लोक ऋण अधिनियम, 1944
(1944 का अधिनियम संख्यांक 18)
[22नबम्बर, 1944]
*** सरकारी प्रतिभूतियों से और [सरकार] के लोक ऋण का भारतीय
रिजर्व बैंक द्वारा प्रबन्ध किए जाने से सम्बन्धित विधि को
समेकित एंव संशोधित करने के लिए
अधिनियम
यतः 2*** सरकारी प्रतिभूतियों से और 3[सरकार] के लोक ऋण का भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रबन्ध किए जाने से संबंधित विधि को समेकित और संशोधित करना समीचीन है;
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता हैः-
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम लोक ऋण *** अधिनियम, 1944 होगा ।
। । । ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित नियम करे ।
[1क. प्रतिभूतियां जिन्हें यह अधिनियम लागू है-यह अधिनियम *** किसी राज्य सरकार अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या पश्चात् निर्गमित और सृजित की गई सरकारी प्रतिभूतियों को लागू है ।]
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि कोई बात, विषय या संदर्भ में विरुद्ध न हो-
(1) “बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है;
[(1क) सरकारी प्रतिभूतियों के सम्बन्ध में, सरकार" से, प्रतिभूति निर्गमित करने वाली केन्दीय या राज्य सरकार अभिप्रेत है;]
(2) “सरकारी प्रतिभूति" से-
(क) ऐसी प्रतिभूति अभिप्रेत है जो लोक ऋण लेने के उद्देशय से [सरकार] द्वारा सृजित और निर्गमित की गई है और जो निम्नलिखित रूपों में से किसी रूप की है, अर्थात् :-
(i) बैंक की पुस्तकों में रजिस्ट्रीकरण द्वारा अन्तरणीय स्टाक; या
(ii) आदेशानुसार देय वचन-पत्र; या
(iii) वाहक को देय वाहक बंध-पत्र; या
(iv) इस निमित्त विहित प्ररूप;
(ख) ऐसे प्ररूप में और इस अधिनियम के ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विहित किए जाएं, 10[सरकार] द्वारा सृजित और निर्गमित कोई अन्य प्रतिभूति ;
(3) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(4) “वचन-पत्र" के अन्तर्गत खजाना बिल भी है ।
3. सरकारी प्रतिभूतियों का अन्तरण-(1) [धारा 5 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, किसी सरकारी प्रतिभूति का अन्तरण केवल ऐसी विहित रीति से किया जाएगा जो उस वर्ग की, जिसकी वह है, प्रतिभूतियों का अन्तरण करने के लिए है और सरकारी प्रतिभूति का कोई भी अन्तरण जो-
(i) केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्गमित प्रतिभूति की दशा में, 30 अप्रैल, 1949 के पश्चात् किया गया है,
(ii) भाग क राज्य की सरकार द्वारा निर्गमित प्रतिभूति की दशा में, 31 मार्च, 1949 के पश्चात् किया गया है,
(iii) जम्मू-कश्मीर से भिन्न किसी भाग ख राज्य की सरकार द्वारा निर्गमित प्रतिभूति की दशा में 14 अक्तूबर, 1956 के पश्चात् किया गया है; ***
(iv) जम्मू-कश्मीर से भिन्न किसी राज्य सरकार द्वारा 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन को या उसके पश्चात् निर्ममित प्रतिभूति की दशा में, उस दिन को या उसके पश्चात् किया गया है, [और]
[(v) जम्मू-कश्मीर राज्य सरकार द्वारा 1972 के सितम्बर के प्रथम दिन या उसके पश्चात् निर्गमित प्रतिभूति की दशा में, उस दिन या उसके पश्चात् किया गया है,]
विधिमान्य नहीं होगा यदि-]
(क) उससे यह तात्पर्यित नहीं है कि उस प्रतिभूति में पूर्ण हक का हस्तान्तरण किया जा रहा है, या
(ख) वह इस प्रकार का है जिससे उस रीति पर प्रभाव पड़ता है जिसकी बाबत यह अभिव्यक्त किया गया था कि वह प्रतिभूति [सरकार] द्वारा उस प्रकार धृत है ।
(2) इस धारा की कोई भी बात इस अधिनियम के अधीन बैंक द्वारा किए गए किसी आदेश पर या न्यायालय द्वारा बैंक को दिए गए किसी आदेश पर प्रभाव नहीं डालेगी ।
4. सरकारी प्रतिभूतियों के अन्तरक का उनकी रकम के लिए दायी नहीं होना-परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति अपने द्वारा सरकारी प्रतिभूति का अन्तरण करने के कारण ही तद्धीन किसी देय धनराशि के, चाहे मूल या ब्याज के रूप में देने का दायी नहीं होगा ।
