Friday, 01, May, 2026
 
 
 
Expand O P Jindal Global University
 

धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 ( Prevention of Money Laundering Act, 2002 )


 

धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002

(2003 का अधिनियम संख्यांक 15)

[17 जनवरी, 2003]

धन-शोधन के निवारण और धन-शोधन से व्युत्पन्न या उसमें

अंतर्वलित सम्पत्ति के अधिहरण और

उससे संसक्त या आनुषंगिक

विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा उसके सत्रहवें विशेष सत्र में 23 फरवरी, 1990 को संकल्प एस-17/2 से उपाबद्ध राजनैतिक घोषणा और कार्रवाई संबंधी विश्वव्यापी कार्यक्रम अंगीकार किया गया था;

और 8 जून से 10 जून, 1998 तक हुए संयुक्त राष्ट्र महासभा के विशेष सत्र द्वारा अंगीकार की गई राजनैतिक घोषणा में सदस्य देशों से मांग की गई है कि वे राष्ट्रीय धन-शोधन विधान और कार्यक्रम को अंगीकार करें;

और पूर्वोक्त संकल्प और घोषणा को कार्यान्िवत करना आवश्यक समझा गया है;

भारत गणराज्य के तिरपनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनिमित होः-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम धन-शोधन निवारण अधिनियम, 2002 है

(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और किसी ऐसे उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

() न्यायनिर्णायक प्राधिकारी" से धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त न्यायनिर्णायक प्राधिकारी अभिप्रेत है

(ख) अपील अधिकरण" से धारा 25 के अधीन स्थापित अपील अधिकरण अभिप्रेत है;

(ग) सहायक निदेशक" से धारा 49 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त सहायक निदेशक अभिप्रेत है;

(घ) कुर्की" से अध्याय 3 के अधीन जारी किए गए किसी आदेश द्वारा सम्पत्ति का अंतरण, संपरिवर्तन, व्ययन या संचलन का प्रतिषेध अभिप्रेत है;

 [(घक) प्राधिकृत व्यक्ति" से विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) की धारा 2 के खंड (ग) में यथा परिभाषित प्राधिकृत व्यक्ति अभिप्रेत है;]

() बैंककारी कंपनी" से कोई ऐसी बैंककारी कंपनी या सहकारी बैंक अभिप्रेत है जिसको बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) लागू होता है और इसके अंतर्गत उस अधिनियम की धारा 51 में निर्दिष्ट कोई बैंक या बैंककारी संस्था है;

(च) न्यायपीठ" से अपील अधिकरण की न्यायपीठ अभिप्रेत है;

 [(चक) हिताधिकारी स्वामी" से ऐसा व्यष्टि, जो अंततः किसी रिपोर्टकर्ता इकाई का स्वामी है या उसके किसी ग्राहक पर नियंत्रण रखता है या ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसकी ओर से कोई संव्यहार किया जा रहा है और इसके अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है, जो किसी विधिक व्यक्ति पर अंतिम प्रभावशाली नियंत्रण का प्रयोग करता है;]

(छ) अध्यक्ष" से अपील अधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(ज) चिट फंड कंपनी" से कोई ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जो चिट फंड अधिनियम, 1982 (1982 का 40) की धारा 2 में यथापरिभाषित फोरमैन, अभिकर्ता या किसी अन्य हैसियत में चिटों का प्रबंध, संचालन या पर्यवेक्षण कर रही है;

 [(जक) ग्राहक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो किसी रिपोर्टकर्ता इकाई के साथ किसी वित्तीय संव्यवहार और क्रियाकलाप में लगा हुआ है और इसके अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है, जिसकी ओर से वह व्यक्ति, जिसने संव्यवहार या क्रियाकलाप में लगाया हुआ है, कार्य कर रहा है;]

(झ) सहकारी बैंक" का वही अर्थ होगा जो निक्षेप बीमा और प्रत्यय गारंटी निगम अधिनियम, 1961 (1961 का 47) की धारा 2 के खंड (घघ) में है;

1[(झक) तत्स्थानी विधि" से इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों के तत्समान किसी विदेश की या उस देश में के ऐसे अपराधों से, जो अनुसूचित अपराधों में से किसी के तत्समान हो, संबद्ध कोई विधि अभिप्रेत है;

(झख) व्यौहारी" का वही अर्थ है, जो केंद्रीय विक्रय-कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) की धारा 2 के खंड () में उसका है;]

(ञ) उपनिदेशक" से धारा 49 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त उपनिदेशक अभिप्रेत है;

  ।                            ।                              ।                              ।                              ।                              ।             

(ट) निदेशक" या अपर निदेशक" या संयुक्त निदेशक" से, धारा 49 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त, यथास्थिति, निदेशक या अपर निदेशक या संयुक्त निदेशक अभिप्रेत है;

  [() वित्तीय संस्था" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 45 के खंड () में यथा परिभाषित वित्तीय संस्था अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत कोई चिट फंड कंपनी, आवास वित्त संस्था, कोई प्राधिकृत व्यक्ति, कोई संदाय प्रणाली आपरेटर, कोई गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी तथा भारत सरकार का डाक विभाग भी है;]

(ड) आवास वित्त संस्था" का वही अर्थ होगा जो राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 (1987 का 53) की धारा 2 के खंड (घ) में है;

3[(ढ) मध्यवर्ती" से, -

(i) कोई स्टाक दलाल, उप दलाल, शेयर अंतरण अभिकर्ता, किसी निर्गम (इश्यू) का बैंककार, किसी न्यास विलेख का न्यासी, निर्गम का रजिस्ट्रार, वाणिज्यिक बैंककार, निम्नांकक, संविभाग प्रबंधक, विनिधान सलाहकार या ऐसा कोई अन्य मध्यवर्ती, जो प्रतिभूति बाजार से सहयुक्त और भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 12 के अधीन रजिस्ट्रीकृत है; या 

(ii) अग्रिम संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952 (1952 का 74) के अधीन मान्यताप्राप्त या रजिस्ट्रीकृत कोई संगम या ऐसे संगम का कोई सदस्य; या

(iii) पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण द्वारा रजिस्ट्रीकृत मध्यवर्ती; या

(iv) प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) की धारा 2 के खंड (च) में निर्दिष्ट कोई मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंज, अभिप्रेत है;]

 [(ढक) अन्वेषण" के अंतर्गत साक्ष्य के संग्रहण के लिए निदेशक द्वारा या इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन की गई सभी कार्यवाहियां हैं;]

(ण) सदस्य" से अपील अधिकरण का सदस्य अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत अध्यक्ष भी है;

(त) धन-शोधन" का वही अर्थ है जो धारा 3 में है;

 (थ) गैर-सरकारी वित्तीय कंपनी" का वह अर्थ होगा जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 45झ के खंड (च) में है; । । ।

(द) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

 [(दक) सीमा के आर-पार विवक्षाओं वाले अपराध" से निम्नलिखित अभिप्रेत है-

(i) भारत के बाहर किसी स्थान पर किसी व्यक्ति द्वारा किया गया ऐसा कोई आचरण, जो उस स्थान पर किसी अपराध का गठन करता है और जिसने अनुसूची के भाग क, भाग ख या भाग ग में विनिर्दिष्ट कोई अपराध गठित किया होता यदि वह भारत में किया गया होता और यदि ऐसा व्यक्ति ऐसे आचरण के आगमों या उनके किसी भाग को भारत में [किसी रीति में अंतरित] करता है; या

(ii) अनुसूची के भाग , भाग या भाग में विनिर्दिष्ट ऐसा कोई अपराध जो भारत में किया गया है और अपराध के आगमों या उनके भाग को भारत के बाहर किसी स्थान को अंतरित किया गया है या अपराध के आगमों या उनके भाग को भारत से भारत के बाहर किसी स्थान को अंतरित किए जाने का कोई प्रयत्न किया गया है

स्पष्टीकरण-इस खंड की कोई बात धन-शोधन निवारण (संशोधन) अधिनियम, 2009 के प्रारंभ से पूर्व अधिनियम की अनुसूची के भाग क या भाग ख में विनिर्दिष्ट अपराधों के संबंध में किसी प्राधिकारी के समक्ष किसी अन्वेषण, जांच विचारण या कार्यवाही पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी;

(दख) संदाय प्रणाली" से ऐसी प्रणाली अभिप्रेत है जो किसी संदायकर्ता और हिताधिकारी के बीच संदाय किए जाने को समर्थ बनाती है, जिसमें समाशोधन, संदाय या व्यवस्थापन सेवा अथवा वे सभी अंतर्वलित हैं ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए संदाय प्रणाली" के अंतर्गत ऐसी प्रणालियां भी हैं, जो क्रेडिट कार्ड प्रचालनों, डेबिट कार्ड प्रचालनों, स्मार्ट कार्ड प्रचालनों, धन अंतरण प्रचालनों या इसी प्रकार के प्रचालनों को समर्थ बनाती हैं;

(दग) संदाय प्रणाली प्रचालक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो किसी संदाय प्रणाली को प्रचालित करता है और ऐसे व्यक्ति के अंतर्गत उसका विदेशी मालिक भी है ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, विदेशी मालिक" से निम्नलिखित अभिप्रेत है, -

() ऐसे किसी व्यक्ति की दशा में, जो व्यष्टि है, भारत के बाहर निवास करने वाला ऐसा व्यष्टि, जो भारत में संदाय प्रणाली के क्रियाकलापों या कृत्यों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वामी है या उस पर नियंत्रण रखता है या उसका प्रबंध करता है

() हिंदू अविभक्त कुटुंब की दशा में, भारत के बाहर रहने वाले ऐसे हिंदू अविभक्त कुटुंब का कर्ता, जो भारत में संदाय प्रणाली के क्रियाकलापों या कृत्यों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वामी है या उस पर नियंत्रण रखता है या उसका प्रबंध करता है;

(इ) किसी कंपनी, फर्म, व्यक्तियों के संगम, व्यष्टि-निकाय, कृत्रिम विधिक व्यक्ति की दशा में, चाहे निगमित हो या नहीं, भारत के बाहर निगमित या रजिस्ट्रीकृत या उस रूप में विद्यमान ऐसी कंपनी, फर्म, व्यक्तियों का संगम, व्यष्टि-निकाय, कृत्रिम विधिक व्यक्ति, जो भारत में संदाय प्रणाली के क्रियाकलापों या कृत्यों का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से स्वामी है या उस पर नियंत्रण रखता है या उसका प्रबंध करता है;]

(ध) व्यक्ति" के अंतर्गत निम्नलिखित हैं-

(i) व्यष्टि,

(ii) हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब,

(iii) कंपनी,

(iv) फर्म,

(v) व्यक्तियों का संगम या व्यष्टियों का निकाय, चाहे निगमित हो या नहीं;

(vi) प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति, जो पूर्ववर्ती उपखंडों में से किसी के भीतर न आता हो, और

(vii) पूर्ववर्ती उपखंडों में उल्लिखित उपरोक्त व्यक्तियों में से किसी व्यक्ति के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन कोई अभिकरण, कार्यालय या शाखा;

[(धक) अभिहित कारबार या वृत्ति चलाने वाले व्यक्ति" से निम्नलिखित अभिप्रेत हैं, -

(i) नकद या वस्तु के लिए सट्टे के खेल खेलने संबंधी क्रियाकलाप करने वाला कोई व्यक्ति, और इसके अंतर्गत कैसिनो से सहयुक्त क्रियाकलाप भी हैं;

(ii) रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) की धारा 6 के अधीन नियुक्त कोई रजिस्ट्रार या उप रजिस्ट्रार, जैसा केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए;

(iii) भू-संपदा अभिकर्ता, जैसा केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए; 

(iv) बहुमूल्य धातुओं और बहुमूल्य रत्नों तथा अन्य उच्च मूल्य वाले माल का व्यौहारी, जैसा केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए;

(v) अन्य व्यक्तियों की ओर से नकदी और द्रव्य प्रतिभूतियों को सुरक्षित रखने और उनके प्रशासन में लगा हुआ व्यक्ति, जैसा केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए; या

(vi) ऐसे अन्य क्रियाकलाप करने वाला व्यक्ति, जिसे केंदीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, समय-समय पर इस प्रकार अभिहित करे;

(धख) बहुमूल्य धातु" से सोना, चांदी, प्लैटिनम, पैलेडियम या रोडियम या ऐसी अन्य धातु अभिप्रेत है, जो केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित की जाए; 

(धग) बहुमूल्य रत्न" से हीरा, पन्ना, माणिक्य, नीलम या कोई ऐसा अन्य रत्न अभिप्रेत है, जो केंद्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए;]

(न) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

() अपराध के आगम" से किसी व्यक्ति द्वारा अनुसूचित अपराध से संबंधित आपराधिक गतिविधि के परिणामस्वरूप प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से व्युत्पन्न या अभिप्राप्त की गई कोई संपत्ति या ऐसी किसी संपत्ति का मूल्य अभिप्रेत है;

(फ) संपत्ति" से कोई संपत्ति या किसी भी वर्णन की आस्तियां अभिप्रेत हैं चाहे वे भौतिक या अभौतिक, जंगम या स्थावर, मूर्त या अमूर्त हैं, और इसके अंतर्गत ऐसी संपत्ति या आस्तियों के, चाहे वे कहीं भी अवस्थित हों, हक या उनमें के हित को साक्ष्यित करने वाले विलेख और लिखत भी हैं ।

1[स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए, यह स्पष्ट किया जाता है कि संपत्ति" पद के अंतर्गत इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध या किसी अनुसूचित अपराध को करने में प्रयुक्त किसी प्रकार की संपत्ति भी है ;

(फक) भू-संपदा अभिकर्ता" से वित्त अधिनियम, 1994 (1994 का 32) की धारा 65 के खंड (88) में यथापरिभाषित कोई भू-संपदा अभिकर्ता अभिप्रेत है;]

(ब) अभिलेख के अंतर्गत पुस्तकों के रूप में या कंप्यूटर में या ऐसे अन्य किसी रूप में, जो विहित किया जाए, रखा गया अभिलेख है;

1[(बक) रिपोर्टकर्ता इकाई" से कोई बैंककारी कंपनी, वित्तीय संस्था, मध्यवर्ती या कोई अभिहित कारबार या वृत्ति चलाने वाला कोई व्यक्ति अभिप्रेत है;]

(भ) अनुसूची" से इस अधिनियम की अनुसूची अभिप्रेत है;

(म) अनुसूचित अपराध" से अभिप्रेत है, -

(i) अनुसूची के भाग क के अधीन विनिर्दिष्ट अपराध; या

 [(ii) अनुसूची के भाग ख के अधीन विनिर्दिष्ट अपराध, यदि ऐसे अपराधों में अंतर्वलित कुल मूल्य तीस लाख रुपए या अधिक है; या 

(iii) अनुसूची के भाग ग के अधीन विनिर्दिष्ट अपराध;]

(य) विशेष न्यायालय" से ऐसा सेशन न्यायालय अभिप्रेत है जिसे धारा 43 की उपधारा (1) के अधीन विशेष न्यायालय के रूप में अभिहित किया गया है;

(यक) अंतरण" के अंतर्गत विक्रय, क्रय, बंधक, गिरवी, दान, उधार या अधिकार, हक, कब्जा या धारणाधिकार के अंतरण का कोई अन्य रूप है;

(यख) मूल्य" से किसी व्यक्ति द्वारा संपत्ति अर्जन की तारीख को या यदि ऐसी तारीख अवधारित नहीं की जा सकती तो उस तारीख को, जिसको ऐसे व्यक्ति द्वारा ऐसी संपत्ति का कब्जा लिया गया है, उस संपत्ति का उचित बाजार मूल्य अभिप्रेत है

(2) किसी अधिनियमिति या उसके किसी उपबंध के प्रति इस अधिनियम या अनुसूची में किसी निर्देश का, उस क्षेत्र के संबंध में जिसमें ऐसी अधिनियमिति या ऐसा उपबंध प्रवर्तन में नहीं है, यह अर्थ लगाया जाएगा मानो वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त किसी तत्स्थानी विधि या उस तत्स्थानी विधि के सुसंगत उपबंधों, यदि कोई हों, के प्रति निर्देश है

अध्याय 2

धन-शोधन का अपराध

3. धन-शोधन का अपराध- [जो कोई, अपराध के आगमों से संबधित ऐसी किसी प्रक्रिया या क्रियाकलाप में, जिसके अंतर्गत उसका छिपाया जाना, कब्जा रखना, अर्जन या उपयोग भी है, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः लिप्त होने का प्रयत्न करेगा या जानते हुए सहायता करेगा या जानते हुए उसका पक्षकार बनेगा या वास्तव में उसमें अंतर्वलित होगा और निष्कलंक संपत्ति के रूप में उसे प्रस्तुत करेगा या उसका दावा करेगा, वह धन-शोधन के अपराध का दोषी होगा

4. धन-शोधन के लिए दण्ड-जो कोई धन-शोधन का अपराध करेगा वह कठोर कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और वह जुर्माने से भी दंडनीय होगा,

परन्तु जहां धन-शोधन में अतंर्वलित अपराध के आगम अनुसूची के भाग के पैरा 2 के अधीन विनिर्दिष्ट किसी अपराध से संबंधित है, वहां इस धारा के उपबंधों का ऐसा प्रभाव होगा मानो जो सात वर्ष तक की हो सकेगी" शब्दों के स्थान पर जो दस वर्ष तक की हो सकेगी" शब्द रखे गए हों

अध्याय 3

कुर्की, न्यायनिर्णयन और अधिहरण

5. धन-शोधन में अंतर्वलित संपत्ति की कुर्की- [(1) जहां निदेशक या इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निदेशक द्वारा प्राधिकृत ऐसे किसी अन्य अधिकारी, जो उपनिदेशक की पंक्ति से नीचे का न हो, के पास उसके कब्जे में की सामग्री के आधार पर यह विश्वास करने का कारण है (ऐसे विश्वास का कारण लेखबद्ध किया जाएगा) कि, -

(क) किसी व्यक्ति के कब्जे में अपराध के कोई आगम हैं; और

(ख) अपराध के ऐसे आगमों को छिपाए जाने, अंतरित किए जाने या उनका किसी ऐसी रीति में व्यौहार किए जाने की संभावना है, जिसके परिणामस्वरूप इस अध्याय के अधीन अपराध के ऐसे आगमों के अधिहरण से संबंधित कोई कार्यवाहियां निष्फल हो सकती हैं,

वहां, वह लिखित आदेश द्वारा, आदेश की तारीख से एक सौ अस्सी दिन से अनधिक अवधि के लिए ऐसी संपत्ति को, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, अनन्तिम रूप से कुर्क कर सकेगा:

परंतु कुर्की का ऐसा आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि, यथास्थिति, अनुसूचित अपराध के संबंध में कोई रिपोर्ट दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 173 के अधीन किसी मजिस्ट्रेट को अग्रेषित कर दी गई हो या उस अनुसूची में वर्णित अपराध का अन्वेषण करने के लिए प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा अनुसूचित अपराध का संज्ञान लेने के लिए किसी मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष कोई परिवाद फाइल कर दिया गया हो अथवा किसी अन्य देश की तत्स्थानी विधि के अधीन वैसी ही कोई रिपोर्ट कर दी गई हो अथवा परिवाद फाइल कर दिया गया हो

परंतु यह और कि खंड (ख) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी व्यक्ति की किसी संपत्ति की इस धारा के अधीन कुर्की की जा सकेगी, यदि निदेशक या इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निदेशक द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी, जो उपनिदेशक की पंक्ति से नीचे का न हो, के पास उसके कब्जे में की सामग्री के आधार पर, यह विश्वास करने का कारण है (ऐसे विश्वास का कारण लेखबद्ध किया जाएगा) कि यदि धन-शोधन में अंतर्वलित उस संपत्ति को इस अध्याय के अधीन तुरंत कुर्क नहीं किया जाता है तो संपत्ति की कुर्की न किए जाने से इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के निष्फल हो जाने की संभावना है ।]

(2) निदेशक या कोई अन्य अधिकारी जो उपनिदेशक की पंक्ति से नीचे का न हो उपधारा (1) के अधीन कुर्की के ठीक पश्चात्, अपने कब्जे में की सामग्री के साथ उस उपधारा में निर्दिष्ट आदेश की प्रति सीलबंद लिफाफे में, न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को ऐसी रीति से अग्रेषित करेगा जो विहित की जाए और ऐसा न्यायनिर्णायक प्राधिकरण ऐसे आदेश और सामग्री को ऐसी अवधि तक रखेगा, जो विहित की जाए । 

(3) उपधारा (1) के अधीन किया गया कुर्की का प्रत्येक आदेश, उस उपधारा में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति के पश्चात् या धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी आदेश की तारीख को, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, प्रभावहीन हो जाएगा

(4) इस धारा की कोई बात उपधारा (1) के अधीन कुर्क की गई स्थावर संपत्ति के उपभोग में हितबद्ध व्यक्ति को ऐसे उपभोग से निवारित नहीं करेगी ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, किसी स्थावर संपत्ति के संबंध में, हितबद्ध व्यक्ति" के अन्तर्गत संपत्ति में किसी हित का दावा करने वाले या दावा करने के हकदार सभी व्यक्ति हैं ।

