संसद् के अधिनियम
धार्मिक विन्यास अधिनियम, 1863
1 संक्षिप्त नाम, भारतीय संक्षिप्त नाम अधिनियम, 1897 (1897 का 14) द्वारा दिया गया ।
यह अधिनियम धार्मिक विन्यास (कनारा पर विस्तारित) अधिनियम, 1865 (1865 का बम्बई अधिनियम सं. 7) द्वारा कनारा को विस्तारित किया गया जिसे विशेष रूप से इसी प्रयोजन के लिए पारित किया गया ।
अनुसूचित जिला अधिनियम, 1874 (1874 का 14) की धारा 3(क) के अधीन अधिसूचना द्वारा यह निम्नलिखित अनुसूचित जिलों में प्रवृत्त घोषित किया गया है, अर्थात्:
हजारीबाग, लोहारदागा (अब जिला रांची,
कलकत्ता राजपत्र, 1899, भाग 1 पृ. 44 देखिए)
तथा मानभूम जिलों और सिंहभूम जिले में
परगना दालभूम तथा कोल्हन ......... भारत का राजपत्र, 1881, भाग 1, पृ. 504 देखिए ।
मिर्जापुर जिले का अनुसूचित
भाग........................................ भारत का राजपत्र, 1879, भाग 1, पृ. 383 देखिए ।
जौनसार बाबर............................ भारत का राजपत्र, 1879, भाग 1, पृ. 382 देखिए ।
गंजाम और विशाखापत्तनम के
अनसूचित जिले.......................... भारत का राजपत्र, 1898, भाग 1, पृ. 870 देखिए ।
असम (नार्थ लुशाई हिल्स को छोड़कर) ....................................भारत का राजपत्र, 1897, भाग 1, पृ. 299 देखिए ।
इसका पश्चात््वर्ती उल्लिखित अधिनियम की धारा 5 के अधीन अधिसूचना द्वारा निम्नलिखित अनुसूचित जिलों, पर विस्तार किया गया है, अर्थात्:
कुमाऊं और गढ़वाल................. भारत का राजपत्र, 1976, भाग 1, पृ. 606 देखिए ।
आगरा प्रान्त की तराई.............. भारत का राजपत्र, 1876, भाग 1, पृ. 505 देखिए ।
अजमेर और मेरवाड़ा................... भारत का राजपत्र, 1877, भाग 1, पृ. 605 देखिए ।
(1863 का अधिनियम संख्यांक 20)
[10 मार्च, 1863]
सरकार को धार्मिक विन्यासों के प्रबन्ध से
अपने को निर्निहित करने के वास्ते
समर्थ बनाने के लिए
अधिनियम
उद्देशिका - यह समीचीन है कि बंगाल में फोर्ट विलियम की प्रेसिडेंसी में और फोर्ट सेन्ट जार्ज की प्रेसीडेंसी में राजस्व बोर्डों और स्थानीय अभिकर्ताओं को बंगाल संहिता के विनियम 19, 1810 (बंगाल विनियम, 1810 का 19) द्वारा (मस्जिदों, हिन्दू मंदिरों, महाविद्यालयों की संभाल और अन्य प्रयोजनों के लिए अनुदान की गई भूमियों के किराए और उपज के सम्यक् विनियोग के लिए ; पुलों, सरायों, क्षेत्रों और अन्य सार्वजनिक भवनों के अनुरक्षण और मरम्मत के लिए ; और नजूल संपत्ति का राजगामी संपत्ति की अभिरक्षा और निपटान के लिए), और मद्रास संहिता के विनियम 7, 1817 द्वारा (मस्जिदों, हिन्दू मंदिरों और महाविद्यालयों की संभाल या अन्य सार्वजनिक प्रयोजनों के लिए अनुदान की गई भूमियों के किराए और उपज के सम्यक् विनियोग के लिए ; पुलों, चौल्ट्रियों, या सत्रमों और अन्य
1963 के विनियम सं. 6 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा (1-7-1965 से) यह अधिनियम दादरा और नागर हवेली पर विस्तारित किया गया एवं प्रवृत्त हुआ ।
धारा 22 भाग ख राज्यों के सिवाय संपूर्ण भारत पर लागू होती है ।
मद्रास हिन्दू रिलिजियस एण्डाउमेंट्स ऐक्ट, 1926 (1927 का मद्रास अधिनियम सं. 2) द्वारा मद्रास में हिन्दू धार्मिक विन्यास तक और उड़ीसा हिन्दू रिलिजियस एण्डाउमेंट््स ऐक्ट, 1939 (1939 का उड़ीसा अधिनियम सं. 4) द्वारा उड़ीसा में अधिनियम निरसित किया गया तथा बंगाल वक्फ ऐक्ट, 1934 (1934 का बंगाल अधिनियम सं. 13) द्वारा बंगाल में संशोधित किया गया ।
