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राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 ( State Financial Corporation Act, 1951 )


 

राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951

(1951 का अधिनियम संख्यांक 63)

[31 अक्तूबर, 1951]

राज्य वित्तीय निगमों की स्थापना के लिए

उपबंध करने के लिए

अधिनियम

संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 कहा जा सकेगा

(2) इसका विस्तार ॥। सम्पूर्ण भारत पर है

(3) यह किसी राज्य में उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो, -

() बोर्ड" से वित्तीय निगम का निदेशक बोर्ड अभिप्रेत है;

 [(कक) विकास बैंक" से भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 (1964 का 18) के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अभिप्रेत है;]

 [() वित्तीय निगम" से धारा 3 के अधीन स्थापित वित्तीय निगम अभिप्रेत है और धारा 3 के अधीन स्थापित संयुक्त वित्तीय निगम इसके अन्तर्गत है;]

 [() औद्योगिक समुत्थान" से कोई ऐसा समुत्थान अभिप्रेत है जो-

(i) माल के विनिर्माण, परिरक्षण या प्रसंस्करण में,

 [(ii) खनन या खानों के विकास में;]

(iii) होटल उद्योग में,

(iv) सड़क या जलमार्ग या वायुमार्ग [या रज्जुमार्ग या लिफ्ट] द्वारा यात्रियों या माल के परिवहन में,

(v) विद्युत् या किसी अन्य प्रकार की शक्ति के उत्पादन या वितरण में,

(vi) किसी भी वर्णन की मशीनरी के या यानों या जलयानों या मोटर-बोटों या ट्रेलरों या ट्रेक्टरों के अनुरक्षण, मरम्मत, परीक्षण या सेवाई में,

(vii) मशीनरी या शक्ति की सहायता से किसी वस्तु के समंजन, मरम्मत या पैकिंग में,

8[[(viii) औद्योगिक क्षेत्र या औद्योगिक संपदा की स्थापना या विकास में;];

 

(ix) मछली पकड़ने में या मछली पकड़ने के लिए तटवर्ती सुविधाएं उपलब्ध करने में या उनके अनुरक्षण में; ॥।

 [(x) तुला चौकी सुविधाएं उपलब्ध कराने में;

(xi) उद्योग के लिए इंजीनियरी, तकनीकी, वित्तीय, प्रबंध, विपणन या अन्य सेवाएं अथवा सुविधाएं उपलब्ध कराने में;

(xii) चिकित्सा, स्वास्थ्य या अन्य सहबद्ध सेवाएं उपलब्ध कराने में;

(xiii) सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार या इलेक्ट्रॉनिक्स जिसके अन्तर्गत उपग्रह संयोजन और श्रव्य या दृश्य केबल संचार भी हैं, से संबंधित साफ्टवेयर या हार्डवेयर सेवाएं उपलब्ध कराने में;

(xiv) पर्यटन संबंधी सुविधाओं को, जिसके अन्तर्गत पर्यटकों के लिए मनोरंजन उद्यान, सभा केन्द्र, रेस्टोरेंट, यात्रा और परिवहन (वायुपत्तनों पर भी), पर्यटक सेवा अभिकरण और मार्गदर्शन और परामर्शी सेवाएं भी हैं, आरंभ करने या उनका विकास करने में;

(xv) सन्निर्माण में;

(xvi) सड़कों का विकास, अनुरक्षण और सन्निर्माण में;

(xvii) वाणिज्यिक कांप्लेक्स सुविधा और सामुदायिक केन्द्र, जिसके अन्तर्गत सम्मेलन भवन भी है, उपलब्ध कराने में;

(xviii) पुष्प कृषि में;

(xix) ऊतक पालन, मत्स्य पालन, कुक्कुट पालन, प्रजनन और अंडज उत्पत्तिशाला में;

(xx) सेवा उद्योग, जैसे कि किसी वस्तु या पदार्थ के उपयोग, विक्रय, परिवहन, परिदान या व्ययन को ध्यान में रखते हुए उसमें परिवर्तन, अलंकरण, पालिशिंग, परिष्करण, तेल देना, धुलाई, सफाई या अन्यथा उपचार करने अथवा अंगीकृत करने में;

(xxi) पूर्वोक्त विषयों में से किसी विषय के संबंध में किसी संकल्पना, प्रौद्योगिकी, डिजाइन, प्रक्रिया या उत्पाद का अनुसंधान और विकास करने में, जिसके अन्तर्गत लघु उद्योग बैंक द्वारा अनुमोदित कोई क्रियाकलाप भी है; अथवा

(xxii) ऐसा अन्य क्रियाकलाप करने में, जो लघु उद्योग बैंक द्वारा अनुमोदित किया जाए,]

लगा हुआ है या लगने वाला है

 [स्पष्टीकरण 1]-माल का प्रसंस्करण" पद के अन्तर्गत किसी पदार्थ पर किसी शारीरिक, यांत्रिक, रासायनिक, वैद्युत या इसी प्रकार की किसी अन्य क्रिया के द्वारा कोई वस्तु उत्पादित करने, तैयार करने या बनाने के लिए कोई कारीगरी या प्रक्रिया भी है

 [स्पष्टीकरण 2-यदि इस संबंध में कोई संदेह उत्पन्न होता है कि क्या कोई समुत्थान औद्योगिक समुत्थान है या नहीं तो उसे उसके विनिश्चय के लिए 2[लघु उद्योग बैंक] को निर्देशित किया जाएगा और उस पर 2[लघु उद्योग बैंक] का विनिश्चय अंतिम होगा;]

() विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

 [(घक) पब्लिक सेक्टर बैंक" पद से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में परिभाषित कोई समनुषंगी बैंक, बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित कोई तत्स्थानी नया बैंक अभिप्रेत है ;]

() रिजर्व बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है;

() अनुसूचित बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की द्वितीय अनुसूची में तत्समय अन्तर्गत कोई बैंक अभिप्रेत है;

 [(चक) लघु उद्योग बैंक" से भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 (1989 का 39) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अभिप्रेत है;]

 [ [(चख)] राज्य सहकारी बैंक" का वही अर्थ होगा जो उसे भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 2 के खण्ड () में दिया गया है;]

2[(चग) संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में राज्य सरकार" से उसका प्रशासक अभिप्रेत है;]

() हामीदारी" से किसी औद्योगिक समुत्थान के स्टाकों, शेयरों, बंधपत्रों या डिबेंचरों के लिए, उन सबके या उनके किसी भाग के पुनर्विक्रय की दृष्टि से प्रतिश्रुति करने की सशर्त या अशर्त संविदा करना अभिप्रेत है

अध्याय 2

राज्य वित्तीय निगमों का निगमन, उनकी पूंजी और प्रबंध

3. राज्य वित्तीय निगमों की स्थापना-(1) राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा राज्य के लिए ऐसे नाम के अधीन जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए एक वित्तीय निगम स्थापित कर सकेगी

                (2) यह वित्तीय निगम उपधारा (1) के अधीन अधिसूचित नाम का शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा जिसे इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए सम्पत्ति के [अर्जन, धारण और व्ययन] करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद ला सकेगा और उस पर वाद लाया जा सकेगा

 [3. संयुक्त वित्तीय निगमों की स्थापना-(1) धारा 3 में किसी बात के होते हुए भी दो या अधिक राज्य  [लघु उद्योग बैंक] से परामर्श करने के पश्चात् ऐसा करार कर सकेंगे कि उस करार में सम्मिलित होने वाले राज्यों के समूह के लिए एक वित्तीय निगम होगा और यदि वह करार उन राज्यों में से प्रत्येक के राजपत्र में प्रकाशित हो जाए तो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उन राज्यों की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए ऐसे नाम के अधीन जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए एक संयुक्त वित्तीय निगम स्थापित कर सकेगी

(2) सम्मिलित होने वाले राज्यों के बीच उपधारा (1) के अधीन अन्तरराज्यिक करार में-

() संयुक्त वित्तीय निगम की प्राधिकृत पूंजी, उन पूर्णतः समादत्त शेयरों की जिनमें वह विभाजित की जाएगी संख्या नियत करने के लिए, और धारा 4 की उपधारा (3) के खण्ड () के अधीन वितरित किए जाने वाले शेयरों के सम्मिलित होने वाले राज्यों में आबंटन के लिए उपबंध हो सकेगा;

() धारा 6 या धारा 7 [या धारा 8] के अधीन प्रत्याभूति के लिए दायित्व में अंश बटाने के लिए उपबंध हो सकेगा;

() प्रत्येक सम्मिलित होने वाली राज्य सरकार द्वारा बोर्ड में नामनिर्देशित किए जाने वाले निदेशकों की संख्या के लिए उपबंध हो सकेगा;

() संयुक्त वित्तीय निगम के संबंध में व्यय के, सम्मिलित होने वाले राज्यों के बीच, प्रभाजन के लिए उपबंध हो सकेगा;

                                                                                                                                                                                      () इस बात का अवधारण हो सकेगा कि इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार के अनेक कृत्यों का सम्मिलित होने वाली राज्य सरकारों में से किस के द्वारा निष्पादन किया जाएगा; और संयुक्त वित्तीय निगम के संबंध में इस अधिनियम में राज्य सरकार के प्रति निर्देशों का अर्थ, अन्यथा स्पष्टतः उपबंधित के सिवाय तदनुकूल किया जाएगा;

() सम्मिलित होने वाले राज्यों के बीच सामान्यतया या इस अधिनियम के अधीन पैदा होने वाले विशिष्ट मामलों के संबंध में परामर्श के लिए उपबंध हो सकेगा;

() इस अधिनियम से असंगत होने वाले ऐसे आनुषंगिक और पारिणामिक उपबंध हो सकेंगे जो करार को प्रभावी करने के लिए आवश्यक या समीचीन समझे जाएं

(3) संयुक्त वित्तीय निगम उपधारा (1) के अधीन अधिसूचित नाम का शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा जिसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए सम्पत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद ला सकेगा और उस पर वाद लाया जा सकेगा

(4) दो या अधिक राज्यों के लिए स्थापित संयुक्त वित्तीय निगम के संबंध में इस अधिनियम में राज्य" के प्रति किसी निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह ऐसे प्रत्येक राज्य के प्रति निर्देश है ]

4. शेयर पूंजी और शेयर धारक- [(1) वित्तीय निगम की प्राधिकृत पूंजी ऐसी राशि होगी जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त नियत की जाए किन्तु वह पचास लाख रुपए से कम या पांच अरब रुपए से अधिक नहीं होगी:

परन्तु राज्य सरकार, लघु उद्योग बैंक की सफिरिश पर, प्राधिकृत पूंजी को राजपत्र में अधिसूचना द्वारा दस अरब रुपए तक बढ़ा सकेगी

(2) धारा 4 के उपबंधों के अधीन रहते हुए प्राधिकृत पूंजी एक ही अंकित मूल्य के उतनी संख्या में पूर्णतः समादत शेयरों और एक ही अंकित मूल्य के उतनी संख्या में पूर्णतः समादत मोचनीय अधिमानी शेयरों में विभाजित की जाएगी और उपधारा (3) के खंड (), खंड () और खंड () में वर्णित पक्षकारों को निर्गमित की जाएगी तथा उक्त उपधारा के खंड () में निर्दिष्ट पक्षकारों की दशा में ऐसे शेयर ऐसे समय और ऐसी रीति में निर्गमित किए जाएंगे जैसा राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अवधारित करे

(3) बोर्ड, राज्य सरकार और लघु उद्योग बैंक के अनुमोदन के अधीन रहते हुए, उन शेयरों की संख्या अवधारित करेगा जो क्रमशः निम्नलिखित में वितरित किए जाएंगे: -

() राज्य सरकार;

() लघु उद्योग बैंक;

() पब्लिक सेक्टर बैंक, जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय जीवन बीमा निगम, केन्द्रीय सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन अन्य बीमा कम्पनियां, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन अन्य संस्थाएं; और

() खंड () या खण्ड () या खण्ड () में निर्दिष्ट पक्षकारों से भिन्न पक्षकार:

परन्तु खंड () में निर्दिष्ट पक्षकारों को आबंटित किए जा सकने वाले शेयरों की संख्या किसी भी दशा में कुल निर्गमित साधारण शेयरों की संख्या के उनचास प्रतिशत से अधिक नहीं होगी:

परन्तु यह और कि निर्गमित साधारण पूंजी में कोई वृद्धि इस रीति से नहीं की जाएगी कि खंड () या खंड () या खंड () में निर्दिष्ट पक्षकार कुल मिलाकर किसी भी समय पर वित्तीय निगम की निर्गमित साधारण पूंजी का इक्यावन प्रतिशत से कम धारण करें ]

(4) इस धारा के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, उपधारा (3) के खंड () और () में निर्दिष्ट पक्षकारों के बीच शेयरों के वितरण के लिए निश्चय और ऐसे शेयरों का आबंटन वित्तीय निगम द्वारा ऐसी रीति से किया जाएगा जो विहित की जाए

 [(5) यदि उपधारा (3) के खंड () और खंड () में निर्दिष्ट पक्षकारों में से किसी को वितरण के लिए निश्चित किन्हीं शेयरों के लिए प्रतिश्रुति नहीं की जाती है तो उनके लिए प्रतिश्रुति राज्य सरकार और 1[लघु उद्योग बैंक] द्वारा समानतः की जाएगी ]

 [4. विशेष वर्ग के शेयर- [(1) राज्य सरकार, [उद्योग बैंक] के परामर्श से, वित्तीय निगम की अनिर्गमित पूंजी के ऐसे भाग को, जिसे विशेष वर्ग के शेयरों को निर्गमित करने के लिए आबंटित किया जाएगा, समय-समय पर विनिर्दिष्ट कर सकेगी ];

(2) उपधारा (1) के अधीन ऐसे निश्चित किए गए विशेष वर्ग के शेयर-

() एक ही अंकित मूल्य के इतने शेयरों में विभाजित किए जाएंगे जितने राज्य सरकार 5[उद्योग बैंक] से परामर्श करके अवधारित करे;

() राज्य सरकार और 5[उद्योग बैंक] द्वारा प्रतिश्रुत किए जाएंगे और वे ऐसा उस अनुपात में कर सकेंगे जो उनके द्वारा और उनके बीच करार पाया जाए तथा वित्तीय निगम तदनुसार ऐसे शेयरों का आबंटन करेगा

(3) यथापूर्वोक्त प्रतिश्रुत पूंजी दर्शित करने वाली निधियों का उपयोग केवल ऐसे प्रयोजनों के लिए, ऐसी रीति से और ऐसे वर्ग या प्रवर्ग के औद्योगिक समुत्थानों को सहायता देने के लिए किया जाएगा, जो 5[उद्योग बैंक] राज्य सरकार से परामर्श करके और उसकी सलाह प्राप्त करने के पश्चात्, समय-समय पर इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, तथा ॥। धारा 48 की कोई भी बात उसको लागू होगी  

(4) वित्तीय निगम के किसी लेखा वर्ष की बाबत विशेष वर्ग के शेयरों पर घोषित लाभांश की दर, उसके अन्य शेयरों की बाबत लाभांश की दर से अधिक नहीं होगी

(5) धारा 4 की उपधारा (2) से (5), धारा 5 और [धारा 6 की उपधारा (1) से (4)] की कोई भी बात विशेष वर्ग के शेयरों को लागू होगी ]

 [4. शेयर पूंजी का विकास बैंक को अन्तरण-ऐसी तारीख को जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे (जिसे इसमें इसके पश्चात् विनिर्दिष्ट तारीख कहा गया है), प्रत्येक वित्तीय निगम के ऐसे सभी शेयर, जो रिजर्व बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट तारीख के ठीक पूर्व की तारीख को प्रतिश्रुत किए जाते हैं, विकास बैंक को अन्तरित हो जाएंगे और उसमें निहित होंगे

4. रकम का संदाय-विकास बैंक द्वारा रिजर्व बैंक को प्रत्येक वित्तीय निगम के उतने शेयरों के जितने रिजर्व बैंक द्वारा प्रतिश्रुत किए गए हैं, विकास बैंक को अन्तरित किए जाने और उसमें निहित होने के लिए उतनी रकम नकद दी जाएगी जो उस वित्तीय निगम के इस प्रकार प्रतिश्रुत शेयरों के अंकित मूल्य के बराबर हो ]

 [4. मोचनीय अधिमानी शेयरों का निर्गमन-(1) राज्य वित्तीय निगम (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारम्भ पर और उसके पश्चात् वित्तीय निगम, -

() बोर्ड द्वारा विनिश्चित किए जाने वाले निबन्धनों पर और रीति से मोचनीय अधिमानी शेयर निर्गमित करेगा; और

