उत्प्रवास अधिनियम, 1983
(1983 का अधिनियम संख्यांक 31)
[10 सितम्बर, 1983]
भारत के नागरिकों के उत्प्रवास से संबंधित
विधि का समेकन और संशोधन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के चौंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, लागू होना और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उत्प्रवास अधिनियम, 1983 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है और यह भारत के बाहर भारत के नागरिकों को भी लागू होता है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबन्ध में इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबन्ध के प्रारम्भ के प्रति निर्देश है ।
2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) प्रमाणपत्र" से धारा 11 के अधीन जारी किया गया रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्रेत है;
(ख) प्रवहण" के अन्तर्गत जलयान, यान, देशी नाव और वायुयान अभिप्रेत है;
(ग) आश्रित" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसकी किसी उत्प्रवासी से नातेदारी है और जो उस उत्प्रवासी पर आश्रित है;
(घ) उत्प्रवासी" से भारत का कोई ऐसा नागरिक अभिप्रेत है जो उत्प्रवास करने का आशय रखता है या उत्प्रवास करता है या जिसने उत्प्रवास किया है किन्तु इसके अन्तर्गत निम्नलिखित नहीं है: -
(i) ऐसे किसी उत्प्रवासी का कोई आश्रित, चाहे ऐसा आश्रित उस उत्प्रवासी के साथ जाता है या उस देश में जिसमें उस उत्प्रवासी ने विधिपूर्वक उत्प्रवास किया है, उसके साथ रहने के प्रयोजन के लिए उसके बाद में प्रस्थान करता है;
(ii) ऐसा कोई व्यक्ति जो अठारह वर्ष की आयु प्राप्त करने के पश्चात् किसी भी समय कम से कम तीन वर्ष तक भारत के बाहर रह चुका है या ऐसे व्यक्ति का पति या पत्नी या पुत्र या पुत्री:
(ङ) उत्प्रवासी प्रवहण" से उत्प्रवासियों के प्रवहण के लिए या उत्प्रवासियों के उतनी संख्या से, जितनी विहित की जाए, अधिक संख्या में पहुंचाने के लिए विशेष रूप से भाड़े पर लिया गया कोई प्रवहण अभिप्रेत है:
परन्तु केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकेगी कि ऐसे स्थान पर, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, उत्प्रवासियों को पहुंचाने वाला कोई प्रवहण उत्प्रवासी प्रवहण नहीं माना जाएगा;
(च) उत्प्रवास करना" और उत्प्रवास" से किसी व्यक्ति का भारत के बाहर किसी देश या स्थान में कोई नियोजन प्राप्त करने के उद्देश्य से (चाहे ऐसे नियोजन की प्राप्ति किसी करार या अन्य ठहराव के अधीन हो अथवा नहीं, और चाहे वह भर्ती करने वाले किसी अभिकर्ता या नियोजक की सहायता से या सहायता के बिना हो) भारत के बाहर प्रस्थान करना अभिप्रेत है;
(छ) नियोजक" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी देश में या भारत के बारह किसी स्थान पर नियोजन की व्यवस्था करता है या करने की प्रस्थापना करता है;
(ज) नियोजन" से मजदूरी या पुरस्कार के लिए खंड (ण) के अर्थान्तर्गत कोई सेवा, उपजीविका या किसी प्रकार के कार्य में लगना (जो केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन सेवा, उपजीविका या कार्य में लगना नहीं है) अभिप्रेत है और इसके सभी व्याकरणिक रूपभेदों और सजातीय पदों का तदनुसार अर्थ लगाया जाएगा;
(झ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(ञ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ट) उत्प्रवासी संरक्षी" से धारा 3 के अधीन नियुक्त उत्प्रवासी संरक्षी अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत धारा 5 के अधीन प्राधिकृत कोई व्यक्ति भी है;
(ठ) भर्ती करने वाला अभिकर्ता" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी नियोजक के लिए भर्ती करने के कारबार में भारत में लगा हुआ है और जो ऐसी भर्ती की बाबत किसी विषय के संबंध में, जिसमें इस प्रकार भर्ती किए गए या इस प्रकार भर्ती किए जाने की वांछा करने वाले व्यक्तियों के साथ व्यवहार करना सम्मिलित है, ऐसे नियोजक का प्रतिनिधित्व करता है;
(ड) भर्ती" के अन्तर्गत भर्ती के प्रयोजन के लिए कोई विज्ञापन निकालना, भारत के बाहर किसी देश में या किसी स्थान पर कोई नियोजन प्राप्त करने या प्राप्त करने में सहायता करने के लिए विज्ञापन द्वारा प्रस्थापना करना और भारत के बाहर किसी देश में या किसी स्थान पर ऐसे व्यक्ति के नियोजन के लिए या उसके संबंध में उस व्यक्ति के साथ कोई पत्र व्यवहार, बातचीत, करार या ठहराव करना भी है;
(ढ) रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी" से धारा 9 के अधीन इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी के रूप में नियुक्त किया गया अधिकारी अभिप्रेत है;
(ण) कार्य" से निम्नलिखित अभिप्रेत हैं: -
(i) कोई अकुशल कार्य, जिसके अन्तर्गत किसी भी प्रकार का औद्योगिक या कृषि श्रम भी है;
(ii) कोई घरेलू सेवा;
(iii) कोई ऐसी सेवा, जो किसी होटल, रेस्तरां, चायघर या लोक समागम के किसी अन्य स्थान पर प्रबन्धकीय हैसियत में सेवा नहीं है;
(iv) किसी ट्रक या अन्य यान के चालक, मैकेनिक, तकनीकी या कुशल श्रमिक या शिल्पी के रूप में कार्य;
(v) कार्यालय सहायक या लेखाकार या टाइपिस्ट या आशुलिपिक या बिक्रीकर्ता या नर्स या किसी मशीन के प्रचालक के रूप में कार्य;
(vi) किसी सिनेमा, प्रदर्शनी या मनोरंजन के संबंध में या उसके प्रयोजनों के लिए कार्य;
(vii) वृत्तिक या किसी अन्य प्रकार का कोई ऐसा कार्य, जो केन्द्रीय सरकार, भारत के ऐसे नागरिकों के, जो भारत के बाहर ऐसे कार्य में नियोजित किए जा सकेंगे, संरक्षण की आवश्यकता और अन्य सुसंगत परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए, अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे:
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार यह समाधान हो जाता है कि पूर्व वर्णित प्रवर्गों में से किसी प्रवर्ग में या उसके किसी उप-प्रवर्ग में नियोजन के संबंध में लागू सेवा की शर्तों को ध्यान में रखते हुए, चाहे साधारणतः या किसी विशिष्ट देश या स्थान और अन्य सुसंगत परिस्थितियों के संबंध में ऐसा करना आवश्यक है तो वह, अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकेगी कि ऐसे प्रवर्ग का कार्य या ऐसे उप-प्रवर्ग का कार्य इस परिभाषा के अर्थान्तर्गत कार्य नहीं माना जाएगा ।
(2) इस अधिनियम में किसी ऐसी विधि के प्रति, जो किसी क्षेत्र में प्रवृत्त नहीं है, किसी निर्देश का, उस क्षेत्र के संबंध में, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के प्रति, यदि कोई हो, निर्देश है ।
अध्याय 2
उत्प्रवास प्राधिकारी
3. उत्प्रवासी संरक्षी-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अधिसूचना द्वारा, एक उत्प्रवासी महासंरक्षी और उतने उत्प्रवासी संरक्षी नियुक्त कर सकेगी जितने वह ठीक समझे ।
(2) केन्द्रीय सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, उस क्षेत्र को परिभाषित कर सकेगी, जिस पर इस प्रकार नियुक्त उत्प्रवासी संरक्षी के प्राधिकार का विस्तार होगा और जहां दो या अधिक उत्प्रवासी संरक्षी एक ही क्षेत्र के लिए नियुक्त किए जाते हैं, वहां वह ऐसे आदेश द्वारा ऐसे क्षेत्र के संबंध में इस अधिनियम के अधीन किए जाने वाले कार्य के वितरण और आबंटन के लिए भी उपबन्ध कर सकेगी ।
(3) उत्प्रवासी संरक्षी इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उनको सौंपे गए कृत्यों का निर्वहन उत्प्रवासी महासंरक्षी के साधारण अधीक्षण और नियंत्रण के अधीन करेंगे ।