यह अधिनियम बिहार राज्य के किसी धार्मिक न्यास पर लागू नहीं होगा (1951 का बिहार अधिनियम सं. 1) ।
1964 के अधिनियम सं. 34 द्वारा यह अधिनियम किसी ऐसे वक्फ पर लागू नहीं होगा जिसे वक्फ अधिनियम, 1954 (1954 का अधिनियम सं. 29) लागू होता हो ।
1959 के मद्रास अधिनियम सं. 22 द्वारा यह अधिनियम मद्रास राज्य में प्रवृत्त नहीं रहेगा ।
सार्वजनिक भवनों के अनुरक्षण और मरम्मत के लिए ; और राजगामी संपत्ति की अभिरक्षा और निपटान के लिए) उन पर अधिरोपित कर्तव्यों में वहां तक अवमुक्त कर दिया जाए जहां तक उन कर्तव्यों में मस्जिदों या हिन्दू मंदिरों की संभाल के लिए और अन्य धार्मिक उपयोगों के लिए अनुदान की गई भूमियों का अधीक्षण ; ऐसे धार्मिक स्थापनों के अनुरक्षण के लिए बनाए गए विन्यासों का विनियोग ; उनसे संबंधित भवनों की मरम्मत और परिरक्षण, और उनके न्यासियों या प्रबंधकों की नियुक्ति सम्मिलित है अथवा ऐसे धार्मिक स्थापनों 1॥॥ के प्रबन्ध से किसी प्रकार का संबंध अंतर्ग्रस्त है, अतः निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :-
1.[1810 के बंगाल विनियम 19 और 1817 के मद्रास विनियम 7 के कुछ भागों का निरसन ।] निरसन अधिनियम, 1870 (1870 का 14) की धारा 1 तथा अनुसूची द्वारा निरसित ।
2. निर्वचन-खंड - इस अधिनियम में –
सिविल न्यायालय और न्यायालय – “सिविल न्यायालय” और “न्यायालय” शब्दों से, 3 [धारा 10 में यथा उपबंधित के सिवाय,] अभिप्रेत है उस जिले में आरंभिक सिविल अधिकारिता वाला प्रधान न्यायालय जिसमें, 2[ राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त कोई अन्य न्यायालय जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर] वह मस्जिद, मंदिर या धार्मिक स्थापन स्थित है जिसके संबंध में या जिसके विन्यास के संबंध में इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन कोई वाद संस्थित किया जाएगा या आवेदन दिया जाएगा ।
3. मस्जिदों आदि के बारे में सरकार द्वारा विशेष उपबंध किया जाना -
- 1874 के अधिनियम सं. 16 की धारा 1 और अनुसूची द्वारा और यह मस्जिदों, हिन्दू मंदिरों की संभाल या अन्य धार्मिक प्रयोजनों के लिए विन्यास के संबंधित बंगाल संहिता के विनियम 19, 1810 तथा मद्रास संहिता के विनियम सं. 7, 1817 का निरसन उस प्रयोजन के लिए समीचीन है,” शब्दों और अक्षरों को निरसित किया गया ।
- 1914 के अधिनियम सं. 10 की धारा 5 और अनुसूची 2 द्वारा “संख्या” और ”लिंग” से संबंधित खंड निरसित ।
- 1925 के अधिनियम सं. 21 की धारा 2 द्वारा अंतःस्थापित ।
प्रत्येक ऐसी मस्जिद, मंदिर या अन्य धार्मिक स्थापन के मामले में, जिसको 1झ्र्इस अधिनियम की उद्देशिकाट में विनिर्दिष्ट विनियमों में से किसी के उपबंध लागू हैं और जिसके न्यासी, प्रबंधक, या अधीक्षक का नामनिर्देशन, इस अधिनियम के पारित होने के समय, सरकार या किसी लोक अधिकारी में निहित है, या उसके द्वारा किया जा सकता है, जिसमें ऐसे न्यासी, प्रबंधक या अधीक्षक का नामनिर्देशन सरकार या किसी लोक अधिकारी द्वारा पुष्टि के अधीन है, राज्य सरकार इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात्, यथाशक्य शीघ्र इसमें इसके पश्चात् यथा उपबंधित विशेष उपबंध केरगी ।