() राज्य सरकार और लघु उद्योग बैंक के पूर्व अनुमोदन से, शेयर धारकों के साधारण अधिवेशन में पारित संकल्प द्वारा, अपने द्वारा विनिश्चित की जाने वाली संख्या में साधारण शेयरों को मोचनीय अधिमानी शेयरों में संपरिवर्तित करेगा:

परन्तु ऐसा संपरिवर्तन किसी भी दशा में, धारा 4 की उपधारा (3) के खंड (), () और () में निर्दिष्ट पक्षकारों द्वारा धारित साधारण शेयरों को, वित्तीय निगम द्वारा निर्गमित की गई साधारण पूंजी के इक्यावन प्रतिशत से कम नहीं करेगा

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट मोचनीय अधिमानी शेयर पर-

                () ऐसे निर्गमन या संपरिवर्तन के समय वित्तीय निगम द्वारा यथाविनिर्दिष्ट नियत दर पर लाभांश होगा; और

() वे तो अन्तरणीय होंगे और उन पर मतदान का अधिकार होगा

(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट मोचनीय अधिमानी शेयरों का वित्तीय निगम द्वारा किस्तों में और ऐसी रीति से मोचन किया जाएगा जो बोर्ड द्वारा अवधारित किया जाए

4. शेयर पूंजी में कटौती-(1) वित्तीय निगम, राज्य सरकार और लघु उद्योग बैंक के पूर्व अनुमोदन से शेयर धारकों की साधारण बैठक में पारित संकल्प द्वारा उसकी शेयर पूंजी को किसी भी प्रकार से घटा सकेगा  

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना शेयर पूंजी निम्नलिखित द्वारा घटाई जा सकेगी-

() असमादत्त शेयर पूंजी की बाबत उसके किन्हीं साधारण शेयरों के प्रति दायित्व का निर्वापन करके या उसे कम करके; या

() अपने किन्हीं साधारण शेयरों के प्रति दायित्व के निर्वापन से या उसमें कमी करके या करके, किसी समादत्त शेयरपूंजी को जिसकी हानि हो गई है या जिसके लिए आस्तियां उपलब्ध नहीं हैं, रद्द करके; या

() अपने किन्हीं साधारण शेयरों के प्रति दायित्व के निर्वापन से या उसमें कमी करके या करके ऐसी समादत्त शेयर पूंजी जो वित्तीय निगम की आवश्यकताओं से अधिक है, को चुका करके

4. मताधिकार के प्रयोग पर निर्बन्धन-वित्तीय निगम के ऐसे प्रत्येक शेयर धारक को, जो साधारण शेयर रखता हो, प्रत्येक संकल्प पर ऐसे शेयरों की बाबत मत देने का अधिकार होगा और मतदान में उसका मताधिकार वित्तीय निगम की समादत्त साधारण पूंजी के उसके अंश के अनुपात में होगा:

परन्तु फिर भी धारा 4 की उपधारा (3) के खंड (), खंड () और खंड () में निर्दिष्ट शेयर धारक से भिन्न कोई शेयर धारक, निर्गमित साधारण पूंजी के दस प्रतिशत से अधिक उसके द्वारा धारित किसी साधारण शेयर की बाबत मताधिकारों का प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा

4. परोक्षी मतदान-धारा 4 की उपधारा (1) के खंड () और धारा 4 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट साधारण अधिवेशन में, मत देने के हकदार शेयर धारकों द्वारा, वैयक्तिक रूप से या जहां परोक्षी अनुज्ञात हो, परोक्षी द्वारा मतदान करके शेयर पूंजी में संपरिवर्तन या उसमें कमी करने का संकल्प पारित किया जाएगा और संकल्प के पक्ष में डाले गए मत, इस प्रकार हकदार और मत देने वाले शेयर धारकों द्वारा संकल्प के विरोध में डाले गए मतों की संख्या के, यदि कोई हो, तीन गुना से कम नहीं होगी

4. शेयर पूंजी का लघु उद्योग बैंक को अन्तरण-ऐसी तारीख को, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अधिसूचित करे (जिसे इसमें इसके पश्चात् अधिसूचित तारीख कहा गया है) विकास बैंक द्वारा प्रतिश्रुत प्रत्येक वित्तीय निगम के सभी शेयर और अधिसूचित तारीख से ठीक पूर्व की तारीख को विकास बैंक द्वारा दी गई पूंजी के बदले में ऋणों की बाबत बकाया रकम लघु उद्योग बैंक को अंतरित और उसमें निहित हो जाएगी और ऐसा अंतरण ऐसी दर पर होगा और संदाय नकद या ऐसी रीति से होगा जो विकास बैंक और लघु उद्योग बैंक के बीच परस्पर करार पाया जाए ]

 [5. शेयरों का अंतरण-(1) उपधारा (2) में यथा उपबंधित के सिवाय, वित्तीय निगम के शेयर निर्बाध रूप से अंतरणीय होंगे

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात से धारा 4 की उपधारा (3) के खंड (), खंड () और खंड () में निर्दिष्ट पक्षकार, वित्तीय निगम में अपने द्वारा धारित किन्हीं शेयरों का अन्तरण करने के हकदार नहीं होंगे यदि ऐसे अंतरण से उनके द्वारा धारित शेयरों का सकल मूल्य घटकर वित्तीय निगम द्वारा निर्गमित साधारण पूंजी के इक्यावन प्रतिशत से कम हो जाता है

(3) बोर्ड, किन्हीं शेयरों के अंतरिती के नाम में अंतरण को रजिस्टर करने से निम्नलिखित में से किसी एक या अधिक आधारों पर और कि किसी अन्य आधार पर इंकार कर सकेगा, अर्थात्: -

() शेयरों का अंतरण इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए विनियमों या किसी अन्य विधि के उपबंधों के उल्लंघन में है;

() शेयरों का अंतरण, बोर्ड की राय में, वित्तीय निगम के हितों पर या लोक हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है;

() शेयरों का अंतरण तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन न्यायालय, अधिकरण या किसी अन्य प्राधिकारी के किसी आदेश द्वारा प्रतिषिद्ध है

(4) बोर्ड, उस तारीख से जिसको वित्तीय निगम के शेयरों के अंतरण की लिखत ऐसे अंतरण के रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजन के लिए उसके पास दर्ज की जाती है, दो मास की समाप्ति के पूर्व, सद्भावपूर्वक केवल इस बारे में अपनी राय ही नहीं बनाएगा कि ऐसे रजिस्ट्रीकरण के उपधारा (3) में निर्दिष्ट आधारों में से किसी पर इंकार नहीं करना चाहिए था या करना चाहिए था, बल्िक, -

() यदि उसने अपनी यह राय भी बनाई है कि ऐसे रजिस्ट्रीकरण से इस प्रकार इंकार नहीं करना चाहिए था तो ऐसा रजिस्ट्रीकरण करेगा; और

() यदि उसने अपनी यह राय बनाई है कि ऐसे रजिस्ट्रीकरण से उपधारा (3) में वर्णित आधारों में से किसी पर इंकार करना चाहिए था तो लिखित में सूचना द्वारा अंतरक और अंतरिती को सूचित करेगा  

(5) उपधारा (4) के अधीन बोर्ड के इंकार किए जाने वाले आदेश के विरुद्ध अपील केन्द्रीय सरकार को होगी और ऐसी अपील फाइल करने और उसकी सुनवाई करने के लिए प्रक्रिया इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार होगी

6. राज्य सरकार द्वारा प्रत्याभूत शेयरों का संपरिवर्तन-(1) राज्य वित्तीय निगम (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारम्भ पर, वित्तीय निगम द्वारा प्रत्येक शेयर धारक को यह विकल्प दिया जाएगा कि वह वित्तीय निगम से उसके द्वारा धारित शेयरों को राज्य सरकार की प्रत्याभूति के बिना, उतने ही अभिहित मूल्य के शेयरों में संपरिवर्तित करे और नए शेयर प्रमाणपत्र जारी करे अथवा ऐसे शेयरों के संबंध में संदत्त रकम का संदाय करे जो उसके द्वारा धारित शेयरों के अंकित मूल्य से अधिक नहीं होगी

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट विकल्प, वित्तीय निगम द्वारा प्रत्येक विद्यमान शेयर धारक को राज्य वित्तीय निगम (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारम्भ से तीन मास की समाप्ति से पूर्व दिया जाएगा और शेयर धारक द्वारा ऐसे विकल्प की प्राप्ति की तारीख से तीन मास के भीतर उसका प्रयोग किया जाएगा

(3) उपधारा (2) के अधीन इस प्रकार प्रयोग किया गया विकल्प अंतिम होगा और प्रयोग किए जाने के पश्चात् परिवर्तित या विखंडित नहीं जाएगा

(4) यदि शेयर धारक ने नियत समय के भीतर, संदाय पाने के विकल्प का प्रयोग किया है तो वित्तीय निगम, उसके द्वारा धारित शेयर प्रमाणपत्र का अभ्यर्पण करने पर ऐसे शेयरों की बाबत संदत्त रकम का, जो उसके अंकित मूल्य के अधिक नहीं होगी, उसे संदाय करेगा:

परन्तु यदि कोई शेयर धारक उपधारा (1) के अधीन उसे दिए गए विकल्प का उपधारा (2) में नियत समय के भीतर प्रयोग करने में असफल रहता है तो यह माना जाएगा कि उसने पहले वाले विकल्प का प्रयोग किया है

(5) उपधारा (4) में अंतर्विष्ट किसी बात के परिणामस्वरूप शेयर पूंजी में कमी हुई नहीं मानी जाएगी और वित्तीय निगम, धारा 4 की उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसे शेयर अधारक द्वारा अभ्यर्पित शेयरों को किसी अन्य व्यक्ति को आबंटित कर सकेगा

(6) वित्तीय निगम, अपने मुख्यालय में एक या अधिक पुस्तकों में शेयर धारकों का एक रजिस्टर रखेगा और उसमें निम्नलिखित विशिष्टियां, जहां तक उपलब्ध हों, दर्ज करेगा, अर्थात्: -

(i) शेयर धारकों के नाम, पते और उपजीविकाएं, यदि कोई हों और प्रत्येक शेयर धारक द्वारा धारित शेयरों का विवरण, जिसमें प्रत्येक शेयर को उसकी द्योतक संख्या से सुभिन्न किया जाएगा;

(ii) वह तारीख जिसको किसी व्यक्ति को शेयर धारक के रूप में दर्ज किया गया;

(iii) वह तारीख जिसको कोई व्यक्ति शेयर धारक नहीं रहा; और

(iv) यथाविहित कोई अन्य विशिष्टियां:

                परन्तु यह कि इस उपधारा में की कोई बात निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) के अधीन किसी निक्षेपागार द्वारा धारित शेयरों को लागू नहीं होगी

(7) उपधारा (6) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, वित्तीय निगम को यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसे रक्षोपायों के अधीन रहते हुए जो विहित किए जाएं, शेयर धारकों के रजिस्टर को कम्प्यूटर फ्लापियों या डिस्कैटों, काम्पैक्ट डिस्क या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक प्ररूप में रखे

(8) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) में किसी बात के होते हुए भी, शेयर धारकों के रजिस्टर की कोई प्रति या उद्धरण, जिसे वित्तीय निगम के, इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा सत्यप्रति के रूप में प्रमाणित किया गया हो, सभी विधिक कार्यवाहियों में साक्ष्य में ग्राह्य होगी

(9) निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) की धारा 11 के अधीन किसी निक्षेपागार द्वारा रखे जाने वाले हिताधिकारी स्वामियों के रजिस्टर को इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ शेयर धारकों का रजिस्टर समझा जाएगा

(10) उपधारा (6), उपधारा (7) और उपधारा (8) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी न्यास की कोई सूचना चाहे वह व्यक्त, विवक्षित या आन्वयिक हो, शेयर धारकों के रजिस्टर में दर्ज नहीं की जाएगी या वित्तीय निगम द्वारा प्राप्त नहीं की जाएगी:

परन्तु यह कि इस धारा की कोई बात किसी निक्षेपागार द्वारा हिताधिकारी स्वामी की ओर से रजिस्ट्रीकृत स्वामी के रूप में धारित शेयरों की बाबत किसी निक्षेपागार को लागू नहीं होगी

स्पष्टीकरण-उपधारा (6), उपधारा (9) और इस उपधारा के प्रयोजनार्थ हिताधिकारी स्वामी", निक्षेपागार" और रजिस्ट्रीकृत स्वामी" पदों के वही अर्थ होंगे जो उन्हें क्रमशः निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (), खंड () और खंड () में दिए गए हैं

(11) भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, वित्तीय निगम के शेयर, उक्त अधिनियम की धारा 20 में प्रगणित प्रतिभूतियों में सम्मिलित समझे जाएंगे

7. वित्तीय निगम की अतिरिक्त पूंजी और उसकी उधार लेने की शक्तियां-(1) वित्तीय निगम, अपनी कामकाज पूंजी को बढ़ाने के प्रयोजनार्थ बंधपत्र और डिबेंचर निर्गमित और विक्रय कर सकेगा

(2) राज्य सरकार, वित्तीय निगम द्वारा उसे किए गए निवेदन पर, वित्तीय निगम द्वारा निर्गमित बंधपत्रों और डिबेन्चरों के मूलधन का प्रतिसंदाय और उस पर ऐसी दर पर जो उस सरकार द्वारा नियत की जाए, ब्याज का संदाय प्रत्याभूत कर सकेगी

(3) इस उपधारा में इसके पश्चात् वर्णित अधिनियमों में किसी बात के होते हुए भी, वित्तीय निगम द्वारा निर्गमित ऐसे बंधपत्र और डिबेन्चरों को, जो राज्य सरकार द्वारा मूलधन के प्रतिसंदाय और ब्याज के संदाय के लिए प्रत्याभूत हों और राज्य सरकार द्वारा इस प्रकार प्रत्याभूत निक्षेपों के मूलधन के प्रतिसंदाय और ब्याज के संदाय के लिए इसके द्वारा रसीदें जारी की गई हों तो उन्हें भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) की धारा 20 में प्रगणित प्रतिभूतियों में सम्मिलित समझा जाएगा और उन्हें बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4)   ॥। के प्रयोजनार्थ अनुमोदित प्रतिभूतियां भी समझा जाएगा

(4) वित्तीय निगम इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का अनुपालन करने के प्रयोजनार्थ रिजर्व बैंक से, -

() निम्नलिखित प्रतिभूतियों के विरुद्ध मांग पर या जिस तारीख को धन उधार लिया जाता है उससे नब्बे दिन से अनधिक की नियत अवधि की समाप्ति पर प्रतिसंदेय, -

(i) ऐसे स्टाक, निधियां और प्रतिभूतियां (स्थावर संपत्ति से भिन्न) जिनमें न्यासी, तत्समय भारत में प्रवृत्त किसी विधि द्वारा न्यास धन का विनिधान करने के लिए प्राधिकृत है, या

(ii) ऐसे विनियम पत्र और वचनपत्र, जो रिजर्व बैंक द्वारा, क्रय या पुनः मितिकाटा लेकर भुगतान किए जाने के लिए पात्र हैं अथवा जो राज्य सरकार द्वारा मूलधन के प्रतिसंदाय और ब्याज के संदाय के प्रति पूर्णतः प्रत्याभूत हैं;

() उस तारीख से, जिसको धन इस प्रकार उधार लिया जाता है, अट्ठारह मास से अनधिक की परिपक्वता की नियत अवधि की समाप्ति पर प्रतिसंदेय केंद्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार की प्रतिभूतियों के विरुद्ध या राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन के अधीन रहते हुए वित्तीय निगम द्वारा निर्गमित और उस तारीख से, जिसको धन इस प्रकार उधार लिया जाता है, अठारह मास से अनधिक की अवधि के भीतर परिपक्व होने वाले बंधपत्रों और डिबेंचरों के विरुद्ध तथा ऐसा प्रत्येक डिबेंचर और बंधपत्र राज्य सरकार द्वारा प्रत्याभूत होगा,

धन उधार ले सकेगा:

परन्तु वित्तीय निगम द्वारा खंड () के अधीन उधार ली गई रकम किसी भी समय कुल मिलाकर उसकी समादत्त शेयर पूंजी के दो गुने से अधिक नहीं होगी

(5) वित्तीय निगम, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के प्रयोजनार्थ राज्य सरकार, किसी वित्तीय संस्था, अनुसूचित बैंक, बीमा कम्पनी या बोर्ड द्वारा यथा अनुमोदित किसी अन्य व्यक्ति से, करार पाए गए निबंधनों और शर्तों पर धन उधार   ले सकेगा