5. लोक पदधारकों द्वारा सरकारी प्रतिभूतियों का धारण करना-(1) जहां कि किसी लोक पद की दशा में, 5[सरकार] शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा घोषित करे कि यह उपधारा उसे लागू होगी, वहां स्टाक या वचन-पत्र के रूप की सरकारी प्रतिभूति उस पदनाम में धारण की जा सकेगी ।
(2) जब कि सरकारी प्रतिभूति इस प्रकार धारण की जाती है तब वह किसी या अतिरिक्त पृष्ठांकन के या अन्तरण विलेख के बिना हर एक पदधारक से उत्तरवर्ती पदधारक को उस तारीख को और उससे, जिसके पश्चात् कथित ने पद भार संभाला है, अन्तरित की गई समझी जाएगी ।
(3) जब कि कोई पदधारक इस प्रकार धारित प्रतिभूति का किसी पक्ष को जो पद में उसका उत्तरवर्ती नहीं है, अन्तरण करता है, तब अन्तरण धारा 3 में अधिकथित रीति से और शर्तों के अधीन रहते हुए, पदधारक के हस्ताक्षर और पदनाम द्वारा किया जाएगा ।
(4) यह धारा ऐसे पद को भी जिसके दो या अधिक संयुक्त धारक हैं ऐसे लागू है जैसे उस पद के लिए लागू होती है, जिसका एक ही धारक है ।
6. न्यास की अवेक्षा नहीं की जाएगी-(1) किसी सरकारी प्रतिभूति की बाबत किसी न्यास की कोई भी अवेक्षा 5[सरकार] द्वारा नहीं की जाएगी, न ही 5[सरकार] ऐसी अपेक्षा से, भले ही वह अभिव्यक्त रूप से दी गई हो, आबद्ध होगी और न 5[सरकार] किसी सरकारी प्रतिभूति की बाबत न्यासी समझी जाएगी ।
(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, बैंक स्टाक पर ब्याज देने, या उसके परिपक्वता मूल्य या अन्तरण या ऐसी अन्य बातों के सम्बन्ध में स्टाक धारकों के ऐसे निदेशों को, जैसा बैंक उचित समझे, आनुग्रहिक कार्य के रूप में अपनी बही में और बैंक के या 5[सरकार] के प्रति किसी दायित्व के बिना अभिलिखित कर सकेगा ।
7. वे व्यक्ति जिनका हक, एकमात्र मृत धारक की सरकारी प्रतिभूति के लिए बैंक द्वारा मान्य होगा-धारा 9 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए यह है कि एकमात्र मृत धारक की सरकारी प्रतिभूति के निष्पादक या प्रशासक तथा भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 39) के भाग 10 के अधीन दिए गए उत्तराधिकार प्रमाणपत्र का धारक ऐसे व्यक्ति होंगे जिनकी बाबत बैंक यह मान्यता देगा कि सरकारी प्रतिभूतियों को रखने का उनको ही हक प्राप्त हैः
परन्तु इस धारा की किसी भी बात से यह वर्जित न होगा कि बैंक मिताक्षरा विधि द्वारा शासित अविभक्त हिन्दू कुटुम्ब के कर्ता या एकमात्र उत्तरजीवी पुरूष सदस्य को सरकारी प्रतिभूति का हक रखने वाला तब मान ले जब कि बैंक को ऐसा प्रतीत होता है कि उस कुटुम्ब के मृत सदस्य के नाम में प्रतिभूति विद्यमान है और ऐसे प्रबन्धकर्ता या एकमात्र उत्तरजीवी सदस्य ने अपने हक को मान्यता दिए जाने के लिए आवेदन किया है और जो ऐसे प्राधिकारी द्वारा और ऐसी जांच के पश्चात्, जो विहित की जाए, इस भाव के ऐसे हस्ताक्षरित प्रमाणपत्र द्वारा समर्थित है कि मृतक मिताक्षरा विधि द्वारा शासित अविभक्त हिन्दू कुटुम्ब का सदस्य था, सरकारी प्रतिभूति उस कुटुम्ब की अविभक्त सम्पत्ति का भाग थी और आवेदक उस कुटुम्ब का कर्ता या एकमात्र उत्तरजीवी पुरूष सदस्य है ।
स्पष्टीकरण-“मिताक्षरा विधि द्वारा शासित अविभक्त हिन्दू कुटुम्ब" पद से इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि मालाबार तारवाड़ इसमें सम्मिलित है ।
8. संयुक्त धारकों या विभिन्न आदाताओं के उत्तरजीवियों का अधिकार-भारतीय संविदा अधिनियम, 1872 (1872 का 9) की धारा 455 में किसी बात के होते हुए भी-
(क) जब कि दो या अधिक व्यक्तियों द्वारा संयुक्त रूप से सरकारी प्रतिभूति धृत की है और उन दोनों में से या उनमें से कोई एक मर जाता है तब प्रतिभूति पर हक उस या उन व्यक्तियों के उत्तरजीवियों में निहित होगा; और
(ख) जब कि सरकारी प्रतिभूति दो या अधिक व्यक्तियों को पृथक्-पृथक् देय है और उन दोनों में से कोई या उनमें से कोई एक मर जाता है तब प्रतिभूति उन व्यक्तियों के उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों को अथवा मृतक के प्रतिनिधि का या उनमें से किसी को देय होगी :