(4) उत्प्रवासी महासंरक्षी इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उसको सौंपे गए विशेष कृत्यों के अतिरिक्त, किसी उत्प्रवासी संरक्षी को सौंपे गए सभी या किन्हीं कृत्यों को निष्पादित कर सकेगा ।
4. उत्प्रवासी संरक्षी के साधारण कर्तव्य-इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक उत्प्रवासी संरक्षी इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उसको सौंपे गए विशेष कर्तव्यों के अतिरिक्त, -
(क) सभी आशयित उत्प्रवासियों और उत्प्रवासियों की संरक्षा करेगा और अपनी सलाह देकर उनकी सहायता करेगा;
(ख) इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के सभी उपबन्धों का अनुपालन वहां तक कराएगा जहां तक वह करा सकता हो;
(ग) उस विस्तार तक और उस रीति में, जो विहित की जाए-
(i) किसी उत्प्रवासी प्रवहण; या
(ii) किसी अन्य प्रवहण का, यदि उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई आशयित उत्प्रवासी या उत्प्रवासी भारत के बाहर किसी स्थान के लिए या वहां से किसी अन्य प्रवहण द्वारा भारत से प्रस्थान कर रहे हैं या भारत को वापस लौट रहे हैं, निरीक्षण करेगा;
(घ) उत्प्रवासियों से उस देश के लिए जिसमें उन्होंने उत्प्रवास किया था, उनकी समुद्र यात्रा या यात्रा के दौरान और उस देश में उनके निवास की अवधि के दौरान और भारत को वापस समुद्र यात्रा या यात्रा के दौरान उनके साथ हुए व्यवहार के बारे में पूछताछ करेगा और उस पर एक रिपोर्ट उत्प्रवासी महासंरक्षी या ऐसे अन्य प्राधिकारी को, जो विहित किया जाए, देगा;
(ङ) ऐसे उत्प्रवासियों को जो भारत में वापस आ गए हैं, जहां तक वह युक्तियुक्त रूप से ऐसा कर सकता हो, सहायता करेगा और उनको सलाह देगा ।
5. संरक्षी के कृत्यों का प्रयोग करने के लिए व्यक्तियों को प्राधिकृत करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि आशयित उत्प्रवासियों या उत्प्रवासियों के हित में ऐसा करना आवश्यक है, तो वह इस अधिनियम के अधीन उत्प्रवासी संरक्षी के सभी या किन्हीं कृत्यों का पालन करने के लिए किसी भी व्यक्ति को प्राधिकृत कर सकेगी ।
6. उत्प्रवास जांच चौकियां-(1) जहां केन्द्रीय सरकार यह समझती है कि इस अधिनियम के उपबन्धों के उल्लंघन को रोकने या उस पर पाबन्दी लगाने की दृष्टि से ऐसा करना आवश्यक है, वहां वह, अधिसूचना द्वारा, उतनी उत्प्रवास जांच चौकियां ऐसे स्थानों पर स्थापित कर सकेगी, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) केन्द्रीय सरकार इस निमित्त किए गए किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के किसी अधिकारी को उपधारा (1) के अधीन स्थापित उत्प्रवास जांच चौकी के भारसाधक अधिकारी के रूप में नियुक्त कर सकेगी ।
(3) उत्प्रवास जांच चौकी का भारसाधक अधिकारी उस उत्प्रवासी संरक्षी के साधारण नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन होगा, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वह उत्प्रवास जांच चौकी स्थित है ।
7. अन्य उत्प्रवासी अधिकारी और कर्मचारिवृन्द-केन्द्रीय सरकार उत्प्रवासी महासंरक्षी और उत्प्रवासी संरक्षी की इस अधिनियम के अधीन उनके कर्तव्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की (जिन्हें इसमें इसके पश्चात् उत्प्रवासी अधिकारी और उत्प्रवासी कर्मचारी कहा गया है) जिन्हें वह ठीक समझे, नियुक्त कर सकेगी ।
8. उत्प्रवासी अधिकारियों का लोक सेवक होना-इस अधिनियम के अधीन नियुक्त उत्प्रवासी महासंरक्षी, उत्प्रवासी संरक्षी, उत्प्रवास जांच चौकियों के भारसाधक अधिकारी, उत्प्रवासी अधिकारी और उत्प्रवासी कर्मचारी, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक होंगे ।
अध्याय 3
भर्ती करने वाले अभिकर्ताओं का रजिस्ट्रीकरण
9. रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी-केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, उत्प्रवासी महासंरक्षी या उत्प्रवासी संरक्षी की पंक्ति से उच्चतर पंक्ति के उस सरकार के किसी अन्य अधिकारी को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी नियुक्त कर सकेगी ।
10. विधिमान्य प्रमाणपत्र के बिना कोई भी व्यक्ति भर्ती करने वाले अभिकर्ता के रूप में कार्य नहीं करेगा-इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, भर्ती करने वाला कोई भी अभिकर्ता, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी द्वारा उस निमित्त जारी किए गए किसी प्रमाणपत्र के अधीन और उसके अनुसार ही भर्ती का कारबार प्रारम्भ करेगा या करेगा, अन्यथा नहीं:
परन्तु इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व भर्ती करने वाले अभिकर्ता का कारबार करने वाला कोई व्यक्ति ऐसे किसी प्रमाणपत्र के बिना ऐसे प्रारम्भ से एक मास की अवधि तक, और यदि उसने एक मास की उक्त अवधि के भीतर इस अधिनियम के अधीन ऐसे प्रमाणपत्र के लिए कोई आवेदन किया है और ऐसा आवेदन विहित प्ररूप में है तथा उसमें विहित विशिष्टियां हैं, तो ऐसे आवेदन का रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी द्वारा निपटारा किए जाने तक, ऐसा कारबार करता रह सकेगा ।
11. रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन-(1) रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी को ऐसे प्ररूप में किया जाएगा और उसमें आवेदक की वित्तीय सुदृढ़ता, विश्वसनीयता, परिसर, जिसमें वह अपना कारबार करने का आशय रखता है, भर्ती करने के लिए उसके पास सुविधाओं, उसके पूर्ववृत्तों (जिनके अन्तर्गत इस बाबत सूचना भी है कि क्या इस अध्याय के अधीन उसे पहले कोई प्रमाणपत्र जारी किया गया था और यदि किया गया था तो क्या ऐसा प्रमाणपत्र रद्द कर दिया गया था) और भर्ती के बारे में उसके पूर्व अनुभव तथा अन्य सुसंगत बातों के बारे में ऐसी विशिष्टियां होंगी, जो विहित की जाएं, और साथ में विहित फीस के संदाय के साक्ष्यस्वरूप एक रसीद और उसकी चालू वित्तीय स्थिति बताने वाला एक शपथपत्र और विहित प्ररूप में इस आशय का एक वचनबंध संलग्न होगा कि रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन में या उसके साथ दी गई किसी सूचना के किसी भी प्रकार से मिथ्या या असत्य पाए जाने की दशा में प्रमाणपत्र विहित प्रक्रिया के अनुसार किसी भी समय रद्द किया जा सकेगा :
परन्तु धारा 14 की उपधारा (6) के अधीन निरर्हित किसी व्यक्ति से इस उपधारा के अधीन कोई भी आवेदन ऐसी निरर्हता की अवधि समाप्त होने तक ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
(2) ऐसे आवेदन की प्राप्ति पर, रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी, -
(क) यदि आवेदन विहित प्ररूप में नहीं है या उसमें विहित विशिष्टियां अन्तर्विष्ट नहीं हैं, तो आवेदन आवेदक को लौटा देगा;
(ख) यदि आवेदन विहित प्ररूप में है और उसमें विहित विशिष्टियां अन्तर्विष्ट हैं, तो आवेदक को यह सूचना देगा कि वह आवेदित प्रमाणपत्र की मंजूरी के लिए पात्र है और आवेदक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उपधारा (3) के अधीन प्रतिभूति की वह रकम, जिसे आवेदक देगा, अवधारित करेगा ।