(6) निर्गमित और बकाया बंधपत्रों तथा डिबेंचरों की कुल रकम, वित्तीय निगम द्वारा उपधारा (4) के खंड () और उपधारा (5) के अधीन उधार ली गई रकमें और वित्तीय निगम द्वारा दी गई प्रत्याभूतियों के रूप में समाश्रित दायित्व या उसके द्वारा किए गए हामीदारी करारों की कुल रकम, वित्तीय निगम की समादत्त शेयर पूंजी और आरक्षित निधि की रकम के दस गुणा से अधिक नहीं होगी:

परन्तु वित्तीय निगम, लघु उद्योग बैंक के पूर्व अनुमोदन से पूर्वोक्त सीमा को वित्तीय निगम की समादत्त शेयर पूंजी और आरक्षित निधि की रकम के तीस गुणा तक बढ़ा सकेगा

8. वित्तीय निगम के पास निक्षेप-(1) वित्तीय निगम, किसी राज्य सरकार से या रिजर्व बैंक के पूर्व अनुमोदन से किसी स्थानीय प्राधिकारी या अन्य व्यक्ति से ऐसी अवधि के अवसान के पश्चात् प्रतिसंदेय निक्षेप, जो निक्षेप करने की तारीख से बारह मास से कम की होगी और ऐसे अन्य निबंधनों पर जो बोर्ड ठीक समझे:

परन्तु ऐसे निक्षेपों की कुल रकम वित्तीय निगम की समादत्त शेयर पूंजी के दो गुने से अधिक नहीं होगी:

परन्तु यह और कि राज्य सरकार, वित्तीय निगम को ऐसी उच्चतर सीमा तक निक्षेप प्रतिगृहीत करने के लिए अनुज्ञा दे सकेगी जो वित्तीय निगम की समादत्त शेयर पूंजी के दस गुने से अधिक हो

(2) उपधारा (1) के अधीन प्रतिगृहीत कोई निक्षेप, जो राज्य सरकार के किसी निक्षेप से भिन्न हो, उसके मूलधन के प्रतिसंदाय के बारे में और उसके ब्याज के संदाय के बारे में, यदि वित्तीय निगम ऐसी अपेक्षा करे तो राज्य सरकार द्वारा प्रत्याभूत किया जाएगा

9. प्रबन्ध-(1) वित्तीय निगम के कार्यकलाप और उसके कारबार का साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबंध ऐसे निदेशक बोर्ड में निहित होगा जो ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा जो वित्तीय निगम द्वारा प्रयोग की जाती हों या की जाती हैं और जिनका वित्तीय निगम द्वारा साधारण अधिवेशन में किया जाना इस अधिनियम द्वारा स्पष्टतः निदेशित या अपेक्षित नहीं है

(2) बोर्ड यह निदेश दे सकेगा कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य कोई शक्ति, अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक या पूर्णकालिक निदेशक द्वारा भी ऐसे मामलों में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं प्रयोक्तव्य होंगी

10. निदेशक बोर्ड-निदेशक बोर्ड निम्नलिखित से मिलकर बनेगा, अर्थात्: -

                () धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन अध्यक्ष के रूप में नामनिर्दिष्ट किया जाने वाला एक निदेशक;

() दो निदेशक, जो राज्य सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे जिनमें से एक निदेशक ऐसा व्यक्ति होगा जो लघु उद्योग का विशेष ज्ञान या अनुभव रखता हो:

परन्तु संयुक्त वित्तीय निगम की दशा में निदेशकों की संख्या उतनी होगी जितनी सम्मिलित राज्यों की सरकारें आपसी करार द्वारा नामनिर्देशित करना ठीक समझें और प्रत्येक सम्मिलित राज्य सरकार के दो से अनधिक निदेशक नामनिर्देशित करेगी:

परन्तु यह और कि संयुक्त वित्तीय निगम की दशा में ऐसा निदेशक, जो लघु उद्योगों का विशेष ज्ञान या अनुभव रखता हो, सम्मिलित उस राज्य द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा, जो सम्मिलित राज्यों के बीच करार के निबंधनों के अनुसार ऐसा नामनिर्देशन करने का हकदार हो;

() दो निदेशक, लघु उद्योग बैंक द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे;

() दो निदेशक धारा 4 की उपधारा (3) के खंड () में वर्णित पक्षकारों द्वारा यथाविहित रीति से नामनिर्देशित किए जाएंगे;

() धारा 4 की उपधारा (3) के खंड () और खंड () में वर्णित के भिन्न ऐसे शेयर धारकों द्वारा जिनके नाम, वित्तीय निगम के शेयर धारकों के रजिस्टर में, उस अधिवेशन की, जिसमें ऐसे निर्वाचन किए गए थे, तारीख से नब्बे दिन पूर्व दर्ज थे, विहित रीति में निम्नलिखित आधार पर ऐसी संख्या में निर्वाचित निदेशक, अर्थात्: -

(i) जहां ऐसे शेयर धारकों द्वारा धारित निर्गमित साधारण शेयर पूंजी की कुल रकम कुल निर्गमित साधारण पूंजी का दस प्रतिशत या उससे कम हो, दो निदेशक;

(ii) जहां ऐसे शेयर धारकों द्वारा धारित निर्गमित साधारण शेयर पूंजी की कुल रकम कुल निर्गमित साधारण पूंजी के दस प्रतिशत से अधिक हो किन्तु पच्चीस प्रतिशत से कम हो, तीन निदेशक; और

(iii) जहां ऐसे शेयर धारकों द्वारा धारित निर्गमित साधारण शेयर पूंजी की कुल रकम कुल निर्गमित साधारण पूंजी का पच्चीस प्रतिशत या अधिक हो, चार निदेशक; और

(iv) जहां इस खंड में निर्दिष्ट ऐसे साधारण शेयर धारकों द्वारा धारित निर्गमित साधारण शेयर पूंजी की कुल रकम सभी चार निदेशकों का निर्वाचन अनुज्ञात नहीं करती, वहां बोर्ड उक्त संख्या को पूरा करने के लिए अपेक्षित संख्या में निदेशकों को सहयोजित करेगा, जो अपने सहयोजन के क्रम में, निर्वाचित निदेशकों द्वारा कार्यभार ग्रहण करने वाले निर्वाचित सदस्यों के बराबर संख्या में निवृत्त होंगे;

                                () प्रबन्ध निदेशक जो धारा 17 की उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार नियुक्त किया जाएगा:

परन्तु बोर्ड के प्रथम गठन पर, खंड () में निर्दिष्ट निदेशक राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे और इस प्रकार नामनिर्देशित निदेशक इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निर्वाचित किए गए निदेशक समझे जाएंगे:

परन्तु यह और कि प्रथमतया गठित बोर्ड के प्रबन्ध निदेशक से भिन्न सभी निदेशक पहले वर्ष के अंत में सेवानिवृत्त हो जाएंगे ]

                                                                                                                                                                                                       

 [11. निदेशकों की पदावधि और सेवा निवृत्ति-(1) नामनिर्देशित निदेशक, उसे नामनिर्देशित करने वाले प्राधिकारी के प्रसादपर्यंत पद धारण करेगा  

(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, नामनिर्देशित निदेशक तीन वर्ष से अनधिक अवधि के लिए पद पर बना रहेगा और पुनर्नामनिर्देशन का भी पात्र होगा:

परन्तु कोई निदेशक छह वर्ष से अधिक अवधि के लिए निरन्तर पद धारण नहीं करेगा

(3) धारा 10 के खंड () के पहले परन्तुक के अधीन निर्वाचित समझे गए निदेशक से भिन्न कोई निर्वाचित निदेशक तीन वर्ष की अवधि के लिए पद पर बना रहेगा और पुनर्निर्वाचन का भी पात्र होगा:

परन्तु कोई निदेशक छह वर्ष से अधिक अवधि के लिए निरन्तर पद धारण नहीं करेगा

12. निदेशक होने के लिए निरर्हताएं-कोई भी ऐसा व्यक्ति निदेशक होगा जो, -

() सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय द्वारा विकृतचित्त का पाया गया है और वह निष्कर्ष अभी प्रवृत्त है; या

() दिवालिया अधिनिर्णीत हो या किसी समय अधिनिर्णीत किया गया हो या जो अपने ऋणों के संदाय का निलम्बन कर चुका हो या अपने लेनदारों से प्रशमन कर लिया है; या

() जिसे किसी ऐसे अपराध के लिए किसी न्यायालय द्वारा दोषसिद्ध किया गया है जिसमें नैतिक अधममता अंतर्ग्रस्त हो और उसके लिए उसे छह मास से अन्यून के कारावास से दंडदिष्ट किया गया हो तथा दण्डादेश की समाप्ति की तारीख से पांच वर्ष की अवधि व्यपगत हुई हो; या

() यदि उसे धारा 4 की उपधारा (3) के खंड () में निर्दिष्ट व्यक्तियों द्वारा निर्वाचित किया गया हो किन्तु वह वित्तीय निगम के पास दस हजार रुपए से अन्यून के अभिहित मूल्य के विल्लंगम रहित शेयरों के धारक के रूप में स्वयं अपने अधिकार में रजिस्ट्रीकृत नहीं हो; या

() उसने अपने द्वारा एकल या अन्यों के साथ संयुक्ततः धारित वित्तीय निगम के शेयरों से संबंधित किसी मांग का संदाय नहीं किया है और मांग के संदाय के लिए नियत अंतिम दिन से छह मास का समय व्यपगत हो चुका हो ]

13. निदेशक का पद से हटाया जाना- [(1)] राज्य सरकार किसी ऐसे निदेशक को पद से हटा सकेगी जो-

() धारा 12 में वर्णित निरर्हताओं में से किसी के अधीन है या हो गया है; या

() बोर्ड की इजाजत के बिना बोर्ड की तीन से अधिक क्रमवर्ती बैठकों में ऐसे प्रतिहेतु के बिना अनुपस्थित रहा है जो बोर्ड की राय में उस अनुपस्थिति की माफी के लिए पर्याप्त हो

 [(2) धारा 4 की उपधारा (3) के खंड (), खंड () और खंड () में वर्णित शेयर धारकों से भिन्न शेयर धारक, जिनके नाम शेयर धारकों के रजिस्टर में दर्ज हैं, निदेशक को यथाविहित रीति में सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, ऐसे शेयर धारकों के बहुमत से, जो ऐसे सभी शेयर धारकों द्वारा धारित कुल निर्गमित शेयर पूंजी के आधे से कम नहीं होगी, एक संकल्प पारित करके धारा 10 के खंड () के अधीन निर्वाचित किसी निदेशक को हटा सकेंगे और उसके स्थान पर इस प्रकार हुई रिक्ति को भरने के लिए किसी अन्य व्यक्ति को निर्वाचित कर सकेंगे ]

14. निदेशक द्वारा पद त्याग और आकस्मिक रिक्तियों का भरा जाना- [(1) धारा 10 के खंड () के अधीन निर्वाचित कोई निदेशक, बोर्ड के अध्यक्ष को लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा और ऐसे त्यागपत्र के स्वीकार किए जाने पर यह समझा जाएगा कि उसने अपना पद रिक्त कर दिया है ]

                (2) निर्वाचित निदेशक के पद में आकस्मिक रिक्ति निर्वाचन द्वारा भरी जाएगी और इस प्रकार निर्वाचित निदेशक अपने पूर्वाधिकारी की पदावधि के असमाप्त भाग के लिए ही पद धारण करेगा

(3) बोर्ड का कोई भी कार्य या कार्यवाही केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि बोर्ड में कोई रिक्ति विद्यमान है या उसके गठन में कोई त्रुटि है

 [15. बोर्ड का अध्यक्ष-(1) लघु उद्योग बैंक, राज्य सरकार के परामर्श से एक निदेशक को, तीन वर्ष से अनधिक कर ऐसी अवधि के लिए और ऐसी शर्तों और निबंधनों पर, जो लघु उद्योग बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में नामनिर्देशित कर सकेगा:

परन्तु यदि अध्यक्ष की नियुक्ति प्रबंध निदेशक के रूप में कृत्य करने के लिए भी नहीं की गई है तो वह पूर्णकालिक निदेशक नहीं होगा:

परन्तु यह और कि अध्यक्ष, जब तक वह निदेशक रहेगा, अध्यक्ष के रूप में पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा

(2) अध्यक्ष, बोर्ड के अधिवेशनों और वित्तीय निगम के साधारण अधिवेशनों में अध्यक्षता करेगा ]

 [16. निदेशकों का पारिश्रमिक-प्रबंध निदेशक से भिन्न निदेशकों को जो सरकार के सेवक हों, बोर्ड की बैठक में उपस्थित होने और यदि वे कार्यपालिका समिति या वित्तीय निगम द्वारा नियुक्त किसी अन्य समिति के सदस्य हैं तो ऐसी समिति की बैठकों में उपस्थित होने के लिए ऐसी फीस दी जाएगी जो विहित की जाए ]

17. प्रबंध निदेशक- [(1) प्रबंध निदेशक-

() राज्य सरकार द्वारा लघु उद्योग बैंक के परामर्श से नियुक्त किया जाएगा;

() वित्तीय निगम का पूर्णकालिक अधिकारी होगा;

() ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा, जो बोर्ड उसे विनियमों द्वारा सौंपे या प्रत्यायोजित करे;

() तीन वर्ष से अनधिक ऐसी अवधि के लिए पद धारण करेगा जो राज्य सरकार विनिर्दिष्ट करे और पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा;

() उतना वेतन और भत्ते प्राप्त करेगा तथा सेवा के ऐसे अन्य निबंधनों और शर्तों के अधीन होगा, जो बोर्ड, राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से अवधारित करे ]

                 [(2) राज्य सरकार, बोर्ड से परामर्श करके प्रबंध निदेशक को पद से हटा सकेगी:

परन्तु किसी भी प्रबंध निदेशक को इस प्रकार तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक उसे अपने हटाए जाने के विरुद्ध कारण दर्शित करने का अवसर दे दिया गया हो ]

 [(3) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, राज्य सरकार को, लघु उद्योग बैंक के पूर्व परामर्श से, उपधारा (1) के खंड () के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति से पूर्व किसी भी समय प्रबंध निदेशक की पदावधि को, उसे न्यूनतम तीन मास की लिखित सूचना देकर अथवा ऐसी सूचना के बदले में तीन मास का वेतन और भत्ते देकर समाप्त करने का अधिकार होगा और प्रबंध निदेशक को भी उपधारा (1) के खंड () के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति से पूर्व किसी भी समय, राज्य सरकार को न्यूनतम तीन मास की लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग करने का अधिकार होगा ]

 [18. कार्यपालिका समिति-(1) बोर्ड एक कार्यपालिका समिति का गठन करेगा जो अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक, पूर्णकालिक निदेशकों और उतने अन्य निदेशकों से मिलकर बनेगी जितने वह ठीक समझे:

परन्तु संयुक्त वित्तीय निगम की दशा में, यदि धारा 10 के खंड () के अधीन नामनिर्दिष्ट निदेशक विभिन्न राज्य सरकारों का प्रतिनिधित्व करते हैं तो वे सभी कार्यपालिका समिति के सदस्य होंगे

(2) कार्यपालिका समिति ऐसे सभी कृत्यों का निर्वहन करेगी जो बोर्ड द्वारा विहित किए जाएं या उसे प्रत्यायोजित किए जाएं

(3) बोर्ड ऐसे प्रयोजन या प्रयोजनों के लिए, जिन्हें वह ठीक समझे, ऐसी अन्य समितियों का गठन कर सकेगा चाहे वे पूर्णतः निदेशकों से या पूर्णतः अन्य व्यक्तियों से या भागतः निदेशकों से और भागतः अन्य व्यक्तियों से मिलकर बने ]

19. बोर्ड और समिति की बैठकें-(1) बोर्ड और कार्यपालिका समिति की बैठकें ऐसे समय और स्थान पर होंगी और उन बैठकों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन किया जाएगा जैसे इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं

(2) किसी भी बैठक में सभी प्रश्नों का विनिश्चय उपस्थित सदस्यों के बहुमत से होगा और मतों के बराबर होने की दशा में अध्यक्ष का या उसकी अनुपस्थिति में पीठासीन किसी अन्य व्यक्ति का दूसरा या निर्णायक मत होगा

(3) कोई भी निदेशक किसी ऐसे मामले में मत नहीं देगा जिसमें वह हितबद्ध हो

                                                                                                                                                                                       

(5) यदि किसी कारणवश बोर्ड का अध्यक्ष या कार्यपालिका समिति का अध्यक्ष, यथास्थिति, बोर्ड की या कार्यपालिका समिति की किसी बैठक में उपस्थित होने में असमर्थ है, तो-