परन्तु इस धारा की कोई भी बात मृत व्यक्तियों के किसी प्रतिनिधि के उस हक पर, जो किसी प्रतिभूति के अधीन या उसकी बाबत जिसे यह धारा लागू है, वह किसी उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों के विरुद्ध रखता है, प्रभाव नहीं डालेगी ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए [कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के,] या सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1912 (1912 का 2) के या चाहे [भारत] में या उसके बाहर व्यक्तियों के संगमों के निगमन से संबंधित किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त अधिनियमिति के 1[अधीन निगमित निकाय या निगमित समझे जाने वाले निकाय] का विघटन होने पर यह समझा जाएगा कि उसका अन्त हो गया है ।
9. पांच हजार रुपए से अनधिक अंकित मूल्य वाली सरकारी प्रतिभूतियों के धारक की मृत्यु पर संक्षिप्त प्रक्रिया-धारा 7 में किसी बात के होते हुए भी, जहां कि ऐसे किसी व्यक्ति की मत्यु के छह मास के अन्दर जो सरकारी प्रतिभूति या प्रतिभूतियों का, जिनका संकलित अंकित मूल्य पांच हजार रुपए से अनधिक है, धारक था वहां यदि बिल का प्रोबेट या उसकी संपदा का प्रशासन पत्र अथवा भारतीय उत्तराधिकार अधिनियम, 1925 (1925 का 39) के भाग 10 के अधीन दिया गया उत्तराधिकार प्रमाणपत्र बैंक में पेश नहीं किया जाता या बैंक का समाधान कर देने वाले रूप में यह साबित नहीं कर दिया जाता है कि इनमें किसी को अभिप्राप्त करने के लिए कार्यवाही संस्थित कर दी गई है, तब बैंक यह अवधारण कर सकेगा कि प्रतिभूति या प्रतिभूतियों का, या मृतक की संपदा का प्रशान करने का हकदार व्यक्ति कौन है और ऐसे अवधारित व्यक्ति में प्रतिभूति या प्रतिभूतियों के निहित करने के आदेश कर सकेगा ।
[9क. धारा 9ख, 9ग आदि का लागू होना-धारा 1क में किसी बात के होते हुए भी, धारा 9ख और 9ग के उपबन्ध तथा धारा 9ख और 9ग में उल्लिखित किन्हीं विषयों के सम्बन्ध में नियम बनाने की शक्ति, केन्द्रीय सरकार द्वारा सृजित और निर्गमित की गई सरकारी प्रतिभूतियों के केवल ऐसे वर्गों को, जिन्हें लोक ऋण (संशोधन) अधिनियम, 1959 (1959 का 44) के चाहे प्रारम्भ होने के पूर्व या पश्चात् वह सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, लागू होंगे और धारा 9ख और 9ग के उपबन्धों के अधीन रहते हुए प्रतिभूतियों के ऐसे वर्गों के सम्बन्ध में धारा 7 और 9 के उपबन्ध प्रभावी होंगे ।
9ख. सरकारी प्रतिभूति के धारकों द्वारा नामनिर्देशन-(1) किसी तत्समय प्रवृत्त विधि में या किसी व्ययन में भले ही वह वसीयती या अन्य प्रकार का हो, किसी बात के होते हुए भी, जहां कि किसी सरकारी प्रतिभूति की बाबत विहित रीति से किए गए नामनिर्देशन से किसी व्यक्ति पर तत्समय के लिए प्रतिभूति पर देय रकम उसके धारक की मृत्यु पर प्राप्त करने के अधिकार का प्रदत्त किया जाना तात्पर्यित है, वहां प्रतिभूति के धारक की मृत्यु पर नामनिर्देशिती अन्य सभी व्यक्तियों का अपर्वजन करके, उस प्रतिभूति का और उस पर रकम दिए जाने का तब के सिवाय हकदार होगा, जब कि विहित रीति से नामनिर्देशन में फेरफार या उसे रद्द न कर दिया जाए ।
(2) प्रतिभूति के धारक द्वारा किए गए नामनिर्देशन की दशा में, उपधारा (1) में निर्दिष्ट नामनिर्देशन तब शून्य हो जाएगा जबकि नामनिर्देशिती उसके पहले मर जाता है या जहां कि दो या अधिक नामनिर्देशिती हैं वहां सभी नामनिर्देशिती उसके पहले मर जाते हैं ।
(3) सरकारी प्रतिभूति का विहित प्रकार से किया गया अन्तरण, पहले किए गए नामनिर्देशन को आप से आप रद्द कर देगाः
परन्तु जहां कि सरकारी प्रतिभूति किसी व्यक्ति द्वारा या उसकी ओर से गिरवीदार के रूप में या किसी प्रयोजन के लिए प्रतिभूति के रूप में धारण की गई है, वहां ऐसे धारण का प्रभाव नामनिर्देशन को रद्द करने का नहीं होगा, किन्तु नामनिर्देशिती का अधिकार इस प्रकार धारण करने वाले व्यक्ति के अधिकार के अध्यधीन रहेगा ।