(3) रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी, उपधारा (2) के अधीन स्वयं आवेदक को जारी करने के लिए प्रस्तावित प्रमाणपत्र के निबंधनों और शर्तों का सम्यक् निष्पादन सुनिश्चित करने के लिए और इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए और ऐसे व्ययों की पूर्ति के लिए, जो ऐसे उत्प्रवासियों में से, जो आवेदक द्वारा भर्ती किए जाएं, किसी उत्प्रवासी के भारत वापस लौटने की दशा में उपगत करने पड़ें, इस निमित्त बनाए गए नियमों के अनुसार, प्रतिभूति की वह रकम (जो किसी भी दशा में एक लाख रुपए से कम नहीं होगी) जिसे आवेदक देगा, अवधारित करेगा ।
(4) यदि कोई आवेदक उपधारा (3) के अधीन अवधारित प्रतिभूति की रकम उस तारीख से, जिसको रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी ऐसी प्रतिभूति देने की उससे अपेक्षा करता है, एक मास की अवधि के भीतर विहित रीति में दे देता है, तो उसे उसके द्वारा आवेदित प्रमाणपत्र जारी कर दिया जाएगा जिस पर इस आशय का एक पृष्ठांकन होगा कि अपेक्षित प्रतिभूति उसके द्वारा दे दी गई है ।
(5) यदि कोई आवेदक उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर उसके द्वारा दी जाने के लिए अपेक्षित प्रतिभूति देने में असफल रहता है, तो उसके आवेदन के बारे में यह समझा जाएगा कि वह उस अवधि की समाप्ति की तारीख को रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी द्वारा अस्वीकृत कर दिया जाता है ।
12. रजिस्ट्रीकरण के निबन्धन और शर्तें-धारा 11 के अधीन जारी किया गया प्रमाणपत्र-
(क) ऐसे प्ररूप में होगा जो विहित किया जाए;
(ख) पांच वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए विधिमान्य होगा जो विहित की जाए:
परन्तु प्रमाणपत्र विहित अवधि से लघुतर अवधि के लिए जारी किया जा सकेगा, -
(i) यदि वह व्यक्ति जिसे वह जारी किया जाता है, ऐसा चाहता है; या
(ii) यदि रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी प्रमाणपत्र के लिए आवेदक को लिखित रूप में संसूचित किए जाने वाले कारणों से किसी भी मामले में यह समझता है कि प्रमाणपत्र लघुतर अवधि के लिए जारी किया जाना चाहिए;
(ग) ऐसे अन्य निबन्धनों और शर्तों के अधीन रहते हुए, जिनके अन्तर्गत, विशिष्टतया, प्रमाणपत्रधारक द्वारा ऐसे विहित अभिलेखों का रखा जाना भी है, जिनमें भर्ती करने, उसके द्वारा भर्ती किए गए या उत्प्रवास करने के लिए सहायता किए गए व्यक्तियों, संबद्ध नियोजकों, भर्ती किए जाने के संबंध में की गई संविदाओं और अन्य ठहरावों के संबंध में उसके वित्तीय संव्यवहारों के ऐसे विवरण भी अन्तर्विष्ट होंगे, जो विहित किए जाएं:
परन्तु प्रमाणपत्र में, विहित निबन्धनों और शर्तों के अतिरिक्त, ऐसे अन्य निबन्धन और शर्तें वे हो सकेंगी जो रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी अधिनियम के प्रयोजनों की पूर्ति करने के लिए किसी विशिष्ट मामले में अधिरोपित करे ।
13. रजिस्ट्रीकरण का नवीकरण-प्रमाणपत्र का समय-समय पर नवीकरण किया जा सकेगा और इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्ध (जिनके अन्तर्गत फीस के बारे में उपबन्ध भी हैं) प्रमाणपत्र के नवीकरण को उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे उसके जारी किए जाने को लागू होते हैं:
परन्तु किसी भी प्रमाणपत्र का तब तक नवीकरण नहीं किया जाएगा जब तक कि उसके नवीकरण के लिए आवेदन, उस तारीख के, जिसको प्रमाणपत्र ऐसे नवीकरण के न किए जाने पर विधिमान्य न रह जाता, कम से कम तीन मास के पूर्व नहीं किया जाता है:
परन्तु यह और कि रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी प्रमाणपत्र के नवीकरण के लिए किए गए किसी आवेदन को, जो उस तारीख से पूर्व जिसको प्रमाणपत्र, यदि ऐसे प्रमाणपत्र का ऐसा नवीकरण न किया गया होता तो, विधिमान्य न रहता, पूर्व तीन मास की अवधि के दौरान किसी समय किया गया है, ग्रहण कर सकेगा यदि आवेदक रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी का यह समाधान कर देता है कि वह उक्त अवधि के पहले ऐसा आवेदन पर्याप्त कारण से नहीं कर सका था ।
14. प्रमाणपत्र का रद्दकरण, निलम्बन, आदि-(1) रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी किसी प्रमाणपत्र को निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक आधारों पर रद्द कर सकेगा किन्तु किसी अन्य आधार पर ऐसा नहीं कर सकेगा, अर्थात्: -
(क) यह कि उस रीति को, जिसमें प्रमाणपत्र धारक ने अपना कारबार किया है या उसकी वित्तीय स्थिति में हुई किसी गिरावट को, भर्ती के लिए उसके पास उपलब्ध सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए वह प्रमाणपत्रधारक प्रमाणपत्र धारण करते रहने के लिए उपयुक्त व्यक्ति नहीं है;
(ख) यह कि प्रमाणपत्रधारक ने उत्प्रवासियों को भारत के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले प्रयोजनों के लिए या लोकनीति के प्रतिकूल प्रयोजनों के लिए भर्ती किया है;
(ग) यह कि प्रमाणपत्रधारक को, प्रमाणपत्र के जारी किए जाने के पश्चात् भारत में किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है जिसमें नैतिक अधमता अन्तर्वलित है;
(घ) यह कि प्रमाणपत्रधारक को, प्रमाणपत्र के जारी किए जाने के पश्चात् भारत में किसी न्यायालय द्वारा इस अधिनियम, उत्प्रवास अधिनियम, 1922 (1922 का 7) या पासपोर्ट, विदेशी मुद्रा, ओषधि, स्वापक पदार्थ या तस्करी से संबंधित किसी अन्य विधि के अधीन किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है और उसके संबंध में उसे कम से कम छह मास का कारावास दिया गया है;
(ङ) यह कि प्रमाणपत्र किसी तात्त्विक तथ्य के दुर्व्यपदेशन द्वारा या उसे दबाकर जारी किया गया है या उसका नवीकरण किया गया है;
(च) यह कि प्रमाणपत्रधारक ने प्रमाणपत्र के किन्हीं निबंधनों और शर्तों का उल्लंघन किया है;
(छ) यह कि केन्द्रीय सरकार की राय में, किसी विदेश के साथ भारत के मित्रतापूर्ण संबंधों के हित में या सर्वसाधारण के हित में प्रमाणपत्र का रद्द करना आवश्यक है ।
(2) जहां रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी का, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, यह समाधान हो जाता है कि किसी प्रमाणपत्र को उपधारा (1) में वर्णित किसी आधार पर रद्द करने के प्रश्न पर विचार लम्बित रहने तक ऐसा करना आवश्यक है वहां रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी लिखित आदेश द्वारा, प्रमाणपत्र का प्रवर्तन तीस दिन से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए निलम्बित कर सकेगा जो आदेश में विहित की जाए, और प्रमाणपत्रधारक से, ऐसे आदेश की प्राप्ति की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर यह हेतुक दर्शित करने की अपेक्षा कर सकेगा कि प्रमाणपत्र के निलम्बन को इस प्रश्न का अवधारण किए जाने तक क्यों नहीं बढ़ा दिया जाए कि प्रमाणपत्र को रद्द क्यों नहीं कर दिया जाना चाहिए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन अपराध के लिए प्रमाणपत्रधारक को दोषसिद्ध करने वाला न्यायालय भी प्रमाणपत्र रद्द कर सकेगा:
परन्तु यह कि यदि दोषसिद्धि को अपील में या अन्यथा अपास्त कर दिया जाता है तो उपधारा (3) के अधीन रद्दकरण शून्य हो जाएगा ।
(4) किसी प्रमाणपत्र के रद्दकरण का आदेश, अपील न्यायालय द्वारा या पुनरीक्षण की शक्तियों का प्रयोग करने वाले किसी न्यायालय द्वारा उपधारा (3) के अधीन किया जा सकेगा ।
