विचारण की समाप्ति पर संपत्ति के व्ययन के लिए आदेश-(1) जब किसी दण्ड न्यायालय में जांच या विचारण समाप्त हो जाता है तब न्यायालय उस संपत्ति या दस्तावेज को, जो उसके समक्ष पेश की गई है, या उसकी अभिरक्षा में है अथवा जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है या जो किसी अपराध के करने में प्रयुक्त की गई है, नष्ट करके, अधिहृत करके या किसी ऐसे व्यक्ति को परिदान करके, जो उस पर कब्जा करने का हकदार होने का दावा करता है, या किसी अन्य प्रकार से उसका व्ययन करने के लिए आदेश दे सकेगा जैसा वह ठीक समझे।
(2) किसी संपत्ति के कब्जे का हकदार होने का दावा करने वाले किसी व्यक्ति को उस संपत्ति के परिदान के लिए उपधारा (1) के अधीन आदेश किसी शर्त के बिना या इस शर्त पर दिया जा सकता है कि वह न्यायालय को समाधानप्रद रूप में यह वचनबंध करते हुए प्रतिभुओं सहित या रहित बंधपत्र निष्पादित करे कि यदि उपधारा (1) के अधीन किया गया आदेश अपील या पुनरीक्षण में उपांतरित या अपास्त कर दिया गया तो वह उस संपत्ति को ऐसे न्यायालय को वापस कर देगा।
(3) उपधारा (1) के अधीन स्वयं आदेश देने के बदले सेशन न्यायालय संपत्ति को मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट को परिदत्त किए जाने का निदेश दे सकता है, जो तब उस संपत्ति के विषय में धारा 457,458 और 459 में उपबंधित रीति से कार्यवाही करेगा।
(4) उस दशा के सिवाय, जब संपत्ति पशुधन है या शीघ्रतया और प्रकृत्या क्षयशील है या जब उपधारा (2) के अनुसरण में बंधपत्र निष्पादित किया गया है, उपधारा (1) के अधीन दिया गया आदेश दो मास तक अथवा जहाँ अपील उपस्थित की गई है वहाँ जब तक उस अपील का निपटारा न हो जाए, कार्यान्वित न किया जाएगा ।
(5) उस संपत्ति की दशा में, जिसके बारे में अपराध किया गया प्रतीत होता है, इस धारा में “संपत्ति” पद के अन्तर्गत न केवल ऐसी संपत्ति है जो मूलतः किसी पक्षकार के कब्जे या नियंत्रण में रह चुकी है, वरन् ऐसी कोई संपत्ति जिसमें या जिसके लिए उस संपत्ति का संपरिवर्तन या विनिमय किया गया है और ऐसे संपरिवर्तन या विनिमय से, चाहे अव्यवहित रूप से चाहे अन्यथा, अर्जित कोई चीज भी है।