(4) जहां कि नामनिर्देशिती अप्राप्तवय है वहां प्रतिभूति के धारक के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह नामनिर्देशिती की अप्राप्तवयता के दौरान अपनी मृत्यु होने की दशा में तत्समय प्रतिभूति पर देय रकम प्राप्त करने के लिए किसी व्यक्ति को विहित प्रकार से नियोजित कर दे और जहां कि ऐसा नियोजन किया गया है वहां धारक की मृत्यु के पश्चात् और नामनिर्देशिती की अप्राप्तवयता के दौरान, सरकारी प्रतिभूति उस व्यक्ति में अप्राप्तवय प्रतिनिधि की हैसियत में निहित समझी जाएगी ।
9ग. धारक की मृत्यु पर अदायगी-(1) यदि कोई व्यक्ति मर जाता है और अपनी मृत्यु के समय सरकारी प्रतिभूति का धारक है और उसकी मृत्यु के समय किसी व्यक्ति के पक्ष में कोई नामनिर्देशन प्रवृत्त है तब प्रतिभूति पर तत्समय देय रकम नामिर्देशिती को दी जाएगी ।
(2) जहां कि नामनिर्देशिती अप्राप्तवय है वहां सरकारी प्रतिभूतियों पर तत्समय देय रकम-
(क) ऐसी किसी भी दशा में, जहां कि धारा 9ख की उपधारा (4) के अधीन कोई व्यक्ति इसे प्राप्त करने के लिए नियोजित किया गया है वहां उस व्यक्ति को, और
(ख) जहां कि ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है, वहां अप्राप्तवय के उपयोग के लिए अप्राप्तवय के संरक्षक को,दी जाएगी ।
(3) जहां कि सरकारी प्रतिभूति पर तत्समय देय रकम दो या अधिक नामनिर्देशितियों को देय है और उन दोनों में से कोई या उनमें से कोई मर गया है, वहां प्रतिभूति का हक उन नामनिर्देशितियों के उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों में निहित होगा और उस पर तत्समय देय रकम तद्नुसार दी जाएगी ।
(4) इस धारा की किसी भी बात से किसी व्यक्ति से यह अपेक्षित नहीं समझा जाएगा कि वह सरकारी प्रतिभूति पर देय रकम की अदायगी उस प्रतिभूति के परिपक्व होने के पहले या प्रतिभूति की शर्तों के अनुसार करने से अन्यथा प्रतिगृहीत करे ।
(5) सरकारी प्रतिभूति पर तत्समय शोध्य रकम की, इस धारा के उपबन्धों के अनुसार की गई अदायगी उस प्रतिभूति विषयक पूर्ण उन्मोचन होगीः
परन्तु इस धारा या धारा 9ख की किसी भी बात से किसी ऐसे अधिकार या दावे पर, जो कोई व्यक्ति उस व्यक्ति के विरुद्ध रखता है जिसको इस धारा के अधीन अदायगी की गई है, प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
10. पांच हजार रुपए से अनधिक अंकित मूल्य की सरकारी प्रतिभूतियां जो अप्राप्तवय या उन्मत्त व्यक्ति की हैं-जहां कि सरकारी प्रतिभूति या प्रतिभूतियां अप्राप्तवय या उन्मत्त व्यक्ति तथा अपना कामकाज करने में असमर्थ व्यक्ति की है तथा प्रतिभूति या प्रतिभूतियों का संकलित अंकित मूल्य पांच हजार रुपए से अनधिक है वहां बैंक ऐसे व्यक्ति में, जिसके बारे में उसका विचार है कि वह अप्राप्तवय या उन्मत्त व्यक्ति का प्रतिनिधित्व करता है, ऐसी प्रतिभूति या प्रतिभूतियों के निहित करने का ऐसा आदेश दे सकेगा जैसा वह ठीक समझता है ।
11. संपरिवर्तन, समेकन, खण्डीकरण या नवीकरण पर प्रतिभूति की दूसरी प्रति या नई प्रतिभूति का निर्गमन-(1) यदि सरकारी प्रतिभूति का हकदार व्यक्ति यह अभिकथित करके बैंक को आवेदन करता है कि प्रतिभूति खो गई है, चोरी या नष्ट हो गई है या विरूपित या विकृत हो गई है तो बैंक की प्रतिभूति के खो जाने, चोरी, नष्ट, विरूपित या विकृत हो जाने के समाधानप्रद रूप में साबित हो जाने पर, ऐसी शर्तों पर और ऐसे शुल्क के दिए जाने पर, जो विहित किए जाएं, आवेदक को देय प्रतिभूति की दूसरी प्रति निर्गमित करने का आदेश दे सकेगा ।
(2) यदि सरकारी प्रतिभूति का हकदार व्यक्ति, प्रतिभूति को दूसरे प्रकार की प्रतिभूति में संपरिवर्तित करवाने के लिए या दूसरे ऋण के सम्बन्ध में निर्गमित की गई प्रतिभूति में या उसे अन्य वैसी ही प्रतिभूति समेकित कराने के लिए, या उसे खण्डीकृत कराने के लिए या उसे नवीकृत करने के लिए, बैंक को आवेदन करता है तो बैंक ऐसी शर्तों पर और ऐसे शुल्क के दिए जाने पर, जो विहित किए जाएं, उस प्रतिभूति को रद्द कर सकेगा और नई प्रतिभूति या प्रतिभूतियां निर्गमित करने का आदेश दे सकेगा ।