(5) प्रमाणपत्र को रद्द या निलंबित करने वाला कोई आदेश पारित करने से पूर्व, यथास्थिति, रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी या न्यायालय उन उपबंधों और व्यवस्थाओं से संबंधित प्रश्न पर विचार करेगा जो उत्प्रवासियों और ऐसे अन्य व्यक्तियों के, जिनके साथ प्रमाणपत्रधारक का भर्ती करने वाले अभिकर्ता के रूप में अपने कारबार के अनुक्रम में कोई संव्यवहार रहा है, हितों की सुरक्षा के लिए की जाएं और ऐसे आदेश कर सकेगा (जिनके अन्तर्गत वे आदेश भी हैं जो ऐसे उत्प्रवासियों और अन्य व्यक्तियों में से सभी या किसी के संबंध में अपने कारबार को करना जारी रखने के लिए प्रमाणपत्रधारक को अनुज्ञात करते हैं) जो वह इस निमित्त आवश्यक समझे ।
(6) जहां किसी व्यक्ति को जारी किया गया कोई प्रमाणपत्र इस धारा के अधीन रद्द कर दिया जाता है, वहां ऐसा व्यक्ति इस अध्याय के अधीन दूसरे प्रमाणपत्र के लिए ऐसे रद्दकरण की तारीख से दो वर्ष की अवधि समाप्त हो जाने तक आवेदन करने का पात्र नहीं होगा ।
अध्याय 4
नियोजकों द्वारा भर्ती के लिए अनुज्ञापत्र
15. सक्षम प्राधिकारी-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा उत्प्रवासी महासंरक्षी या उत्प्रवासी संरक्षी से उच्चतर पंक्ति के उस सरकार के किसी अन्य अधिकारी को इस अध्याय के अधीन अनुज्ञापत्र जारी करने के लिए प्राधिकारी (जिसे इसमें इसके पश्चात् समक्ष प्राधिकारी कहा गया है) नियुक्त कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसे किसी व्यक्ति को, जो भारत के बाहर किसी देश में या किसी स्थान पर उस सरकार के अधीन नियोजित है, समक्ष प्राधिकारी की शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी और इस अध्याय के अधीन ऐसे नियोजकों को, जो भारत के नागरिक नहीं हैं ऐसे देश में या स्थान पर नियोजन के लिए भारत के किसी नागरिक की भर्ती करने के प्रयोजन के लिए अनुज्ञापत्र जारी कर सकेगी और इस प्रकार प्राधिकृत व्यक्ति इस अध्याय के अधीन अपने द्वारा जारी किए गए प्रत्येक अनुज्ञापत्र की सम्यक्तः प्रमाणित प्रति उत्प्रवासी महासंरक्षी को भेजेगा ।
16. नियोजकों द्वारा भर्ती करने वाले अभिकर्ताओं के माध्यम से या अनुज्ञापत्र के अधीन भर्ती का किया जाना-इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन जैसा अन्यथा उपबंधित हैं उसके सिवाय, कोई भी नियोजक भारत के बाहर किसी देश में या किसी स्थान पर नियोजन के लिए भारत के किसी नागरिक की भर्ती-
(क) इस अधिनियम के अधीन ऐसी भर्ती करने के लिए सक्षम किसी भर्ती करने वाले अभिकर्ता के माध्यम से, या
(ख) इस अध्याय के अधीन इस निमित्त जारी किए गए किसी विधिमान्य अनुज्ञापत्र के अनुसार ही,
करेगा, अन्यथा नहीं ।
17. अनुज्ञापत्र अभिप्राप्त करने के लिए प्रक्रिया-(1) इस अध्याय के अधीन अनुज्ञापत्र अभिप्राप्त करने के लिए इच्छुक नियोजक सक्षम प्राधिकारी को उस निमित्त विहित रूप में आवेदन करेगा ।
(2) ऐसे आवेदन की प्राप्ति पर सक्षम प्राधिकारी इस निमित्त बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए, ऐसी जांच करेगा जो वह आवश्यक समझे और आवेदन किए गए अनुज्ञापत्र को मंजूर करेगा या आवेदन अस्वीकृत कर देगा:
परन्तु अनुज्ञापत्र मंजूर करने से पूर्व सक्षम प्राधिकारी आवेदक से ऐसी शर्तों का अनुपालन करने की अपेक्षा कर सकेगा जो विहित की जाएं, जिनके अन्तर्गत प्रतिभूति देने के बारे में शर्तें और ऐसी अन्य शर्तें भी हैं जो ऐसा प्राधिकारी लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से भारत के उन नागरिकों के, जिनकी आवेदक द्वारा भर्ती की जाने की संभावना है, हित में आवश्यक समझे ।
(3) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, सक्षम प्राधिकारी उपधारा (1) के अधीन निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक आधारों पर ही आवेदन अस्वीकृत कर सकेगा, न कि किसी अन्य आधार पर, अर्थात्: -
(क) यह कि आवेदन सब बातों में पूर्ण नहीं है और आवेदन में दी गई तात्त्विक विशिष्टियां सही नहीं हैं;
(ख) यह कि नियोजन के निबंधन और शर्तें, जिनकी आवेदक अपने द्वारा भर्ती किए गए या भर्ती किए जाने के लिए प्रस्तावित व्यक्तियों के लिए प्रस्थापना करता है भेदभावपूर्ण या शोषणकारी है;
(ग) यह कि उस नियोजन में जिसके लिए आवेदक प्रस्थापना करता है, ऐसी प्रकृति का काम अन्तर्वलित है जो भारत की विधि के अनुसार विधिविरुद्ध है या जो भारत की लोक नीति के प्रतिकूल है या जो मानवीय प्रतिष्ठा और गरिमा के मानदंडों का अतिक्रमण करता है;
(घ) यह कि आवेदक के पूर्ववृत्तों, उसकी वित्तीय स्थिति, उसके पास उपलब्ध सुविधाओं, उसके द्वारा अतीत में नियोजित व्यक्तियों की काम करने और रहने की दशाओं को ध्यान में रखते हुए, यह लोकहित में या उन व्यक्तियों के, जो उसके द्वारा भर्ती किए जाएं, हित में नहीं होगा कि उसे अनुज्ञापत्र जारी किया जाए;
(ङ) यह कि उस देश या स्थान में जहां आवेदक अपने द्वारा भर्ती किए गए व्यक्तियों को नियोजित करने की प्रस्थापना करता है प्रवर्तमान परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, ऐसा नियोजन स्वीकार करने के लिए उत्प्रवास करना भारत के किसी नागरिक के हित में नहीं होगा ।
(4) जहां समक्ष प्राधिकारी उपधारा (2) के अधीन आवेदन को अस्वीकृत करने वाला आदेश करता है, वहां वह ऐसा आदेश करने के अपने कारणों का एक संक्षिप्त कथन लेखबद्ध करेगा और मांग की जाने पर उसकी एक प्रति आवेदक को देगा:
परन्तु यदि सक्षम प्राधिकारी की यह राय है कि किसी विदेश के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्धों के हित में या साधारण जनता के हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह, यथास्थिति, ऐसी प्रति देने से इंकार कर सकेगा या कथन के केवल ऐसे भाग को, जो वह ठीक समझे, प्रति दे सकेगा ।
18. अनुज्ञापत्र की विधिमान्यता की अवधि-धारा 17 के अधीन जारी किया गया अनुज्ञापत्र उसके जारी किए जाने की तारीख से एक वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि की समाप्ति तक, जो विहित की जाए, या ऐसे व्यक्तियों की भर्ती पूरी हो जाने के समय तक, जिनकी भर्ती के लिए ऐसा अनुज्ञापत्र जारी किया गया है, इन दोनों में से जो भी पूर्वतर हो, विधिमान्य रहेगा:
परन्तु जहां अनुज्ञापत्रधारक पर्याप्त हेतुक से विहित अवधि की समाप्ति के पूर्व ऐसी भर्ती पूरी करने में असमर्थ रहा है वहां विहित प्राधिकारी इस निमित्त बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए अनुज्ञापत्र की विधिमान्यता की अवधि को ऐसी और अवधि या अवधियों से बढ़ा सकेगा जो एक समय में तीन मास से अधिक नहीं होगी ।
19. कुछ अनुज्ञापत्रों का रजिस्ट्रीकरण-धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकृत किसी व्यक्ति से अभिप्राप्त कोई अनुज्ञापत्र तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कि उसकी एक प्रमाणित प्रति विहित रीति में उत्प्रवासी महासंरक्षी के पास फाइल नहीं कर दी जाती है ।
20. अनुज्ञापत्र का रद्दकरण या निलम्बन-धारा 14 में निर्दिष्ट किसी प्रमाणपत्र के रद्दकरण और निलम्बन से संबंधित उस धारा के उपबंध, ऐसे उपान्तरों के अधीन रहते हुए, जो आवश्यक हों (जिनके अन्तर्गत उस धारा में रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी के प्रति निर्देशों का इस अध्याय के अधीन सक्षम प्राधिकारी के प्रति निर्देशों के रूप में अर्थ लगाने के लिए उपान्तर भी है) अनुज्ञापत्र के रद्दकरण या निलम्बन को लागू होंगे ।
21. छूट देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार का यदि यह समाधान हो जाता है कि ऐसा करना लोकहित में आवश्यक या समीचीन है तो वह अधिसूचना द्वारा और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, नियेाजकों के किसी वर्ग या वर्गों को इस अध्याय के अधीन अनुज्ञापत्र अभिप्राप्त करने की अपेक्षा से छूट दे सकेगी ।
