-+भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934
(1934 का अधिनियम संख्यांक 2)
[6 मार्च, 1934]
भारतीय रिजर्व बैंक गठित
करने के लिए
अधिनियम
बैंक-नोटों का निर्गमन करने और [भारत] में मुद्रा-स्थिति की सुदृढ़ता बनाए रखने की दृष्टि से आरक्षित राशियों का रखा जाना नियंत्रित करने के लिए तथा समष्टिगत रूप से देश की करेंसी और प्रत्यय व्यवस्था को देश के लाभार्थ चलाने के लिए भारत के लिए एक रिजर्व बैंक का गठित करना समीचीन है ;
[और अधिकाधिक जटिल अर्थव्यवस्था की चुनैती का सामना करने के लिए आधुनिक मुद्रा नीति सम्बन्धी रूपरेखा का होना आवश्यक है;
और मुद्रा नीति का प्राथमिक उद्देश्य, विकास के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए मूल्य स्थिरता बनाए रखना है;
और भारत में मुद्रा नीति सम्बन्धी रूपरेखा भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा प्रवर्तित की जाएगी;]
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 है ।
[(2) इसका विस्तार *** सम्पूर्ण भारत पर है ।]
(3) यह धारा तुरंत प्रवृत्त होगी और इस अधिनियम के शेष उपबंध ऐसी तारीख या तारीखों को प्रवृत्त होंगे, जो [केन्द्रीय सरकार] भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो,-
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[(कii)] "रिजर्व बैंक" से इस अधिनियम द्वारा गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है;
[(कiii) "अंतरराष्ट्रीय समाशोधन बैंक" से हेग में हस्ताक्षरित 20 जनवरी, 1930 के करार के अनुसरण में, स्विटजरलैंड की विधि के अधीन उक्त नाम से स्थापित निगमित निकाय अभिप्रेत है;]
(ख) "केंद्रीय बोर्ड" से रिजर्व बैंक के निदेशकों का केंद्रीय बोर्ड अभिप्रेत है;
[(खvक) "उपभोक्ता मूल्य सूचकांक" से भारत सरकार द्वारा समय-समय पर प्रकाशित उपभोक्ता मूल्य सूचकांक समुच्चय अभिप्रेत है;]
[ [(खvi)] “निक्षेप बीमा निगम" से निक्षेप बीमा निगम अधिनियम, 1961 (1961 का 47) की धारा 3 के अधीन स्थापित निक्षेप बीमा निगम अभिप्रेत है;]
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[(खviiiक) “निआ बैंक" के भारतीय निर्यात-आयात बैंक अधिनियम, 1981 (1981 का 28) के अधीन स्थापित भारतीय निर्यात-आयात बैंक अभिप्रेत है;]
[(खix) “विदेशी करेंसी" और विदेशी मुद्रा" के वही अर्थ हैं जो विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) में है;
(ग) “औद्योगिक वित्त निगम" से औद्योगिक वित्त निगम अधिनियम, 1948 (1948 का 15) के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक वित्त निगम अभिप्रेत है;]
[(गi) “मुद्रा स्फीति" से मासिक उपभोक्ता मूल्य सूचकांक की प्रतिशतता के रूप में अभिव्यक्त वर्षवार परिवर्तन अभिप्रेत है;
(गii) “मुद्रा स्फीति लक्ष्य" से धारा 45यक की उपधारा (1) के अनुसार अवधारित मुद्रा स्फीति लक्ष्य अभिप्रेत है;]
[(गक) “अन्तरराष्ट्रीय विकास संगम" से अन्तरराष्ट्रीय विकास संगम (प्रास्थिति, उन्मुक्ति और विशेषाधिकार) अधिनियम, 1960 (1960 का 32) में निर्दिष्ट “संगम" अभिप्रेत है;
(गख) “अन्तरराष्ट्रीय वित्त निगम" से अन्तरराष्ट्रीय वित्त निगम (प्रास्थिति, उन्मुक्ति और विशेषाधिकार) अधिनियम, 1958 (1958 का 42) में निर्दिष्ट “निगम" अभिप्रेत है;
(गग) “अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा निधि" और “अन्तरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक" से अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा निधि और बैंक अधिनियम, 1945 में निर्दिष्ट क्रमशः “अन्तरराष्ट्रीय निधि" और “अन्तरराष्ट्रीय बैंक" अभिप्रेत है;]
[(गगi) “मुद्रा नीति समिति" से धारा 45यख की उपधारा (1) के अधीन गठित समिति अभिप्रेत है;]
[(गगग) “राष्ट्रीय बैंक" से राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 (1981 का 61) की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अभिप्रेत है;]
[(गगगग) “राष्ट्रीय आवास बैंक" से राष्ट्रीय आवास बैंक अधिनियम, 1987 (1987 का 53) की धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय आवास बैंक अभिप्रेत है;]
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[(गगगगi) “नीति दर" से धारा 17 की उपधारा (12कख) के अधीन रेपो-संव्यवहारों के लिए दर अभिप्रेत है;]
[(गv) “पुनर्निर्माण बैंक" से भारतीय औद्योगिक पुनर्निर्माण बैंक अधिनियम, 1984 (1984 का 62) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक पुनर्निर्माण बैंक अभिप्रेत है;]
(घ) “रुपए का सिक्का" से ऐसे *** रुपए अभिप्रेत हैं जो [सिक्का निर्माण अधिनियम, 2011 (2011 का 11)] के उपबन्धों के अधीन [ [भारत] में] वैध निविदा है; ***
(ङ) “अनुसूचित बैंक" से ऐसा बैंक अभिप्रेत है जो द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित है;
[(ङठ) “लघु उद्योग बैंक" से भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अधिनियम, 1989 (1989 का 39) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय लघु उद्योग विकास बैंक अभिप्रेत है;]
[(ङक) “प्रायोजक बैंक" से प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (1976 का 21) में यथापरिभाषित प्रायोजक बैंक अभिप्रेत है;
[ [(ङख)] “स्टेट बैंक" से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) के अधीन गठित स्टेट बैंक अभिप्रेत है]
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[(चi) “राज्य वित्तीय निगम" से राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 63) के अधीन स्थापित कोई राज्य वित्तीय निगम अभिप्रेत है;]
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[(छ) “यूनिट ट्रस्ट" से भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट अभिप्रेत है;]
[(ज) “कृषि संक्रिया", “केन्द्रीय सहकारी बैंक", “सहकारी सोसाइटी", “फसलें", “फसलों का विपणन", “मत्स्य-पालन", “प्रादेशिक ग्रामीण बैंक" और “राज्य सहकारी बैंक" के वही अर्थ होंगे जो उनके राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, (1981 का 61) में हैं;
(झ) “सहकारी बैंक", सहकारी प्रत्यय सोसाइटी", निदेशक", प्राथमिक कृषिक प्रत्यय सोसाइटी", प्राथमिक सहकारी बैंक" और प्राथमिक प्रत्यय सोसाइटी" के वही अर्थ होंगे जो उनके बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के भाग 5 में हैं ।]
अध्याय 2
निगमन, [पूंजी,] प्रबंध और कारबार
3. रिजर्व बैंक की स्थापना और निगमन-(1) [केन्द्रीय सरकार] से करेन्सी का प्रबन्ध ग्रहण करने तथा बैंककारी का कारबार इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार चलाने के प्रयोजन के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के नाम से एक बैंक गठित किया जाएगा ।
(2) रिजर्व बैंक भारतीय रिजर्व बैंक के नाम से एक निगमित निकाय होगा जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
[4. रिजर्व बैंक की पूंजी-रिजर्व बैंक की पूंजी पांच करोड़ रुपए होगी ।]
5. [शेयर पूंजी का बढ़ाया या घटाया जाना ।]-1948 के अधिनियम सं० 62 की धारा 7 तथा अनुसूची द्वारा (1-1-1949) से निरसित ।
6. कार्यालय, शाखाएं और अभिकरण-रिजर्व बैंक यथाशक्य शीघ्र मुम्बई, कलकत्ता, [दिल्ली और मद्रास] *** में कार्यालय स्थापित करेगा और भारत *** में किसी अन्य स्थान में या 9[केन्द्रीय सरकार] की पूर्व मंजूरी से अन्यत्र शाखाएं या अभिकरण स्थापित कर सकेगा ।
[7. प्रबंध-(1) केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक को समय-समय पर ऐसे आदेश दे सकेगी जो वह बैंक के गवर्नर से परामर्श करने के पश्चात् लोकहित में आवश्यक समझे ।
(2) ऐसे निदेशों के अधीन रहते हुए रिजर्व बैंक के कार्यों और कारबार का साधारण अधीक्षण और निदेशन निदेशकों के केन्द्रीय बोर्ड को सौंपा जाएगा जो ऐसी सब शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा और ऐसे सभी कार्य तथा बातें कर सकेगा जो रिजर्व बैंक द्वारा प्रयोक्तव्य हैं या की जा सकती हैं ।
[(3) केन्द्रीय बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियमों में जैसा उपबन्धित हो उसके सिवाय गवर्नर तथा उसकी अनुपस्थिति में उसके द्वारा इस नाम निमित्त निर्दिष्ट डिप्टी गवर्नर को भी रिजर्व बैंक के कार्यों और कामकाज के साधारण अधीक्षण और निदेशन की शक्तियां होंगी और वह ऐसी सब शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा जो रिजर्व बैंक द्वारा प्रयोक्तव्य हैं या की जा सकती हैं ।]]
8. केन्द्रीय बोर्ड का गठन और निदेशकों की पदावधि- [(1) केन्द्रीय बोर्ड निम्नलिखित निदेशकों से मिलकर बनेगा, अर्थात् :-
(क) एक गवर्नर और [चार से अनधिक] डिप्टी गवर्नर, जो [केन्द्रीय सरकार] द्वारा नियुक्त किए जाएंगे,
(ख) चार निदेशक, जो 4[केन्द्रीय सरकार] द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे और जिनमें धारा 9 के अनुसार गठित चार स्थानीय बोर्डों में से प्रत्येक से एक होगा,
(ग) [दस] निदेशक, जो 4[केन्द्रीय सरकार] द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे, और
(घ) [दो] सरकारी अधिकारी जो [केन्द्रीय सरकार] द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ।]
(2) गवर्नर और डिप्टी गवर्नर अपना सारा समय रिजर्व बैंक के कार्यों में लगाएंगे और ऐसे वेतन और भत्ते प्राप्त करेंगे जो केन्द्रीय बोर्ड द्वारा 4[केन्द्रीय सरकार] के अनुमोदन से अवधारित किए जाएं :
[परन्तु यदि केन्द्रीय बोर्ड की यह राय है कि लोकहित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह गवर्नर या डिप्टी गवर्नर को ऐसा अंशकालिक अवैतनिक काम, चाहे वह इस अधिनियम के प्रयोजनों से संबंधित हो या नहीं, जिससे, यथास्थिति, गवर्नर या डिप्टी गवर्नर के रूप में उसके कर्तव्यों में बाधा पहुंचने की सम्भाव्यता नहीं है, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के अनुरोध पर करने के लिए अनुज्ञा दे सकेगा :]
[परंतु यह और कि केन्द्रीय सरकार बैंक से परामर्श करके किसी उप-गवर्नर को राष्ट्रीय बैंक का अध्यक्ष ऐसे निबंधनों और शर्तों पर नियुक्त कर सकेगी जो वह सरकार विनिर्दिष्ट करे ।]
(3) डिप्टी गवर्नर और उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन नामनिर्दिष्ट निदेशक केन्द्रीय बोर्ड के किसी अधिवेशन में हाजिर हो सकेंगे और उसके विचार-विमर्श में भाग ले सकेंगे; किन्तु मत देने के लिए हकदार नहीं होंगे :
[परंतु जब गवर्नर ऐसे किसी अधिवेशन में किसी कारण से हाजिर होने में असमर्थ हो तो उसके द्वारा लिखित रूप में इस निमित्त प्राधिकृत डिप्टी गवर्नर उस अधिवेशन में उसकी ओर से मत दे सकेगा ।]
(4) गवर्नर और डिप्टी गवर्नर पांच वर्ष से अनधिक ऐसी अवधि के लिए पद धारण करेंगे जो 4[केन्द्रीय सरकार] उन्हें नियुक्त करते समय नियत करे और वे पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र होंगे ।
[(5) उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन निर्दिष्ट निदेशक *** चार वर्ष की कालावधि के लिए [पद धारण करेगा और पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा :
परन्तु ऐसा कोई सदस्य दो अवधियों, अर्थात् निरंतर या आंतरायिक रूप से, आठ वर्ष की अधिकतम अवधि से अधिक के लिए नियुक्त नहीं किया जाएगा ।]
उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन नामनिर्दिष्ट निदेशक 4[केन्द्रीय सरकार] के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।
(5) बोर्ड का कोई कार्य या कार्यवाही बोर्ड में किसी रिक्ति या उसके गठन में किसी त्रुटि के आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी ।
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(7) निवृत्त होने वाला निदेशक पुर्नामनिर्देशन के लिए पात्र होगा ।]
[9. स्थानीय बोर्ड, उनका गठन और उनके कृत्य-(1) प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट चार क्षेत्रों में से प्रत्येक के लिए एक स्थानीय बोर्ड गठित किया जाएगा और यथासम्भव प्रादेशिक या आर्थिक हितों और सहकारी और देशी बैंकों के हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाने वाले पांच सदस्यों से मिलकर बनेगा ।
(2) स्थानीय बोर्ड के सदस्य अपने में से एक व्यक्ति को बोर्ड का सभापति निर्वाचित करेंगे ।
[(3) स्थानीय बोर्ड का प्रत्येक सदस्य चार वर्ष की अवधि के लिए [पद धारण करेगा और पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा :
परन्तु ऐसा कोई सदस्य दो अवधियों, अर्थात् निरंतर या आंतरायिक रूप से, आठ वर्ष की अधिकतम अवधि से अधिक के लिए नियुक्त नहीं किया जाएगा ।]
(4) स्थानीय बोर्ड केन्द्रीय बोर्ड को ऐसे मामलों में सलाह देगा जो उसे साधारणतया या विशिष्टतः निर्धारित किए जाएं और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जो केन्द्रीय बोर्ड उसे प्रत्यायोजित करे ।]
10. निदेशकों और स्थानीय बोर्डों के सदस्यों की निरर्हताएं-(1) ऐसा कोई व्यक्ति निदेशक या स्थानीय बोर्ड का सदस्य न हो सकेगा-
(क) जो वैतनिक सरकारी अधिकारी है, *** ****, या
(ख) जो दिवालिया न्यायनिर्णीत हुआ है या किसी समय हुआ था अथवा जितने भुगतान करना निलम्बित कर दिया है या अपने लेनदारों के साथ समझौता कर लिया है, या
(ग) जो पागल पाया गया है या विकृतचित्त हो जाता है, या
(घ) जो किसी बैंक का अधिकारी या कर्मचारी है, या
[(ङ) [जो बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10], की धारा 5 के खण्ड (ग) के अर्थ में बैंककारी कम्पनी का अथवा सहकारी बैंक का निदेशक है ।]
(2) कोई दो व्यक्ति जो एक ही वाणिज्यिक फर्म के भागीदार हैं या एक ही प्राइवेट कम्पनी के निदेशक हैं या जिनमें से एक दूसरे का साधारण अभिकर्ता है या दूसरे से या किसी ऐसी वाणिज्यिक फर्म से, जिसका दूसरा व्यक्ति भागीदार है, प्राधिकार पत्र धारण करता है, एक ही समय पर एक ही स्थानीय बोर्ड के निदेशक या सदस्य नहीं हो सकेंगे ।
(3) उपधारा (1) के खंड (क), खंड (घ) या खंड (ङ) की कोई बात गवर्नर को, या डिप्टी गवर्नर को या धारा 8 की उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन नामनिर्दिष्ट निदेशक को लागू नहीं होगी ।
11. पद से हटाया जाना और उसका रिक्त होना-(1) [केन्द्रीय सरकार] गर्वनर या डिप्टी गवर्नर या [किसी अन्य निदेशक या स्थानीय बोर्ड के किसी सदस्य] को पद से हटा सकेगी :
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[(2) यदि धारा 8 की उपधारा (1) के खंड (ख) या खंड (ग) के अधीन नामनिर्दिष्ट निदेशक धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन बनाए गए बोर्ड के लगातार तीन अधिवेशनों से केन्द्रीय बोर्ड की इजाजत के बिना अनुपस्थित रहता है तो वह पद धारण करने से परिविरत हो जाएगा ।]
(3) यदि कोई निदेशक या सदस्य धारा 10 की उपधारा (1) या उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट निरर्हताओं में से किसी से ग्रस्त हो जाता है तो उस निदेशक को 8[केन्द्रीय सरकार] और, स्थानीय बोर्ड के उस सदस्य को केन्द्रीय बोर्ड, पद से हटा देगी या हटा देगा ।
(4) पूर्वगामी उपधारा के अधीन हटाया गया या पद धारण करने से परिविरत निदेशक या किसी स्थानीय बोर्ड का सदस्य निदेशक के रूप में या स्थानीय बोर्ड के सदस्य के रूप में पुनर्नियुक्ति के लिए तब तक पात्र नहीं होगा जब तक कि उस पदावधि का अवसान न हो जाए जिसके लिए उसकी नियुक्ति की गई थी ।
(5) किसी व्यक्ति का जो [संसद् या [किसी राज्य के] विधान मंडल] का सदस्य है निदेशक या स्थानीय बोर्ड के सदस्य के रूप में *** नामनिर्देशन *** शून्य होगा जब तक कि वह अपना 3*** नामनिर्देशन 4*** की तारीख से दो मास के भीतर ऐसा सदस्य होने से परिविरत नहीं हो जाता है और यदि कोई निदेशक या स्थानीय बोर्ड का सदस्य [संसद् या ऐसे किसी विधान-मंडल] के सदस्य के रूप में निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट किया जाता है तो वह, यथास्थिति, ऐसे निर्वाचन या नामनिर्देशन की तारीख से निदेशक या स्थानीय बोर्ड का सदस्य होने से परिविरत हो जाएगा ।
(6) निदेशक अपना पद [केन्द्रीय सरकार] को और स्थानीय बोर्ड का सदस्य अपना पद केन्द्रीय बोर्ड को त्यागपत्र देकर त्याग सकेगा और उसके त्यागपत्र के स्वीकार किए जाने पर वह पद रिक्त हो जाएगा ।
12. आकस्मिक रिक्तियां और अनुपस्थिति-(1) यदि गवर्नर या डिप्टी गवर्नर अंग शैथिल्य के कारण या अन्यथा अपने कर्तव्यों का निष्पादन करने के लिए असमर्थ हो जाता है या छुट्टी पर या अन्यथा ऐसी परिस्थितियों में अनुपस्थित है जिनमें उसका पद रिक्त न हो तो 6[केन्द्रीय सरकार] केन्द्रीय बोर्ड द्वारा इस बाबत की गई सिफारिशों पर विचार करने के पश्चात् किसी अन्य व्यक्ति को उस रिक्ति में स्थानपन्न रूप से नियुक्त कर सकेगी और ऐसा व्यक्ति धारा 10 की उपधारा (1) के खंड (घ) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी रिजर्व बैंक का अधिकारी हो सकेगा ।
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(3) जहां स्थानीय बोर्ड के किसी सदस्य के पद में *** कोई आकस्मिक रिक्ति हो जाती है वहां केन्द्रीय बोर्ड *** व्यक्ति को, जिसकी स्थानीय बोर्ड के [अन्यट सदस्यों ने सिफारिश की है, उसके लिए नामनिर्दिष्ट कर सकेगी ।
(4) जहां निदेशक के पद में कोई ऐसी रिक्ति हो जाती है, जो उपधारा (1) में उपबंधित रिक्तियों से भिन्न है वहां रिक्ति [केन्द्रीय सरकार द्वाराट भरी जाएगी ।
(5) *** आकस्मिक रिक्ति की पूर्ति करने के लिए इस धारा के अधीन नामनिर्दिष्ट *** व्यक्ति अपने पूर्वाधिकारी की अवधि के अपर्यवसित भाग तक पद धारण करेगा ।
13. केन्द्रीय बोर्ड के अधिवेशन-(1) केन्द्रीय बोर्ड के अधिवेशन प्रत्येक वर्ष कम से कम छह बार और प्रत्येक तिमाही में कम से कम एक बार गवर्नर द्वारा बुलाए जाएंगे ।
(2) कोई [चार निदेशक] किसी भी समय गवर्नर से केन्द्रीय बोर्ड का अधिवेशन बुलाने की अपेक्षा कर सकेंगे गवर्नर तदनुसार तुरन्त अधिवेशन बुलाएगा ।
(3) गवर्नर [या यदि वह किसी कारण से हाजिर होने में असमर्थ है,] तो धारा 8 की उपधारा (3) के परन्तुक के अधीन उसकी ओर से मत देने के लिए प्राधिकृत डिप्टी गवर्नर, केन्द्रीय बोर्ड के अधिवेशनों में पीठासीन होगा और समान मतों की अवस्था में उसका द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।
14-16. [साधारण अधिवेशन । केन्द्रीय बोर्ड का प्रथम गठन । स्थानीय बोर्डों का प्रथम गठन ।]-1948 के अधिनियम संख्यांक 62 की धारा 7 तथा अनुसूची द्वारा (1-1-1949 से) निरसित ।
17. कारबार जिसे रिजर्व बैंक कर सकेगा-रिजर्व बैंक एतत्पश्चात् विनिर्दिष्ट अनेक प्रकार के कारबार चलाने और उनका निष्पादन करने के लिए प्राधिकृत होगा, अर्थात् :-
(1) *** [केन्द्रीय सरकार], [ *** [राज्यट सरकारों ***] *** स्थानीय प्राधिकारियों, बैंकों और किन्हीं अन्य व्यक्तियों से और उनके लिए बिना ब्याज वाले निक्षेप के रूप में धन का प्रतिग्रहण और धन का संग्रहण ।
(2) (क) दो या दो से अधिक मान्य हस्ताक्षरों वाले, जिन हस्ताक्षरों में से एक अनुसूचित बैंक [या राज्य सहकारी बैंक] [या किसी ऐसी वित्तीय संस्था का होगा जो विनिमयपत्रों और वचनपत्रों को प्रतिगृहीत करने में या मितीकाटा लेकर उनका भुगतान करने में प्रमुखतः लगी हुई हो और जो इस निमित्त रिजर्व बैक द्वारा 9[ *** अनुमोदित हो] ऐसे विनिमयपत्रों और वचनपत्रों का क्रय, विक्रय या पुनः मितीकाटा लेकर भुगतान करना, [जो भारत] [में लिखे गए और देय हैं] और जो सद्भावी वाणिज्यिक या व्यापारिक संव्यवहारों से उद्भूत हुए हैं और [जो ऐसे क्रय या पुनः मितीकाटा लेकर भुगतान करने की तारीख से अनुग्रह दिवसों को छोड़कर-
(i) भारत से माल के निर्यात से सम्बन्धित किसी ऐसे संव्यवहार से उद्भूत विनिमयपत्रों तथा वचनपत्रों की दशा में एक सौ अस्सी दिन के अन्दर, और
(ii) किसी अन्य दशा में नब्बे दिन के अन्दर,
परिपक्व होने वाले हैं,]
(ख) दो या दो से अधिक मान्य हस्ताक्षरों वाले, जिन हस्ताक्षरों में से एक अनुसूचित बैंक [या [राज्य] सहकारी बैंक 9[या किसी ऐसी वित्तीय संस्था का होगा जो विनिमयपत्रों और वचनपत्रों को प्रतिगृहीत करने में या मितीकाटा लेकर उनका भुगतान करने में प्रमुखतः लगी हुई हो और जो इस निमित्त रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित हों,] ऐसे विनिमयपत्रों और वचनपत्रों का क्रय, विक्रय, या पुनःमितीकाटा लेकर भुगतान करना, 11[जो भारत] 12[में लिखे गए और देय हैंट और [कृषि संक्रियाओं के] या फसलों के विपणन 16[वित्तपोषण] के प्रयोजन के लिए लिखे गए या दिए गए हैं और अनुग्रह दिवसों को छोड़कर ऐसे पुनः मितीकाटा लेकर भुगतान करने के [पन्द्रह मास] के भीतर परिपक्व होने वाले हैं;
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[(खख) दो या दो से अधिक मान्य हस्ताक्षरों वाले, जिनमें से एक राज्य सहकारी बैंक 9[या किसी ऐसी वित्तीय संस्था का होगा जो विनिमयपत्रों और वचनपत्रों को प्रतिगृहीत करने में या मितीकाटा लेकर उनका भुगतान करने में प्रमुखतः लगी हुई हो और जो इस निमित्त रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित हो] ऐसे विनिमयपत्रों और वचनपत्रों का क्रय, विक्रय और पुनः मितीकाटा लेकर भुगतान करना जो भारत में लिखे गए और देय हैं और रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित कुटीर और लघु उद्योगों के उत्पादन या विपणन क्रियाओं का वित्तपोषण करने के प्रयोजन के लिए लिखे गए या दिए गए हैं और ऐसे क्रय या पुनः मितीकाटा लेकर भुगतान करने की तारीख से, अनुग्रह दिवसों को छोड़कर, बारह मास के भीतर परिपक्व होने वाले हैं, परन्तु यह तब जबकि ऐसे विनिमयपत्रों या वचनपत्रों के मूल और ब्याज की अदायगी राज्य सरकार द्वारा पूर्णतः प्रत्याभूत हों;]
(ग) अनुसूचित बैंक *** के हस्ताक्षरों वाले ऐसे विनिमयपत्रों और वचनपत्रों का क्रय, विक्रय या पुन मितीकाटा लेकर भु्गतान करना 14[जो भारत में 12[लिखे गए और देय हैं औ जो [केन्द्रीय सरकार 12[या 15[राज्य] सरकार] की प्रतिभूतियां *** धारण करने या उनका व्यापार करने के प्रयोजन के लिए दिए गए या लिखे गए हैं और ऐसे क्रय या पुनः मितीकाटा लेकर भुगतान करने की तारीख से अनुग्रह दिवसों को छोड़कर, नब्बे दिन के भीतर परिपक्व होने वाले हैं ।
(3) (क) [विदेशी मुद्रा] अनुसूचित बैंकों *** से खरीदना और उनको बेचना *** ;
[(ख) ऐसे विनियमपत्रों का (जिनके अंतर्गत खजाना विनियमपत्र हैं) क्रय, विक्रय और पुनःमितीकाटा लेकर भुगतान करना जो भारत से बाहर के ऐसे देश में जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा निधि का सदस्य है किसी स्थान में या पर लिखे गए गए हैं और जो क्रय की तारीख के अनुग्रह दिवसों को छोड़ कर,-
(i) भारत से माल के निर्यात से संबंधित किसी सद्भाविक संव्यवहार से उद्भूत विनिमयपत्र की दशा में, एक सौ अस्सी दिन के अंदर, तथा
(ii) किसी अन्य दशा में, नब्बे दिन के अंदर,
परिपक्व होने वाले हैं :
परन्तु भारत में ऐसा कोई क्रय, विक्रय या पुनः मितीकाटा लेकर भुगतान करना अनुसूचित बैंक या राज्य सहकारी बैंक के साथ ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।]
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[(3क) किसी अनुसूचित बैंक या राज्य सहकारी बैंक को ऐसे बैंक के ऐसे वचनपत्रों पर, जो मांग पर, अथवा एक सौ अस्सी दिन से अनधिक नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिदेय हैं, उधार और अग्रिम देना :
परन्तु यह तब जबकि उधार लेने वाला बैंक लिखित रूप से इस भाव की घोषणा कर देता है कि-
(i) भारत से माल के निर्यात से संबंधित किसी संव्यवहार से उद्भूत तथा ऐसे उधार या अग्रिम की रकम से अन्यून मूल्य के ऐसे विनिमयपत्र वह धारण किए हुए हैं, जो-
(क) भारत में लिखे गए हैं और जो भारत के बाहर के किसी ऐसे देश के किसी स्थान पर लिखे गए हैं जो अंतरराष्ट्रीय मुद्रा निधि का सदस्य है, अथवा किसी अन्य देश में लिखे गए हैं जिसे रिजर्व बैंक ने भारत के राजपत्र में इस निमित्त अधिसूचित किया है, और
[(ख) उधार या अग्रिम की तारीख से एक सौ अस्सी दिन से अनधिक समय पर परिपक्व होने हैं तथा जब तक ऐसे उधारों और अग्रिमों का कोई भाग बिना चुकाया रहता है तब तक वह उतने मूल्य के ऐसे विनिमयपत्र धारण किए रहेगा जिनका मूल्य तत्समय बाकी ऐसे उधार या अग्रिम की रकम से कम नहीं है; या]
[(ii) उसने निर्यातक को या भारत में किसी अन्य व्यक्ति को पोतवहन-पूर्व उधार या अग्रिम इस उद्देश्य से दिया है कि वह भारत से माल का निर्यात करने में समर्थ हो जाए और किसी समय लिए गए और बाकी उधार या अग्रिम की रकम उस उधार या अग्रिम की रकम से कम नहीं रहेगी जो उधार लेने वाले बैंक ने रिजर्व बैंक से अभिप्राप्त किया है ।]
[(3ख) किसी अनुसूचित बैंक या राज्य सहकारी बैंक को, उस बैंक के वचनपत्रों पर, ऐसे उधार और अग्रिम देना जो मांग पर या एक सौ अस्सी दिन से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिदेय हों :
परन्तु यह तब जब कि उधार लेने वाला बैंक लिखित रूप में इस आशय की घोषणा करता है कि उसने उधार और अग्रिम सद्भावी वाणिज्यिक या व्यापारिक संव्यवहारों के लिए या कृषिक संक्रियाओं के या फसलों के विपणन या अन्य ऐसे कृषि प्रयोजनों के वित्तपोषण के लिए दिए हैं जो घोषणा में उल्लिखित हैं और उक्त घोषणा के अंतर्गत ऐसी अन्य विशिष्टियां सम्मिलित हैं जिनकी रिजर्व बैंक अपेक्षा करे;]
(4) *** स्थानीय प्राधिकारियों, अनुसूचित बैंकों, [ *** [राज्य] सहकारी बैंकों [और राज्य वित्तीय निगमों]] *** को निम्नलिखित की प्रतिभूति पर ऐसे उधार और अग्रिम देना जो मांग पर अथवा नब्बे दिन से अनधिक नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिदेय हों,-
(क) वे स्टाक, निधियां (स्थावर संपत्ति से भिन्न) और प्रतिभूतियां जिनमें न्यासी न्यास-धन को [यूनाइटेड किंगडम की] पार्लियामेंट के किसी अधिनियम द्वारा या [भारत] *** में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा विनिहित करने के लिए प्राधिकृत हैं,
(ख) सोना या चांदी या उनके हक-दस्तावेज,
(ग) वे विनिमयपत्र और वचनपत्र जो रिजर्व बैंक द्वारा खरीदे जाने या पुनः मितीकाटा लेकर भुगतान करने के योग्य हैं [या जो मूल के प्रतिदान और ब्याज की अदायगी के लिए राज्य सरकार द्वारा संपूर्णतः प्रत्याभूत हैं;]
(घ) किसी अनुसूचित बैंक [ [या 4[राज्य]] सहकारी बैंक] के वे वचनपत्र जिनका समर्थन माल पर हक संबंधी [ऐसी दस्तावेजों सेट होता है जो सद्भावी वाणिज्यिक या व्यापारिक संव्यवहारों के लिए या [कृषिक संक्रियाओं] या फसलों के विपणन के [वित्तपोषण] के प्रयोजन के लिए 15[दिए गए उधार या अग्रिम] के लिए प्रतिभूति के रूप में ऐसे किसी बैंक को 13[अंतरित] या समनुदेशित कर दी गई है या उसके पास गिरवी रख दी गई है :
[परन्तु भारत से माल के निर्यात से संबंधित किसी संव्यवहार से उद्भूत होने वाले विनिमयपत्र तथा वचनपत्र की प्रतिभूति पर दिए गए उधार और अग्रिम मांग पर अथवा एक सौ अस्सी दिन से अनधिक नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिदेय होंगे ;]
[(4क) किसी राज्य वित्तीय निगम 6*** को केन्द्रीय सरकार की या किसी राज्य सरकार की कैसी ही परिपक्वता वाली प्रतिभूतियों पर या उस निगम द्वारा निर्गमित और संबद्ध राज्य सरकार द्वारा प्रत्याभूत और ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से अठारह मास से अनधिक की कालावधि के भीतर परिपक्व होने वाले बंधपत्रों और डिबेंचरों पर ऐसे उधार या अग्रिम देना जो ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से अठारह मास से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिदेय हैं :
[परन्तु राज्य वित्तीय निगम द्वारा उधार लेने के लिए राज्य सरकार का पूर्व अनुमोदन प्राप्त किया जाएगा और उस निगम को इस खंड के अधीन दिए गए उधारों और अग्रिमों की कुल रकम किसी भी समय निगम के शेयरों की [समादत्त पूंजी के दुगुनेट से अधिक नहीं होगी ।]]