(3) इस धारा के अधीन जिस व्यक्ति को प्रतिभूति की दूसरी प्रति या नई प्रतिभूति निर्गमित की जाती है उसकी बाबत यह समझा जाएगा कि वह धारा 19 के प्रयोजनों के लिए बैंक द्वारा मान्यताप्राप्त प्रतिभूति धारक है और किसी व्यक्ति को इस प्रकार निर्गमित की गई प्रतिभूति की दूसरी प्रति या नई प्रतिभूति के बारे में यह समझा जाएगा कि वह [सरकार] तथा ऐसे व्यक्ति के और सभी व्यक्तियों के जिन्हें ऐसे व्यक्ति के माध्यम से तत्पश्चात् हक व्युत्पन्न होता है, बीच एक नई संविदा है ।
12. विवाद की दशा में बैंक द्वारा सरकारी प्रतिभूति पर के हक का संक्षिप्त अवधारण-(1) यदि बैंक की यह राय है कि सरकारी प्रतिभूति के हक के बारे में शंका विद्यमान है तो वह ऐसे व्यक्ति का अवधारण करने की कार्यवाही करेगा जिसकी बाबत बैंक के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि वह उसका हकदार है ।
(2) बैंक हर एक दावेदार को, जिसकी उसे जानकारी है, अन्य सभी दावेदारों के नाम और वह समय जब और बैंक के उस अधिकारी का नाम, जिसके द्वारा बैंक अवधारण करेगा, उल्लेख करते हुए लिखित सूचना देगा ।
(3) बैंक हर एक दावेदार को इस प्रकार किए गए अवधारण के परिणाम की लिखित सूचना देगा ।
(4) उपधारा (3) में निर्दिष्ट सूचनाओं के दिए जाने के छह मास के अवसान पर बैंक उस व्यक्ति में, जिसे बैंक प्रतिभूति का हकदार पाए, प्रतिभूति और उस पर न दिया गया कोई ब्याज निहित करने का आदेश कर सकेगा ।
13. सरकारी प्रतिभूतियों के बारे में लागू विधि-इस बात के होते हुए भी कि [सरकार] ने सुविधा की दृष्टि से यह इंतजाम किया है कि सरकारी प्रतिभूति पर अदायगियां [भारत] से अन्यत्र किसी दूसरे स्थान में की जाएं, सरकारी प्रतिभूतियों के सम्बन्ध में ऐसे सभी प्रश्नों विषयक सभी व्यक्तियों के अधिकार, जिनकी चर्चा इस अधिनियम में है, भारत की विधि अनुसार और [भारत] के न्यायालयों द्वारा अवधारित किए जाएंगे ।
14. साक्ष्य का अभिलेखन-(1) बैंक ऐसे किसी आदेश को करने के प्रयोजन के लिए जिसे वह इस अधिनियम के अधीन करने के लिए सशक्त है, जिला मजिस्ट्रेट से *** यह अनुरोध कर सकेगा कि वह जिला मजिस्ट्रेट वह पूरा साक्ष्य या उसका कोई भाग अभिलिखित करे या करवा ले जो वह व्यक्ति पेश करे जिसके साक्ष्य की मांग बैंक ने उससे की है । वह जिला मजिस्ट्रेट, जिससे यह अनुरोध किया जाए स्वयं या अपने अधीनस्थ प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट को या अपने अधीनस्थ द्वितीय वर्ग मजिस्ट्रेट को जो राज्य सरकार के साधारण या विशेष आदेश द्वारा साक्ष्य अभिलिखित करने के लिए सशक्त है, निर्दिष्ट कर सकेगा और उसकी एक प्रति बैंक को भेजेगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन निहितीकरण आदेश करने के प्रयोजन के लिए बैंक, अपने अधिकारियों में से एक को ऐसे किसी व्यक्ति का साक्ष्य, जिसका साक्ष्य बैंक द्वारा अपेक्षित है अभिलिखित करने का निदेश दे सकेगा या शपथपत्र पर साक्ष्य प्राप्त कर सकेगा ।
(3) कोई मजिस्ट्रेट या बैंक का अधिकारी जो इस धारा के अनुसरण में कार्य कर रहा है उस साक्षी को शपथ दिला सकेगा जिसकी वह परीक्षा कर रहा है ।
15. निहितीकरण आदेश करने के लंबित रहने तक अदायगियों का और अन्तरणों के रजिस्ट्रीकरण का मुल्तवी रहना-जहां कि बैंक इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति में सरकारी प्रतिभूति निहित करने का आदेश देने का विचार रखता है वहां जब तक कि निहितीकरण आदेश न कर दिया गया हो प्रतिभूति पर ब्याज का या उसके परिपक्वता मूल्य का दिया जाना वह निलम्बित कर सकेगा या धारा 11 के अधीन किसी आदेश के करने को या प्रतिभूति के किसी अन्तरण के रजिस्ट्रीकरण को मुल्तवी कर सकेगा ।
16. बंधपत्र की अपेक्षा करने की बैंक की शक्ति-(1) बैंक ऐसा कोई आदेश करने के पहले, जिसे करने के लिए वह इस अधिनियम के अधीन सशक्त है, उस व्यक्ति से, जिसके पक्ष में आदेश किया जाना है, यह अपेक्षा कर सकेगा कि बैंक के व्ययनाधीन रहने वाला बंधपत्र दो प्रतिभुओं सहित ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए इस बात के लिए निष्पादित कर दे अथवा बैंक व्ययनाधीन वाली ऐसी प्रतिभूति, जो उस आदेश की विषयवस्तु के मूल्य के दुगने से अनधिक प्रतिभूति इस बात के लिए दे दे कि वह उसकी रकम बैंक को या ऐसे व्यक्ति को देगा जिसे उपधारा (2) का अनुसरण करने में बैंक वह बंधपत्र या प्रतिभूति समनुष्टि करे ।