4. राजस्व बोर्ड के भाराधीन न्यास संपत्ति का न्यासियों आदि को अंतरण - प्रत्येक ऐसी मस्जिद, मंदिर, या अन्य धार्मिक स्थापन के मामले में, जो इस अधिनियम के पारित होने के समय, किसी ऐसे न्यासी, प्रबंधक या अधीक्षक के प्रबंध के अधीन है, जिसका नामनिर्देशन न तो सरकार या किसी लोक अधिकारी में निहित है न उसके द्वारा किया जा सकता है और न उसकी पुष्टि के ही अधीन है, राज्य सरकार इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, ऐसी संपत्ति के सिवाय जो इसमें इसके पश्चात् उपबंधित है, उस समस्त भू-संपत्ति या अन्य संपत्ति को, इस अधिनियम के पारित होने के समय राजस्व बोर्ड या किसी स्थानीय अभिकर्ता के कब्जे में या अधीक्षण के अधीन है और ऐसी मस्जिद, मंदिर या अन्य धार्मिक स्थापन की है, ऐसे न्यासी, प्रबंधक या अधीक्षक को अंतरित करेगी ;
ऐसी संपत्ति के बारे में बोर्ड की शक्तियों की समाप्ति - और ऐसी मस्जिद, मंदिर या अन्य धार्मिक स्थापन के बारे में, और इस प्रकार अंतरित समस्त भूमि और अन्य संपत्ति के बारे में, राजस्व बोर्ड और स्थानीय अभिकर्ताओं की शक्तियां और उत्तरदायित्व वहां तक के सिवाय जहां तक वे ऐसे अंतरण के पूर्व उक्त राजस्व बोर्ड या किसी स्थानीय अभिकर्ता द्वारा किए गए कार्य और उपगत दायित्व के बारे में हैं, समाप्त और पर्यवसित हो जाएंगे ।
25. न्यास अधिकारी पद के रिक्त होने पर उसके उत्तराधिकार के
- 1891 के अधिनियम सं. 12 की धारा 2 और अनुसूची 2 द्वारा धारा 1ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- धारा 5 किसी ऐसे वक्फ पर लागू नहीं होगी जिसे वक्फ अधिनियम, 1954 (1954 का 29) लागू होता हो ।
अधिकार के बारे में विवाद की दशा में प्रक्रिया - जब कभी किसी कारण किसी न्यासी, प्रबंधक, या अधीक्षक का पद जिसको पूर्वगामी धारा के अधीन संपत्ति अंतरित कर दी गई है रिक्त हो जाता है और ऐसे पद के उत्तराधिकार के अधिकार के बारे में कोई विवाद पैदा हो जाता है तो जिस मस्जिद, मंदिर या धार्मिक स्थापन की वह संपत्ति है उसमें या उसकी पूजा या सेवा करने में या उससे संबंधित न्यासों में हितबद्ध किसी व्यक्ति के लिए यह विधिसम्मत होगा कि वह ऐसे मस्जिद, मंदिर या अन्य धार्मिक स्थापन का कोई प्रबंधक, नियुक्त किए जाने के लिए सिविल न्यायालय को आवेदन करे और तब ऐसा न्यायालय ऐसे प्रबंधक को तब तक कार्य करने के लिए नियुक्त कर सकेगा जब तक कि कोई अन्य व्यक्ति ऐसे पद के उत्तराधिकार के अपने अधिकार को वाद द्वारा स्थापित नहीं कर लेता ।
न्यायालय द्वारा नियुक्त प्रबंधकों की शक्तियां -सिविल न्यायालय द्वारा इस प्रकार नियुक्त प्रबंधक का वे सब शक्तियां होंगी और वह उनका प्रयोग करेगा जो इस या किसी अन्य अधिनियम के अधीन, पूर्ववर्ती न्यासी, प्रबंधक या अधीक्षक को, जिसके स्थान पर ऐसा प्रबंधक न्यायालय द्वारा नियुक्त किया गया है, ऐसे मस्जिद, मंदिर और धार्मिक स्थापन के या उसकी संपत्ति के संबंध में प्राप्त थी या जिनका वह प्रयोग कर सकता था ।