अध्याय 5
उत्प्रवास निकासी
22. उत्प्रवास निकासी के बारे में अपेक्षा, आदि-(1) भारत का कोई भी नागरिक तब तक उत्प्रवास नहीं करेगा, जब तक कि वह इस अध्याय के अधीन विहित रीति से और प्ररूप में उत्प्रवासी संरक्षी से उत्प्रवास के लिए प्राधिकार (ऐसे प्राधिकार को इसमें इसके पश्चात् उत्प्रवास निकासी कहा गया है) प्राप्त नहीं कर लेता है ।
(2) उत्प्रवास निकासी के लिए आवेदन विहित प्ररूप में होगा, उसमें विहित विशिष्टियां होंगी, और वह संबंधित उत्प्रवासी द्वारा उत्प्रवासी संरक्षी को किया जाएगा:
परन्तु ऐसा आवेदन भर्ती करने वाले अभिकर्ता के, यदि कोई हो, जिसके माध्यम से उत्प्रवासी की भर्ती की गई है या सम्बद्ध नियोजक के माध्यम से, किया जा सकेगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन प्रत्येक आवेदन के साथ, -
(क) उस नियोजन की बाबत करार की (विहित रीति में सत्यापित और अधिप्रमाणित) एक सही प्रति होगी जिसे स्वीकार करने के लिए आवेदक उत्प्रवास करने की प्रस्थापना करता है और जहां ऐसा करार सभी या किसी विहित विषय का उपबंध नहीं करता है वहां (विहित रीति में सत्यापित और अधिप्रमाणित) एक कथन संलग्न होगा जिसमें ऐसे विषय के संबंध में विशिष्टियों का उल्लेख किया जाएगा;
(ख) उन व्ययों की पूर्ति के लिए, जो उस दशा में उपगत किए जाए जब आवेदक के भारत वापस लौटने का प्रबन्ध करना आवश्यक हो जाए, प्रतिभूति के रूप में व्यवस्था के बारे में (विहित रीति में सत्यापित और अधिप्रमाणित) विवरण होगा;
(ग) विहित फीस के संदाय के साक्ष्य स्वरूप एक रसीद होगी;
(घ) ऐसी अन्य सुसंगत दस्तावेजें या दस्तावेजों की प्रतियां होंगी जो विहित की जाएं ।
(4) उत्प्रवासी संरक्षी, आवेदन में और आवेदन के साथ प्रस्तुत की गई अन्य दस्तावेजों में वर्णित विशिष्टियों की शुद्धता के बारे में अपना समाधान करने के पश्चात् विहित रीति से और प्ररूप में आवेदक के उत्प्रवास को प्राधिकृत कर सकेगा या लिखित आदेश द्वारा आवेदक को या, यथास्थिति, भर्ती करने वाले अभिकर्ता या नियोजक को, जिसके माध्यम से आवेदन किए गए हैं, कमियों के बारे में सूचित करेगा और उससे ऐसे समय के भीतर जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, उन कमियों को ठीक करने की अपेक्षा कर सकेगा या आवेदन को अस्वीकृत कर सकेगा ।
(5) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उत्प्रवासी संरक्षी इस धारा के अधीन निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक आधारों पर ही उत्प्रवास निकासी के आवेदन को अस्वीकृत कर सकेगा, किसी अन्य आधार पर नहीं, अर्थात्: -
(क) यह कि उस नियोजन के निबन्धन और शर्तें जिसे आवेदक स्वीकार करने की प्रस्थापना करता है, भेदभावपूर्ण या शोषणकारी हैं;
(ख) यह कि वह नियोजन जिसे आवेदक स्वीकार करने की प्रस्थापना करता है, इस प्रकार का है, जो भारत की विधि के अनुसार विधिविरुद्ध या भारत की लोकनीति के प्रतिकूल है या मानवीय प्रतिष्ठा और गरिमा के मानदण्डों का अतिक्रमण करता है;
(ग) यह कि आवेदक को काम या निवास की अवमानक परिस्थितियों में काम करना होगा;
(घ) यह कि उस देश या स्थान की, जहां आवेदक नियोजन स्वीकार करने की प्रस्थापना करता है, प्रवर्तमान परिस्थितियों को या उस नियोजक के, जिसके अधीन आवेदक नियोजन स्वीकार करने की प्रस्थापना करता है, पूर्ववृत्त या अन्य सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए, उत्प्रवास करना आवेदक के हित में नहीं होगा;
(ङ) यह कि ऐसे व्ययों की पूर्ति के लिए, जो उस दशा में उपगत करने आवश्यक हो सकते हैं जब आवेदक की भारत वापस लौटने की व्यवस्था आवश्यक हो जाए, कोई व्यवस्था या इंतजाम नहीं किया गया है या इस निमित्त की गई व्यवस्थाएं या इंतजाम इस प्रयोजन के लिए पर्याप्त नहीं हैं ।
(6) उत्प्रवास निकासी के आवेदन को अस्वीकृत करने वाले प्रत्येक आदेश में उस आधार या उन आधारों का, जिस पर वह आदेश किया गया है और उन तथ्यों या परिस्थितियों का जिन पर ऐसे आधार निर्भर करते हैं, स्पष्ट रूप से उल्लेख किया जाएगा ।
अध्याय 6
अपीलें
23. अपीलें-(1) कोई ऐसा व्यक्ति जो-
(क) रजिस्ट्रीकरण के लिए उसके आवेदन को अस्वीकृत करने वाले या कोई प्रतिभूति देने के लिए उससे अपेक्षा करने वाले या उसको जारी किए गए प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट किसी निबंधन या शर्त का (जो विहित निबंधन या शर्त नहीं है) अनुपालन करने की अपेक्षा करने वाले अथवा उसको जारी किए गए प्रमाणपत्र को निलंबित या रद्द करने वाले या उसका नवीकरण करने से इंकार करने वाले रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी के किसी आदेश से; या
(ख) किसी अनुज्ञापत्र के लिए उसके आवेदन को अस्वीकृत करने वाले या उसको जारी किए गए अनुज्ञापत्र में विनिर्दिष्ट किन्हीं निबन्धनों या शर्तों का (जो विहित निबंधन या शर्तें नहीं हैं) अनुपालन करने की अपेक्षा करने वाले अथवा उसको जारी किए गए अनुज्ञापत्र को निलंबित या रद्द करने वाले या उसकी विधिमान्यता की अवधि का विस्तार करने से इन्कार करने वाले सक्षम प्राधिकारी के किसी आदेश से; या
(ग) उत्प्रवास निकासी के लिए उसका आवेदन अस्वीकार करने वाले उत्प्रवासी संरक्षी के किसी आदेश से; या
(घ) इस अधिनियम के अधीन किसी प्रतिभूति, अतिरिक्त प्रतिभूति या नई प्रतिभूति देने की उससे अपेक्षा करने वाले या उसके द्वारा दी गई प्रतिभूति, अतिरिक्त प्रतिभूति या नई प्रतिभूति के प्रतिदाय के लिए (चाहे पूर्णतः या भागतः किसी भी दशा में) उसके दावे को समपहृत या नामंजूर करने वाले रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी या सक्षम प्राधिकारी या उत्प्रवासी संरक्षी या विहित प्राधिकारी के किसी आदेश से,
व्यथित है, वह ऐसे आदेश के विरुद्ध अपील ऐसी अवधि के भीतर, जो विहित की जाए, केन्द्रीय सरकार को करेगा ।
(2) कोई अपील, यदि वह उसके लिए विहित अवधि की समाप्ति के पश्चात् की जाती है तो ग्रहण नहीं की जाएगी:
परन्तु कोई अपील उसके लिए विहित अवधि की समाप्ति के पश्चात् ग्रहण की जा सकेगी यदि अपीलार्थी केन्द्रीय सरकार का यह समाधान कर देता है कि उसके पास उस अवधि के भीतर अपील न करने का पर्याप्त हेतुक था ।
(3) अपील के लिए विहित अवधि की संगणना परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के अधीन अवधियों की संगणना की बाबत उसके उपबन्धों के अनुसार की जाएगी ।
(4) इस धारा के अधीन प्रत्येक अपील ऐसे प्ररूप में की जाएगी जो विहित किया जाए और उसके साथ उस आदेश की एक प्रति, जिसके विरुद्ध अपील की गई है और ऐसी फीस, जो विहित की जाए, संलग्न होगी ।
(5) अपील को निपटाने की प्रक्रिया (जिसके अन्तर्गत आगे और विचार के लिए उस प्राधिकारी को, जिसके आदेश के विरुद्ध अपील की गई है विषय का प्रतिप्रेषण भी है) ऐसी होगी, जो विहित की जाए:
परन्तु कोई भी अपील निपटाई जाने से पूर्व अपीलार्थी को अपने मामले को अभ्यावेदित करने के लिए युक्तियुक्त अवसर दिया जाएगा ।
(6) ऐसे आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्टि करने वाला, उपान्तरण करने वाला या उसे उलटने वाला, इस धारा के अधीन अपील में किया गया प्रत्येक आदेश अन्तिम होगा ।
अध्याय 7
अपराध और शास्तियां
24. अपराध और शास्तियां-(1) जो कोई-
(क) इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार के सिवाय उत्प्रवास करेगा; या
(ख) धारा 10 या धारा 16 के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा; या