(2) वह न्यायालय, जिसके समक्ष ऐसे किसी आदेश की विषयवस्तु की बाबत दावा किया गया है, यह आदेश दे सकेगा कि बन्धपत्र या प्रतिभूति सफल दावेदार को समनुदिष्ट की जाए जो तदुपरि ऐसे दावे के विस्तार तक बंधपत्र को प्रवर्तित कराने या प्रतिभूति को वसूल करने का हकदार होगा ।
17. सूचनाओं का शासकीय राजपत्रों में प्रकाशन-ऐसी किसी सूचना की तामील, जिसका बैंक द्वारा इस अधिनियम के अधीन दिया जाना अपेक्षित है, डाक द्वारा की जा सकेगी किन्तु ऐसी प्रत्येक सूचना, [इस बात के अनुसार कि वह सूचना केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार में से किस द्वारा निर्गमित प्रतिभूति से संबंधित है, भारत के राजपत्र में या राज्य के शासकीय राजपत्र में] बैंक द्वारा प्रकाशित की जाएगी और ऐसे प्रकाशन पर यह समझा जाएगा कि वह उन सभी व्यक्तियों को भेज दी गई है जिनके लिए वह आशयित है ।
18. निहितीकरण आदेश की परिधि-इस अधिनियम के अधीन बैंक द्वारा किया गया आदेश सरकारी प्रतिभूति पर पूर्ण हक प्रदत्त कर सकेगा अथवा तब तक के लिए जब तक पूर्ण हक निहित करने विषयक अतिरिक्त आदेश लम्बित रहता है प्रतिभूति पर प्रोद्भूत तथा प्राद्भावी हित पर ही हक प्रदत्त कर सकेगा ।
19. बैंक द्वारा किए गए आदेशों का विधिक प्रभाव-सरकारी प्रतिभूति के धारक के रूप में किसी व्यक्ति की बैंक द्वारा कोई भी मान्यता और इस अधिनियम के अधीन बैंक द्वारा किया गया कोई भी आदेश किसी न्यायालय द्वारा वहां तक प्रश्नगत नहीं किया जाएगा जहां तक कि ऐसी मान्यता या आदेश से उन सम्बन्धों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा जो [सरकार] या बैंक के, किसी ऐसे व्यक्ति से है जो बैंक द्वारा मान्यताप्राप्त सरकारी प्रतिभूति का धारक है या जो ऐसी प्रतिभूति में हित का दावेदार है, तथा बैंक द्वारा किसी व्यक्ति को ऐसी मान्यता या बैंक द्वारा किसी व्यक्ति में सरकारी प्रतिभूति निहित करने वाला आदेश ऐसे प्रवृत्त होगा कि उस व्यक्ति को उस प्रतिभूति पर हक केवल इस वैयक्तिक दायित्व के ही अधीन प्रदत्त हो जाए जो उस प्रतिभूति के अधिकारवान् स्वामी के प्रति उस धनराशि लेखे हैं जो उसके निमित्त ली और प्राप्त की गई है ।
20. न्यायालय के आदेश पर कार्यवाहियों का रोका जाना-जहां कि बैंक का यह विचार है कि किसी सरकारी प्रतिभूति के बारे में कोई ऐसा आदेश किया जाए जिसे करने के लिए वह इस अधिनियम के अधीन सशक्त है और आदेश के किए जाने से पहले बैंक को ऐसा आदेश करने से रोकने का आदेश [भारत] के किसी न्यायालय से मिल जाता है वहां बैंक या तो-
(क) न दिए गए या प्रोद्भावी ब्याज सहित प्रतिभूति को तब तक धृत रखेगा जब तक न्यायालय का अतिरिक्त आदेश प्राप्त न हो जाए, या
(ख) न्यायालय से यह आवेदन कर सकेगा कि वह प्रतिभूति उन शासकीय न्यासियों को, जो उस राज्य द्वारा नियुक्त किए गए हैं जिसमें ऐसा न्यायालय स्थित है, तब तक के लिए अन्तरित कर ली जाए जब तक न्यायालय के समक्ष वाली कार्यवाहियों का निबटारा लम्बित रहता है ।
21. निहितीकरण कार्यवहियों का बैंक द्वारा रद्द किया जाना-जहां कि बैंक का यह विचार है कि इस अधिनियम के अधीन सरकारी प्रतिभूति को किसी व्यक्ति में निहित करने का आदेश दिया जाए वहां बैंक उस प्रयोजन के लिए पहले की गई कार्यवाहियों को इसके पूर्व कि आदेश दिया जाए रद्द कर सकेगा और ऐसे रद्द किए जाने पर ऐसा आदेश करने को नए सिरे से अग्रसर हो सकेगा ।
22. सरकारी प्रतिभूतियों का ब्याज की बाबत उन्मोचन-सरकारी प्रतिभूति के निबन्धनों में, अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, कोई भी व्यक्ति ऐसी प्रतिभूति पर ऐसी किसी अवधि की बाबत, जो उस सर्व प्रथम तारीख से व्यपगत हो चुकी है जिसको ऐसी प्रतिभूति पर शोध्य रकम की अदायगी की मांग की जा सकती थी, ब्याज का दावा करने का हकदार न होगा ।