(5) निदेशक या कोई अन्य अधिकारी जो उपधारा (1) के अधीन किसी संपत्ति को अनंतिम रूप से कुर्क करता है, ऐसी कुर्की से तीस दिनों की अवधि के भीतर, न्यायनिर्णायक प्राधिकारी के समक्ष ऐसी कुर्की के तथ्यों का कथन करते हुए एक परिवाद फाइल करेगा

6. न्यायनिर्णायक प्राधिकारी की संरचना, शक्तियां, आदि-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए, [एक न्यायनिर्णायक प्राधिकरण] नियुक्त करेगी ।

(2) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण, अध्यक्ष और दो अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा:

परन्तु इनमें से एक-एक सदस्य ऐसा व्यक्ति होगा जिसे विधि, प्रशासन, वित्त या लेखाकर्म के क्षेत्र में अनुभव हो ।

(3) तथापि कोई व्यक्ति न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा, जब तक   कि वह-

(क) विधि के क्षेत्र में-

(i) जिला न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हित न हो,

(ii) भारतीय विधि सेवा का सदस्य न रहा हो और उस सेवा में श्रेणी-1 का पद धारण न किया हो;

(ख) वित्त, लेखाकर्म या प्रशासन के क्षेत्र में जब तक वह ऐसी अर्हताएं न रखता हो जो विहित की जाएं ।

(4) केन्द्रीय सरकार किसी सदस्य को न्यायनिर्णायक प्राधिकरण का अध्यक्ष नियुक्त करेगी ।

(5) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, -

(क) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण की अधिकारिता का प्रयोग उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा;

(ख) न्यायपीठ का गठन न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के अध्यक्ष द्वारा किया जा सकेगा जो एक या दो सदस्यों से मिलकर होगा जैसा न्यायनिर्णायक प्राधिकरण का अध्यक्ष ठीक समझे;

(ग) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण की न्यायपीठों की बैठकें सामान्यतः दिल्ली में और ऐसे अन्य स्थानों पर होंगी जिन्हें केन्द्रीय सरकार, अध्यक्ष के परामर्श से, अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे;

(घ) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसे क्षेत्रों को विनिर्दिष्ट करेगी जिनके संबंध में न्यायनिर्णायक प्राधिकरण की प्रत्येक न्यायपीठ अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगी ।

(6) उपधारा (5) में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष किसी सदस्य को एक न्यायपीठ से दूसरी न्यायपीठ में स्थानान्तरित कर सकेगा

(7) यदि किसी मामले या विषय की सुनवाई के प्रक्रम पर, अध्यक्ष या किसी सदस्य को यह प्रतीत होता है कि मामला या विषय ऐसी प्रकृति का है जिसकी सुनवाई दो सदस्यों से मिलकर बनी न्यायपीठ द्वारा होनी चाहिए, जो उक्त मामले या विषय, यथास्थिति, अध्यक्ष द्वारा अंतरित किया जा सकेगा या अध्यक्ष को, ऐसी न्यायपीठ को, जिसे वह ठीक समझे, अंतरण के लिए निर्देशित किया जा सकेगा ।

(8) अध्यक्ष और प्रत्येक सदस्य अपना-अपना पद उस तारीख से जिसको वह अपना पद ग्रहण करते हैं, पांच वर्ष की अवधि के लिए उस रूप में पद धारण करेंगे:

परंतु कोई अध्यक्ष या अन्य सदस्य अपना पद [पैंसठ] वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् धारित नहीं करेगा ।

(9) सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं:

परंतु न तो सदस्य को संदेय वेतन और भत्तों में और न ही उनकी सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में नियुक्ति के पश्चात् उनके लिए अलाभकारी परिवर्तन किया जाएगा ।

(10) यदि अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के पद में, अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न किसी कारण से कोई रिक्ति होती है तो केन्द्रीय सरकार, उस रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करेगी और न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के समक्ष कार्यवाहियां उस प्रक्रम से जारी रखी जा सकेंगी जिस प्रक्रम पर रिक्ति भरी जाती है ।

(11) अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद-त्याग कर सकेगा: 

परंतु अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, जब तक उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा अपना पद पहले छोड़ने के लिए अनुज्ञा नहीं दी जाती है, तब तक ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास का अवसान होने तक या उसके उत्तराधिकारी के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त व्यक्ति द्वारा अपना पदभार ग्रहण कर लेने तक या उसकी पदावधि का अवसान होने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, अपना पद धारण करता रहेगा । 

(12) अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को उसके पद से केन्द्रीय सरकार द्वारा, सुनवाई का आवश्यक अवसर दिए जाने के पश्चात् किए गए आदेश द्वारा ही हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

(13) अध्यक्ष के पद पर उसकी मृत्यु, पद-त्याग या अन्य कारण से रिक्ति होने की दशा में ज्येष्ठतम सदस्य, न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में उस तारीख तक कार्य करेगा जिसको ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नियुक्त किया गया कोई नया अध्यक्ष अपना पद भार ग्रहण करता है

(14) जब न्यायनिर्णायक प्राधिकरण का अध्यक्ष, अनुपस्थिति, बीमारी के कारण या किसी अन्य कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तब ज्येष्ठतम सदस्य न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के अध्यक्ष के कृत्यों का उस तारीख तक निर्वहन करेगा जिसको न्यायनिर्णायक प्राधिकरण का अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को पुनः संभालता है

(15) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा अधिकथित प्रक्रिया द्वारा आबद्ध नहीं होगा किन्तु नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों से मार्गदर्शित होगा और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।

7. न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार, प्रत्येक न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को ऐसे अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराएगी जैसे वह सरकार ठीक समझे ।

(2) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे ।

(3) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारी के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं ।

8. न्यायनिर्णयन-(1) धारा 5 की उपधारा (5) के अधीन किसी परिवाद या धारा 17 की उपधारा (4) या धारा 18 की उपधारा (10) के अधीन किए गए आवेदनों की प्राप्ति पर, यदि न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी व्यक्ति ने  [धारा 3 के अधीन अपराध किया है और उसके कब्जे में अपराध के आगम हैं] तो वह ऐसे व्यक्ति पर तीस दिन से अन्यून की एक सूचना उसे यह बताने के लिए तामील कर सकेगा कि वह अपनी आय, उपार्जन या आस्तियों के उन स्रोतों को उपदर्शित करे जिनमें से या जिनके द्वारा उसने धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन कुर्क की गई या धारा 17 या धारा 18 के अधीन अभिगृहीत [या अवरुद्ध] की गई संपत्ति अर्जित की है, वह साक्ष्य जिसका वह अवलम्ब लेता है और अन्य सुसंगत जानकारी और विशिष्टियां पेश करे तथा कारण दर्शित करे कि क्यों न सभी या किसी संपत्ति को धन-शोधन में अंतर्वलित संपत्ति के रूप में घोषित कर दिया जाए और उनका केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिहरण कर लिया जाए :

परन्तु जहां इस उपधारा के अधीन कोई सूचना ऐसी संपत्ति को विनिर्दिष्ट करती है जो किसी अन्य व्यक्ति की ओर से उस व्यक्ति द्वारा धारित की गई है वहां ऐसी सूचना की एक प्रति ऐसे अन्य व्यक्ति पर भी तामील की जाएगी:

परन्तु यह और कि जहां ऐसी संपत्ति संयुक्त रूप से एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा धारित है वहां ऐसी सूचना ऐसी संपत्ति धारित करने वाले सभी व्यक्तियों पर तामील की जाएगी ।

(2) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण-

(क) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई सूचना के उत्तर पर, यदि कोई है, विचार करने के पश्चात्;

() व्यथित व्यक्ति और निदेशक या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी की सुनवाई के पश्चात्; और

() उसके समक्ष अभिलेख पर रखी गई सभी सुसंगत सामग्री पर विचार करने के पश्चात्, आदेश द्वारा निष्कर्ष अभिलिखित करेगा कि क्या सभी या कोई एक संपत्ति जो उपधारा (1) के अधीन जारी की गई सूचना में निर्दिष्ट है, धन-शोधन में अंतर्वलित है:

परन्तु यदि संपत्ति का दावा किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया है जो उस व्यक्ति से भिन्न है जिसे सूचना जारी की गई थी, तो ऐसे व्यक्ति को भी यह साबित करने के लिए सुनवाई का अवसर दिया जाएगा कि संपत्ति धन-शोधन में अंतर्वलित नहीं है ।

(3) जहां न्यायनिर्णायक प्राधिकरण उपधारा (2) के अधीन यह विनिश्चित करता है कि कोई संपत्ति धन-शोधन में अंतर्वलित है तो वह लिखित आदेश द्वारा, धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन की गई संपत्ति की कुर्की या [धारा 17 अथवा धारा 18 के अधीन अभिगृहीत या अवरुद्ध संपत्ति अथवा अभिलेख के प्रतिधारण की पुष्टि करेगा तथा उस आशय का निष्कर्ष अभिलिखित करेगा, जिसके पश्चात् ऐसी कुर्की अथवा अभिगृहीत या अवरुद्ध संपत्ति अथवा अभिलेख का प्रतिधारण या अवरोधन-]

(क) 1[यथास्थिति, किसी न्यायालय के समक्ष इस अधिनियम के अधीन या भारत के बाहर दांडिक अधिकारिता वाले सक्षम न्यायालय के समक्ष किसी अन्य देश की तत्समय विधि के अधीन किसी अपराध] के संबंध में कार्यवाहियों के लंबित रहने के दौरान बना रहेगा; और

1[(ख) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण द्वारा धारा 8 की उपधारा (5) या उपधारा (7) या धारा 58ख या धारा 60 की उपधारा (2क) के अधीन अधिहरण का आदेश पारित किए जाने के पश्चात् अंतिम हो जाएगा ।]

(4) जहां धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन किया गया कुर्की का अनंतिम आदेश उपधारा (3) के अधीन पुष्ट कर दिया जाता है वहां निदेशक या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत कोई अन्य अधिकारी 1[धारा 5 के अधीन कुर्क की गई या धारा 17 की उपधारा (1क) के अधीन अवरुद्ध की गई संपत्ति का, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, तत्काल कब्जा ले लेगा:

परंतु यदि धारा 17 की उपधारा (1क) के अधीन अवरुद्ध की गई संपत्ति का कब्जा लेना व्यवहार्य नहीं है तो अधिहरण के आदेश का वही प्रभाव होगा मानो संपत्ति का कब्जा ले लिया गया है ।]

 1[(5) जहां इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के विचारण की समाप्ति पर विशेष न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि धन-शोधन का अपराध किया गया है, वहां वह यह आदेश करेगा कि ऐसी संपत्ति, जो धन-शोधन में अंतर्वलित है या जिसका धन-शोधन के अपराध के किए जाने के लिए उपयोग किया गया है, केंद्रीय सरकार को अधिहृत हो जाएगी ]

(6) जहां इस अधिनियम के अधीन किसी विचारण की समाप्ति पर विशेष न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि धन-शोधन का अपराध नहीं किया गया है या संपत्ति धन-शोधन में अंतर्वलित नहीं है, वहां वह उस संपत्ति को उसे प्राप्त करने के लिए हकदार व्यक्ति को सौंपने का आदेश देगा ।]

(7) जहां अभियुक्त की मृत्यु या अभियुक्त को कोई उद्घोषित अपराधी घोषित किए जाने के कारण या किसी अन्य कारण से, इस अधिनियम के अधीन विचारण नहीं किया जा सका है या प्रारंभ हो जाने पर पूरा नहीं किया जा सका है, वहां विशेष न्यायालय, निदेशक द्वारा या ऐसी किसी संपत्ति के, जिसकी बाबत धारा 8 की उपधारा (3) के अधीन कोई आदेश पारित किया गया है, कब्जे का हकदार होने का दावा करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर उसके समक्ष की सामग्री पर विचार करने के पश्चात् धन-शोधन के अपराध में अंतर्वलित संपत्ति के, यथास्थिति, अधिहरण या उसकी निर्मुक्ति के संबंध में समुचित आदेश पारित करेगा ।]

9. संपत्ति का केन्द्रीय सरकार में निहित होना-जहां किसी व्यक्ति की किसी संपत्ति के संबंध में 1[धारा 8 की उपधारा (5) या उपधारा (7) या धारा 58 या धारा 60 की उपधारा (2)] के अधीन अधिहरण का कोई आदेश किया गया है वहां ऐसी संपत्ति में के सभी अधिकार और हक आत्यंतिक रूप से सभी विल्लंगमों से मुक्त केन्द्रीय सरकार में निहित हो जाएंगे:

परन्तु जहां 1[यथास्थिति, विशेष न्यायालय या न्यायनिर्णायक प्राधिकरण] की इस अध्याय के अधीन कुर्क की गई या अध्याय 5 के अधीन अभिगृहीत  [या अवरुद्ध] की गई किसी संपत्ति में हितबद्ध किसी अन्य व्यक्ति को सुनवाई का अवसर दिए जाने के पश्चात् यह राय है कि संपत्ति पर कोई विल्लंगम या पट्टाधृत हित इस अध्याय के उपबंधों को विफल करने की दृष्टि से सृजित किया गया है, वहां आदेश द्वारा वह ऐसे विल्लंगम या पट्टाधृत हित को शून्य घोषित कर सकेगा और तदुपरि पूर्वोक्त संपत्ति ऐसे विल्लंगमों या पट्टाधृत हित से मुक्त केन्द्रीय सरकार में निहित हो जाएगी :

परन्तु यह और कि इस धारा की कोई बात ऐसे विल्लंगमों के संबंध में किसी दायित्व से किसी व्यक्ति को उन्मोचित करने का प्रभाव नहीं रखेगी जो ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध नुकसानी के वाद द्वारा लागू की जा सके ।

10. इस अध्याय के अधीन अधिहरण की गई संपत्तियों का प्रबंध-(1) केन्द्रीय सरकार राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा उतनी संख्या में, जितनी वह उचित समझे, अधिकारियों को (जो भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे के न हों) प्रशासक के कृत्यों का अनुपालन करने के लिए नियुक्त कर सकेगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्रशासक ऐसी संपत्ति को, जिसके संबंध में [धारा 8 की उपधारा (5) या उपधारा (6) या उपधारा (7) या धारा 58ख या धारा 60 की उपधारा (2क)] के अधीन आदेश पारित किया गया है, ऐसी रीति में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए प्राप्त करेगा और उसका प्रबंध करेगा जो विहित की जाएं ।

(3) प्रशासक ऐसी संपत्ति का व्ययन करने के लिए जो धारा 9 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित है, ऐसे उपाय भी करेगा, जिनका केन्द्रीय सरकार निदेश दे ।

11. समन, दस्तावेज और साक्ष्य पेश किए जाने आदि की बाबत शक्ति-(1) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन, निम्नलिखित मामलों की बाबत किसी वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्ः-

(क) प्रकटीकरण और निरीक्षण;

(ख) किसी व्यक्ति को, जिसके अन्तर्गत किसी बैंककारी कंपनी या वित्तीय संस्था या कम्पनी का कोई अधिकारी भी है, हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

(ग) अभिलेखों के प्रस्तुतीकरण के लिए बाध्य करना;

(घ) शपथ पर साक्ष्य ग्रहण करना;

(ङ) साक्षियों और दस्तावेजों की जांच के लिए कमीशन निकालना; और

(च) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।

(2) इस प्रकार समन किए गए सभी व्यक्ति, व्यक्तिगत रूप में या प्राधिकृत अभिकर्ताओं के माध्यम से उपसंजात होने के लिए आबद्ध होंगे जैसा कि न्यायनिर्णायक प्राधिकरण निदेश दें और ऐसे किसी विषय पर सत्य कथन करने के लिए आबद्ध होंगे जिसकी बाबत उनकी परीक्षा की जाती है या वे कथन करते हैं और ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करेंगे जो अपेक्षित हों

(3) इस धारा के अधीन प्रत्येक कार्यवाही, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत विधिक कार्यवाही समझी जाएगी ।

अध्याय 4

बैंककारी कंपनियों, वित्तीय संस्थाओं और मध्यवर्तियों की बाध्यताएं

 [12. बैंककारी कंपनियों, वित्तीय संस्थाओं और मध्यवर्तियों द्वारा अभिलेखों का रखा जाना-(1) प्रत्येक रिपोर्टकर्ता इकाई, -

(क) सभी संव्यवहारों का, जिनके अंतर्गत खंड (ख) के अधीन आने वाले संव्यवहारों से संबंधित सूचना भी है, ऐसी रीति में अभिलेख रखेगी, जो उसे व्यष्टिक संव्यवहारों की पुनर्रचना करने में समर्थ बनाए; 

(ख) ऐसे संव्यवहारों के संबंध में, चाहे वे प्रयतित हों या निष्पादित, जिनकी प्रकृति और मूल्य विहित किया जा सकता है, सूचना, ऐसे समय के भीतर, जो विहित किया जाए, निदेशक को देगी;

() अपने ग्राहकों की पहचान का, ऐसी रीति में और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, सत्यापन करेगी;

(घ) अपने ऐसे ग्राहकों के, जो विहित किए जाएं, हिताधिकारी स्वामी की, यदि कोई हो, पहचान करेगी;

(ङ) अपने ग्राहकों और हिताधिकारी स्वामियों की पहचान को साक्ष्यित करने वाले दस्तावेजों और अपने ग्राहकों से संबंधित खातों की फाइलों तथा कारबार संबंधी पत्राचार का अभिलेख रखेगी ।

(2) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, रखी गई, दी गई या सत्यापित की गई प्रत्येक सूचना गोपनीय रखी जाएगी ।

(3) उपधारा (1) के खंड (क) में निर्दिष्ट अभिलेख किसी ग्राहक और रिपोर्टकर्ता इकाई के बीच के संव्यवहार की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए रखे जाएंगे ।

(4) उपधारा (1) के खंड () में निर्दिष्ट अभिलेख किसी ग्राहक और रिपोर्टकर्ता इकाई के बीच कारोबारी संबंध समाप्त होने या खाता बंद किए जाने के पश्चात् इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, पांच वर्ष की अवधि के लिए रखे जाएंगे

(5) केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, किसी रिपोर्टकर्ता इकाई या रिपोर्टकर्ता इकाइयों के वर्ग को इस अध्याय के अधीन किसी बाध्यता से छूट प्रदान कर सकेगी ।]

 [12 क. सूचना तक पहुंच-(1) निदेशक, किसी रिपोर्टकर्ता इकाई से धारा 12 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई अभिलेख और ऐसी कोई अतिरिक्त सूचना मंगा सकेगा, जो वह इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझे

(2) प्रत्येक रिपोर्टकर्ता इकाई निदेशक को ऐसी सूचना, जो उपधारा (1) के अधीन उससे अपेक्षित हो, ऐसे समय के भीतर और ऐसी रीति में, जो वह विनिर्दिष्ट करे, प्रस्तुत करेगी ।

(3) तत्समय, प्रवृत्त किसी विधि के अधीन जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, निदेशक द्वारा उपधारा (1) के अधीन ईप्सित प्रत्येक सूचना गोपनीय रखी जाएगी ।]

13. निदेशक की जुर्माना अधिरोपित करने की शक्तियां-(1) निदेशक, या तो स्वप्रेरणा से या किसी प्राधिकारी, अधिकारी या व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर [रिपोर्टकर्ता इकाई की बाध्यताओं के संबंध में ऐसी जांच कर सकेगा या ऐसी जांच करा सकेगा, जिसका वह इस अध्याय के अधीन आवश्यक होना ठीक समझे] । 

 [(1क) यदि निदेशक की अपने समक्ष की जांच या किन्हीं अन्य कार्यवाहियों के किसी प्रक्रम पर, मामले की प्रकृति और जटिलता को ध्यान में रखते हुए, यह राय है कि ऐसा करना आवश्यक है तो वह संबंधित रिपोर्टकर्ता इकाई को अपने अभिलेखों की, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं, इस प्रयोजन के लिए केंद्रीय सरकार द्वारा रखे गए लेखाकारों के पैनल में से किसी लेखाकार द्वारा संपरीक्षा कराए जाने का निदेश दे सकेगा ।

(1) उपधारा (1) के अधीन किसी संपरीक्षा के या उसके आनुषंगिक व्यय केंद्रीय सरकार द्वारा वहन किए जाएंगे ]

2[(2) यदि निदेशक, किसी जांच के किसी प्रक्रम पर यह पाता है कि कोई रिपोर्टकर्ता इकाई या बोर्ड में का उसका अभिहित निदेशक या उसका कोई कर्मचारी इस अध्याय के अधीन बाध्यताओं का पालन करने में असफल रहा है तो ऐसी किसी अन्य कार्रवाई पर, जो इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों के अधीन की जा सकती है, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना वह, -

(क) लिखित में चेतावनी जारी कर सकेगा; या

(ख) उस रिपोर्टकर्ता इकाई या बोर्ड में के उसके अभिहित निदेशक या उसके किसी कर्मचारी को विनिर्दिष्ट अनुदेशों का पालन करने का निदेश दे सकेगा; या