[(4कक) राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 (1981 का 61) की क्रमशः धारा 42 और धारा 43 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि और राष्ट्रीय ग्रमीण प्रत्यय (स्थिरीकरण) निधि में वार्षिक अभिदाय करना;]
[(4ख) भारतीय औद्योगिक वित्त निगम 6*** को ऐसे उधार और अग्रिम देना, जो-
(क) केन्द्रीय सरकार की या किसी राज्य सरकार की प्रतिभूतियों पर, मांग पर या ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से नब्बे दिन से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिसंदेय हैं, या
(ख) केन्द्रीय सरकार की कैसी ही परिपक्व होने वाली प्रतिभूतियों पर या ऐसे निगम द्वारा पुरोधृत और केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रत्याभूत और ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से अठारह मास से अनधिक की कालावधि के भीतर परिपक्व होने वाले बंधपत्रों और डिबेंचरों पर ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से अठारह मास से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिदेय हैं :
। । । । ।
[(4खख) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित किसी वित्तीय संस्था को उधार और अग्रिम देना जो-
(क) केन्द्रीय सरकार की या किसी राज्य सरकार की प्रतिभूतियों पर, मांग पर या ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से नब्बे दिन से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिदेय हैं; या
(ख) केन्द्रीय सरकार की या किसी राज्य सरकार की कैसी ही परिपक्व होने वाली प्रतिभूतियों पर या उस वित्तीय संस्था द्वारा पुरोधृत और केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा प्रत्याभूत और ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से अठारह मास से अनधिक की कालावधि के भीतर परिपक्व होने वाले बंधपत्रों और डिबेंचरों पर, ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से अठारह मास से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिदेय हैं :
परन्तु उपखंड (ख) के अधीन किसी वित्तीय संस्था को दिए गए उधारों और अग्रिमों की रकम किसी समय कुल मिलाकर, उसकी समादत्त शेयर पूंजी के साठ प्रतिशत से अधिक न होगी;
[(4खखख) यूनिट ट्रस्ट को-
(i) ऐसे स्टाक, निधियों और (स्थावर संपत्ति से भिन्न) प्रतिभूतियों की प्रतिभूति पर, जिनमें न्यास-धन विनिहित करने के लिए कोई न्यासी भारत में तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा प्राधिकृत हो, ऐसा उधार और अग्रिम देना जो मांगे जाने पर या उस उधार या अग्रिम की तारीख से नब्बे दिन से अनधिक की नियत कालावधि के अवसान पर प्रतिसंदेय है,] ***
(ii) केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से निर्गमित और उसके द्वारा प्रत्याभूत यूनिट ट्रस्ट के बंधपत्रों की प्रतिभूति पर, उधार या अग्रिम धन देना जो मांगे जाने पर या उस उधार या अग्रिम की तारीख से अठारह मास की कालावधि के भीतर प्रतिसंदेय है;]
[(iii) भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) के अधीन प्रथम यूनिट स्कीम से भिन्न किसी स्कीम के प्रयोजनों के लिए ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, और यूनिट ट्रस्ट की ऐसी अन्य संपत्ति की प्रतिभूति पर, जैसी रिजर्व बैंक द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए, उधार और अग्रिम देना ।]
[(4ग) कृषिक उपज (विकास और भांडागारण) निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 28) के अधीन स्थापित भांडागारण निगम को उधार और अग्रिम देना, जो-
(क) मांग पर या ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से नब्बे दिन से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिसंदेय हैं, और जो केन्द्रीय सरकार की या किसी राज्य सरकार की प्रतिभूतियों पर दिए गए हैं; या
(ख) केन्द्रीय सरकार की या किसी राज्य सरकार की कैसी ही परिपक्व होने वाली प्रतिभूतियों पर दिए गए हैं या जिस निगम को उधार या अग्रिम दिया गया है उस द्वारा निर्गमित और केन्द्रीय या राज्य सरकार द्वारा प्रत्याभूत हैं और ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से अठारह मास से अनधिक की कालावधि के भीतर परिपक्व होने वाले बंधपत्रों और डिबेंचरों पर ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से अठारह मास से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिदेय हैं :
परन्तु खंड (ख) के अधीन दिए गए उधारों या अग्रिमों की रकम किसी समय कुल मिलाकर केन्द्रीय भांडागारण निगम की दशा में तीन करोड़ रुपए और राज्य भांडागारण निगम की दशा में पचास लाख रुपए से अधिक न होगी;]
[(4घ) निक्षेप बीमा निगम को उधार और अग्रिम देना तथा निगम को साधारणतः ऐसी रीति से और ऐसे निबंधनों पर सहायता देना जो केन्द्रीय बोर्ड द्वारा अवधारित की जाए या किए जाएं;]
[(4घघ) राष्ट्रीय आवास बैंक को ऋण और उधार देना और राष्ट्रीय आवास बैंक की ऐसी रीति से और ऐसे निबंधनों पर जो केन्द्रीय बोर्ड द्वारा अवधारित किए जाएं, साधारणतया सहायता करना;]
[(4ङ) राष्ट्रीय बैंक को-
(i) स्टाक, निधियों तथा (स्थावर संपत्ति से भिन्न) ऐसी प्रतिभूतियों की प्रतिभूति पर, जिनमें कोई न्यासी न्यास धन का विनिधान करने के लिए भारत में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा प्राधिकृत है; या
(ii) ऐसी अन्य शर्तों या निबंधनों पर, जो बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं,
ऐसे उधार और अग्रिम देना जो मांग पर या ऐसे उधार या अग्रिम के दिए जाने की तारीख से अठारह मास से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिसंदेय हैं;]
[(4च) यूनिट ट्रस्ट की प्रारंभिक पूंजी में अभिदाय करना;]
[(4छ) धारा 46ग के अधीन स्थापित राष्ट्रीय औद्योगिक उधार (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि में से *** निआ बैंक [या पुनर्निर्माण बैंक]] [या लघु उद्योग बैंक] को उधार और अग्रिम धन देना, तथा उसके बंधपत्र और डिबेंचर क्रय करना;
[(4छछ) राष्ट्रीय आवास बैंक को धारा 46घ के अधीन स्थापित राष्ट्रीय आवास प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि में से ऋण और उधार देना, तथा उक्त बैंक के बंधपत्र और डिबेंचर क्रय करना;]
(4ज) 4*** 7[या लघु उद्योग बैंक] को-
(क) ऐसे स्टाक, निधियों और (स्थावर संपत्ति से भिन्न) प्रतिभूतियों की प्रतिभूति पर, जिनमें न्यास-धन विनिहित करने के लिए कोई न्यासी भारत में तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा प्राधिकृत है, ऐसा उधार और अग्रिम देना जो मांगे जाने पर या उस उधार या अग्रिम की तारीख से नब्बे दिन से अनधिक की नियत कालावधि के अवसान पर प्रतिसंदेय है,
(ख) ऐसे विनिमयपत्रों या वचनपत्रों की प्रतिभूति पर उधार और अग्रिम देना जो सद्भावपूर्वक किए गए वाणिज्यिक या व्यापारिक संव्यवहारों से उद्भूत हैं, जिन पर दो या अधिक मान्य हस्ताक्षर हैं, और जो उधार या अग्रिम धन की तारीख से पांच वर्ष के भीतर परिपक्व होते हैं;
[(4झ) अनुसूचित बैंकों, 4*** 5[निआ बैंक [पुनर्निर्माण बैंक या लघु उद्योग बैंक]] औद्योगिक वित्त निगम और किसी अन्य ऐसी वित्तीय संस्था को, जो रिजर्व बैंक की सिफारिश पर केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अनुमोदित की जाए, ऐसा उधार और अग्रिम देना जो मांगे जाने पर या अन्यथा और ऐसी प्रतिभूति पर और ऐसे अन्य निबंधनों तथा शर्तों पर प्रतिसंदेय है, जिनका इस निमित्त अनुमोदन केन्द्रीय बोर्ड, यथास्थिति, ऐसे बैंकों, या वित्तीय संस्था को पूंजीगत माल के आयात के वित्तपोषण के प्रयोजन के लिए या केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किए जाने वाले अन्य प्रयोजनों के लिए, रिजर्व बैंक से विदेशी मुद्रा क्रय करने में समर्थ बनाने के लिए करे;
5[(4ञ) निआ बैंक को-
(क) ऐसे स्टाकों, निधियों और (स्थावर संपत्ति से भिन्न) प्रतिभूतियों की प्रतिभूति पर जिनमें न्यास-धन विनिहित करने के लिए कोई न्यासी भारत में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा प्राधिकृत है, ऐसे उधार और अग्रिम देना जो मांगे जाने पर या उस उधार या अग्रिम की तारीख से नब्बे दिन से अनधिक की नियत अवधि के अवसान पर प्रतिसंदेय है; या
(ख) ऐसे विनिमयपत्रों या वचन-पत्रों की प्रतिभूति पर उधार और अग्रिम देना जो सद्भावपूर्वक किए गए वाणिज्यिक या व्यापार संव्यवहारों से उद्भूत होते हैं, जिन पर दो या अधिक मान्य हस्ताक्षर हैं और जो ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से पांच वर्ष के भीतर परिपक्व होते हैं;]
[(4ट) पुनर्निर्माण बैंक को-
(क) ऐसे स्टाकों, निधियों और (स्थावर संपत्ति से भिन्न) प्रतिभूतियों की प्रतिभूति पर, जिनमें न्यास-धन विनिहित करने के लिए कोई न्यासी भारत में तत्समय प्रवृत्त विधि द्वारा प्राधिकृत है, ऐसा उधार और अग्रिम देना जो मांगे जाने पर या उस उधार या अग्रिम की तारीख से नब्बे दिन से अनधिक नियत अवधि के अवसान पर प्रतिसंदेय है; या
(ख) ऐसे विनिमय-पत्रों या वचन-पत्रों की प्रतिभूति पर उधार और अग्रिम देना, जो सद्भावपूर्वक किए गए वाणिज्यिक या व्यापारिक संव्यवहारों से उद्भूत होते हैं, जिन पर दो या अधिक मान्य हस्ताक्षर हैं और जो ऐसे उधार या अग्रिम की तारीख से पांच वर्ष के भीतर परिपक्व होते हैं;]
(5) [केन्द्रीय सरकार] [ *** [और [राज्य] सरकार]] को ऐसे अग्रिम देना और जो प्रत्येक दशा में अग्रिम देने की तारीख से तीन मास से अनधिक के पश्चात् प्रतिदेय है;
[(6) अपने कार्यालयों या अभिकरणों में देय मांगदेय ड्राफ्ट, तार, अन्तरणादेशों और अन्य प्रकार के विप्रेषणादेशों का निर्गमन, तार अन्तरणादेशों का खरीदना, और बैंक प्रेष-विपत्रों का बनाना, निर्गमन और परिचालन;]
[(6क) व्युत्पन्नों में और केन्द्रीय बोर्ड के अनुमोदन से किसी अन्य वित्तीय लिखत में व्यवहार करना ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, “व्युत्पन्न" से ऐसी लिखत अभिप्रेत है जिसका निपटान किसी भविष्यवर्ती तारीख को किया जाना है और जिसका मूल्य निम्नलिखित पूर्वाधिकारों में से एक या एक से अधिक के समुच्चय परिवर्तन से व्युत्पन्न किया जाता है, अर्थात् :-
(क) ब्याज दर,
(ख) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार की प्रतिभूतियों की या किसी स्थानीय प्राधिकारी की ऐसी प्रतिभूतियों की जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाएं, कीमत,
(ग) विदेशी प्रतिभूतियों की कीमत,
(घ) विदेशी मुद्रा दर,
(ङ) रेट या कीमतों का सूचकांक,
(च) प्रत्यय रेटिंग या प्रत्यय सूचकांक,
(छ) सोने या चांदी के सिक्कों की कीमत, या सोने या चांदी बुलियन, या
(ज) इसी प्रकृति के कोई अन्य परिवर्ती;
। । । । ।
(8) [केन्द्रीय 4[सरकार या 5[या राज्य] सरकार]] की कैसी ही परिपक्वता वाली प्रतिभूतियों का या किसी स्थानीय प्राधिकारी *** की ऐसी प्रतिभूतियों का, जैसी केन्द्रीय सरकार ने केन्द्रीय बोर्ड की सिफारिश पर तन्निमित्त विनिर्दिष्ट की हों, क्रय और विक्रय :
परन्तु मूल और ब्याज की बाबत जिन प्रतिभूतियों के लिए पूरी प्रत्याभूति [ऐसी किसी सरकार [या प्राधिकारी]] ने दी है वे इस खंड के प्रयोजनों के लिए ऐसी सरकार 12[या प्राधिकारीट की प्रतिभूतियां समझी जाएंगी;
। । । । ।
[(8क) [ [राष्ट्रीय बैंक], [निक्षेप बीमा निगम], *** स्टेट बैंक [या केन्द्रीय सरकार द्वारा तन्निमित्त अधिसूचित किसी अन्य बैंकट [या वित्तीय संस्था] के शेयर और पूंजी का क्रय और विक्रय;]]
[(8कक) किसी वित्तीय संस्था का संवर्धन करना, स्थापन करना और उनकी सहायता करना या उसके संवर्धन, स्थापना और समर्थन में, चाहे अपने समनुंषगी के रूप में या अन्यथा सहयोग देना;]
[(8ख) ऐसे विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए स्टेट बैंक के पास निक्षेपों का रखना जैसे तन्निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किए जाएं;
(9) धनों, प्रतिभूतियों और अन्य मूल्यवान वस्तुओं की अभिरक्षा या ऐसी प्रतिभूतियों के आगमों का संग्रहण, चाहे वह मूलधन, ब्याज या लाभांश हों;
(10) सब संपत्ति का, चाहे वह स्थावर हो या जंगम, जो रिजर्व बैंक के दावों की पूर्ति या आंशिक पूर्ति में किसी प्रकार रिजर्व बैंक के कब्जे में आएं, विक्रय और वसूली;
(11) निम्नलिखित प्रकारों के कारबार में से किसी का संव्यवहार करने में *** [केन्द्रीय सरकार] के [या किसी [राज्य] सरकार के *** या किसी स्थानीय प्राधिकारी के *** [या भारतीय औद्योगिक वित्त निगम के] *** [या किसी अन्य ऐसे निगमित निकाय के, जो किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन स्थापित या गठित किया गया हो [या भारत के बाहर के किसी ऐसे देश की सरकार के [या किसी ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी के] जो तन्निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किया जाए,] अभिकर्ता के रूप में कार्य करना, अर्थात्-
(क) सोना या चांदी [या विदेशी मुद्रा] का क्रय और विक्रय,
(ख) किसी कम्पनी के शेयरों, प्रतिभूतियों या विनिमयपत्रों का क्रय, विक्रय, अन्तरण और अभिरक्षा,
(ग) किन्हीं प्रतिभूतियों या शेयरों के आगमों का संग्रहण, चाहे वह मूलधन, ब्याज या लाभांश हों,
(घ) भारत में या अन्यत्र देय विनिमयपत्रों द्वारा मालिक की जोखिम पर ऐसे आगमों का विप्रेषण,
(ङ) लोक-ऋण का प्रबन्ध,
[(च) *** *** बंधपत्रों और डिबेंचरों को निर्गमित करना और उनका प्रबंध करना;
[(11क) केन्द्रीय सरकार के अभिकर्ता के रूप में :-
[(क) इस बात की प्रत्याभूति देने के लिए कार्य करना कि केन्द्रीय सरकार ने जिस लघु औद्योगिक समुत्थान को अनुमोदित किया है उसकी जो बाध्यताएं ऐसे किसी उधार और अग्रिमों की बाबत अथवा ऐसी अन्य प्रत्यय सुविधाओं की बाबत, जो उसे किसी बैंक या अन्य वित्तीय संस्था द्वारा दी गई है; उस बैंक या अन्य वित्तीय संस्था के प्रति है, उनका सम्यक् पालन उस संस्था द्वारा किया जाएगा, तथा ऐसी प्रत्याभूति के संबंध में भुगतान ऐसे अभिकर्ता के रूप में करना, तथा]
(ख) ऐसी किसी स्कीम के प्रशासन में कार्य करना जो किन्हीं उधारों या अग्रिमों के सम्बन्ध में अथवा किसी अन्य प्रत्यय सुविधा के सम्बन्ध में, जो भारत से किसी निर्यात का वित्तपोषण करने या किसी निर्यात को सुगम करने के प्रयोजन से बैंकों द्वारा या अन्य वित्तीय संस्थाओं द्वारा दी गई हैं या उपबन्धित की गई हैं, ब्याज या अन्य प्रभारों की दर के लिए सहाय्यिकी देने की है, तथा केन्द्रीय सरकार की ओर से ऐसे अभिकर्ता के रूप में भुगतान करना;
[(12) सोने या चांदी के सिक्के और सोना-चांदी और विदेशी मुद्रा का क्रय और विक्रय करना और किसी विदेश के प्रधान करेन्सी प्राधिकारी के पास अथवा अन्तरराष्ट्रीय समाशोधन बैंक या किसी अन्तरराष्ट्रीय या प्रादेशिक बैंक में अथवा ऐसे प्रधान करेन्सी प्राधिकारी या प्राधिकारियों या किसी विदेशी सरकार द्वारा बनाई गई वित्तीय संस्था में सोने का खाता खोलना;]
[(12क) भारत के बाहर के किसी देश की सरकार द्वारा या भारत के बाहर स्थापित किसी संस्था या निगमित निकाय द्वारा निर्गमित विदेशी करेंसी या किसी अन्तरराष्ट्रीय या प्रशमित करेंसी यूनिट में देय के रूप में अभिव्यक्त ऐसी प्रतिभूतियों का क्रय और विक्रय करना जो रिजर्व बैंक द्वारा क्रय की दशा में क्रय की तारीख से दस वर्ष की कालावधि के भीतर परिपक्व होने वाली प्रतिभूतियां हैं :
परन्तु किसी संस्था या निगमित निकाय की प्रतिभूतियों की दशा में ऐसी प्रतिभूतियों के संबंध में मूल का प्रतिसंदाय और ब्याज का संदाय संबद्ध देश की सरकार द्वारा प्रत्याभूत होगा;]
[(12कक) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार की प्रतिभूतियों को या किसी स्थानीय प्राधिकारी की ऐसी प्रतिभूतियों को, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाएं या विदेशी प्रतिभूतियों को उधार देना या उधार लेना;
(12कख) रेपो या रिवर्स रेपों में व्यवहार करना :
परन्तु रेपो या रिवर्स रेपो के माध्यम से निधियों को उधार देना या उधार लेना इस धारा में अंतर्विष्ट किसी परिसीमा के अध्यधीन नहीं होगा ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए,-
(क) “रेपो" से केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार की प्रतिभूतियों को या किसी स्थानीय प्राधिकारी की ऐसी प्रतिभूतियों को, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाएं या विदेशी प्रतिभूतियों को, उक्त पारस्परिक रूप से करार की गई भविष्यवर्ती तारीख को करार पाई गई कीमत पर, जिसके अंतर्गत उधार ली गई निधियों पर ब्याज भी है, पुनः क्रय करने के लिए करार के साथ उक्त प्रतिभूतियों के, विक्रय द्वारा निधियां उधार लेने के लिए कोई लिखत अभिप्रेत है;
(ख) “रिवर्स रेपो" से केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार की प्रतिभूतियों को या किसी स्थानीय प्राधिकारी की, ऐसी प्रतिभूतियों को, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाएं या विदेशी प्रतिभूतियों को, उक्त पारस्परिक रूप से करार की गई भविष्यवर्ती तारीख को करार पाई गई कीमत पर जिसके अंतर्गत उधार ली गई निधियों पर ब्याज भी है, पुनः विक्रय करने के लिए करार के साथ प्रतिभूतियों के क्रय द्वारा निधियां उधार देने के लिए कोई लिखत अभिप्रेत है;]
[(12ख) अनुसूचित बैंकों, *** [निआ बैंक], [या पुनर्निर्माण बैंक या लघु उद्योग बैंक], औद्योगिक वित्त निगम, किसी राज्य वित्तीय निगम और किसी अन्य ऐसी वित्तीय संस्था को, जो रिजर्व बैंक की सिफारिश पर केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित की जाए, और ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो इस निमित्त केन्द्रीय सरकार विनिर्दिष्ट करे, यथास्थिति, ऐसे बैंक या वित्तीय संस्था के वचनपत्र पर विदेशी करेंसियों में उधार और अग्रिम देना :
परन्तु यह तब जब कि, यथास्थिति, उधार लेने वाला बैंक या वित्तीय संस्था इस आशय की लिखित घोषणा कर देती है कि-
(क) उसने अन्तराष्ट्रीय व्यापार का वित्तपोषण करने के लिए या पूंजीगत माल के आयात के लिए या ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किए जाएं उधार और अग्रिम दिया है; और
(ख) इस प्रकार दिए गए और किसी भी समय बकाया उधारों या अग्रिमों की रकम उसके द्वारा रिजर्व बैंक से लिए गए उधार या अग्रिमों की बकाया रकम से कम नहीं होगी;]
[(13) किसी बैंक के, जिसके अन्तर्गत भारत में निगमित बैंक भी है, भारत के बाहर के कार्यालय में खाता खोलना अथवा भारत के बाहर निगमित किसी बैंक या किसी देश में तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन उस देश के प्रधान करेंसी प्राधिकारी अथवा किसी अन्तरराष्ट्रीय या प्रादेशिक बैंक अथवा ऐसे प्रधान करेंसी प्राधिकारियों या विदेशी सरकारों द्वारा बनाई गई वित्तीय संस्था के साथ अभिकरण-करार करना और उसके अभिकर्ता या तत्स्थानी के रूप में कार्य करना, और किसी ऐसे अन्तरराष्ट्रीय या प्रादेशिक बैंक या वित्तीय संस्था या किसी अन्य ऐसी विदेशी संस्था के, जो इस निमित्त केन्द्रीय बोर्ड द्वारा अनुमोदित की जाए, शेयरों और प्रतिभूतियों में रिजर्व बैंक की निधियां विनिहित करना;]
[(13क) किसी अन्य देश या देशों के समूह के साथ भारत के विदेश व्यापार मद्धे अथवा उस देश या उन देशों के समूह को, उनसे, किन्हीं प्रेषणों मद्धे किसी व्यक्ति या प्राधिकारी से, या उसको शोध्य किन्हीं रकमों के समाशोधन और उनके परिनिर्धारण की किसी व्यवस्था में भाग लेना जिसके अन्तर्गत उसके संबंध में किसी भी करेंसी में कोई रकम देना या प्राप्त करना भी है और उस प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से केन्द्रीय बैंकों, मुद्रा प्राधिकारियों या अन्य प्राधिकारियों के किसी अन्तरराष्ट्रीय या प्रादेशिक समाशोधन संघ का सदस्य होना, अथवा ऐसी किन्हीं समाशोधन व्यवस्थाओं से सहयुक्त होना, अथवा केन्द्रीय बैंकों, मुद्रा प्राधिकारियों या अन्य वैसे ही प्राधिकारियों द्वारा बनाए गए किसी निकाय या संगम का सदस्य होना, अथवा उनके साथ किसी रीति से सहयुक्त होना;]
(14) रिजर्व बैंक के कारबार के प्रयोजनों के लिए एक मास से अनधिक की कालावधि के लिए धन उधार लेना और इस प्रकार उधार लिए गए धन के लिए प्रतिभूति देना :
परन्तु भारत *** में अनुसूचित बैंक *** से भिन्न किसी व्यक्ति से या भारत *** से बाहर ऐसे बैंक से, जो किसी देश में तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन उस देश का प्रधान करेन्सी प्राधिकारी है, भिन्न किसी व्यक्ति से इस खंड के अधीन कोई धन उधार नहीं लिया जाएगा :
परन्तु यह और भी कि भारत 4*** में व्यक्तियों से इस प्रकार लिए गए उधार की कुल रकम किसी समय रिजर्व बैंक की [पूंजी] की रकम से अधिक नहीं होगी;
। । । । । । ।
(15) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए बैंक-नोट बनाना और निर्गमित करना *** ***
[(15क) इस अधिनियम के अधीन या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन रिजर्व बैंक को सौंपे गए कर्तव्यों का पालन करना और शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग करना;]
[(15ख) बैंककारी में प्रशिक्षण देने तथा अनुसंधान का संप्रवर्तन करने के लिए सुविधाओं की व्यवस्था करना जहां रिजर्व बैंक की यह राय है कि ऐसी व्यवस्था से रिजर्व बैंक द्वारा अपनी शक्तियों और कृत्यों का प्रयोग अथवा अपने कर्तव्यों का निर्वहन सुकर हो सकता है;]
(16) साधारणतः ऐसे सब विषयों और ऐसी सब बातों को करना जो इस अधिनियम *** के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग या कर्तव्यों के निर्वहन के आनुषंगिक या पारिणामिक हैं ।
18. मितिकाटा लेकर सीधा भुगतान करने की शक्ति- *** जब [रिजर्व बैंक] *** की राय में ऐसा विशेष अवसर आ गया है जिसके कारण यह आवश्यक या समीचीन हो गया है कि भारतीय *** व्यापार, वाणिज्य, उद्योग और कृषि के हित में प्रत्यय का विनियमन करने के प्रयोजन के लिए [इस धारा के अधीन] कार्यवाही की जानी चाहिए तो धारा 17 *** में अन्तर्विष्ट किसी परिसीमा के होते हुए भी, रिजर्व बैंक-
[(1) कोई विनिमयपत्र या वचनपत्र खरीद सकेगा या बेच सकेगा या मितीकाटा लेकर उसका भुगतान कर सकेगा भले ही ऐसा विनिमयपत्र या वचनपत्र रिजर्व बैंक द्वारा उस धारा के अधीन खरीदे या मितीकाटा लेकर भुगतान किए जाने के योग्य न हों; या]
। । । । । । ।
[(3) (क) किसी राज्य सहकारी बैंक को, या
(ख) किसी राज्य सहकारी बैंक की सिफारिश पर, किसी ऐसी सहकारी सोसाइटी को जो उस क्षेत्र में रजिस्ट्रीकृत हुई हो जिसमें वह राज्य सहकारी बैंक काम करता है, या
(ग) किसी अन्य व्यक्ति को,
मांग पर या नब्बे दिन से अनधिक की नियत कालावधियों के अवसान पर प्रतिदेय उधार या अग्रिम ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर दे सकेगा जिन्हें रिजर्व बैंक पर्याप्त समझे ।
। । । । ।
। । । । ।
[18क. उधार या अग्रिम की विधिमान्यता का प्रश्नगत न किया जाना-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी-
(क) इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसरण में रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए उधार या अग्रिम की विधिमान्यता केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि पूर्वोक्त जैसी किसी अन्य विधि अथवा किसी संकल्प, संविदा, ज्ञापन, संगम अनुच्छेद या किसी अन्य लिखत की अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं हुआ है :
परन्तु जहां कि कोई कम्पनी या सहकारी सोसाइटी उधारों या अग्रिमों को अभिप्राप्त करने के लिए अपने ज्ञापन द्वारा सशक्त नहीं है, वहां इस खंड की कोई बात ऐसी कम्पनी या सहकारी सोसाइटी द्वारा अभिप्राप्त किसी उधार या अग्रिम को विधिमान्य नहीं बनाएगी;
(ख) जहां धारा 17 के खंड (3क) या खण्ड (3ख) के अधीन कोई उधार या अग्रिम दिया गया है अथवा धारा 18 के खण्ड (3) के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा किसी व्यक्ति को दिया गया कोई उधार या अग्रिम ऐसे व्यक्ति द्वारा किसी उधार लेने वाले को उधार या अग्रिम दिए जाने में पूर्णतः अथवा अंशतः उपयोजित किया गया है वहां-
(i) ऐसे विनिमयपत्रों मद्धे, जिनकी बाबत धारा 17 के खण्ड (3क) के परन्तुक के खण्ड (त्) के अधीन कोई घोषणा प्रस्तुत की गई है अथवा उक्त परन्तुक के खण्ड (त्त्) में अथवा उक्त धारा के खण्ड (3ख) के परन्तुक में निर्दिष्ट उधारों और अग्रिम के बकायों के प्रतिदाय या उनकी वसूली मद्धे, उधार लेने वाले बैंक द्वारा, या
(ii) उधार लेने वाले बैंक या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा रिजर्व बैंक से धारा 18 के अधीन अभिप्राप्त निधियों में से किसी उधार लेने वाले को दिए गए उधारों और अग्रिमों के प्रतिदाय या उनकी वसूली से उस उधार लेने वाले बैंक या अन्य व्यक्ति द्वारा,
प्राप्त कोई भी धनराशि, यथास्थिति, उस उधार लेने वाले बैंक या अन्य व्यक्ति द्वारा ऐसी रकमों के प्रतिदाय के लिए ही उपयोग में लाई जाएगी जो उस बैंक या उस व्यक्ति द्वारा रिजर्व बैंक को वापस करने के लिए शोध्य हों, और उस बैंक या व्यक्ति द्वारा रिजर्व बैंक के लिए न्यास के रूप में उस समय तक रखी जाएगी, जब तक कि उन रकमों का इस प्रकार प्रतिदाय नहीं हो जाता ।]
19. वह कारबार जो रिजर्व बैंक नहीं कर सकेगा-धारा 17, 18, [42] और 45 में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय रिजर्व बैंक-
(1) व्यापार में भाग नहीं ले सकेगा या अन्यथा किसी वाणिज्यिक, औद्योगिक या अन्य उपक्रम में कोई प्रत्यक्ष हित ऐसे हित के सिवाय नहीं रख सकेगा जिसे वह अपने दावों में से किसी की पूर्ति के अनुक्रम में किसी रीति से अर्जित करे, परन्तु ऐसे सारे हितों का शीघ्रातिशीघ्र व्ययन कर दिया जाएगा;
[(2) किसी बैंककारी कम्पनी के या किसी अन्य कम्पनी के शेयर नहीं खरीद सकेगा या ऐसे किन्हीं शेयरों की प्रतिभूति पर उधार नहीं देगा;]
(3) स्थावर सम्पत्ति या तत्संबद्ध हकदस्तावेजों के बंधक पर या अन्यथा उनकी प्रतिभूति पर अग्रिम नहीं दे सकेगा या जहां तक उसके अपने कारबार-परिसरों और अपने अधिकारियों और नौकरों के निवास गृहों के लिए आवश्यक हो उसके सिवाय, स्थावर संपत्ति का स्वामी नहीं बनेगा;
(4) उधार या अग्रिम नहीं देगा;
(5) मांग से अन्यथा प्रतिदेय विनिमयपत्र नहीं लिखेगा या प्रतिगृहीत करेगा;
(6) निक्षेपों या चालू खातों पर ब्याज नहीं देगा ।
अध्याय 3
केन्द्रीय बैंककारी कृत्य
20. सरकारी कारबार करने की रिजर्व बैंक की बाध्यता- रिजर्व बैंक [ *** केन्द्रीय सरकार ***] की ओर से धन प्रतिगृहीत करेगा और [उसके खाते] में जमा राशि तक अदायगी करेगा, और [उसके विनिमय], विप्रेषणादेश तथा अन्य बैंककारी क्रियाओं को, जिनके अन्तर्गत [संघ केट लोक ऋण का प्रबंध भी है, करेगा ।
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21. रिजर्व बैंक को भारत में सरकारी कारबार का संव्यवहार करने का अधिकार होगा-(1) [केन्द्रीय सरकार] *** ऐसी शर्तों पर, जैसी करार पाई जाएं, [अपने] सब धन-संबंधी, विप्रेषणादेश संबंधी, विनिमय संबंधी और भारत में के बैंककारी संबंधी संव्यवहार, रिजर्व बैंक को सुपुर्द कर देगी और विशेषतया, बिना ब्याज लिए 11[अपने] नकद अतिशेष रिजर्व बैंक में निक्षिप्त करेगी :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात 9[केन्द्रीय सरकार] *** को उन स्थानों में, जहां कि रिजर्व बैंक की कोई शाखाएं या अभिकरण नहीं हैं, धन का लेन-देन करने से निवारित नहीं करेगी और 9[केन्द्रीय सरकार] ऐसे स्थानों में ऐसे अतिशेष रख सकेगी जैसी [उसे] अपेक्षित हों ।
(2) 9[केन्द्रीय सरकार] *** ऐसी शर्तों पर, जैसी करार पाई जाएं, रिजर्व बैंक को लोक ऋण का प्रबंध और नए उधारों का निर्गमन सौंप देगी ।
(3) इस धारा में निर्दिष्ट शर्तों पर करार होने में असफल होने पर 9[केन्द्रीय सरकार] इस बात का विनिश्चय करेगी कि शर्तें क्या होंगी ।