6. जिन न्यासियों को धारा 4 के अधीन संपत्ति का अन्तरण किया जाता है उनके अधिकार आदि - प्रत्येक ऐसे न्यासी, प्रबंधक या अधीक्षक के, जिसको इस अधिनियम की धारा 4 में विहित रीति में किसी मस्जिद, मंदिर या अन्य धार्मिक स्थापन की भूमि और अन्य संपत्ति अंतरित की गई है, अधिकार, शक्तियां और उत्तरदायित्व, तथा उसकी नियुक्ति, निर्वाचन और हटाने की शर्तें, इस अधिनियम के अधीन वाद चलाए जाने के दायित्वाधीन होने के सिवाय और राजस्व बोर्ड और स्थानीय अभिकर्ताओं को ऐसे मस्जिद, मंदिर या धार्मिक स्थापन पर और ऐसे न्यासी, प्रबंधक या अधीक्षक पर इसके द्वारा निरसित विनियमों द्वारा दिए गए प्राधिकार के सिवाय जो प्राधिकार इसके द्वारा पर्यवसित और निरसित किया जाता है, वैसी ही होंगी जैसी वे उस दशा में होती जब यह अधिनियम पारित नहीं किया गया होता ।
ऐसी सब शक्तियां जो इस अधिनियम की उक्त धारा 4 के अधीन अन्तरित भूमि और अन्य सम्पत्ति के किराए की वसूली के लिए किसी बोर्ड या स्थानीय अभिकर्ता द्वारा प्रयुक्त की जा सकती हैं ऐसे अन्तरण की
तारीख से किसी ऐसे न्यासी, प्रबन्धक या अधीक्षक द्वारा प्रयुक्त की जा सकेंगी जिसको ऐसा अन्तरण किया गया है ।
7. समितियों की नियुक्ति - इस अधिनियम की धारा 3 में वर्णित सभी मामलों में, राज्य सरकार प्रत्येक खण्ड या जिले में एक बार एक या अधिक समितियां नियुक्त करेगी जो इसके द्वारा निरसित विनियमों के अधीन राजस्व बोर्ड और स्थानीय अभिकर्ताओं का स्थान ग्रहण करेंगी और उनकी शक्तियों का प्रयोग करेंगी ।
समितियों का गठन और कर्तव्य ऐसी समिति में तीन या अधिक व्यक्ति होंगे, और वह ऐसी किसी सम्पत्ति से, जिसके लिए इस अधिनियम की धारा 21 के अधीन विशेष रूप से उपबन्ध किया गया है, सम्बन्धित कर्तव्यों के सिवाय उन सभी कर्तव्यों का पालन करेगी जो ऐसे बोर्ड और स्थानीय अभिकर्ताओं पर अधिरोपित हों ।
8. समिति के सदस्य की अर्हताएं - उक्त समिति के सदस्य, उन धर्मों को जिनके प्रयोजनों के लिए, वह मस्जिद, मन्दिर या अन्य धार्मिक स्थापन स्थापित किया गया था या अब अनुरक्षित किया जाता है मानने वाले व्यक्तियों में से और जहां तक अभिनिश्चित किया जा सके उन व्यक्तियों की, जो ऐसी मस्जिद, मन्दिर या अन्य धार्मिक स्थापन के अनुरक्षण में हितबद्ध हैं, सामान्य इच्छा के अनुसार नियुक्त किए जाएंगे ।
समिति की नियुक्ति राजपत्र में अधिसूचित की जाएगी ।
हितबद्ध व्यक्तियों की इच्छा अभिनिश्चित करना - ऐसी नियुक्ति के बारे में, ऐसे व्यक्तियों की सामान्य इच्छा अभिनिश्चित करने के लिए, राज्य सरकार झ्र्राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, (इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न होने वाले), ऐसे नियमों के अधीन जो ऐसी राज्य सरकार द्वारा बनाए जाएं, निर्वाचन करा सकती है । 1[इस धारा के अधीन बनाया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात््, यथाशीघ्र, राज्य विधान-मण्डल के समक्ष रखा जाएगा ।]
9. पदावधि - यथापूर्वोक्त नियुक्त समिति का प्रत्येक सदस्य जीवनपर्यन्त पद धारण करेगा जब तक कि उसे अवचार या अयोग्यता के कारण हटा न दिया जाए;
- 1983 के अधिनियम सं. 20 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-3-1984 से) अंतःस्थापित ।
हटाना - और कोई भी ऐसा सदस्य सिविल न्यायालय के आदेश के बिना नहीं हटाया जाएगा जैसा कि इसमें इसके पश्चात्, उपबन्धित है ।
10. रिक्तियों का भरा जाना - जब यथापूर्वोक्त नियुक्त समिति के सदस्यों में कोई रिक्ति हो जाए तब ऊपर उपबन्धित रूप से हितबद्ध व्यक्तियों द्वारा उस रिक्ति को भरने के लिए एक नया सदस्य निर्वाचित किया जाएगा ।