(ग) उस रिपोर्टकर्ता इकाई या बोर्ड में के उसके अभिहित निदेशक या उसके किसी कर्मचारी को, ऐसे अंतरालों पर, जो विहित किए जाएं, उसके द्वारा किए जा रहे उपायों पर रिपोर्टें भेजने का निदेश दे सकेगा; या

(घ) आदेश द्वारा उस रिपोर्टकर्ता इकाई या बोर्ड में के उसके अभिहित निदेशक या उसके किसी कर्मचारी पर ऐसी कोई धनीय शास्ति, जो प्रत्येक असफलता के लिए दस हजार रुपए से कम की नहीं होगी, किंतु जो एक लाख रुपए तक की हो सकेगी, अधिरोपित कर सकेगा ।]

(3) निदेशक, उपधारा (2) के अधीन पारित आदेश की एक प्रति, ऐसी प्रत्येक बैंककारी कंपनी, वित्तीय संस्था या मध्यवर्ती या व्यक्ति को, जो उस उपधारा के अधीन कार्यवाहियों में पक्षकार है, अग्रेषित करेगा ।

[स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, लेखाकार" से चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) के अर्थांतर्गत कोई चार्टर्ड अकाउंटेंट अभिप्रेत है ।]

 [14. कतिपय मामलों में बैककारी कंपनियों, वित्तीय संस्थाओं आदि के विरुद्ध सिविल कार्यवाही होना-धारा 13 में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, रिपोर्टकर्ता इकाई, उसके निदेशक और कर्मचारी धारा 12 की उपधारा (1) के खंड () के अधीन सूचना देने के लिए अपने विरुद्ध किन्हीं सिविल या दांडिक कार्यवाहियों के लिए दायी नहीं होंगे

 [15. बैंककारी कंपनी, वित्तीय संस्था और मध्यवर्ती द्वारा जानकारी देने की प्रक्रिया और रीति-केंद्रीय सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक के परामर्श से, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए, धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन किसी रिपोर्टकर्ता इकाई द्वारा सूचना रखे जाने और देने की प्रक्रिया और रीति विहित कर सकेगी ]

अध्याय 5

समन, तलाशी और अभिग्रहण, आदि

16. सर्वेक्षण की शक्ति-(1) इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां अधिकारी के पास, उसके कब्जे में की सामग्री के आधार पर यह विश्वास करने का कारण है (ऐसे विश्वास के लिए कारण लेखबद्ध किए जाएंगे) कि धारा 3 के अधीन कोई अपराध किया गया है, वहां वह निम्नलिखित किसी स्थान में प्रवेश कर सकेगा, -

(i) उसको समनुदेशित क्षेत्र की सीमाओं के भीतर कोई स्थान, या

(ii) जिसके बारे में वह ऐसे अन्य प्राधिकारी द्वारा इस धारा के प्रयोजनों के लिए प्राधिकृत किया गया है जिसे वह क्षेत्र समनुदेशित है जिसके भीतर ऐसा स्थान अवस्थित है,

जिस स्थान पर ऐसा अपराध गठित करने वाला कोई कार्य किया जा रहा है और किसी स्वत्वधारी, कर्मचारी या किसी अन्य व्यक्ति से, जो उस समय और स्थान पर ऐसे कार्य को किए जाने में किसी रीति से हाजिर है या सहायता कर रहा है, अपेक्षा कर सकेगा कि वह, -

(i) ऐसे अभिलेखों का निरीक्षण करने में उसे आवश्यक सुविधाएं दे जिनकी वह अपेक्षा करे और जो ऐसे स्थान पर उपलभ्य हो सकें,

(ii) अपराध के आगम या अपराध के आगमों से संबद्ध किसी संव्यवहार की, जो इसमें पाया जाए, जांच करने या सत्यापित करने के लिए आवश्यक सुविधाएं दे; और

(iii) ऐसी जानकारी दे जिसकी वह किसी ऐसे मामले के संबंध में अपेक्षा करे जो इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के लिए उपयोगी या उससे सुसंगत हो ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए ऐसे स्थान में, जहां ऐसा कार्य, जो किसी अपराध का होना गठित करता है, किया जा रहा है, कोई ऐसा अन्य स्थान भी सम्मिलित होगा, चाहे वहां कोई क्रियाकलाप किया जा रहा है या नहीं, जहां ऐसा क्रियाकलाप करने वाला व्यक्ति यह कथन करता है कि ऐसे कार्य से संबद्ध उसके कोई अभिलेख या उसकी सम्पत्ति का कोई भाग है या रखा गया है ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्राधिकारी, सर्वेक्षण पूरा करने के ठीक पश्चात्, उस उपधारा में निर्दिष्ट किसी स्थान में प्रवेश करने के पश्चात् इस प्रकार अभिलिखित कारणों की एक प्रति, उस उपधारा में निर्दिष्ट उसके कब्जे में की सामग्री के साथ ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, सीलबन्द लिफाफे में, न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को अग्रेषित करेगा और ऐसा न्यायनिर्णायक प्राधिकरण ऐसे कारण और सामग्री ऐसी अवधि तक रखेगा, जो विहित की जाए

(3) इस धारा के अधीन कार्य करने वाला कोई प्राधिकारी, -

(i) उसके द्वारा निरीक्षित अभिलेखों पर पहचान के चिह्न लगा सकेगा और उससे उद्धरण या प्रतियां ले सकेगा या करा सकेगा,

(ii) उसके द्वारा जांची गई या सत्यापित किसी संपत्ति की तालिका तैयार कर सकेगा, और

(iii) उस स्थान में उपस्थित किसी व्यक्ति का ऐसा कथन अभिलिखित कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के लिए उपयोगी या उससे सुसंगत हो ।

17. तलाशी और अभिग्रहण-(1) जहां [निदेशक या इस धारा के प्रयोजनों के लिए उसके द्वारा प्राधिकृत उप-निदेशक की पंक्ति से अनिम्न पंक्ति के किसी अन्य अधिकारी] के पास, अपने कब्जे में की जानकारी के आधार पर, यह विश्वास करने का कारण है (ऐसे विश्वास के लिए कारण लेखबद्ध किए जाएंगे) कि किसी व्यक्ति ने, -

(i) ऐसा कोई कार्य किया है जो धन-शोधन है, या

(ii) धन-शोधन में अंतर्ग्रस्त अपराध के किसी आगम को कब्जे में रखा है, या

(iii) धन-शोधन से संबंधित कोई अभिलेख कब्जे में रखा है [या]

[(iv) अपराध से संबंधित किसी संपत्ति को कब्जे में रखा है,] 

तो वह इस निमित्त बनाए गए नियमों के अध्यधीन अपने किसी अधीनस्थ अधिकारी को निम्नलिखित के लिए प्राधिकृत कर सकेगा-

(क) किसी भवन, स्थान, जलयान, यान या वायुयान में, जहां उसके पास यह संदेह करने के कारण हैं कि ऐसे अभिलेख या अपराध के आगम रखे गए हैं, प्रवेश करना और तलाशी लेना; 

(ख) किसी दरवाजे, बाक्स, लाकर, सेफ, अलमारी या अन्य आधान का, खंड (क) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने के लिए जहां उनकी चाबियां उपलब्ध नहीं हैं, ताला तोड़कर खोलना;

(ग) ऐसी तलाशी के परिणामस्वरूप पाए गए किसी अभिलेख या सम्पत्ति को अभिगृहीत करना;

(घ) [ऐसे अभिलेख या संपत्ति पर, यदि अपेक्षित होट पर पहचान के चिह्न लगाया या उससे उद्घरण या प्रतियां लेना या तैयार करना या करवाना;

(ङ) ऐसे अभिलेख या संपत्ति का टिप्पण या तालिका तैयार करना;

(च) ऐसे किसी व्यक्ति की शपथ पर परीक्षा करना जिसके कब्जे में या नियंत्रण में ऐसा अभिलेख या सम्पत्ति पाई जाती है जो इस अधिनियम के अधीन किसी अन्वेषण के प्रयोजनों के लिए सुसंगत सभी मामलों से संबंधित है:

[परंतु ऐसी कोई तलाशी तब तक नहीं ली जाएगी जब तक कि अनुसूचित अपराध के संबंध में कोई रिपोर्ट दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 157 के अधीन किसी मजिस्ट्रेट को अग्रेषित न कर दी गई हो या अनुसूची में वर्णित अपराध का अन्वेषण करने के लिए प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा अनुसूचित अपराध का संज्ञान करने के लिए , यथास्थिति, किसी मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष कोई परिवाद फाइल न कर दिया गया हो अथवा ऐसे मामलों में जहां ऐसी रिपोर्ट अग्रेषित की जानी अपेक्षित नहीं है वहां प्राप्त सूचना की या अन्यथा वैसी ही रिपोर्ट किसी अनुसूचित अपराध का अन्वेषण करने के लिए प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा भारत सरकार के अपर सचिव या उसके समतुल्य पंक्ति से अन्यून के किसी अधिकारी को, जो, यथास्थिति, मंत्रालय या विभाग  या इकाई का प्रधान हो, या ऐसे किसी अन्य अधिकारी को, जो केंद्रीय सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, इस प्रयोजन के लिए प्राधिकृत किया जाए, प्रस्तुत न कर दी गई हो ।]

[(1) जहां ऐसे अभिलेख या संपत्ति का अभिग्रहण करना व्यवहार्य नहीं है, वहां उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत अधिकारी, उस संपत्ति को अवरुद्ध करने का आदेश कर सकेगा, जिसके पश्चात् उस संपत्ति का, ऐसा आदेश करने वाले अधिकारी की पूर्व अनुज्ञा के सिवाय, अंतरण या अन्यथा व्यौहार नहीं करेगा और ऐसे आदेश की एक प्रति की संबंधित व्यक्ति पर तामील की जाएगी:

परंतु यदि धारा 8 की उपधारा (5) या उपधारा (7) या धारा 58ख या धारा 60 की उपधारा (2क) के अधीन उसके अधिहरण के पूर्व किसी समय, अवरुद्ध की गई किसी संपत्ति का अभिग्रहण करना व्यवहार्य हो जाता है तो उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत अधिकारी उस संपत्ति का अभिग्रहण कर सकेगा ।]

(2) वह प्राधिकारी, जिसे उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत किया गया है, तलाशी और अधिग्रहण के ठीक पश्चात् [या अवरुद्ध करने का आदेश जारी करने परट इस प्रकार अभिलिखित किए गए कारणों की एक प्रति, उस उपधारा में निर्दिष्ट उसके कब्जे में की सामग्री के साथ ऐसी रीति से जो विहित की जाए, सीलबन्द लिफाफे में, न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को अग्रेषित करेगा और ऐसा न्यायनिर्णायक प्राधिकरण ऐसे कारण और सामग्री ऐसी अवधि तक रखेगा, जो विहित की जाए ।

(3) जहां किसी प्राधिकारी का, धारा 16 के अधीन सर्वेक्षण के दौरान अभिप्राप्त जानकारी पर समाधान हो जाता है कि कोई साक्ष्य छिपाया या बिगाड़ा जाएगा; या उसके छिपाए या बिगाड़े जाने की संभावना है, वहां वह ऐसे कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएंगे, उस भवन या स्थान में प्रवेश कर सकेगा और तलाशी ले सकेगा जहां ऐसा साक्ष्य अवस्थित है और उस साक्ष्य को अभिगृहीत   कर सकेगा:

परन्तु उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई प्राधिकार, इस उपधारा के अधीन तलाशी के लिए अपेक्षित नहीं होगा ।

 [(4) उपधारा (1) के अधीन किसी अभिलेख या संपत्ति को अभिगृहीत करने या उपधारा (1क) के अधीन किसी अभिलेख या संपत्ति को अवरुद्ध करने वाला प्राधिकारी, यथास्थिति, ऐसे अभिग्रहण या अवरोधन से तीस दिन की अवधि के भीतर, न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के समक्ष, उपधारा (1) के अधीन अभिगृहीत किए गए ऐसे अभिलेख या संपत्ति के प्रतिधारण का या उपधारा (1क) के अधीन तामील किए गए अवरोधन के आदेश को जारी रखे जाने का अनुरोध करते हुए आवेदन फाइल करेगा ।]

18. व्यक्तियों की तलाशी-(1) यदि किसी प्राधिकारी के पास, जो साधारण या विशेष आदेश द्वारा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत है, यह विश्वास करने का कारण है (ऐसे विश्वास के लिए कारण लेखबद्ध किए जांएगे) कि किसी व्यक्ति ने अपने शरीर में या उसके कब्जे, स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन किसी वस्तु में, किसी अभिलेख या अपराध के आगम को छिपाकर रखा है जो इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के लिए उपयोगी या उससे सुसंगत हो सकता है तो वह उस व्यक्ति की तलाशी ले सकेगा और ऐसे अभिलेख या सम्पत्ति का अभिग्रहण कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के लिए उपयोगी या उससे सुसंगत हो सकता है :

 [परंतु किसी व्यक्ति की ऐसी कोई तलाशी तब तक नहीं ली जाएगी जब तक कि अनुसूचित अपराध के संबंध में कोई रिपोर्ट दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 157 के अधीन किसी मजिस्ट्रेट को अग्रेषित न कर दी गई हो या अनुसूची में वर्णित अपराध का अन्वेषण करने के लिए प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा अनुसूचित अपराध का संज्ञान करने के लिए, यथास्थिति, किसी मजिस्ट्रेट या न्यायालय के समक्ष कोई परिवाद फाइल न कर दिया गया हो अथवा ऐसे मामलों में जहां ऐसी रिपार्ट अग्रेषित की जानी अपेक्षित नहीं है वहां प्राप्त सूचना की या अन्यथा वैसी ही रिपोर्ट किसी अनूसूचित अपराध का अन्वेषण करने के लिए प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा भारत सरकार के अपर सचिव या उसके समतुल्य पंक्ति से अन्यून के किसी अधिकारी को, जो, यथास्थिति, मंत्रालय या विभाग या इकाई का प्रधान हो, या ऐसे किसी अन्य अधिकारी को, जो केंद्रीय सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा, इस प्रयोजन के लिए प्राधिकृत किया जाए, प्रस्तुत न कर दी गई हो ।]

(2) वह प्राधिकारी, जिसे उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत किया गया है, तलाशी और अभिग्रहण के ठीक पश्चात् इस प्रकार अभिलिखित किए गए कारणों की एक प्रति, उस उपधारा में निर्दिष्ट उसके कब्जे में की सामग्री के साथ ऐसी रीति से जो विहित की जाए, सीलबन्द लिफाफे में, न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को अग्रेषित करेगा और ऐसा न्यायनिर्णायक प्राधिकरण ऐसे कारण और सामग्री ऐसी अवधि तक रखेगा, जो विहित की जाए ।

(3) जहां, कोई प्राधिकारी किसी व्यक्ति की तलाशी लेने वाला हो वहां वह, यदि ऐसा व्यक्ति ऐसी अपेक्षा करे तो ऐसे व्यक्ति को उससे रैंक में निकटतम ज्येष्ठ राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के पास चौबीस घंटे के भीतर ले जाएगा:

परन्तु चौबीस घंटे की अवधि से वह समय अपवर्जित किया जाएगा जो ऐसे व्यक्ति को निकटतम उससे रैंक में ज्येष्ठ राजपत्रित अधिकारी के पास या मजिस्ट्रेट के न्यायालय में ले जाने में की गई यात्रा के लिए आवश्यक है ।

(4) यदि उपधारा (3) के अधीन अध्यपेक्षा की जाती है तो प्राधिकारी, उस व्यक्ति को उक्त उपधारा में निर्दिष्ट उससे रैंक में ज्येष्ठ राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट के समक्ष ले जाने के पूर्व उसे चौबीस घंटे से अधिक के लिए निरुद्ध नहीं करेगा:

परन्तु चौबीस घंटे की अवधि से वह समय अपवर्जित किया जाएगा जो ऐसे व्यक्ति को निरोध के स्थान से उससे रैंक में ज्येष्ठ राजपत्रित अधिकारी के पास या मजिस्ट्रेट के न्यायालय में ले जाने में की गई यात्रा के लिए आवश्यक है

(5) राजपत्रित अधिकारी या मजिस्ट्रेट, जिसके समक्ष ऐसे व्यक्ति को लाया जाता है, यदि तलाशी के लिए कोई उचित आधार नहीं पाता है तो तत्काल ऐसे व्यक्ति को उन्मोचित करेगा किन्तु अन्यथा वह यह निदेश देगा कि तलाशी ली जाए

(6) उपधारा (1) या उपधारा (5) के अधीन तलाशी लेने से पूर्व, प्राधिकारी, दो या अधिक व्यक्तियों को उपस्थित रहने और तलाशी में साक्ष्य के लिए बुलाएगा और तलाशी ऐसे व्यक्तियों की उपस्थिति में ली जाएगी ।

(7) प्राधिकारी तलाशी के क्रम में अभिगृहीत अभिलेख या सम्पत्ति की सूची तैयार करेगा और उस सूची पर साक्षियों के हस्ताक्षर अभिप्राप्त करेगा ।

(8) किसी स्त्री की तलाशी, किसी स्त्री के सिवाय, अन्य व्यक्ति द्वारा नहीं ली जाएगी ।

(9) प्राधिकारी, तलाशी के दौरान पाए गए या अभिगृहीत अपराध के अभिलेखों या आगमों की बाबत उपधारा (1) या उपधारा (5) के अधीन तलाशी लिए गए किसी व्यक्ति का कथन अभिलिखित करेगा:

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।  

(10) प्राधिकारी, उपधारा (1) के अधीन किसी अभिलेख या संपत्ति को अभिगृहीत करते समय, ऐसे अभिग्रहण से तीस दिन की अवधि के भीतर, न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के समक्ष ऐसे अभिलेख या संपत्ति के प्रतिधारण के लिए अनुरोध करते हुए आवेदन फाइल करेगा ।

19. गिरफ्तार करने की शक्ति-(1) यदि निदेशक, उपनिदेशक, सहायक निदेशक या केन्द्रीय सरकार द्वारा, साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के पास उसके कब्जे में की सामग्री के आधार पर यह विश्वास करने का कारण है (ऐसे विश्वास के लिए कारण लेखबद्ध किए जाएंगे) कि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का दोषी है तो वह ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकेगा और यथासंभव शीघ्र, उसे ऐसी गिरफ्तारी के आधारों की सूचना देगा ।

(2) निदेशक, उपनिदेशक, सहायक निदेशक या कोई अन्य अधिकारी, उपधारा (1) के अधीन ऐसे व्यक्ति के गिरफ्तार किए जाने के ठीक पश्चात् आदेश की एक प्रति, उस उपधारा में निर्दिष्ट उसके कब्जे में की सामग्री के साथ ऐसी रीति से जो विहित की जाए, सीलबंद लिफाफे में ऐसे न्यायनिर्णायक प्राधिकारी अग्रेषित करेगा और ऐसा न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के ऐसे आदेश और सामग्री को ऐसी अवधि तक रखेगा जो विहित की जाए ।

(3) उपधारा (1) के अधीन गिरफ्तार किया गया प्रत्येक व्यक्ति, चौबीस घंटे के भीतर, यथास्थिति, अधिकारिता रखने वाले किसी न्यायिक मजिस्ट्रेट या महानगर मजिस्ट्रेट के पास ले जाया जाएगा:

परन्तु चौबीस घंटे की अवधि से वह समय अपवर्जित किया जाएगा जो गिरफ्तारी के स्थान से मजिस्ट्रेट के न्यायालय तक यात्रा के लिए आवश्यक है ।

 [20. संपत्ति का प्रतिधारण-(1) जहां कोई संपत्ति धारा 17 या धारा 18 के अधीन अभिगृहीत या धारा 17 की उपधारा (1क) के अधीन अवरुद्ध की गई है और निदेशक द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी के पास, उसके कब्जे में की सामग्री के आधार पर यह विश्वास करने का कारण (ऐसे विश्वास का कारण उसके द्वारा लेखबद्ध किया जाएगा) है कि ऐसी संपत्ति को धारा 8 के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजनों के लिए प्रतिधारित किया जाना अपेक्षित है, वहां ऐसी संपत्ति, उस तारीख से, जिसको ऐसी संपत्ति, यथास्थिति, अभिगृहीत या अवरुद्ध की गई थी, एक सौ अस्सी दिन से अनधिक की अवधि के लिए, यदि वह अभिगृहीत की गई है तो प्रतिधारित की जा सकेगी या यदि अवरुद्ध की गई है तो अवरुद्ध बनी रह सकेगी ।

(2) निदेशक द्वारा प्राधिकृत अधिकारी, उसके द्वारा धारा 8 के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजनों के लिए संपत्ति के प्रतिधारण या अवरोधन के जारी रखे जाने संबंधी आदेश के पारित किए जाने के ठीक पश्चात्, आदेश की एक प्रति, उपधारा (1) में निर्दिष्ट उसके कब्जे में की सामग्री के साथ, एक सीलबंद लिफाफे में, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, न्यायनिर्णायक प्राधिकरण को अग्रेषित करेगा और ऐसा न्यायनिर्णायक प्राधिकरण उस आदेश और सामग्री को ऐसी अवधि के लिए रखेगा, जो विहित की जाए ।