[(4) इस धारा के अधीन किया गया कोई करार किए जाने के पश्चात् यथासंभव शीघ्र संसद् के समक्ष रखा जाएगा ।]
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[21क. करार होने पर रिजर्व बैंक राज्यों का सरकारी कारबार कर सकेगा-(1) रिजर्व बैंक किसी *** राज्य *** की सरकार से करार करके-
(क) उसके धन संबंधी, विप्रेषणादेशों संबंधी, विनिमय संबंधी और भारत में के बैंककारी संबंधी सब संव्यवहार, जिसके अंतर्गत बिना ब्याज के रिवर्ज बैंक में निक्षिप्त नकद अतिशेष विशेष रूप से है, कर सकेगा; और
(ख) उस राज्य के लोक ऋण का प्रबंध और नए उधारों का निर्गमन कर सकेगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया कोई करार किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के समक्ष रखा जाएगा ।
[21ख. रिजर्व बैंक और कुछ राज्यों की बीच सन् 1956 की पहली नवम्बर से पूर्व किए गए करारों का प्रभाव-(1) रिजर्व बैंक और निम्नलिखित स्पष्टीकरण में विनिर्दिष्ट किसी राज्य की सरकार के बीच, धारा 21 या धारा 21क के अधीन किया गया और 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त, कोई करार उस दिन से ऐसे प्रभाव रखेगा मानो वह रिजर्व बैंक और तत्स्थानी राज्य की सरकार के बीच धारा 21क के अधीन उस दिन उस करार के साधारण प्रवर्तन को प्रभावित न करने वाले ऐसे उपान्तरों सहित, यदि कोई हों, किया गया करार हो जैसे रिजर्व बैंक और तत्स्थानी राज्य की सरकार के बीच करार पाए जाएं या ऐसे करार के अभाव में जैसे केन्द्रीय सरकार के आदेश द्वारा किए जाएं ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में तत्स्थानी राज्य" से,-
(क) रिजर्व बैंक और आन्ध्र राज्य के बीच करार की दशा में आन्ध्र प्रदेश राज्य;
(ख) रिजर्व बैंक और किसी अन्य भाग क राज्य के, जैसा वह 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन के पूर्व वर्तमान था, बीच करार की अवस्था में उसी नाम वाला राज्य; और
(ग) रिजर्व बैंक और भाग ख राज्य मैसूर या तिरूवांकुर-कोचीन के बीच, जैसा वह 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन से पूर्व वर्तमान था, करार की दशा में क्रमशः मैसूर या केरल राज्य अभिप्रेत है ।
(2) रिजर्व बैंक और भाग ख राज्य हैदराबाद, मध्य भारत या सौराष्ट्र की सरकार के बीच धारा 21क के अधीन हुए किसी करार की बाबत यह समझा जाएगा कि उसका पर्यवसान सन् 1956 के अक्तूबर के 31वें दिन को हो गया है ।]
22. बैंक-नोट निर्गमित करने का अधिकार-(1) रिजर्व बैंक को [भारत] में बैंक-नोट निर्गमित करने का एकल अधिकार होगा और वह उस काल के लिए जिसे केन्द्रीय सरकार केन्द्रीय बोर्ड की सिफारिश पर नियत करेगी, [केन्द्रीय सरकार] द्वारा अपने को दिए गए करेंसी नोट निर्गमित कर सकेगा और जब तक कि कोई प्रतिकूल आशय न प्रतीत हो बैंक-नोटों को इस अधिनियम के जो उपबन्ध लागू हैं वे 3[केन्द्रीय सरकार] द्वारा या रिजर्व बैंक द्वारा निर्गमित किए गए भारत सरकार के सारे करेन्सी नोटों को उसी रीति से लागू होंगे मानो ऐसे करेन्सी नोट बैंक-नोट हों और इस अधिनियम में बैंक-नोटों के प्रति निर्देशों का अर्थ तदनुसार किया जाएगा ।
(2) उस तारीख से ही जिससे यह अध्याय प्रवृत्त होता है 3[केन्द्रीय सरकार] कोई करेन्सी नोट निर्गमित नहीं करेगी ।
23. निर्गमन विभाग-(1) बैंक-नोटों का निर्गमन रिजर्व बैंक द्वारा निर्गमन विभाग से किया जाएगा जो बैंककारी विभाग से पृथक् कर दिया जाएगा और पूर्णतः सुभिन्न रहेगा और निर्गमन विभाग की आस्तियां धारा 34 में एतत्पश्चात् यथापरिभाषित निर्गमन विभाग के दायित्वों से भिन्न किसी दायित्व के अधीन नहीं होंगी ।
(2) निर्गमन विभाग, बैंककारी विभाग या किसी अन्य व्यक्ति को बैंक-नोट या अन्य बैंक नोटों के या ऐसे सिक्कों, सोना-चांदी या प्रतिभूतियों के विनिमय में ही निर्गमित करेगा जिनका आरक्षित निधि का एक भाग होना इस अधिनियम द्वारा अनुज्ञात है अन्यथा नहीं ।
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[24. नोटों का अंकित मूल्य-(1) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए बैंक नोट दो रुपए, पांच रुपए, दस रुपए, बीस रुपए, पचास रुपए, सौ रुपए, पांच सौ रुपए, एक हजार रुपए, पांच हजार रुपए और दस हजार रुपए या दस हजार रुपए से अनधिक ऐसे अन्य अंकित मूल्य के होंगे जो केन्द्रीय बोर्ड की सिफारिश पर केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।
(2) केन्द्रीय सरकार केन्द्रीय बोर्ड की सिफारिश पर यह निदेश दे सकेगी कि ऐसे अंकित मूल्य के बैंक-नोटों का, जो वह इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, निर्गमन न किया जाए या निर्गमन करना बन्द कर दिया जाए ।]
25. बैंक-नोटों का रूप-बैंक-नोट ऐसे डिजाइन, रूप और सामग्री के होंगे जो केन्द्रीय बोर्ड द्वारा की गई सिफारिश पर विचार करने के पश्चात् 3[केन्द्रीय सरकार] द्वारा अनुमोदित की जाए ।
26. नोट वैध निविदा होंगे-(1) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए प्रत्येक बैंक-नोट 2[भारत] में किसी भी स्थान में उसमें अभिव्यक्त राशि की अदायगी में या लेखे वैध निविदा होगा और केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रत्याभूत होगा ।
(2) केन्द्रीय बोर्ड की सिफारिश पर केन्द्रीय सरकार भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह घोषित कर सकेगी कि ऐसी तारीख से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट हो, किसी अंकित मूल्य के बैंक-नोटों का कोई क्रम [रिजर्व बैंक के ऐसे कार्यालय या अभिकरण ही या ऐसे विस्तार तक में वैध निविदा रहेगा जैसा अधिसूचना में विनिर्दिष्ट है, अन्यथा नहीं ।]
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[26क. कुछ बैंक-नोट वैध निविदा न रहेंगे-धारा 26 में किसी बात के होते हुए भी 1946 की जनवरी के तेरहवें दिन के पूर्व निर्गमित पांच सौ रुपए, एक हजार रुपए या दस हजार रुपए के अंकित मूल्य का कोई बैंक-नोट उसमें अधिव्यक्त राशि की अदायगी या लेखे वैध निविदा नहीं रहेगा ।]
27. नोटों पर पुनः निर्गमन-रिजर्व बैंक ऐसे बैंक-नोटों को, जो फटे हुए, विरूपित या अत्यधिक मैले हैं, फिर से निर्गमित नहीं करेगा ।
28. खोए गए, चोरी किए गए, विकृत या अपूर्ण नोटों का प्रत्युद्धरण- *** किसी अधिनियमिति या विधि-नियम में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी कोई व्यक्ति केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक से भारत सरकार के किसी खोए हुए, चोरी किए गए, विकृत या अपूर्ण करेन्सी-नोट का मूल्य अधिकारेण प्रत्युद्धृत करने का हकदार नहीं होगा :
परन्तु रिजर्व बैंक [केन्द्रीय सरकार] की पूर्व मंजूरी से वे परिस्थितियां जिनमें और वे शर्तें और परिसीमाएं विहित कर सकेगा, जिनके अधीन, ऐसे करेन्सी-नोटों या बैंक-नोटों का मूल्य अनुग्रह स्वरूप प्रतिदत्त किया जा सकेगा, और इस परन्तुक के अधीन बनाए गए नियम *** [संसद्] के पटल पर रखे जाएंगे ।
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[28क. कुछ दशाओं में विशेष बैंक-नोटों और एक रुपए के विशेष नोटों का निर्गमन-(1) भारत के बाहर बैंक-नोटों के परिचालन को नियंत्रित करने के प्रयोजन के लिए रिजर्व बैंक, इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध में किसी बात के होते हुए भी, पांच रुपए, दस रुपए और एक सौ रुपए के अंकित मूल्यों वाले ऐसे डिजाइन, रूप और सामग्री के, जो उपधारा (3) के अधीन अनुमोदित की जाए, बैंक-नोट (जिन्हें एतत्पश्चात् इस धारा में विशेष बैंक-नोट कहा गया है) निर्गमित कर सकेगा ।
(2) भारत के बाहर सरकार के एक रुपए के नोटों के परिचालन को नियंत्रित करने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध में या करेन्सी अध्यादेश, 1940 (1940 का अध्यादेश सं० 4) में किसी बात के होते हुए भी, एक रुपए के अंकित मूल्य वाले ऐसे डिजाइन, रूप और सामग्री के, जो उपधारा (3) के अधीन अनुमोदित की जाए, भारत सरकार के नोट (जिन्हें एतत्पश्चात् इस धारा में एक रुपए का विशेष नोट कहा गया है) निर्गमित कर सकेगी ।
(3) विशेष बैंक-नोटों का डिजाइन, रूप और सामग्री ऐसी होगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उन सिफारिशों पर, जो गवर्नर द्वारा की गई है, विचार करने के पश्चात् अनुमोदित की जाए और एक रुपए के विशेष नोटों का डिजाइन, रूप और सामग्री ऐसे होगी जिसे अपनाना केन्द्रीय सरकार ठीक समझे ।
(4) न तो विशेष बैंक-नोट और न एक रुपए के विशेष नोट ही भारत में वैद्य निविदा होंगे ।
(5) एक रुपए के विशेष नोट के बारे में यह समझा जाएगा कि वह धारा 39 के सिवाय इस अधिनियम के सब प्रयोजनों के लिए “रुपए का सिक्का" पद के अन्तर्गत है किन्तु यह न समझ जाएगा कि वह इस अधिनियम के प्रयोजनों में से किसी के लिए करेन्सी नोट है ।
(6) जहां विशेष बैंक-नोट में उसका किसी विनिर्दिष्ट कार्यालय या रिजर्व बैंक की शाखा में देय होना अभिव्यक्त है वहां धारा 39 द्वारा अधिरोपित बाध्यता केवल उस विनिर्दिष्ट कार्यालय या शाखा पर होगी किन्तु ऐसे विनियमों के अधीन रहते हुए ही होगी जो इस धारा के अधीन बनाए जाएं ।
(7) इस धारा के उपबंधों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए जिन विषयों के लिए उपबन्ध करना आवश्यक या सुविधापूर्ण है उन सब विषयों के लिए और विशिष्टतया उस रीति के लिए जिससे और उन शर्तों और परिसीमाओं के लिए जिनके अधीन रहते हुए-
(i) भारत के बाहर किसी देश में परिचालित बैंक-नोटों और एक रुपए के नोटों को इस धारा के अधीन निर्गमित विशेष नोटों से बदला जा सकेगा;
(ii) किन्हीं ऐसे विशेष नोटों को किन्हीं अन्य बैंक-नोटों या एक रुपए के नोटों से बदला जा सकेगा; उपबन्ध करने के लिए विनियम, रिजर्व बैंक, केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से बना सकेगा ।]
29. बैंक-नोटों पर स्टाम्प-शुल्क से रिजर्व बैंक को छूट प्राप्त होगी-रिजर्व बैंक अपने द्वारा निर्गमित बैंक-नोटों पर *** भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 (1899 का 2) के अधीन कोई स्टाम्प शुल्क देने के दायित्वाधीन न होगा ।
30. केन्द्रीय बोर्ड को अतिष्ठित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि [केन्द्रीय सरकार] की राय में रिजर्व बैंक इस अधिनियम *** द्वारा या अधीन अपने ऊपर अधिरोपित बाध्यताओं के परिपालन में असफल रहा है तो [केन्द्रीय सरकार] भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा केन्द्रीय बोर्ड को अतिष्ठित करने की घोषणा कर सकेगी और तत्पश्चात् रिजर्व बैंक के कार्यों का साधारण अधीक्षण और संचालन उस अभिकरण को सौंपा जाएगा जिसे 2[केन्द्रीय सरकार] अवधारित करे और ऐसा अधिकरण ऐसी सब शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा और ऐसे कार्य तथा ऐसी बातें कर सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय बोर्ड द्वारा प्रयोक्तव्य हैं या की जा सकती हैं ।
(2) जब इस धारा के अधीन कार्यवाही की जाती है तब 2[केन्द्रीय सरकार] जिन परिस्थितियों के परिणामस्वरूप वह कार्यवाही करनी पड़ी है उन परिस्थितियों का और की गई उस कार्यवाही की एक पूर्ण रिपोर्ट यथाशक्य शीघ्र और किसी भी दशा में बोर्ड को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के निकाले जाने से तीन मास के अन्दर [संसद्] के समक्ष रखवाएगी ।
31. मांग पर देय विपत्रों या नोटों का निर्गमन- [(1)] रिजर्व बैंक से या इस अधिनियम द्वारा अभिव्यक्त रूप से यथाप्राधिकृत 2[केन्द्रीय सरकार] से भिन्न [भारत] में कोई व्यक्ति वाहक की मांग पर देय कोई विनिमयपत्र, हुण्डी, वचनपत्र या वचनबंध, जो धन देने के लिए हैं, न तो लिखेगा न प्रतिगृहीत करेगा और न निर्गमित करेगा और न वाहक को ऐसे किसी व्यक्ति की मांग पर देय पत्रों, हुंडियों या नोटों पर कोई राशि या धन न तो उधार लेगा, न उसके लिए देनदार रहेगा और न लेगा :
परन्तु हुंडियों सहित चैक या ड्राफ्ट, जो वाहक की मांग पर या अन्यथा देय हैं, किसी व्यक्ति के ऐसे खाते पर लिखे जा सकेंगे जो उसका किसी बैंककार, सर्राफ या अभिकर्ता के यहां है ।
[(2) पराक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) में किसी बात के होते हुए भी, रिजर्व बैंक से या इस अधिनियम द्वारा अभिव्यक्ततः यथाप्राधिकृत केन्द्रीय सरकार से भिन्न 7[भारत] में कोई व्यक्ति कोई ऐसा वचनपत्र, जिससे यह अभिव्यक्त है कि लिखत के वाहक को वह देय है, न तो लिखेगा न ही निर्गमित करेगा ।]
32. [शास्ति ।]-भारतीय रिजर्व बैंक (संशोधन) अधिनियम, 1974 (1974 का 51) की धारा 9 द्वारा निरसित ।
33. निर्गमन विभाग की आस्तियां-(1) निर्गमन विभाग की आस्तियां सोने के सिक्कों, सोने की सिल्लियों, [विदेशी प्रतिभूतियों], रुपए के सिक्कों और रुपयों वाली प्रतिभूतियों के रूप में इतनी कुल रकम होंगी जो निर्गमन विभाग के एतत्पश्चात् यथापरिनिश्चित दायित्वों के योग से कम नहीं है ।
[(2) आस्तियों के रूप में धारित सोने के सिक्कों, सोने की सिल्लियों और विदेशी प्रतिभूतियों का कुल मूल्य और इस प्रकार से धारित सोने के सिक्कों और सोने की सिल्लियों का कुल मूल्य किसी समय क्रमशः दो सौ करोड़ रुपए और एक सौ पन्द्रह करोड़ रुपए से कम नहीं होगा ।]
[(3) शेष आस्तियां रुपए के सिक्कों, कैसी ही परिपक्वता वाली भारत सरकार की रुपए वाली प्रतिभूतियों, राष्ट्रीय बैंक द्वारा धारा 17 की उपधारा (4ङ) के अधीन किसी उधार या अग्रिम के लिए लिखे गए वचनपत्रों और भारत में देय ऐसे विनिमयपत्रों और वचनपत्रों के रूप में धारण की जाएगी जो धारा 17 के खण्ड (2) के उपखण्ड (क) या उपखण्ड (ख) या उपखण्ड (खख) के अधीन या धारा 18 के खण्ड (1) के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा क्रय किए जाने योग्य हैं ।]
(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए सोने के सिक्के और सोने की सिल्लियों का मूल्य [तत्समय प्रचलित अंतरराष्ट्रीय बाजार कीमत से अनधिक कीमत परट रुपए के सिक्कों का मूल्य अपने अंकित मूल्य के अनुसार और प्रतिभूतियों का मूल्य तत्समय प्रचलित [बाजार की दरों से अनधिक दरों पर लगाया जाएगा ।]
(5) आस्तियों के रूप में धारित सोने के सिक्के और सोने की सिल्लियों में कम से कम सतरह बटा बीस [भारत] में धारण किया जाएगा और आस्तियों के रूप में धारित सब सोने के सिक्के और सब सोने की सिल्लियां रिजर्व बैंक या उसके अभिकरणों की अभिरक्षा में धारण किए जाएंगे :
परन्तु रिजर्व बैंक का जो सोना किसी अन्य बैंक में या किसी टकसाल या कोषागार में या अभिवहन में है उसकी गणना आस्तियों के भाग के रूप में की जा सकेगी ।
[(6) जो विदेशी प्रतिभूतियां आस्तियों के भाग के रूप में धारण की जा सकती हैं, इस धारा के प्रयोजन के लिए वे-
(i) किसी ऐसे विदेश के, जो अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा निधि का सदस्य हे, करेन्सी में देय निम्नलिखित प्रकार की प्रतिभूतियां होंगी, अर्थात् :-
(क) ऐसे बैंक के पास, जो उस विदेश का प्रधान करेंसी प्राधिकारी है, जमा अतिशेष और विदेशी करेंसी में कोई अन्य अतिशेष या प्रतिभूतियां, जो अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा निधि, अन्तरराष्ट्रीय पुनर्निर्माण और विकास बैंक, अन्तरराष्ट्रीय विकास संगम या अन्तरराष्ट्रीय वित्त निगम [या एशियाई विकास बैंक] या अन्तरराष्ट्रीय समाशोधन बैंक या इस निमित्त [केन्द्रीय सरकार द्वारा [अनुमोदित] किसी बैंककारी या वित्तीय संस्थाट द्वारा रखी जाती हो या पुरोधृत की जाती हो, परन्तु यह तब जब वे [दस वर्ष की कालावधि] के भीतर प्रतिदेय हों;
(ख) दो या दो से अधिक मान्य हस्ताक्षरों वाले और उस विदेश में किसी स्थान पर लिखे गए और देय नब्बे दिन से अनधिक परिपक्वता वाले विनिमयपत्र; और
(ग) [दस वर्षों के भीतर] परिपक्व होने वाली उस विदेश की सरकारी प्रतिभूतियां;
(ii) रकम निकालने का कोई अधिकार जिसका दायित्व अन्तराष्ट्रीय मुद्रा निधि पर है ।
34. निर्गमन विभाग के दायित्व-(1) निर्गमन विभाग के दायित्व वह रकम होगी जो भारत सरकार के उन करेन्सी नोटों और उन बैंक नोटों की कुल रकम के बराबर है जो तत्समय परिचालन में है ।
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35. [प्रारंभिक आस्तियां और दायित्व ।]-1948 के अधिनियम सं० 62 की धारा 7 तथा अनुसूची द्वारा (1-1-1949 से) निरसित ।
36. [रुपए के सिक्के की आस्तियों के उतार-चढ़ाव के बारे में व्यौहार के ढंग ।]-1963 के अधिनियम सं० 55 की धारा 3 द्वारा (1-2-1964 से) निरसित ।
[37. विदेशी प्रतिभूति विषयक आस्तियों सम्बन्धी अपेक्षाओं का निलंबन-पूर्वगामी उपबन्धों में किसी बात के होते हुए भी रिजर्व बैंक धारा 33 की उपधारा (2) से अपेक्षित मूल्य से कम रकम की विदेशी प्रतिभूतियां केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से प्रथमतः छह मास से अधिक की कालावधि के लिए, जो कालावधि वैसी ही मंजूरी से समय-समय पर एक बार में तीन मास से अनधिक की कालावधि तक बढ़ाई जा सकेगी, आस्तियों के रूप में धारण कर सकेगा ।
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38. रुपए के सिक्के की बाबत सरकार और रिजर्व बैंक की बाध्यताएं- [केन्द्रीय सरकार] रिजर्व बैंक के माध्यम द्वारा ही *** कोई रुपया परिचालित करने के सिवाय परिचालित *** न करने के लिए वचनबद्ध होगी और रिजर्व बैंक इसके लिए वचनबद्ध होगा कि रुपए का सिक्का वह परिचालन के प्रयोजनों के लिए व्ययनित करने के सिवाय अन्यथा व्ययनित न करेगा 14*** ।
39. विभिन्न प्रकार की करेन्सी देने की बाध्यता-(1) रिजर्व बैंक मांग किए जाने पर बैंक-नोटों और भारत सरकार के करेन्सी नोटों के विनिमय में रुपए के सिक्के देगा और जो सिक्का [सिक्का-निर्माण अधिनियम, 2011 (2011 का 11)ट के अधीन वैध निविदा है उसके विनिमय में मांग किए जाने पर करेन्सी नोट या बैंक-नोट देगा ।
(2) रिजर्व बैंक [दो] रुपए या उससे ऊपर के करेन्सी नोटों या बैंक-नोटों के विनिमय में कम मूल्य के बैंक-नोट या करेन्सी नोट या ऐसे अन्य सिक्के, जो 1[सिक्का-निर्माण अधिनियम, 2011 (2011 का 11) के अधीन वैध निविदा हैं, इतनी मात्रा में देगा जितनी रिजर्व बैंक की राय में परिचालन के लिए आवश्यक है, और [केन्द्रीय सरकार] रिजर्व बैंक को ऐसे सिक्के उसके लिए मांग होने पर देगी । यदि 3[केन्द्रीय सरकार] किसी समय ऐसे सिक्के देने में असफल रहती है तो रिवर्ज बैंक जनता को उन्हें देने की अपनी बाध्यता से मुक्त हो जाएगा ।
[40. विदेशी मुद्रा में संव्यवहार-रिजर्व बैंक किसी ऐसे प्राधिकृत व्यक्ति को या से, जो मुम्बई, कलकत्ता, दिल्ली या मद्रास के उसके कार्यालय में [या उसकी ऐसी शाखाओं में, जैसी केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा अवधारित करे,] इसकी बाबत मांग करता है, विनिमय की ऐसी दरों पर और ऐसी शर्तों पर, जो केन्द्रीय सरकार जहां तक विनिमय दरों का सम्बन्ध है अन्तरराष्ट्रीय मुद्रा निधि की अपनी बाध्यताओं को ध्यान में रखते हुए समय-समय पर साधारण या विशेष आदेश द्वारा अवधारित करे, विदेशी मुद्रा का क्रय या विक्रय करेगा :
परन्तु कोई व्यक्ति दो लाख रुपए से कम मूल्य की विदेशी मु्द्रा का क्रय या विक्रय करने की मांग करने का हकदार नहीं होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में प्राधिकृत व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो [विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) द्वारा या अधीन, यथास्थिति, ऐसी विदेशी मुद्रा, जिससे उसकी मांग सम्बद्ध है, क्रय या विक्रय करने का हकदार है ।]
41क. [भारत और बर्मा के बीच प्रेषण संबंधी उपबंध की बाध्यता ।]-1947 के अधिनियम संख्यांक 11 की धारा 22 द्वारा (1-4-1947 से) निरसित ।
42. अनुसूचित बैंकों की नकद आरक्षितियों का रिजर्व बैंक में रखा जाना- [(1) द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित हर बैंक, रिजर्व बैंक में एक औसत दैनिक अतिशेष रखेगा जिसकी रकम [उस बैंक के, उपधारा (2) में निर्दिष्ट विवरणी में यथादर्शित भारत में मांग और कालिक दायित्वों के योग के ऐसे प्रतिशत से जिसे बैंक, समय-समय पर देश में आर्थिक स्थिरता को सुनिश्चित करने की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए, भारत के राजपत्र में अधिसूचित करे, कम नहीं होगी ।]
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स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) “औसत दैनिक अतिशेष" से उन अतिशेषों का औसत अभिप्रेत है जो [पक्ष के] प्रत्येक दिन काम-काज बन्द होने पर धारित हैं;
[(ख) “पक्ष" से शनिवार से आगामी द्वितीय शुक्रवार तक की कालावधि, जिसके अंतर्गत ये दोनों दिन हैं, अभिप्रेत है;]
[(ग) “दायित्वों" के अन्तर्गत निम्नलिखित नहीं हैं :-
(i) बैंक की समादत्त पूंजी या आरक्षितियां अथवा लाभ हानि खाते में कोई नकदी अतिशेष;
(ii) रिजर्व बैंक से *** [अथवा निआ बैंक से] [अथवा पुनर्निर्माण बैंक से] [अथवा राष्ट्रीय आवास बैंक सेट [अथवा लघु उद्योग बैंक से] अथवा [राष्ट्रीय बैंक] *** से ली गई उधार की कोई रकम, तथा
(iii) राज्य सहकारी बैंक की दशा में, ऐसे बैंक द्वारा राज्य सरकार से [या राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम अधिनियम, 1962 (1962 का 26) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय सहकारी विकास निगम से] लिया गया कोई उधार भी तथा आरक्षित निधि के रूप में धन का ऐसे बैंक में निक्षेप अथवा उसका कोई भाग जो उस बैंक के कार्यक्षेत्र में स्थित किसी सोसाइटी द्वारा उस बैंक में रखा गया है;
[(iv) किसी ऐसे राज्य सहकारी बैंक की दशा में, जिसमें अपने पास रखे गए किसी अतिशेष के आधार पर कोई अग्रिम दिया है, उतना अतिशेष जितना ऐसी अग्रिम रकम की बाबत बकाया हो;]
1[(v) किसी प्रादेशिक ग्रामीण बैंक की दशा में, ऐसे बैंक द्वारा अपने प्रायोजक बैंक से लिया गया कोई उधार भी ।]
2[(घ) निम्नलिखित बैंकों और संस्थाओं के प्रति किसी ऐसे अनुसूचित बैंक के, जो राज्य सहकारी बैंक नहीं हैं, कुल दायित्वों" में से उन अनुसूचित बैंक के प्रति ऐसे सभी बैंकों और संस्थाओं के कुल दायित्वों को घटा दिया जाएगा, अर्थात् :-
(i) स्टेट बैंक;
(ii) भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) की धारा 2 में यथापरिभाषित समनुषंगी बैंक;
(iii) बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों और अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 द्वारा गठित तत्स्थानी नया बैंक;
1[(iiiक) बैंककारी कंपनी (उपक्रमों और अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 द्वारा गठित तत्स्थानी नया बैंक;]
(iv) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 खंड (ग) में यथापरिभाषित बैंककारी कम्पनी;
(v) सहकारी बैंक; या
(vi) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित कोई अन्य वित्तीय संस्था;
(ङ) निम्नलिखित बैंकों और संस्थाओं के प्रति किसी ऐसे अनुसूचित बैंक के, जो राज्य सहकारी बैंक है, कुल “दायित्वों" में से राज्य सहकारी बैंक के प्रति ऐसे सभी बैंकों और संस्थाओं के कुल दायित्वों को घटा दिया जाएगा, अर्थात् :-
(i) स्टेट बैंक,
(ii) भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) की धारा 2 में यथापरिभाषित समनुषंगी बैंक,
(iii) बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 द्वारा गठित तत्स्थानी नया बैंक,
1[(iiiक) बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 द्वारा गठित तत्स्थानी नया बैंक,ट
(iv) बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खंड (ग) में यथापरिभाषित बैंककारी कम्पनी,
(v) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित कोई अन्य वित्तीय संस्था ।]
(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी रिजर्व बैंक भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगा कि प्रत्येक अनुसूचित बैंक ऐसी तारीख से, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की गई हो, उपधारा (1) के द्वारा या अधीन विहित अतिशेष के अतिरिक्त रिजर्व बैंक के पास ऐसा अतिरिक्त औसत दैनिक अतिशेष रखेगा जिसकी रकम [अधिसूचना में विनिर्दिष्ट दरों से कम नहीं होगी, ऐसा अतिरिक्त अतिशेष उस आधिक्य के प्रति निर्देश से संगणित किए जाएगा जो बैंक के उन मांग और कालिक दायित्वों का,] जो उपधारा (2) में निर्दिष्ट विवरणी में दर्शित हैं, ऐसी विवरणी में दर्शित उस मांग और कालिक दायित्वों से है जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट तारीख को काम-काज बन्द होने के समय था किन्तु इस प्रकार कि अतिरिक्त अतिशेष किसी भी दशा में ऐसे आधिक्य से अधिक न होगा :
1[परन्तु रिजर्व बैंक, भारत के राजपत्र में किसी पृथक् अधिसूचना द्वारा, द्वितीय अनुसूची में तत्पश्चात् सम्मिलित किए गए किसी बैंक की बाबत भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।]
। । । । ।
[(1ग) रिजर्व बैंक, इस धारा के प्रयोजनों के लिए, किसी संव्यवहार या किसी वर्ग के संव्यवहारों के बारे में समय-समय पर यह विनिर्दिष्ट कर सकेगा कि ऐसे संव्यवहार या संव्यवहारों को भारत में किसी अनुसूचित बैंक का दायित्व माना जाएगा और यदि इस बाबात कोई प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या किसी संव्यवहार या किसी वर्ग के संव्यवहारों को इस धारा के प्रयोजनों के लिए भारत में किसी अनुसूचित बैंक का दायित्व माना जाए तो उस पर रिजर्व बैंक का विनिश्चय अन्तिम होगा ।]
[(2) प्रत्येक अनुसूचित बैंक-
(क) मांग और कालिक दायित्वों की रकम और भारत में बैंकों से लिए गए अपने उधार की रकम को [मांग और कालिक दायित्वों में वर्गीकृत करते हुए];
। । । । । । ।
(ख) अपने द्वारा भारत में धारित उन नोटों और सिक्कों की जो वैध निविदा है कुल रकम;
(ग) अपने द्वारा भारत में रिजर्व बैंक में धारित अतिशेष;
(घ) अपने द्वारा अन्य बैंकों में चालू खाते में धारित अतिशेष और भारत में मांग पर और अल्प-सूचना पर प्रतिदेय धन;
(ङ) केन्द्रीय और राज्य सरकार की प्रतिभूतियों में बही मूल्य के अनुसार विनिधान जिनमें खजाना बिल और खजाना निक्षेप रसीदें सम्मिलित होंगी;
(च) भारत में अग्रिमों की रकम;
(छ) भारत में क्रय और मितीकाटा लेकर भुगतान किए गए अन्तर्देशीय-पत्र और [क्रय और मितीकाटा लेकर भुगतान किए गए विदेशी विनिमयपत्र],
दर्शित करने वाली ऐसी विवरणी, जो ऐसे बैंक के दो उत्तरदायी अधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित होगी, [प्रत्येक दूसरे शुक्रवार को काम-काज बन्द होने पर रिजर्व बैंक के पास भेजेगा और ऐसी प्रत्येक विवरणी उस तारीख से पांच दिन के भीतर भेजी जाएगी जिससे वह समबद्ध है] :
[परन्तु बैंक पूर्वगामी खंडों में विनिर्दिष्ट किसी विशिष्टि को, भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, हटा सकेगा या उसमें उपान्तर कर सकेगा या उसमें कुछ जोड़ सकेगा :
परन्तु यह और किट जहां परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) के अधीन शुक्रवार [ऐसा दूसरा शुक्रवारट किसी अनुसूचित बैंक के एक या एक से अधिक कार्यालयों के लिए लोक अवकाश दिन है वहां विवरणी में ऐसे कार्यालय या कार्यालयों की बाबत पूर्ववर्ती काम वाले दिन के अंक दिए जाएंगे किन्तु ऐसा होने पर भी वह उस शुक्रवार से सम्बद्ध समझी जाएगी :
[परन्तु यह और भी कि जहां रिजर्व बैंक का यह समाधान हो जाता है कि किसी अनुसूचित बैंक की दशा में ऐसे बैंक या उसकी शाखाओं की भौगोलिक स्थिति के कारण इस उपधारा के अधीन पाक्षिक विवरणी देना असाध्य है वहां रिजर्व बैंक ऐसे बैंक को यह अनुज्ञा दे सकेगा कि वह बैंक,-
(i) उपरोक्त कालावधि के भीतर उस पक्ष की अनन्तिम विवरणी दे, जिसके बाद उस तारीख से जिससे वह संबद्ध है, बीस दिन के भीतर एक अन्तिम विवरणी दी जाएगी, या