(ग) साशय कोई मिथ्या सूचना देकर या कोई तात्त्विक सूचना छिपाकर इस अधिनियम के अधीन कोई प्रमाणपत्र या अनुज्ञापत्र या उत्प्रवास निकासी अभिप्राप्त करेगा; या
(घ) विधिपूर्ण प्राधिकार के बिना प्रमाणपत्र या अनुज्ञापत्र या दस्तावेज या पृष्ठांकन में इस अधिनियम के अधीन जारी की गई या दी गई उत्प्रवास निकासी के रूप में कोई परिवर्तन करेगा या करवाएगा; या
(ङ) इस अधिनियम के अधीन उत्प्रवासी संरक्षी के आदेश का अनुपालन करने में अवज्ञा या उपेक्षा करेगा; या
(च) उत्प्रवासी से इस अधिनियम के अधीन विहित सीमा से अधिक प्रभार लेगा; या
(छ) किसी उत्प्रवासी से छल करेगा,
वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा:
परन्तु ऐसे किन्हीं विशेष और यथायोग्य कारणों के अभाव में, जिनका वर्णन न्यायालय के निर्णय में किया जाएगा, ऐसा कारावास छह मास से कम का न होगा और ऐसा जुर्माना एक हजार रुपए से कम का न होगा ।
(2) जो कोई उपधारा (1) के अधीन कोई अपराध करने का प्रयत्न करेगा, वह ऐसे अपराध के लिए उस उपधारा के अधीन उपबंधित दण्ड से दण्डनीय होगा ।
(3) जो कोई ऐसे किसी निबंधन या शर्त का उल्लंघन करेगा जिसके अधीन रहते हुए इस अधिनियम के अधीन कोई उत्प्रवास निकासी दी गई है, यदि ऐसे उल्लघंन के लिए इस अधिनियम में अन्यत्र कोई अन्य दण्ड उपबंधित नहीं किया गया है, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(4) जो कोई इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का दुष्प्रेरण करेगा वह, यदि दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया जाएगा, तो उस अपराध के लिए उपबन्धित दण्ड से दण्डनीय होगा ।
(5) जो कोई इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के अधीन किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किए जाने पर उसी उपबन्ध के अधीन किसी अपराध के लिए पुनः दोषसिद्ध किया जाएगा वह दूसरे और ऐसे प्रत्येक पश्चात्वर्ती अपराध के लिए, उस अपराध के लिए उपबन्धित शास्ति से दुगुनी शास्ति से दण्डनीय होगा ।
25. कम्पनी द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया जाता है वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दण्ड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, तथा
(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
26. अपराध का संज्ञेय होना-दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन सभी अपराध संज्ञेय होंगे ।
27. केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी का आवश्यक होना-इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध की बाबत किसी भी व्यक्ति के विरुद्ध कोई भी अभियोजन केन्द्रीय सरकार या ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी की पूर्व मंजूरी के बिना नहीं चलाया जाएगा, जो इस निमित्त उस सरकार द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत किया जाए:
परन्तु जब कोई अपराध किसी उत्प्रवासी या किसी आशयित उत्प्रवासी के बारे में किया गया हो और परिवाद ऐसे उत्प्रवासी या आशयित उत्प्रवासी द्वारा या ऐसे उत्प्रवासी या आशयित उत्प्रवासी की ओर से पिता, माता, पति, पत्नी, पुत्र, पुत्री, भाई, बहन या ऐसे उत्प्रवासी या आशयित उत्प्रवासी के संरक्षक द्वारा, अथवा यदि ऐसा उत्प्रवासी या आशयित उत्प्रवासी अविभक्त हिन्दू कुटुम्ब का सदस्य है तो उस कुटुम्ब के कर्ता द्वारा, फाइल किया गया है, तब किसी मंजूरी की अपेक्षा नहीं होगी ।
28. दण्ड का किसी अन्य कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव न होना-इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए दण्ड के अधिनिर्णय से किसी ऐसी कार्रवाई पर, जो ऐसे उल्लंघन के संबंध में, इस अधिनियम के अधीन की गई है, या की जा सकेगी, कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
अध्याय 8
प्रकीर्ण
29. इस बाबत अवधारण कि क्या कोई व्यक्ति उत्प्रवासी है-जहां किसी उत्प्रवासी संरक्षी के समक्ष यह प्रश्न उद्भूत होता है कि क्या भारत से प्रस्थान करने का आशय रखने वाला कोई व्यक्ति उत्प्रवासी है या नहीं, तो उस प्रश्न का विनिश्चय उत्प्रवासी संरक्षी ऐसी रीति से, ऐसी जांच करने के पश्चात् और ऐसे साक्ष्य पर जो विहित किया जाए, और ऐसे अन्य साक्ष्य पर, जो सुसंगत हो, विचार करने के पश्चात्, करेगा और ऐसा विनिश्चय ऐसे व्यक्ति को विहित रीति में संसूचित करेगा ।
30. सर्व-साधारण आदि के हित में किसी देश को उत्प्रवास प्रतिषिद्ध करने की शक्ति-(1) जहां केन्द्रीय सरकार के पास यह विश्वास करने का कारण है कि भारत की प्रभुता और अखंडता, भारत की सुरक्षा, भारत के किसी विदेश के साथ मित्रतापूर्ण सम्बन्धों या सर्व साधारण के हितों को ध्यान में रखते हुए किसी देश के लिए उत्प्रवास को प्रतिषिद्ध करने के लिए पर्याप्त आधार विद्यमान हैं वहां वह उस देश के लिए उत्प्रवास को अधिसूचना द्वारा प्रतिषिद्ध कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना छह मास से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, प्रभावी होगी:
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार के पास यह विश्वास करने का कारण है कि उपधारा (1) में वर्णित आधार विद्यमान बने हुए हैं तो वह समय-समय पर अधिसूचना द्वारा ऐसी अवधि के लिए जो प्रत्येक अवसर पर छह मास से अधिक नहीं होगी, जैसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, उस देश के लिए उत्प्रवास को प्रतिषिद्ध कर सकेगी ।
31. किसी देश में महामारी, सिविल उपद्रवों आदि के फैलने के कारण उत्प्रवास का प्रतिषेध करने की शक्ति-(1) जहां केन्द्रीय सरकार के पास यह विश्वास करने का कारण है कि-
(क) आशयित उत्प्रवासियों को, यदि किसी ऐसे देश को उत्प्रवास करने की अनुज्ञा दी गई, जहां उनके पहुंचने पर उनके जीवन के लिए, -
(i) ऐसे देश में किसी बीमारी के फैलने या वातावरण के प्रदूषण, या
(ii) संघर्ष या गृह युद्ध या सिविल अशांति या राजनैतिक उपद्रव के कारण,
गंभीर जोखिम पैदा हो जाएगी;
(ख) भारत के उस देश के साथ राजनयिक सम्बन्ध न होने के कारण भेदभाव, दुर्व्यवहार और शोषण से उत्प्रवासियों का संरक्षण करना सम्भव नहीं है,
वहां वह अधिसूचना द्वारा, उस देश के लिए उत्प्रवास को प्रतिषिद्ध कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना छह मास से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, प्रभावी होगी:
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार के पास यह विश्वास करने का कारण है कि उपधारा (1) में वर्णित कोई उधार विद्यमान बना हुआ है तो वह समय-समय पर अधिसूचना द्वारा ऐसी और अवधि के लिए, जो प्रत्येक अवसर पर छह मास से अधिक नहीं होगी, जैसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, उस देश के लिए उत्प्रवास को प्रतिषिद्ध कर सकेगी ।
32. किसी वर्ग या प्रवर्ग के व्यक्तियों के उत्प्रवास को प्रतिषिद्ध करने की शक्ति-(1) जहां केन्द्रीय सरकार का यह विचार है कि सर्वसाधारण के हित में किसी वर्ग या प्रवर्ग के व्यक्तियों का किसी देश में उत्प्रवास, उनकी आयु, लिंग या अन्य सुसंगत तथ्यों को ध्यान में रखते हुए प्रतिषिद्ध किया जाना चाहिए तो वह, अधिसूचना द्वारा, ऐसे वर्ग या प्रवर्ग के व्यक्तियों के, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, उस देश के लिए उत्प्रवास को प्रतिषिद्ध कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना छह मास से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, प्रभावी होगी:
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार के पास यह विश्वास करने का कारण है कि उपधारा (1) में वर्णित आधारों में से कोई आधार विद्यमान बना हुआ है तो वह समय-समय पर अधिसूचना द्वारा ऐसी अवधि के लिए, जो प्रत्येक अवसर पर छह मास से अधिक नहीं होगी, जैसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, उस देश के लिए उत्प्रवास को प्रतिषिद्ध कर सकेगी ।
33. प्रतिभूति के बारे में उपबन्ध-(1) कोई ऐसी प्रतिभूति या अन्य वित्तीय उपबन्ध, जो इस अधिनियम के अधीन किए जाने के लिए अपेक्षित हो, उस प्रयोजन को ध्यान में रखते हुए, जिसके लिए ऐसी प्रतिभूति या अन्य वित्तीय उपबन्ध किए जाने के लिए अपेक्षित है, युक्तियुक्त होगा ।
(2) विहित प्राधिकारी, किसी ऐसे व्यक्ति को, जिसने किसी प्रयोजन के लिए कोई प्रतिभूति दी है, विहित रीति से सूचना देने के पश्चात् और ऐसे व्यक्ति को अपने मामले का व्यपदेशन करने का अवसर देने के पश्चात्, लिखित आदेश द्वारा, निदेश दे सकेगा कि ऐसी संपूर्ण प्रतिभूति या उसका कोई भाग ऐसे प्रयोजन के लिए उपयोग किए जाने के लिए और ऐसी रीति से, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, समपहृत कर लिया जाए ।
(3) जहां विहित प्राधिकारी को यह प्रतीत होता है कि इस अधिनियम के अधीन किसी व्यक्ति द्वारा किसी प्रयोजन के लिए दी गई प्रतिभूति किसी कारणवश अपर्याप्त हो गई है, या किसी भी कारणवश उपलभ्य नहीं रही है तो विहित प्राधिकारी, उसे अपने मामले का व्यपदेशन करने का अवसर देने के पश्चात् लिखित आदेश द्वारा ऐसे व्यक्ति से, यथास्थिति, ऐसी अतिरिक्त प्रतिभूति या ऐसी नई प्रतिभूति जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, देने की अपेक्षा कर सकेगा ।
34. प्रतिभूति का लौटाया जाना-इस अधिनियम के अधीन दी गई कोई भी प्रतिभूति उस समय, यथास्थिति, लौटा दी जाएगी या निर्मुक्त कर दी जाएगी, जब वह उस प्रयोजन के लिए जिसके लिए वह दी गई थी, अपेक्षित नहीं रह जाती है और अन्य परिस्थिति, जिनमें और वह रीति जिसमें इस अधिनियम के अधीन दी गई कोई प्रतिभूति लौटाई जा सकेगी या निर्मुक्त की जा सकेगी, ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।
35. व्यक्तियों, सवारियों, आदि की तलाशी लेने, अभिग्रहण और निरोध करने की शक्ति-ऐसी सभी शक्तियों का, जो तत्समय सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) द्वारा किन्हीं व्यक्तियों, जलयानों या वायुयानों या किसी अन्य प्रवहण की तलाशी और निरोध या किसी दस्तावेज या वस्तु के अभिग्रहण या किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी की बाबत या अन्यथा उस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के निवारण या पता चलाने के प्रयोजन के लिए अथवा ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए, जिसकी बाबत यह संदेह है कि उसने उस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किया है, सीमाशुल्क अधिकारियों को प्रदान की गई है, इस अधिनियम के विरुद्ध किसी अपराध के निवारण या पता चलाने के प्रयोजन के लिए या ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार करने के लिए, जिसकी बाबत यह संदेह है कि उसने इस अधिनियम के विरुद्ध कोई अपराध किया है,-
(क) ऐसे किसी सीमाशुल्क अधिकारी द्वारा, या
(ख) उत्प्रवासी महासंरक्षी या उत्प्रवासी संरक्षी द्वारा, या
(ग) उत्प्रवास जांच चौकी के भारसाधक द्वारा,
प्रयोग किया जा सकेगा ।
36. विवरणियां और रजिस्टर-(1) भर्ती करने वाला प्रत्येक अभिकर्ता ऐसे रजिस्टर और अन्य अभिलेख रखेगा और विहित प्राधिकारियों को ऐसी कालिक या अन्य विवरणियां प्रस्तुत करेगा जो विहित की जाएं ।
(2) उत्प्रवासी महासंरक्षी, रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी, या सक्षम प्राधिकारी, उत्प्रवासी संरक्षी, आदेश द्वारा, किसी भर्ती करने वाले अभिकर्ता से कोई अन्य विवरणी या जानकारी मंगा सकेगा ।
(3) उत्प्रवासी महासंरक्षी, रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी, सक्षम प्राधिकारी, या उत्प्रवासी संरक्षी या किसी उत्प्रवास जांच चौकी का भारसाधक अधिकारी उपधारा (1) के अधीन भर्ती करने वाले किसी अभिकर्ता द्वारा रखे गए किसी रजिस्टर या अन्य अभिलेख का निरीक्षण कर सकेगा और ऐसे निरीक्षण के प्रयोजनों के लिए युक्तियुक्त समय पर भर्ती करने वाले किसी अभिकर्ता के कारबार परिसरों में प्रवेश कर सकेगा ।
37. प्राधिकारियों और अधिकारियों को सिविल न्यायालय की कुछ शक्तियां होना-(1) उत्प्रवासी महासंरक्षी, रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी, सक्षम प्राधिकारी और प्रत्येक उत्प्रवासी संरक्षी को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के प्रयोजन के लिए, वही शक्तियां होंगी जो निम्नलिखित विषयों के संबंध में किसी वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -
(क) साक्षियों को समन करना और उनको हाजिर कराना;
(ख) किसी दस्तावेज का प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपि की अपेक्षा करना;
(घ) शपथपत्रों पर साक्ष्य लेना;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।
(2) उत्प्रवासी महासंरक्षी, रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी, या सक्षम प्राधिकारी या उत्प्रवासी संरक्षी के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत न्यायिक कार्यवाही होगी और उत्प्रवासी महासंरक्षी, रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी, सक्षम प्राधिकारी और प्रत्येक उत्प्रवासी संरक्षी को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय माना जाएगा ।
38. निदेश देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के किसी उपबन्ध को कार्यान्वित करने के बारे में उत्प्रवासी महासंरक्षी, रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी, सक्षम प्राधिकारी या उत्प्रवासी संरक्षी को निदेश दे सकेगी ।
39. अन्य विधियों का प्रभाव-(1) इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम के उपबन्ध इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति में या इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति के आधार पर प्रभाव रखने वाले किसी करार या अन्य लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।
(2) उपधारा (1) में जो उपबंधित है उसके सिवाय इस अधिनियम के उपबन्ध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अतिरिक्त, न कि उसके अल्पीकरण में, होंगे ।
40. प्रत्यायोजन-केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि किसी ऐसी शक्ति या कृत्य का, -
(क) जिसका प्रयोग या निर्वहन इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा किया जा सकता है, या
(ख) जिसका प्रयोग या निर्वहन इस अधिनियम के अधीन किसी रजिस्ट्रीकर्ता प्राधिकारी, सक्षम प्राधिकारी या उत्प्रवासी संरक्षी द्वारा किया जा सकता है,
ऐसे विषयों के सम्बन्ध में और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो वह अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करे, प्रयोग या निर्वहन निम्नलिखित द्वारा भी किया जा सकेगा: -
(i) ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, जो केन्द्रीय सरकार के अधीनस्थ हो, या