() बोर्ड की बैठक की दशा में कोई निदेशक ॥। और जो बोर्ड के अध्यक्ष द्वारा लिख कर प्राधिकृत किया गया है ऐसी बैठक में पीठासीन होगा, किन्तु यदि इस प्रकार प्राधिकृत निदेशक अनुपस्थित है या ऐसा कोई प्राधिकार नहीं दिया गया है, तो बोर्ड उस बैठक में पीठासीन होने के लिए किसी निदेशक को निर्वाचित कर सकेगा; और

() कार्यपालिका समिति की बैठक की दशा में उस समिति के अध्यक्ष द्वारा लिखकर प्राधिकृत किया गया कोई सदस्य उस बैठक में पीठासीन होगा किन्तु यदि इस प्रकार प्राधिकृत सदस्य अनुपस्थित है या यदि ऐसा कोई प्राधिकार नहीं दिया गया है, तो समिति उस बैठक में पीठासीन होने के लिए अपने सदस्यों में से किसी को निर्वाचित कर सकेगी ]

20. कार्यपालिका समिति की शक्तियां-(1) ऐसे सामान्य या विशेष निदेशों के अधीन रहते हुए, जो बोर्ड समय-समय पर दे, कार्यपालिका समिति बोर्ड की सक्षमता के अन्तर्गत किसी मामले को निपटा सकेगी

(2) कार्यपालिका समिति की प्रत्येक बैठक के [कार्यवृत्त, कार्यपालिका समिति की अगली बैठक में उनके पुष्टीकरण के पश्चात् बोर्ड की आगामी बैठक में उसके समक्ष रखे जाएंगे ]

21. सलाहकार समितियां-वित्तीय निगम [एक या अधिक समिति या समितियां, जो पूर्णतः निदेशकों या पूर्णतः अन्य व्यक्तियों अथवा भागतः निदेशकों और भागतः अन्य व्यक्तियों से मिलकर बनेंगी,] वित्तीय निगम को अपने कृत्यों के दक्ष पालन में सहायता देने के प्रयोजनों के लिए और विशिष्टतया यह सुनिश्चित करने के प्रयोजनों के लिए कि उन कृत्यों का प्रयोग विशिष्ट क्षेत्रों या उद्योगों की परिस्थितियों और उनमें विद्यमान दशाओं तथा उनकी अपेक्षाओं का सम्यक् ध्यान रखकर किया जाता है, नियुक्त कर सकेगा

 [22. कार्यालय और अभिकरण-वित्तीय निगम अपना मुख्य कार्यालय और अन्य कार्यालय तथा अभिकरण ऐसे स्थानों पर स्थापित करेगा, जो राज्य सरकार समय-समय पर विनिर्दिष्ट करे, और यथापूर्वोक्त के सिवाय, वित्तीय निगम अतिरिक्त कार्यालय या अभिकरण राज्य के भीतर ऐसे अन्य स्थानों पर स्थापित कर सकेगा, जहां वह आवश्यक समझे ]

23. वित्तीय निगम के अधिकारी और अन्य कर्मचारी-वित्तीय निगम ऐसे अधिकारी, सलाहकार और कर्मचारी नियुक्त कर सकेगा जैसे वह अपने कृत्यों के दक्ष पालन के लिए आवश्यक समझता है और उनकी नियुक्ति और सेवा की शर्तों तथा उनको संदेय पारिश्रमिक को विनियमों द्वारा अवधारित कर सकेगा:

                                                                                                                                                                                       

अध्याय 3

बोर्ड की शक्तियां और कृत्य

24. बोर्ड का सामान्य कर्तव्य-बोर्ड इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में उद्योग, वाणिज्य और जन साधारण के हितों का सम्यक् ध्यान रखते हुए कारबार के सिद्धांतों के अनुसार कार्य करेगा

[25. कारबार, जिसका संव्यवहार वित्तीय निगम कर सकेगा- [(1) वित्तीय निगम, इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, निम्नलिखित प्रकार के किसी भी कारबार को चलाएगा और उसमें संव्यवहार करेगा, अर्थात्: -

                                () करार पाए जाने वाले निबंधनों और शर्तों पर निम्नलिखित की प्रत्याभूति देगा, अर्थात्: -

(i) औद्योगिक समुत्थानों द्वारा लिए गए ऋण जो बीस वर्ष से अनधिक की अवधि के भीतर प्रतिसंदेय हैं और लोक बाजार में जारी किए गए हैं;

(ii) अनुसूचित बैंकों या राज्य सहकारी बैंकों या अन्य वित्तीय संस्थाओं से औद्योगिक समुत्थानों द्वारा लिए गए ऋण;

() करार पाए जाने वाले निबंधनों और शर्तों पर, भारत के भीतर उसके पूंजी माल के क्रय के संबंध में शोध्य आस्थगित संदायों की प्रत्याभूति देना;

() औद्योगिक समुत्थानों द्वारा स्टाक, शेयरों, बंधपत्रों या डिबेंचरों के निर्गमन की हामीदारी करना;

() औद्योगिक समुत्थानों को अपने द्वारा अनुदत्त किए गए ऋणों और उधारों से संबंधित किन्हीं लिखतों का प्रतिफलस्वरूप अंतरण करना;

() किसी औद्योगिक समुत्थान को ऋणों या उधारों के दिए जाने से संबंधित या उद्भूत होने वाले किसी विषय के संबंध में अथवा किसी औद्योगिक समुत्थान के डिबेंचरों की प्रतिश्रुति अथवा विकास बैंक, लघु उद्योग बैंक, भारतीय  औद्योगिक वित्तीय निगम लिमिटेड या वित्तीय संस्था के कारबार के संबंध में केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या विकास बैंक या लघु उद्योग बैंक या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन विरचित और रजिस्ट्रीकृत भारतीय औद्योगिक वित्तीय निगम लिमिटेड अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित की गई किसी अन्य वित्तीय संस्था के अभिकर्ता के रूप में कार्य करना;

() किसी औद्योगिक समुत्थान या किसी अन्य समुत्थान के स्टाक, शेयरों, बंधपत्रों या डिबेंचरों में प्रतिक्षुति करना या उनका क्रय करना;

() प्रतिश्रुति द्वारा या उसके हामीदारी दायित्वों को पूर्ण करने में अर्जित किए गए किसी स्टाक, शेयरों, बंधपत्रों या डिबेंचरों को अपनी आस्तियों के भागरूप प्रतिधारित करना अथवा इस प्रकार अर्जित किसी स्टाक, शेयरों, बंधपत्रों या डिबेंचरों का व्ययन करना;

() किसी औद्योगिक समुत्थान को ऋण या उधार देना अथवा इसके डिबेंचरों के लिए प्रतिश्रुत करना जो, यथास्थिति, उनके अनुदत्त किए जाने या प्रतिश्रुत किए जाने की तारीख से बीस वर्ष से अनधिक की अवधि के भीतर प्रतिसंदेय होंगे:

परन्तु यह कि वित्तीय निगम, लघु उद्योग बैंक के पूर्व अनुमोदन से, बीस वर्ष की उक्त सीमा को दस वर्ष की अवधि तक और बढ़ा सकता है:

परन्तु यह और कि इस खंड में अंतर्विष्ट किसी बात से वित्तीय निगम को किसी ऐसे औद्योगिक समुत्थान को ऋण या उधार देने अथवा उसके डिबेंचरों के लिए प्रतिश्रुत करने से निवारित किया गया नहीं समझा जाएगा जिसके पास ऐसे डिबेंचरों या ऋणों को इस औद्योगिक समुत्थान के स्टाक या शेयरों में संप्रवर्तित करने का विकल्प है:

परन्तु यह भी कि वित्तीय निगम, ऐसे विकल्प का प्रयोग करते हुए उन डिबेंचरों या ऋणों पर बकाया रकमों को उस औद्योगिक समुत्थान के स्टाक या शेयरों में संप्रवर्तित कर सकता है, यदि ऐसा समुत्थान, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 81 के उपबंधों के अधीन रहते हुए और उसके अनुसार अतिरिक्त स्टाक या शेयरों के निर्गमन द्वारा अपनी प्रतिश्रुत पूंजी को बढ़ाता है तो उस औद्योगिक समुत्थान के स्टाक या शेयरों के लिए भी प्रतिश्रुत कर सकता है;

स्पष्टीकरण-इस खंड में ऐसे डिबेंचरों या उधारों की बकाया रकम" पद से मूलधन, ब्याज और ऐसे डिबेंचरों या उधारों पर संदेय अन्य प्रभार अभिप्रेत हैं जो उस समय संदेय थे जब रकमों को स्टाक या शेयरों में परिवर्तित करने की इच्छा की जाती है;

() ऐसे वचनपत्रों और विनिमयपत्रों को प्रतिगृहीत करना या उनका मितिकाटे पर निपटान करना जो औद्योगिक समुत्थानों द्वारा या ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा दिया गया है, लिखा गया है, प्रतिगृहीत किया गया है या पृष्ठांकित किया गया है जो किसी एक औद्योगिक समुत्थान द्वारा विनिर्मित पूंजी माल को किसी अन्य औद्योगिक समुत्थान को विक्रय करता है;

() विपणन या विनिधानों का मूल्यांकन करने या उनके संबंध में व्यवहार करने के लिए अनुसंधान और सर्वेक्षण करना या किसी उद्योग के विकास के संबंध में तकनीकी-आर्थिक अध्ययन या अन्य क्रियाकलाप करना और चलाना;

() किसी उद्योग की प्रोन्नति, प्रबंध या विस्तार के लिए किसी औद्योगिक समुत्थान या किसी व्यक्ति को तकनीकी और प्रशासनिक सहायता देना;

() उद्योगों की प्रोन्नति और विकास के लिए योजनाएं बनाना और सहायता करना;

() परामर्शी सेवा और वाणिज्य बैंककारी सेवाएं देना;

() डिबेन्चर और अन्य प्रतिभूतियों के धारकों के लिए न्यासी के रूप में कार्य करना;

() औद्योगिक संयंत्र, उपस्कर, मशीनरी या अन्य आस्ति को पट्टे पर, उप पट्टे पर, किराए पर या अवक्रय पर देना;

() लेनदारी-लेखा-क्रय;

() निर्यात से संबंधित प्रत्यय और सेवाएं देना;

() मुद्रा बाजार से संबंधित कार्यकलापों का परिवचन करना;

() पारस्परिक निधियां स्थापित करना और आस्ति प्रबंध कार्यकलाप चलाना;

() कम्पनियों, समनुषंगियों, सोसाइटियों, न्यासों या व्यक्तियों के ऐसे अन्य संगमों का, जिन्हें वह ठीक समझे, संप्रवर्तन, उनकी विरचना या संचालन करना अथवा उनके संप्रवर्तन, उनकी विरचना या संचालन करने में सहायता करना;

() प्रत्यय-पत्रों का अप्रलेखन या उनकी पुष्टि या पृष्ठांकन करना और उनके अधीन लिखे गए विपत्रों और अन्य दस्तावेजों का परक्रामण या उगाही करना;

() लघु उद्योग बैंक द्वारा यथा प्राधिकृत अन्य कारोबार को करना और/या इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों के प्रयोग या कर्तव्यों के निर्वहन से साधारणतया आनुषंगिक या उसके पारिणामिक कार्य और बात करना

(2) वित्तीय निगम, उपधारा (1) में वर्णित सेवाओं में से किसी के प्रतिफलस्वरूप ऐसा कमीशन, दलाली, ब्याज, पारिश्रमिक या फीस प्राप्त कर सकेगा, जो करार पाई जाए ]

                                                                                                                                                                                       

                (3) धारा 7 की उपधारा (5) के उपबंधों के अध्यधीन, उपधारा (1) के खण्ड (), () [() और (गक)], के अधीन वित्तीय निगम के समाश्रित दायित्वों का योग किसी भी समय निगम की समादत्त शेयर पूंजी और आरक्षित निधि के दुगुने से अधिक राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन और [लघु उद्योग बैंक] से परामर्श के बिना नहीं होगा किन्तु किसी भी दशा में वह निगम की समादत्त शेयर पूंजी और आरक्षित निधि के तिगुने से अधिक नहीं होगा

 [(4) इस धारा की कोई बात किसी वित्तीय निगम को किसी कम्पनी में, चाहे गिरवीदार, बन्धकदार या पूर्ण स्वामी के रूप में, उस कम्पनी की प्रतिश्रुत शेयर पूंजी की तीस प्रतिशत या स्वयं अपनी समादत्त शेयर पूंजी और उपलभ्य आरक्षितियों की तीस प्रतिशत, इन दोनों में से जो भी कम हो, उससे अधिक रकम के शेयर धारण करने के लिए हकदार नहीं बनाएगी

(5) यदि राज्य वित्तीय निगम (संशोधन) अधिनियम, 1972 के प्रारम्भ पर कोई वित्तीय निगम, उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट सीमाओं से अधिक शेयर धारण करता है, तो वह निगम उस मामले की रिपोर्ट तत्काल रिजर्व बैंक को करेगा और अपनी शेयर धृतियों को ऐसी कालावधि के भीतर, जो रिजर्व बैंक अनुज्ञात करे, इस प्रकार घटाएगा कि वे उस उपधारा के उपबन्धों के अनुरूप हो जाएं ]

 [25. अधिकार अर्जित करने की शक्ति-वित्तीय निगम को, किसी वित्तीय संस्था द्वारा अनुदत्त किसी उधार या अग्रिम धन के अथवा किसी लिखत के निष्पादन या निर्गमन द्वारा अथवा पृष्ठांकन द्वारा किसी लिखत के अंतरण द्वारा या किसी अन्य रीति से पूर्णतः या भागतः वसूलीय किसी रकम के संबंध में ऐसी वित्तीय संस्था के ऐसे अधिकारों और हितों को, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किए जाएं (जिनके अंतर्गत उनसे आनुषंगिक अन्य अधिकार हैं) अंतरण द्वारा या समनुदेशन द्वारा अर्जित करने का अधिकार होगा:

परंतु यह तब जब कि ऐसा उधार या अग्रिम धन अथवा रकम किसी ऐसे कारबार से संबंधित है, जिसका वित्तीय निगम इस अधिनियम के अधीन संव्यवहार कर सकेगा ]

 [25. दान, अनुदान, आदि-वित्तीय निगम, सरकार से या किसी अन्य स्रोत से दान, अनुदान, संदान या उपकृति प्राप्त कर सकेगा ]

 [26. सौकर्य की सीमा-राज्य वित्तीय निगम (संशोधन) अधिनियम, 2000 के प्रारंभ से ही वित्तीय निगम, किसी औद्योगिक समुत्थान से धारा 25 की उपधारा (1) के खंड (), खंड () या खंड () के अधीन ऐसे कोई ठहराव इस प्रकार नहीं करेगा कि उस समुत्थान के शेयरों और स्टॉक, चाहे प्रतिश्रुत हों या प्रतिश्रुत किए जाने के लिए करार किया गया हो, के अंकित मूल्य और हामीदारी करारों तथा आस्थगित संदाय प्रत्याभूतियों के कारण बकाया दायित्वों सहित ऐसे सभी ठहरावों की बाबत उस समुत्थान के विरुद्ध बकाया कुल रकम निम्नलिखित से अधिक हो-

(i) किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन स्थापित किसी निगम अथवा कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में यथा परिभाषित किसी कंपनी अथवा सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1912 (1912 का 2) अथवा तत्समय प्रवृत्त सहकारी सोसाइटियों से संबंधित किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी सहकारी सोसाइटी की दशा में पांच करोड़ रुपए; और

(ii) किसी अन्य दशा में दो करोड़ रुपए:

परन्तु वित्तीय निगम, लघु उद्योग बैंक के पूर्वानुमोदन से खंड (i) या खंड (ii) में नियत सीमा को चार गुना तक बढ़ा सकेगा ]

27. सुविधा के लिए शर्तों के अधिरोपण की शक्ति-(1) किसी औद्योगिक समुत्थान से धारा 25 के अधीन कोई ठहराव करने में वित्तीय निगम ऐसी शर्तें अधिरोपित कर सकेगा जैसी वह वित्तीय निगम के हितों को संरक्षित करने और यह सुनिश्चित करने के लिए कि उस द्वारा अनुदत्त सुविधा का उस औद्योगिक समुत्थान द्वारा सर्वोत्तम उपयोग किया जाता है, आवश्यक और समीचीन समझे