(ii) पाक्षिक विवरणी के बदले मासिक विवरणी दे, जो उस मास के, जिससे वह संबद्ध है, समाप्त होने के पश्चात् बीस दिन के भीतर और मास के लिए काम-काज बन्द होने के समय तक ऐसे बैंक के बारे में ऐसे ब्यौंरे देकर भेजी जाएगी, जो इस उपधारा में विनिर्दिष्ट है ।]
9[(2क) जहां किसी मास का अन्तिम शुक्रवार उपधारा (2) के प्रयोजन के लिए दूसरा शुक्रवार नहीं है, वहां प्रत्येक अनुसूचित बैंक ऐसे अन्तिम शुक्रवार को काम-काज के बंद के समय तक या जहां ऐसा अन्तिम शुक्रवार परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 (1881 का 26) के अधीन लोक अवकाश दिन है वहां पूर्ववर्ती काम वाले दिन काम-काज के बन्द होने के समय तक उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट ब्यौंरे देते हुए, विशेष विवरणी रिजर्व बैंक को भेजेगा और ऐसी विवरणी उस तारीख के पश्चात् जिससे वह संबद्ध है, सात दिन के भीतर भेजी जाएगी ।]
[(3) यदि किसी अनुसूचित बैंक द्वारा किसी [पक्ष] में रिजर्व बैंक में धारित औसत दैनिक अतिशेष उपधारा (1) या उपधारा (1क) के द्वारा या अधीन विहित न्यूनतम से कम है तो ऐसा अनुसूचित बैंक उस 2[पक्ष] की बाबत रिजर्व बैंक को, उस रकम पर, जिससे रिजर्व बैंक के पास जमा ऐसा अतिशेष विहित न्यूनतम से कम है, बैंक दर से तीन प्रतिशत अधिक दर पर, दांडिक ब्याज चुकाने के दायित्वाधीन होगा और यदि आगामी 2[पक्ष] में भी ऐसा औसत दैनिक अतिशेष विहित न्यूनतम से कम रहता है तो उस रकम पर, जिससे रिजर्व बैंक में जमा ऐसा अतिशेष विहित न्यूनतम से कम है, दांडिक ब्याज की दरें बढ़ा कर उस 2[पक्ष] की और प्रत्येक पश्चात्वर्ती 2[पक्ष] की, जिसके दौरान में व्यतिक्रम होता रहता है, बैंक दर से पांच प्रतिशत अधिक दर दी जाएंगी ।]
[(3क) किसी अनुसूचित बैंक द्वारा उपधारा (3) के उपबन्धों के अधीन बैंक दर से पांच प्रतिशत अधिक की बढ़ी हुई दर के अनुसार दंडिक ब्याज देय हो गया है [और तत्पश्चात् यदि आगामीट 2[पक्षट के दौरान भी रिजर्व बैंक में धारित औसत दैनिक अतिशेष विहित न्यूनतम से कम है, तो-
(क) अनुसूचित बैंक का प्रत्येक निदेशक, प्रबन्धक या सचिव, जो जानते हुए और जानबूझकर व्यतिक्रम का पक्षकार है, जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा और ऐसे अतिरिक्त जुर्माने से, जो उसके पश्चात्वर्ती प्रत्येक 2[पक्षट के लिए, जिसमें व्यतिक्रम बना रहता है, पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा, और
(ख) रिजर्व बैंक उस अनुसूचित बैंक को उक्त 2[पक्ष] के पश्चात् कोई नया निक्षेप प्राप्त करने से प्रतिषिद्ध कर सकेगा,]
और यदि खंड (ख) में निर्दिष्ट प्रतिषेध का अनुपालन करने में उस अनुसूचित बैंक द्वारा व्यतिक्रम किया जाता है तो उस अनुसूचित बैंक का प्रत्येक निदेशक और अधिकारी, जो जानते हुए और जानबूझकर ऐसे व्यतिक्रम का पक्षकार है या जो उपेक्षा से या अन्यथा ऐसे व्यतिक्रम में सहायता देता है, ऐसे प्रत्येक व्यतिक्रम की बाबत जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा और ऐसे अतिरिक्त जुर्माने से, जो पहले दिन के पश्चात् ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसमें ऐसे प्रतिषेध के उल्लंघन में प्राप्त निक्षेप अनुसूचित बैंक द्वारा प्रतिधारित किया जाता है, पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में अधिकारी" के अंतर्गत *** प्रबन्धक, सचिव, शाखा प्रबन्धक और शाखा सचिव है ।]
(4) उपधारा (2) के उपबन्धों के अनुपालन में असफल रहने वाला प्रत्येक अनुसूचित बैंक ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसमें असफलता बनी रहती है, [रिजर्व बैंक कोट एक सौ रुपए की शास्ति देने के 6[दायित्वाधीन होगाट ।
[(5) (क) उपधारा (3) और (4) द्वारा अधिरोपित शास्तियां उस तारीख से चौदह दिन की कालावधि के अन्दर देय होंगी जिसको रिजर्व बैंक द्वारा निकाली गई उनके चुकाए जाने की मांग करने वाली सूचना की तामील अनुसूचित बैंक पर हुई है तथा अनुसूचित बैंक द्वारा ऐसी कालावधि के अन्दर उसके न दिए जाने पर उस क्षेत्र में, जहां व्यतिक्रम करने वाले बैंक का कोई कार्यालय स्थित है, अधिकारिता रखने वाले प्रधान सिविल न्यायालय के निदेश से, उद्गृहीत की जा सकेगी, ऐसा न्यायालय यह निदेश रिजर्व बैंक द्वारा तन्निमित्त किए गए आवेदन पर ही देगा;
(ख) जब न्यायालय खण्ड (क) के अधीन कोई निदेश देता है तो वह अनुसूचित बैंक द्वारा देय राशि को विनिर्दिष्ट करते हुए एक प्रमाणपत्र देगा और ऐसा हर प्रमाणपत्र उसी रीति से प्रवर्तनीय होगा मानो वह न्यायालय द्वारा किसी वाद में की गई डिक्री हो;
(ग) यदि रिजर्व बैंक का यह समाधान हो जाता है कि उपधारा (1), (1क) या (2) के उपबन्धों का अनुपालन करने में असफल रहने के लिए व्यतिक्रमी बैंक के पास पर्याप्त हेतुक था तो इस धारा में किसी बात के होते हुए भी वह, यथास्थिति, शास्तिक ब्याज या शास्ति के लिए मांग नहीं करेगा ।
[(6) एतत्पश्चात् यथा उपबन्धित को छोड़कर रिवर्ज बैंक भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा-
(क) किसी ऐसे बैंक का द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित किए जाने का निदेश करेगा जो पहले से उसमें सम्मिलित नहीं है और जो [भारत में] बैंककारी का कारबार करता है, और-
(i) जिसके पास पांच लाख रुपए से अन्यून के संकलित मूल्य की समादत्त पूंजी और आरक्षित निधियां हैं, और
(ii) जो रिजर्व बैंक का यह समाधान करा देता है कि उस बैंक के कार्यों का संचालन ऐसी रीति से नहीं किया जा रहा है जो उसमें रखने वालों के हितों के प्रतिकूल है, और
(iii) [जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में यथापरिभाषित [कम्पनी, राज्य सहकारी बैंक] या केन्द्रीय सरकार द्वारा तन्निमित्त अधिसूचित संस्था] या [भारत के बाहर] किसी स्थान में प्रवृत्त किसी विधि के द्वारा या अधीन कोई निगम या निगमित कम्पनी है;
(ख) किसी ऐसे अनुसूचित बैंक को उस अनुसूची से निकाले जाने का निदेश करेगा-
(i) जिसकी समादत्त पूंजी और आरक्षित निधियों का संकलित मूल्य किसी समय पांच लाख रुपए से कम हो जाता है, या
(ii) जिसकी बाबत रिजर्व बैंक की राय [बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10)ट की धारा 35 के अधीन निरीक्षण करने के पश्चात् यह है कि वह अपने कारबार का संचालन उसमें निक्षेप रखने वालों के हितों के लिए प्रतिकूल रीति में कर रहा है, या
(iii) जिसका परिसमापन हो जाता है या जो अन्यथा बैंककारी कारबार चलाना बन्द कर देता है :
परन्तु रिजर्व बैंक सम्बद्ध अनुसूचित बैंक के आवेदन पर और ऐसी शर्तों के अधीन यदि कोई हों, जो वह अधिरोपित करे, इतनी कालावधि के लिए, जितनी रिजर्व बैंक अनुसूचित बैंक को, यथास्थिति, अपनी समादत्त पूंजी और आरक्षित निधियों का संकलित मूल्य पांच लाख रुपए से अन्यून तक बढ़ाने या अपने कारबार के संचालन की त्रुटियों को दूर करने का अवसर देने के लिए युक्तियुक्त समझता हो, खंड (ख) के उपखंड (त्) या उपखण्ड (त्त्) के अधीन किसी निदेश का देना आस्थगित कर सकेगा;
(ग) अनुसूचित बैंक का अनुसूची में वर्णण जब कभी वह बैंक अपना नाम बदलता है तब बदल देगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में मूल्य" शब्द से वास्तविक या विनिमय मूल्य, न कि वह नामीय मूल्य जो संयुक्त बैंक की बाहियों में दर्शित किया गया है अभिप्रेत है और यदि किसी बैंक की समादत्त पूंजी या आरक्षित निधियों का संकलित मूल्य संगणित करने के संबंध में कोई विवाद पैदा होता है तो इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए रिजर्व बैंक द्वारा उसका अवधारण अंतिम होगा ।
[(6क) इस बात पर विचार करते समय कि राज्य सहकारी बैंक या प्रादेशिक ग्रामीण बैंक को दूसरी अनुसूची में सम्मिलित किया जाए या उसमें से निकाला जाए, बैंक, इस प्रश्न पर राष्ट्रीय बैंक के प्रमाणपत्र पर कार्य करने के लिए सक्षम होगा कि, यथास्थिति, राज्य सहकारी बैंक या प्रादेशिक ग्रामीण बैंक समादत्त पूंजी या आरक्षित निधियों के बारे में अपेक्षाओं को पूरा करते हैं या नहीं या क्या उनके कार्यों का संचालन ऐसी रीति से नहीं किया जा रहा है जो उनमें निक्षेपकर्ताओं के हितों के प्रतिकूल है ।]
[(7) रिजर्व बैंक किसी अनुसूचित बैंक को उसके सब कार्यालयों या किसी कार्यालय की बाबत या उसकी आस्तियों और दायित्वों में से सब या उसके किसी भाग की बाबत इस धारा के उपबन्धों से ऐसी छूट, जो वह ठीक समझे, ऐसी कालावधि के लिए और ऐसी शर्तों के अधीन, जो विनिर्दिष्ट की गई हों, दे सकेगा ।]
[43. रिजर्व बैंक द्वारा समेकित विवरण का प्रकाशन-रिजर्व बैंक प्रति [पक्ष] एक समेकित विवरण प्रकाशित कराएगा जिसमें सभी अनुसूचित बैंकों के कुल दायित्वों और आस्तियों को एक साथ दिखाया जाएगा जो इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन प्राप्त विवरणियों और जानकारी पर आधारित होगा ।]
[43क. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) रिजर्व बैंक या उसके अधिकारियों में से किसी के विरुद्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी ऐसी बात के लिए नहीं की जाएगी जो धारा 42 या धारा 43 के अनुसरण में [या अध्याय 3क के उपबंधों के अनुसरण में] सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित है ।]
(2) रिजर्व बैंक या उसके अधिकारियों में से किसी के विरुद्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी ऐसे नुकसान के लिए नहीं की जाएगी जो किसी ऐसी बात से हुआ है या जिसका किसी ऐसी बात से होना सम्भाव्य है जो धारा 42 या धारा 43 के अनुसरण में 10[या अध्याय 3क के उपबन्धों के अनुसरण में] सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित है ।
44. [सहकारी बैंकों से विवरणियों की अपेक्षा करने की शक्ति ।]-बैंककारी विधि सहकारी सोसाइटियों को लागू अधिनियम, 1965 (1965 का 23) की धारा 7 द्वारा (1-3-1966 से) निरसित ।
[45. अभिकर्ताओं की नियुक्ति-(1) जब तक किसी स्थान के प्रति निर्देश से केन्द्रीय सरकार द्वारा अन्यथा निदेश न दिया जाए बैंक लोक हित में, बैंककारी सुविधाओं, बैंककारी विकास और ऐसे अन्य तथ्यों को ध्यान में रखते हुए, जो उसकी राय में इस बारे में सुसंगत हैं राष्ट्रीय बैंक या स्टेट बैंक या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी किसी नए बैंक या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी किसी नए बैंक या भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथापरिभाषित किसी समनुषंगी बैंक को अपने अभिकर्ता के रूप में भारत में सभी स्थानों पर या किसी स्थान पर, ऐसे प्रयोजनों के लिए जो बैंक विनिर्दिष्ट करे, नियुक्ति कर सकेगा ।
(2) जहां किसी विधि या नियम, विनियम या विधि का बल रखने वाली किसी अन्य लिखत के अधीन बैंक में संदाय किए जाने के लिए अपेक्षित कोई संदाय या बैंक में परिदत्त किए जाने के लिए अपेक्षित कोई बिल या हुंडी या अन्य प्रतिभूति को बैंक की ओर से प्राप्त करने के लिए बैंक ने किसी बैंक को उपधारा (1) के अधीन अपने अभिकर्ता के रूप में नियुक्त किया है वहां उसका संदाय या परिदान बैंक के अभिकर्ता के रूप में इस प्रकार नियुक्त बैंक में किया जा सकेगा ।]
[अध्याय 3क
प्रत्यय विषयक जानकारी का संग्रहण और दिया जाना
45क. परिभाषाएं-इस अध्याय में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-
(क) “बैंककारी कम्पनी" से [बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10)ट की धारा 5 में यथा परिभाषित बैंककारी कम्पनी अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत [भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथापरिभाषित कोई समनुषंगी बैंक, बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 द्वारा गठित कोई तत्समान नया बैंक और इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित कोई अन्य वित्तीय संस्था भी है;]
(ख) “उधार लेने वाले" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे प्रत्यय की ऐसी कोई सीमा किसी बैंककारी कम्पनी द्वारा मंजूर की गई है, भले ही उसका प्रयोग किया गया हो या न किया गया हो और उसके अन्तर्गत निम्नलिखित हैं,-
(i) कम्पनी अथवा निगम की दशा में उसके समनुषंगी;
(ii) हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब की दशा में उसका कोई सदस्य अथवा कोई फर्म जिसमें ऐसा सदस्य भागीदार है;
(iii) फर्म की दशा में उसका कोई भागीदार अथवा कोई अन्य फर्म जिसमें ऐसा भागीदार एक भागीदार है; और
(iv) व्यष्टि की दशा में ऐसी कोई फर्म जिसमें ऐसा व्यष्टि भागीदार है;
(ग) “प्रत्यय विषयक जानकारी" से ऐसी कोई जानकारी अभिप्रेत है जो-
(i) ऐसे उधारों या अग्रिमों तथा अन्य प्रत्यय सुविधाओं के स्वरूप की है जो बैंककारी कम्पनी द्वारा किसी उधार लेने वाले या उधार लेने वालों के वर्ग को दी गई है;
(ii) किसी उधार लेने वाले [या उधार लेने वालों के वर्ग] से उन उधार सुविधाओं के लिए, 4[जो उसे या उस वर्ग को दी गई है,] ली गई प्रतिभूति के स्वरूप से सम्बद्ध है;
(त्त्त्) उस प्रत्याभूति के सम्बन्ध में है जो बैंककारी कम्पनी ने अपने व्यवहारियों में से किसी के लिए या अपने व्यवहारियों के किसी वर्ग के लिए दी है;
5[(iv) किसी उधार लेने वाले या उधार लेने वालों के किसी वर्ग के साधनों, पूर्ववृत्त, वित्तीय संव्यवहारों के इतिहास और उसकी साख के सम्बन्ध में है;
(v) किसी ऐसी अन्य जानकारी के सम्बन्ध में है, जिसे रिजर्व बैंक उधार या उधार नीति को और अधिक व्यवस्थित ढंग से विनियमित करने के लिए सुसंगत समझे ।]
45ख. प्रत्यय विषयक जानकारी संगृहीत करने की रिजर्व बैंक की शक्ति-रिजर्व बैंक-
(क) बैंककारी कम्पनियों से प्रत्यय विषयक जानकारी, ऐसी रीति से संगृहीत कर सकेगा जो वह ठीक समझे, और
(ख) धारा 45घ के उपबन्धों के अनुसार किसी बैंककारी कम्पनी को ऐसी जानकारी दे सकेगा ।
45ग. प्रत्यय विषयक जानकारी संगृहीत करने वाली विवरणियां मांगने की शक्ति-(1) रिजर्व बैंक, अपने को इस अध्याय के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के लिए समर्थ करने के प्रयोजन से किसी समय किसी बैंककारी कम्पनी को यह निदेश दे सकेगा कि वह कम्पनी प्रत्यय विषयक जानकारी से सम्बन्धित ऐसे कथन ऐसे प्ररूप में और इतने समय के अन्दर जो रिजर्व बैंक द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किया जाए, रिजर्व बैंक के सामने रखे ।
(2) बैंककारी कम्पनी किसी तत्समय प्रवृत्त विधि में अथवा उसके गठन का विनियमन करने वाली किसी लिखत में अथवा उसके द्वारा निष्पादित किसी करार में तत्प्रतिकूल ऐसी किसी बात के होते हुए भी, जो अपने व्यवहारियों से होने वाली अपने व्यवहारों की गोपनीयता बनाए रखने से सम्बन्धित है, ऐसे किसी आदेश का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगी जो उपधारा (1) के अधीन निकाला गया हो ।
45घ. प्रत्यय विषयक जानकारी बैंककारी कंपनी को देने की प्रक्रिया-(1) बैंककारी कम्पनी ऐसे किसी वित्तीय ठहराव के सम्बन्ध में, जो किसी व्यक्ति के साथ उसके द्वारा किया गया है या किए जाने के लिए प्रस्थापित है, रिजर्व बैंक से ऐसे प्ररूप में, जैसा रिजर्व बैंक विनिर्दिष्ट करे उससे वह अनुरोध करते हुए आवेदन कर सकेगी कि आवेदक को ऐसी प्रत्यय विषयक जानकारी दी जाए जैसी आवेदन में विनिर्दिष्ट की गई हो ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन की प्राप्ति पर रिजर्व बैंक यथाशक्य शीघ्र उन विषयों से जो आवेदन में विनिर्दिष्ट हैं, सम्बन्धित ऐसी प्रत्यय विषयक जानकारी, जो उसके पास हो, आवेदक को देगा :
परन्तु ऐसे दी गई जानकारी में उन बैंककारी कम्पनियों के नाम प्रकट न किए जाएंगे जिन्होंने रिजर्व बैंक को ऐसी जानकारी दी है ।
(3) रिजर्व बैंक हर आवेदन के विषय में पच्चीस रुपए से अनधिक ऐसी फीस उद्गृहीत कर सकेगा जो वह प्रत्यय विषयक जानकारी दिए जाने के लिए ठीक समझे ।
45ङ. जानकारी के प्रकटन का प्रतिषेध-(1) ऐसे किसी कथन में, जो बैंककारी कंपनी द्वारा धारा 45ङ के अधीन दिया गया है, अन्तर्विष्ट अथवा रिजर्व बैंक द्वारा किसी बैंककारी कम्पनी को धारा 45घ के अधीन दी गई प्रत्यय विषयक जानकारी गोपनीय स्वरूप की मानी जाएगी, तथा इस अध्याय के प्रयोजनों के सिवाय न तो प्रकाशित की जाएगी और न अन्यथा प्रकट की जाएगी ।
(2) इस धारा की कोई बात निम्नलिखित को लागू न होगी-
(क) धारा 45ग के अधीन रिजर्व बैंक को दी गई किसी जानकारी का किसी बैंककारी कम्पनी द्वारा रिजर्व बैंक की पूर्व अनुज्ञा से प्रकटन;
(ख) ऐसी किसी जानकारी का, जो धारा 45ग के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा संगृहीत की गई है, रिजर्व बैंक द्वारा उस दशा में, जिसमें कि वह लोकहित में ऐसा करना आवश्यक समझता है, ऐसे समेकित प्ररूप में, जैसा वह ठीक समझे, किसी बैंककारी कम्पनी का नाम या उधार लेने वालों का नाम प्रकट किए बिना प्रकाशन;
[(ग) बैंककारों के बीच प्रचलित रूढ़िक पद्धति और प्रथा के अनुसार अथवा किसी अन्य विधि के अधीन अनुज्ञात या अपेक्षित रूप में, किसी बैंककारी कम्पनी या रिजर्व बैंक द्वारा किसी अन्य बैंककारी कम्पनी को कोई उधार विषयक जानकारी का प्रकटन या प्रकाशन :
परन्तु इस खंड के अधीन बैंककारी कंपनी द्वारा प्राप्त उधार विषयक किसी जानकारी को बैंककारों में प्रचलित रूढ़िक पद्धति और प्रथा के अनुसार अथवा किसी अन्य विधि के अधीन अनुज्ञा या अपेक्षित रूप में प्रकाशित किए जाने के सिवाय प्रकाशित नहीं किया जाएगा;
[(घ) प्रत्यय विषयक जानकारी कंपनी (विनियमन) अधिनियम, 2005 (2005 का 30) के अधीन किसी प्रत्यय विषयक सूचना का प्रकटन ।]
(3) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी कोई न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी न तो रिजर्व बैंक को और न किसी बैंककारी कम्पनी को ऐसे किसी कथन को पेश करने या उसका निरीक्षण करने के हेतु देने के लिए मजबूर करेगा जो उस बैंककारी कंपनी द्वारा धारा 45ग के अधीन दिया गया है और न अन्य ऐसी किसी प्रत्यय विषयक जानकारी को प्रकट करने के लिए मजबूर करेगा जो रिजर्व बैंक द्वारा उस बैंककारी कम्पनी को धारा 45घ के अधीन दी गई है ।
45च. प्रतिकर के कुछ दावों का वर्जित होना-किसी व्यक्ति को इस अध्याय के उपबन्धों में से किसी के प्रवर्तन के कारण हुई किसी हानि के लिए कोई प्रतिकर पाने का कोई भी अधिकार न तो संविदा से, और न अन्यथा प्राप्त होगा ।
45छ. [शास्तियां ।]-भारतीय रिजर्व बैंक (संशोधन) अधिनियम, 1974 (1974 का 51) की धारा 15 द्वारा निरसित ।
[अध्याय 3ख
निक्षेप प्राप्त करने वाली गैर-बैंककारी संस्थाओं से तथा वित्तीय संस्थाओं से सम्बन्धित उपबंध
45ज. अध्याय 3ख का कतिपय दशाओं में लागू न होना-इस अध्याय के उपबन्ध स्टेट बैंक को अथवा [बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10)] की धारा 5 में यथापरिभाषित बैंककारी कम्पनी को अथवा [उस अधिनियम की धारा 5 के खंड (घक) में यथापरिभाषित तत्स्थानी नए बैंक या भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) में यथापरिभाषित समनुषंगी बैंक का] अथवा [प्रादेशिक ग्रामीण बैंक या सहकारी बैंक या प्राथमिक कृषिक प्रत्यय सोसाइटी या प्राथमिक प्रत्यय सोसाइटी] को लागू न होंगे :
परन्तु इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि [तमिलनाडु इण्डस्ट्रीयल इनवेस्टमेंट कारपोरेशन लिमिटेड] बैंककारी कम्पनी नहीं है ।
45झ. परिभाषाएं-इस अध्याय में जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
[(क) “गैर-बैंककारी वित्तीय संस्था के कारबार" से खंड (ग) में निर्दिष्ट किसी वित्तीय संस्था के कारबार को चलाना अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत खंड (च) में निर्दिष्ट गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी का कारबार है;]
[(कक) “कम्पनी" से कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में यथापरिभाषित कम्पनी अभिप्रेत है और उस अधिनियम की धारा 591 के अर्थ के अन्दर विदेशी कंपनी उसके अन्तर्गत है;
(ख) “निगम" से वह निगम अभिप्रेत है जो किसी विधान-मण्डल के अधिनियम द्वारा निगमित किया गया है;
[(खख) “निक्षेप" के अन्तर्गत निक्षेप या उधार के रूप में या किसी अन्य रूप में धन की कोई प्राप्ति है और उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत वह सदैव से है किन्तु उसके अंतर्गत निम्नलिखित नहीं हैं-
(i) शेयर पूंजी के रूप में एकत्रित रकमें,
(ii) किसी फर्म के भागीदारों द्वारा पूंजी के रूप में अभिदत्त रकमें,
(iii) किसी अनुसूचित बैंक या किसी सहकारी बैंक या बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खंड (ग) में यथापरिभाषित किसी अन्य बैंककारी कंपनी से प्राप्त रकमें,
(iv) निम्नलिखित से प्राप्त कोई रकम,-
। । । । । ।
(ख) राज्य वित्तीय निगम,
(ग) भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 (1964 का 18) की धारा 6क में या उसके अधीन विनिर्दिष्ट वित्तीय संस्था, या
(घ) अन्य संस्था जो बैंक द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए;
(ध्) काम-काज के मामूली अनुक्रम में निम्नलिखित रूप में प्राप्त रकमें,-
(क) प्रतिभूति निक्षेप,
(ख) व्यवहारी निक्षेप,
(ग) अग्रिम धन, या
(घ) माल, सम्पत्ति या सेवाओं के लिए आदेशों पर अग्रिम;
(vi) सहकारी निकाय से सम्बन्धित ऐसी किसी अधिनियमिति के, जो किसी राज्य में उस समय प्रवृत्त है, अधीन रजिस्ट्रीकृत ऐसे किसी व्यष्टि या फर्म या व्यष्टियों के संगम से जो निगमित नहीं है, प्राप्त रकम; और
(vii) किसी चिट के संबंध में अभिदायों के रूप में प्राप्त रकम ।
स्पष्टीकरण-1 “चिट" का वही अर्थ है जो चिट फंड अधिनियम, 1982 (1982 का 40) की धारा 2 के खंड (ख) में है ।
स्पष्टीकरण-2 किसी संपत्ति (जंगम या स्थावर) के विक्रय पर विक्रेता द्वारा क्रेता को दिया गया कोई प्रत्यय इस खंड के प्रयोजनों के लिए निक्षेप नहीं समझा जाएगा;]
[(ग) “वित्तीय संस्था" से ऐसी कोई गैर-बैंककारी संस्था अभिप्रेत है जो निम्नलिखित किसी क्रियाकलाप को अपने कारबार के रूप में या अपने कारबार के भाग के रूप में करती है, अर्थात् :-
(i) अपने क्रियाकलाप से भिन्न किसी क्रियाकलाप का उधार या अग्रिम देकर या अन्यथा वित्तपोषण करना;
(ii) ऐसे शेयरों, स्टाक, बन्धपत्रों, डिबेंचरों या प्रतिभूतियों का, जो किसी सरकार या स्थानीय प्राधिकारी द्वारा निर्गमित हों या इसी प्रकार की अन्य विपण्य प्रतिभूतियों का अर्जन करना;
(iii) अवक्रय अधिनियम, 1972 (1972 का 26) की धारा 2 के खण्ड (ग) में यथापरिभाषित अवक्रय-करार के अधीन अवक्रेता को कोई माल भाड़े पर देना या उसका परिदान करना;
(iv) किसी भी प्रकार का बीमा-कारबार करना;
(v) किसी राज्य में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में यथापरिभाषित चिटों या कुरियों या उसी प्रकार के किसी कारबार के फौरमैन या अभिकर्ता के रूप में या किसी अन्य हैसियत से प्रबन्ध, संचालन या पर्यवेक्षण करना;
(vi) किसी प्रयोजन के लिए या किसी भी नाम से ज्ञात किसी स्कीम या ठहराव के अधीन अभिदायों के रूप में या यूनिटों के विक्रय द्वारा या अन्य लिखतों द्वारा या किसी अन्य रीति से एकमुश्त या अन्यथा, धनराशियों का संग्रहण करना और उन व्यक्तियों को जिनसे धनराशियां संगृहीत की गई हों या किसी अन्य व्यक्ति को नकद या वस्तु के रूप में पुरस्कार या दान देना या किसी अन्य रूप में धनराशियों का संवितरण करना;
[किंतु इसके अन्तर्गत ऐसी कोई संस्था नहीं है जो अपने मुख्य कारबार के रूप में,-
(क) कृषिक संक्रियाएं करती है; या
(कक) औद्योगिक क्रियाकलाप करती है; या
(ख) किसी माल (प्रतिभूतियों से भिन्न) का क्रय या विक्रय करती है या किन्हीं सेवाओं की व्यवस्था करती है; या
(ग) स्थावर सम्पत्ति का क्रय, सन्निर्माण या विक्रय इस प्रकार करती है कि संस्था की आय का कोई भी भाग ऐसे वित्तपोषण से व्युत्पन्न न हो जो अन्य व्यक्ति स्थावर सम्पत्ति के क्रय, सन्निर्माण या विक्रय के लिए करते हैं ।
[स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, औद्योगिक क्रियाकलाप" से कोई ऐसा क्रियाकलाप अभिप्रेत है जो भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 (1964 का 18) की धारा 2 के खंड (ग) के उपखंड (त्) से उपखंड (न्ध्त्त्त्) तक में विनिर्दिष्ट है;]
(घ) “फर्म" से भारतीय भागीदारी अधिनियम, 1932 (1932 का 9) में यथापरिभाषित फर्म अभिप्रेत है; ***
(ङ) “गैर बैंककारी संस्था" से कम्पनी, निगम [या सहकारी सोसाइटीट अभिप्रेत है;
3[(च) “गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी" से अभिप्रेत है-
(i) कोई ऐसी वित्तीय संस्था, जो एक कंपनी है;
(ii) कोई ऐसी गैर-बैंककारी संस्था, जो एक कंपनी है और जिसका मुख्य काराबार किसी स्कीम या ठहराव के अधीन या किसी अन्य रीति से निक्षेप के प्रतिग्रहण करने या किसी रीति से उधार देने का है;
(iii) ऐसी अन्य गैर-बैंककारी संस्था या ऐसे वर्ग की संस्थाएं जिन्हें रिजर्व बैंक, केंद्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से और राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विर्निष्ट करे ।]
[45झक. रजिस्ट्रीकरण की अपेक्षा और शुद्ध स्वामित्वाधीन निधि-(1) इस अध्याय में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी किसी गैर-बैंककारी वित्तीय संस्था का कारबार-
(क) इस अध्याय के अधीन दिया गया रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र प्राप्त किए बिना; और
(ख) पच्चीस लाख रुपए की शुद्ध स्वामित्वाधीन निधि या दो करोड़ से अनधिक ऐसी अन्य रकम रखे बिना, जो रिजर्व बैंक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे,
प्रारंभ नहीं करेगी या नहीं चलाएगी ।
(2) प्रत्येक गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी रिजर्व बैंक को रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन ऐसे प्ररूप में, जो रिजर्व बैंक विनिर्दिष्ट करे, करेगी :
परन्तु ऐसी कोई गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी, जो भारतीय रिजर्व बैंक (संशोधन) अधिनियम, 1997 के प्रारंभ पर विद्यमान है ऐसे प्रारंभ से छह मास की समाप्ति से पहले रिजर्व बैंक को रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करेगी और उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, तब तक गैर-बैंककारी वित्तीय संस्था का कारबार करना चालू रख सकेगी जब तक रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र उसे नहीं दे दिया जाता या रजिस्ट्रीकरण के आवेदन के नामंजूर करने की संसूचना उसे नहीं दे दी जाती है ।
(3) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई गैर बैंककारी वित्तीय कंपनी जो भारतीय रिजर्व बैंक (संशोधन) अधिनियम, 1997 के प्रारंभ पर विद्यमान है और शुद्ध स्वामित्वाधीन निधि पच्चीस लाख रुपए से कम रखती है, ऐसी कंपनी को शुद्ध स्वामित्वाधीन निधि की अपेक्षा को पूरा करने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए गैर-बैंककारी वित्तीय संस्था का कारबार-
(i) ऐसे प्रारंभ से तीन वर्ष की अवधि के लिए; या
(ii) ऐसी अतिरिक्त अवधि के लिए जो रिजर्व बैंक ऐसा करने के लिए कारणों को लेखबद्ध करने के पश्चात्, बढ़ाए,
इस शर्त के अधीन चालू रख सकेगी कि ऐसी कंपनी, शुद्ध स्वामित्वाधीन निधि की अपेक्षा पूरा करने के तीन मास के भीतर ऐसी पूर्ति के बारे में रिजर्व बैंक को सूचित करेगी :
परन्तु इस उपधारा के अधीन कारबार चालू रखने के लिए अनुज्ञात अवधि, किसी भी दशा में, कुल मिलाकर छह वर्ष से अधिक नहीं होगी ।
(4) रिजर्व बैंक, रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन पर विचार करने के प्रयोजन के लिए गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी की बहियों के निरीक्षण द्वारा या अन्यथा यह समाधान करने की अपेक्षा कर सकेगा कि निम्नलिखित शर्तें पूरी कर दी गई हैं :-
(क) कि गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी अपने वर्तमान या भावी निक्षेपकर्ताओं को जब भी उनके दावे प्रोद्भूत हों पूर्ण संदाय करने की स्थिति में है या होगी;