(3) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर, यदि न्यायनिर्णायक प्राधिकरण उक्त अवधि से परे ऐसी संपत्ति का प्रतिधारण या उसके अवरोध के जारी रखे जाने की अनुज्ञा नहीं देता है तो वह संपत्ति उस व्यक्ति को, जिससे ऐसी संपत्ति अभिगृहीत की गई थी या जिसकी संपत्ति को अवरुद्ध किए जाने का आदेश किया गया था, वापस कर दी जाएगी

(4) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि से परे ऐसी संपत्ति के प्रतिधारण या अवरोधन के जारी रखे जाने को प्राधिकृत किए जाने से पूर्व, अपना यह समाधान करेगा कि संपत्ति प्रथमदृष्ट्या धन-शोधन में अंतर्वलित है और संपत्ति धारा 8 के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित है ।

(5) धारा 8 की उपधारा (5) या उपधारा (7) के अधीन अधिहरण का आदेश पारित करने के पश्चात्, यथास्थिति, न्यायालय या न्यायनिर्णायक प्राधिकरण धन-शोधन में अंतर्वलित संपत्ति से भिन्न सभी संपत्ति उस व्यक्ति को, जिससे ऐसी संपत्ति अभिगृहीत की गई थी या उसे प्राप्त करने के लिए हकदार व्यक्तियों को सौंपने का निदेश देगा

(6) जहां संपत्ति के सौंपे जाने का कोई आदेश धारा 8 की उपधारा (6) के अधीन न्यायालय द्वारा या धारा 58 या धारा 60 की उपधारा (2) के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकरण द्वारा किया गया है, वहां निदेशक या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई अन्य अधिकारी, यदि उसकी यह राय है कि ऐसी संपत्ति इस अधिनियम के अधीन अपील संबंधी कार्यवाहियों के लिए सुसंगत है, ऐसे आदेश की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के लिए ऐसी किसी संपत्ति के सौंपे जाने को रोक सकेगा

21. अभिलेखों का प्रतिधारण-(1) जहां कोई अभिलेख धारा 17 या धारा 18 के अधीन अभिगृहीत या धारा 17 की उपधारा (1क) के अधीन अवरुद्ध किए गए हैं और अन्वेषण अधिकारी या निदेशक द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि ऐसे कोई अभिलेख इस अधिनियम के अधीन किसी जांच के लिए प्रतिधारित किए जाने अपेक्षित हैं, वहां ऐसे अभिलेख उस दिन से, जिसको ऐसे अभिलेख, यथास्थिति, अभिगृहीत या अवरुद्ध किए गए थे, एक सौ अस्सी दिन से अनधिक की अवधि के लिए, यदि वे अभिगृहीत किए गए हैं तो प्रतिधारित किए जा सकेंगे या यदि अवरुद्ध किए गए हैं तो अवरुद्ध बने रह सकेंगे ।

(2) वह व्यक्ति, जिससे अभिलेख अभिगृहीत या अवरुद्ध किए गए हों, अभिलेखों की प्रतियां अभिप्राप्त करने का हकदार होगा

(3) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति पर, अभिलेख उस व्यक्ति को, जिससे ऐसे अभिलेख अभिगृहीत किए गए थे या जिसके अभिलेखों को अवरुद्ध किए जाने का आदेश किया गया था, वापस कर दिए जाएंगे, जब तक कि न्यायनिर्णायक प्राधिकरण ऐसे अभिलेखों का उक्त अवधि से परे प्रतिधारण या अवरोधन जारी रखे जाने की अनुमति नहीं देता है । 

(4) न्यायनिर्णायक प्राधिकरण, ऐसे अभिलेखों का, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि से परे प्रतिधारण या अवरोधन जारी रखे जाने को प्राधिकृत करने से पूर्व अपना यह समाधान करेगा कि अभिलेख धारा 8 के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित हैं ।

(5) धारा 8 की उपधारा (5) या उपधारा (7) के अधीन अधिहरण का आदेश पारित करने के पश्चात्, न्यायनिर्णायक प्राधिकारी अभिलेख उस व्यक्ति को, जिससे ऐसे अभिलेख अभिगृहीत किए गए थे, सौंपे जाने का निदेश देगा

(6) जहां अभिलेखों को सौंपे जाने का आदेश धारा 8 की उपधारा (6) के अधीन न्यायालय द्वारा या धारा 58ख या धारा 60 की उपधारा (2क) के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकारी द्वारा किया गया है, वहां निदेशक या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई अन्य अधिकारी, यदि उसकी यह राय है कि ऐसे अभिलेख इस अधिनियम के अधीन अपीलीय कार्यवाहियों के लिए सुसंगत हैं, ऐसे आदेश की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के लिए ऐसे किन्हीं अभिलेखों के सौंपे जाने को रोक सकेगा ।]

22. कतिपय मामलों में अभिलेखों या संपत्ति की बाबत उपधारणा-(1) जहां कोई अभिलेख या संपत्ति किसी सर्वेक्षण या किसी तलाशी के दौरान किसी व्यक्ति के कब्जे या नियंत्रण में हैं या पाई जाती हैं [या जहां इस अधिनियम के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन कोई अभिलेख या संपत्ति किसी व्यक्ति द्वारा प्रस्तुत की गई है या किसी व्यक्ति की अभिरक्षा या नियंत्रण से पुनः अधिकार में ली गई या अभिगृहीत की गई है या अवरुद्ध की गई है] तो वहां यह उपधारणा की जाएगी कि: -

(i) ऐसे अभिलेख या ऐसी संपत्ति ऐसे व्यक्ति की है;

(ii) ऐसे अभिलेखों की अन्तर्वस्तु सही है; और

(iii) हस्ताक्षर और ऐसे अभिलेखों का प्रत्येक अन्य भाग जिनका किसी विशिष्ट व्यक्ति के हस्तालेख में होना तात्पर्यित है या जिनके बारे में युक्तियुक्त रूप से यह उपधारणा की जा सकती है कि वे किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित या उसके हस्तलेख में हैं, उसी व्यक्ति के हस्तलेख में हैं और स्टाम्पित, निष्पादित या अनुप्रमाणित किसी अभिलेख की दशा में यह उस व्यक्ति द्वारा निष्पादित या अनुप्रमाणित किया था, जिसके द्वारा इसका इस प्रकार स्टाम्पित, निष्पादित या अनुप्रमाणित किया जाना तात्पर्यित है ।

(2) जहां ऐसा कोई अभिलेख, किसी प्राधिकारी या व्यक्ति द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत और ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों के अनुक्रम में, भारत से बाहर किसी स्थान से प्राप्त हुआ है वहां, यथास्थिति, विशेष न्यायालय, अपील अधिकरण या न्यायनिर्णायक प्राधिकरणः-

() यह उपधारणा करेगा कि हस्ताक्षर और ऐसे अभिलेख का प्रत्येक अन्य भाग, जिनका किसी विशिष्ट व्यक्ति के हस्तलेख में होना तात्पर्यित है या जिनके बारे में न्यायालय युक्तियुक्त रूप से यह धारणा कर सकता है कि वे किसी विशिष्ट व्यक्ति द्वारा हस्ताक्षरित या उसके हस्तलेख में है, उसी व्यक्ति के हस्तलेख में है; और निष्पादित या अनुप्रमाणित किसी अभिलेख की दशा में यह उपधारणा करेगा कि इसे उस व्यक्ति द्वारा निष्पादित या अनुप्रमाणित किया गया था, जिसके द्वारा इसका इस प्रकार निष्पादित या अनुप्रमाणित किया जाना तात्पर्यित है

(ख) इस बात के होते हुए भी यह सम्यक् रूप से स्टांपित नहीं है, यदि ऐसा दस्तावेज साक्ष्य में अन्यथा ग्राह्य है तो दस्तावेज को साक्ष्य में ग्रहण करेगा ।

23. अंतःसंबंधित संव्यवहारों के संबंध में उपधारणा-(1) जहां धन-शोधन में दो या अधिक अंतःसंबंधित संव्यवहार अंतर्ग्रस्त हैं और एक या अधिक ऐसे संव्यवहार धन-शोधन में या उनका अंतर्ग्रस्त होना साबित कर दिया जाता है वहां धारा 8 के अधीन न्यायनिर्णयन या [अधिहरण या धन-शोधन संबंधी अपराध के विचारण के प्रयोजनों के लिए तब तक यह उपधारणा की जाएगी कि शेष संव्यवहार ऐसे अंतःसंबंधित संव्यवहारों के भागरूप हैं जब तक कि न्यायनिर्णायक प्राधिकरण या विशेष न्यायालय] के समाधानप्रद रूप में अन्यथा साबित नहीं कर दिया जाता

 [24. सबूत का भार-(1) इस अधिनियम के अधीन अपराध के आगमों से संबंधित किन्हीं कार्यवाहियों में, -

() धारा 3 के अधीन धन-शोधन के अपराध से आरोपित किसी व्यक्ति के मामले में प्राधिकरण या न्यायालय, जब तक प्रतिकूल साबित नहीं किया जाता है, यह उपधारणा करेगा कि अपराध के ऐसे आगम धन-शोधन में अंतर्वलित हैं; और

(ख) किसी अन्य व्यक्ति के मामले में प्राधिकरण या न्यायालय, यह उपधारणा कर सकेगा कि अपराध के ऐसे आगम धन-शोधन में अंतर्वलित हैं ।]

अध्याय 6

अपील अधिकरण

25. अपील अधिकरण की स्थापना-केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकारियों के आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई के लिए एक अपील अधिकरण की स्थापना करेगी

26. अपील अधिकरण को अपीलें-(1) उपधारा (3) में यथा अन्यथा उपबंधित के सिवाय, इस अधिनियम के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकरण द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित निदेशक या कोई व्यक्ति, अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा

(2) धारा 13 की उपधारा (2) के अधीन किए गए निदेशक के किसी आदेश से व्यथित कोई [रिपोर्टकर्ता इकाई] अपील अधिकरण को अपील कर सकेगी ।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन की गई प्रत्येक अपील उस तारीख से, जिसको न्यायनिर्णायक प्राधिकरण या निदेशक द्वारा किए गए आदेश की प्रति प्राप्त की जाती है, पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर फाइल की जाएगी और यह ऐसे प्ररूप में होगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए:

परन्तु अपील अधिकरण, सुने जाने का अवसर देने के पश्चात् किसी अपील को पैंतालीस दिन की अवधि की समाप्ति के पश्चात् ग्रहण कर सकेगा, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उक्त अवधि के भीतर फाइल न करने के लिए पर्याप्त कारण थे ।

(4) अपील अधिकरण, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किसी अपील की प्राप्ति पर, अपील के पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, जिस आदेश के विरुद्ध अपील की गई है, उसकी पुष्टि करते हुए, उसे उपांतरित या अपास्त करते हुए, उस पर ऐसे आदेश पारित कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।

(5) अपील अधिकरण अपने द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की प्रति अपील के पक्षकारों और, यथास्थिति, संबंधित न्यायनिर्णायक प्राधिकरण या निदेशक को भेजेगा ।

(6) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन अपील अधिकरण के समक्ष फाइल की गई अपील पर उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता से कार्यवाही की जाएगी और उसके द्वारा, अपील को फाइल करने की तारीख से छह मास के भीतर अपील का अंतिम रूप से निपटारा करने का प्रयास किया जाएगा ।

27. अपील अधिकरण की संरचना, आदि-(1) अपील अधिकरण अध्यक्ष और दो अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा

(2) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, -

(क) अपील अधिकरण की अधिकारिता का प्रयोग उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा;

(ख) किसी न्यायपीठ का गठन अध्यक्ष द्वारा एक या दो सदस्यों से, जैसा अध्यक्ष ठीक समझे, किया जा सकेगा;

(ग) अपील अधिकरण की न्यायपीठें साधारणतया नई दिल्ली में और ऐसे अन्य स्थानों में अधिविष्ट होंगी जिन्हें केन्द्रीय सरकार, अध्यक्ष के परामर्श से, अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे; 

(घ) केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा, उन क्षेत्रों को विनिर्दिष्ट करेगी जिनके संबंध में अपील अधिकरण की प्रत्येक न्यायपीठ अधिकारिता का प्रयोग कर सकेगी ।

(3) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष किसी सदस्य का एक न्यायपीठ से दूसरी न्यायपीठ में स्थानान्तरण कर सकेगा ।

(4) यदि किसी मामले या विषय की सुनवाई के किसी प्रक्रम पर अध्यक्ष या किसी सदस्य को यह प्रतीत होता है कि वह मामला या विषय ऐसी प्रकृति का है जिसकी सुनवाई दो सदस्यों से मिलकर बने न्यायपीठ द्वारा होनी चाहिए तो उक्त मामला या विषय, यथास्थिति, अध्यक्ष द्वारा अंतरित किया जाएगा या अध्यक्ष जो ऐसी न्यायपीठ को, जिसे वह ठीक समझे, अंतरण के लिए उसे निर्दिष्ट किया जा सकेगा । 

28. नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) कोई व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह उच्चतम न्यायालय या [किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है या उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होने के लिए आर्हित है] ।

(2) कोई व्यक्ति किसी सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह-

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(ख) भारतीय विधि सेवा का सदस्य रहा है और उस सेवा की श्रेणी 1 में कोई पद कम से कम तीन वर्ष तक धारण कर चुका है; या

(ग) भारतीय राजस्व सेवा का सदस्य रहा है और उस सेवा में कम से कम तीन वर्ष आय-कर आयुक्त का पद या कोई समतुल्य पद धारण कर चुका है;

(घ) भारतीय आर्थिक सेवा का सदस्य रहा है और उस सेवा में कम से कम तीन वर्ष तक संयुक्त सचिव का पद या कोई समतुल्य पद धारण कर चुका है;

(ङ) भारतीय सीमाशुल्क और केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क सेवा का सदस्य रहा है और उस सेवा में कम से कम तीन वर्ष तक संयुक्त सचिव का पद या उसके समतुल्य पद धारण कर चुका है; या

(च) चार्टर्ड अकाउन्टेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) के अधीन चार्टर्ड अकाउन्टेंट के रूप में या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत लेखाकार के रूप में या भागतः रजिस्ट्रीकृत लेखाकार और भागतः चार्टर्ड अकाउन्टेंट के रूप में कम से कम दस वर्ष के लिए लेखाकर्म की प्रैक्टिस कर चुका है:

परन्तु अपील अधिकरण के सदस्यों में से एक सदस्य उपखंड (च) में वर्णित प्रवर्ग से होगा; या

(छ) भारतीय लेखा परीक्षा और लेखा सेवा का सदस्य रहा है और उस सेवा में कम से कम तीन वर्ष तक संयुक्त सचिव का पद या उसके समतुल्य पद धारण कर चुका है ।

(3) उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय का कोई आसीन न्यायाधीश इस धारा के अधीन भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श के पश्चात् ही नियुक्त किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

 [(4) ऐसे अध्यक्ष या किसी सदस्य को जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन स्थापित किसी अन्य अधिकरण में अध्यक्ष या सदस्य का पद धारण किए हुए है, उस अधिकरण का अध्यक्ष या सदस्य बने रहने के अतिरिक्त, इस अधिनियम के अधीन अपील अधिकरण का, यथास्थिति, अध्यक्ष या सदस्य नियुक्त किया जा सकेगा ।]

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

30. सेवा की शर्तें-अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा [सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (पदावधि सहित)] ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं:

परन्तु अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के वेतन और भत्तों में और 3[सेवा के अन्य निबंधन और शर्तों (पदावधि सहित)] में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

31. रिक्तियां-यदि अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के पद में अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न कारण से कोई रिक्ति होती है तो केन्द्रीय सरकार रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किसी दूसरे व्यक्ति की नियुक्ति करेगी और अपील अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियां उसी प्रक्रम से जारी रह सकेंगी, जिस पर रिक्ति भरी गई है

32. त्यागपत्र और हटाया जाना-(1) अध्यक्ष या अन्य सदस्य, केन्द्रीय सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगा:

परंतु अध्यक्ष या अन्य सदस्य, जब तक कि उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा उससे पहले पद त्याग करने के लिए अनुज्ञा नहीं दी जाती है, ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास का अवसान होने तक या उसके पदोत्तरवर्ती के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त व्यक्ति द्वारा अपना पद ग्रहण कर लेने तक या उसकी पदावधि के अवसान होने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, अपना पद धारण करता रहेगा ।

(2) अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य अपने पद से, राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किए गए किसी व्यक्ति द्वारा ऐसी जांच किए जाने के पश्चात् जिसमें ऐसे अध्यक्ष या अन्य सदस्य को उसके विरुद्ध लगाए गए ऐसे आरोपों की सूचना दे दी गई है और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया है साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए आदेश से ही हटाया जाएगा अन्यथा नहीं:

 [परंतु ऐसे अध्यक्ष या किसी सदस्य को, जो भारत के मुख्य न्यायमूर्ति की सिफारिश पर नियुक्त किया गया था, हटाने से पूर्व भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श किया जाएगा ।]

33. कतिपय परिस्थितियों में सदस्य का अध्यक्ष के रूप में कार्य करना-(1) अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में ज्येष्ठ सदस्य, उस तारीख तक अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा, जिस तारीख को ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नियुक्त नया अध्यक्ष अपना पद ग्रहण करता है

(2) जब अध्यक्ष अनुपस्थिति, बीमारी या किसी अन्य कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो तब ज्येष्ठ सदस्य, उस तारीख तक अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करेगा, जिस तारीख को अध्यक्ष अपने कर्तव्यों को फिर से संभालता है

34. अपील अधिकरण के कर्मचारिवृंद-(1) केन्द्रीय सरकार, अपील अधिकरण को उतने अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराएगी, जितने वह सरकार ठीक समझे ।

(2) अपील अधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण में रहते हुए अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे

(3) अपील अधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं ।

35. अपील अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) अपील अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा अधिकथित प्रक्रिया से आबद्ध नहीं होगा किन्तु नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शित होगा और अपील अधिकरण को, इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्तियां होंगी

(2) अपील अधिकरण की, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित विषयों के संबंध में वे शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्ः-

(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और उन्हें पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

(घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबंधों के अधीन रहते हुए किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की अपेक्षा करना;

(ङ) साक्षी या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

(च) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;

(छ) किसी अभ्यावेदन को त्रुटि के कारण खारिज करना या उसका एकपक्षीय विनिश्चय करना;

(ज) किसी अभ्यावेदन के व्यतिक्रम के आधार पर खारिज किए जाने के किसी आदेश या उसके द्वारा पारित किसी एकपक्षीय आदेश को अपास्त करना; और

(झ) कोई अन्य विषय, जिसे केन्द्रीय सरकार विहित करे ।

(3) इस अधिनियम के अधीन अपील अधिकरण द्वारा किया गया कोई आदेश, अपील अधिकरण द्वारा सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पादनीय होगा और इस प्रयोजन के लिए अपील अधिकरण को सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी

(4) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, अपील अधिकरण अपने द्वारा किए गए किसी आदेश को स्थानीय अधिकारिता रखने वाले किसी सिविल न्यायालय को पारेषित कर सकेगा और वह सिविल न्यायालय उस आदेश का इस प्रकार निष्पादन करेगा मानो वह उसी न्यायालय द्वारा की गई कोई डिक्री हो ।

(5) अपील अधिकरण के समक्ष सभी कार्यवाहियां भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी और अपील अधिकरण को दंड प्रकिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और धारा 346 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

36. न्यायपीठों के बीच कार्य का वितरण-जहां किन्हीं न्यायपीठों का गठन किया जाता है वहां अध्यक्ष, समय-समय पर अधिसूचना द्वारा, न्यायपीठों के बीच अपील अधिकरण के कार्य के वितरण के बारे में उपबंध कर सकेगा और ऐसे विषयों का भी उपबंध करा सकेगा जिन पर प्रत्येक न्यायपीठ द्वारा कार्यवाही की जा सकती है ।

37. मामलों को अंतरित करने की अध्यक्ष की शक्ति-अध्यक्ष, किसी भी पक्षकार के आवेदन पर, और पक्षकारों को सूचना देने के पश्चात् और उनमें से ऐसे पक्षकारों की, जिनकी वह सुनवाई करना चाहता है, सुनवाई करने के पश्चात्, या ऐसी सूचना दिए बिना स्वप्ररेणा से एक न्यायपीठ के समक्ष लंबित किसी मामले को निपटाए जाने के लिए किसी अन्य न्यायपीठ को अंतिरित कर सकेगा ।

 38. विनिश्चय का बहुमत द्वारा किया जाना-यदि दो सदस्यों से मिलकर बनी किसी न्यायपीठ के सदस्यों में किसी प्रश्न पर मतभेद होता है तो वे उस प्रश्न या उन प्रश्नों को जिन पर उनका मतभेद है, कथन तैयार करेंगे और उसे अध्यक्ष को निर्देशित करेंगे, जो या तो उस प्रश्न या उन प्रश्नों की स्वयं सुनवाई करेगा या ऐसे प्रश्न या प्रश्नों की सुनवाई के लिए मामला अपील अधिकरण के [तीसरे सदस्य को] निर्देशित करेगा और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों को अपील अधिकरण के उन सदस्यों के जिन्होंने मामले की सुनवाई की है, जिनके अंतर्गत वे सदस्य भी हैं जिन्होंने  उसकी पहले सुनवाई की थी, बहुमत की राय के अनुसार विनिश्चित किया जाएगा ।

