यान-हरण निवारण अधिनियम, 1982
(1982 का अधिनियम संख्यांक 65)
[6 नवम्बर, 1982]
वायुयान के विधिविरुद्ध अभिग्रहण के दमन
के लिए कन्वेंशन को प्रभावी करने
और उससे सम्बन्धित
विषयों के लिए
अधिनियम
वायुयान के विधिविरुद्ध अभिग्रहण के दमन के लिए कन्वेंशन पर 16 दिसम्बर, 1970 को हेग में हस्ताक्षर किए गए थे ;
और यह समीचीन है कि भारत उक्त कन्वेंशन को मान ले और उसे प्रभावी करने और उससे सम्बन्धित विषयों के लिए उपबंध करे ;
अतः भारत गणराज्य के तैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, लागू होना और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम यान-हरण निवारण अधिनियम, 1982 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है और जैसा कि इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित है, उसके सिवाय यह उसके अधीन किसी भी ऐसे अपराध को लागू होता है जो किसी व्यक्ति द्वारा भारत के बाहर किया गया है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) वायुयान" से ऐसा वायुयान अभिप्रेत है, चाहे वह भारत में रजिस्ट्रीकृत है या नहीं, जो सैनिक वायुयान अथवा सीमाशुल्क या पुलिस सेवाओं में प्रयुक्त वायुयान से भिन्न है ;
(ख) भारत में रजिस्ट्रीकृत वायुयान" से ऐसा वायुयान अभिप्रेत है जो तत्समय भारत में रजिस्ट्रीकृत है ;
(ग) कन्वेंशन देश" से ऐसा देश अभिप्रेत है जिसमें तत्समय हेग कन्वेंशन प्रवृत्त है ;
(घ) हेग कन्वेंशन" से वायुयानों के विधिविरुद्ध अभिग्रहण के दमन के लिए वह कन्वेंशन अभिप्रेत है जिस पर 16 दिसम्बर, 1970 को हेग में हस्ताक्षर किए गए थे ;
(ङ) सैनिक वायुयान" से किसी देश की नौसेना, थल सेना, वायुसेना या किन्हीं अन्य सशस्त्र बलों का वायुयान अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत प्रत्येक ऐसा वायुयान भी है, जो तत्समय ऐसे किसी बल के किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा समादेशित है जिसे उस प्रयोजन के लिए लगाया गया है ।
अध्याय 2
यान-हरण और सम्बद्ध अपराध
3. यान-हरण-(1) जो कोई उड़ानरत वायुयान पर, विधिविरुद्धतया, बल या बल की धमकी द्वारा अथवा किसी अन्य प्रकार के अभित्रास द्वारा उस वायुयान का अभिग्रहण कर लेता है या उस पर नियंत्रण कर लेता है, वह ऐसे वायुयान के हरण का अपराध करता है ।
(2) जो कोई किसी वायुयान के संबंध में उपधारा (1) में निर्दिष्ट कार्यों में से कोई कार्य करने का प्रयत्न करता है, अथवा ऐसे किसी कार्य के किए जाने का दुष्प्रेरण करता है, उसकी बाबत भी यह समझा जाएगा कि उसने ऐसे वायुयान के हरण का अपराध किया है ।
(3) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, किसी वायुयान को किसी भी समय, उसी क्षण से जब उसके सभी बाहरी द्वार उड़ान के लिए यात्रियों के चढ़ जाने के पश्चात् बन्द कर दिए जाते हैं, उस क्षण तक जब तक कि ऐसा कोई द्वार उड़ान के पश्चात् यात्रियों के उतरने के लिए खोल नहीं दिया जाता है, उड़ानरत समझा जाएगा, तथा किसी वायुयान के विवश होकर उतरने की दशा में, उड़ान को तब तक जारी समझा जाएगा जब तक कि उस देश के, जिसमें इस प्रकार विवश होकर उतरना पड़ता है, सक्षम प्राधिकारी उस वायुयान की तथा उस पर के व्यक्तियों और सम्पत्ति की जिम्मेदारी नहीं संभाल लेते हैं ।
4. यान-हरण के लिए दण्ड-जो कोई यान-हरण का अपराध करता है, उसे आजीवन कारावास से दण्डित किया जाएगा और वह जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
5. यान-हरण से सम्बद्ध हिंसा के कार्यों के लिए दण्ड-जो कोई, ऐसा व्यक्ति होते हुए जो किसी वायुयान के हरण का अपराध कर रहा है, ऐसे अपराध के सम्बन्ध में, ऐसे वायुयान के किसी यात्री या कर्मीदल के सदस्य के प्रति हिंसा का कोई कार्य करता है, उसे वही दण्ड दिया जाएगा जिससे वह भारत में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन तब दण्डनीय होता जब ऐसा कार्य भारत में किया जाता ।
[5क. अन्वेषण, आदि की शक्तियों का प्रदान किया जाना-(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, दंड प्रकिया संहिता, 1973 के अधीन किसी पुलिस अधिकारी द्वारा प्रयोक्तव्य गिरफ्तारी, अन्वेषण और अभियोजन की शक्तियां केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी को, प्रदान कर सकेगी ।