(ख) कि गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के कार्यकलापों का संचालन ऐसी रीति में नहीं किया जा रहा है जा किए जाने की संभावना नहीं है जो उसके वर्तमान या भावी निक्षेपकर्ताओं के हित के लिए हानिकर हो;
(ग) कि गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के प्रबंध या प्रस्तावित प्रबंध का साधारण स्वरूप लोकहित या उसके निक्षेपकर्ताओं के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला नहीं होगा;
(घ) कि गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के पास पर्याप्त पूंजी-संरचना और उपार्जन की संभावनाएं हैं;
(ङ) कि गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को भारत में कारबार प्रारंभ करने या चलाने के लिए रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र देने से लोकहित की पूर्ति होगी;
(च) कि रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के दिए जाने से मुद्रा-स्थिरता, आर्थिक संवृद्धि से संगत और ऐसे अन्य सुसंगत कारणों पर विचार करते हुए जो रिजर्व बैंक, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, वित्तीय सेक्टर के प्रचालन और समेकन पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा; और
(छ) कि कोई अन्य शर्त, जिसका पूरा करना रिजर्व बैंक की राय में यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक होगा कि किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा भारत में कारबार प्रारंभ करना या उसे चलाना लोकहित या निक्षेपकर्ताओं के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला नहीं होगा ।
(5) रिजर्व बैंक, यह समाधान हो जाने के पश्चात् कि उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट शर्तें पूरी कर दी गई हैं, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ऐसी शर्तों के अधीन दे सकेगा, जो वह अधिरोपित करना ठीक समझे ।
(6) रिजर्व बैंक, इस धारा के अधीन किसी गैर बैंककारी वित्तीय कंपनी को दिया गया रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र रद्द कर सकेगा, यदि ऐसी कंपनी-
(i) भारत में गैर-बैंककारी वित्तीय संस्था का कारबार चलाना बंद कर देती है; या
(ii) ऐसी किसी शर्त का अनुपालन करने में असफल रहती है जिसके अधीन उसे रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र दिया गया था; या
(iii) उपधारा (4) के खंड (क) से खंड (छ) में विनिर्दिष्ट शर्तों में से किसी को पूरा करने में किसी भी समय असफल रहती है; या
(iv) (क) इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए किसी निदेश के अनुपालन में; या
(ख) किसी विधि की अपेक्षाओं या इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए किसी निदेश या आदेश के अनुसार लेखाओं को रखने में; या
(ग) अपनी लेखाबहियों और अन्य सुसंगत दस्तावेजों को निरीक्षण के लिए, जब रिजर्व बैंक के किसी निरीक्षण प्राधिकारी द्वारा ऐसी मांग की जाए तो, प्रस्तुत करने में,
असफल रहती है; या
(v) इस अध्याय के उपबंधों के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए किसी आदेश द्वारा निक्षेप स्वीकार करने से प्रतिषिद्ध की गई है और ऐसा आदेश कम से कम तीन मास की अवधि के लिए प्रवर्तन में रहा है :
परन्तु यह कि इस आधार पर रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को रद्द करने से पहले कि गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी खंड (ii) के उपबंधों का अनुपालन करने में असफल हो गई है या खंड (iii) में निर्दिष्ट शर्तों में से किसी को पूरा करने में असफल हो गई है तो रिजर्व बैंक, जब तक उसकी यह राय न हो कि रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को रद्द करने में विलंब लोकहित या निक्षेपकर्ताओं या गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला होगा, ऐसी कंपनी को, ऐसे निबंधनों पर, जो रिजर्व बैंक, ऐसे उपबंध का अनुपालन या ऐसी शर्त की पूर्ति कराने के लिए, आवश्यक कदम उठाने के लिए विनिर्दिष्ट करे, अवसर देगा :
परन्तु यह और कि रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के रद्द करने का कोई आदेश करने से पहले ऐसी कंपनी को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा ।
(7) रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन को खारिज करने या रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को रद्द करने के आदेश से व्यथित कोई कंपनी, केन्द्रीय सरकार को उस तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर, जिसको खारिज करने या रद्द करने का ऐसा आदेश उसे संसूचित किया जाता है, अपील कर सकेगी और जहां कोई अपील केन्द्रीय सरकार को की जाती है वहां उसका और जहां ऐसी कोई अपील नही की जाती है वहां रिजर्व बैंक का विनिश्चय अंतिम होगा :
परन्तु अपील के खारिज करने का कोई आदेश करने से पहले ऐसी कंपनी को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(I) शुद्ध स्वामित्वाधीन निधि" से-
(क) कंपनी के अंतिम तुलन-पत्र में प्रकटित रूप में समादत्त साधारण पूंजी और खुली आरक्षितियों का वह योग अभिप्रेत है जो उसमें से-
(i) हानि का संचित अतिशेष;
(ii) आस्थगित राजस्व व्यय; और
(iii) अन्य अमूत आस्तियों,
की कटौती करने के पश्चात्, और
(ख) इसके अतिरिक्त-
(1) ऐसी कंपनी के-
(i) उसकी समनुषंगियों;
(ii) उसी समूह की कंपनियों;
(iii) सभी अन्य गैर बैंककारी वित्तीय कपंनियों,
के अंशों में विनिधान; तथा
(2) ऐसे डिबेंचरों, बंधपत्रों, बकाया उधारों और अग्रिमों (जिनके अंतर्गत अवक्रय और पट्टा वित्त है) के, जो-
(i) ऐसी कंपनी की समनुषंगियों; और
(ii) उसी समूह की कंपनियों,
को दिए गए हैं या उनके पास निक्षिप्त किए गए हैं, बही मूल्य के रूप में रकमों को, उस सीमा तक जिस तक ऐसी रकमें ऊपर (क) के दस प्रतिशत से अधिक है,
और घटाकर आता है ।
(II) “समनुषंगियों" और उसी समूह की कपंनियों" का वही अर्थ है जो उनका कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में है ।
45झख. आस्तियों का प्रतिशत बनाए रखना-(1) प्रत्येक गैर बैंककारी वित्तीय कंपनी, ऐसी अविल्लंगमित अनुमोदित प्रतिभूतियों में, जिनका मूल्याकंन ऐसी कीमत पर किया गया हो जो ऐसी प्रतिभूतियों की चालू बाजार कीमत से अधिक न हो, उतनी रकम का भरत में विनिधान करेगी और विनिधान करती रहेगी जो किसी भी दिन कारबार बंद करने के समय, द्वितीय पूर्ववर्ती तिमाही के अंतिम कार्य दिवस को कारबार बंद करने के समय पर बकाया निक्षेपों के पांच प्रतिशत से कम न होगी या ऐसी उच्चतर प्रतिशत होगी जो पच्चीस प्रतिशत से अधिक नहीं होगी, जो रिजर्व बैंक, समय-समय पर, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे :
परन्तु रिजर्व बैंक, गैर बैंककारी वित्तीय कंपनियों के विभिन्न वर्गों की बाबत विनिधान के विभिन्न प्रतिशत विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
(2) इस धारा के उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए, रिजर्व बैंक, प्रत्येक गैर बैंककारी वित्तीय कंपनी से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह एक विवरणी ऐसे प्ररूप में, ऐसी रीति से और ऐसी अवधि के लिए जो रिजर्व बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, उसे दे ।
(3) यदि किसी गैर बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा किसी दिन कारबार बंद करने के समय पर विनिधान की गई रकम, उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट दर से कम हो जाती है तो ऐसी कंपनी, ऐसी कमी की बाबत, रिजर्व बैंक को, उस रकम पर जो वास्तव में विनिधान की गई रकम में विनिर्दिष्ट प्रतिशत से कम हो जाती है, रिजर्व बैंक की दर के ऊपर प्रतिवर्ष तीन प्रतिशत की दर से शास्तिक ब्याज का संदाय करने के दायित्वाधीन होगी और जहां ऐसी कमी पश्चात्वर्ती तिमाहियों में जारी रहती है वहां शास्तिक ब्याज की दर प्रत्येक पश्चात्वर्ती तिमाही के लिए ऐसी कमी पर रिजर्व बैंक की दर के ऊपर प्रतिवर्ष पांच प्रतिशत होगी ।
(4) (क) उपधारा (3) के अधीन संदेय शास्तिक ब्याज, उस तारीख से, जिसको उसके संदाय की मांग करने वाली रिजर्व बैंक द्वारा जारी की गई सूचना की गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी पर तामील की जाती है, चौदह दिन की अवधि के भीतर संदेय होगा और गैर- बैंककारी वित्तीय कंपनी ऐसी अवधि के भीतर उसका संदाय करने में असफल रहने की दशा में ऐसे प्रधान सिविल न्यायालय के निदेश द्वारा, जिसकी अधिकारिता उस क्षेत्र पर है जहां व्यतिक्रमी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी का कार्यालय स्थित है, शास्ति का उद्ग्रहण किया जा सकेगा और ऐसा निदेश रिजर्व बैंक द्वारा न्यायालय को इस निमित्त किए गए आवेदन पर ही दिया जाएगा, और
(ख) जब न्यायालय खंड (क) के अधीन निदेश देता है तो वह, गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा संदेय राशि को विनिर्दिष्ट करते हुए एक प्रमाणपत्र जारी करेगा और ऐसा प्रत्येक प्रमाणपत्र उसी रीति से प्रवर्तनीय होगा मानो वह न्यायालय द्वारा किसी बाद में की गई डिक्री हो ।
(5) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, यदि रिजर्व बैंक का यह समाधान हो जाता है कि व्यतिक्रमी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के पास उपधारा (1) के उपबंधों का अनुपालन करने में उसकी असफलता के लिए पर्याप्त कारण है तो वह शास्तिक ब्याज के संदाय की मांग नहीं भी कर सकता है ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए-
(i) “अनुमोदित प्रतिभूतियों" से अभिप्रेत हैं किसी राज्य सरकार की या केन्द्रीय सरकार की प्रतिभूतियां और ऐसे बंधपत्र, जिनके मूलधन और उन पर ब्याज दोनों, किसी ऐसी सरकार द्वारा पूर्णतः और बिना शर्त प्रत्याभूत किए गए हों;
(ii) “अविल्लंगमित अनुमोदित प्रतिभूतियों" के अंतर्गत ऐसी अनुमोदित प्रतिभूतियां हैं जो गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा किसी अन्य संस्था के पास अग्रिम या किसी अन्य ठहराव के लिए, उस सीमा तक जिस तक ऐसी प्रतिभूतियां किसी रीति से निकाली नहीं गई हैं या उनका उपयोग नहीं किया गया है या उन्हें विल्लंगमित नहीं किया जाता है, जमा की गई हैं;
(iii) “तिमाही" से मार्च, जून, सितंबर या दिसंबर के अंतिम दिन को समाप्त होने वाली तीन मास की अवधि अभिप्रेत है ।
45झग. आरक्षित निधि-(1) प्रत्येक गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी एक आरक्षित निधि का सृजन करेगी और उसमें प्रत्येक वर्ष अपने शुद्ध लाभ के बीस प्रतिशत से अन्यून ऐसी राशि का, जो लाभ और हानि लेखा में प्रकट की गई हो और कोई लाभांश घोषित किए जाने से पूर्व अंतरण करेगी ।
(2) आरक्षित निधि में से किसी राशि का कोई विनियोग गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा केवल उस प्रयोजन के लिए किया जाएगा जो रिजर्व बैंक द्वारा समय-समय पर, विनिर्दिष्ट किया जाए, अन्यथा नहीं और ऐसे प्रत्येक विनियोग की रिपोर्ट रिजर्व बैंक को ऐसे निकाले जाने को तारीख से इक्कीस दिन के भीतर की जाएगी :
परंतु रिजर्व बैंक किसी विशिष्ट मामले में और पर्याप्त हेतुक दर्शित किए जाने पर इक्कीस दिन की अवधि को ऐसी और अवधि तक, जो वह ठीक समझे, बढ़ा सकेगा या ऐसी रिपोर्ट करने में किसी विलंब को माफ कर सकेगा ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक की सिफारिश पर और किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी की, उसके निक्षेप दायित्वों के संबंध में, समादत्त पूंजी और आरक्षितियों की पर्याप्तता को ध्यान में रखते हुए, लिखित आदेश द्वारा, यह घोषित कर सकेगी कि उपधारा (1) के उपबंध, गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को, ऐसी अवधि के लिए जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, लागू नहीं होंगे :
परन्तु ऐसा कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक उपधारा (1) के अधीन आरक्षित निधि में रकम अंश प्रीमियम खाते में रकम सहित गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी की समादंत्त पूंजी से कम नहीं है ।
45ञ. धन के निक्षेप की याचना करने वाले प्रास्पेक्ट्स या विज्ञापन का रिजर्व बैंक द्वारा विनियमन या प्रतिषेध-यदि रिजर्व बैंक लोक हित में यह बात करना आवश्यक समझता है तो वह साधारण या विशेष आदेश द्वारा-
(क) जनता से धन के निक्षेपों की याचना करने वाले किसी प्रास्पेक्ट्स या विज्ञापन के किसी गैर-बैंककारी संस्था द्वारा निकाले जाने का विनियमन या प्रतिषेध कर सकेगा; तथा
(ख) वे शर्तें विनिर्दिष्ट कर सकेगा जिन पर कोई ऐसा प्रास्पेक्ट्स या विज्ञापन उस दशा में, जिसमें कि उसका निकाला जाना प्रतिषिद्ध नहीं किया गया है, निकाला जा सकेगा ।
[45ञक. नीति निर्धारित करने और निदेश जारी करने की रिजर्व बैंक की शक्ति-(1) यदि रिजर्व बैंक का यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में या देश की वित्तीय प्रणाली को उसके फायदे के लिए विनियमित करने के लिए या किसी गैर बैंककारी वित्तीय कंपनी के ऐसे कार्यकलापों को निर्धारित करने के लिए जिनका संचालन ऐसी रीति से किया जा रहा है जो निक्षेपकर्ताओं के हित के लिए हानिकर है या ऐसी रीति से किया जा रहा है जो गैर बैंककारी वित्तीय कंपनी के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है और ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह नीति का निर्धारण कर सकेगा और सभी गैर बैंककारी वित्तीय कंपनियों या उनमें से किसी को आय मान्यता, लेखा मानकों, डुबंत और शंकास्पद ऋणों के लिए समुचित उपबंध करने, आस्तियों के लिए जोखित भार पर आधारित पूंजी पर्याप्तता तथा इतर तुलन-पत्र मदों के लिए प्रत्यय संपरिवर्तन कारकों के संबंध में और, यथास्थिति, किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी या किसी वर्ग की गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनियों या साधारणतया गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनियों द्वारा निधियों के अभिनियोजन के संबंध में भी निदेश दे सकेगा और ऐसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनियां इस प्रकार अवधारित नीति और इस प्रकार जारी किए गए निर्देश का अनुसरण करने के लिए आबद्ध होंगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन निहित शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, रिजर्व बैंक, गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनियों को साधारणतया या किसी वर्ग की गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को अथवा किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को विशिष्टितया निम्नलिखित के बारे में निदेश दे सकेगा-
(क) वह प्रयोजन जिसके लिए अग्रिम या अन्य विधि आधारित या निधि इत्तर आधारित सौकर्य नहीं किया जा सकेगा; और
(ख) वह अधिकतम रकम जिसके अग्रिम या अन्य वित्तीय सौकर्य या शेयरों और अन्य प्रतिभूतियों के विनिधान जो, गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी की समादत्त पूंजी, आरक्षितियों और निक्षेपों को तथा अन्य सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए उस गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा किसी व्यक्ति या किसी कंपनी या कंपनियों के किसी समूह के लिए किए जा सकेंगे ।]
45ट. गैर-बैंककारी संस्थाओं से यह जानकारी संगृहीत करने की कि उनके यहां कितने निक्षेप हैं तथा उन्हें निर्देश देने की रिजर्व बैंक की शक्ति-(1) रिजर्व बैंक किसी समय यह निर्देश दे सकेगा कि हर गैर-बैंककारी संस्था उस गैर-बैंककारी संस्था द्वारा प्राप्त निक्षेपों से सम्बन्धित या संसक्त ऐसे कथन, ऐसी जानकारी या विशिष्टियां रिजर्व बैंक को ऐसे प्ररूप में, ऐसे अन्तरालों पर, और इतने समय के अन्दर दे, जो रिजर्व बैंक ने साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट की हो ।
(2) रिजर्व बैंक में उपधारा (1) के अधीन निहित शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यह है कि जो कथन, जानकारी या विशिष्टियां उपधारा (1) के अधीन दी जानी हैं वे निम्नलिखित सब मामलों से या उनमें से किसी से सम्बन्धित हो सकेंगी अर्थात् निक्षेपों की रकम, वे प्रयोजन और कालावधियां जिनके लिए तथा ब्याज की वे दरें और वे अन्य निबन्धन और शर्तें जिन पर वे प्राप्त की जाती हैं ।
(3) यदि रिजर्व बैंक लोकहित में यह बात करना आवश्यक समझता है तो निक्षेपों पर देय ब्याज की दरों सहित तथा उन कालावधियों सहित, जिनके लिए ऐसे निक्षेप प्राप्त किए जा सकेंगे, ऐसे निक्षेपों से सम्बन्धित या संसक्त किन्हीं बातों की बाबत निदेश वह गैर-बैंककारी संस्थाओं को साधारणतः अथवा किसी गैर-बैंककारी संस्था या गैर-बैंककारी संस्थाओं के समूह को विशिष्टितः दे सकेगा ।
(4) यदि कोई गैर-बैंककारी संस्था ऐसे किसी निदेश का अनुपालन करने में असफल रहती है, जो रिजर्व बैंक द्वारा उपधारा (3) के अधीन दिया गया है तो रिजर्व बैंक उस गैर-बैंककारी संस्था को निक्षेप लेने से प्रतिषिद्ध कर सकेगा ।
। । । । ।
(6) निक्षेप प्राप्त करने वाली हर गैर-बैंककारी संस्था रिजर्व बैंक द्वारा यह अपेक्षा की जाने पर तथा इतने समय के अन्दर जितना रिजर्व बैंक विनिर्दिष्ट करे उस रूप में, जिसमें कि वह उस वर्ष के अन्तिम दिन है जिससे लेखा सम्बन्धित है, अपने वार्षिक तुलनपत्र की तथा लाभ-हानि लेखा की या अन्य वार्षिक लेखा की एक प्रति अपने खर्चे पर हर ऐसे व्यक्ति को भिजवाएगी जिससे उसके पास उतनी राशि से अधिक के निक्षेप हैं जितनी रिजर्व बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट की गई हो ।
45ठ. वित्तीय संस्थाओं से जानकारी मांगने तथा निदेश देने की रिजर्व बैंक की शक्ति-(1) यदि रिजर्व बैंक का समाधान हो जाता है कि देश की प्रत्यय व्यवस्था को देश के लाभार्थ चलाने के लिए अपने को समर्थ करने के लिए यह बात करना आवश्यक है तो वह-
(क) साधारणतः वित्तीय संस्थाओं से या विशिष्टतः वित्तीय संस्थाओं के किसी समूह अथवा किसी वित्तीय संस्था से यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसी वित्तीय संस्थाओं या संस्था के कारबार से संबंधित ऐसे कथन, ऐसी जानकारी या ऐसी विशिष्टियां, ऐसे प्ररूप में, ऐसे अंतरालों पर और इतने समय के अन्दर वह रिजर्व बैंक को दे जैसा या जितना रिजर्व बैंक द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए;
(ख) साधारणतः ऐसी संस्थाओं को या विशिष्टतः किसी ऐसी संस्था को वित्तीय संस्थाओं या संस्था के रूप में अपने कारबार का संचालन करने के बारे में निर्देश दे सकेगा ।
(2) रिजर्व बैंक में उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन निहित शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना वे कथन, जानकारी या विशिष्टियां, जो वित्तीय संस्था द्वारा दी जानी हैं, निम्नलिखित सब बातों या उनमें से किन्ही से संबंधित हो सकेंगी अर्थात् समादत्त पूंजी, आरक्षितियां, या अन्य दायित्व, सरकारी प्रतिभूतियों में या अन्यथा किए गए विनिधान, वे व्यक्ति जिन्हें और वे प्रयोजन और कालावधियां जिससे या जिनके लिए वित्त दिया गया है तथा ब्याज की दर सहित वे निबन्धन और शर्तें, जिन पर वह दिया गया है ।
(3) किसी वित्तीय संस्था को उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन निदेश देने में रिजर्व बैंक उन स्थितियों का जिनमें और उन उद्देश्यों का जिनके लिए वह संस्था स्थापित की गई है, उसके कानूनजात उत्तरदायित्वों का, यदि कोई हों, और उस प्रभाव का, जो ऐसी वित्तीय संस्था के कारबार की मुद्रा और पूंजी बाजारों के रुख पर पड़ना संभाव्य है, सम्यक् ध्यान रखेगा ।
45ड. गैर-बैंककारी संस्थाओं का यह कर्तव्य कि रिजर्व बैंक द्वारा मांगे गए कथन आदि उसे दें-हर गैर-बैंककारी संस्था का यह कर्तव्य होगा कि वह इस अध्याय के उपबन्धों के अधीन मांगे गए कथन, जानकारी या विशिष्टियां दे और दिए गए किसी निदेश का अनुपालन करे ।
[45डक. लेखापरीक्षकों की शक्तियां और कर्तव्य-(1) किसी गैर-बैंककारी संस्था के प्रत्येक लेखापरीक्षक का यह कर्तव्य होगा कि वह यह जांच करे कि उस गैर-बैंककारी संस्था ने अपने द्वारा प्राप्त निक्षेपों से सम्बन्धित या संसक्त ऐसे विवरण, जानकारी या विशिष्टियां रिजर्व बैंक को दी हैं या नहीं जिनके दिए जाने की इस अध्याय के अधीन अपेक्षा की गई है और लेखापरीक्षक उस गैर-बैंककारी संस्था द्वारा धृत ऐसे निक्षेपों की कुल धनराशि की रिपोर्ट रिजर्व बैंक को भेजेगा किन्तु उस दशा में नहीं भेजेगा, जिसमें ऐसी जांच पर उसका यह समाधान हो गया हो कि उस गैर-बैंककारी संस्था ने ऐसे विवरण, जानकारी या विशिष्टियां दे दी हैं ।
[(1क) रिजर्व बैंक, यह समाधान हो जाने पर कि लोकहित में या निक्षेपकर्ताओं के हित में या लेखा बहियों के समुचित निर्धारण के प्रयोजन के लिए ऐसा करना आवश्यक है, किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी या किसी वर्ग की गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनियों को साधारणतया या गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को या ऐसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी या कम्पनियों के लेखापरीक्षकों को तुलनपत्र, लाभ और हानि लेखा, लेखा बहियों में दायित्वों के प्रकटीकरण या उससे संबंधित किसी बात की बाबत निदेश जारी कर सकेगा ।]
(2) जहां [किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी की दशा में] लेखापरीक्षक ने रिजर्व बैंक को उपधारा (1) के अधीन रिपोर्ट भेज दी है या उसका उसे भेजने का आशय है तो वह उस रिपोर्ट की अंतर्वस्तुओं को, जो उसने, रिजर्व बैंक को भेज दी हैं जिसे भेजने का उसका आशय है, कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 227 की उपधारा (2) के अधीन अपनी रिपोर्ट में सम्मिलित करेगा ।
[(3) जहां रिजर्व बैंक की यह राय है कि लोकहित में या गैर-बैंककारी वित्तीय कम्पनी के हित में या ऐसी कम्पनी के निक्षेपकर्ताओं के हित में ऐसा करना आवश्यक है, वहां पर किसी भी समय आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगा कि ऐसे किसी संव्यवहार या किसी वर्ग के संव्यवहारों के संबंध में या ऐसी अवधि अथवा अवधियों के लिए जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के लेखाओं की विशेष लेखापरीक्षा की जाएगी और रिजर्व बैंक, ऐसी विशेष लेखापरीक्षा करने के लिए लेखापरीक्षक या लेखापरीक्षकों को नियुक्त कर सकेगा और लेखापरीक्षक या लेखापरीक्षकों को उसे रिपोर्ट प्रस्तुत करने के लिए निदेश दे सकेगा ।
(4) लेखापरीक्षकों का पारिश्रमिक, जो रिजर्व बैंक द्वारा लेखापरीक्षा में अन्तर्वलित कार्य की प्रकृति और मात्रा को ध्यान में रखते हुए नियत किया जाए और लेखापरीक्षा के या उससे आनुषंगिक व्यय इस प्रकार लेखापरीक्षा की गई गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा वहन किए जांएगे ।]
[45डख. निक्षेप के प्रतिग्रहण और आस्तियों के अन्य संक्रामण का प्रतिषेध करने की रिजर्व बैंक की शक्ति-(1) यदि कोई गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी किसी धारा के उपबंधों का अतिक्रमण करती है या रिजर्व बैंक द्वारा इस अध्याय के उपबंधों में से किसी के अधीन दिए गए किसी निदेश या आदेश का पालन करने में असफल रहती है तो रिजर्व बैंक, गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को किसी निक्षेप का प्रतिग्रहण करने से प्रतिषिद्ध कर सकेगा ।
(2) तत्स्मय प्रवृत्त किसी करार या लिखत या किसी विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, रिजर्व बैंक, यह समाधान हो जाने पर कि लोकहित में या निक्षेपकर्ताओं के हित में ऐसा करना आवश्यक है, ऐसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी का, जिसके विरुद्ध निक्षेप का प्रतिग्रहण करने से प्रतिषिद्ध करने वाला आदेश जारी किया गया है, यह निदेश दे सकेगा कि वह अपनी संपत्ति और आस्तियों का रिजर्व बैंक की पूर्व लिखित अनुज्ञा के बिना ऐसी अवधि तक, जो आदेश की तारीख से छह मास से अधिक न हो, विक्रय, अंतरण न करे, उनको भारित या बंधक न करे या उनके संबंध में किसी भी रीति से व्यौहार न करे ।
45डग. परिसमापन अर्जी फाइल करने की बैंक की शक्ति-(1) रिजर्व बैंक, यह समाधान हो जाने पर कि कोई गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी-
(क) में अपने ऋण का संदाय करने में असमर्थ है; या
(ख) धारा 45झक के उपबंधों के आधार पर गैर-बैंककारी वित्तीय संस्था का कारबार करने के लिए निरर्हित हो गई है; या
(ग) रिजर्व बैंक द्वारा, किसी आदेश से, निक्षेप का प्रतिग्रहण करने से प्रतिषिद्ध कर दी गई है और ऐसा आदेश तीन मास से अन्यून अवधि के लिए प्रवृत्त रहा है; या
(घ) गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी का बना रहना लोकहित या कंपनी के निक्षेपकर्ताओं के हित के लिए हानिकर है, तो ऐसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के परिसमापन के लिए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन आवेदन फाइल कर सकेगा ।
(2) किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को अपने ऋण का संदाय करने में असमर्थ तब समझा जाएगा जब उसने अपने किसी कार्यालय या अपनी किसी शाखा में की गई किसी विधिपूर्ण मांग को पांच कार्य दिवस के भीतर पूरा करने से इंकार कर दिया है या वह उसे पूरा करने में असफल रही है और रिजर्व बैंक लिखित रूप में यह प्रमाणित करता है कि ऐसी कंपनी अपने ऋण का संदाय करने में असमर्थ है ।
(3) रिजर्व बैंक द्वारा उपधारा (1) के अधीन किए गए प्रत्येक आवेदन की एक प्रति कंपनी रजिस्ट्रार को भेजी जाएगी ।
(4) किसी कंपनी के परिसमापन से संबंधित कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के सभी उपबंध रिजर्व बैंक द्वारा इस उपबंध के अधीन किए गए आवेदन पर आरम्भ की गई किसी परिसमापन कार्यवाही को लागू होंगे ।]
45ढ. निरीक्षण- [(1) रिजर्व बैंक किसी भी समय अपने अधिकारियों या कर्मचारियों में से किसी एक या अधिक अथवा किन्हीं अन्य व्यक्तियों द्वारा (जिन्हें इस धारा में इसके पश्चात् निरीक्षण प्राधिकारी कहा गया है)-
(i) किसी गैर-बैंककारी संस्था का, जिसके अंतर्गत वित्तीय संस्था भी है, निरीक्षण ऐसी किसी विवरण, जानकारी या विशिष्टियों के, जो रिजर्व बैंक को दी गई हैं, सही होने या पूर्ण होने का सत्यापन करने के प्रयोजनों के लिए या कोई ऐसी जानकारी या विशिष्टियां अभिप्राप्त करने के प्रयोजन के लिए कर सकेगा जिन्हें वह गैर-बैंककारी संस्था ऐसा करने की मांग की जाने पर देने में असफल रही है; या
(ii) यदि रिजर्व बैंक किसी गैर-बैंककारी संस्था का, जो वित्तीय संस्था है, निरीक्षण करना आवश्यक या समीचीन समझता है तो वह उस संस्था का निरीक्षण करा सकेगा ।]
(2) ऐसे हर निदेशक, किसी समिति या निकाय के सदस्य का, जिसे गैर-बैंककारी संस्था के कार्यकलाप का प्रबंध तत्समय दिया हुआ है या उसके अन्य अधिकारी या कर्मचारी का यह कर्तव्य होगा कि उसकी अभिरक्षा में या शक्ति के अधीन जो भी बहियां, लेखे और अन्य दस्तावेज हैं उन्हें निरीक्षण प्राधिकारी के समक्ष पेश करे तथा उस प्राधिकारी को उस संस्था के कारबार से संबंधित ऐसे कथन, और जानकारी, जिसकी वह प्राधिकारी उससे अपेक्षा करे इतने समय के अन्दर दे दे, जितना उस प्राधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट किया गया हो ।
(3) निरीक्षण प्राधिकारी ऐसे किसी निदेशक, समिति या निकाय के किसी सदस्य की, जिसमें गैर-बैंककारी संस्था के कार्यकलाप का प्रबंध तत्समय निहित है अथवा उसके अन्य अधिकारी या कर्मचारी की शपथ पर परीक्षा उस संस्था के कारबार के संबंध में कर सकेगा और तदनुसार शपथ दिला सकेगा ।