39. अपीलार्थी का प्राधिकृत प्रतिनिधि की सहायता लेने और सरकार को प्रस्तुत करने वाले अधिकारियों की नियुक्ति करने का अधिकार-(1) इस अधिनियम के अधीन अधिकरण को अपील करने वाला कोई व्यक्ति, अपील अधिकरण के समक्ष अपना मामला प्रस्तुत करने के लिए स्वयं उपस्थित हो सकेगा या अपनी पसन्द के किसी प्राधिकृत प्रतिनिधि की सहायता ले सकेगा ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, प्राधिकृत प्रतिनिधि" पद का वही अर्थ होगा जो उसका आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 288 की उपधारा (2) में है ।

(2) केन्द्रीय सरकार या निदेशक, एक या अधिक प्राधिकृत प्रतिनिधियों या अपने किन्हीं अधिकारियों को, प्रस्तुत करने वाले अधिकारी के रूप में कार्य करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा और इस प्रकार प्राधिकृत प्रत्येक व्यक्ति किसी अपील की बाबत मामला अपील अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकेगा ।

40. सदस्यों, आदि का लोक सेवक होना-अपील अधिकरण का अध्यक्ष, उसका सदस्य और अन्य अधिकारी तथा कर्मचारी, न्यायनिर्णायक प्राधिकारी, निदेशक और उसके अधीनस्थ अधिकारी, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझे जाएंगे ।

41. सिविल न्यायालय की अधिकारिता का होना-किसी सिविल न्यायालय को, ऐसे किसी मामले के संबंध में, जिसका अवधारण करने के लिए इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन कोई निदेशक, न्यायनिर्णायक प्राधिकरण या अपील अधिकरण सशक्त है, कोई वाद या कार्यवाही ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी और इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा कोई व्यादेश मंजूर नहीं किया जाएगा ।

42. उच्च न्यायालय में अपील-अपील अधिकरण के किसी विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे आदेश से उद्भूत होने वाले, विधि या तथ्य संबंधी किसी प्रश्न की बाबत अपील, अपील अधिकरण के विनिश्चय या आदेश के उसे संसूचित किए जाने की तारीख से साठ दिन के भीतर उच्च न्यायालय में फाइल कर सकेगा:

परन्तु उच्च न्यायालय, यदि उसका समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी, उक्त अवधि के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित हुआ था तो वह साठ दिनों से अनधिक की और अवधि के भीतर अपील फाइल करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, उच्च न्यायालय" से, -

(i) ऐसा उच्च न्यायालय अभिप्रेत है, जिसकी अधिकारिता के भीतर व्यथित पक्षकार मामूली तौर से निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए वैयक्तिक रूप से कार्य करता है; और

(ii) जहां केन्द्रीय सरकार व्यथित पक्षकार है वहां ऐसा उच्च न्यायालय अभिप्रेत है, जिसकी क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर प्रत्यर्थी या जहां एक से अधिक प्रत्यर्थी हैं वहां प्रत्यर्थियों में से कोई प्रत्यर्थी, मामूली तौर से निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए वैयक्तिक रूप से कार्य करता है ।

अध्याय 7

विशेष न्यायालय

43. विशेष न्यायालय-(1) केन्द्रीय सरकार, ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए अथवा ऐसे मामले या मामलों के किसी वर्ग या समूह के लिए जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, धारा 4 के अधीन दंडनीय अपराध के विचारण के लिए, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श से, अधिसूचना द्वारा, किसी एक या अधिक सेशन न्यायालयों को विशेष न्यायालय या विशेष न्यायालयों के रूप में    पदाभिहित करेगी । 

स्पष्टीकरण-इस उपधारा में उच्च न्यायालय" से उस राज्य का उच्च न्यायालय अभिप्रेत है जिसमें विशेष न्यायालय के रूप में पदाभिहित सेशन न्यायालय ऐसे पदाभिधान से ठीक पूर्व कार्य कर रहा था ।

(2) विशेष न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करते समय, उपधारा (1) में निर्दिष्ट अपराध से भिन्न किसी ऐसे अपराध का भी विचारण करेगा जिसका अभियुक्त पर दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन उसी विचारण में आरोप लगाया जा सकता है ।

44. विशेष न्यायालयों द्वारा विचारणीय अपराध-(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी-

 [(क) धारा 4 के अधीन दंडनीय कोई अपराध और उस धारा के अधीन अपराध से संबंधित कोई अनुसूचित अपराध उस क्षेत्र के लिए, जिसमें अपराध किया गया है, गठित विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय होगा: 

परन्तु विशेष न्यायालय, जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किसी अनुसूचित अपराध का विचारण कर रहा हो, ऐसे अनुसूचित अपराध का विचारण करता रहेगा; या]

() विशेष न्यायालय इस अधिनियम के अधीन इस निमित्त प्राधिकृत किसी प्राधिकारी द्वारा किए गए परिवाद पर 1[अभियुक्त को विचारण के लिए उसे सुपुर्द किए बिना धारा 3 के अधीन अपराध का संज्ञान कर सकेगा;]

 [(ग) यदि ऐसा न्यायालय, जिसने अनुसूचित अपराध का संज्ञान किया है, उस विशेष न्यायालय से भिन्न है, जिसने उपखंड (ख) के अधीन धन-शोधन के अपराध के परिवाद का संज्ञान किया है, तो वह इस अधिनियम के अधीन कोई परिवाद फाइल करने के लिए प्राधिकृत प्राधिकारी द्वारा कोई आवेदन किए जाने पर अनुसूचित अपराध से संबंधित मामला विशेष न्यायालय को सुपुर्द कर सकेगा और विशेष न्यायालय, उस मामले के प्राप्त होने पर उस पर उस प्रक्रम से आगे कार्यवाही करेगा, जिस पर वह उसके सुपुर्द किया जाता है;

() कोई विशेष न्यायालय, अनुसूचित अपराध या धन-शोधन के अपराध का विचारण करते समय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंधों के अनुसार, जैसे वे सेशन न्यायालय के समक्ष किसी विचारण को लागू होते हैं, विचारण करेगा ]

(2) इस धारा में की किसी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 439 के अधीन जमानत से संबंधित उच्च न्यायालय की विशेष शक्तियों को प्रभावित करती है और उच्च न्यायालय उस धारा की उपधारा (1) के खंड () के अधीन शक्ति सहित ऐसी शक्तियों का प्रयोग ऐसे कर सकेगा मानो उस धारा में मजिस्ट्रेट" के प्रति निर्देश के अंतर्गत धारा 43 के अधीन पदाभिहित विशेष न्यायालय" के प्रति निर्देश भी है

45. अपराधों का संज्ञेय और अजमानतीय होना- [दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, अनुसूची के भाग क के अधीन तीन वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति को जमानत पर या उसके निजी बंधपत्र पर तब तक नहीं छोड़ा जाएगा जब तक कि, -]

(i) लोक अभियोजक को ऐसी निर्मुक्ति के आवेदन का विरोध करने के लिए अवसर नहीं दे दिया गया है, और

(ii) जहां लोक अभियोजक आवेदन का विरोध करता है वहां न्यायालय का यह समाधान नहीं हो जाता है कि यह विश्वास करने के लिए समुचित आधार है कि वह ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और उसके द्वारा जमानत के दौरान कोई अपराध किए जाने की संभावना नहीं है :

परन्तु यह कि ऐसा व्यक्ति यदि सोलह वर्ष की आयु से कम का है या महिला है या रुग्ण है या अशक्त है तो उसे जमानत पर निर्मुक्त किया जा सकता है, यदि विशेष न्यायालय ऐसा निदेश दे:

परन्तु यह और कि विशेष न्यायालय, निम्नलिखित द्वारा लिखित रूप में की गई शिकायत के सिवाय, धारा 4 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान नहीं करेगा: -

(i) निदेशक; या 

(ii) केंद्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार का कोई अधिकारी जो इस निमित्त केंद्रीय सरकार द्वारा, किसी ऐसे लिखित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, प्राधिकृत किया गया हो, जिसे उस राज्य सरकार ने इस निमित्त किया हो  

 [(1क) दंड प्रकिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में या इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी पुलिस अधिकारी इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का अन्वेषण तब तक नहीं करेगा जब तक कि उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, विनिर्दिष्ट रूप से प्राधिकृत न किया गया हो ।]

(2) उपधारा (1) । । । में विनिर्दिष्ट जमानत मंजूर करने की सीमा, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) या जमानत मंजूर करने के लिए तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन परिसीमा के अतिरक्ति है ।

46. दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होना-(1) इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध (जिनके अंतर्गत जमानत या बंधपत्रों के बारे में उपबंध भी हैं), विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे और उक्त उपबंधों के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय सेशन न्यायालय समझा जाएगा और विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन का संचालन करने वाला व्यक्ति लोक अभियोजक समझा जाएगा:

परन्तु केन्द्रीय सरकार किसी मामले या मामलों के किसी वर्ग या समूह के लिए विशेष लोक अभियोजक भी नियुक्त कर सकेगी ।

(2) कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन लोक अभियोजक या विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह अधिवक्ता के रूप में संघ या किसी राज्य के अधीन कम से कम सात वर्ष तक ऐसे विधि व्यवसाय में न रहा हो जिसमें विधि का विशेष ज्ञान अपेक्षित है ।

(3) इस धारा के अधीन लोक अभियोजक या विशेष लोक अभियोजक के रूप में नियुक्त प्रत्येक व्यक्ति दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 2 के खंड (प) के अर्थान्तर्गत लोक अभियोजक समझा जाएगा और उस संहिता के उपबंधों का तद्नुसार प्रभाव होगा ।

47. अपील और पुनरीक्षण-उच्च न्यायालय, जहां तक लागू हो, दंड प्रकिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अध्याय 29 या 30 द्वारा उच्च न्यायालय को प्रदत्त सभी शक्तियों का इस रूप में प्रयोग कर सकेगा मानो उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर स्थित विशेष न्यायालय उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर मामलों का विचारण करने वाला सेशन न्यायालय हो ।

अध्याय 8

प्राधिकारी

48. अधिनियम के अधीन प्राधिकारी-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्राधिकारियों के निम्नलिखित वर्ग होंगे, अर्थात्ः-

(क) निदेशक या अपर निदेशक अथवा संयुक्त निदेशक;

(ख) उप निदेशक;

(ग) सहायक निदेशक; और

(घ) ऐसे अन्य वर्ग के अधिकारी, जो इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए नियुक्त किए जाएं ।

49. प्राधिकारियों और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति और उनकी शक्तियां-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए प्राधिकारियों के रूप में ऐसे व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह उचित समझे ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केन्द्रीय सरकार, उस उपधारा के अधीन नियुक्त निदेशक या किसी अपर निदेशक या किसी संयुक्त निदेशक या किसी उप निदेशक या किसी सहायक निदेशक को, सहायक निदेशक की पंक्ति से निम्न पंक्ति के अन्य प्राधिकारियों को नियुक्त करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी

(3) उन शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार अधिरोपित करे, कोई प्राधिकारी, इस अधिनियम के अधीन उस पर अधिरोपित शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन कर सकेगा ।

50. समन करने, दस्तावेज प्रस्तुत करने और साक्ष्य देने, आदि के बारे में प्राधिकारियों की शक्ति-(1) निदेशक को, धारा 13 के प्रयोजनों के लिए वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निम्नलिखित विषयों की बाबत वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्ः-

(क) प्रकटीकरण और निरीक्षण;

(ख) किसी व्यक्ति को जिसके अंतर्गत किसी [रिपोर्टकर्ता इकाई] का कोई अधिकारी भी है, हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

(ग) अभिलेखों के प्रस्तुतीकरण के लिए विवश करना;

(घ) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

(ङ) साक्षियों और दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना; और 

(च) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।

(2) निदेशक, अपर निदेशक, संयुक्त निदेशक, उप निदेशक अथवा सहायक निदेशक को ऐसे किसी व्यक्ति को समन करने की शक्ति होगी जिसकी हाजिरी वह, चाहे इस अधिनियम के अधीन किसी अन्वेषण या कार्यवाही के अनुक्रम में साक्ष्य देने के लिए या कोई अभिलेख पेश करने के लिए आवश्यक समझता है ।

(3) इस प्रकार समन किए सभी व्यक्ति, व्यक्तिगत रूप से अथवा प्राधिकृत अभिकर्ताओं के माध्यम से, जैसा कि ऐसा अधिकारी निदेश दे, हाजिर होने और ऐसे किसी विषय के बारे में सत्य कथन करने के लिए बाध्य होगा जिसके संबंध में उनकी परीक्षा की जा रही हो अथवा ऐसे कथन करने और ऐसे दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए बाध्य होगा जिनकी उससे अपेक्षा की जाए ।

(4) उपधारा (2) और उपधारा (3) के अधीन प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थान्तर्गत न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी ।

(5) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, उपधारा (2) में निर्दिष्ट कोई अधिकारी, इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों में उसके समक्ष प्रस्तुत किए गए किन्हीं अभिलेखों को परिबद्ध कर सकेगा और ऐसी किसी अवधि के लिए अपने पास प्रतिधारित कर सकेगा जिसे वह उचित समझे:

परन्तु कोई सहायक निदेशक या उप निदेशक-

(क) किसी अभिलेख को, ऐसा करने के लिए अपने कारणों को लेखबद्ध किए बिना, परिबद्ध नहीं करेगा; या

(ख) ऐसे किसी अभिलेख को निदेशक का पूर्व अनुमोदन अभिप्राप्त किए बिना तीन मास से अधिक की अवधि के लिए अपनी अभिरक्षा में नहीं रखेगा । 

51. प्राधिकारियों की अधिकारिता-(1) प्राधिकारी, इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के द्वारा या उनके अधीन ऐसे प्राधिकारियों को, यथास्थिति, प्रदत्त सभी शक्तियों या उनमें से किसी शक्ति का प्रयोग या उन्हें समनुदेशित सभी कृत्यों या किसी कृत्य का पालन ऐसे निदेशों के अनुसार करेंगे जो केन्द्रीय सरकार ऐसे सभी प्राधिकारियों या किसी प्राधिकारी द्वारा ऐसी शक्तियों के प्रयोग और कर्तव्यों के पालन के लिए जारी करे । 

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट निदेश अथवा आदेश जारी करने में केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित मानदंडों में से किसी एक या अधिक को ध्यान में रखेगी, अर्थात्ः-

(क) प्रादेशिक क्षेत्र;

(ख) व्यक्तियों के वर्ग;

(ग) मामलों के वर्ग;

(घ) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट कोई अन्य मानदंड ।

52. निदेश, आदि जारी करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर, प्राधिकारियों को इस अधिनियम के उचित प्रशासन के लिए ऐसे आदेश, अनुदेश और निदेश जारी कर सकेगी जो वह उचित समझे और ऐसे प्राधिकारी तथा इस अधिनियम के निष्पादन में नियोजित अन्य सभी व्यक्ति, केन्द्रीय सरकार के ऐसे आदेशों, अनुदेशों और निदेशों का पालन और अनुसरण करेंगे:

परन्तु ऐसे कोई आदेश, अनुदेश या निदेश-

() किसी प्राधिकारी से किसी विशिष्ट मामले का विनिश्चय किसी विशिष्ट रीति से करने की अपेक्षा करने के लिए; या

(ख) किसी न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के अपने कृत्यों का स्वविवेक से पालन करने में हस्तक्षेप करने के लिए,

जारी नहीं किए जाएंगे ।

53. कतिपय अधिकारियों का सशक्तिकरण-केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के अधीन प्राधिकारी के रूप में कार्य करने के लिए केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के ऐसे किसी अधिकारी को, जो निदेशक की पंक्ति से नीचे का न हो, विशेष या साधारण आदेश द्वारा, सशक्त कर सकेगी:

परन्तु केन्द्रीय सरकार यदि किसी विशिष्ट क्षेत्र में निदेशक या उससे ऊपर की पंक्ति का अधिकारी उपलब्ध नहीं है तो निदेशक की पंक्ति से नीचे के किसी अधिकारी को सशक्त कर सकेगी ।

54. जांच आदि में सहायता करने के लिए कतिपय अधिकारी-निम्नलिखित [अधिकारियों और अन्य व्यक्तियों को] इस अधिनियम के प्रवर्तन में प्राधिकारियों की सहायता करने के लिए सशक्त किया जाता है और उनसे ऐसा करने की अपेक्षा की जाती है, अर्थात्ः-

(क) सीमाशुल्क और केन्द्रीय उत्पाद-शुल्क विभाग के अधिकारी;

(ख) स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (1985 का 61) की धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त अधिकारी; 

(ग) आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 117 की उपधारा (1) के अधीन आय-कर प्राधिकारी;

1[(घ) प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) की धारा 2 के खंड (च) में निर्दिष्ट मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सेंज के सदस्य और धारा 4 के अधीन मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंजों के अधिकारी;]

(ङ) भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक के अधिकारी;

(च) पुलिस अधिकारी; 

() विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) की धारा 36 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त प्रवर्तन अधिकारी;

(ज) भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड के अधिकारी;

 [(जक) बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 3 के अधीन स्थापित बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण के अधिकारी;

(जख) अग्रिम संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952 (1952 का 74) की धारा 3 के अधीन स्थापित अग्रिम वायदा बाजार आयोग के अधिकारी;

(जग) अग्रिम संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1952 (1952 का 74) की धारा 6 के अधीन मान्यताप्राप्त संगम के अधिकारी और सदस्य;

(जघ) पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण के अधिकारी;

(जङ) भारत सरकार के डाक विभाग के अधिकारी;

(जच) रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) की धारा 6 के अधीन राज्य सरकारों द्वारा नियुक्त किए गए रजिस्ट्रार या उप रजिस्ट्रार;

(जछ) मोटर यान अधिनियम, 1988 (1988 का 59) का के अध्याय 4 के अधीन मोटर यानों को रजिस्टर करने के लिए सशक्त रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी;

(जज) चार्टर्ड अकाउंटेन्ट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय चार्टर्ड अकाउंटेन्ट संस्थान के अधिकारी और सदस्य;

(जझ) लागत और संकर्म लेखापाल अधिनियम, 1959 (1959 का 23) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय लागत लेखापाल संस्थान के अधिकारी और सदस्य;

(जञ) कंपनी सचिव अधिनियम, 1980 (1980 का 56) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय कंपनी सचिव संस्थान के अधिकारी और सदस्य;]

() किसी केन्द्रीय अधिनियम या राज्य अधिनियम के अधीन गठित या स्थापित किसी अन्य निगमित निकाय के अधिकारी

(ञ) केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार, स्थानीय प्राधिकारियों या [रिपोर्टकर्ता इकाइयों] के ऐसे अन्य अधिकारी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

अध्याय 9

कतिपय मामलों में सहायता के लिए व्यतिकारी ठहराव और संपत्ति की कुर्की और

उसके अधिहरण के लिए प्रक्रिया

55. परिभाषाएं-इस अध्याय में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) संविदाकारी राज्य" से ऐसा कोई देश या भारत से बाहर कोई स्थान अभिप्रेत है जिसकी बाबत केन्द्रीय सरकार द्वारा, उस देश की सरकार के साथ संधि के माध्यम से या अन्यथा ठहराव किए गए हैं; 

(ख) पहचान करने" के अन्तर्गत ऐसे सबूत का सिद्ध होना है कि संपत्ति धारा 3 के अधीन किसी अपराध से प्राप्त की गई या उस अपराध के करने में प्रयुक्त की गई थी;

() पता लगाने" से संपत्ति की प्रकृति, उसके स्रोत, व्ययन, संचलन, हक अथवा स्वामित्व का अवधारण करना अभिप्रेत है

56.  विदेशों के साथ करार-(1) केन्द्रीय सरकार, भारत से बाहर किसी देश की सरकार के साथ-

(क) इस अधिनियम के उपबंधों को प्रवृत्त करने;

() इस अधिनियम के अधीन या उस देश में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि के अधीन किसी अपराध के निवारण के लिए अथवा इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध से संबंधित मामलों के अन्वेषण के लिए जानकारी के आदान-प्रदान के लिए

करार कर सकेगी और राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो करार के कार्यान्वयन के लिए आवश्यक हों  

(2) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि ऐसे संविदाकारी राज्य के संबंध में, जिसके साथ व्यतिकारी ठहराव किए गए हों, इस अध्याय का लागू होना ऐसी शर्तों, अपवादों या अर्हताओं के अध्यधीन होगा जो उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हों । 