(2) पुलिस के सभी अधिकारियों और सरकार के सभी अधिकारियों से यह अपेक्षा की जाती है और उन्हें इस बात के लिए सशक्त किया जाता है कि वे इस अधिनियम के उपबंधों के निष्पादन में, उपधारा (1) में निर्दिष्ट केन्द्रीय सरकार के अधिकारियों की सहायता करें ।]
6. अधिकारिता-(1) उपधरा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां धारा 4 या धारा 5 के अधीन कोई अपराध भारत के बाहर किया गया है, वहां ऐसा अपराध करने वाले व्यक्ति के साथ उसकी बाबत वैसी ही कार्रवाई की जा सकेगी मानो ऐसा अपराध भारत में किसी ऐसे स्थान पर, जहां वह पाया जाए, किया गया है ।
(2) कोई भी न्यायालय धारा 4 या धारा 5 के अधीन दण्डनीय किसी ऐसे अपराध का, जो भारत के बाहर किया गया है, संज्ञान नहीं करेगा, जब तक कि-
(क) ऐसा अपराध भारत में रजिस्ट्रीकृत किसी वायुयान पर नहीं किया जाता है ;
(ख) ऐसा अपराध किसी ऐसे वायुयान पर नहीं किया जाता है जो तत्समय ऐसे पट्टेदार को बिना कर्मीदल के पट्टे पर दिया गया है जिसके अपने कारबार का मुख्य स्थान, या जहां उसका ऐसा कोई कारबार का स्थान नहीं है वहां उसका स्थायी निवास स्थान भारत में है ; अथवा
(ग) अभिकथित अपराधी भारत का नागरिक नहीं है अथवा उस वायुयान पर नहीं है जिसके संबंध में ऐसा अपराध तब किया जाता है जब वह भारत में उतरता है या भारत में पाया जाता है ।
[6क. अभिहित न्यायालय-(1) राज्य सरकार, शीघ्र विचारण का उपबंध करने के प्रयोजन के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे क्षेत्र या क्षेत्रों के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, किसी सेशन न्यायालय को अभिहित न्यायालय के रूप में विनिर्दिष्ट करेगी ।
(2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, अभिहित न्यायालय, यथासाध्य, दिन प्रतिदिन के आधार पर विचारण करेगा ।
6ख. अभिहित न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध-(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी,-
(क) इस अधिनियम के अधीन सभी अपराध धारा 6क की उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट अभिहित न्यायालय द्वारा ही विचारणीय होंगे ;
(ख) जहां ऐसा कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का अभियुक्त है या जिसके द्वारा अपराध के किए जाने का संदेह है, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 167 की उपधारा (2) या उपधारा (2क) के अधीन किसी मजिस्ट्रेट के पास भेजा जाता है, वहां वह मजिस्ट्रेट ऐसे व्यक्ति का ऐसी अभिरक्षा में निरोध, जैसा वह ठीक समझे, जहां ऐसा मजिस्ट्रेट न्यायिक मजिस्ट्रेट है वहां कुल मिलाकर पन्द्रह दिन से अनधिक अवधि के लिए और जहां ऐसा मजिस्ट्रेट कार्यपालक मजिस्ट्रेट है वहां कुल मिलाकर सात दिन से अनधिक अवधिक के लिए प्राधिकृत कर सकेगा :
परन्तु जहां ऐसा मजिस्ट्रेट-
(i) जब ऐसा व्यक्ति उसके पास पूर्वोक्त रीति से भेजा जाता है, या
(ii) उसके द्वारा प्राधिकृत निरोध की अवधि की समाप्ति पर या उससे पूर्व किसी समय,
यह विचार करता है कि ऐसे व्यक्ति का निरुद्ध रखना अनावश्यक है, वहां वह ऐसे व्यक्ति को उस अभिहित न्यायालय को, जिसे अधिकारिता है, भेजने का आदेश करेगा ;
(ग) अभिहित न्यायालय, खण्ड (ख) के अधीन अपने पास भेजे गए व्यक्ति के संबंध में उसी शक्ति का प्रयोग कर सकेगा जो वह मजिस्ट्रेट, जिसे मामले के विचारण की अधिकारिता है, ऐसे मामले में दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 167 के अधीन अभियुक्त व्यक्ति के संबंध में, जो उस धारा के अधीन उसके पास भेजा गया है, प्रयोग करता ;
(घ) अभिहित न्यायालय, इस निमित्त प्राधिकृत, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के किसी अधिकारी द्वारा किए गए किसी परिवाद के परिशीलन पर उस अपराध का संज्ञान अभियुक्त को विचारण के लिए सुपुर्द किए जाने के बिना कर सकेगा ।
(2) इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का विचारण करते समय अभिहित न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध से भिन्न किसी ऐसे अपराध का भी जिससे अभियुक्त उसी विचारण में दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन आरोपित किया जा सकता है, विचारण कर सकेगा ।
6ग. अभिहित न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों में संहिता का लागू होना-इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध अभिहित न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे और अभिहित न्यायालय के समक्ष अभियोजन का संचालन करने वाले व्यक्ति को लोक अभियोजक समझा जाएगा ।]