[45ढक. अप्राधिकृत व्यक्ति निक्षेपों की याचना नहीं करेंगे-कोई भी व्यक्ति किसी गैर-बैंककारी संस्था की ओर से जनता से धन के निक्षेपों की, कोई प्रास्पेक्ट्स या विज्ञापन प्रकाशित करके या करवाकर या किसी भी अन्य रीति से, तब तक यह याचना नहीं करेगा जब तक-
(क) उसे ऐसा करने के लिए उक्त गैर-बैंककारी संस्था द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत न किया गया हो और वह उस संस्था का नाम विनिर्दिष्ट न करे जिसने उसे इस प्रकार प्राधिकृत किया है; और
(ख) वह प्रास्पेक्ट्स या विज्ञापन धारा 45ञ के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा किए गए किसी आदेश और तत्समय प्रवृत्त विधि के किसी अन्य उपबंध के अनुपालन में न हो जो ऐसे प्रास्पेक्ट्स या विज्ञापन के प्रकाशन पर लागू होता है ।
[45ढख. जानकारी का प्रकटन-(1) किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी से संबंधित कोई ऐसी जानकारी जो,-
(i) ऐसी कंपनी द्वारा इस अध्याय के उपबंधों के अधीन प्रस्तुत किए गए किसी कथन या विवरणी में अंतर्विष्ट है; अथवा
(ii) रिजर्व बैंक द्वारा लेखापरीक्षा या निरीक्षण के माध्यम से अथवा अन्यथा अभिप्राप्त की गई है,
गोपनीय समझी जाएगी और इस धारा में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, प्रकट नहीं की जाएगी ।
(2) इस धारा की कोई बात-
(क) किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा रिजर्व बैंक की पूर्व अनुज्ञा से उपधारा (1) के अधीन रिजर्व बैंक को दी गई जानकारी के प्रकटन को;
(ख) रिजर्व बैंक द्वारा, यदि वह लोकहित में ऐसा करना आवश्यक समझे, तो उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा एकत्र की गई किसी जानकारी के ऐसे समेकित रूप में जिसे वह उचित समझे, किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी या उसके उधार लेने वालों का नाम प्रकट किए बिना किए गए प्रकाशन को;
(ग) गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी या रिजर्व बैंक द्वारा किसी अन्य गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को ऐसी जानकारी के या ऐसी कंपनियों के बीच चलन और रूढ़िगत प्रथा के अनुसार या किसी अन्य विधि के अधीन अनुज्ञात अथवा अपेक्षित प्रकटन या प्रकाशन को,
लागू नहीं होगी :
परन्तु इस खंड के अधीन किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा प्राप्त की गई किसी ऐसी जानकारी को कंपनियों के बीच चलन और रूढ़िगत प्रथा के अनुसार अथवा किसी अन्य विधि के अधीन अनुज्ञात या अपेक्षित रीति के अनुसार ही प्रकाशित किया जाएगा अन्यथा नहीं ।
(3) इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, रिजर्व बैंक, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में या निक्षेपकर्ताओं अथवा गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के हित में या किसी ऐसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के ऐसे कार्यकलापों को निवारित करने के लिए, जिनका संचालन ऐसी रीति से किया जाता रहा है, जो निक्षेपकर्ताओं के हित के लिए हानिकर है, ऐसा करना समीचीन है, तो स्वप्रेरणा से या अनुरोध किए जाने पर, किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के कारबार के संचालन के संबंध में कोई जानकारी किसी विधि के अधीन गठित किसी प्राधिकारी को दे सकेगा अथवा संसूचित कर सकेगा ।
(4) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायालय या अधिकरण अथवा अन्य प्राधिकारी, रिजर्व बैंक को इस अध्याय के किन्हीं उपबंधों के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा अभिप्राप्त किसी कथन या अन्य सामग्री को पेश करने या उसका निरीक्षण करने के लिए विवश नहीं करेगा ।
45ढग. छूट देने की रिजर्व बैंक की शक्ति-रिजर्व बैंक, यह समाधान हो जाने पर कि ऐसा करना आवश्यक है, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकेगा कि इस अध्याय का कोई या सभी उपबंध किसी गैर-बैंककारी संस्था या किसी वर्ग की गैर-बैंककारी संस्थाओं या किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी या किसी वर्ग की गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनियों को साधारणतया अथवा ऐसी किसी अवधि के लिए जो विनिर्दिष्ट की जाए, ऐसी शर्तों, परिसीमाओं या निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए, जिन्हें वह अधिरोपित करना उचित समझे, लागू नहीं होंगे ।]
45ण. [शास्तियां ।]-भारतीय रिजर्व बैंक (संशोधन) अधिनियम, 1974 (1974 का 51) की धारा 22 द्वारा निरसित ।
45त. [अपराध का संज्ञान ।]-भारतीय रिजर्व बैंक (संशोधन) अधिनियम, 1974 (1974 का 51) की धारा 22 द्वारा निरसित ।
45थ. अध्याय 3ख अन्य विधियों पर अध्यारोही होगा-इस अध्याय के उपबंध इस बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे कि किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि में अथवा किसी ऐसी विधि के आधार पर प्रभावशील किसी लिखत में उससे असंगत कोई बात है ।]
[45थक. निक्षेप के प्रति संदाय का आदेश देने की कंपनी विधि बोर्ड की शक्ति-(1) गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा प्रतिग्रहण किए गए प्रत्येक निक्षेप का, जब तब कि उसका नवीकरण नहीं कर दिया जाता, ऐसे निक्षेप के निबंधनों और शर्तों के अनुसार प्रतिसंदाय किया जाएगा ।
(2) जहां गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी किसी निक्षेप या उसके किसी भाग का ऐसे निक्षेप के निबंधनों और शर्तों के अनुसार प्रतिसंदाय करने में असफल रही है वहां कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 10ङ के अधीन गठित कंपनी विधि बोर्ड, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि कंपनी निक्षेपकर्ताओं के हितों की रक्षा करने के लिए अथवा लोक हित में ऐसा करना आवश्यक है, तो स्वप्रेरणा से, अथवा निक्षेपकर्ता के आवेदन पर आदेश द्वारा गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को निदेश दे सकेगा कि वह ऐसे निक्षेप का या उसके भाग का तत्काल या ऐसे समय के भीतर और ऐसी शर्तों के अधीन जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, प्रतिसंदाय करे :
परन्तु कंपनी विधि बोर्ड, इस उपधारा के अधीन कोई आदेश करने से पूर्व गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी को और उस मामले में हितबद्ध अन्य व्यक्तियों को सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर दे सकेगा ।
45थख. निक्षेपकर्ताओं द्वारा नामनिर्देशन-(1) जहां किसी गैर-बैंककारी संस्था द्वारा कोई निक्षेप किसी एक या अधिक व्यक्तियों के जमा खाते में रखा जाता है वहां, यथास्थिति, निक्षेपकर्ता या सभी निक्षेपकर्ता एक साथ केन्द्रीय सरकार द्वारा बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 45यक के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित रीति में एक व्यक्ति को नामनिर्देशित कर सकेंगे जिसको एकमात्र निक्षेपकर्ता की मृत्यु की दशा में अथवा सभी निक्षेपकर्ताओं की मृत्यु की दशा में गैर-बैंककारी संस्था द्वारा निक्षेप की रकम वापस की जा सकेगी ।
(2) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अथवा ऐसे निक्षेप के संबंध में किसी व्ययन में, चाहे वह वसीयती अथवा अन्यथा है, किसी बात के होते हुए भी, जहां किया गया नामनिर्देशन किसी व्यक्ति को गैर-बैंककारी संस्था से निक्षेप की रकम प्राप्त करने का अधिकार प्रदान करने के लिए तात्पर्यित हो, वहां नामनिर्देशिती, यथास्थिति, एकमात्र निक्षेपकर्ता की मृत्यु पर या सभी निक्षेपकर्ताओं की मृत्यु पर ऐसे निक्षेप के संबंध में अन्य सभी व्यक्तियों को अपवर्जित करते हुए, यथास्थिति, एकमात्र निक्षेपकर्ता अथवा निक्षेपकर्ताओं के सभी अधिकारों का हकदार हो जाएगा जब तक कि नामनिर्देशन, केन्द्रीय सरकार द्वारा बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 45यक के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित रीति से परिवर्तित या रद्द नहीं कर दिया जाता है ।
(3) जहां नामनिर्देशिती अवयस्क है वहां नामनिर्देशन करने वाले निक्षेपकर्ता के लिए नामनिर्देशिती की अवयस्कता के दौरान उसकी मृत्यु की दशा में बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 45यक के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा, विहित रीति से किसी व्यक्ति को निक्षेप की रकम प्राप्त करने के लिए नियुक्त करना विधिपूर्ण होगा ।
(4) इस धारा के उपबंधों के अनुसार गैर-बैंककारी संस्था द्वारा किया गया संदाय गैर-बैंककारी संस्था को निक्षेप की बाबत अपने दायित्व से पूर्णतः उन्मोचित करेगा :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी अधिकार या दावे पर प्रभाव नहीं डालेगी, जो कोई व्यक्ति उस व्यक्ति के विरुद्ध रखता हो जिसे इस धारा के अधीन संदाय किया जाता है ।
(5) उस व्यक्ति अथवा उन व्यक्तियों से, जिनके नाम में गैर-बैंककारी संस्था द्वारा निक्षेप धारित किया जाता है, भिन्न किसी व्यक्ति के दावे की कोई सूचना गैर-बैंककारी संस्था द्वारा प्राप्त नहीं होगी और न गैर-बैंककारी संस्था ऐसी किसी सूचना द्वारा आबद्ध होगी भले ही उसे यह सूचना अभिव्यक्ततः दी गई हो :
परन्तु जहां ऐसे निक्षेप के संबंध में सक्षम अधिकारिता वाले किसी न्यायालय से कोई डिक्री, आदेश, प्रमाणपत्र अथवा अन्य प्राधिकार किसी गैर-बैंककारी संस्था के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है वहां गैर-बैंककारी संस्था ऐसी डिक्री, आदेश, प्रमाणपत्र अथवा अन्य प्राधिकार का सम्यक् ध्यान रखेगी ।]
[अध्याय 3ग
अनिगमित निकायों द्वारा निक्षपों के प्रतिग्रहण का प्रतिषेध
45द. निर्वचन-इस अध्याय में प्रयुक्त और अध्याय 3ख में परिभाषित शब्दों और पदों के वे ही अर्थ होंगे जो उसमें हैं ।
[45ध. कुछ दशाओं में निक्षेप का प्रतिग्रहण न किया जाना-कोई ऐसा व्यक्ति, जो व्यष्टि या फर्म या व्यष्टियों का अनिगमित संगम है,-
(i) यदि उसके कारबार में पूर्णतः या भागतः धारा 45झ के खंड (ग) में विनिर्दिष्ट कोई क्रियाकलाप सम्मिलित है; या
(ii) यदि उसका मुख्य कारबार किसी स्कीम या ठहराव के अधीन या किसी अन्य रीति से निक्षेपों के प्रतिग्रहण करने अथवा किसी रीति से उधार देने का है,
कोई निक्षेप प्रतिगृहीत नहीं करेगा :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी व्यष्टि द्वारा अपने किसी नातेदार से ऋण के रूप में धन के प्रतिग्रहण को अथवा किसी फर्म के किसी भागीदार के नातेदार या नातेदारों से ऋण के रूप में फर्म द्वारा धन के प्रतिग्रहण को लागू नहीं होगी ।
(2) जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई व्यक्ति, 1 अप्रैल, 1997 को कोई ऐसा निक्षेप धारण करता है जो उपधारा (1) के अनुसार नहीं है वहां ऐसे निक्षेप का उस व्यक्ति द्वारा ऐसे निक्षेप के प्रतिसंदाय के लिए शोध्य हो जाने के पश्चात् तत्काल या ऐसे प्रारम्भ की तारीख से तीन वर्ष के भीतर, जो भी पूर्वतर हो, प्रतिसंदाय किया जाएगा :
परन्तु यदि रिजर्व बैंक का, किसी व्यक्ति द्वारा रिजर्व बैंक को किए गए आवेदन पर यह समाधान हो जाता है कि ऐसा व्यक्ति अपने नियंत्रण के परे कारणों से निक्षेपों के एक भाग का प्रतिसंदाय करने में असमर्थ है या ऐसा प्रतिसंदाय उसको अत्यधिक कठिनाई में डाल देगा तो वह, लिखित आदेश द्वारा ऐसी अवधि का, एक वर्ष से अनधिक की अवधि तक ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, विस्तार कर सकेगा ।
(3) 1 अप्रैल, 1997 से ही उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई व्यक्ति निक्षेप की याचना करने के लिए किसी रूप में कोई विज्ञापन जारी नहीं करेगा अथवा जारी नहीं कराएगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए कोई व्यक्ति किसी दूसरे का नातेदार केवल, तभी माना जाएगा, जब-
(i) वे किसी हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब के सदस्य हैं; या
(ii) वे पति और पत्नी हैं; अथवा
(iii) नीचे दी गई नातेदारों की सूची में बताई गई रीति से एक दूसरे के नातेदार हैं :-
नातेदारों की सूची
1. पिता, 2. माता (जिसके अन्तर्गत सौतेली माता है), 3. पुत्र (जिसके अन्तर्गत सौतेला पुत्र है), 4. पुत्र की पत्नी, 5. पुत्री (जिसके अन्तर्गत सौतेली पुत्री है), 6. पिता का पिता, 7. पिता की माता, 8. माता की माता, 9. माता का पिता, 10. पुत्र का पुत्र, 11. पुत्र के पुत्र की पत्नी, 12. पुत्र की पुत्री, 13. पुत्र की पुत्री का पति, 14. पुत्री का पति, 15. पुत्री का पुत्र, 16. पुत्री के पुत्र की पत्नी, 17. पुत्री की पुत्री, 18. पुत्री की पुत्री का पति, 19. भाई (जिसके अन्तर्गत सौतेला भाई है), 20. भाई की पत्नी, 21. बहिन (जिसके अन्तर्गत सौतेली बहिन है), 22. बहिन का पति ।]
45न. तलाशी वारंट जारी करने की शक्ति-(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन तलाशी वारंट जारी करने की अधिकारिता रखने वाला कोई न्यायालय रिजर्व बैंक के या राज्य सरकार के इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा अपने इस विश्वास का कथन करते हुए दिए गए आवेदन पर कि धारा 45घ के उपबंधों के उल्लंघन में निक्षेपों का प्रतिग्रहण करने से संबंधित कुछ दस्तावेजें ऐसे न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर किसी स्थान पर छिपाई गई हैं, ऐसी दस्तावेजों की तलाशी के लिए वारंट जारी कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए किसी वारंट का निष्पादन उसी रीति से किया जाएगा और उसका वही प्रभाव होगा जैसे दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन जारी किए गए तलाशी वारंट का निष्पादन किया जाता है और उसका प्रभाव होता है ।
[अध्याय 3घ
व्युत्पन्नों, मुद्रा बाजार लिखतों, प्रतिभूतियों आदि में संव्यवहारों का विनियमन
45प. परिभाषाएं-इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए,-
(क) “व्युत्पन्न" से ऐसी लिखत अभिप्रेत है जिसका निपटान किसी भविष्यवर्ती तारीख को किया जाना है, और जिसका मूल्य ब्याज दर, विदेशी मुद्रा दर, प्रत्यय रेटिंग या प्रत्यय सूचकांक, प्रतिभूतियों की कीमत (जिसे पूर्वाधिकार भी कहा जाता है) या उनमें से किसी एक से अधिक के समुच्चय में परिवर्तन से व्युत्पन्न है और जिसके अंतर्गत ब्याज दर विनिमय, अग्रिम दर करार, विदेशी करेंसी विनिमय, विदेशी करेंसी रुपया विनिमय, विदेशी करेंसी विकल्प, विदेशी करेंसी रुपया विकल्प या ऐसी अन्य लिखत भी हैं, जो समय-समय पर बैंक द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए;
(ख) “मुद्रा बाजार लिखत" के अंतर्गत मांग या सूचना धन, आवधिक धन, रेपो, रिवर्स रेपो, जमा-प्रमाणपत्र, वाणिज्यिक सावधि बिल, वाणिज्यिक पत्र और एक वर्ष तक की परिपक्वता के मूल या आरंभिक ऐसा अन्य ऋण लिखत जिसे बैंक समय-समय पर विनिर्दिष्ट करे;
(ग) “रेपो" से प्रतिभूतियों को पारस्परिक रूप से करार की गई भविष्यवर्ती तारीख को करार पाई गई कीमत पर, जिसके अंतर्गत उधार ली गई निधियों पर ब्याज भी है, पुनः क्रय करने के लिए करार के साथ उन प्रतिभूतियों के विक्रय द्वारा निधियां उधार लेने के लिए कोई लिखत अभिप्रेत है;
(घ) “रिवर्स रेपो" से प्रतिभूतियों को पारस्परिक रूप से करार की गई भविष्यवर्ती तारीख को करार पाई गई कीमत पर, जिसके अंतर्गत उधार ली गई निधियों पर ब्याज भी है, पुनः विक्रय करने के लिए करार के साथ उन प्रतिभूतियों के क्रय द्वारा निधियां उधार लेने के लिए कोई लिखत अभिप्रेत है;
(ङ) “प्रतिभूतियों" से केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार की प्रतिभूतियां या किसी स्थानीय प्राधिकारी की ऐसी प्रतिभूतियां अभिप्रेत हैं जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाएं, और जिसमें “रेपो" या “रिवर्स रेपो" के प्रयोजनों के लिए, निगमित बंधपत्र और डिबेंचर भी हैं ।
45फ. व्युत्पन्नों में संव्यवहार-(1) प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे व्युत्पन्नों में संव्यवहार, जो बैंक द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किए जाएं, विधिमान्य होंगे, यदि संव्यवहार के पक्षकारों में से कम-से-कम एक पक्षकार बैंक, अनुसूचित बैंक या इस अधिनियम, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10), विदेशी मुद्रा प्रबंध अधिनियम, 1999 (1999 का 42) या किसी अन्य अधिनियम के अधीन या विधि का बल रखने वाली ऐसी लिखत के अधीन जो बैंक द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट की जाए, बैंक के विनियामक परिक्षेत्र के अंतर्गत आने वाला कोई अन्य अभिकरण भी है ।
(2) ऐसे व्युत्पन्नों में संव्यवहार, जो बैंक द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किए गए थे, हमेशा ही ऐसे विधिमान्य रहे समझे जाएंगे, मानो उपधारा (1) के उपबंध सभी तात्त्विक समयों पर प्रवृत्त थे ।
45ब. व्युत्पन्नों, द्रव बाजार लिखतों आदि में संव्यवहारों को विनियमित करने की शक्ति-(1) बैंक, लोकहित में, या देश की वित्त प्रणाली को उसके लाभ के लिए विनियमित करने के लिए, ब्याज दरों या ब्याज दर उत्पादों के संबंध में नीति अवधारित कर सकेगा और प्रतिभूतियों, द्रव बाजार लिखतों, विदेशी मुद्रा, व्युत्पन्नों या वैसी ही प्रकृति की अन्य लिखतों, जो बैंक समय-समय पर विनिर्दिष्ट करे, से संबंधित सभी अभिकरणों या उनमें से किसी को उस निमित्त निदेश दे सकेगा :
परन्तु इस उपधारा के अधीन जारी निदेश, प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) की धारा 4 के अधीन मान्यताप्राप्त स्टाक एक्सचेंजों में, उसमें वर्णित संव्यवहारों के संबंध में व्यापार के निष्पादन या निपटान के लिए प्रक्रिया से संबंधित नहीं होंगे ।
(2) बैंक, उपधारा (1) में निर्दिष्ट अभिकरणों को विनियमित करने के लिए उसे समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, उनसे कोई जानकारी, विवरण या अन्य विशिष्टियां मंगा सकेगा या ऐसे अभिकरणों का निरीक्षण करा सकेगा ।
45भ. निदेशों का पालन करने और जानकारी देने का कर्तव्य-प्रत्येक निदेशक या सदस्य या अन्य निकाय का जिसमें धारा 45ब में निर्दिष्ट अभिकरणों के कामकाज का प्रबंध तत्समय निहित किया गया है, यह कर्तव्य होगा कि वह बैंक द्वारा दिए गए निदेशों का पालन करे और उस धारा के अधीन मांगी गई जानकारी या विवरण या विशिष्टियां प्रस्तुत करे ।]
[अध्याय 3ङ
संयुक्त तंत्र
45म. संयुक्त तंत्र-इस अधिनियम या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, यदि इस बारे में राय में कोई भिन्नता होती है कि-
(i) ऐसी कोई लिखत, जो इस अधिनियम की धारा 45प के खण्ड (क) में निर्दिष्ट कोई व्युत्पन्न या खंड (ख) में निर्दिष्ट मुद्रा बाजार लिखत या खंड (ग) में निर्दिष्ट रेपों या खंड (घ) में निर्दिष्ट रिवर्स रेपों या खंड (ङ) में निर्दिष्ट प्रतिभूतियां हैं; या
(ii) ऐसी कोई लिखत, जो बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन जीवन बीमा की पालिसी है या प्रतिभूति संविदा (विनियमन) अधिनियम, 1956 (1956 का 42) की धारा 2 के खण्ड (ज) के उपखंड (त्), उपखंड (त्क), उपखंड (त्ख), उपखंड (त्ग), उपखंड (त्घ), उपखंड (ख्र्ङ), उपखंड (त्त्), उपखंड (त्त्क) और उपखंड (त्त्त्) में निर्दिष्ट स्क्रिप या कोई अन्य प्रतिभूतियां हैं,
मिश्रित या ऐसी संयुक्त लिखत है जो मुद्रा बाजार विनिधान या प्रतिभूति बाजार लिखत का घटक है या खंड (त्) या खंड (त्त्) में निर्दिष्ट बीमा या किसी अन्य लिखत का घटक है और वह भारतीय रिजर्व बैंक या भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड अधिनियम, 1992 (1992 का 15) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड या बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण अधिनियम, 1999 (1999 का 41) की धारा 3 के अधीन स्थापित बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण या भारत सरकार के संकल्प सं० एफ सं० 1(6) 2007-पीआर, तारीख 14 नवम्बर, 2008 द्वारा गठित पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण की अधिकारिता के अंतर्गत आता है, तो राय में ऐसी भिन्नता को निम्नलिखित से मिलकर बनने वाली किसी संयुक्त समिति को निर्दिष्ट किया जाएगा, अर्थात् :-
(क) संघ का वित्त मंत्री_________________.पदेन, अध्यक्ष;
(ख) गवर्नर, भारतीय रिजर्व बैंक_________________.पदेन, उपाध्यक्ष;
(ग) सचिव, आर्थिक कार्य विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार_________________.पदेन सदस्य;
(घ) सचिव, वित्तीय सेवा विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार_________________.पदेन सदस्य;
(ङ) अध्यक्ष, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण_________________.पदेन सदस्य;
(च) अध्यक्ष, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड_________________पदेन सदस्य;
(छ) अध्यक्ष, पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण_________________.पदेन सदस्य ।
(2) सचिव, वित्तीय सेवा विभाग, वित्त मंत्रालय, भारत सरकार, उपधारा (1) में निर्दिष्ट संयुक्त समिति की बैठकों का, संयोजक होगा ।
(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट राय में किसी भिन्नता की दशा में, उस उपधारा के खण्ड (ख), खंड (ङ), खंड (च) या खंड (छ) में निर्दिष्ट संयुक्त समिति का कोई सदस्य संयुक्त समिति को निर्देशित कर सकेगा ।
(4) संयुक्त समिति ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगी, जो वह समीचीन समझे और उपधारा (3) के अधीन किए गए निर्देश की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर उस पर अपने विनिश्चय, केन्द्रीय सरकार को देगी ।
(5) संयुक्त समिति का विनिश्चय, भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड, बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण तथा पेंशन निधि विनियामक और विकास प्राधिकरण पर आबद्धकर होगा ।]
[अध्याय 3च
मुद्रा निति
45य. इस अध्याय के उपबंधों का अधिनियम के अन्य उपबंधों पर अभिभावी होना-इस अध्याय के उपबंध इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों में अंतर्विष्ट किसी असंगत बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।
45यक. मुद्रा स्फीति लक्ष्य-(1) केन्द्रीय सरकार, बैंक के परामर्श से प्रत्येक पांच वर्ष में एक बार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के निबन्धनानुसार मुद्रा स्फीति लक्ष्य का अवधारण करेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार ऐसे अवधारण पर राजपत्र में मुद्रा स्फीति लक्ष्य अधिसूचित करेगी ।
45यख. मुद्रा नीति समिति का गठन-(1) केंद्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बैंक की मुद्रा नीति समिति के नाम से एक समिति का गठन करेगी ।
(2) मुद्रा नीति समिति में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :-
(क) बैंक का गवर्नर-अध्यक्ष, पदेन;
(ख) मुद्रा निति का भारसाधक बैंक का डिप्टी गवर्नर-सदस्य, पदेन;
(ग) बैंक का एक अधिकारी, जो केंद्रीय बोर्ड द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा-सदस्य, पदेन; और
(घ) तीन व्यक्ति, जिन्हें केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा-सदस्य ।
(3) मुद्रा नीति समिति, मुद्रा स्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अपेक्षित नीति दर अवधारित करेगी ।
(4) मुद्रा नीति समिति का विनिश्चय बैंक पर आबद्धकर होगा ।
45यग. केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त सदस्यों की पात्रता और चयन-(1) धारा 45यख की उपधारा (2) के खंड (घ) में निर्दिष्ट मुद्रा नीति समिति के सदस्य अर्थशास्त्र या बैंककारी या वित्त या मुद्रा नीति के क्षेत्र में ज्ञान और अनुभव रखने वाले योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा प्राप्त व्यक्तियों में से केंद्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे :
परन्तु किसी व्यक्ति को सदस्य के रूप में नियुक्त नहीं किया जाएगा यदि-
(i) ऐसे व्यक्ति ने सदस्य के रूप में नियुक्ति की तारीख को सत्तर वर्ष की आयु पूरी कर ली है;
(ii) ऐसा व्यक्ति बैंक के किसी बोर्ड या समिति का कोई सदस्य है;
(iii) ऐसा व्यक्ति बैंक का कोई कर्मचारी है;
(iv) ऐसा व्यक्ति भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अधीन यथापरिभाषित कोई लोक सेवक है;
(v) ऐसा व्यक्ति संसद् या किसी राज्य विधान-मंडल का कोई सदस्य है;
(vi) ऐसा व्यक्ति किसी भी समय दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है;
(vii) ऐसा व्यक्ति किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, जो एक सौ अस्सी दिन या उससे अधिक की अवधि के कारावास से दंडनीय है;
(viii) ऐसा व्यक्ति मुद्रा नीति समिति के सदस्य के रूप में कर्तव्यों के निर्वहन में शारीरिक रूप से या मानसिक रूप से असमर्थ है;
(ix) ऐसे व्यक्ति का बैंक से हित का तात्त्विक विरोध है और वह ऐसे विरोध का समाधान करने में असमर्थ है ।
(2) धारा 45यख की उपधारा (2) के खण्ड (घ) में निर्दिष्ट मुद्रा नीति समिति के सदस्यों की नियुक्ति केंद्रीय सरकार द्वारा खोजबीन-सह-चयन समिति द्वारा की गई सिफारिशों पर की जाएगी जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :-
(क) मंत्रिमंडल सचिव-अध्यक्ष;
(ख) भारतीय रिजर्व बैंक का गवर्नर या उसका प्रतिनिधि (डिप्टी गवर्नर की पंक्ति से अनिम्न)-सदस्य;
(ग) सचिव, आर्थिक कार्य विभाग-सदस्य;
(घ) अर्थशास्त्र या बैंककारी या वित्त या मुद्रा नीति के क्षेत्र में तीन विशेषज्ञ, जो केंद्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे-सदस्य ।
(3) खोजबीन-सह-चयन समिति, सदस्यों का चयन करते समय ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, विहित की जाए ।
45यघ. मुद्रा नीति समिति के सदस्यों की नियुक्ति के निबंधन और शर्तें-(1) धारा 45यख की उपधारा (2) के खण्ड (घ) के अधीन नियुक्त मुद्रा नीति समिति के सदस्य चार वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे और पुनर्नियुक्ति के पात्र नहीं होंगे ।
(2) मुद्रा नीति समिति के सदस्यों की नियुक्ति के निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, विहित की जाएं और ऐसे सदस्यों को संदेय पारिश्रमिक और अन्य भत्ते ऐसे होंगे जो केंद्रीय बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(3) कोई सदस्य, उपधारा (1) के अधीन उसकी पदावधि की समाप्ति से पूर्व किसी भी समय केंद्रीय सरकार को छह सप्ताह से अन्यून की लिखित सूचना देकर मुद्रा नीति समिति से त्यागपत्र दे सकेगा और केंद्रीय सरकार द्वारा त्यागपत्र स्वीकार किए जाने पर वह मुद्रा नीति समिति का सदस्य नहीं रहेगा ।
45यङ. मुद्रा नीति समिति के सदस्यों का हटाया जाना-(1) केंद्रीय सरकार धारा 45यख की उपधारा (2) के खण्ड (घ) के अधीन नियुक्त मुद्रा नीति समिति के किसी भी ऐसे सदस्य को पद से हटा सकेगी,-
(क) जो दिवालिया है या किसी भी समय न्यायनिर्णीत किया गया है; या
(ख) जो सदस्य के रूप में कार्य करने के लिए शारीरिक रूप से या मानसिक रूप से असमर्थ हो गया है; या
(ग) जो किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, जिसमें केंद्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अंतर्वलित है; या
(घ) जो अपनी नियुक्ति के समय पर किसी हित के तात्त्विक विरोध को यथोचित रूप से प्रकट करने में असफल रहा है; या
(ङ) जो पूर्व छुट्टी अभिप्राप्त किए बिना मुद्रा नीति समिति के तीन आनुक्रमिक अधिवेशनों में उपस्थित नहीं होता है; या
(च) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित कर लिया है, जिससे सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या
(छ) जिसने धारा45यग की उपधारा (1) के परंतुक के खंड (त्त्), खंड (त्त्त्), खंड (त्ध्) और खंड (ध्) में निर्दिष्ट कोई पद अर्जित कर लिया है; या