57. कतिपय दशाओं में संविदाकारी राज्य को अनुरोध पत्र-(1) इस अधिनियम या दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, यदि इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के अन्वेषण या अन्य कार्यवाहियों के अनुक्रम में, विशेष न्यायालय को अन्वेषक अधिकारी या अन्वेषक अधिकारी से उच्चतर पंक्ति के किसी अधिकारी द्वारा आवेदन किया जाता है कि इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के अन्वेषण या अन्य कार्यवाहियों के संबंध में कोई साक्ष्य अपेक्षित है और उसकी यह राय है कि ऐसा साक्ष्य संविदाकारी राज्य में किसी स्थान पर उपलभ्य हो सकता है और विशेष न्यायालय, यह समाधान हो जाने पर कि ऐसा साक्ष्य इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के अन्वेषण या कार्यवाहियों के संबंध में अपेक्षित है तो वह संविदाकारी राज्य में किसी न्यायालय या प्राधिकारी को, जो ऐसे अनुरोध पर विचार करने के लिए सक्षम है-

(i) मामले के तथ्यों और परिस्थितियों की परीक्षा करने,

(ii) ऐसे कदम उठाने जिन्हें विशेष न्यायालय ऐसे अनुरोध पत्र में विनिर्दिष्ट करे, और

(iii) अनुरोध पत्र जारी करने वाले विशेष न्यायायल को इस प्रकार लिए गए या संगृहीत किए सभी साक्ष्य को अग्रेषित करने के लिए अनुरोध पत्र जारी कर सकेगा । 

(2) अनुरोध पत्र ऐसी रीति में पारेषित किया जाएगा जिसे केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।

(3) उपधारा (1) के अधीन अभिलिखित किया गया प्रत्येक कथन या प्राप्त किया गया प्रत्येक दस्तावेज या चीज, अन्वेषण के दौरान संगृहीत साक्ष्य समझी जाएगी ।

58. कतिपय दशाओं में संविदाकारी राज्य को सहायता-जहां केन्द्रीय सरकार को संविदाकारी राज्य के किसी न्यायालय या प्राधिकारी से अनुरोध पत्र प्राप्त होता है जिसमें इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के अन्वेषण या कार्यवाहियों के लिए और उनसे संबंधित किसी साक्ष्य को ऐसे न्यायालय या प्राधिकारी को अग्रेषित करने के लिए अनुरोध किया गया है वहां केन्द्रीय सरकार ऐसे अनुरोध पत्र को विशेष न्यायालय या इस अधिनियम के अधीन किसी प्राधिकारी को, जिसे वह उचित समझे, ऐसे अनुरोध के, यथास्थिति, इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अनुसार निष्पादन के लिए अग्रेषित कर सकेगी ।

 [58क. विशेष न्यायालय द्वारा सम्पत्ति निर्मुक्त किया जाना-जहां किसी अन्य देश की तत्स्थानी विधि के अधीन भारत के बाहर किसी दंड न्यायालय में आपराधिक मामला बंद करने या किसी विचारण की समाप्ति पर, उस न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि धन-शोधन का अपराध नहीं हुआ है या भारत में की संपत्ति धन-शोधन में अंतर्वलित नहीं है, वहां विशेष न्यायालय, संबंधित व्यक्ति या निदेशक द्वारा किए गए आवेदन पर, अन्य पक्षकार को सूचना देने के पश्चात् वह संपत्ति उस व्यक्ति को, जो उसे प्राप्त करने के लिए हकदार है, सौंपे जाने का आदेश दे सकेगा  

58ख. सम्पत्ति के अधिहरण या निर्मक्ति के लिए किसी संविदाकारी राज्य या प्राधिकरण का अनुरोध पत्र-जहां अभियुक्त की मृत्यु या अभियुक्त को कोई उद्घोषित अपराधी घोषित किए जाने के कारण या किसी अन्य कारण से किसी अन्य देश की तत्स्थानी विधि के अधीन विचारण नहीं किया जा सका है या प्रारंभ हो जाने पर पूरा नहीं किया जा सका है, वहां केंद्रीय सरकार किसी संविदाकारी राज्य में किसी न्यायालय या प्राधिकरण से, यथास्थिति, संपत्ति का अधिहरण करने या उसे निर्मुक्त करने का अनुरोध करने संबंधी अनुरोध-पत्र प्राप्त होने पर, उसे निदेशक को विशेष न्यायालय के समक्ष आवेदन करने के लिए अग्रेषित करेगी और ऐसे आवेदन पर विशेष न्यायालय धन-शोधन के अपराध में अंतर्वलित उस संपत्ति के अधिहरण या उसकी निर्मुक्ति के संबंध में समुचित आदेश पारित करेगा

59. आदेशिकाओं की तामील के लिए और अभियुक्त व्यक्तियों के स्थानान्तरण में सहायता के लिए व्यतिकारी ठहराव-(1) जहां, विशेष न्यायालय, धारा 4 के अधीन दंडनीय किसी अपराध के संबंध में यह चाहता है कि, उसके द्वारा जारी किए गए-

(क) अभियुक्त व्यक्ति को समन, या

(ख) अभियुक्त व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए वारंट, या

(ग) किसी व्यक्ति को उसके समक्ष हाजिर होने और दस्तावेज या कोई अन्य चीज पेश करने की अपेक्षा करते हुए अथवा उसे पेश करने के लिए समन, या

(घ) तलाशी वारंट,

किसी संविदाकारी राज्य में किसी स्थान पर तामील या निष्पादित किए जाएंगे वहां वह ऐसे प्राधिकारियों के माध्यम से, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, ऐसे न्यायालय, न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट को ऐसे समन या वारंट दो प्रतियां में ऐसे प्ररूप में भेजेगा और, यथास्थिति, वह न्यायालय, न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट उन्हें निष्पादित कराएगा ।

(2) जहां किसी विशेष न्यायालय ने, धारा 4 के अधीन दंडनीय किसी अपराध के संबंध में, -

 (क) अभियुक्त व्यक्ति के लिए कोई समन, या

(ख) किसी अभियुक्त व्यक्ति की गिरफ्तारी के लिए वारंट, या

(ग) किसी ऐसे व्यक्ति के लिए समन, जिससे हाजिर होने और कोई दस्तावेज या अन्य चीज प्रस्तुत करने के लिए अथवा उसे प्रस्तुत करने के लिए अपेक्षा की गई है, या 

(घ) तलाशी वांरट,

तामील या निष्पादन के लिए प्राप्त किया है, जो संविदाकारी राज्य के किसी न्यायालय, न्यायाधीश या मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया है वहां वह उसकी इस प्रकार तामील या उसका निष्पादन कराएगा मानो वह उसके द्वारा उक्त राज्यक्षेत्रों में किसी अन्य न्यायालय से अपनी स्थानीय अधिकारिता के भीतर तामील या निष्पादन के लिए प्राप्त समन या वारंट हो; और जहां-

(i) गिरफ्तारी का वारंट निष्पादित किया गया है वहां गिरफ्तार किए गए व्यक्ति के साथ, धारा 19 के अधीन विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की जाएगी; 

(ii) तलाशी वारंट निष्पादित किया गया है वहां तलाशी में पाई गई चीजों के साथ, जहां तक संभव हो, धारा 17 और धारा 18 में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार कार्रवाई की जाएगी:

परन्तु ऐसी दशा में जहां संविदाकारी राज्य से प्राप्त समन या तलाशी वांरट निष्पादित किया गया है, वहां प्रस्तुत किए गए दस्तावेज या अन्य चीजें, अथवा तलाशी में पाई गई चीचें, समन या तलाशी वारंट जारी करने वाले न्यायालय को ऐसे प्राधिकारी के माध्यम से अग्रेषित की जाएंगी जिसे केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे  

(3) जहां उपधारा (2) के अनुसरण में संविदाकारी राज्य को स्थानान्तरित व्यक्ति भारत में कैदी है वहां विशेष न्यायालय या केन्द्रीय सरकार ऐसी शर्तें अधिरोपित कर सकेगा/सकेगी जिन्हें वह न्यायालय या सरकार उचित समझे

(4) जहां उपधारा (1) के अनुसरण में भारत को स्थानांतरित व्यक्ति संविदाकारी राज्य में कैदी है वहां भारत में विशेष न्यायालय यह सुनिश्चित करेगा कि उन शर्तों का जिनके अधीन रहते हुए कैदी भारत को स्थानांतरित किया जाता है, पालन कर दिया गया है और ऐसा कैदी ऐसी अभिरक्षा में और ऐसी शर्तों के अध्यधीन रखा जाएगा जो केन्द्रीय सरकार लिखित में निदेशित करे ।

60. संविदाकारी राज्य या भारत में संपत्ति की कुर्की, अभिग्रहण या अधिहरण, आदि-(1) जहां निदेशक ने  [धारा 5 के अधीन किसी संपत्ति की कुर्की के लिए या धारा 17 की उपधारा (1क) के अधीन उसके अवरोधन के लिए आदेश किया है या जहां न्यायनिर्णायक प्राधिकरण ने धारा 8 के अधीन किसी संपत्ति के संबंध में कोई आदेश किया है या जहां विशेष न्यायालय ने धारा 8 की उपधारा (5) या उपधारा (6) के अधीन किसी संपत्ति के संबंध में अधिहरण का कोई आदेश किया है] और ऐसी संपत्ति के बारे में यह संदेह है कि वह संविदाकारी राज्य में है तो विशेष न्यायालय, धारा 10 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त, यथास्थिति, निदेशक या प्रशासक द्वारा किए गए आवेदन पर संविदाकारी राज्य में न्यायालय या प्राधिकारी को ऐसे आदेश के निष्पादन के लिए अनुरोध पत्र जारी कर सकेगा ।

(2) जहां केन्द्रीय सरकार को संविदाकारी राज्य में न्यायालय या प्राधिकारी से ऐसा अनुरोध पत्र प्राप्त होता है जिसमें भारत में ऐसी संपत्ति की कुर्की या उसके अधिहरण के लिए अनुरोध किया गया है जो किसी व्यक्ति द्वारा प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः संविदाकारी राज्य में किए गए धारा 3 के अधीन किसी अपराध से व्युत्पन्न या अभिप्राप्त की गई है वहां केन्द्रीय सरकार ऐसे अनुरोध पत्र को इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार निष्पादन के लिए निदेशक को अग्रेषित कर सकेगी जिसे वह उचित समझे ।

[(2क) जहां किसी अन्य देश की तत्स्थानी विधि के अधीन भारत के बाहर किसी दंड न्यायालय में आपराधिक मामला बंद करने या किसी विचारण की समाप्ति पर उस न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि उस देश की तत्स्थानी विधि के अधीन धन-शोधन का अपराध किया गया है, तो न्यायनिर्णायक प्राधिकरण उपधारा (2) के अधीन अधिहरण के निष्पादन के लिए निदेशक से आवेदन की प्राप्ति पर, प्रभावित व्यक्तियों को सूचना देने के पश्चात्, यह आदेश करेगा कि वह संपत्ति, जो धन-शोधन में अंतर्वलित है या जिसका धन-शोधन का अपराध किए जाने के लिए उपयोग किया गया है, केंद्रीय सरकार को अधिहृत हो जाएगी ।]

(3) निदेशक धारा 58 या धारा 59 के अधीन अनुरोध पत्र की प्राप्ति पर, इस अधिनियम के अधीन किसी प्राधिकारी को ऐसी संपत्ति का पता लगाने और उसकी पहचान करने के लिए सभी आवश्यक कार्रवाई करने के लिए निदेश देगा

(4) उपधारा (3) में निर्दिष्ट कार्रवाई के अंतर्गत किसी व्यक्ति, स्थान, संपत्ति, आस्तियों, दस्तावेजों, किसी बैंक या लोक वित्तीय संस्थाओं में लेखा बहियों या किन्हीं अन्य सुसंगत विषयों की बाबत कोई जांच, अन्वेषण या सर्वेक्षण सम्मिलित है

(5) उपधारा (4) में निर्दिष्ट कोई जांच, अन्वेषण या सर्वेक्षण उपधारा (3) में वर्णित प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार जारी किए गए निदेशों के अनुसार किया जाएगा ।

(6) अध्याय 3 में अंतर्विष्ट संपत्ति की कुर्की, न्यायनिर्णयन, अधिहरण और उसके केन्द्रीय सरकार में निहित होने से संबंधित और अध्याय 5 में अंतर्विष्ट सर्वेक्षण, तलाशियों और अभिग्रहणों से संबंधित इस अधिनियम के उपबंध ऐसी संपत्ति को लागू होंगे जिसके संबंध में किसी न्यायालय या संविदाकारी राज्य से संपत्ति की कुर्की या अधिहरण के लिए अनुरोध पत्र प्राप्त होता है । 

 [(7) जब इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किसी संविदाकारी राज्य के किसी अनुरोध के निष्पादन के परिणामस्वरूप, भारत में कोई संपत्ति अधिहृत की जाती है तब केन्द्रीय सरकार या तो अनुरोध करने वाले राज्य को ऐसी संपत्ति वापस कर सकेगी या पारस्परिक रूप से करार किए गए निबंधनों पर ऐसी संपत्ति के व्ययन द्वारा उस राज्य को क्षतिपूरित कर सकेगी, जिसमें अधिहृत संपत्ति को वापस करने या व्ययन करने के संबंध में अन्वेषण, अभियोजन या न्यायिक कार्यवाहियों में उपगत युक्तियुक्त व्ययों की कटौती का ध्यान रखा जाएगा ।]

61. अनुरोध पत्र की बाबत प्रक्रिया-इस अध्याय के अधीन केंद्रीय सरकार को प्राप्त प्रत्येक अनुरोध पत्र, समन या वारंट और संविदाकारी राज्य को पारेषित किए जाने वाला प्रत्येक अनुरोध पत्र, समन या वारंट, यथास्थिति, संविदाकारी राज्य को या भारत में संबद्ध न्यायालय को, ऐसे प्ररूप और ऐसी रीति में जो केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, पारेषित किया जाएगा ।

अध्याय 10

प्रकीर्ण

62. तंग करने वाली तलाशी के लिए दंड-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन शक्तियों का प्रयोग करने वाला कोई प्राधिकारी या अधिकारी जो कारणों को लेखबद्ध किए बिना, -

(क) किसी भवन या स्थान की तलाशी लेता है या तलाशी कराता है; या

(ख) किसी व्यक्ति को निरुद्ध करता है, या उसकी तलाशी लेता है या उसे गिरफ्तार करता है,

ऐसे प्रत्येक अपराध के लिए दोषसिद्धि पर ऐसे कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी अथवा ऐसे जुर्माने से जो पचास हजार रुपए तक का हो सकेगा अथवा दोनों से दंडनीय होगा ।

63. मिथ्या सूचना अथवा सूचना देने में असफल रहने आदि के लिए दंड-(1) ऐसा कोई, व्यक्ति जो जानबूझकर और विद्वेषपूर्वक मिथ्या सूचना देता है और ऐसा करके इस अधिनियम के अधीन कोई गिरफ्तारी या तलाशी करवाता है, दोषसिद्धि पर ऐसे कारावास से जो दो वर्ष तक का हो सकेगा या ऐसे जुर्माने से जो पचास हजार रुपए तक हो सकेगा अथवा दोनों से दंडनीय होगा । 

(2) यदि ऐसा कोई व्यक्ति, -

(क) जो धारा 3 के अधीन किसी अपराध से संबंधित किसी विषय के बारे में सत्य कथन करने के लिए वैध रूप से आबद्ध है, किसी प्राधिकारी द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए उससे किए गए किसी प्रश्न का उत्तर देने से इंकार करता है; या

() जो इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों के अनुक्रम में उसके द्वारा किए गए ऐसे किसी कथन पर हस्ताक्षर करने से इंकार करता है जिस पर कोई प्राधिकारी हस्ताक्षर करने के लिए उससे वैध रूप से अपेक्षा करता है; या

(ग) जिसे किसी स्थान या समय पर या तो साक्ष्य देने के लिए या लेखा बहियां या अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने के लिए हाजिर होने के लिए धारा 50 के अधीन समन जारी किया जाता है, और वह उस स्थान या समय पर हाजिर होने या लेखा बहियां अथवा अन्य दस्तावेज प्रस्तुत करने का लोप करता है,

तो वह ऐसे व्यतिक्रम या असफलता के लिए शास्ति के रूप में ऐसी धनराशि का, जो पांच सौ रुपए से कम की नहीं होगी किंतु दस हजार रुपए तक की हो सकेगी, संदाय करेगा ।

(3) इस धारा के अधीन कोई आदेश उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी प्राधिकारी द्वारा तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि उस व्यक्ति को, जिस पर शास्ति अधिरोपित करने का प्रस्ताव है ऐसे प्राधिकारी द्वारा उस विषय पर सुनवाई का अवसर नहीं दे   दिया जाता ।

 [(4) उपधारा (2) के खंड (ग) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसा कोई व्यक्ति, जो धारा 50 के अधीन जारी किए गए किसी निदेश की साशय अवज्ञा करता है, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 174 के अधीन अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने के लिए भी दायी होगा ।]

64. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई न्यायालय, धारा 62 या धारा 63 की उपधारा (1) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से ही करेगा, अन्यथा नहीं ।

(2) केन्द्रीय सरकार, इस निमित्त अनुरोध की प्राप्ति से नब्बे दिन के भीतर, आदेश द्वारा, मंजूरी देगी या मंजूरी देने से इंकार कर देगी ।

65. दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 का लागू होना-दंड प्रकिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं, इस अधिनियम के अधीन गिरफ्तारी, तलाशी और अभिग्रहण, कुर्की, अधिहरण, अन्वेषण, अभियोजन और अन्य सभी कार्यवाहियों को लागू होंगे ।

66. सूचना का प्रकटीकरण-निदेशक या उसके द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट कोई अन्य प्राधिकारी, -

(i) किसी कर, शुल्क या उपकर के अधिरोपण या विदेशी मुद्रा के व्यवहार या स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (1985 का 61) के अधीन स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार के निवारण से संबंधित किसी विधि के अधीन कृत्यों का पालन करने वाले किसी अधिकारी, प्राधिकारी या निकाय को; अथवा

(ii) ऐसे किसी अधिकारी, प्राधिकारी या निकाय को, जो किसी अन्य विधि के अधीन ऐसे कृत्यों का पालन कर रहा है जो केन्द्रीय सरकार, यदि लोकहित में ऐसा करना उसकी राय में आवश्यक है, इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे,

इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने में ऐसे निदेशक या उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किसी प्राधिकारी द्वारा प्राप्त या अभिप्राप्त की गई कोई जानकारी, जो उप निदेशक या उसके द्वारा इस प्रकार विनिर्दिष्ट किए गए अन्य प्राधिकारी की राय में, उस विधि के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के लिए खण्ड (i) या खंड (ii) में विनिर्दिष्ट उस अधिकारी, प्राधिकारी या निकाय को समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए आवश्यक है, देगा या दिलाएगा

67. सिविल न्यायालयों में वादों का वर्जन-इस अधिनियम के अधीन की गई किसी कार्यवाही या किए गए किसी आदेश को अपास्त या उपान्तरित करने के लिए किसी सिविल न्यायालय में कोई वाद नहीं लाया जाएगा और इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए सरकार या सरकार के किसी अधिकारी के विरुद्ध कोई अभियोजन, वाद या अन्य कार्यवाही नहीं की जाएगी ।

68. सूचना आदि का कतिपय आधारों पर अविधिमान्य होना-इस अधिनियम के उपबंधों में से किसी उपबंध के अनुसरण में दी गई कोई सूचना, जारी किए गए समन, आदेश, पेश किया गया दस्तावेज या की गई अन्य कार्यवाही अथवा दिए जाने अथवा किए जाने या जारी किए जाने के लिए तात्पर्यित कोई सूचना, समन, आदेश, दस्तावेज या अन्य कार्यवाही, ऐसी सूचना, समन, आदेश, दस्तावेज या अन्य कार्यवाही में मात्र किसी त्रुटि, कमी या लोप के कारण अविधिमान्य नहीं होगी यदि ऐसी सूचना, समन, आदेश, दस्तावेज या अन्य कार्यवाही सारतः और प्रभावतः इस अधिनियम के आशय और प्रयोजन के अनुरूप और उनके अनुसार है ।

 [69. जुर्मानों की वसूली-जहां धारा 13 या धारा 63 के अधीन किसी व्यक्ति पर अधिरोपित किसी जुर्माने या शास्ति का संदाय, जुर्माने या शास्ति के अधिरोपण के दिन से छह मास के भीतर नहीं किया जाता है, वहां निदेशक या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई अन्य अधिकारी उस रकम की उक्त व्यक्ति से वसूली करने की कार्यवाही उसी रीति में कर सकेगा जैसी कि बकाया की वसूली के लिए आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43)  की दूसरी अनुसूची में विहित है और उसे या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी को उक्त प्रयोजन के लिए उक्त अनुसूची में वर्णित कर वसूली अधिकारी की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी ।]

70. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम, किए गए किसी आदेश या निदेश के उपबंधों में से किसी का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति, कंपनी है वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस उल्लंघन के किए जाने के समय, उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे उल्लंघन के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे: 

परन्तु इस उपधारा की कोई बात, किसी ऐसे व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि उल्लंघन उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे उल्लंघन के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम, किए गए किसी निदेश या आदेश के किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह उल्लंघन कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की समहति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस उल्लंघन का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस उल्लंघन का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा । 