23. वाहक बन्धपत्र की बाबत उन्मोचन-वाहक बंधपत्र या ऐसे किसी बंधपत्र के ब्याज कूपन पर के सब दायित्व से 1[सरकार] ऐसे बंधपत्र या कूपन के धारक को उसमें अभिव्यक्त की गई रकम, उसके शोध्य हो जाने की तारीख को या उसके पश्चात् उपस्थित किए जाने पर, दे देने पर तब के सिवाय उन्मोचित हो जाएगी, जबकि ऐसी अदायगी की जाने के पहले ही 1[सरकार] पर [भारत] में के किसी न्यायालय के ऐसे आदेश की तामील हो गई है जिससे उस सरकार को अदायगी करने से अवरुद्ध किया गया है ।
24. ब्याज की बाबत सरकार के दायित्व का परिसीमाकाल-जहां कि किसी तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा कोई लघुतर परिसीमाकाल निश्चित नहीं किया गया है वहां सरकारी प्रतिभूति पर शोध्य किसी ब्याज के दिए जाने की बाबत 1[सरकार] का दायित्व, उस तारीख से जिसको ब्याज के रूप में शोध्य रकम हो गई है छह वर्ष का अवसान होते ही पर्यवसित हो जाएगा ।
25. दस्तावेजों का निरीक्षण-कोई भी व्यक्ति ऐसी परिस्थितियों में तथा ऐसी रीति से तथा ऐसी शर्तों पर जैसी विहित की जाएं ऐसी सरकारी प्रतिभूति का जो 1[सरकार] के कब्जे या अभिरक्षा में है निरीक्षण करने का या उससे अथवा ऐसी अन्य पुस्तक, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज से, जो सरकारी प्रतिभूतियों या सरकारी प्रतिभूति के सम्बन्ध में 1[सरकार] के द्वारा या ओर से रखी और बनी रखी जाती है, व्युत्पन्न कोई जानकारी पाने का हकदार होने के सिवाय वैसा निरीक्षण या जानकारी पाने का हकदार न होगा ।
26. बैंक और उसके अधिकारियों का लोक आफिसर समझा जाना-भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 124 के तथा सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के भाग 4 के उन उपबन्धों के, जो लोक आफिसरों की पदीय हैसियत में उनके द्वारा या विरुद्ध वादों से संबंधित है, तथा उक्त संहिता के आदेश 5 के नियम 27 और आदेश 21 के नियम 27 के उपबन्धों के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि बैंक और उस हैसियत में काम करने वाला बैंक का कोई अधिकारी, लोक आफिसर है ।
27. शास्ति-(1) यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी आवेदन में अथवा इस अधिनियम के अनुसरण में की जा रही किसी जांच के अनुक्रम में कोई कथन अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए सरकारी प्रतिभूति पर हक प्राप्त करने के प्रयोजन से इस अधिनियम के अधीन वाले किसी प्राधिकारी से करेगा जो असत्य है और या तो जिसे वह असत्य जानता है या जिसे सत्य होने का विश्वास नहीं करता है तो वह कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, या दोनों से दण्डनीय होगा ।
(2) कोई न्यायालय उपधारा (1) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान बैंक के परिवाद पर करने के सिवाय नहीं करेगा ।
28. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार पूर्व प्रकाशन की शर्त के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किसी बात के लिए उपबन्ध कर सकेंगे-
(क) वे प्ररूप जिनमें सरकारी प्रतिभूतियां निर्गमित की जा सकेंगी;
(ख) धारा 2 के खण्ड (2) के उपखण्ड (क) के खण्ड (iv) में निर्दिष्ट बाध्यताओं का प्ररूप;
(ग) वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए सरकारी प्रतिभूतियां [भूतपूर्व भारतीय राज्यों के शासकोंट को निर्गमित की जा सकेंगी;
(घ) वह रीति जिससे विभिन्न प्रकार की सरकारी प्रतिभूतियां अन्तरित की जा सकेंगी;
(ङ) लोक कार्यालयों में के पदों से भिन्न पद धारण करने वालों द्वारा स्टाक के रूप में सरकारी प्रतिभूतियों का धारण और वह रीति जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए इस प्रकार धृत सरकारी प्रतिभूतियां अन्तरित की जा सकेंगी;
(च) वह रीति जिसमें सरकारी प्रतिभूतियों की बाबत ब्याज दिया जाना है और अभिस्वीकृति की जानी है;
