठ 771 ।

                गंजम और विशाखापत्तनम के .................... देखिए भारत का राजपत्र 1898, भाग 1, पृष्ठ 870 ।

                अनुसूचित जिले

                कुर्ग.......................................................देखिए भारत का राजपत्र 1879, भाग 1, पृष्ठ 747 ।

                असम (नार्थ लुशाई हिल्स को छोड़कर) ............... देखिए भारत का राजपत्र 1897, भाग 1, पृष्ठ 299 ।

                सिंहभूम जिले का पोरहार एस्टेट ........................... देखिए भारत का राजपत्र 1897, भाग 1, पृष्ठ 1059 ।

                इसका अंतिम उल्लिखित अधिनियम की धारा 5 के अधीन अधिसूचना द्वारा निम्नलिखित अनुसूचित जिलों पर विस्तार किया गया हैं अर्थात्‌:

                कुमाऊं और गढ़वाल.................................. देखिए भारत का राजपत्र 1876, भाग 1, पृष्ठ 606 ।

                आगरा प्रान्त की तराई.................................देखिए भारत का राजपत्र 1876, भाग 1, पृष्ठ 505 ।

                इस अधिनियम का नए प्रान्तों और................ देखिए 1949 का अधिनियम सं. 59 ।

                विलीन राज्यों में भी विस्तारण किया गया

2              1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के अध्यधीन राज्यक्षेत्र के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

3              बंगाल सिविल कोट्‌र्स ऐक्ट, 1871 (1871 का 6) द्वारा निरसित, जिसे नार्थ-वैस्टर्न प्राविन्सेज एण्ड असम सिविल कोट्‌र्स ऐक्ट, 1887 (1887 का 12) द्वारा निरसित कर दिया गया ।

का हो, अथवा जहां वाद के पक्षकारों में से एक या अधिक या तो मुसलमान या हिन्दू मत के न हों वहां उन धर्मों की विधियों को इस प्रकार प्रवर्तित नहीं होने दिया जाएगा जिससे वे ऐसे पक्षकार या पक्षकारों को किसी सम्पत्ति से वंचित करें जिसके कि वे ऐसी विधियों के प्रवर्तन के अभाव में हकदार होते, और यतः उस अधिनियमित के सिद्धांत का समस्त 1झ्र्भारतट में विस्तार करना फायदाप्रद होगा । अतः निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता हैं:

 

1. विधि या प्रथा का जो धर्मपरिवर्तन या जाति-च्यूति पर अधिकारों को समपहृत या प्रभावित करती हैं प्रवर्तन में न रहना  1 [भारत] में अब प्रवृत्त किसी विधि या प्रथा का वह अंश जो किसी व्यक्ति के उस द्वारा किसी धर्म का त्याग करने या उसे उसकी सहधर्मचारिता से अपवर्जित किए जाने अथवा जाति से वंचित किए जाने के कारण, अधिकारों या संपत्ति का सपमहरण करता हैं या विरासत के किसी अधिकार का किसी प्रकार ह्रास या या उसे प्रभावित करने वाला ठहराया जाए, 2झ्र्किसी न्यायालय में विधि के रूप में प्रवर्तित नहीं किया जा सकेगा ।

 3[2. संक्षिप्त नाम और विस्तार - (1) यह अधिनियम जाति निर्योग्यता निवारण अधिनियम, 1850 कहा जा सकेगा ।

(2) इसका विस्तार जम्मू और कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर हैं ।

1              1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी सरकार के अध्यधीन राज्यक्षेत्रञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

2              1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा ईस्ट इंडिया कंपनी के न्यायालयों में और रायल चार्टर द्वारा उन्हीं राज्यक्षेत्रों के भीतर स्थापित न्यायालयों मेंञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।

3              1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा जोड़ा गया 

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