स्पष्टीकरण [1]-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-

(i) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; और

(ii) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है । 

 [स्पष्टीकरण 2-शंकाओं को दूर करने के लिए, यह स्पष्ट किया जाता है कि किसी कंपनी को, इस बात के होते हुए भी कि किसी विधिक व्यक्ति का अभियोजन या उसकी दोषसिद्धि किसी व्यष्टि के अभियोजन या दोषसिद्धि पर समाश्रित होगी, अभियोजित किया जा सकेगा ।]

71. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंधों का, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभाव होगा ।

72. मृत्यु या दिवालिएपन की दशा में कार्यवाहियों का जारी रहना-(1) जहां-

(क) किसी व्यक्ति की किसी सम्पत्ति को धारा 8 के अधीन कुर्क किया गया है और ऐसी संपत्ति को कुर्क करने वाले आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं की गई है; या

(ख) कोई अपील, अपील अधिकरण को की गई है, और-

(i) खंड (क) में निर्दिष्ट किसी मामले में, ऐसे व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या उसे अपील अधिकरण को अपील करने के पूर्व दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है, या

(ii) खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी मामले में, ऐसे व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या उसे अपील लम्बित रहने के दौरान दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है, 

वहां, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधियों या शासकीय समनुदेशिती या शासकीय रिसीवर के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह, यथास्थिति, अपील अधिकरण के समक्ष अपील करे या ऐसे व्यक्ति के स्थान पर, अपील अधिकरण के समक्ष अपील को जारी रखे और धारा 26 के उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसी अपील को लागू होंगे या लागू होते रहेंगे

(2) जहां-

(क) अपील अधिकरण द्वारा कोई विनिश्चय या आदेश पारित किए जाने के पश्चात् कोई अपील धारा 42 के अधीन उच्च न्यायालय को नहीं की गई है; या

(ख) कोई ऐसी अपील उच्च न्यायालय को की गई है, 

वहां-

(i) खंड (क) में निर्दिष्ट मामले में, अपील फाइल करने के हकदार व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है या उसे उच्च न्यायालय को अपील करने के पूर्व दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है, या

(ii) खंड (ख) में निर्दिष्ट मामले में, उस व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है जिसने अपील फाइल की थी या उसे उच्च न्यायालय के समक्ष अपील लम्बित रहने के दौरान दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है,

वहां, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधियों या शासकीय समनुदेशिती या शासकीय रिसीवर के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसे व्यक्ति के स्थान पर उच्च न्यायालय को अपील करे या उच्च न्यायालय के समक्ष अपील को जारी रखे और धारा 42 का उपबंध, जहां तक हो सके, ऐसी अपील को लागू होगा या लागू होता रहेगा ।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन शासकीय समनुदेशिती या शासकीय रिसीवर की शक्तियों का प्रयोग उसके द्वारा, यथास्थिति, प्रेसिडेंसी नगर दिवाला अधिनियम, 1909 (1909 का 3) या प्रान्तीय दिवाला अधिनियम, 1920 (1920 का 5) के उपबंधों के अधीन रहते हुए किया जाएगा ।

73. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए, अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्ः- 

(क) वह प्ररूप, जिसमें इस अधिनियम में निर्दिष्ट अभिलेख रखे जा सकेंगे;

 [(कक) धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन संपत्ति की अनन्तिम कुर्की की रीति;]

(ख) वह रीति, जिसमें धारा 5 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट आदेश और सामग्री रखी जानी है; 

(ग) धारा 6 की उपधारा (3) के अधीन सदस्यों के अनुभव की बाबत विषय;

(घ) धारा 6 की उपधारा (9) के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा [उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (पदावधि सहित)]; 

(ङ) धारा 7 की उपधारा (3) के अधीन न्यायनिर्णायक प्राधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

1[(डङ) धारा 5 के अधीन कुर्क की गई या धारा 17 की उपधारा (1क) या धारा 8 की उपधारा (4) के अधीन अवरुद्ध की गई संपत्ति का अभिग्रहण करने या कब्जा लेने की रीति;]

(च) वह रीति, जिसमें और वे शर्तें, जिनके अधीन रहते हुए धारा 10 की उपधारा (2) के अधीन अधिहृत सम्पत्तियां प्राप्त की जा सकेंगी और उनका प्रबंध किया जा सकेगा;

(छ) वे अतिरिक्त विषय, जिनकी बाबत न्यायनिर्णायक प्राधिकरण धारा 11 की उपधारा (1) के खण्ड (च) के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा;

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(झ) [धारा 12 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन संव्यवहारों की जानकारी दी जाएगी;

 [(ञ) वह रीति और वे शर्तें, जिनमें धारा 12 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन रिपोर्टकर्ता इकाइयों द्वारा ग्राहकों की पहचान का सत्यापन किया जाएगा;

(ञञ) धारा 12 की उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन रिपोर्टकर्ता इकाइयों द्वारा ग्राहकों से हिताधिकारी स्वामी की, यदि कोई हो, पहचान कराने की रीति;

(ञञञ) अंतराल की वह अवधि जिसमें धारा 13 की उपधारा (2) के खंड (ग) के अधीन रिपोर्टकर्ता इकाइयों या उनके कर्मचारियों में से किसी कर्मचारी द्वारा रिपोर्टें भेजी जाती हैं;] 

(ट) धारा 15 के अधीन यथा अपेक्षित धारा 12 की उपधारा (1) के अधीन जानकारी के रखे जाने और दिए जाने की प्रक्रिया और रीति; 

(ठ) वह रीति, जिसमें धारा 16 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट कारण और सामग्री रखी जाएगी;

(ड) धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन तलाशी और अभिग्रहण से संबंधित नियम;

(ढ) वह रीति, जिसमें धारा 17 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट कारण और सामग्री रखी जाएगी;

(ण) वह रीति, जिसमें धारा 18 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट कारण और सामग्री रखी जाएगी;

(त) वह रीति, जिसमें धारा 19 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट आदेश और सामग्री रखी जाएगी;

 1[(तत) वह रीति, जिसमें धारा 20 की उपधारा (2) के अधीन संपत्ति के प्रतिधारण या अवरोधन के बनाए रखे जाने का आदेश अग्रेषित किया जाएगा और ऐसे आदेश और सामग्री को रखने की अवधि;] 

() वह रीति, जिसमें भारत के बाहर अधिप्रमाणित अभिलेख धारा 22 की उपधारा (2) के अधीन प्राप्त किए जा सकेंगे;

(द) धारा 26 की उपधारा (3) के अधीन अपील का प्ररूप और ऐसी अपील फाइल करने की फीस;

(ध) धारा 30 के अधीन अपील अधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(न) धारा 34 की उपधारा (3) के अधीन अपील अधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की शर्तें;

(प) वे अतिरिक्त विषय, जिनकी बाबत अपील अधिकरण, धारा 35 की उपधारा (2) के खंड (झ) के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा;

 [(पक) वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए धारा 45 की उपधारा (1क) के अधीन किसी अपराध का अन्वेषण करने के लिए किसी पुलिस अधिकारी को प्राधिकृत किया जा सकेगा ।]

(फ) वे अतिरिक्त विषय, जिनकी बाबत प्राधिकारी, धारा 50 की उपधारा (1) के खंड (च) के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकेंगे;

(ब) धारा 50 की उपधारा (5) के अधीन अभिलेखों के परिबद्ध करने और अभिरक्षा से संबंधित नियम;

(भ) कोई अन्य बात जिसे विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित की जाए ।

74. नियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसा नियम तत्पश्चात् केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा, तथापि, उस नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा

75. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, उस कठिनाई को दूर करने के लिए ऐसे उपबंध कर सकेगी जो उसके लिए आवश्यक प्रतीत हों और इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों:

परन्तु इस धारा के अधीन कोई ऐसा आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा

अनुसूची

[धारा 2 (म) देखिए]

[भाग

पैरा 1

भारतीय दंड संहिता के अधीन अपराध

(1860 का 45)

धारा

अपराध का वर्णन

120

आपराधिक षडयंत्र

121

भारत सरकार के विरुद्ध युद्ध करना या युद्ध करने का प्रयत्न करना या युद्ध करने का दुष्प्रेरण करना

121

धारा 121 द्वारा दंडनीय अपराधों को राज्य के विरुद्ध करने का षडयंत्र

255

सरकारी स्टाम्प का कूटकरण

257

सरकारी स्टाम्प के कूटकरण के लिए उपकरण बनाना या बेचना

258

कूटकृत सरकारी स्टाम्प का विक्रय  

259

सरकारी कूटकृत स्टाम्प को कब्जे में रखना

260

किसी सरकारी स्टाम्प को, कूटकृत जानते हुए उसे असली स्टाम्प के रूप में उपयोग में लाना

302

हत्या

304

हत्या की को] ि में आने वाले आपराधिक मानव वध के लिए दंड

307

हत्या करने का प्रयत्न

308

आपराधिक मानव वध करने का प्रयत्न

327

संपत्ति उद्दापित करने के लिए या अवैध कार्य कराने को मजबूर करने के लिए स्वेच्छया उपहति कारित करना

329

संपत्ति उद्दापित करने के लिए या अवैध कार्य कराने को मजबूर करने के लिए स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना

364

फिरौती, आदि के लिए व्यपहरण

384 से 389

उद्दापन्न से संबंधित अपराध

392 से 402

लूट और डकैती से संबंधित अपराध

411

चुराई हुई संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना

412

ऐसी संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना जो डकैती करने में चुराई गई है

413

चुराई हुई संपत्ति का अभ्यासतः व्यापार करना

414

चुराई हुई संपत्ति छिपाने में सहायता करना

417

छल के लिए दंड

धारा

अपराध का वर्णन

418

इस ज्ञान के साथ छल करना कि उस व्यक्ति को सदोष हानि हो सकती है जिसका हित संरक्षित रखने के लिए अपराधी आबद्ध है

419

प्रतिरूपण द्वारा छल के लिए दंड

420

छल करना और संपत्ति परिदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करना

421

लेनदारों में वितरण निवारित करने के लिए संपत्ति का बेईमानी से या कपटपूर्वक अपसारण या छिपाना

422

ऋण को लेनदारों के लिए उपलब्ध होने से बेईमानी से या कपटपूर्वक निवारित करना

423

अंतरण के ऐसे विलेख का, जिसमें प्रतिफल के संबंध में मिथ्या कथन अंतर्विष्ट है, बेईमानी से या कपटपूर्वक निष्पादन

424

संपत्ति का बेईमानी से या कपटपूर्वक अपसारण या छिपाया जाना

467

मूल्यवान प्रतिभूति, बिल इत्यादि, की कूटरचना

471

कूटरचित दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख का असली के रूप में उपयोग में लाना

472 और 473

कूटरचना करने के आशय से कूटकृत मुद्रा, आदि का बनाना या कब्जे में रखना

475 और 476

अभिलक्षणा या चिह्न की कूटकृति बनाना

481

मिथ्या संपत्ति-चिह्न को उपयोग में लाना

482

मिथ्या संपत्ति-चिह्न का उपयोग करने के लिए दंड

483

अन्य व्यक्ति द्वारा उपयोग में लाए गए संपत्ति-चिह्न का कूटकरण

484

लोक सेवक द्वारा उपयोग में लाए गए चिह्न का कूटकरण

485

संपत्ति-चिह्न के कूटकरण के लिए कोई उपकरण बनाना या उस पर कब्जा

486

कूटकृत संपत्ति-चिह्न से चिह्नित माल का विक्रय

487

किसी ऐसे पात्र के ऊपर मिथ्या चिह्न बनाना जिसमें माल रखा है   

488

किसी ऐसे मिथ्या चिह्न को उपयोग में लाने के लिए दंड

489

करेंसी नोटों या बैंक नोटों का कृटकरण

489

कूटरचित या कूटकृत करेंसी नोटों या बैंक नोटों को असली के रूप में उपयोग में लाना

पैरा 2

स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 के अधीन अपराध

(1985 का 61)

धारा

अपराध का वर्णन

15

पोस्त तृण के संबंध में उल्लंघन

16

कोका के पौधे और कोका की पत्तियों के संबंध में उल्लंघन

17

निर्मित्त अफीम के संबंध में उल्लंघन

18

अफीम पोस्त और अफीम के संबंध में उल्लंघन

19

खेतिहर द्वारा अफीम का गबन

धारा

अपराध का वर्णन

20

कैनेबिस के पौधे और कैनेबिस के संबंध में उल्लंघन

21

विनिर्मित ओषधियों और निर्मितियों के संबंध में उल्लंघन

22

मनःप्रभावी पदार्थों के संबंध में उल्लंघन

23

स्वापक ओषधियों और मनःप्रभावी पदार्थों का अवैध रूप से भारत में आयात, भारत से निर्यात या यानांतरण

24

स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 की धारा 12 के उल्लंघन में स्वापक ओषधियों और मनःप्रभावी पदार्थों में बाह्य व्यवहार

25

स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 की धारा 9 के अधीन किए गए आदेशों का उल्लंघन

27

अवैध व्यापार का वित्तपोषण और अपराधियों को संश्रय देना

29

दुष्प्रेरण और आपराधिक षड्यंत्र

पैरा 3

विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 के अधीन अपराध

(1908 का 6)

धारा

अपराध का वर्णन

3

जीवन और संपत्ति को जोखिम में डालने वाला विस्फोट कारित करना               

4

विस्फोट कारित करने का प्रयत्न करना या जीवन या संपत्ति को जोखिम में डालने के आशय से विस्फोटक बनाना या रखना

5

संदिग्ध परिस्थितियों में विस्फोटक पदार्थ बनाना या अपने पास रखना

पैरा 4

विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 के अधीन अपराध

(1967 का 37)

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 3 के साथ पठित धारा 10

किसी विधिविरुद्ध संगम, आदि का सदस्य होने के लिए शास्ति

धारा 3 के साथ पठित धारा 11

विधिविरुद्ध संगम, आदि की निधियों से बरतने के लिए शास्ति।

धारा 3 के साथ पठित धारा 13

विधिविरुद्ध क्रियाकलाप के लिए दंड

धारा 15 के साथ पठित धारा 16

आतंकवादी कार्य के लिए दंड

16

रेडियोधर्मी पदार्थों, न्यूक्लीयर युक्तियों, आदि की मांग करने के लिए दंड

17

आतंकवादी कार्य के लिए निधियां जुटाने के लिए दंड

18

षड्यंत्र आदि के लिए दंड  

18

आतंकवादी शिविर आयोजित करने के लिए दंड

18

आतंकवादी कार्य के लिए किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की भर्ती करने के लिए दंड

धारा

अपराध का वर्णन

19

संश्रय देने, आदि के लिए दंड

20

आतंकवादी गैंग या संगठन का सदस्य होने के लिए दंड

21

आतंकवाद के आगमों को धारित करने के लिए दंड

38

किसी आतंकवादी संगठन की सदस्यता से संबंधित अपराध

39

किसी आतंकवादी संगठन को दिए गए समर्थन से संबंधित अपराध

40

किसी आतंकवादी संगठन के लिए निधि जुटाने का अपराध

पैरा 5

आयुध अधिनियम, 1959 के अधीन अपराध

(1959 का 54)

धारा

अपराध का वर्णन

25

आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 5 के उल्लंघन में, किन्हीं आयुधों या गोलाबारुद का विनिर्माण, विक्रय, अंतरण, संपरिवर्तन, मरम्मत, परख या परिसिद्धि करना, या उसे विक्रय या अंतरण के लिए अभिदर्शित या प्रस्थापित करना या विक्रय, अंतरण, संपरिवर्तन, मरम्मत, परख या परिसिद्धि के लिए अपने कब्जे में रखना  

आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 7 के उल्लंघन में, किन्हीं प्रतिषिद्ध आयुधों या प्रतिषिद्ध गोलाबारुद को अर्जित करना, अपने कब्जे में रखना या लेकर चलना

विक्षुब्ध क्षेत्रों में अधिसूचित आयुधों के कब्जे के बारे में प्रतिषेध आदि के संबंध में आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 24 का उल्लंघन

विक्षुब्ध क्षेत्रों में के सार्वजनिक स्थानों में या उनमें से होकर अधिसूचित आयुध लेकर चलने के बारे में प्रतिषेध के संबंध में आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 24 का उल्लंघन

धारा 25 में विनिर्दिष्ट अन्य अपराध

26

आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 3, 4, 10 या 12 के किन्हीं उपबंधों के उल्लंघन में कोई कार्य ऐसी रीति में करना, जो उक्त अधिनियम की धारा 26 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट है

आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 5, 6, 7 या 11 के किन्हीं उपबंधों के उल्ंलघन में कोई कार्य ऐसी रीति में करना, जो उक्त अधिनियम की धारा 26 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट है

धारा 26 में विनिर्दिष्ट अन्य अपराध

27

आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 5 के उल्लंघन में आयुधों या गोलाबारुद का उपयोग या धारा 7 के उल्लंघन में किन्हीं आयुधों या गोलाबारुद का उपयोग

28

कतिपय दशाओं में अग्न्यायुध या नकली अग्न्यायुध का उपयोग और कब्जा

29

जानते हुए अनुज्ञप्ति रहित व्यक्ति से आयुध आदि क्रय करना या आयुध आदि ऐसे व्यक्ति को परिदत्त करना, जो उन्हें कब्जे में रखने का हकदार हो

30

अनुज्ञप्ति की किसी शर्त या आयुध अधिनियम, 1959 के किन्हीं उपबंधों या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम का उल्लंघन

पैरा 6

वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अधीन अपराध

(1972 का 53)

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 9 के साथ पठित धारा 51

वन्य प्राणियों का आखेट करना

धारा 17 के साथ पठित धारा 51

विनिर्दिष्ट पादपों के तोड़ने, उखाड़ने आदि के प्रतिषेध से संबंधित धारा 17 के उपबंधों का उल्लंघन

धारा 39 के साथ पठित धारा 51

वन्यप्राणियों, आदि के सरकार की संपत्ति होने से संबंधित धारा 39 के उपबंधों का उल्लंघन

धारा 44 के साथ पठित धारा 51

अनुज्ञप्ति के बिना ट्राफी और प्राणि-वस्तुओं में व्यवहार के प्रतिषेध से संबंधित धारा 44 के उपबंधों का उल्लंघन

धारा 48 के साथ पठित धारा 51

अनुज्ञप्तिधारी द्वारा प्राणी आदि के क्रय से संबंधित धारा 48 के उपबंधों का उल्लंघन

धारा 49 के साथ पठित धारा 51

अनुसूचित प्राणियों से व्युत्पन्न ट्राफियों, प्राणि-वस्तुओं, आदि में व्यौहार के प्रतिषेध से संबंधित धारा 49 के उपबंधों का उल्लंघन

पैरा 7

अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के अधीन अपराध

(1956 का 104)

धारा

अपराध का वर्णन 

5

व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए उपाप्त करना, उत्प्रेरित करना या ले जाना

6

किसी व्यक्ति को ऐसे परिसर में निरुद्ध करना जहां वेश्यावृत्ति की जाती है

8

वेश्यावृत्ति के प्रयोजनों के लिए विलुब्ध करना या याचना करना

9

अभिरक्षा में के व्यक्ति को विलुब्ध करना

पैरा 8

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन अपराध

(1988 का 49)

धारा

अपराध का वर्णन

7

लोक सेवक द्वारा पदीय कार्य के लिए वैध पारिश्रमिक से भिन्न परितोषण लिया जाना

8

लोक सेवक पर भ्रष्ट या अवैध साधनों द्वारा असर डालने के लिए परितोषण का लेना

9

लोक सेवक पर वैयक्तिक असर डालने के लिए परितोषण का लेना

10

लोक सेवक द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 8 या धारा 9 में परिभाषित अपराधों का दुष्प्रेरण

13

लोक सेवक द्वारा आपराधिक अवचार

पैरा 9

विस्फोटक अधिनियम, 1884 के अधीन अपराध

(1884 का 4)

धारा

अपराध का वर्णन

9

कतिपय अपराधों के लिए दंड

9

कंपनियों द्वारा अपराध

पैरा 10

पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 के अधीन अपराध

(1972 का 52)

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 3 के साथ पठित धारा 25

पुरावशेषों और बहुमूल्य कलाकृतियों के निर्यात-व्यापार का उल्लंघन               

28

कंपनियों द्वारा अपराध

पैरा 11

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के अधीन अपराध

(1992 का 15)

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 24 के साथ पठित धारा 12

छलसाधनयुक्त और प्रवंचक युक्तियों, अंतरंगी व्यापार और प्रतिभूतियों के सारवान् अर्जन का प्रतिषेध या नियंत्रण

24

प्रतिभूतियों का अर्जन या नियंत्रण

पैरा 12

सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 के अधीन अपराध

(1962 का 52)

धारा

अपराध का वर्णन

135

शुल्क या प्रतिषेधों का अपवंचन

पैरा 13

बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976 के अधीन अपराध

(1976 का 19)