(छ) द्विप्रतिक, नवीकृत, संपरिवर्तित, समेकित और उप-खण्डित सरकारी प्रतिभूतियों के दिए जाने को शासित करने वाली शर्तें;
(ज) सरकारी प्रतिभूतियों की दूसरी प्रति देने और सरकारी प्रतिभूतियों के नवीकरण, संपरिवर्तन, समेकन या उपखण्डन के लिए फीसें;
(झ) वह प्ररूप जिसमें उन्मोचन, नवीकरण, संपरिवर्तन, समेकन या उपखण्डन के लिए परिदत्त सरकारी प्रतिभूति की प्राप्ति अभिस्वीकृत की जानी है;
(ञ) स्टाक के रूप में सरकारी प्रतिभूतियों से सम्बन्धित दस्तावेजों के अनुप्रमाणन की रीति;
(ट) वह रीति जिसमें सरकारी प्रतिभूति से सम्बन्धित किसी दस्तावेज पर या [सरकार] द्वारा निर्गमित किए गए किसी वचनपत्र पर कोई पृष्ठांकन, उस व्यक्ति की मांग पर, जो किसी कारण से लिखने में असमर्थ है, उसकी ओर से निष्पादित किया जा सकेगा;
(ठ) धारा 16 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट बन्धपत्र का प्ररूप;
(ड) धारा 25 के अधीन वह परिस्थिति और वह रीति जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए सरकारी प्रतिभूतियों, पुस्तकों, रजिस्टरों और अन्य दस्तावेजों के निरीक्षण की अनुज्ञा दी जा सकेगी अथवा उनमें से कोई सूचना दी जा सकेगी;
(ढ) निहितीकरण आदेश के करने में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(ण) वह प्राधिकारी जिसके द्वारा धारा 7 के उपबन्ध में निर्दिष्ट प्रमाणपत्र दिया जाएगा और उसमें उल्लिखित जांच करने का ढंग;
[(त) वह प्ररूप जिसमें और वे व्यक्ति जिनके पक्ष में धारा 9ख के अधीन नामनिर्देशन किए जा सकेंगे, वह रीति जिसमें और वे शर्तें और निबन्धन जिनके अधीन रहते हुए नामनिर्देशन किए जा सकेंगे, ऐसे नामनिर्देशनों का रजिस्ट्रीकरण, उनमें फेरफार या उनका रद्दकरण और वे फीसें जो ऐसे रजिस्ट्रीकरण, फेरफार या रद्दकरण के लिए उद्गृहीत की जा सकेंगी;
(थ) वह रीति जिससे धारा 9ख की उपधारा (4) के प्रयोजनों के लिए कोई व्यक्ति नियुक्त किया जा सकेगा ।]
[(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
[29. भारतीय विधियों का सरकारी प्रतिभूतियों को लागू न होना-भारतीय प्रतिभूति अधिनियम, 1920 (1920 का 10) का और उस विधि के तत्समान भाग ख राज्य में लोक ऋण (संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 57) के प्रारंभ के ठीक पहले प्रवृत्त किसी विधि का सरकारी प्रतिभूतियों को, जिनको यह अधिनियम लागू होता है, और उन सभी बातों को जिनके लिए इस अधिनियम के द्वारा उपबन्ध किया गया है, लागू होना बन्द हो जाएगाः
परन्तु ऐसी कोई तत्समान विधि हैदराबाद, सौराष्ट्र, या तिरुबांकुर कोचीन सरकार द्वारा 1953 की 31वीं मार्च को या उसके पूर्व सृजित और निर्गमित की गई किन्हीं प्रतिभूतियों को या उसके संबंध में लोक ऋण (संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 57) के प्रारंभ के एक वर्ष से अनधिक ऐसी अवधि के लिए जैसी केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे लागू बनी रहेगी ।]
[30. भाग ख राज्यों में 1951 के प्रथम अप्रैल के पूर्व जो विधियां प्रवृत्त न थीं उनके प्रति निर्देश का अर्थान्वयन-इस अधिनियम में किसी विधि के प्रति किसी निर्देश का, जिसका विस्तार भाग स्त्र्खऱ् राज्य विधि अधिनियम, 1951 (1951 का 3) के प्रारम्भ के पूर्व किसी भाग स्त्र्खऱ् राज्य पर या ऐसे राज्य के किसी भाग पर नहीं था, जहां आवश्यक हो, यह अर्थ लगाया जाएगा कि उक्त तारीख के पूर्व तत्समय विधि के प्रति, यदि कोई हो, तो यथापरिस्थिति, उस राज्य में या उसके किसी भाग में प्रवृत्त है, निर्देश इसके अन्तर्गत है ।]
[31. जम्मू-कश्मीर में जो विधियां प्रवृत्त नहीं हैं उनके प्रति निर्देश का अर्थान्वयन-इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति जो जम्मू-कश्मीर राज्य में प्रवृत्त नहीं है, किसी निर्देश का, जहां आवश्यक हो, यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत उस राज्य में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के प्रति, यदि कोई हो, निर्देश है ।]
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