(ज) जिसने केन्द्रीय सरकार की राय में अपने पद का ऐसा दुरुपयोग किया है, जिससे उसका पद पर बने रहना लोक हित के लिए हानिकर है ।
(2) धारा 45यख की उपधारा (2) के खण्ड (घ) के अधीन नियुक्त कोई भी सदस्य उपधारा (1) के खंड (घ), खंड (ङ), खंड (च), खंड (छ) और खंड (ज) के अधीन तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उसे मामले की सुनवाई युक्तियुक्त अवसर न दे दिया गया हो ।
45यच. मुद्रा नीति समिति की कार्यवाहियों का रिक्तियों आदि के कारण अविधिमान्य न होना-मुद्रा नीति समिति की कोई भी कार्यवाही केवल इस कारण से अविधिमान्य नहीं होगी कि-
(क) मुद्रा नीति समिति में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या
(ख) मुद्रा नीति समिति के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या
(ग) मुद्रा नीति समिति की प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है जिससे मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं पड़ता हो ।
45यछ. मुद्रा नीति समिति का सचिव-(1) उक्त समिति को सचिवीय सहायता प्रदान करने के लिए बैंक, मुद्रा नीति समिति का एक सचिव नियुक्त करेगा ।
(2) सचिव ऐसे कृत्यों का पालन ऐसी रीति में करेगा, जो केंद्रीय बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।
45यज. मुद्रा नीति समिति के सदस्यों के लिए सूचना-(1) बैंक, मुद्रा नीति समिति के सदस्यों को ऐसी सभी सूचनाएं उपलब्ध कराएगा जो मुद्रा स्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए सुसंगत हों ।
(2) उपधारा (1) के अधीन बैंक द्वारा उपलब्ध कराई गई सूचना के अतिरिक्त मुद्रा नीति समिति का कोई भी सदस्य किसी भी समय बैंक से अतिरिक्त सूचना के लिए अनुरोध कर सकेगा, जिसके अंतर्गत कोई भी डाटा, प्रतिमान या विश्लेषण भी है ।
(3) बैंक, उपधारा (2) में मुद्रा समिति के सदस्य को यथा निवेदित ऐसी सूचना युक्तियुक्त समय के भीतर उपलब्ध कराएगा, जब तक कि-
(क) सूचना किसी अस्तित्व या व्यक्ति से संबंधित है और सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है; या
(ख) सूचना किसी अस्तित्व या व्यक्ति की पहचाल किए जाने की अनुज्ञा देती है और सूचना सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है ।
(4) बैंक द्वारा, मुद्रा नीति समिति के किसी सदस्य को उपलब्ध कराई गई कोई भी सूचना मुद्रा नीति समिति के सभी सदस्यों को उपलब्ध कराई जाएगी ।
45यझ. मुद्रा नीति समिति का बैठकें-(1) बैंक, मुद्रा नीति समिति की एक वर्ष में कम से कम चार बैठकें आयोजित करेगा ।
(2) बैंक द्वारा, किसी वर्ष के लिए मुद्रा नीति समिति की बैठक की समय सारणी उस वर्ष की प्रथम बैठक के कम से कम एक सप्ताह पहले प्रकाशित की जाएगी ।
(3) बैठक की समय सारणी में परिवर्तन केवल-
(क) मुद्रा नीति समिति की पूर्व बैठक में किए गए विनिश्चय के माध्यम से किया जाएगा; या
(ख) तब किया जाएगा यदि गवर्नर की राय में प्रशासनिक अत्यावश्यकताओं के कारण अतिरिक्त बैठक अपेक्षित है या बैठक का पुनः अनुसूचित किया जाना अपेक्षित है ।
(4) बैठक की समय सारणी में कोई भी परिवर्तन बैंक द्वारा यथाशक्य शीघ्रता से प्रकाशित किया जाएगा ।
(5) मुद्रा नीति समिति की किसी बैठक की गणपूर्ति चार सदस्यों से होगी जिनमें से कम से कम एक गवर्नर और उसकी अनुपस्थिति में वह डिप्टी गवर्नर होगा, जो मुद्रा नीति समिति का सदस्य है ।
(6) मुद्रा नीति समिति की बैठकों की अध्यक्षता गवर्नर द्वारा और उसकी अनुपस्थिति में ऐसे डिप्टी गवर्नर द्वारा, जो मुद्रा नीति समिति का सदस्य है, की जाएगी ।
(7) मुद्रा नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का एक मत होगा ।
(8) ऐसे सभी प्रश्नों का, जो मुद्रा नीति समिति की किसी बैठक के समक्ष आते हैं, विनिश्चय उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाएगा और मत बराबर होने की दशा में गवर्नर का दूसरा या निर्णायक मत होगा ।
(9) केंद्रीय सरकार, यदि आवश्यक समझे तो समय-समय पर मुद्रा नीति समिति को लिखित में अपने विचार भेज सकेगी ।
(10) किसी प्रस्ताविक संकल्प के लिए मु्द्रा नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का मत ऐसे सदस्य के विरुद्ध अभिलिखित किया जाएगा ।
(11) मुद्रा नीति समिति का प्रत्येक सदस्य प्रस्ताविक संकल्प के पक्ष में या उसके विरुद्ध मत देने के कारण विनिर्दिष्ट करते हुए लिखित में कथन करेगा ।
(12) मुद्रा नीति समिति के कार्यकरण की प्रक्रिया, आचरण, गोपनीयता संहिता और कोई अन्य आनुषंगिक मामला ऐसा होगा, जो केंद्रीय बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए ।
(13) मुद्रा नीति समिति की कार्यवाही गोपनीय होगी ।
45यञ. मुद्रा नीति समिति के विनिश्चयों को कार्यान्वित करने के लिए उठाए जाने वाले कदम-(1) बैंक, मुद्रा नीति समिति के विनिश्चयों को कार्यान्वित करने के लिए, जिसके अंतर्गत उसमें कोई परिवर्तन भी हैं, उठाए जाने वाले कदमों को स्पष्ट करते हुए एक दस्तावेज प्रकाशित करेगा ।
(2) ऐसे दस्तावेज में सम्मिलित की जाने वाली विशिष्टियां और ऐसे दस्तावेजों के प्रकाशनों की बारंबारता ऐसी होगी जो केंद्रीय बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए ।
45यट. विनिश्चयों का प्रकाशन-बैंक, मुद्रा नीति समिति की प्रत्येक बैठक की समाप्ति के पश्चात्, उक्त समिति द्वारा अंगीकृत संकल्प को प्रकाशित करेगा ।
45यठ. मुद्रा नीति समिति की बैठक की कार्यवाहियों का प्रकाशन-बैंक, मुद्रा नीति समिति की प्रत्येक बैठक के पश्चात, चौदहवें दिन बैठक की कार्यवाहियों का कार्यवृत्त प्रकाशित करेगा, जिसके अंतर्गत निम्नलिखित होंगे, अर्थात् :-
(क) मुद्रा नीति समिति की बैठक में अंगीकृत संकल्प ;
(ख) उक्त बैठक में अंगीकृत संकल्पों पर ऐसे सदस्य को श्रेयित मुद्रा नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का मत;
(ग) उक्त बैठक में अंगीवृत्त संकल्पों पर धारा 45यझ की उपधारा (11) के अधीन मुद्रा नीति समिति के प्रत्येक सदस्य का कथन ।
45यड. मुद्रा नीति रिपोर्ट-(1) बैंक, प्रत्येक छह मास में एक बार नीति रिपोर्ट नामक एक दस्तावेज निम्नलिखित स्पष्ट करते हुए प्रकाशित करेगा-
(क) मुद्रा स्फीति के स्रोत; और
(ख) दस्तावेज के प्रकाशन की तारीख से छह मास से अठारह मास के बीच की अवधि के लिए मुद्रा स्फीति का पूर्वानुमान ।
(2) मुद्रा नीति समिति का प्ररूप और अंतर्वस्तुएं ऐसी होंगी, जो केंद्रीय बोर्ड द्वारा बनाए गए विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं ।
45यढ. मुद्रा स्फीति लक्ष्य को बनाए रखने में असफलता-जहां बैंक, मुद्रा स्फीति लक्ष्य को पूरा करने में असफल होता है, वहां वह केंद्रीय सरकार को एक रिपोर्ट में निम्नलिखित उपवर्णित करेगा-
(क) मुद्रा स्फीति लक्ष्य प्राप्त करने में असफलता के कारण;
(ख) बैंक द्वारा किए जाने के लिए प्रस्तावित उपचारात्मक कार्रवाई; और
(ग) उस समयावाधि का अनुमान, जिसके भीतर प्रस्तावित उपचारात्मक कार्रवाइयों का यथासमय कार्यान्वयन करके मुद्रा स्फीति लक्ष्य प्राप्त किया जाएगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए ऐसे कारक, जिनसे असफलता का गठन होता है, वे होंगे जो केंद्रीय सरकार द्वारा, वित्त अधिनियम, 2016 (2016 का 28) के अध्याय 12 के भाग 1 के प्रारंभ की तारीख से तीन मास के भीतर राजपत्र में अधिसूचित किए जाएं ।
45यण. नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, इस अध्याय के उपबंधों को क्रियान्वित करने के प्रयोजनों के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबंध किया जा सकेगा,-
(क) धारा 45यग की उपधारा (3) के अधीन खोजबीन-सह-चयन समिति के कार्यकरण की प्रक्रिया;
(ख) धारा 45यघ की उपधारा (2) के अधीन मुद्रा नीति समिति के सदस्यों की (पारिश्रमिक और अन्य भत्तों से भिन्न) नियुक्ति के निबंधन और शर्तें; और
(ग) कोई अन्य विषय जो केंद्रीय सरकार द्वारा नियमों द्वारा विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।]
अध्याय 4
साधारण उपबन्ध
46. आरक्षित निधि में केन्द्रीय सरकार द्वारा अभिदाय- [केन्द्रीय सरकार] पांच करोड़ रुपए के मूल्य की रुपए में की प्रतिभूतियां रिजर्व बैंक को अन्तरित करेगी जिन्हें रिजर्व बैंक आरक्षित निधि में रख देगा ।
[46क. राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि और राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (स्थिरीकरण) निधि में अभिदाय-बैंक प्रतिवर्ष ऐसी धनराशि, जिसे वह आवश्यक और साध्य समझे, राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक अधिनियम, 1981 (1981 का 61) की धारा 42 और धारा 43 के अधीन स्थापित और अनुरक्षित क्रमशः राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि और राष्ट्रीय ग्रामीण प्रत्यय (स्थिरीकरण) निधि में अभिदाय करेगा ।]
[46ग. राष्ट्रीय औद्योगिक प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि-(1) रिजर्व बैंक एक निधि स्थापित करेगा और रखेगा जो राष्ट्रीय औद्योगिक प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि कहलाएगी और जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे-
(क) रिजर्व बैंक द्वारा दी गई दस करोड़ रुपए की आरम्भिक राशि;
(ख) ऐसी अन्य धनराशियां जिनका रिजर्व बैंक प्रत्येक वर्ष अभिदाय करेः
परन्तु जून, 1965 के तीसवें दिन समाप्त होने वाले वर्ष से प्रारम्भ होने वाले पांच वर्षों में से प्रत्येक के दौरान वार्षिक अभिदाय पांच करोड़ रुपए से कम न होगाः
परन्तु यह और कि यदि परिस्थितिवश ऐसा आवश्यक हो तो केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक को किसी भी वर्ष में पांच करोड़ रुपए की उक्त राशि घटाने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी ।
(2) उक्त निधि की रकम रिजर्व बैंक द्वारा केवल निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए लगाई जाएगी, अर्थात्ः-
। । । ।
[(ग) [यथास्थिति, निआ बैंक या पुनर्निर्माण बैंक] के किसी कारबार के प्रयोजनों के लिए [यथास्थिति, निआ बैंक या पुनर्निर्माण बैंक] [या लघु उद्योग बैंक] को उधारों और अग्रिमों का दिया जाना;
(घ) [यथास्थिति, निआ बैंक या पुनर्निर्माण बैंक] [या लघु उद्योग बैंक] द्वारा पुरोधृत बंधपत्रों और डिबेंचरों का क्रय करना ।]
2[46घ. राष्ट्रीय आवास प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि-(1) बैंक राष्ट्रीय आवास प्रत्यय (दीर्घकालिक प्रवर्तन) निधि के नाम से ज्ञात एक निधि स्थापित और अनुरक्षित करेगा जिसमें प्रतिवर्ष ऐसी धनराशियां, जैसी वह आवश्यक समझे जमा की जाएंगी ।
(2) उक्त निधि की रकम का उपयोजन बैंक केवल निम्नलिखित उद्देश्यों के लिए करेगा, अर्थात्ः-
(क) राष्ट्रीय आवास बैंक के किसी कारबार के प्रयोजन के लिए राष्ट्रीय आवास बैंक को ऋण और उधार देना;
(ख) राष्ट्रीय आवास बैंक द्वारा पुरोधृत वचनपत्र और डिबेंचर क्रय करना ।]
[47. अधिशेष लाभों का आबंटन-डूबंत और शंकास्पद ऋणों, आस्तियों के अवक्षयण, कर्मचारिवृन्द और अधिवार्षिकी निधियों में अभिदायों के लिए [और अन्य सब ऐसी बातों के लिए, जिनके लिए] उपबंध इस अधिनियम के द्वारा या अधीन किया जाना है या जिनके लिए प्रायः बैंककार व्यवस्था करते हैं; व्यवस्था करने के पश्चात् लाभों का अतिशेष केन्द्रीय सरकार को दिया जाएगा ।]
48. आय-कर और अधिकर से रिजर्व बैंक को छूट-(1) [आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43)] या आय-कर या अधिकर की बाबत किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त अधिनियमिति में किसी बात के होते हुए भी रिजर्व बैंक अपनी आय, लाभों या अभिलाभों में से किसी पर, आय-कर या अधिकर देने के दायित्वाधीन नहीं होगा ।
। । । ।
49. रिजर्व बैंक दर का प्रकाशन-रिजर्व बैंक समय-समय पर वह मानक दर प्रकाशित करेगा जिस पर वह विनिमयपत्र या अन्य वाणिज्यिक पत्र, जो इस अधिनियम के अधीन क्रय किए जाने योग्य हैं, क्रय या पुनः मितीकाटा लेकर भुगतान करने के लिए तैयार हैं ।
[50. संपरीक्षक-(1) केन्द्रीय सरकार द्वारा दो से अन्यून संपरीक्षक नियुक्त किए जाएंगे और उनका पारिश्रमिक नियत किया जाएगा ।
(2) संपरीक्षक एक वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए जो केन्द्रीय सरकार उनकी नियुक्ति करते समय नियत करे, पद धारण करेंगे और पुनः नियुक्ति के लिए पात्र होंगे ।]
51. सरकार द्वारा विशेष संपरीक्षकों की नियुक्ति-धारा 50 में अन्तर्विष्ट किसी बात पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, [केन्द्रीय सरकार] किसी समय रिजर्व बैंक के लेखाओं की परीक्षा करने और उसकी बाबत प्रतिवेदन देने के लिए [नियंत्रक महालेखापरीक्षकट *** को नियुक्त कर सकेगी ।
52. संपरीक्षकों की शक्तियां और कर्तव्य-(1) प्रत्येक संपरीक्षक को वार्षिक तुलनपत्र की एक प्रति दी जाएगी और उसका कर्तव्य होगा कि वह उसकी परीक्षा उससे संबद्ध लेखाओं और वाउचरों के साथ मिलाकर करे और प्रत्येक संपरीक्षक को रिजर्व बैंक द्वारा रखी गई सब पुस्तकों की एक सूची परिदत्त की जाएगी और उसकी पहुंच रिजर्व बैंक की बहियों, लेखाओं और अन्य दस्तावेजों तक सभी युक्तियुक्त समयों पर होगी, और वह ऐसे लेखाओं के अन्वेषण में अपनी सहायता के लिए लेखापाल या अन्य व्यक्ति रिजर्व बैंक *** के व्यय पर नियोजित कर सकेगा और वह रिजर्व बैंक के किसी निदेशक या अधिकारी की ऐसे लेखाओं के संबंध में परीक्षा कर सकेगा ।
(2) संपरीक्षक वार्षिक तुलनपत्र और लेखाओं के बारे में *** 8[केन्द्रीय सरकार] *** को रिपोर्ट भेजेंगे और ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट में वे यह कथित करेंगे और कि क्या तुलनपत्र की बाबत उनकी यह राय है कि वह पूरा और ठीक तुलनपत्र है जिसमें सब आवश्यक विशिष्टियां दी हुई हैं और जो उचित रीति में ऐसे तैयार किया गया है कि उससे रिजर्व बैंक काम-काम की सच्ची और यथार्थ स्थिति प्रदर्शित होती है और उस दशा में, जिसमें कि उन्होंने कि केन्द्रीय बोर्ड से कोई स्पष्टीकरण या जानकारी मांगी है, यह भी कथित करेंगे कि क्या वह दी गई है या नहीं और क्या वह समाधानप्रद है या नहीं है *** ।
53. विवरणियां-(1) रिजर्व बैंक [ऐसे] प्ररूप में, जैसा [केन्द्रीय सरकार] भारत के राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विहित करे, निर्गमित विभाग और बैंककारी विभाग का एक सप्ताहित लेखा तैयार करेगा और 2[केन्द्रीय सरकार] को भेजेगा । 2[केन्द्रीय सरकार] इन लेखाओं को [भारत के राजपत्र में ऐसे अन्तरालों पर और ऐसे उपांतरित रूप में प्रकाशित करवाएगी जो वह ठीक समझे]।
(2) रिजर्व बैंक उस तारीख से, जिसको रिजर्व बैंक के वार्षिक लेखा बन्द किए जाते हैं, दो मास के अन्दर रिजर्व बैंक के वर्ष भर के संचालन की केन्द्रीय बोर्ड की रिपोर्ट के साथ रिजर्व बैंक के गवर्नर, डिप्टी गवर्नर और मुख्य लेखापाल द्वारा हस्ताक्षरित और संपरीक्षकों द्वारा प्रमाणित वार्षिक लेखाओं की एक प्रति 2[केन्द्रीय सरकार] को भेजेगा और 2[केन्द्रीय सरकार] ऐसे लेखाओं और रिपोर्ट को भारत के राजपत्र में प्रकाशित कराएगी ।
। । । ।
[54. ग्रामीण प्रत्यय और विकास-बैंक ग्रामीण प्रत्यय और विकास के विभिन्न पहलुओं पर अध्ययन करने के लिए अनुभवी कर्मचारी रख सकेगा और विशेष रूप से वह-
(क) राष्ट्रीय बैंक को अनुभवी मार्गदर्शन और सहायता दे सकेगा;
(ख) एकीकृत ग्रामीण विकास के संवर्धन के लिए ऐसे क्षेत्रों में जहां वह आवश्यक समझे, विशेष अध्ययन चला सकेगा ।]
[54क. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) गवर्नर इस अधिनियम के *** अधीन या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन अपने द्वारा प्रयोक्तव्य ऐसी शक्तियों और कृत्यों को साधारण या विशेष आदेश द्वारा ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं डिप्टी गवर्नर को प्रत्यायोजित कर सकेगा, जो वह रिजर्व बैंक के कृत्यों के दक्ष प्रशासन के लिए आवश्यक समझे ।
(2) यह तथ्य कि कोई डिप्टी गवर्नर इस अधिनियम के अनुसरण में किसी शक्ति का प्रयोग करता है या कोई कार्य या बात करता है उसके ऐसा करने के प्राधिकार का निश्चायक साक्ष्य होगा ।
[54कक. अपने कर्मचारियों को अन्य संस्थाओं में प्रतिनियुक्त करने की रिजर्व बैंक की शक्ति- [(1) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि या किसी करार में किसी बात के होते हुए भी रिजर्व बैंक अपने कर्मचारिवृन्द के किसी सदस्य को ऐसी अवधि के लिए जो वह ठीक समझे,-
(क) किसी ऐसी संस्था में जो पूर्णतः या पर्याप्ततः रिजर्व बैंक के स्वामित्व में है, प्रतिनियुक्त कर सकेगा;
(ख) विकास बैंक में प्रतिनियुक्त कर सकेगा किन्तु इस प्रकार कि ऐसी कोई प्रतिनियुक्ति लोक वित्तीय संस्था विधि (संशोधन) अधिनियम, 1975 की धारा 5 के प्रारम्भ से तीस मास के अवसान के पश्चात् जारी नहीं रहेगी;
(ग) यूनिट ट्रस्ट में प्रतिनियुक्त कर सकेगा, किन्तु इस प्रकार कि ऐसी कोई प्रतिनियुक्ति भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) की धारा 4क की उपधारा (1) के अधीन; केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित तारीख से तीस मास के अवसान के पश्चात् जारी नहीं रहेगी,
और तब इस प्रकार प्रतिनियुक्त व्यक्ति अपनी प्रतिनियुक्ति की अवधि के दौरान उस संस्था की, जिसमें वह इस प्रकार प्रतिनियुक्त किया गया है, ऐसी सेवा करेगा जो वह संस्था अपेक्षा करे ।
(2) जहां कोई व्यक्ति किसी संस्था में उपधारा (1) के अधीन प्रतिनियुक्त किया गया है वहां वह इस बात का हकदार न होगा कि वह ऐसे किसी संबलम्, उपलब्धियों तथा सेवा के अन्य निबंधनों ओर शर्तों का दावा करे जिनका हकदार वह उस दशा में न होता जिसमें कि वह ऐसे प्रतिनियुक्त न किया गया होता ।
(3) इस धारा की किसी बात से रिजर्व बैंक को यह शक्ति न मिल जाएगी कि वह अपने कर्मचारिवृन्द के किसी सदस्य को ऐसे किस संबलम्, ऐसी उपलब्धियों या सेवा के ऐसे अन्य निबन्धनों या शर्तों पर, जो उसके लिए उससे कम अनुकूल हैं जिसका वह ऐसे प्रतिनियोजन के ठीक पूर्व हकदार था, किसी संस्था में प्रतिनियुक्त कर दे ।
(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए किसी संस्था की बाबत यह तभी समझा जाएगा कि वह पूर्णतः या सारतः रिजर्व बैंक के स्वामित्व में है यदि उस संस्था की पूंजी में रिजर्व बैंक का चालीस प्रतिशत से कम अंश नहीं है ।
स्पष्टीकरण-“पूंजी" शब्द से यूनिट ट्रस्ट के सम्बन्ध में उस ट्रस्ट की आरंभिक पूंजी अभिप्रेत है ।
55. और 56. [बैंक द्वारा रिपोर्ट । रजिस्ट्रीकृत अंशों के स्वामित्व के बारे में उद्घोषणा की अपेक्षा करने की शक्ति ।]-1948 के अधिनियम संख्यांक 62 की धारा 7 और अनुसूची द्वारा (1-1-1949 से) निरसित ।
57. रिजर्व बैंक का समापन-(1) [कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1)ट की कोई बात रिजर्व बैंक को लागू नहीं होगी और [केन्द्रीय सरकार] के आदेश के सिवाय और ऐसी रीति के सिवाय, जो वह [निर्दिष्ट करे,] रिजर्व बैंक का समापन नहीं किया जाएगा ।]
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58. केन्द्रीय बोर्ड की विनियम बनाने की शक्ति-केन्द्रीय बोर्ड इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभाव देने के वास्ते जिन विषयों के लिए उपबन्ध करना आवश्यक या सुविधाजनक है उन सब के लिए ऐसे विनियम, जो अधिनियम से संगत हैं, [केन्द्रीय सरकार] की पूर्व मंजूरी से [राजपत्र में अधिसूचना द्वारा] बना सकेगा ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी उपबन्ध की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियम निम्नलिखित सब विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात्ः-
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(च) वह रीति जिससे केन्द्रीय बोर्ड का काम-काज किया जाएगा और उसके अधिवेशनों में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(छ) स्थानीय बोर्ड के काम-काज का संचालन और ऐसे बोर्डों को शक्तियों और कृत्यों का प्रत्यायोजन;
(ज) केन्द्रीय बोर्डों की शक्तियां और कृत्य रिजर्व बैंक के *** डिप्टी गवर्नरों, निदेशकों या अधिकारियों को प्रत्यायोजित करना;
(झ) केन्द्रीय बोर्डों की समितियां बनाना और ऐसी समितियों को केन्द्रीय बोर्ड की शक्तियों और कृत्यों का प्रत्यायोजन और ऐसी समितियों के काम-काज का संचालन;
(ञ) रिजर्व बैंक के अधिकारियों और सेवकों के लिए कर्मचारिवृन्द और अधिवार्षिकी निधियों का गठन और प्रबंध;
(ट) वह प्ररूप और रीति जिसमें रिजर्व बैंक के लिए आबद्धकर संविदाएं हस्ताक्षरित की जाएंगी;
(ठ) रिजर्व बैंक की कार्यालयिक मुद्रा संबंधी उपबंध तथा उसके प्रयोग की रीति और प्रभाव;
(ड) वह प्ररूप और रीति जिसमें रिजर्व बैंक का तुलनपत्र तैयार किया जाएगा और लेखा रखे जाएंगे;
(ढ) रिजर्व बैंक के निदेशकों का पारिश्रमिक;
(ण) रिजर्व बैंक से अनुसूचित बैंकों का संबंध और अनुसूचित बैंकों द्वारा रिजर्व बैंक को भेजी जाने वाली विवरणियां;
(त) [बैंक (जिसके अंतर्गत डाकघर बचत बैंक हैं)] के लिए समाशोधन-गृहों का विनियमन;
[(तत) बैंकों के बीच या बैंकों और धारा 45झ के खंड (ग) में निर्दिष्ट अन्य वित्तीय संस्थाओं के बीच इलैक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से निधि अंतरण का विनियमन जिसके अंतर्गत उन शर्तों का जिनके अधीन रहते हुए बैंक और अन्य वित्तीय संस्थाएं ऐसे निधि अंतरणों में भाग लेंगी, ऐसे निधि अंतरणों की रीति का और ऐसे निधि अंतरणों में भागीदारी के अधिकारों और बाध्यताओं का अधिकथित किया जाना भी है;]
(थ) वे परिस्थितियां जिनमें और वे शर्तें और परिसीमाएं जिनके अधीन भारत सरकार के किसी खोए, चोरी हो गए, विकृत्त या अपूर्ण करेन्सी नोट या बैंक-नोट का मूल्य प्रतिदत्त किया जा सकेगा;
[(थक) धारा 45यघ की उपधारा (2) के अधीन मुद्रा नीति समिति के सदस्यों को संदेय पारिश्रमिक और अन्य भत्ते;
(थख) धारा 45यछ की उपधारा (2) के अधीन सचिव के कृत्य;
(थग) धारा 45यझ की उपधारा (12) के अधीन मुद्रा नीति समिति की प्रक्रिया, अधिवेशन के संचालन की रीति और अन्य संबंधित विषय;
(थघ) धारा 45यञ की उपधारा (2) के अधीन दस्तावेज के प्रकाशन की विशिष्टियां और आवर्ती;
(थङ) धारा 45यड की उपधारा (2) के अधीन प्रकाशित की जाने वाली मुद्रा नीति रिपोर्ट का प्ररूप और उनकी अंतर्वस्तुएं;] और
(द) साधारणतः रिजर्व बैंक के काम-काज का दक्ष संचालन ।
[(3) इस धारा के अधीन बनाया गया कोई भी विनियम ऐसी पूर्ववर्ती या पश्चात्वर्ती तारीख से प्रभावी होगा जो विनियम में विनिर्दिष्ट की जाए ।
(4) केन्द्रीय बोर्ड द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र केन्द्रीय सरकार को भेजा जाएगा और वह सरकार उसकी एक प्रति संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखवाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के, या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
[(5)] इस धारा के अधीन बनाए गए सब विनियमों की प्रतियां जनता को उनका मूल्य चुकाने पर प्राप्त होंगी ।
[58क. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम या इसके अधीन किए गए या दिए गए किसी आदेश, विनियम या निदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार, रिज़र्व बैंक या किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम या इसके अधीन किए गए या दिए गए किसी आदेश, विनियम या निदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात द्वारा हुए या होने के लिए संभाव्य किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या रिज़र्व बैंक के विरुद्ध न होगी ।]
[अध्याय 5
शास्तियां
58ख. शास्तियां-(1) जो कोई इस अधिनियम या इसके अधीन किए गए या दिए गए किसी आदेश, विनियम या निदेश द्वारा या उसके अधीन या उसके किसी उपबन्ध के प्रयोजनों के लिए किए गए आवेदन, की गई घोषणा, अपेक्षित विवरणी, विवरण या दी गई जानकारी या विशिष्टियों में अथवा किसी ऐसे प्रास्पेक्ट्स या विज्ञापन में, जो किसी व्यक्ति द्वारा जनता से निक्षेप आमन्त्रित करने के लिए या उसके सम्बन्ध में जारी किया गया है, जानबूझकर ऐसा कथन, जिसका कोई महत्वपूर्ण अंश मिथ्या है, यह जानते हुए करेगा कि वह मिथ्या है, या कोई महत्वपूर्ण कथन करने का जानबूझकर लोप करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से भी, दण्डनीय होगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति कोई ऐसी बही, लेखा या अन्य दस्तावेज पेश करने में अथवा ऐसा कोई विवरण, जानकारी या विशिष्टियां देने में, जिसे पेश करने या देने का उसका कर्तव्य इस अधिनियम या इसके अधीन किए गए या दिए गए किसी आदेश, विनियम या निदेश के अधीन है अथवा किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर देने में, जो इस अधिनियम के उपबन्धों या उनके अधीन किए गए या दिए गए किसी आदेश, विनियम या निदेश के अनुसरण में उससे पूछा जाता है, असफल रहेगा, तो वह जुर्माने से, जो प्रत्येक अपराध की बाबत दो हजार रुपए तक का हो सकेगा तथा उस दशा में, जिसमें कि वह बराबर ऐसे ही असफल रहेगा या अपने इन्कार पर डटा रहेगा, अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम अपराध के पश्चात् ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान वह अपराध चालू रहता है, एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(3) यदि कोई व्यक्ति धारा 31 के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा, तो वह जुर्माने से, जो विनिमयपत्र, हुंडी, वचनपत्र या उस धन के संदाय के लिए, जिसकी बाबत अपराध किया गया है, वचनपत्र की रकम तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(4) यदि कोई व्यक्ति उधार विषयक किसी ऐसी जानकारी का प्रकटन करेगा जिसे प्रकट करना धारा 45ङ के अधीन प्रतिषिद्ध है, तो वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी; या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
[(4क) यदि कोई व्यक्ति, धारा 45झक की उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष से कम की नहीं होगी किन्तु जो पांच वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से, जो एक लाख रुपए से कम का नहीं होगा किन्तु जो पांच लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(4कक) यदि कोई लेखापरीक्षक, रिजर्व बैंक द्वारा धारा 45डख के अधीन दिए गए किसी निदेश या किए गए किसी आदेश का पालन करने में असफल रहेगा तो वह जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(4ककक) जो कोई, धारा 45थक की उपधारा (2) के अधीन कम्पनी विधि बोर्ड द्वारा किए गए किसी आदेश का पालन करने में असफल रहेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और ऐसे प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान ऐसा अनुपालन जारी रहता है, पचास रुपए से अन्यून के जुर्माने का भी दायी होगा ।]
(5) [यदि लेखा परीक्षक से भिन्न कोई व्यक्ति]-
(क) अध्याय 3ख के अधीन दिए गए किसी निदेश या आदेश के उल्लंघन में कोई निक्षेप प्राप्त करेगा; या
[(कक) अध्याय 3ख के उपबंधों में से किसी उपबंध के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा दिए गए किसी निदेश या किए गए किसी आदेश का पालन करने में असफल रहेगा; या]
(ख) कोई प्रास्पेक्ट्स या विज्ञापन, यथास्थिति, धारा 45ढक के या किसी आदेश के, जो धारा 45ञ के अधीन दिया गया है, अनुसार निकालने से अन्यथा निकालेगा,
तो वह कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा और ऐसे जुर्माने से भी दण्डनीय होगा, जो-
(i) खंड (क) के अधीन आने वाले किसी उल्लंघन की दशा में, प्राप्त निक्षेप की रकम के दुगुने तक का हो सकेगा, और
(ii) खंड (ख) के अधीन आने वाले किसी उल्लंघन की दशा में, प्रास्पेक्ट्स या विज्ञापन द्वारा मांगे गए निक्षेप की रकम के दुगुने तक का हो सकेगा ।