अध्याय 3
प्रकीर्ण
7. प्रत्यर्पण के बारे में उपबंध-(1) धारा 4 और धारा 5 के अधीन अपराध प्रत्यर्पणीय अपराधों के रूप में सम्मिलित किए गए और उन सभी प्रत्यर्पण-सन्धियों में उपबंधित किए गए समझे जाएंगे जो भारत द्वारा कन्वेंशन देशों के साथ की गई हैं और जिनका विस्तार, इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख को, भारत पर है और जो भारत पर आबद्धकर हैं ।
(2) इस अधिनियम के अधीन अपराधों को प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 के लागू किए जाने के प्रयोजनों के लिए, ऐसे वायुयान के बारे में, जो किसी कन्वेंशन देश में रजिस्ट्रीकृत है, किसी भी समय जब वह वायुयान उड़ानरत है, यह समझा जाएगा कि वह उस देश की अधिकारिता के भीतर है चाहे वह तत्समय किसी अन्य देश की अधिकारिता के भीतर भी हो या न हो ।
[7क. जमानत के बारे में उपबन्ध-(1) दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का अभियुक्त कोई व्यक्ति, यदि वह अभिरक्षा में है तो, जमानत पर या अपने स्वयं के बंधपत्र पर तब तक नहीं छोड़ा जाएगा जब तक कि-
(क) लोक अभियोजक को ऐसे छोड़े जाने के आवेदन का विरोध करने का अवसर न दे दिया गया हो ; और
(ख) जहां लोक अभियोजक ऐसे आवेदन का विरोध करता है वहां, न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि यह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त आधार है कि वह ऐसे अपराध का दोषी नहीं है और उससे, जब कि वह जमानत पर है, कोई अपराध किए जाने की संभावना नहीं है ।
(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट जमानत मंजूर किए जाने पर निर्बन्धन दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन जमानत मंजूर किए जाने पर निर्बन्धन के अतिरिक्त है ।
(3) इस धारा में की कोई बात दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 439 के अधीन जमानत के बारे में उच्च न्यायालय की विशेष शक्तियों पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी ।]
8. कन्वेंशन के संविदाकारी पक्षकार-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह प्रमाणित कर सकेगी कि हेग कन्वेंशन के संविदाकारी पक्षकार कौन-कौन हैं और उन्होंने कन्वेंशन के उपबंधों का किस विस्तार तक उपयोग किया है और ऐसी कोई भी अधिसूचना उसमें प्रमाणित विषयों के बारे में निश्चायक साक्ष्य होगी ।
9. कतिपय वायुयानों को कन्वेंशन देशों में रजिस्ट्रीकृत समझने की शक्ति-यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि किसी वायुयान के संबंध में हेग कन्वेंशन के अनुच्छेद 5 की अपेक्षाओं की पूर्ति हो गई है तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ऐसा वायुयान उस कन्वेंशन देश में रजिस्ट्रीकृत समझा जाएगा, जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।
10. अभियोजन के लिए पूर्व मंजूरी का आवश्यक होना-इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए कोई अभियोजन केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से ही संस्थित किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
[10क. धारा 4 और धारा 5 के अधीन अपराधों के बारे में उपधारणा-धारा 4 या धारा 5 के अधीन किसी अपराध के अभियोजन में, यदि यह साबित कर दिया जाता है कि,-
(क) अभियुक्त के कब्जे में से कोई आयुध, गोलाबारूद या विस्फोटक बरामद किए गए थे और यह विश्वास करने का कारण है कि इसी प्रकार के आयुध, गोलाबारूद या विस्फोटक ऐसे अपराध के किए जाने में उपयोग में लाए गए थे ; या
(ख) ऐसे अपराध के किए जाने के संबंध में कर्मीदल या यात्रियों पर बल के प्रयोग, बल की धमकी या किसी अन्य प्रकार का अभित्रास दिए जाने का साक्ष्य है,
तो अभिहित न्यायालय, जब तक कि इसके प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता है, यह उपधारणा करेगा कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है ।]
11. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किए गए या किए जाने के लिए संभाव्य किसी नुकसान के लिए केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध न होगी ।
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