प्रक्रिया - समिति के शेष सदस्य यथासम्भव शीघ्र, ऐसी रिक्ति की सार्वजनिक सूचना देंगे और निर्वाचन संबंधी नियमों के अधीन, जो राज्य सरकार द्वारा बनाए जाएं, ऊपर उपबंधित रूप से हितबद्ध व्यक्तियों द्वारा नए सदस्य के निर्वाचन के लिए कोई दिन नियत करेंगे जो ऐसी रिक्ति की तारीख से तीन मास के पश्चात् का नहीं होगा ;
और जो कोई भी उक्त नियमों के अधीन निर्वाचित होगा वह ऐसी रिक्ति को भरने के लिए समिति का सदस्य होगा ।
कब न्यायालय द्वारा रिक्ति का भरा जाना - यदि यथावूर्वोक्त किसी रिक्ति को उसके होने के पश्चात् तीन मास के भीतर यथापूर्वोक्त निर्वाचन द्वारा न भरा जाए तो सिविल न्यायालय किसी भी व्यक्ति के आवेदन पर उस रिक्ति को भरने के लिए किसी व्यक्ति को नियुक्त कर सकेगा अथवा यह आदेश दे सकेगा कि उस रिक्ति को समिति के शेष सदस्यों द्वारा तुरन्त भर लिया जाए, जिस आदेश का पालन करना शेष सदस्यों का कर्तव्य होगा और यदि इस आदेश का पालन नहीं किया गया तो सिविल न्यायालय उक्त रिक्ति को भरने के लिए कोई सदस्य नियुक्त कर सकेगा ।
[ झ्र्स्पष्टीकरण - इस धारा में “सिविल न्यायालय” से उस जिले में आरम्भिक सिविल अधिकारिता वाला प्रधान न्यायालय अभिप्रेत है जिसमें वह मस्जिद, मन्दिर या धार्मिक स्थापन, जिनके लिए समिति नियुक्त की गई है, या उनमें से कोई स्थित है ।]
11. समिति के किसी सदस्य का मस्जिद आदि का न्यासी आदि भी न होना - इस अधिनियम अधीन नियुक्त समिति का कोई सदस्य, उस मस्जिद, मन्दिर या अन्य धार्मिक स्थापन का, जिसके प्रबनध के लिए ऐसी समिति नियुक्त की गई है, न्यासी, प्रबन्धक या अधीक्षक भी नहीं हो सकेगा
1. 1925 के अधिनियम सं. 21 की धारा 3 द्वारा जोड़ा गया ।
या उस रूप में कार्य भी नहीं करेगा ।
12. समिति की नियुक्ति पर, बोर्ड और स्थानीय अभिकर्ताओं का सम्पत्ति को अन्तरित करना - किसी ऐसी मस्जिद, मन्दिर या धार्मिक स्थापन के अधीक्षण के लिए और उसके कार्यों के प्रबन्ध के लिए ऊपर उपबन्धित रूप से किसी समिति की नियुक्ति पर तुरन्त राजस्व बोर्ड या उक्त बोर्ड के प्राधिकार के अधीन कार्य करने वाले स्थानीय अभिकर्ता, इसमें इसके पश्चात् यथा उपबन्धित के सिवाय उस समस्त भू-सम्पत्ति या अन्य सम्पत्ति को जो नियुक्ति के समय उक्त बोर्ड या स्थानीय अभिकर्ताओं के अधीक्षण के अधीन या कब्जें में है और उक्त धार्मिक स्थापन की है, ऐसी समिति को अन्तरित करेंगे ।
बोर्ड और अभिकर्ताओं की शक्तियों और उत्तरदायित्वों की समाप्ति - और तब ऐसी मस्जिद, मन्दिर और धार्मिक स्थापन के बारे में और इस प्रकार अन्तरित समस्त भूमि और अन्य सम्पत्ति के बारे में बोर्ड और स्थानीय अभिकर्ताओं की शक्तियां और उत्तरदायित्व, उपरोक्त के सिवाय और वहां तक के सिवाय जहां तक वे ऐसे अन्तरण के पूर्व उक्त बोर्ड और अभिकर्ताओं द्वारा किए गए कार्यों और उपगत दायित्वों के बारे में है, समाप्त और पर्यवसित हो जाएंगे ।
समिति की शक्तियों का प्रारम्भ - वे सब शक्तियां, जो इस धारा के अधीन अनतरित भूमि और अन्य सम्पत्ति के किराए की वसूली के लिए किसी बोर्ड या स्थानीय अभिकर्ता द्वारा प्रयुक्त की जा सकती थीं, ऐसे अन्तरण की तारीख से उस समिति द्वारा प्रयुक्त की जा सकेंगी जिसको ऐसे अन्तरण किया गया है ।