(ii) किसी राज्य सरकार द्वारा या ऐसी राज्य सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा, या
(iii) किसी ऐसे विदेश में जिसमें भारत का कोई राजनयिक मिशन नहीं है, ऐसे विदेशी कौन्सलीय कार्यालय द्वारा,
जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।
41. छूट देने की शक्ति-(1) जहां केन्द्रीय सरकार का, उसको किए गए किसी निर्देश पर या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि-
(क) किसी विदेश के साथ मित्रतापूर्ण संबंधों को; अथवा
(ख) उत्प्रवासियों के लिए रहन-सहन और कार्य करने की स्तरीय दशाओं की व्यवस्था करने की किसी विदेशी नियोजक या किसी वर्ग के विदेशी नियोजकों की ज्ञात ख्याति को और उसकी भर्ती की पद्धति तथा नियोजन की शर्तों को; अथवा
(ग) किसी लोक उपक्रम या किसी अनुमोदित समुत्थान द्वारा विदेश में अपनी परियोजनाओं के निष्पादन के लिए अपनाई गई भर्ती की पद्धतियों और उपबन्धित की गई नियोजन की शर्तों को; अथवा
(घ) विदेश में तैनात सरकारी अधिकारियों द्वारा अपने साथ ले जाए गए अपने घरेलू नौकरों को, जहां ऐसे घरेलू नौकरों की यात्रा की बाबत व्यय सरकार द्वारा वहन किया जाता है, दी गई सुविधाओं और सेवा की शर्तों को; और
(ङ) अन्य सब सुसंगत बातों को,
ध्यान में रखते हुए ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है वहां केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसे विदेशी उच्च पदधारी या किसी वर्ग के विदेशी नियोजकों या लोक उपक्रम, अनुमोदित समुत्थान या सरकारी अधिकारियों को इस अधिनियम के सभी या किन्हीं उपबन्धों के प्रवर्तन से छूट दे सकेगी ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजन के लिए-
(क) लोक उपक्रम" से निम्नलिखित अभिप्रेत है, -
(i) सरकार के स्वामित्वाधीन और नियंत्रणाधीन वाला उपक्रम; या
(ii) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित सरकारी कंपनी; या
(iii) किसी केन्द्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम के द्वारा या अधीन स्थापित कोई निगमित निकाय;
(ख) अनुमोदित समुत्थान" से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन निगमित ऐसी कंपनी या भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932 का 9) के अधीन रजिस्ट्रीकृत भागीदारी फर्म या सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) या सोसाइटियों में संबंधित किसी राज्य में तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत सोसाइटी या किसी केन्द्रीय, प्रान्तीय या राज्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई सहकारी सोसाइटी, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस धारा के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित करे, अभिप्रेत है ।
(2) यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि भारत और किसी विदेश या विदेशों के बीच किसी सन्धि, करार या कन्वेंशन को कार्यान्वित करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है तो वह, अधिसूचना द्वारा, और ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, अधीन रहते हुए, साधारणतया या ऐसे प्रयोजनों के लिए जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, ऐसे प्राधिकारियों, अभिकरणों या व्यक्तियों द्वारा, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, भर्ती को इस अधिनियम के सभी या किन्हीं उपबन्धों के प्रवर्तन से छूट दे सकेगी ।
42. अधिनियम का कतिपय उत्प्रवासियों को लागू न होना-इस अधिनियम की कोई भी बात निम्नलिखित को लागू नहीं मानी जाएगी-
(क) ऐसे किसी व्यक्ति की भर्ती या उत्प्रवास, जो भारत का नागरिक नहीं है;
(ख) उन विदेशी राज्यों की सेवा के लिए, जिनको विदेशी भर्ती अधिनियम, 1874 (1874 का 4) लागू होता है, भारत में भर्ती के नियंत्रण को ।
43. नियम बनाने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए, अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए नियुक्त अधिकारियों और कर्मचारियों की शक्तियां और कर्तव्य तथा उनकी सेवाओं के निबंधन और शर्तें:
(ख) निम्नलिखित के प्ररूप: -
(i) भर्ती का कारबार प्रारम्भ करने या चलाने के लिए प्रमाणपत्र और उसके जारी किए जाने या नवीकरण के लिए आवेदन;
(ii) भारत के बाहर नियोजन के लिए व्यक्तियों को भर्ती के लिए अनुज्ञापत्र और उसके जारी किए जाने के लिए आवेदन;
(iii) उत्प्रवास निकासी के लिए आवेदन;
(iv) केन्द्रीय सरकार को की जाने वाली अपील;
(ग) वह रीति और प्ररूप जिसमें उत्प्रवास निकासी के रूप में प्राधिकार दिया जा सकेगा;
(घ) वे विशिष्टियां जो प्रमाणपत्र या अनुज्ञापत्र के लिए या उत्प्रवास निकासी के लिए आवेदन में होंगी;
(ङ) वह रीति जिसमें इस अधिनियम के अधीन की जाने के लिए अपेक्षित विभिन्न जांचें की जा सकेंगी;
(च) वह रीति जिसमें प्रमाणपत्र या अनुज्ञापत्र के निबंधनों और शर्तों का सम्यक् पालन सुनिश्चित करने के लिए या इस अधिनियम के उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए प्रतिभूति की रकम दी जाएगी;
(छ) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए दस्तावेजों और दस्तावेजों की प्रतियों को सत्यापित या अधिप्रमाणित करने की रीति;
(ज) केन्द्रीय सरकार को की गई अपील की सुनवाई में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया;
(झ) इस अधिनियम के अधीन आवेदन और अन्य विषयों के संबंध में संदत्त की जाने वाली फीसें;
(ञ) वे प्रभार जो भर्ती करने वाला अभिकर्ता की गई सेवाओं के संबंध में उत्प्रवासी से वसूल कर सकेगा और ऐसे प्रभारों के मान और परिसीमाएं;
(ट) वे निबंधन और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए प्रमाणपत्र या अनुज्ञापत्र या उत्प्रवास निकासी इस अधिनियम के अधीन जारी की जा सकेगी;
(ठ) इस अधिनियम के अधीन जारी किए गए प्रमाणपत्र या अनुज्ञापत्र की वैधता की कालावधि;
(ड) वह प्राधिकारी जो इस अधिनियम के अधीन किसी अनुज्ञापत्र की विधिमान्यता की अवधि बढ़ाने या प्रतिभूति समपहृत करने या किसी अतिरिक्त प्रतिभूति या नई प्रतिभूति की अपेक्षा करने के लिए समक्ष है;
(ढ) उत्प्रवासियों के कल्याण, सुरक्षा और संरक्षण के लिए दी जाने वाली वास सुविधा, सामान, चिकित्सा सामान और कर्मचारिवृन्द, जीवन रक्षक और सफाई संबंधी व्यवस्थाएं और अन्य सामान और व्यवस्था तथा किसी उत्प्रवासी प्रवहण में रखे जाने वाले अभिलेख;
(ण) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
44. अधिसूचनाओं और नियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (ण), धारा 30, धारा 31 या धारा 32 के अधीन जारी जारी कि गई प्रत्येक अधिसूचना और धारा 43 के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, जारी की जाने या बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी या उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचना या नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह अधिसूचना जारी नहीं की जानी चाहिए या यह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात्, यथास्थिति, वह अधिसूचना या नियम ऐसे उपांतरित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा । किन्तु अधिसूचना या नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
45. 1922 के अधिनियम 7 का निरसन-उत्प्रवास अधिनियम, 1922 इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
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