(1) कोई व्यक्ति किसी राज्य की विधानसभा या विधान परिषद का सदस्य चुने जाने के लिए और सदस्य होने के लिए निरर्हित होगा--
(क) यदि वह भारत सरकार के या पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट किसी राज्य की सरकार के अधीन, ऐसे पद को छोड़कर जिसको धारण करने वाले का निरर्हित न होना राज्य के विधान-मंडल ने विधि द्वारा घोषित किया है, कोई लाभ का पद धारण करता है;
(ख) यदि वह विकृतचित्त है और सक्षम न्यायालय की ऐसी घोषणा विद्यमान है;
(ग) यदि वह अनुन्मोचित दिवालिया है;
(घ) यदि वह भारत का नागरिक नहीं है या उसने किसी विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित कर ली है या वह किसी विदेशी राज्य के प्रति निष्ठा या अनुषक्ति को अभिस्वीकार किए हुए है;
(ङ) यदि वह संसद द्वारा बनाई गई किसी विधि द्वारा या उसके अधीन इस प्रकार निरर्हित कर दिया जाता है।
1 देखिए विधि मंत्रालय की अधिसूचना सं.एफ. 46/50-सी, दिनांक 26 जनवरी, 1950, भारत का राजपत्र, असाधारण, पृष्ठ 678 में प्रकाशित समसामयिक सदस्यता प्रति-ोध नियम, 1950।
2 संविधान (बावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1985 की धारा 4 द्वारा (1-3-1985 से) '' अनुच्छेद 191 के खंड (1)'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।
3 संविधान (तैंतीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1974 की धारा 3 द्वारा उपखंड (ख) के स्थान पर प्रतिस्थापित।
4 संविधान (तैंतीसवाँ संशोधन) अधिनियम, 1974 की धारा 3 द्वारा अंतःस्थापित।
5 संविधान (बावनवाँ संशोधन) अधिनियम, 1985 की धारा 5 द्वारा (1-3-1985 से) '' (2) इस अनुच्छेद के प्रयोजनों के लिए'' के स्थान पर प्रतिस्थापित।