13. लेखाओं के बारे में न्यासी आदि का कर्तव्य - जिस मस्जिद, मन्दिर या धार्मिक स्थापन को इस अधिनियम के उपबन्ध लागू होते हैं उसके प्रत्येक न्यासी, प्रबंधक ओर अधीक्षक का कर्तव्य होगा कि वह ऐसे मस्जिद, मन्दिर या अन्य धार्मिक स्थापन के विन्यासों और व्ययों के बारे में अपनी प्राप्तियों और संवितरणों के नियमित लेखे रखे;
और समिति के कर्तव्य - और इस अधिनियम के प्राधिकार के अधीन नियुक्त या कार्य करने वाली प्रत्येक प्रबन्ध समिति का कर्तव्य होगा कि वह ऐसी मस्जिद, मन्दिर या अन्य धार्मिक स्थापन के प्रत्येक न्यासी, प्रबन्धक और अधीक्षक से ऐसी प्राप्तियों और संवितरणों के नियमित लेखे प्रत्येक वर्ष
में कम से कम एक बार पेश करने की अपेक्षा करे और ऐसी प्रत्येक प्रबन्ध समिति उनके ऐसे लेखे स्वयं रखेगी ।
14. न्यासभंग आदि की दशा में हितबद्ध व्यक्ति द्वारा अकेले ही वाद लाया जा सकना - किसी मस्जिद, मन्दिर या धार्मिक स्थापन में, या उसकी पूजा या सेवा करने या उससे संबंधित न्यासों में हितबद्ध कोई व्यक्ति उसमें हितबद्ध अन्य व्यक्तियों में से किसी को वादी के रूप में संयोजित किए बिना, ऐसे मस्जिद, मन्दिर या धार्मिक स्थापन के न्यासी, प्रबन्धक या अधीक्षक अथवा इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किसी समिति के सदस्य के विरुद्ध किसी ऐसे अपकरण, न्यासभंग या कर्तव्य-उपेक्षा के लिए सिविल न्यायालय में वाद ला सकेगा जो ऐसे न्यासी, प्रबधक, अधीक्षक या ऐसी समिति के सदस्य द्वारा क्रमशः उनमें निहित या उनको विश्वासपूर्वक सौंपे गए न्यासों के बारे में किए गए हों ;
सिविल न्यायालय की शक्तियां - और सिविल न्यायालय ऐसे न्यासी, प्रबंधक, अधीक्षक या समिति के सदस्य द्वारा किसी कार्य के विनिर्दिष्ट पालन के लिए निदेश दे सकेगा,
और ऐसे न्यासी, प्रबन्धक, अधीक्षक या समिति के सदस्य के विरुद्ध नुकसानी और खर्चों की डिक्री दे सकेगा,
और ऐसे न्यासी, प्रबन्धक, अधीक्षक या समिति के सदस्य को हटाने का निदेश भी दे सकेगा ।
15. व्यक्ति को वाद लाने के लिए हकदार बनाने वाले हित का स्वरूप - अन्तिम पूर्वगामी धारा के अधीन किसी व्यक्ति को वाद लाने का हकदार बनाने के लिए अपेक्षित हित का धन-सम्बन्धी या प्रत्यक्ष या तात्कालिक हित या ऐसा हित होना आवश्यक नहीं है जिससे कि वाद लाने वाला व्यक्ति न्यासों के प्रबन्ध या अधीक्षण में कोई भाग लेने का हकदार हो ।
जो कोई व्यक्ति किसी मस्जिद, मन्दिर या धार्मिक स्थापन में पूजा या सेवा में उपस्थित होने का अधिकारी है या उपस्थित होता रहा है अथवा किसी भिक्षा-वितरण के लाभ में भाग लेने का अधिकारी है, वह अन्तिम पूर्वगामी धारा के अर्थ में हितबद्ध व्यक्ति समझा जाएगा ।
16. मध्यस्थों को निर्देश - इस अधिनियम के अधीन संस्थित किसी वाद या कार्यवाही में उस न्यायालय के लिए, जिसके समक्ष ऐसे वाद या
कार्यवाही लम्बित है, यह आदेश देना विधिसम्मत होगा कि ऐसे वाद में जिस मामले पर मतभेद है वह एक या अधिक मध्यस्थों को विनिश्चय के लिए निर्दिष्ट किया जाए ।
1940 के अधिनियम संख्यांक 10 का लागू होना - जब कभी ऐसा कोई आदेश दिया जाए तो, झ्र्माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 के अध्याय 4ट के उपबंध, ऐसे आदेश और माध्यस्थम् को सभी मामलों में उसी रीति में लागू होंगे मानो पक्षकारों के आवेदन पर ऐसा आदेश झ्र्उक्त अधिनियम की धारा 21ट के अधीन दिया गया हो ।