धारा

अपराध का वर्णन

16

बंधित श्रम के प्रवर्तन के लिए दंड

18

बंधित श्रम पद्धति के अधीन बंधित श्रम कराने के लिए दंड

धारा

अपराध का वर्णन

20

दुष्प्रेरण का एक अपराध होना

पैरा 14

बालक श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986

(1986 का 61)

धारा

अपराध का वर्णन

14

किसी बालक को धारा 3 के उपबंधों के उल्लंघन में काम करने के लिए नियोजित करने के लिए दंड

पैरा 15

मानव अंग प्रतिरोपण अधिनियम, 1994 के अधीन अपराध

(1994 का 42)

धारा

अपराध का वर्णन

18

प्राधिकार के बिना मानव अंग के निकाले जाने के लिए दंड

19

मानव अंगों में वाणिज्यिक व्यवहार के लिए दंड

20

इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के उल्लंघन के लिए दंड

पैरा 16

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 के अधीन अपराध

(2000 का 56)

धारा

अपराध का वर्णन

23

किशोर या बालक के प्रति क्रूरता के लिए दंड

24

भीख मांगने के लिए किशोर या बालक का नियोजन

25

किशोर या बालक को मादक लिकर या स्वापक ओषधि या मनःप्रभावी पदार्थ देने के लिए शास्ति

26

किशोर या बालक कर्मचारी का शोषण

पैरा 17

उत्प्रवास अधिनियम, 1983 के अधीन अपराध

(1983 का 31)

धारा

अपराध का वर्णन

24

अपराध और शास्तियां

पैरा 18

पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अधीन अपराध

(1967 का 15)

धारा

अपराध का वर्णन

12

अपराध और शास्तियां

पैरा 19

विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 के अधीन अपराध

(1946 का 31)

धारा

अपराध का वर्णन

14

अधिनियम आदि के उपबंधों के उल्लंघन के लिए शास्ति

14

कूटरचित पासपोर्ट का प्रयोग करने पर दंड

14

दुष्प्रेरण के लिए शास्ति

पैरा 20

प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, 1957 के अधीन अपराध

(1957 का 14)

धारा

अपराध का वर्णन

63

प्रतिलिप्यधिकार या इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त अन्य अधिकारों के अतिलंघन का अपराध

63

द्वितीय और पश्चात्वर्ती दोषसिद्धियों के संबंध में वर्धित शास्ति

63

कम्प्यूटर प्रोग्राम की अतिलंघनकारी प्रति का जानबूझकर उपयोग

68

धारा 52 के उल्लंघन के लिए शास्ति

पैरा 21

व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 के अधीन अपराध

(1999 का 47)

धारा

अपराध का वर्णन

103

मिथ्या व्यापार चिह्न, पण्य विवरण, आदि लगाने के लिए शास्ति

104

ऐसे माल का विक्रय या ऐसी सेवाएं प्रदान करने के लिए शास्ति जिस पर मिथ्या व्यापार चिह्न या मिथ्या पण्य विवरण लगाया गया है

105

दूसरी या पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि के लिए वर्धित शास्ति

107

किसी व्यापार चिह्न का रजिस्ट्रीकृत रूप में मिथ्या रूप से व्यपदेशन करने के लिए शास्ति

120

भारत के बाहर किए गए कार्यों के लिए भारत में दुष्प्रेरण का दंड

पैरा 22

सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अधीन अपराध

(2000 का 21)

धारा

अपराध का वर्णन

72

गोपनीयता और एकांतता भंग के लिए शास्ति

75

अधिनियम का भारत से बाहर किए गए अपराधों और उल्लंघनों को लागू होना

पैरा 23

जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अधीन अपराध

(2003 का 18)

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 6 के साथ पठित धारा 55

धारा 6, आदि के उल्लंघन के लिए शास्ति

पैरा 24

पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 के अधीन अपराध

(2001 का 53)

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 68 के साथ पठित धारा 70

मिथ्या अभिधान, आदि के उपयोजन के लिए शास्ति

धारा 68 के साथ पठित धारा 71

ऐसी किस्मों के विक्रय के लिए शास्ति जिन पर मिथ्या अभिधान का उपयोजन किया गया हो

धारा 68 के साथ पठित धारा 72

किसी किस्म को रजिस्ट्रीकृत रूप में, मिथ्या रूप से व्यपदिष्ट करने के लिए शास्ति

धारा 68 के साथ पठित धारा 73

पश्चात्वर्ती अपराध के लिए शास्ति

पैरा 25

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अधीन अपराध

(1986 का 29)

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 7 के साथ पठित धारा 15

विहित मानकों से अधिक में पर्यावरण प्रदूषकों के निस्सारण, आदि के लिए शास्ति

धारा 8 के साथ पठित धारा 15

प्रक्रिया संबंधी रक्षोपायों का पालन किए बिना परिसंकटमय पदार्थों को हथालने के लिए शास्ति

पैरा 26

जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अधीन अपराध

(1974 का 6)

धारा

अपराध का वर्णन

41(2)

सरिता या कुंए के प्रदूषण के लिए शास्ति

43

धारा 24 के उपबंधों के उल्लंघन के लिए शास्ति

पैरा 27

वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अधीन अपराध

(1981 का 14)

धारा

अपराध का वर्णन

37

औद्योगिक संयंत्र के प्रचालन संबंधी उपबंधों का अनुपालन करने में असफलता

पैरा 28

सामुद्रिक नौपरिवहन और महाद्वीपीय मग्नतट भूमि पर स्थिर प्लेटफार्मों की सुरक्षा के विरुद्ध विधिविरुद्ध कार्यों का दमन अधिनियम, 2002 के अधीन अपराध

(2002 का 69)

धारा

अपराध का वर्णन

3

(i) पोत, स्थिर प्लेटफार्म, पोत के स्थौरा, नौपरिवहन सुविधाओं, आदि के विरुद्ध अपराध;

 

(ii) भाग में, पैरा 1 से 25 का लोप किया जाएगा;

 

(iii) भाग में, क्रम संख्यांक (2) और उससे संबंधित प्रविष्टियों का लोप किया जाएगा ]

[पैरा 1

भारतीय दंड संहिता के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

120

आपराधिक षडयंत्र

255

सरकारी स्टाम्प का कूटकरण

257

सरकारी स्टाम्प के कूटकरण के लिए उपकरण बनाना या बेचना

258

कूटकृत सरकारी स्टाम्प का विक्रय  

259

सरकारी कूटकृत स्टाम्प को कब्जे में रखना

260

किसी सरकारी स्टाम्प को, कूटकृत जानते हुए उसे असली स्टाम्प के रूप में उपयोग में लाना

302

हत्या

304

हत्या की को] ि में आने वाले आपराधिक मानव वध के लिए दंड

धारा

अपराध का वर्णन

307

हत्या करने का प्रयत्न

308

आपराधिक मानव वध करने का प्रयत्न

327

संपत्ति उद्दापित करने के लिए या अवैध कार्य कराने को मजबूर करने के लिए स्वेच्छया उपहति कारित    करना

329

संपत्ति उद्दापित करने के लिए या अवैध कार्य कराने को मजबूर करने के लिए स्वेच्छया घोर उपहति कारित करना

364

फिरौती आदि के लिए व्यपहरण

384 से 389

उद्दापन्न से संबंधित अपराध

392 से 402

लूट और डकैती से संबंधित अपराध

411

चुराई हुई संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना

412

ऐसी संपत्ति को बेईमानी से प्राप्त करना जो डकैती करने में चुराई गई है

413

चुराई हुई संपत्ति का अभ्यासतः व्यापार करना

414

चुराई हुई संपत्ति छिपाने में सहायता करना

417

छल के लिए दंड

418

इस ज्ञान के साथ छल करना कि उस व्यक्ति को सदोष हानि हो सकती है जिसका हित संरक्षित रखने के लिए अपराधी आबद्ध है

419

प्रतिरूपण द्वारा छल के लिए दंड

420

छल करना और संपत्ति परिदत्त करने के लिए बेईमानी से उत्प्रेरित करना

421

लेनदारों में वितरण निवारित करने के लिए संपत्ति का बेईमानी से या कपटपूर्वक अपसारण या छिपाना

422

ऋण को लेनदारों के लिए उपलब्ध होने से बेईमानी से या कपटपूर्वक निवारित करना

423

अंतरण के ऐसे विलेख का, जिसमें प्रतिफल के संबंध में मिथ्या कथन अंतर्विष्ट है, बेईमानी से या कपटपूर्वक निष्पादन

424

संपत्ति का बेईमानी से या कपटपूर्वक अपसारण या छिपाया जाना

467

मूल्यावान प्रतिभूति, विल इत्यादि, की कूटरचना

471

कूटरचित दस्तावेज या इलैक्ट्रानिक अभिलेख का असली के रूप में उपयोग में लाना

472 और 473

कूटरचना करने के आशय से कूटकृत मुद्रा, आदि का बनाना या कब्जे में रखना

475 और 476

अभिलक्षणा या चिह्न की कूटकृति बनाना

481

मिथ्या संपत्ति-चिह्न को उपयोग में लाना

482

मिथ्या संपत्ति-चिह्न का उपयोग करने के लिए दंड

483

अन्य व्यक्ति द्वारा उपयोग में लाए गए संपत्ति-चिह्न का कूटकरण

484

लोक सेवक द्वारा उपयोग में लाए गए चिह्न का कूटकरण

485

संपत्ति-चिह्न के कूटकरण के लिए कोई उपकरण बनाना या उस पर कब्जा

486

कूटकृत संपत्ति-चिह्न से चिह्नित माल का विक्रय

धारा

अपराध का वर्णन

487

किसी ऐसे पात्र के ऊपर मिथ्या चिह्न बनाना जिसमें माल रखा है   

488

किसी ऐसे मिथ्या चिह्न को उपयोग में लाने के लिए दंड ]

पैरा 2

आयुध अधिनियम, 1959 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

25

आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 5 के उल्लंघन में किन्हीं आयुधों या गोलाबारूद का विनिर्माण, विक्रय, अंतरण, संपरिवर्तन, मरम्मत, परख या परिषिद्ध करना या उसे विक्रय या अंतरण के लिए अभिदर्शित या प्रस्थापित करना या विक्रय, अंतरण, संपरिवर्तन, मरम्मत, परख या परिषिद्ध करने के लिए अपने कब्जे में रखना

आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 7 के उल्लंघन में किसी प्रतिषिद्ध आयुध या प्रतिषिद्ध गोलाबारुद को अर्जित करना, अपने कब्जे में रखना या ले जाना

विक्षुब्ध क्षेत्रों में अधिसूचित आयुधों के कब्जे के बारे में प्रतिषेध आदि के संबंध में आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 24 का उल्लंघन

विक्षुब्ध क्षेत्रों में के सार्वजानिक स्थानों में या उनमें से होकर अधिसूचित आयुध लेकर चलने के बारे में प्रतिषेध आदि के संबंध में आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 24 का उल्लंघन

धारा 25 में विनिर्दिष्ट अन्य अपराध

26

आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 3, 4, 10 या 12 के उपबंधों में से किसी उपबंध के उल्लंघन में कोई कार्य ऐसी रीति से करना जो उक्त अधिनियम की धारा 26 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट है

आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 5, 6, 7 या 11 के उपबंधों में से किसी उपबंध के उल्लंघन में कोई कार्य ऐसी रीति से करना जो उक्त अधिनियम की धारा 26 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट है

धारा 26 में विनिर्दिष्ट अन्य अपराध

27

आयुध अधिनियम, 1959 की धारा 5 के उल्लंघन में आयुधों या गोलाबारूद का उपयोग या धारा 7 के उल्लंघन में किसी आयुध या गोलाबारूद का उपयोग        

28

कतिपय दशाओं में अग्न्यायुध या नकली अग्न्यायुध का उपयोग और कब्जा

29

जानते हुए अनुज्ञप्ति रहित व्यक्ति से आयुध आदि क्रय करना या आयुध आदि ऐसे व्यक्ति को परिदत्त करना जो उन्हें कब्जे में रखने का हकदार हो

30

अनुज्ञप्ति की शर्त या आयुध अधिनियम, 1959 या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम के किन्हीं उपबंधों का उल्लंघन

पैरा 3

वन्य जीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

[धारा 9 के साथ पठित धारा 51

वन्य प्राणियों का आखेट करना ]

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 17 के साथ पठित धारा 51

विनिर्दिष्ट पादपों के तोड़ने, उखाड़ने आदि के प्रतिषेध से संबंधित धारा 17 के उपबंधों का उल्लंघन

धारा 39 के साथ पठित धारा 51

वन्यप्राणियों, आदि के सरकार की संपत्ति होने से संबंधित धारा 39 के उपबंधों का उल्लंघन

धारा 44 के साथ पठित धारा 51

अनुज्ञप्ति के बिना ट्राफी और प्राणि वस्तुओं में व्यवहार के प्रतिषेध से संबंधित धारा 44 के उपबंधों का उल्लंघन

धारा 48 के साथ पठित धारा 51

अनुज्ञप्तिधारी द्वारा प्राणी आदि के क्रय से संबंधित धारा 48 के उपबंधों का उल्लंघन

धारा 49 के साथ पठित धारा 51

अनुसूचित प्राणियों से व्युत्पन्न ट्राफियों, प्राणि वस्तुओं, आदि में व्यवहार के प्रतिषेध से संबंधित धारा 49 के उपबंधों का उल्लंघन

पैरा 4

अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन 

5

व्यक्ति को वेश्यावृत्ति के लिए उपाप्त करना, उत्प्रेरित करना या ले जाना

6

किसी व्यक्ति को ऐसे परिसर में निरुद्ध करना जहां वेश्यावृत्ति की जाती है

8

वेश्यावृत्ति के प्रयोजनों के लिए विलुब्ध करना या याचना करना

9

अभिरक्षा में व्यक्ति को विलुब्ध करना

पैरा 5

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

7

लोक सेवक द्वारा पदीय कार्य के लिए वैध पारिश्रमिक से भिन्न परितोषण लिया जाना

8

लोक सेवक पर भ्रष्ट या अवैध साधनों द्वारा असर डालने के लिए परितोषण का लेना

9

लोक सेवक पर वैयक्तिक असर डालने के लिए परितोषण का लेना

10

लोक सेवक द्वारा भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 8 या धारा 9 में परिभाषित अपराधों का दुष्प्रेरण

[13

लोक सेवक द्वारा आपराधिक अवचार ]

पैरा 6

विस्फोटक अधिनियम, 1884 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

9

कतिपय अपराधों के लिए दंड

9

कंपनियों द्वारा अपराध

पैरा 7

पुरावशेष तथा बहुमूल्य कलाकृति अधिनियम, 1972 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 3 के साथ पठित धारा 25

पुरावशेषों और बहुमूल्य कलाकृतियों के निर्यात-व्यापार का उल्लंघन

28

कंपनियों द्वारा अपराध

पैरा 8

भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 24 के साथ पठित धारा 12

छलसाधनयुक्त और प्रवंचक युक्तियों, अंतरंगी व्यापार और प्रतिभूतियों के सारवान् अर्जन का प्रतिषेध या नियंत्रण

पैरा 9

सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

135

शुल्क या प्रतिषेधों का अपवंचन

पैरा 10

बंधित श्रम पद्धति (उत्सादन) अधिनियम, 1976 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

16

बंधित श्रम के प्रवर्तन के लिए दंड

18

बंधित श्रम पद्धति के अधीन बंधित श्रम कराने के लिए दंड

20

दुष्प्रेरण का एक अपराध होना

पैरा 11

बालक श्रम (प्रतिषेध और विनियमन) अधिनियम, 1986

धारा

अपराध का वर्णन

14

धारा 3 के उपबंधों के उल्लंघन में काम करने के लिए किसी बालक का नियोजन करने के लिए दंड

पैरा 12

मानव अंग प्रतिरोपण अधिनियम, 1994 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

18

प्राधिकार के बिना मानव अंग के निकाले जाने के लिए दंड

19

मानव अंगों में वाणिज्यिक व्यवहार के लिए दंड

20

इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के उल्लंघन के लिए दंड

पैरा 13

किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2000 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

23

किशोर या बालक के प्रति क्रूरता के लिए दंड

24

भीख मांगने के लिए किशोर या बालक का नियोजन

25

किशोर या बालक को मादक लिकर या स्वापक ओषधि या मनःप्रभावी पदार्थ देने के लिए शास्ति

26

किशोर या बालक कर्मचारी का शोषण

पैरा 14

उत्प्रवास अधिनियम, 1983 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

24

अपराध और शास्तियां

पैरा 15

पासपोर्ट अधिनियम, 1967 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

12

अपराध और शास्तियां

पैरा 16

विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

14

अधिनियम आदि के उपबंधों के उल्लंघन के लिए शास्ति

14

कूटरचित पासपोर्ट का प्रयोग करने पर दंड

धारा

अपराध का वर्णन

14

दुष्प्रेरण के लिए शास्ति

पैरा 17

प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम, 1957 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

63

प्रतिलिप्यधिकार या इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त अन्य अधिकारों के अतिलंघन का अपराध

63

द्वितीय और पश्चात्वर्ती दोषसिद्धियों के संबंध में वर्धित शास्ति

63

कम्प्यूटर प्रोग्राम की अतिलंघनकारी प्रति का जानबूझकर किया गया उपयोग

68

धारा 52 के उल्लंघन के लिए शास्ति

पैरा 18

व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

103

मिथ्या व्यापार चिह्न, पण्य विवरण, आदि लगाने के लिए शास्ति

104

ऐसे माल का विक्रय या ऐसी सेवाएं प्रदान करने के लिए शास्ति जिस पर मिथ्या व्यापार चिह्न या मिथ्या पण्य विवरण लगाया गया है

105

दूसरी या पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि के लिए वर्धित शास्ति

107

किसी व्यापार चिह्न का रजिस्ट्रीकृत रूप में मिथ्या रूप से व्यपदेशन करने के लिए शास्ति

120

भारत के बाहर किए गए कार्यों के लिए भारत में दुष्प्रेरण का दंड

पैरा 19

सूचना प्रैद्योगिकी अधिनियम, 2000 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

72

गोपनीयता और एकांतता भंग के लिए शास्ति

75

अधिनियम का भारत से बाहर किए गए अपराधों और उल्लंघनों को लागू होना

पैरा 20

जैव विविधता अधिनियम, 2002 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 6 के साथ पठित धारा 55

धारा 6, आदि के उल्लंघन के लिए शास्ति

पैरा 21

पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण अधिनियम, 2001 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 68 के साथ पठित धारा 70

मिथ्या अभिधान, आदि के उपयोजन के लिए शास्ति

धारा 68 के साथ पठित धारा 71

ऐसी किस्मों के विक्रय के लिए शास्ति जिन पर मिथ्या अभिधान का उपयोजन किया गया हो

धारा 68 के साथ पठित धारा 72

किसी किस्म को रजिस्ट्रीकृत रूप में, मिथ्या रूप से व्यपदिष्ट करने के लिए शास्ति

धारा 68 के साथ पठित धारा 73

पश्चात्वर्ती अपराध के लिए शास्ति

पैरा 22

पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

धारा 7 के साथ पठित धारा 15

पर्यावरण प्रदूषकों के निस्सारण के लिए शास्ति

धारा 8 के साथ पठित धारा 15

परिसंकटमय पदार्थों को हथालने के लिए शास्ति

पैरा 23

जल (प्रदूषण निवारण तथा नियंत्रण) अधिनियम, 1974 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

41(2)

सरिता या कुंए के प्रदूषण के लिए शास्ति

43

धारा 24 के उपबंधों के उल्लंघन के लिए शास्ति

पैरा 24

वायु (प्रदूषण निवारण और नियंत्रण) अधिनियम, 1981 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

37

औद्योगिक संयंत्र के प्रचालन संबंधी उपबंधों का अनुपालन करने में असफलता

पैरा 25

सामुद्रिक नौपरिवहन और महाद्वीपीय मग्नतट भूमि पर स्थिर प्लेटफार्मों की सुरक्षा के विरुद्ध विधिविरुद्ध कार्यों का दमन अधिनियम, 2002 के अधीन अपराध

धारा

अपराध का वर्णन

3

पोत, स्थिर प्लेटफार्म, पोत के स्थौरा, नौपरिवहन सुविधाओं, आदि के विरुद्ध अपराध "]

[भाग

कोई ऐसा अपराध जो सीमा के आर-पार विवक्षा वाला अपराध है और जो निम्नलिखित में विनिर्दिष्ट है, -

                                (1) भाग क; या

                                (2) भाग ख, बिना किसी धनीय प्रभाव के; या

                                (3) भारतीय दण्ड संहिता के अध्याय 17 के अधीन संपत्ति के विरुद्ध अपराध ।]

 

--------------

Download the LatestLaws.com Mobile App
 
 
Latestlaws Newsletter
 

Publish Your Article

 

Campus Ambassador

 

Media Partner

 

Campus Buzz

 

LatestLaws Guest Court Correspondent

LatestLaws Guest Court Correspondent Apply Now!
 

LatestLaws.com presents: Lexidem Offline Internship Program, 2026

 

LatestLaws.com presents 'Lexidem Online Internship, 2026', Apply Now!

 
 
 

LatestLaws Partner Event : Smt. Nirmala Devi Bam Memorial International Moot Court Competition

 
 
Latestlaws Newsletter