 [(2) जहां वित्तीय निगम द्वारा किसी औद्योगिक समुत्थान के साथ किए गए किसी ठहराव में, ऐसे औद्योगिक समुत्थान के एक या अधिक निदेशकों की वित्तीय निगम द्वारा नियुक्ति के लिए उपबन्ध है, वहां ऐसा उपबन्ध और उसके अनुसरण में की गई निदेशकों की कोई नियुक्ति, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या औद्योगिक समुत्थान से सम्बन्धित ज्ञापन, संगम-अनुच्छेदों या अन्य किसी लिखत में तत्प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, विधिमान्य और प्रभावशील  होगी, तथा पूर्वोक्त ऐसी किसी विधि या लिखत में अन्तर्विष्ट शेयर अर्हता, आयु सीमा, निदेशक-पदों की संख्या, निदेशकों के पद से हटाए जाने सम्बन्धी कोई उपबन्ध और ऐसी ही शर्तें पूर्वोक्त ठहराव के अनुसरण में वित्तीय निगम द्वारा नियुक्त किसी निदेशक को लागू नहीं होंगी

(3) उपधारा (2) के अनुसरण में नियुक्त कोई निदेशक-

() वित्तीय निगम के प्रसाद पर्यन्त पद धारण करेगा और वित्तीय निगम के लिखित आदेश द्वारा उसे हटाया जा सकेगा या उसके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को रखा जा सकेगा;

() अपने केवल निदेशक होने के कारण अथवा निदेशक के रूप में अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सद्भावपूर्वक की गई या की गई किसी बात के लिए अथवा उससे सम्बन्धित किसी बात के लिए किसी बाध्यता या दायित्व के अधीन नहीं होगा;

() चक्रानुक्रम से निवृत्ति का भागी नहीं होगा और ऐसी निवृत्ति के भागी निदेशकों की संख्या की संगणना करने में उसकी गिनती नहीं की जाएगी ]

28. प्रतिषिद्ध कारबार- [(1)] वित्तीय निगम-

 [() इस अधिनियम द्वारा यथाउपबन्धित के सिवाय निक्षेप प्रतिगृहीत नहीं करेगा;

() धारा 25 की उपधारा (1) के खण्ड [(घक)], () और () में यथाउपबंधित के सिवाय किसी कम्पनी के शेयरों या स्टाकों में प्रतिश्रुति नहीं करेगा;]

() अपने स्वयं के शेयरों की प्रतिभूति पर कोई उधार या अग्रिम धन अनुदत नहीं करेगा;

 [() किसी औद्योगिक समुत्थान को, जिसकी बाबत समादत्त शेयर पूंजी और खुली आरक्षितियों का योग दस करोड़ रुपए से अधिक हो या ऐसी उच्चतर रकम हो जो तीस करोड़ रुपए से अनधिक हो, जो राज्य सरकार, लघु उद्योग बैंक की सिफारिश पर राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे किसी भी प्रकार की सहायता देना ]

                3[(2) वित्तीय निगम किसी ऐसे औद्योगिक समुत्थान के साथ किसी भी प्रकार का कारबार नहीं करेगा जिसका स्वत्वधारी, भागीदार, निदेशक, प्रबन्धक, अभिकर्ता, कर्मचारी या प्रत्याभूतिदाता उस वित्तीय निगम का कोई निदेशक है, या जिसमें वित्तीय निगम के एक या अधिक निदेशक मिलकर सारवान हित रखते हैं:

                परन्तु यह धारा किसी औद्योगिक समुत्थान को उस दशा में जब वित्तीय निगम का कोई निदेशक-

(i) सरकार द्वारा या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित सरकारी कम्पनी द्वारा या किसी अन्य विधि से या उसके अधीन स्थापित किसी निगम द्वारा ऐसे समुत्थान बोर्ड के निदेशक के रूप में नामनिर्देशित किया गया है; या

(ii) सरकार द्वारा या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित सरकारी कम्पनी द्वारा या किसी अन्य विधि से या उसके अधीन स्थापित किसी निगम द्वारा उस समुत्थान में धारित शेयरों के आधार पर ऐसे समुत्थान के बोर्ड में निर्वाचित किया गया है,

यथास्थिति, केवल ऐसे नामनिर्देशान या निर्वाचन के कारण लागू नहीं होगी

स्पष्टीकरण-किसी औद्योगिक समुत्थान के सम्बन्ध में सात्रवान् हित" से वित्तीय निगम के एक या अधिक निदेशकों द्वारा या ऐसे निदेशक के [कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 2 के खण्ड (41) में यथापरिभाषित] किसी नातेदार द्वारा, अकेले या मिलकर, औद्योगिक समुत्थान के शेयरों में धारित ऐसा फायदाप्रद हित अभिप्रेत है, जिस पर समादत्त कुल रकम या तो पांच लाख रुपए या औद्योगिक समुत्थान की समादत्त शेयर पूंजी की पांच प्रतिशत, इन दोनों में से जो भी कम हो, उससे अधिक है

(3) उपधारा (2) के उपबन्ध-

(i) राज्य वित्तीय निगम (संशोधन) अधिनियम, 1972 के प्रारम्भ के पूर्व किए गए कारबार के संबंध में किसी संव्यवहार को लागू नहीं होंगे, और ऐसा सब कारबार और उसके सम्बन्ध में कोई संव्यवहार ऐसे क्रियान्वित किए जा सकेंगे या चालू रखे जा सकेंगे मानो वह अधिनियम प्रवृत्त हुआ हो;

(ii) केवल उस समय तक लागू होंगे जब तक उस उपधारा में यथाउपवर्णित निर्योग्यता की पुरोभाव्य शर्तें बनी रहती हैं ]

29. व्यतिक्रम की दशा में वित्तीय निगम के अधिकार-(1) जहां कोई औद्योगिक समुत्थान, जो किसी करार के अधीन वित्तीय निगम के प्रति किसी दायित्व के अधीन है, किसी उधार या अग्रिम धन या उसकी किसी किस्त के प्रतिसंदाय में  [या निगम द्वारा दी गई किसी प्रत्याभूति के संबंध में अपनी बाध्यताओं को पूरा करने में] व्यतिक्रम करता है, या वित्तीय निगम से किए गए अपने करार के निबन्धनों का अन्यथा अनुपालन नहीं करता है, वहां वित्तीय निगम को  [उस औद्योगिक समुत्थान का प्रबन्ध या कब्जा या दोनों ग्रहण करने का अधिकार] होगा तथा वित्तीय निगम के पास गिरवी, बन्धक, आड्मान रखी गई या उसे समनुदेशित सम्पत्ति को  [पट्टे या बिक्री के तौर पर अन्तरित करने] और आप्त करने 7[का अधिकार] होगा

(2) उपधारा (1) के अधीन ॥। अपनी शक्तियों के प्रयोग में वित्तीय निगम द्वारा किया गया सम्पत्ति का अन्तरण अन्तरित सम्पत्ति में या उसके प्रति सभी अधिकार अन्तरिती में ऐसे निहित करेगा [मानो वह अन्तरण] सम्पत्ति के स्वामी द्वारा किया गया हो

(3) वित्तीय निगम द्वारा धारित प्रतिभूति के भागरूप माल से पूर्णतः या भागतः विनिर्मित या उत्पादित माल के बारे में वित्तीय निगम के वे ही अधिकार और शक्तियां होंगी, जो उसे मूल माल के बारे में थीं

 [(4) जहां उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन  [किसी औद्योगिक समुत्थान के विरुद्ध कोई कार्रवाई की गई है] वहां सभी खर्चे 4[प्रभार और व्यय, जो वित्तीय निगम की राय में]  [उसके आनुषंगिक होने के नाते] उसके द्वारा 4[उचित रूप में उपगत किए गए हैं] उस औद्योगिक समुत्थान से वसूलीय होंगे और वह धन, जो उसके द्वारा  ॥। प्राप्त किया जाता है, किसी तत्प्रतिकूल संविदा के अभाव में, उसके द्वारा प्रथमतः ऐसे खर्चों, प्रभारों और व्ययों से संदाय में और द्वितीयतः वित्तीय निगम को देय ऋण के उन्मोचन में उपयोजित किए जाने के लिए न्यासतः धारित किया जाएगा और ऐसे प्राप्त धन की अवशिष्टि उसके हकदार व्यक्ति को दे दी जाएगी ]

(5) [जहां वित्तीय निगम ने किसी औद्योगिक समुत्थान के विरुद्ध उपधारा (1) के उपबन्धों के अधीन कोई कार्रवाई की है] वहां वित्तीय निगम ऐसे समुत्थान के द्वारा या उसके विरुद्ध वादों के प्रयोजनों के लिए उस समुत्थान का स्वामी समझा जाएगा और [समुत्थान] के नाम से वह वाद ला सकेगा और उस पर वाद लाया जा सकेगा

30. करार पाई गई कालावधि से पूर्व प्रतिसंदाय की मांग करने की शक्ति-किसी करार में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी वित्तीय निगम किसी ऐसे औद्योगिक समुत्थान से, जिसे उसने कोई उधार या अग्रिम धन अनुदत्त किया हो लिखित सूचना द्वारा यह अपेक्षा, कि वह वित्तीय निगम के प्रति अपने दायित्वों का पूर्णतः निर्वहन तत्क्षण करे, उस दशा में कर सकेगा, जिसमें-

() बोर्ड को यह प्रतीत होता है कि उस औद्योगिक समुत्थान द्वारा उधार या अग्रिम-धन के लिए अपने आवेदन में किसी तात्त्विक विशिष्टि की बाबत मिथ्या या भ्रामक जानकारी दी गई थी; अथवा

() उस औद्योगिक समुत्थान ने उधार या अग्रिम-धन के विषय में वित्तीय निगम के साथ हुई अपनी संविदा के निबन्धनों का अनुपालन नहीं किया है; अथवा

() इस बात की युक्तियुक्त आशंका है कि वह औद्योगिक समुत्थान अपने ऋणों को चुकाने में असमर्थ है, या उसके विषय में समापन कार्यवाही प्रारम्भ हो सकती है; अथवा

() उधार या अग्रिम-धन के लिए प्रतिभूति के रूप में वित्तीय निगम के पास गिरवी, बन्धक, आड्मान रखी गई या उसको समनुदेशित सम्पत्ति का उस औद्योगिक समुत्थान द्वारा वित्तीय निगम को समाधानप्रद रूप में बीमा नहीं कराया गया है और उसे बीमाकृत नहीं रखा गया है, अथवा उसके मूल्य में इतनी गिरावट हो गई है कि बोर्ड की यह राय है कि उसको समाधानप्रद रूप में अतिरिक्त प्रतिभूति दी जानी चाहिए, और ऐसी प्रतिभूति नहीं दी जाती है; अथवा

() बोर्ड की अनुज्ञा के बिना, औद्योगिक समुत्थान के परिसर में से कोई मशीनरी, संयंत्र या अन्य उपस्कर, चाहे वह प्रतिभूति का भाग हो या हो, प्रतिस्थापित किए बिना हटा लिया जाता है; अथवा

() किसी कारण से वित्तीय निगम के हितों के संरक्षण के लिए यह आवश्यक है

31. वित्तीय निगम द्वारा दावों को प्रवर्तित कराने के लिए विशेष उपबंध-(1) जहां कोई औद्योगिक समुत्थान किसी करार के भंग में, किसी उधार या अग्रिम-धन या उसकी किस्त के प्रतिसंदाय में  [या निगम द्वारा दी गई किसी प्रत्याभूति के संबंध में अपनी बाध्यताओं को पूरा करने में] व्यतिक्रम करता है या वित्तीय निगम के साथ अपने करार के निबन्धनों का अन्यथा अनुपालन नहीं करता है या जहां वित्तीय निगम धारा 30 के अधीन किसी औद्योगिक समुत्थान से किसी उधार या अग्रिम-धन के तुरन्त प्रतिसंदाय की अपेक्षा करता है और वह औद्योगिक समुत्थान ऐसा प्रतिसंदाय नहीं करता है, वहां बोर्ड द्वारा इस निमित्त साधारणतः या विशिष्टतः प्राधिकृत वित्तीय निगम का कोई अधिकारी,  [इस अधिनियम की धारा 29 और सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) की धारा 69 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना,] ऐसे जिला न्यायाधीश से, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय परिसीमाओं के भीतर वह औद्योगिक समुत्थान अपना सम्पूर्ण कारबार या उसका कोई पर्याप्त भाग चलाता है, निम्नलिखित अनुतोषों में से एक या अधिक के लिए आवेदन कर सकेगा, अर्थात्-

() उस सम्पत्ति के विक्रय के आदेश के लिए, जो उधार या अग्रिम-धन के लिए प्रतिभूति के रूप में [वित्तीय निगम] के पास गिरवी, बन्धक या आडमान रखी गई है, या उसे समनुदेशित है; अथवा

 [(कक) किसी प्रतिभू के दायित्व को प्रवर्तित करने के लिए; या

() औद्योगिक समुत्थान का प्रबन्ध वित्तीय निगम को अन्तरित करने के लिए; अथवा

() बोर्ड की अनुज्ञा के बिना औद्योगिक समुत्थान के परिसर में से मशीनरी या उपस्कर को अन्तरित करने या हटाने से औद्योगिक समुत्थान को अवरुद्ध करने वाले अन्तरिम व्यादेश के लिए, जहां ऐसे हटाए जाने की आशंका है

                (2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन में वित्तीय निगम के प्रति औद्योगिक समुत्थान के दायित्व की प्रकृति और विस्तार का, तथा उस आधार का, जिस पर आवेदन किया गया है और ऐसी अन्य विशिष्टियों का, जैसी विहित की जाएं, विवरण होगा

32. धारा 31 के अधीन आवेदनों के सम्बन्ध में जिला न्यायाधीश की प्रक्रिया-(1) जब आवेदन धारा 31 की उपधारा (1) के उपखण्ड () और () में वर्णित अनुतोषों के लिए है तब जिला न्यायाधीश, प्रतिभूति की, या औद्योगिक समुत्थान की उतनी सम्पत्ति की, जितनी की बाबत उसका यह प्राक्कलन है कि विक्रीत किए जाने पर उससे वित्तीय निगम के प्रति औद्योगिक समुत्थान के परादेय दायित्व के तथा धारा 31 के अधीन की गई कार्यवाहियों के खर्चे के योग के बराबर रकम वसूल हो जाएगी, कुर्की का अन्तरिम आदेश औद्योगिक समुत्थान को अपनी मशीनरी या उपस्कर अन्तरित करने या हटाने से अवरुद्ध करने के अन्तरिम आदेश के सहित या उसके बिना पारित करेगा

 [(1) जब आवेदन धारा 31 की उपधारा (1) के खण्ड (कक) में वर्णित अनुतोष के लिए है तब जिला न्यायाधीश, प्रतिभू से यह अपेक्षा करने वाली एक सूचना जारी करेगा कि वह उस तारीख को, जो सूचना में विनिर्दिष्ट होगी, यह कारण दर्शित करे कि उसके दायित्व को क्यों प्रवर्तित किया जाए ]

(2) जहां आवेदन धारा 31 की उपधारा (1) के खण्ड () में वर्णित अनुतोष के लिए है वहां जिला न्यायाधीश, औद्योगिक समुत्थान को अपनी मशीनरी या उपस्कर अन्तरित करने या हटाने से अवरुद्ध करने वाला एक अन्तरिम व्यादेश अनुदत्त करेगा और औद्योगिक समुत्थान से यह अपेक्षा करने वाली एक सूचना जारी करेगा कि औद्योगिक समुत्थान उस तारीख को, जो सूचना में विनिर्दिष्ट होगी, इसका कारण दर्शित करे कि उस औद्योगिक समुत्थान का प्रबन्ध वित्तीय निगम को क्यों अन्तरित कर दिया जाए

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन कोई आदेश पारित करने 3[अथवा उपधारा (1) के अधीन कोई सूचना जारी करने] से पूर्व जिला न्यायाधीश, यदि वह ठीक समझे, आवेदन करने वाले अधिकारी की परीक्षा कर सकेगा

 [(4) जिला न्यायाधीश उसी समय जिस समय वह उपधारा (1) के अधीन आदेश पारित करता है औद्योगिक समुत्थान या संलग्न प्रतिभूति के स्वामी को एक सूचना जिसके साथ आदेश की, आवेदन की और उस साक्ष्य की, यदि कोई हो, जो उसके द्वारा अभिलिखित किया गया है, प्रतियां भी होंगी, देगा जिसमें औद्योगिक समुत्थान या प्रतिभूति के स्वामी से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह उस तारीख को, जो सूचना में विनिर्दिष्ट होगी, यह कारण दर्शित करे कि कुर्की का अंतरिम आदेश अंतिम क्यों कर दिया जाए या व्यादेश की पुष्टि क्यों कर दी जाए

(4) यदि उपधारा (1) के अधीन सूचना में विनिर्दिष्ट तारीख को या उससे पूर्व कोई कारण दर्शित नहीं किया जाता है तो जिला न्यायाधीश प्रतिभू के दायित्व के प्रवर्तन के लिए तुरंत आदेश देगा ]