17. 1940 के अधिनियम संख्यांक 10 के अधीन निर्देश - अन्तिम पूर्वगामी धारा की कोई भी बात, उक्त 3झ्र्माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 कीट उक्त झ्र्धारा 21ट के अधीन पक्षकारों को न्यायालय में आवेदन करने के लिए या न्यायालय को निर्देश का आदेश देने के लिए निवारित नहीं करेगी ।
18. वाद संस्थित करने की इजाजत के लिए आवेदन - इस अधिनियम के अधीन कोई वाद जब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसे वाद को संस्थित करने की इजाजत के लिए न्यायालय को प्रारम्भिक आवेदन न किया गया हो । 4॥॥
न्यायालय आवेदन के परिशीलन पर यह अवधारित करेगा कि वाद को संस्थित करने के लिए पर्याप्त प्रथमदृष्ट्या आधार है या नहीं, और यदि न्यायालय का यह निर्णय है कि ऐसे आधार हैं तो वाद संस्थित करने के लिए इजाजत दे दी जाएगी ।
- 1940 के अधिनियम सं. 10 की धारा 49 और अनुसूची 4 द्वारा सिविल प्रक्रिया संहिता के अध्याय 6ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1940 के अधिनियम सं. 10 की धारा 49 और अनुसूची 4 द्वारा उक्त संहिता की धारा 312ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1940 के अधिनियम सं. 10 की धारा 49 और अनुसूची 4 द्वारा उक्त सिविल प्रक्रिया संहिता की धारा 312ञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1870 के अधिनियम सं. 7 की धारा 2 और अनुसूची 3 द्वारा आवेदन अस्टाम्पित पत्र पर किया जाएञ्ज् शब्द निरसित ।
खर्चे - 1॥। यदि न्यायलय की यह राय है कि वाद न्यास के फायदे के लिए रहा है और वाद के किसी भी पक्षकार का कसूर नहीं है तो न्यायालय खर्चे का या उसके ऐसे भाग का संदाय, जो वह ठीक समझे, संपदा में से किए जाने का आदेश दे सकेगा ।
19. न्यायालय का न्यास के लेखे दाखिल किए जाने की अपेक्षा कर सकना - वाद संस्थित करने की इजाजत देने के पहले, या इजाजत देने के बाद कोई कार्यवाही किए जाने के पहले, या जब वाद लम्बित हो तब किसी भी समय न्यायालय, यथास्थिति, न्यासी, प्रबन्धक या अधीक्षक अथवा समिति के किसी सदस्य को न्यास के लेखे या उनका उतना भाग, जो न्यायालय को आवश्यक प्रतीत हो, न्यायालय में दाखिल करने के लिए आदेश दे सकेगा ।
20. आपराधिक न्यासभंग के लिए कार्यवाही - पूर्वगामी धाराओं के अधीन किसी न्यायालय के समक्ष लम्बित कोई वाद या कार्यवाही, आपराधिक न्यासभंग के लिए किसी दाण्डिक न्यायालय में किसी कार्यवाही पर किसी भी प्रकार से कोई प्रभाव नहीं डालेगी या हस्तक्षेप नहीं करेगी ।
21. वे मामले जिनमें विन्यास भागतः धार्मिक और भागतः लौकिक प्रयोजनों के लिए हैं - किसी ऐसे मामले में जिसमें किसी भूमि या अन्य सम्पत्ति का अनुदान किसी ऐसे स्थापन की संभाल के लिए किया गया है जिसका स्वरूप भागतः धार्मिक और भागतः लौकिक है,
या जिसमें किसी स्थापन की संभाल के लिए किए गए विन्यास का विनियोग भागतः धार्मिक और भागतः लौकिक उपयोगों के लिए किया जाता है,
राजस्व बोर्ड किसी न्यासी, प्रबन्धक या अधीक्षक, अथवा इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किसी प्रबन्ध समिति को अन्तरण करने से पहले, यह अवधारित करेगा कि उक्त भूमि या अन्य सम्पत्ति का कितना भाग, यदि कोई हो, लौकिक उपयोगों में लगाए जाने के लिए उक्त बोर्ड के अधीक्षणाधीन रहे,