[(5क) यदि कोई व्यक्ति धारा 45ध के किसी उपबंध का उल्लंघन करेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से, जो उस धारा के उल्लंघन में ऐसे व्यक्ति द्वारा प्राप्त किए गए निक्षेप की रकम के दुगुने तक का या दो हजार रुपए तक का, इनमें से जो भी अधिक हो, हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगाः
परन्तु तत्प्रतिकूल ऐसे विशेष और पर्याप्त कारणों के अभाव में जो न्यायालय के निर्णय में उल्लिखित किए जाएंगे, कारावास एक वर्ष से कम का नहीं होगा और जुर्माना एक हजार रुपए से कम का नहीं होगा ।
(5ख) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 29 में किसी बात के होते हुए भी, महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह उपधारा (5क) के अधीन सिद्धदोष ठहराए गए किसी व्यक्ति पर उस धारा में विनिर्दिष्ट सीमा से अधिक जुर्माने का दंडादेश अधिरोपित करे ।]
(6) यदि इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध का उल्लंघन किया जाएगा अथवा इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी आदेश, विनियम या निदेश या अधिरोपित किसी शर्त की या किसी अन्य अपेक्षा का अनुपालन करने में कोई व्यतिक्रम किया जाएगा तो ऐसे उल्लंघन या व्यतिक्रम का दोषी कोई भी व्यक्ति जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा और जहां कि कोई उल्लंघन या व्यतिक्रम बराबर जारी रहता है वहां वह अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम अपराध के पश्चात् ऐसे प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान वह उल्लंघन या व्यतिक्रम जारी रहता है, एक सौ रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
58ग. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जो धारा 58ख में निर्दिष्ट उल्लंघन या व्यतिक्रम करने वाला व्यक्ति कोई कम्पनी हो वहां प्रत्येक व्यक्ति, जो उस उल्लंघन या व्यतिक्रम के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था, और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे उल्लंघन या व्यतिक्रम के दोषी समझे जाएंगे तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगेः
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि उल्लंघन या व्यतिक्रम उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे उल्लंघन या व्यतिक्रम के निवारण के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी अथवा कर्मचारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है, या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी अथवा कर्मचारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और, तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण 1-इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध के बारे में यह समझा जाएगा कि वह उस स्थान पर किया गया है जहां उस कम्पनी का भारत में कारबार का, यथास्थिति, रजिस्ट्रीकृत कार्यालय या प्रधान स्थान स्थित है ।
स्पष्टीकरण 2-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) “कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत निगम, गैर-बैंककारी संस्था, फर्म, सहकारी सोसाइटी या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है;
(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
58घ. धारा 58ख के लागू होने का वर्जन-धारा 58ख की कोई भी बात किसी ऐसे मामले को या उसकी बाबत लागू नहीं होगी जिसकी चर्चा धारा 42 में की गई है ।
58ङ. अपराधों का संज्ञान-(1) कोई भी न्यायालय इस अधनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान, रिजर्व बैंक के ऐसे अधिकारी द्वारा, जो रिजर्व बैंक द्वारा लिखित रूप में साधारणतया या विशिष्टतया इस निमित्त प्राधिकृत है, लिखित रूप में किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं और प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग मजिस्ट्रेट से अवर कोई भी न्यायालय या उससे वरिष्ठ न्यायालय ऐसे अपराध का विचारण नहीं करेगाः
[परन्तु धारा 58ख की उपधारा (5क) के अधीन दंडनीय किसी अपराध के सम्बन्ध में लिखित परिवाद राज्य सरकार के ऐसे अधिकारी द्वारा भी किया जा सकेगा जो उस सरकार द्वारा लिखित रूप में साधारणतया या विशिष्टतया इस निमित्त प्राधिकृत है ।]
(2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, यदि मजिस्ट्रेट को ऐसा करने का कोई कारण दिखाई देता है तो वह बैंक के उस अधिकारी को, जिसने परिवाद फाइल किया है, स्वीय हाजिरी से अभिमुक्त कर सकेगा, किन्तु मजिस्ट्रेट कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर परिवादी की स्वीय हाजिरी का निदेश स्वविवेकानुसार दे सकेगा ।
58च. जुर्माने का उपयोजन-इस अधिनियम के अधीन जुर्माना अधिरोपित करने वाला कोई भी न्यायालय यह निदेश दे सकेगा कि पूरा जुर्माना या उसका कोई भाग कार्यवाही के खर्चे में या उन खर्चों के संदाय के लिए उपयोजित किया जाएगा ।
[58छ. जुर्माना अधिरोपित करने की रिजर्व बैंक की शक्ति-(1) धारा 58ख में किसी बात के होते हुए भी, यदि धारा 58ख में उल्लिखित प्रकृति का कोई उल्लंघन या व्यतिक्रम किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कम्पनी द्वारा किया जाता है तो रिजर्व बैंक, ऐसी गैर-बैंककारी वित्तीय कम्पनी पर,-
(क) पांच हजार रुपए से अनधिक की शास्ति अधिरोपित कर सकेगा; या
(ख) जहां उल्लंघन या व्यतिक्रम धारा 58ख की उपधारा (4क) या उपधारा (5) के खंड (क) या खंड (कक) के अधीन हो, वहां पांच लाख रुपए से अनधिक की या ऐसे उल्लंघन या व्यतिक्रम में, जहां रकम अनुमान्य है, अन्तर्वलित रकम के दोगुने की, इनमें से जो भी अधिक हो शास्ति अधिरोपित कर सकेगा, और जहां ऐसा उल्लंघन या व्यतिक्रम जारी रहने वाला है वहां प्रथम शास्ति के पश्चात् प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसा उल्लंघन या व्यतिक्रम जारी रहता है, पच्चीस हजार रुपए तक की शास्ति और अधिरोपित कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन शास्ति अधिरोपित करने के प्रयोजन के लिए रिजर्व बैंक, गैर-बैंककारी वित्तीय कम्पनी पर सूचना की तामील करेगा जिसमें उससे इस बारे में कारण दर्शित करने की अपेक्षा की जाएगी कि सूचना में विनिर्दिष्ट रकम शास्ति के रूप में अधिरोपित क्यों न की जाए और ऐसी गैर-बैंककारी वित्तीय कम्पनी को सुने जाने का युक्तियुक्त अवसर प्रदान किया जाएगा ।
(3) इस धारा के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा अधिरोपित कोई शास्ति, उस तारीख से जिसको रिजर्व बैंक द्वारा उक्त राशि के संदाय की मांग करते हुए जारी की गई सूचना की गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी पर तामील की जाती है, तीस दिन की अवधि के भीतर संदेय होगी और गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के ऐसी अवधि के भीतर उस राशि का संदाय करने में असफल रहने की दशा में, उस क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले प्रधान सिविल न्यायालय द्वारा दिए गए निदेश पर जहां गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय या प्रधान कार्यालय स्थित है, शास्ति उद्गृहीत की जा सकेगीः
परन्तु प्रधान सिविल न्यायालय द्वारा ऐसा कोई निदेश इस निमित्त प्राधिकृत रिजर्व बैंक के किसी अधिकारी द्वारा किए गए आवेदन पर ही दिया जाएगा अन्यथा नहीं ।
(4) उपधारा (3) के अधीन निदेश जारी करने वाला न्यायालय, गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी द्वारा संदेय राशि को विनिर्दिष्ट करने वाला प्रमाणपत्र जारी करेगा और ऐसा प्रत्येक प्रमाणपत्र उसी रीति से प्रवर्तनीय होगा मानो वह किसी सिविल वाद में न्यायालय द्वारा दी गई डिक्री हो ।
(5) ऐसे किसी उल्लंघन या व्यतिक्रम की बाबत जिसके संबंध में इस धारा के अधीन रिजर्व बैंक द्वारा कोई शास्ति अधिरोपित की गई है, किसी गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के विरुद्ध कोई भी परिवाद किसी न्यायालय में फाइल नहीं किया जाएगा ।
(6) जहां धारा 58ख में निर्दिष्ट प्रकृति के किसी उल्लंघन या व्यतिक्रम के संबंध में किसी न्यायालय में गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के विरुद्ध कोई परिवाद फाइल किया गया है वहां, उस गैर-बैंककारी वित्तीय कंपनी के विरुद्ध शास्ति अधिरोपित करने के लिए कोई कार्यवाही इस धारा के अधीन नहीं की जाएगी ।
59. से 61. [1906 के अधिनियम संख्यांक 3 का संशोधन । निरसन । 1913 के अधिनियम संख्यांक 7 की धारा 11 का संशोधन ।]-1937 के अधिनियम संख्यांक 20 की धारा 3 और अनुसूची 2 द्वारा निरसित ।
[प्रथम अनुसूची
(धारा 9 देखिए)
[1. पश्चिमी क्षेत्र, गोवा, गुजरात, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र राज्यों तथा दादरा और नागर हवेली और दमण और दीव के संघ राज्यक्षेत्रों से मिलकर बनेगा ।
2. पूर्वी क्षेत्र, अरुणाचल प्रदेश, असम, बिहार, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, उड़ीसा, सिक्किम, त्रिपुरा, और पश्चिमी बंगाल राज्यों तथा अंदमान और निकोबार द्वीपों के संघ राज्यक्षेत्रों से मिलकर बनेगा ।]
3. उत्तरी क्षेत्र, जम्मू-कश्मीर [पंजाब, हरियाणा,] [हिमाचल प्रदेश,] राजस्थान और उत्तर प्रदेश के राज्यों और [चंडीगढ़] [और दिल्ली] के संघ राज्यक्षेत्रों से मिलकर बनेगा ।
4. दक्षिणी क्षेत्र, आंध्र प्रदेश, [कर्नाटक], [तमिलनाडु] और केरल राज्यों और [पांडिचेरी और [लक्षद्वीप] के राज्यक्षेत्रों से मिलकर बनेगा]] ।]
[द्वितीय अनुसूची
[धारा 42 और धारा 2 (ङ) देखिए]
अनुसूचित बैंक
आन्ध्र प्रदेश स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, हैदराबाद ।
बिहार स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, पटना ।
गुजरात स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, अहमदाबाद ।
केरल स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, त्रिवेन्द्रम ।
मध्य प्रदेश राज्य सहकारी बैंक मर्यादित, जबलपुर ।
तमिलनाडु स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, मद्रास ।
महाराष्ट्र स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, मुम्बई ।
कर्नाटक स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, बंगलौर ।
उड़ीसा स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, कटक ।
राजस्थान स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, जयपुर ।
उत्तर प्रदेश स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, लखनऊ ।
वेस्ट बंगाल स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, कलकत्ता ।
पंजाब स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, चण्डीगढ़ ।
हरियाणा स्टेट कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, अंबाला सिटी, जिसका मुख्यालय चंड़ीगढ़ है ।
इलाहाबाद बैंक ।
आन्ध्र बैंक ।
बैंक आफ बड़ौदा ।
बैंक आफ इंडिया ।
बैंक आफ महाराष्ट्र ।
केनारा बैंक ।
सेंट्रल बैंक आफ इंडिया ।
कारपोरेशन बैंक ।
देना बैंक ।
इंडियन बैंक ।
इंडियन ओवरसीज बैंक ।
न्यू बैंक आफ इंडिया ।
ओरियन्टल बैंक आफ कामर्स ।
पंजाब नेशनल बैंक ।
पंजाब एंड सिंध बैंक ।
सिंडिकेट बैंक ।
यूनियन बैंक आफ इंडिया ।
यूनाइटेड बैंक आफ इंडिया ।
यूनाइटेड कामर्शियल बैंक ।
विजया बैंक ।
भारतीय स्टेट बैंक ।
स्टेट बैंक आफ बीकानेर एंड जयपुर ।
स्टेट बैंक आफ हैदराबाद ।
स्टेट बैंक आफ इंदौर ।
स्टेट बैंक आफ मैसूर ।
स्टेट बैंक आफ पटियाला ।
स्टेट बैंक आफ सौराष्ट्र ।
स्टेट बैंक आफ ट्रावनकोर ।
बैंक आफ कोचीन लिमिटेड, अर्नाकुलम ।
बैंक आफ कराड़ लिमिटेड, कराड़ ।
बैंक आफ मदुरै लिमिटेड, मदुरै ।
बैंक आफ राजस्थान लिमिटेड, उदयपुर ।
बैंक आफ तंजावूर लिमिटेड ।
बरेली कारपोरेशन बैंक लिमिटेड, बरेली ।
बनारस स्टेट बैंक लिमिटेड ।
भारत ओवरसीज बैंक लिमिटेड, मद्रास ।
कैथोलिक सीरियन बैंक लिमिटेड, त्रिचुर ।
धनलक्ष्मी बैंक लिमिटेड, त्रिचुर ।
फेडरल बैंक लिमिटेड, अलवई ।
हिन्दुस्तान कमर्शियल बैंक लिमिटेड, कानपुर ।
जम्मू एण्ड कश्मीर बैंक लिमिटेड, श्रीनगर ।
कर्नाटक बैंक लिमिटेड, मंगलौर ।
करूर वैश्य बैंक लिमिटेड ।
कुम्भकोणम सिटी यूनियन बैंक लिमिटेड ।
लक्ष्मी कमर्शियल बैंक लिमिटेड ।
लक्ष्मी विलास बैंक लिमिटेड, करूर ।
लार्ड कृष्ण बैंक लिमिटेड, कोडुंगल्लूर ।
मीरज स्टेट बैंक लिमिटेड ।
नैनीताल बैंक लिमिटेड ।
नेंडुगाडी बैंक लिमिटेड, कालीकट ।
पारूर सेंट्रल बैंक लिमिटेड ।
पंजाब कोआपरेटिव बैंक लिमिटेड, अमृतसर ।
पूर्वांचल बैंक लिमिटेड, गोहाटी ।
रत्नाकार बैंक लिमिटेड, कोल्हापुर ।
सांगली बैंक लिमिटेड ।
बैंक आफ तमिलनाडु लिमिटेड ।
साउथ इंडियन बैंक लिमिटेड ।
तमिलनाडु मर्केन्टाइल बैंक लिमिटेड ।
ट्रेडर्स बैंक लिमिटेड ।
यूनाइटेड इण्डस्ट्रियल बैंक लिमिटेड, कलकत्ता ।
यूनाइटेड वेस्टर्न बैंक लिमिटेड, बंगलौर सिटी ।
वैश्य बैंक लिमिटेड ।
एलेजमेन बैंक आफ नेदरलैंड्स एन० वी० ।
अमेरिकन एक्सप्रेस इंटरनेशनल बैंकिंग कारपोरेशन ।
बैंक आफ अमेरिका नेशनल ट्रस्ट एण्ड सेविंग्स एसोसिएशन ।
बैंक आफ टोकियो लिमिटेड ।
बैंक नेशनल द पेरिस ।
ब्रिटिश बैंक आफ दि मिडिल ईस्ट ।
स्टैडर्ड चार्टर्ड बैंक ।
सिटी बैंक एन० ए० ।
ग्रिंडलेज बैंक पी०आई०सी० ।
हांग कांग एण्ड शंघाई बैंकिंग कारपोरेशन ।
मितसुई बैंक लिमिटेड ।
सेनाली बैंक ।
यूरोपियन एशियन बैंक ।
अमीरात कमर्शियल बैंक लिमिटेड ।
बैंक आफ ओमान लिमिटेड ।
बैंक इंडोस्वेज ।
बैंक आफ क्रेडिज एंड कामर्स इंटरनेशनल (ओवरसीज) लिमिटेड ।
बैंक आफ नोवा स्काटिया ।
हबीब बैंक लिमिटेड ।
नेशनल बैंक आफ पाकिस्तान ।
प्रथमा बैंक, मुरादाबाद (उत्तर प्रदेश) ।
गोरखपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, गोरखपुर (उत्तर प्रदेश) ।
जयपुर नागौर आंचलिक ग्रामीण बैंक, जयपुर (राज़स्थान) ।
हरियाणा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, भिवानी (हरियाणा) ।
गौड़ ग्रामीण बैंक, माल्दा (पश्चिमी बंगाल) ।
भोजपुर रोहतास ग्रामीण बैंक, आरा (बिहार) ।
संयुक्त क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, बेलइसा (उत्तर प्रदेश) ।
क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, होशंगाबाद (मध्य प्रदेश) ।
तुंगभद्रा ग्रामीण बैंक, बेल्लारी (कर्नाटक) ।
पुरी ग्राम्य बैंक, पिपली (उड़ीसा) ।
जम्मू ग्रामीण बैंक, (जम्मू-कश्मीर) ।
चम्पारन क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, मोतीहारी (बिहार) ।
बाराबंकी ग्रामीण बैंक, बाराबंकी (उत्तर प्रदेश) ।
गुड़गांव ग्रामीण बैंक, गुड़गांव (हरियाणा) ।
रायबरेली क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, रायबरेली (उत्तर प्रदेश) ।
फर्रूखाबाद ग्रामीण बैंक, फर्रुखाबाद (उत्तर प्रदेश) ।
मल्लभूम ग्रामीण बैंक, बांकुरा (पश्चिमी बंगाल) ।
बोलांगीर आंचलिक ग्राम्य बैंक, बोलांगीर (उड़ीसा) ।
नागार्जुन ग्रामीण बैंक, खमाम (आन्ध्र प्रदेश) ।
प्राज्योतिष गाओलिया बैंक, नलबारी (असम) ।
रायलसीमा ग्रामीण बैंक, कुडप्पा (आन्ध्र प्रदेश) ।
माल प्रभा ग्रामीण बैंक, धारवार (कर्नाटक) ।
मयूराक्षी ग्रामीण बैंक, सूरी (पश्चिमी बंगाल) ।
मराठवाड़ा ग्रामीण बैंक, नांदेड़ (महाराष्ट्र) ।
मारवाड़ ग्रामीम बैंक, पाली (राजस्थान) ।
भागीरथ ग्रामीण बैंक, सीतापुर (उत्तर प्रदेश) ।
श्री विशाखा ग्रामीण बैंक, श्री काकुलम (आन्ध्र प्रदेश) ।
कावेरी ग्रामीण बैंक, मैसूर (कर्नाटक) ।
शेखावटी ग्रामीण बैंक, सीकर (राजस्थान) ।
कटक ग्राम्य बैंक, कटक (उड़ीसा) ।
बिलासपुर रायपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, बिलासपुर (मध्य प्रदेश) ।
मगध ग्रामीण बैंक, गया (बिहार) ।
कोरापुट पंचवटी ग्राम्य बैंक, जयपुर (उड़ीसा) ।
साउथ मलबार ग्रामीण बैंक, मलप्पुरम (केरल) ।
नार्थ मलबार ग्रामीण बैंक, कन्ननूर (केरल) ।
रीवा-सीधी ग्रामीण बैंक, रीवा (मध्य प्रदेश) ।
त्रिपुरा ग्रामीण बैंक, अगरतल्ला (त्रिपुरा) ।
हिमाचल ग्रामीण बैंक, मण्डी (हिमाचल प्रदेश) ।
कोसी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, पुर्णिया (बिहार) ।
बलिया क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, बलिया (उत्तर-प्रदेश) ।
सुल्तानपुर क्षेत्रीय ग्राणीण बैंक, सुल्तानपुर (उत्तर-प्रदेश) ।
उत्तर बंग क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, कूच बिहार (पश्चिमी बंगाल) ।
पांड्यन ग्राम बैंक, सेप्तूर (तमिलनाडु) ।
वैशाली क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, मुजफ्फरपुर (बिहार) ।
मुंगेर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, मुंगेर (बिहार) ।
बुंदेलखंड क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, टिक्कमगढ़ (मध्य प्रदेश) ।
संथाल परगना ग्रामीण बैंक, डुमका (बिहार) ।
हरदोई उन्नाव ग्रामीण बैंक, हरदोई (उत्तर प्रदेश) ।
कृष्णा ग्रामीण बैंक, गुलबर्गा (कर्नाटक) ।
कच्छ ग्रामीण बैंक, भुज (गुजरात) ।
जामनगर ग्रामीण बैंक, जामनगर (गुजरात) ।
मरूधर ग्रामीण बैंक, चुरू (राजस्थान) ।
मधुबनी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, मधुबनी (बिहार) ।
नालन्दा ग्रामीण बैंक, बिहार शरीफ (बिहार) ।
सिंघभूम क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, चाई बासा (बिहार) ।
शारदा ग्रामीण बैंक, सतना (मध्य प्रदेश) ।
इलाकाई देहाती बैंक, श्रीनगर (जम्मू-कश्मीर) ।
सरगुजा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, अंबिकापुर (मध्य प्रदेश) ।
श्री अनन्त ग्रामीण बैंक, अनन्तपुर (आन्ध्र प्रदेश) ।
बस्तर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, जगदलपुर (मध्य प्रदेश) ।
कानपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, कानपुर (उत्तर प्रदेश) ।
श्रावस्ती ग्रामीण बैंक, बहराइच (उत्तर प्रदेश) ।
दुर्ग-राजनांदगांव ग्रामीण बैंक, राजनांदगांव (मध्य प्रदेश) ।
मिथिला क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, दरभंगा (बिहार) ।
इटावा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, इटावा (उत्तर प्रदेश) ।
समस्तीपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, समस्तीपुर (बिहार) ।
पलामू क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, डालटेनगं (बिहार) ।
किसान ग्रामीण बैंक, बदायूं (उत्तर प्रदेश) ।
क्षेत्रीय किसान ग्रामीण बैंक, मैनपुरी (उत्तर प्रदेश) ।
कमलाहांडी आंचलिक ग्राम्य बैंक, भीवनीपटना (उड़ीसा) ।
झाबुआ-धार क्षेत्रीय ग्राम्य बैंक, झाबुआ (मध्य प्रदेश) ।
रांची क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, रांची (बिहार) ।
बेतरनी ग्राम्य बैंक, बारिपाड़ा (उड़ीसा) ।
काशी ग्रामीण बैंक, वाराणसी (उत्तर प्रदेश) ।
लखिमी गांवलिया बैंक, गोलाघाट (असम) ।
बस्ती ग्रामीण बैंक, बस्ती (उत्तर प्रदेश) ।
बालासौर ग्राम्य बैंक, बालासौर (उड़ीसा) ।
इलाहाबाद क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, इलाहाबाद (उत्तर प्रदेश) ।
प्रतापगढ़ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, प्रतापगढ़ (उत्तर प्रदेश) ।
नादिया ग्रामीण बैंक, कृष्णनगर (पश्चिमी बंगाल) ।
फैजाबाद क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) ।
फतेहपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ।
सागर ग्रामीण बैंक, आमतल्ला (पश्चिमी बंगाल) ।
बरेली क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, बरेली (उत्तर प्रदेश) ।
बर्धमान ग्रामीण बैंक, बर्धवान (पश्चिमी बंगाल) ।
देवीपाटन क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, गौंडा (उत्तर प्रदेश) ।
रायगढ़ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, रायगढ़ (मध्य प्रदेश) ।
श्रृषिकृल्य ग्राम्य बैंक, बरहामपुर (मध्य प्रदेश) ।
अलवर भरतपुर आंचलिक ग्रामीण बैंक, भरतपुर (राजस्थान) ।
अलीगढ़ ग्रामीण बैंक, अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) ।
श्री वेंकटेश्वर ग्रामीण बैंक, चित्तूर (आन्ध्र प्रदेश) ।
तुलसी ग्रामीण बैंक, बांदा (उत्तर प्रदेश) ।
गोपालगंज क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, गोपालगंज (बिहार) ।
शिवपुरी गुना क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, शिवपुरी (मध्य प्रदेश) ।
सारण क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, छपरा (बिहार) ।
एटा ग्रामीण बैंक, एटा (उत्तर प्रदेश) ।
गोमती ग्रामीण बैंक, जोनपुर (उत्तर प्रदेश) ।
दमोह-पन्ना-सागर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, दमोह (मध्य प्रदेश) ।
सिवान क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सिवान (बिहार) ।
कछार ग्रामीण बैंक, सिलचर (असम) ।
कामराज रूरल बैंक, सोपोर (जम्मू-कश्मीर) ।
चित्रदुर्ग ग्रामीण बैंक, चित्रदुर्ग (कर्नाटक) ।
धेनकनाल ग्राम्य बैंक, धेनकनाल (उड़ीसा) ।
आवली क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, सवाई माधोपुर (राजस्थान) ।
बनासकांठा-मेहसाणा ग्रामीण बैंक, पाटण (गुजरात) ।
खासी जयन्तिया रूरल बैंक, शिलांग (मेघालय) ।
लांगपी देहानगी रूरल बैंक, दीफू (असम) ।
श्री सरस्वती ग्रामीण बैंक, आदिलाबाद (आंध्र प्रदेश) ।
पंचमहल ग्रामीण बैंक, गोधरा (गुजरात) ।
छत्रसाल ग्रामीण बैंक, उरई (उत्तर प्रदेश) ।
देवास शाजापुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, देवास (मध्य प्रदेश) ।
सुबन सीरी गाओलिया बैंक, उत्तरी लखीमपुर (असम) ।
कल्पतरू ग्रामीण बैंक, तुमकुर (कर्नाटक) ।
संगमेश्वर ग्रामीण बैंक, महबूबनगर (आन्ध्र प्रदेश) ।
रानी लक्ष्मी बाई क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, झांसी (उत्तर प्रदेश) ।
मंजिरा ग्रामीण बैंक, संगारेड्डी, मेडक (आंध्र प्रदेश) ।
पिनाकिनी ग्रामीण बैंक, नेलौर (आन्ध्र प्रदेश) ।
हावड़ा ग्रामीण बैंक, हावड़ा (पश्चिमी बंगाल) ।
निमाड़ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, खारगोन (मध्य प्रदेश) ।
काकथिया ग्रामीण बैंक, वारंगल (आन्ध्र प्रदेश) ।
हाडोती क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, कोटा (राजस्थान) ।
मांडला बालाघाट क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, मांडला (मध्य प्रदेश) ।
औरंगाबाद जालना क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, औरंगाबाद (महाराष्ट्र) ।
विदुर ग्रामीण बैंक, बिजनौर (उत्तर प्रदेश) ।
छिंदवाड़ा सिवनी क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, छिंदवाड़ा (मध्य प्रदेश) ।
मेवाड़ आंचलिक ग्रामीण बैंक, उदयपुर (राजस्थान) ।
थार आंचलिक ग्रामीण बैंक, जोधपुर (राजस्थान) ।
चन्द्रपुर गाड़चिरोली ग्रामीण बैंक, चंद्रपुर (महाराष्ट्र) ।
कोलार ग्रामीण बैंक, कोलार (कर्नाटक) ।
राजगढ़ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, राजगढ़ (मध्य प्रदेश) ।
शाहजहांपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, शाहजहांपुर (उत्तर प्रदेश) ।
चैतन्य ग्रामीण बैंक, तेनाली, गुन्तूर जिला (आंध्र प्रदेश) ।
नैनीताल अल्मोड़ा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, नैनीताल (उत्तर प्रदेश) ।
श्री सातवाहन ग्रामीण बैंक, करीमनगर (आंध्र प्रदेश) ।
विंध्यवासिनी ग्रामीण बैंक, मिर्जापुर (उत्तर प्रदेश) ।
नागालैंड रूरल बैंक, कोहिमा (नागालैंड) ।
शिवालिक क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, होशियारपुर (पंजाब) ।
कपूरथला फिरोजपुर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, कपूरथला (पंजाब) ।
गुरदासपुर अमृतसर ग्रामीण विकास बैंक, गुरदासपुर (पंजाब) ।
बीजापुर ग्रामीण विकास बैंक, बीजापुर (कर्नाटक) ।
शहडोल क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, शहडोल (मध्य प्रदेश) ।
सरयू ग्रामीण बैंक, खेरी (लखीमपुर खेरी) (उत्तर प्रदेश) ।
मिजोरम रूरल बैंक (मिजोरम) ।
अकोला ग्रामीण बैंक, अकोला (महाराष्ट्र) ।
रत्नागिरी सिंदूदुर्ग ग्रामीण बैंक, रत्नागिरी (महाराष्ट्र) ।
रतलाम-मंदसौर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, मंदसौर (मध्य प्रदेश) ।
अरुणाचल प्रदेश रूरल बैंक, पासीघाट (अरुणाचल प्रदेश) ।
जमुना ग्रामीण बैंक, आगरा (उत्तर प्रदेश) ।
सुरेन्द्रनगर-भावनगर ग्रामीण बैंक, सुरेन्द्रनगर (गुजरात) ।
सोलापुर ग्रामीण बैंक, सोलापुर (महाराष्ट्र) ।
भंडारा ग्रामीण बैंक, भंडारा (महाराष्ट्र) ।
चंबल क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, मुरैना (मध्य प्रदेश) ।
बलसाड़-डांग ग्रामीण बैंक, बलसाड़ (गुजरात) ।
सूरत-भरुच ग्रामीण बैंक, भरूच (गुजरात) ।
बूंदी-चित्तोड़गढ़ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, बूंदी (राजस्थान) ।
भीलवाड़ा-अजमेर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, भीलवाड़ा (राजस्थान) ।
डुंगरपुर बांसवाड़ा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, डुंगरपुर (राजस्थान) ।
श्रीगंगानगर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, श्री गंगानगर (राजस्थान) ।
महाकौशल क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, नरसिंहपुर (मध्य प्रदेश) ।
चिकमगलूर-कोड़ागू ग्रामीण बैंक, चिकमगलूर (कर्नाटक) ।
गिरडीह क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, गिरडीह (बिहार) ।
मुजफ्फरनगर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, मुजफ्फरनगर (उत्तर प्रदेश) ।
साबरकांथा-गांधीनगर ग्रामीण बैंक, हिम्मतनगर (गुजरात) ।
सहयाद्री ग्रामीण बैंक, शिमोगा (कर्नाटक) ।
हिसार-सिरसा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, हिसार (हरियाणा) ।
इन्दौर-उज्जैन क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, उज्जैन (मध्य प्रदेश) ।
नेत्रवती ग्रामीण बैंक, मंगलौर (कर्नाटक) ।
वरदा ग्रामीण बैंक, कुम्टा (कर्नाटक) ।
अम्बाला-कुरूक्षेत्र ग्रामीण बैंक, अम्बाला शहर (हरियाणा) ।
मुर्शिदाबाद ग्रामीण बैंक, बरहामपुर (पश्चिमी बंगाल) ।
जूनागढ़ अमरेली ग्रामीण बैंक, जूनागढ़ (गुजरात) ।
हजारीबाग क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, हजारीबाग (बिहार) ।
यवतमाल ग्रामीण बैंक, यवतमाल (महाराष्ट्र) ।
पाटलिपुत्र ग्रामीण बैंक, पटना (बिहार) ।
गोलकुंडा ग्रामीण बैंक, हैदराबाद (आन्ध्र प्रदेश) ।
श्रीराम ग्रामीण बैंक, निजामाबाद (आन्ध्र प्रदेश) ।
भागलपुर-बांका क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, भागलपुर (बिहार) ।
बेगूसराय क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, बेगूसराय (बिहार) ।
पिथौरागढ़ क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, पिथौरागढ़ (उत्तर प्रदेश) ।
गंगा यमुना ग्रामीण बैंक, देहरादून (उत्तर प्रदेश) ।
बीकानेर क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, बीकानेर (राजस्थान) ।
विश्वेश्वरैया ग्रामीण बैंक, मण्डया (कर्नाटक) ।
अलकनंदा ग्रामीण बैंक, पौड़ी (उत्तर प्रदेश) ।
बुलढाणा ग्रामीण बैंक, बुलढाणा (महाराष्ट्र) ।
पर्वतीय ग्रामीण बैंक, चम्बा (हिमाचल प्रदेश) ।
अधियमान ग्रामीण बैंक, धर्मपुरी (तमिलनाडु) ।
ग्वालियर दतिया क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, दतिया (मध्य प्रदेश) ।
मालवा ग्रामीण बैंक, संगरूर (पंजाब) ।
कनकदुर्गा ग्रामीण बैंक, गुडीवाडा (आन्ध्र प्रदेश) ।
फरीदकोट भटिंडा क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, भटिंडा (पंजाब) ।
ठाणे ग्रामीण बैंक, ठाणे (महाराष्ट्र) ।
विदिशा-भोपाल क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, विदिशा (मध्य प्रदेश) ।
गोदवरी ग्रामीण बैंक, राजमुंद्री (आंध्र प्रदेश) ।
तृतीय अनुसूची-1955 के अधिनियम सं० 23 की धारा 52 और तीसरी अनुसूची द्वारा (1-7-1955 से) निरसित ।
चतुर्थ अनुसूची-1948 के अधिनियम सं० 62 की धारा 7 और अनुसूची द्वारा (1-1-1949 से) निरसित ।
पंचम अनुसूची-इंडिया एंड बर्मा (बर्मा मानेटरी अरेन्जमेंट्स) आर्डर, 1937 द्वारा निरसित ।
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