(5) यदि उपधारा (2) और (4) के अधीन सूचना में विनिर्दिष्ट तारीख को या उसके पूर्व कोई कारण दर्शित नहीं किया जाता है तो जिला न्यायाधीश तत्क्षण अन्तरिम आदेश को अंतिम कर देगा और कुर्क की गई सम्पत्ति के विक्रय का निदेश देगा और औद्योगिक समुत्थान का प्रबन्ध वित्तीय निगम को अन्तरित कर देगा या व्यादेश को पुष्ट कर देगा

(6) यदि कारण दर्शित किया जाता है तो जिला न्यायाधीश वित्तीय निगम के दावे का अन्वेषण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के उपबंधों के अनुसार, जहां तक ऐसे उपबन्ध लागू हों, करने के लिए कार्यवाही आरम्भ करेगा

(7) उपधारा (6) के अधीन अन्वेषण करने के पश्चात् न्यायाधीश-

                () कुर्की का आदेश पुष्ट कर सकेगा और कुर्क की गई सम्पत्ति के विक्रय का निदेश दे सकेगा;

() कुर्की के आदेश में ऐसा फेरफार कर सकेगा कि कुर्क की गई सम्पत्ति का कोई भाग कुर्की से निर्मुक्त हो जाए, और कुर्क की गई सम्पत्ति के शेष भाग के विक्रय का निदेश दे सकेगा;

() सम्पत्ति को कुर्की से निर्मुक्त कर सकेगा;

() व्यादेश को पुष्ट या विघटित कर सकेगा; ॥।

 [(घक) प्रतिभू के दायित्व के प्रवर्तन के लिए निदेश दे सकेगा या इस निमित्त किए गए दावे को नामंजूर कर सकेगा, अथवा]

() औद्योगिक समुत्थान का प्रबन्ध वित्तीय निगम को अन्तरित कर सकेगा या इस निमित्त किया गया दावा नामंजूर कर सकेगा:

                परन्तु खण्ड () के अधीन कोई आदेश करते समय 1[या खंड (घक) के अधीन प्रतिभू के दायित्व को प्रवर्तित करने के लिए दावे को नामंजूर करने वाला आदेश करते समय या खंड () के अधीन औद्योगिक समुत्थान के प्रबंध को वित्तीय निगम को अंतरित करने के लिए दावे को नामंजूर करने वाला आदेश करते समय] जिला न्यायाधीश ऐसे अतिरिक्त आदेश कर सकेगा, जैसे वह वित्तीय निगम के हितों के संरक्षण के लिए आवश्यक समझे, और कार्यवाहियों के खर्चों का प्रभाजन ऐसी रीति में कर सकेगा जैसी वह ठीक समझे:

                परन्तु यह और कि जब तक वित्तीय निगम, जिला न्यायाधीश को यह प्रज्ञापित कर दे कि वह किसी सम्पत्ति को कुर्की से निर्मुक्त करने वाले 1[प्रतिभू के दायित्व को प्रवृत्त करने के लिए दावे को नामंजूर करने वाले या औद्योगिक समुत्थान को वित्तीय निगम को अंतरित करने के लिए दावे को नामंजूर करने वाले] आदेश के विरुद्ध अपील करेगा, ऐसा आदेश तब तक प्रभावशील नहीं किया जाएगा जब तक उपधारा (9) के अधीन नियत उस कालावधि का, जिसके भीतर अपील की जा सकती है अवसान हो जाए, अथवा यदि अपील कर दी गई है तो उस दशा के सिवाय जिसमें उच्च न्यायालय अन्यथा निर्दिष्ट करता है, जब तक अपील का निपटारा हो जाए

                (8) इस धारा के अधीन सम्पत्ति की कुर्की या विक्रय का आदेश, यावत्साध्य उस रीति से जो ब्रिकी के निष्पादन में सम्पत्ति की कुर्की या उसके विक्रय के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में उपबंधित है, ऐसे प्रभावशील किया जाएगा मानो वित्तीय निगम डिक्रीदार हो

 [(8) इस धारा के अधीन वित्तीय निगम को किसी औद्योगिक समुत्थान का प्रबन्ध अन्तरित करने वाला आदेश, यावत्साध्य उस रीति से जो डिक्री के निष्पादन में स्थावर सम्पत्ति के कब्जे या जंगम सम्पत्ति के परिदान के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में उपबंधित है ऐसे प्रभावशील किया जाएगा मानो वित्तीय निगम डिक्रीदार हो ]

(9) [उपधारा (4), उपधारा (5)] या उपधारा (7) के अधीन किसी आदेश से व्यथित कोई पक्षकार, आदेश की तारीख से तीन दिन के भीतर उच्च न्यायालय में अपील कर सकेगा और ऐसी अपील होने पर उच्च न्यायालय पक्षकारों की सुनवाई करने के पश्चात् उस पर ऐसे आदेश पारित कर सकेगा जैसे वह उचित समझे

(10) जहां औद्योगिक समुत्थान के बारे में समापन की कार्यवाहियां धारा 31 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन करने से पूर्व प्रारम्भ हो चुकी हैं, वहां इस धारा की किसी बात का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह औद्योगिक समुत्थान के अन्य लेनदारों पर वित्तीय निगम को कोई ऐसा अधिमान देती है जो किसी अन्य विधि द्वारा उसे प्रदत्त हो

 [(11) इस धारा के अधीन जिला न्यायाधीश के कृत्य-

() प्रेसिडेन्सी नगर में, जहां अधिकारिता रखने वाला नगर सिविल न्यायालय है वहां उस न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा और ऐसे न्यायालय के अभाव में उच्च न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य होंगे; तथा

() अन्यत्र, अपर जिला न्यायाधीश द्वारा भी प्रयोक्तव्य होंगे; [या सिविल अधिकारिता वाले प्रधान न्यायालय के किसी न्यायाधीश] ]

5[(12) शंकाओं के निराकरण के लिए एतद्द्वारा यह घोषित किया जाता है कि इस धारा के अधीन अन्तरिम व्यादेश अनुदत्त करने के लिए सक्षम किसी न्यायालय को रिसीवर नियुक्त करने की शक्ति और उससे आनुषंगिक सभी अन्य शक्तियों का प्रयोग करने की शक्ति भी होगी ]

 [32. औद्योगिक समुत्थान का प्रबन्ध ग्रहण कर लिए जाने पर उसके निदेशक या प्रशासक नियुक्त करने की वित्तीय निगम की शक्ति-(1) जब किसी औद्योगिक समुत्थान का प्रबन्ध वित्तीय निगम द्वारा ग्रहण कर लिया गया हो तब वित्तीय निगम, राजपत्र में अधिसूचित आदेश द्वारा इतने व्यक्तियों को जितने वह ठीक समझे-

() उस दशा में जिसमें औद्योगिक समुत्थान कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में यथापरिभाषित कम्पनी है, उस औद्योगिक समुत्थान के निदेशक नियुक्त कर सकेगा; या

() किसी अन्य दशा में उस औद्योगिक समुत्थान के प्रशासक नियुक्त कर सकेगा

                (2) इस धारा के अधीन निदेशक या प्रशासक नियुक्त करने की शक्ति के अन्तर्गत किसी व्यष्टि, फर्म या कम्पनी को, उस औद्योगिक समुत्थान का, ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर, जैसे वित्तीय निगम ठीक समझे, प्रबन्ध-अभिकर्ता या प्रबन्धक नियुक्त करने की शक्ति भी है

 [(3) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि की या उस औद्योगिक समुत्थान से सम्बन्धित किसी लिखत की कोई बात जहां तक वह कोई शेयर धारण अर्हता, आयु सीमा, निदेशक पदों की संख्या पर निर्बन्धन, चक्रानुक्रम द्वारा निवर्तन या पद से हटाए जाने के बारे में कोई उपबंध निदेशक के सम्बन्ध में करती है, इस धारा के अधीन वित्तीय निगम द्वारा नियुक्त किसी निदेशक को लागू नहीं होगी ]

32. धारा 32 के अधीन अधिसूचित आदेश का प्रभाव-धारा 32 के अधीन अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने पर-

() यह समझा जाएगा कि उस दशा में जिसमें औद्योगिक समुत्थान कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में यथापरिभाषित कम्पनी है, उन सब व्यक्तियों ने जो अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने के ठीक पूर्व औद्योगिक समुत्थान के निदेशकों के रूप में पद धारण किए हुए थे और किसी अन्य दशा में उन सब व्यक्तियों ने जो अधिसूचित आदेश के जारी किए जाने के ठीक पूर्व औद्योगिक समुत्थान के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण की शक्तियों वाले किसी पद को धारण किए हुए थे उस हैसियत में अपने पद रिक्त कर दिए हैं;

() यह समझा जाएगा कि वह प्रबन्ध संविदा जो औद्योगिक समुत्थान के और उसके किसी ऐसे प्रबन्ध-अभिकर्ता या किसी निदेशक या प्रबन्धक के बीच की गई थी जो अधिसूचित आदेश के निकाले जाने के ठीक पूर्व उस हैसियत में पद धारण किए हुए थे, पर्यवसित हो गई है;

() उस दशा में जिसमें औद्योगिक समुत्थान कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में यथापरिभाषित कम्पनी है यह समझा जाएगा कि धारा 32 के अधीन नियुक्त प्रबन्ध-अभिकर्ता, यदि कोई हो, उक्त अधिनियम, और औद्योगिक समुत्थान के ज्ञापन और संगम-अनुच्छेद के अनुसरण में सम्यक् रूप से नियुक्त किया गया था और उक्त अधिनियम के और ज्ञापन और अनुच्छेदों के उपबन्ध इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट अन्य उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, तद्नुसार लागू होंगे, किन्तु कोई भी ऐसा प्रबन्ध-अभिकर्ता वित्तीय निगम की पूर्व सम्मिति के बिना पद से हटाया नहीं जाएगा;

() वे निदेशक या प्रशासक जो धारा 32 के अधीन नियुक्त किए गए हैं ऐसी सभी सम्पत्ति, चीजबस्त और अनुयोज्य दावों को, जिनका औद्योगिक समुत्थान हकदार है या प्रतीत होता है, अपनी अभिरक्षा या अपने नियंत्रण में लेने के लिए ऐसे कदम उठाएंगे, जो आवश्यक हों और औद्योगिक समुत्थान की सभी सम्पत्ति और चीजबस्त अधिसूचित आदेश की तारीख से, यथास्थिति, निदेशकों या प्रशासकों की अभिरक्षा में समझी जाएगी;

() वे निदेशक जो धारा 32 के अधीन नियुक्त किए गए हैं, सब प्रयोजनों के लिए, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन सम्यक् रूप से गठित औद्योगिक समुत्थान के निदेशक होंगे और निदेशकों या, यथास्थिति, औद्योगिक समुत्थान के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण की शक्तियों का प्रयोग करने वाले व्यक्तियों की सब शक्तियों का प्रयोग करने के हकदार केवल ऐसे निदेशक या, यथास्थिति, धारा 32 के अधीन नियुक्त प्रशासक ही होंगे चाहे ऐसी शक्तियां उक्त अधिनियम से, या औद्योगिक समुत्थान के ज्ञापन या संगम-अनुच्छेदों से अथवा किसी अन्य स्रोत से, व्युत्पन्न हों

32. निदेशकों और प्रशासकों की शक्तियां और कर्तव्य-(1) वित्तीय निगम के नियंत्रण के अध्यधीन रहते हुए, यथास्थिति, वे निदेशक या प्रशासक जो धारा 32 के अधीन नियुक्त किए गए हैं ऐसे कदम उठाएंगे जैसे औद्योगिक समुत्थान के कारबार का दक्षतापूर्वक प्रबन्ध करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हों और ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेंगे और उनके ऐसे कर्तव्य होंगे जैसे विहित किए जाएं

(2) उपधारा (1) के अधीन उनमें निहित शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यथास्थिति, वे निदेशक या प्रशासक जो धारा 32 के अधीन नियुक्त किए गए हैं, औद्योगिक समुत्थान के और किसी अन्य व्यक्ति के बीच किसी ऐसी संविदा या करार को, जो धारा 32 के अधीन अधिसूचित आदेश के निकाले जाने से पूर्व किसी समय किया गया हो, रद्द करने या उसमें फेरफार करने के प्रयोजन के लिए न्यायालय से आवेदन, वित्तीय निगम के पूर्व अनुमोदन से कर सकेंगे और यदि सम्यक् जांच के पश्चात् न्यायालय का समाधान हो जाए कि ऐसी संविदा या ऐसा करार असद्भावपूर्वक किया गया था और औद्योगिक समुत्थान के हितों के लिए हानिकर है तो वह उस संविदा या करार को रद्द करने या उसमें फेरफार करने का आदेश (चाहे अशर्त या ऐसी शर्तों के अध्यधीन जैसी अधिरोपित करना वह ठीक समझे) करेगा और वह संविदा या करार तद्नुसार प्रभावी होगा

32. प्रबन्ध-अभिकर्ता, प्रबन्ध निदेशक आदि की संविदा के पर्यवसान के लिए प्रतिकर का कोई अधिकार नहीं होगा-(1) किसी संविदा या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में किसी बात के होते हुए भी किसी औद्योगिक समुत्थान का कोई भी प्रबन्ध-अभिकर्ता, प्रबन्ध निदेशक या कोई अन्य निदेशक या प्रबन्धक या प्रबन्ध का भारसाधक कोई व्यक्ति पद के पर्यवसान के लिए या अपने द्वारा ऐसे समुत्थान के साथ की गई किसी प्रबन्ध संविदा के इस अधिनियम के अधीन समय-पूर्व पर्यवसान के लिए, किसी भी प्रतिकर का हकदार होगा

(2) उपधारा (1) की कोई भी बात ऐसे किसी प्रबन्ध-अभिकर्ता, या प्रबन्ध निदेशक या किसी अन्य निदेशक या प्रबन्धक या प्रबन्ध के भारसाधक किसी व्यक्ति के उस अधिकार पर प्रभाव डालेगी जो उसे ऐसे प्रतिकर से अन्यथा वसूलीय धनराशियों को उस औद्योगिक समुत्थान से वसूल करने के बारे में हो

32. 1956 के अधिनियम 1 का लागू होना-(1) जहां किसी ऐसे औद्योगिक समुत्थान का प्रबन्ध, जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में यथापरिभाषित कम्पनी हो, वित्तीय निगम द्वारा ग्रहण कर लिया जाए वहां उक्त अधिनियम में, या ऐसे समुत्थान के ज्ञापन या संगम-अनुच्छेदों में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी-

() ऐसे समुत्थान के शेयर धारकों के लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए किसी व्यक्ति को समुत्थान का निदेशक नामनिर्देशित या नियुक्त करना विधिपूर्ण नहीं होगा;

() कोई भी संकल्प जो ऐसे समुत्थान के शेयर धारकों की किसी बैठक में पारित हुआ हो तब तक प्रभावशील नहीं किया जाएगा जब तक कि वह निगम द्वारा अनुमोदित हो जाए;

() ऐसे समुत्थान के परिसमापन के लिए या उसकी बाबत रिसीवर की नियुक्ति के लिए वित्तीय निगम की सम्मति के बिना कोई भी कार्यवाही किसी न्यायालय में होगी

(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के, और इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट अन्य उपबन्धों के अध्यधीन तथा राज्य सरकार के परामर्श से केन्द्रीय सरकार द्वारा, इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट ऐसे अन्य अपवादों, निर्बन्धनों और परिसीमाओं के, यदि कोई हों, अध्यधीन रहते हुए कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) ऐसे समुत्थान को वैसी ही रीति में लागू होता रहेगा जैसे वह उसे धारा 32 के अधीन अधिसूचित आदेश के निकाले जाने से पूर्व लागू होता था

32. कम्पनी होने वाले किसी औद्योगिक समुत्थान के उस दशा में जिसमें उसका प्रबन्ध-ग्रहण कर लिया जाता है, विघटन आदि के लिए वाद फाइल करने पर निर्बन्धन-(1) जब किसी औद्योगिक समुत्थान का प्रबन्ध, जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में यथापरिभाषित कम्पनी नहीं है, वित्तीय निगम द्वारा ग्रहण कर लिया जाता है तब विघटन के लिए या विभाजन के लिए कोई वाद या कार्यवाही जहां तक उसका सम्बन्ध उस औद्योगिक समुत्थान से है, किसी न्यायालय में या किसी अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष वित्तीय निगम की सम्मति के बिना नहीं होगी

(2) किसी औद्योगिक समुत्थान के सम्बन्ध में जिसका प्रबन्ध वित्तीय निगम द्वारा ग्रहण कर लिया गया है, किसी शासकीय समनुदेशिती या रिसीवर की नियुक्ति के लिए कोई कार्यवाही किसी न्यायालय में वित्तीय निगम की सम्मति के बिना नहीं होगी  

 [32. वित्तीय निगम को देय धन की भू-राजस्व की बकाया के रूप में वसूली-जहां वित्तीय निगम द्वारा किसी औद्योगिक समुत्थान को अनुदत्त किसी सौकर्य की बाबत कोई रकम वित्तीय निगम को देय हो वहां वित्तीय निगम या उसके द्वारा इस निमित्त लिखित रूप में प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति, वसूली के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसे देय रकम की वसूली के लिए राज्य सरकार से आवेदन कर सकेगा और यदि राज्य सरकार या ऐसे प्राधिकारी का, जिसे वह सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करने के पश्चात्, जो नियमों द्वारा विहित की जाए, समाधान हो जाता है कि कोई रकम देय है तो वह कलक्टर को उस रकम के लिए प्रमाणपत्र जारी कर सकेगा और कलक्टर उस रकम को उसी रीति से वसूल करने के लिए अग्रसर होगा जैसे भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती है ]

अध्याय 4

निधियों का विनिधान, लेखा और संपरीक्षा

33. वित्तीय निगम की निधियां-(1) प्रत्येक वित्तीय निगम की अपनी निधि होगी और वित्तीय निगम की सब प्राप्तियां उसमें रखी जाएंगी और निगम द्वारा सभी संदाय उसमें से किए जाएंगे

(2) निधि की सब धनराशियां रिजर्व बैंक  [या भारतीय स्टेट बैंक अथवा भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथापरिभाषित किसी समनुषंगी बैंक में]  [या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की प्रथम अनुसूची के स्तम्भ 2 में विनिर्दिष्ट बैंकों में से किसी बैंक में]  [या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 48) की प्रथम अनुसूची के स्तंभ 2 में विनिर्दिष्ट बैंकों में से किसी बैंक में]  [अथवा रिजर्व बैंक से परामर्श करके किसी अनुसूचित बैंक या राज्य सहकारी बैंक में जमा की जाएंगी ]

 [34. निधियों का विनिधान-वित्तीय निगम, अपनी निधियों का विनिधान, बोर्ड द्वारा समय-समय पर विनिश्चित की जाने वाली प्रतिभूतियों में और लागू मार्गदर्शक सिद्धान्त तथा ऐसे विवेकपूर्ण मानदण्डों के अनुसरण में, जो विहित किए जाएं, कर सकेगा ]

35. लाभों का व्ययन-(1) वित्तीय निगम एक आरक्षित निधि स्थापित करेगा

(2) डूबे और शंकास्पद ऋणों, आस्तियों के अवक्षयण, और ऐसी सभी अन्य बातों के लिए प्रबन्ध करने के पश्चात् जिनके लिए बैंककारी कम्पनियां प्रायः प्रबन्ध करती हैं वित्तीय निगम अपने शुद्ध वार्षिक लाभों में से लाभांश घोषित कर सकेगा:

                                                                                                                                                                                       

                                                                                                                                                                                       

 [35. विशेष आरक्षित निधि-(1) वित्तीय निगम, एक विशेष आरक्षित निधि स्थापित करेगा जिसमें राज्य सरकार, विकास बैंक और लघु उद्योग बैंक को वित्तीय निगम के शेयरों पर, उद्भूत होने वाले लाभांशों का इतना भाग अन्तरित किया जाएगा जितना राज्य सरकार, विकास बैंक और लघु उद्योग बैंक के बीच करार द्वारा नियत किया जाए:

परन्तु यह कि अधिसूचित तारीख के पश्चात् यह उपधारा इस प्रकार प्रभावी होगी मानो राज्य सरकार, विकास बैंक और लघु उद्योग बैंक" शब्दों के स्थान पर, राज्य सरकार और लघु उद्योग बैंक" शब्द रखे गए हों, सिवाय उन सभी लाभांशों के बारे में जो अधिसूचित तारीख से पूर्व की संपूरित लेखा अवधि की बाबत उद्भूत हुए हों

(2) राज्य सरकार या लघु उद्योग बैंक से भिन्न वित्तीय निगम के किसी शेयर धारक का विशेष आरक्षित निधि पर कोई दावा नहीं होगा  

(3) विशेष आरक्षित निधि में जमा रकम का वित्तीय निगम द्वारा केवल उन प्रयोजनों के लिए उपयोग किया जा सकेगा जो राज्य सरकार और लघु उद्योग बैंक द्वारा अनुमोदित किए जाएं ]

36. साधारण बैठकें-(1) एक साधारण बैठक (जो इसके पश्चात् इसमें वार्षिक साधारण बैठक के रूप में निर्दिष्ट है) वित्तीय निगम के वार्षिक लेखाओं के बन्द किए जाने की तारीख से [चार मास] के भीतर प्रतिवर्ष राज्य में ऐसे स्थान पर की जाएगी जहां वित्तीय निगम का कोई कार्यालय है और बोर्ड द्वारा किसी अन्य समय पर भी साधारण बैठक बुलाई जा सकेगी  

 [(2) वार्षिक साधारण अधिवेशन में उपस्थित शेयर धारकों को, -

() वित्तीय निगम के, जिस तारीख को लेखे बंद और संतुलित किए जाते हैं, उस तारीख तक के तुलनपत्र और लाभ और हानि लेखे;

() लेखाओं के अन्तर्गत आने वाली अवधि में वित्तीय निगम के कामकाज की रिपोर्ट;

() तुलनपत्र और लेखाओं के बारे में संपरीक्षक की रिपोर्ट; और

() लाभांश घोषित करने और आरक्षित निधि के पंजीकरण के प्रस्तावों,

पर विचार-विमर्श और अंगीकृत करने का अधिकार होगा

(3) वार्षिक साधारण अधिवेशन में उपस्थित शेयर धारक, इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ऐसे अधिवेशनों के संव्यवहारों में किसी अन्य विषय पर भी विचार-विमर्श कर सकते हैं ]

37. संपरीक्षा- [(1) वित्तीय निगम के लेखाओं की संपरीक्षा, ऐसे संपरीक्षकों द्वारा की जाएगी जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 226 की उपधारा (1) के अधीन संपरीक्षकों के रूप में कार्य करने के लिए सम्यक् रूप में अर्हित हों, जिनकी नियुक्ति वित्तीय निगम द्वारा शेयर धारकों के साधारण अधिवेशन में, भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित संपरीक्षकों के पैनल में से और ऐसे निबंधनों और ऐसे पारिश्रमिक पर की जाएगी जो रिजर्व बैंक नियत करे ]

(2) वित्तीय निगम की वार्षिक तुलनपत्र की एक प्रति हर संपरीक्षक को दी जाएगी, और उससे संबंधित लेखाओं और वाउचरों के साथ उसकी परीक्षा करना उसका कर्तव्य होगा, तथा हर संपरीक्षक को वित्तीय निगम द्वारा रखी गई सब बहियों की एक सूची परिदत्त की जाएगी और उसकी सभी युक्तियुक्त समयों पर वित्तीय निगम की बहियों, लेखाओं और अन्य दस्तावेजों तक पहुंच होगी और वह ऐसे लेखाओं के सम्बन्ध में वित्तीय निगम के किसी भी निदेशक या अधिकारी की परीक्षा कर सकेगा

(3) संपरीक्षक वार्षिक तुलनपत्र और लेखाओं के बारे में अपनी रिपोर्ट शेयर धारकों को देंगे और ऐसी हर रिपोर्ट में वे यह कथन करेंगे कि क्या उनकी राय में तुलनपत्र पूर्ण और सही तुलनपत्र है जिसमें सभी आवश्यक विशिष्टियां अन्तर्विष्ट हैं और वह उचित रूप से लिखा गया है जिससे वित्तीय निगम के कार्यकलाप की स्थिति का सच्चा और ठीक रूप प्रदर्शित होता है और उस दशा में जबकि उन्होंने बोर्ड से कोई स्पष्टीकरण या जानकारी मांगी हो तो क्या वह दी जा चुकी है और समाधानप्रद है

(4) राज्य सरकार भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक के परामर्श से, किसी भी समय संपरीक्षकों को उनसे यह अपेक्षा करने वाले निदेश दे सकेगी कि वे निगम द्वारा अपने शेयर धारकों और लेनदारों के संरक्षण के लिए किए गए उपायों की यथायोग्यता पर, या वित्तीय निगम के कार्यकलाप की संपरीक्षा में उनके द्वारा बरती गई प्रक्रियाओं की पर्याप्तता पर रिपोर्ट दें और यदि उसकी राय में लोकहित ऐसी अपेक्षा करें तो संपरीक्षा की परिधि में वृद्धि या विस्तार कर सकेगी, या निदेश दे सकेगी कि संपरीक्षा में कोई भिन्न प्रक्रिया अपनाई जाए या यह निदेश दे सकेगी कि संपरीक्षकों द्वारा कोई अन्य परीक्षा की जाए

(5) वित्तीय निगम संपरीक्षकों की प्रत्येक रिपोर्ट की एक प्रति को शेयर धारकों के समक्ष रखने से कम से कम एक मास पूर्व भारत के नियंत्रक और महालेखापरीक्षक को भेजेगा

(6) पूर्वगामी उपधाराओं में किसी बात कृषि के होते हुए भी भारत का नियंत्रक और महालेखापरीक्षक या तो स्वप्रेरणा पर या राज्य सरकार से इस निमित्त निवेदन मिलने पर ऐसी संपरीक्षा ऐसे समय पर कर सकेगा जैसा वह आवश्यक समझे:

                                                                                                                                                                                       

(7) धारा 6 के अधीन हर संपरीक्षा की रिपोर्ट राज्य सरकार को अग्रेषित की जाएगी और सरकार उसे राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगी

 [37. निरीक्षण-(1) [लघु उद्योग बैंक] किसी समय, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से और उस सरकार द्वारा वैसा करने के लिए निदेश दिए जाने पर, किसी वित्तीय निगम के कार्यकरण और उसकी बहियोंतथा लेखाओं का अपने एक या अधिक अधिकारियों द्वारा निरीक्षण कराएगा, और 3[लघु उद्योग बैंक] ऐसे निरीक्षण की रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को और राज्य सरकार को भेजेगा, तथा, उसकी एक प्रति वित्तीय निगम को देगा

(2) वित्तीय निगम के प्रत्येक निदेशक या प्रत्येक अधिकारी का कर्तव्य होगा कि वह उपधारा (1) के अधीन निरीक्षण करने वाले किसी अधिकारी को ऐसी सब बहियां, लेखे और अन्य दस्तावेज पेश करे जो उसकी अभिरक्षा या शक्ति में हों और वित्तीय निगम के कामकाज से सम्बन्धित कोई विवरण या जानकारी जो उक्त अधिकारी अपेक्षित करे इतने समय के अन्दर जितना उक्त अधिकारी विनिर्दिष्ट करे, उसे दे

(3) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी को 3[लघु उद्योग बैंक] या उसके किन्हीं अधिकारियों से यह अपेक्षा करने की शक्ति नहीं होगी कि वे उपधारा (1) के अधीन अपने द्वारा किए गए निरीक्षण की रिपोर्ट या उसकी कोई प्रति ऐसे न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी के समक्ष पेश करें

(4) राज्य सरकार उपधारा (1) के अधीन उसे भेजी गई किसी रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् बोर्ड को ऐसे अनुदेश दे सकेगी जैसे वह आवश्यक समझे और ऐसे अनुदेशों का पालन करना बोर्ड का कर्तव्य होगा ]

38. विवरणियां- [(1) वित्तीय निगम राज्य सरकार, [लघु उद्योग बैंक] और रिजर्व बैंक को ऐसे विवरण और विवरणियां ऐसे प्ररूप में देगा जैसे राज्य सरकार, 5[लघु उद्योग बैंक] या रिजर्व बैंक समय-समय पर अपेक्षा करे ]

(2) वित्तीय निगम,  [राज्य सरकार, 5[लघु उद्योग बैंक] और रिजर्व बैंक को], प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति से  [चार मास के भीतर, उस वर्ष की समाप्ति पर अपनी आस्तियों और दायित्वों का विहित प्ररूप में एक विवरण, उस वर्ष के लिए हानि और लाभ के लेखा, संपरीक्षकों की रिपोर्ट और उस वर्ष के दौरान वित्तीय निगम के कार्यकरण पर एक रिपोर्ट सहित देगा, और उक्त विवरण, लेखा और रिपोर्ट की प्रतियां राजपत्र में प्रकाशित की जाएंगी और राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखी जाएंगी ]

अध्याय 5

प्रकीर्ण

39. नीति के प्रश्नों पर वित्तीय निगम को अनुदेश देने की शक्ति-(1) बोर्ड का अपने कृत्यों के निर्वहन में नीति के प्रश्नों पर ऐसे अनुदेशों से मार्गदर्शन होगा जो उसे [ [लघु उद्योग बैंक] से परामर्श करके [और उसकी सलाह प्राप्त करने के पश्चात्]] राज्य सरकार द्वारा दिए जाएं

(2) यदि राज्य सरकार और बोर्ड के बीच यह विवाद उठे कि कोई प्रश्न नीति का प्रश्न है या नहीं है तो राज्य सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा

 [(2) उपधारा (1) और उपधारा (2) में की कोई बात ऐसी दशा में लागू नहीं होगी जहां राज्य सरकार, वित्तीय निगम में साधारण शेयरों के इक्यावन प्रतिशत से कम धारित करती हो

(2) राज्य सरकार द्वारा वित्तीय निगम के साधारण शेयर धारण किए जाने पर भी नीति संबंधी विषयों पर राज्य सरकार वित्तीय निगम को सलाह दे सकेगी ]

(3) यदि बोर्ड  [इस धारा की उपधारा (1) के अधीन] राज्य सरकार द्वारा अधिकथित नीति के प्रश्न पर अनुदेशों को अथवा 2[धारा 37 की उपधारा (4) के अधीन] बोर्ड को दिए गए अनुदेशों को कार्यान्वित करने में असफल हो तो राज्य सरकार को शक्ति होगी कि वह बोर्ड को अतिष्ठित कर दे और उसके स्थान पर एक अन्य बोर्ड की नियुक्ति तब तक कार्य करने के लिए कर दे जब तक समुचित रूप से गठित बोर्ड स्थापित कर दिया जाए और बोर्ड को अतिष्ठित करने के आधारों के बारे में राज्य सरकार का विनिश्चय किसी भी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा

40. विश्वस्तता और गोपनीयता की घोषणा- [(1) वित्तीय निगम अपने संघटकों से या उनके कार्यकलाप से सम्बन्धित कोई जानकारी, इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा अन्यथा अपेक्षित के सिवाय, उन परिस्थितियों में ही जिनमें विधि अथवा बैंककारों की रूढ़िगत पद्धति और प्रथा के अनुसार, उस वित्तीय संस्था के लिए ऐसी जानकारी प्रकट करना आवश्यक या समुचित है, प्रकट करेगा, अन्यथा नहीं  

(2) वित्तीय निगम इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के प्रयोजन के लिए, -

                () केन्द्रीय सरकार से; अथवा

() भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक से, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) के अर्थ में किसी समनुषंगी बैंक से, बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन अथवा बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरणअधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित किसी तत्स्थानी नए बैंक से, किसी अन्य अनुसूचित बैंक से, किसी  [राज्य सहकारी बैंक, लघु उद्योग बैंक या विकास बैंक] से,

ऐसी प्रत्यय विषयक जानकारी या अन्य जानकारी, जैसी वह उस प्रयोजन के लिए उपयोगी समझे, ऐसी रीति से और ऐसे समय पर जो वह उचित समझे, संगृहीत कर सकेगा या उसे ऐसी जानकारी दे सकेगा

                स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, प्रत्यय विषयक जानकारी" पद का इस उपान्तर के अधीन रहते हुए कि उसमें निर्दिष्ट बैंककारी कम्पनी से इस उपधारा के खंड () में निर्दिष्ट बैंक अभिप्रेत होगा, वही अर्थ होगा जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की उपधारा 45 के खंड () में है ]

 [(3) वित्तीय निगम का प्रत्येक निदेशक, संपरीक्षक, अधिकारी या अन्य कर्मचारी अपने कर्तव्य ग्रहण करने से पूर्व अनुसूची में दिए गए प्ररूप में विश्वस्तता और गोपनीयता की घोषणा करेगा ]

  [(4) इस धारा की कोई बात प्रत्यय विषयक जानकारी कंपनी (विनियमन) अधिनियम, 2005 के अधीन प्रकट की गई प्रत्यय विषयक जानकारी को लागू नहीं होगी ]

41. निदेशकों की क्षतिपूर्ति-(1) प्रत्येक निदेशक की उसके कर्तव्यों के निर्वहन में उसके द्वारा उपगत सभी हानियों और व्ययों की बाबत जो उसके जानबूझकर किए गए कार्य या व्यतिक्रम से हुए हों वित्तीय निगम द्वारा क्षतिपूर्ति की जाएगी

(2) कोई निदेशक वित्तीय निगम के किसी अन्य निदेशक के लिए या किसी अधिकारी अथवा अन्य कर्मचारी के लिए या वित्तीय निगम की किसी ऐसी हानि या व्यय के लिए जो वित्तीय निगम की ओर से अर्जित की गई या ली गई किसी सम्पत्ति या प्रतिभूति के मूल्य की या उसमें हक की अपर्याप्तता या कमी के, अथवा वित्तीय निगम के प्रति बाध्यताधीन किसी व्यक्ति के सदोष कार्य के, अथवा अपने पद के या उससे सम्बन्धित कर्तव्यों के निष्पादन में सद्भावपूर्वक की गई किसी बात के फलस्वरूप हो, उत्तरदायी नहीं होगा

 [41. धारा 27 या धारा 32 के अधीन नियुक्त व्यक्तियों द्वारा की गई कार्रवाई के लिए परित्राण-धारा 27 या धारा 32 के अनुसरण में वित्तीय निगम द्वारा निदेशक, प्रशासक, प्रबंध अभिकर्ता या प्रबन्धक के रूप में नियुक्त किसी व्यक्ति के विरुद्ध, किसी ऐसी बात के लिए जो ऐसे निदेशक, प्रशासक, प्रबंध अभिकर्ता या प्रबंधक के रूप में उस द्वारा सद्भावपूर्वक की गई है या की जाने के लिए आशयित है, कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी

 [41. निक्षेपों, बंधपत्रों आदि के संबंध में नामनिर्देशन-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जहां किन्हीं निक्षेपों, बंधपत्रों या अन्य प्रतिभूतियों की बाबत विहित रीति से कोई नामनिर्देशन किया जाता है, वहां उनके निक्षेपकर्ता या उसके धारक की मृत्यु पर ऐसे निक्षेपों, बंधपत्रों या प्रतिभूतियों पर देय रकम उस नामनिर्देशिती में निहित और उसे संदेय होगी किन्तु यह किसी अन्य व्यक्ति के ऐसे निक्षेपों, बंधपत्रों या प्रतिभूतियों में किसी अधिकार, हक या हित के अधीन रहते हुए होगा

(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार वित्तीय निगम द्वारा कोई संदाय ऐसे निक्षेपों, बंधपत्रों या प्रतिभूतियों की बाबत वित्तीय निगम के दायित्व के पूर्ण उन्मोचन में होगा ]

42. अपराध-(1) जो कोई वित्तीय निगम को दिए गए किसी वहन-पत्र, भांडागार-रसीद या अन्य लिखत में जिसके द्वारा वित्तीय निगम को इस अधिनियम के अधीन उस द्वारा अनुदत्त किसी संविदा के लिए प्रतिभूति दी गई है या दी जानी तात्पर्यित है जानबूझकर मिथ्या कथन करेगा या जानते हुए किसी मिथ्या कथन का किया जाना अनुज्ञात करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दण्डनीय होगा

(2) जो कोई वित्तीय निगम की लिखित सम्मति के बिना किसी विवरण पत्रिका या विज्ञापन में वित्तीय निगम के नाम का उपयोग करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दण्डनीय होगा

(3) इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान कोई भी न्यायालय बोर्ड द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत वित्तीय निगम के किसी अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित लिखित परिवाद के बिना नहीं करेगा

43. आय-कर और अधिकर से सम्बन्धित उपबंध- [आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43)] के प्रयोजनों के लिए वित्तीय निगम उस अधिनियम के अर्थ में कम्पनी समझा जाएगा और अपनी आय, लाभों और अभिलाभों पर तद्नुसार आय-कर और अधिकर का दायी होगा:

परन्तु ॥। [धारा 7 या धारा 8] के अनुसरण में दी गई प्रत्याभूति के अधीन राज्य सरकार द्वारा संदत्त किसी राशि को वित्तीय निगम की आय, लाभ और अभिलाभ नहीं माना जाएगा और ऐसी राशि में से वित्तीय निगम द्वारा संदत्त डिबेंचरों, [बंधपत्रों या निक्षेपों] पर किसी ब्याज को उस द्वारा उपगत व्यय नहीं माना जाएगा:

परन्तु यह और कि किसी शेयर धारक की दशा में लाभांशों का ऐसा भाग जो राज्य सरकार द्वारा अग्रिम रूप से संदत्त किसी ऐसी राशि में से दिया गया है, प्रतिभूतियों पर ब्याज" से हुई उसकी आय समझा जाएगा [और उस पर आय-कर ऐसे संदेय होगा मानो वह उस अधिनियम की धारा 8 के अर्थ में आय-कर से मुक्त रूप में पुरोधृत राज्य सरकार की किसी प्रतिभूति पर प्राप्य ब्याज हो]

 [43. शक्तियों का प्रत्यायोजन-बोर्ड साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कर्तव्यों में से उन्हें, जिन्हें प्रत्यायोजित करना वह आवश्यक समझे वित्तीय निगम के प्रबंध-निदेशक को या किसी अन्य अधिकारी को [अथवा धारा 21 के अधीन नियुक्त किसी समिति को] ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के, यदि कोई हों, जैसी उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, अधीन प्रत्यायोजित कर सकेगा ]

 [43. बोर्ड को रिपोर्टें-(1) धारा 21 के अधीन नियुक्त समिति की प्रत्येक बैठक के कार्यवृत्त, समिति की अगली बैठक में उनके पुष्टीकरण के पश्चात् बोर्ड की आगामी बैठक में उसके समक्ष रखे जाएंगे

                                                                                                                                                                                      

44. 1891 के अधिनियम 18 का वित्तीय निगम की बहियों को लागू होना-वित्तीय निगम बैंककार बही साक्ष्य अधिनियम, 1891 (1891 का 18) के प्रयोजनों के लिए बैंक समझा जाएगा

45. वित्तीय निगम का समापन-कम्पनियों या निगमों के समापन से सम्बद्ध विधि का कोई भी उपबंध वित्तीय निगम को लागू नहीं होगा और वित्तीय निगम को राज्य सरकार के आदेश के और ऐसी रीति के सिवाय जैसी वह निदिष्ट करे समापनाधीन नहीं किया जाएगा

46. अधिनियम के प्रारम्भ पर विद्यमान कतिपय वित्तीय संस्थाओं को अधिनियम को लागू करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के सब या कोई उपबंध ऐसे अपवादों और निर्बन्धनों के अधीन, जैसे विनिर्दिष्ट किए जाएं,  [किसी राज्य सरकार द्वारा स्थापित किसी ऐसी संस्था कोट लागू होंगे जिसका उद्देश्य औद्योगिक समुत्थानों का वित्तपोषण करना हो, और ऐसी अधिसूचना के निकाले जाने पर वह संस्था इस अधिनियम के अर्थ में उस राज्य के लिए राज्य सरकार द्वारा स्थापित वित्तीय निगम समझी जाएगी, और इस अधिनियम के उपबन्ध इस अधिसूचना के तात्पर्य के अनुसार उसको लागू हो जाएंगे :

 [परंतु किसी संस्था के संबंध में इस उपधारा के अधीन कोई अधिसूचना तब तक नहीं निकाली जाएगी जब तक संबद्ध राज्य सरकार द्वारा उस निमित्त अनुरोध नहीं किया जाता है ]

(2) उपधारा (1) के अधीन निकाली गई कोई अधिसूचना, उस अधिसूचना के निकाले जाने से ठीक पूर्व किसी ऐसी संस्था को लागू किसी अधिनियमिति के प्रवर्तन को निलम्बित कर सकेगी

 [46. वित्तीय निगम की अधिकारिता का करार द्वारा अन्य राज्यों को विस्तार-(1) जब कोई वित्तीय निगम किसी राज्य के लिए स्थापित किया गया है  [और ऐसा एक या अधिक अन्य राज्य जिसकी या जिनकी आवश्यकताओं की पूर्णतः या भागतः पूर्ति वित्तीय निगम द्वारा नहीं होती] चाहता है कि वह वित्तीय निगम  [उन राज्यों या उनके किसी क्षेत्र की आवश्यकताओं की भी पूर्ति करेऔर वे राज्य,  [लघु उद्योग बैंक] से परामर्श करने के पश्चात् एक करार करते हैं जो उन राज्यों में से प्रत्येक के राजपत्र में प्रकाशित किया जाए, तब वह वित्तीय निगम, केन्द्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचना के निकाले जाने पर, उस करार के निबंधनों के अनुसार  [यथास्थिति, उन राज्यों की या उनके उस क्षेत्र की आवश्यकताओं की पूर्ति करेगाट 7[और कोई वित्तीय निगम या कोई राज्य, एक दूसरे के साथ या राज्यों के अन्य वित्तीय निगमों के साथ और राज्यों के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के सम्बन्ध में यथापूर्वोक्त पृथक् या आनुक्रमिक करार कर सकेगा ]

7[(1) उपधारा (1) के अधीन किया गया कोई करार उसके पक्षकारों के बीच पारस्परिक करार द्वारा उपांतरित या विखण्डित किया जा सकेगा और प्रत्येक ऐसा पारस्परिक करार आस्तियों और दायित्वों के प्रभाजन की भी व्यवस्था करेगा ]

(2) अन्तर्राज्यिक करार में, जो उसमें सम्मिलित होने वाले राज्यों के बीच हो, यथासम्भव ऐसे सब उपबंध होंगे जैसे धारा 3 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट हैं

46. अन्य विधियों पर अधिनियम का प्रभाव-इस अधिनियम के और तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों या किए गए आदेशों के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी औद्योगिक समुत्थान के ज्ञापन या संगम-अनुच्छेदों में अथवा इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावशील किसी अन्य लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावशील होंगे, किन्तु यथापूर्वोक्त के सिवाय, इस अधिनियम के उपबंध, किसी औद्योगिक समुत्थान को तत्समय लागू किसी अन्य विधि के अतिरिक्त होंगे कि उसके अल्पीकरण में ]

                                                                                                                                                                                       

48. बोर्ड की विनियम बनाने की शक्ति-(1) [लघु उद्योग बैंक] से परामर्श करने के पश्चात् और राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से, बोर्ड, उन सब बातों के लिए उपबंध करने को जिनके लिए उपबंध करना इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावशील करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन है ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों से असंगत हों

(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे, -

() इस अधिनियम के अधीन निर्वाचन करना और उनका संचालन जिसके अन्तर्गत निर्वाचनों की विधिमान्यता के बारे में शंकाओं या विवादों का अंतिम विनिश्चय भी है;

() वह रीति जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन वित्तीय निगम के शेयरों का प्रथम आबंटन किया जाएगा;

() वह रीति जिसमें और वे शर्तें जिनके अधीन वित्तीय निगम के शेयरों का धारण और अन्तरण किया जा सकेगा तथा साधारणतः वे सब बातें जो शेयर धारकों के अधिकारों और कर्तव्यों से संबंधित हों;

 [(गक) धारा 6 के अधीन शेयर धारकों के रजिस्टर को बनाए रखना, ऐसे रजिस्टर में दर्ज की जाने वाली विशिष्टियां, कंप्यूटर की फ्लापियों या डिस्कैटों, कम्पैक्ट डिस्क या कोई अन्य इलेक्ट्रानिक प्ररूप में शेयर धारकों के रजिस्टर के अनुरक्षण में पालन किए जाने वाले रक्षोपाय, शेयर धारकों के रजिस्टर का निरीक्षण और उसका बंद किया जाना और उससे संबंधित अन्य सभी विषय;

(गख) धारा 10 के खंड () के अधीन निदेशकों के नामनिर्देशन की रीति;

(गग) धारा 17 की उपधारा (1) के खंड () के अधीन बोर्ड द्वारा प्रबंध निदेशक को कर्तव्यों का सौंपा जाना या प्रत्यायोजन;

(गघ) धारा 18 की उपधारा (2) के अधीन कार्यपालिका समिति के कृत्य;

(गङ) वे मार्गदर्शक सिद्धांत और विवेकपूर्ण मानदंड जिनके अनुसार धारा 34 के अधीन विनिधान किया जा सकेगा;

(गच) वह रीति जिसमें धारा 41 के अधीन नामनिर्देशन किया जा सकेगा; और

(गछ) ऐसी रकमों का जो तत्समय कारबार के संव्यवहार के लिए अपेक्षित नहीं हो, विनिधान (चाहे बैंक में निक्षेप के रूप में या अन्यथा हो)];

() वह रीति जिसमें साधारण बैठकें बुलाई जाएंगी, उनमें अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया और वह रीति जिसमें मताधिकारों का प्रयोग किया जा सकेगा;

() बोर्ड और कार्यपालिका समिति की बैठकें बुलाना; उनकी बैठकों में उपस्थिति के लिए फीसें और उनमें कारबार का संचालन;

() वित्तीय निगम द्वारा बंधपत्रों और डिबेंचरों के निर्गमन और प्रतिसंदाय की रीति तथा निबंधन;

() वे शर्तें जिन्हें वित्तीय निगम उधार या अग्रिम धन देने में अधिरोपित कर सकेगा;

                                                       

() इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित विवरणियों और विवरणों के प्ररूप;

() वित्तीय निगम के कर्मचारियों, सलाहकारों और अभिकर्ताओं से भिन्न अधिकारियों के कर्तव्य और आचरण;

() वित्तीय निगम के कर्मचारियों के लिए भविष्य या अन्य प्रसुविधाओं निधियों की स्थापना और उनको बनाए रखना;

() वित्तीय निगम के साथ किए गए करार के भंग पर किसी औद्योगिक समुत्थान के प्रबंध को ग्रहण कर लेना;

() इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए [समितियों] की नियुक्ति, उनकी [बैठकों में उपस्थिति के लिए फीसें और उनमें कारबार का संचालन]; और

() सामान्यतया वित्तीय निगम के कार्यालयों का दक्ष संचालन;

1[() वह प्ररूप और रीति, जिसमें वित्तीय निगम के तुलनपत्र और लेखे तैयार किए जाएंगे;

() विहित किए जाने वाले या किए जा सकने वाले कोई अन्य विषय ]

 

 [(3) इस धारा के अधीन बनाए गए सब विनियम राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे और ऐसा कोई विनियम ऐसी पूर्ववर्ती या पश्चात्वर्ती तारीख से प्रभावशील होगा जो विनियमों में विनिर्दिष्ट की जाए ]

 [48. नियमों और विनियमों का राज्य विधान मंडल के समक्ष रखा जाना- ॥। धारा 48 के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा ]

 

 

 [48. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में धारा 5 की उपधारा (5) के अधीन अपील फाइल करने और उसकी सुनवाई की प्रक्रिया के लिए उपबंध किया जा सकेगा

(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ]

 [49. कठिनाई दूर करने की शक्ति-यदि लोक वित्तीय संस्था विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 द्वारा यथासंशोधित इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार कठिनाई दूर करने के प्रयोजन के लिए, आदेश द्वारा, ऐसी बात कर सकेगी जो ऐसे उपबन्धों से असंगत हो:

परन्तु ऐसा कोई आदेश उक्त संशोधन अधिनियम के प्रारम्भ से तीन वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा ]

अनुसूची

[धारा 40(3) देखिए]

विश्वस्तता और गोपनीयता की घोषणा

मैं..............................., इस द्वारा घोषणा करता हूं कि मैं वफादारी, सच्चाई और अपने सर्वोत्तम कौशल और योग्यता से उन कर्तव्यों का निष्पादन और पालन करूंगा जो वित्तीय निगम के (यथास्थिति) निदेशक, अधिकारी, कर्मचारी या संपरीक्षक के रूप में में मुझसे अपेक्षित हैं और जो उक्त वित्तीय निगम में मेरे द्वारा धारित किसी पद या स्थिति से उचित रूप से संबंधित हैं

                मै यह भी घोषणा करता हूं कि मैं वित्तीय निगम के कार्यकलाप से सम्बन्धित कोई जानकारी, ऐसे किसी व्यक्ति को संसूचित नहीं करूंगा या नहीं होने दूंगा, जो वैध रूप से उसका हकदार हो और मैं ऐसे किसी व्यक्ति को, वित्तीय निगम की या उसके कब्जे में की और वित्तीय निगम के कारबार से सम्बन्धित किन्हीं भी बहियों या दस्तावेजों का निरीक्षण करने दूंगा और उन तक उसकी पहुंच होने दूंगा

 

हस्ताक्षर……………….

मेरे समक्ष हस्ताक्षर किए:

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