- 1 1870 के अधिनियम सं. 7 की धारा 2 और अनुसूची 3 द्वारा वाद के उन्मोचन पर खर्चे की संगणना करते समय प्रारम्भिक आवेदन पर स्टाम्प शुल्क प्राक्कलित किया जाएगा और वाद के खर्चे में जोड़ा जाएगाञ्ज् शब्द निरसित ।
और कितना भाग न्यासी, प्रबन्धक या अधीक्षक, अथवा समिति के अधीक्षण के लिए अन्तरित किया जाए,
और कितनी वार्षिक रकम, यदि कोई हो, उक्त न्यासी, प्रबन्धक या अधीक्षक, या समिति के अधीक्षण में इस प्रकार अंतरित की जाने वाली भूमि या अन्य सम्पत्ति पर प्रभारित की जाए और यथापूर्वोक्त लौकिक उपयोगों के लिए उक्त बोर्ड या स्थानीय अभिकर्ताओं को संदेय की जाए ।
ऐसे प्रत्येक मामले में इस अधिनियम के उपबन्ध केवल उस भूमि और अन्य सम्पत्ति के बारे में ही प्रभावी होंगे जो इस प्रकार अन्तरित की जाए ।
22. सरकार द्वारा अब इसके पश्चात् से किसी मस्जिद, मन्दिर आदि की संभाल के लिए सम्पत्ति का भार धारण न किया जाना - इस अधिनियम में यथा उपबन्धित के सिवाय, झ्र्केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकारट के लिए या किसी सरकार के किसी अधिकारी के लिए अपनी शासकीय हैसियत में यह विधिसम्मत ॥। नहीं होगा कि वह,
किसी मस्जिद, मन्दिर या अन्य धार्मिक स्थापन की संभाल के लिए अनुदान की गई या अन्यथा उसकी किसी भूमि या अन्य संपत्ति के अधीक्षण का भार ग्रहण करे या पुनर्गहण करे, अथवा
ऐसी किसी मस्जिद, मंदिर या अन्य स्थापन के अनुरक्षण के लिए किए गए किसी विन्यास के प्रबंध या विनियोग में कोई भाग ले, अथवा
उसका कोई न्यासी, प्रबन्धक या अधीक्षक नामनिर्देशित या नियुक्त करे, या किसी रूप में उससे सम्बन्धित रहे ।
23. अधिनियम का उसमें उल्लिखित विनियमों और पुरावशेष भवनों आदि के बारे में प्रभाव - इस अधिनियम की किसी भी बात के बारे में यह
- विधि अनुकूलन आदेश, 1948 द्वारा भारत में किसी सरकारञ्ज् के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1874 के अधिनियम सं. 16 की धारा 1 और अनुसूची द्वारा इस अधिनियम के पारित होने के पश्चात्ञ्ज् शब्द निरसित ।
- बंगाल वक्फ अधिनियम, 1934 (1934 का बंगाल अधिनियम सं. 13) द्वारा केवल बंगाल पर लागू धारा 22 में एक परन्तुक जोड़ा गया ।
नहीं माना जाएगा कि वह इस अधिनियम में उल्लिखित विनियमों के उपबंधों पर, वहां तक के सिवाय जहां तक उनका सम्बन्ध मस्जिदों, हिन्दू मन्दिरों और अन्य धार्मिक स्थापनों से है, प्रभाव डालती है; या सरकार को ऐसे विनियमों के उपबन्धों के अधीन ऐसे भवनों को, जो अपनी पुरातनता के लिए, या अपने ऐतिहासिक या वास्तुकलात्मक महत्व के लिए प्रसिद्ध है या लोक सुविधाओं के लिए अपेक्षित है, हानि से बचाने के लिए और परिरक्षित करने के लिए उक्त विनियमों के उपबन्धों के अधीन ऐसी कार्रवाई करने से रोकती है जैसी वह आवश्यक समझती है ।
24. [झ्र्भारत ।ट - भारतीय स्वतन्त्रता (केन्द्रीय अधिनियम तथा अध्यादेश अनुकूलन) आदेश, 1948 द्वारा निरसित ।
------------------
- अर्थात् बंगाल चैरिटेबल एण्डाउमेन्ट्स, पब्लिक बिल्डिंग एण्ड एनचीट्स रेगूलेशन, 1810 (1810 का बंगाल विनियम सं. 19) और मद्रास एण्डाउमेंट्स एंड एनचीट्स रेगूलेशन, 1817 (1817 का मद्रास विनियम सं. 7) ।
- अब प्राचीन संस्मारक परिरक्षण अधिनियम, 1904 (1904 का 7) भी देखिए ।
- बंगाल वक्फ ऐक्ट, 1934 (1934 का बंगाल अधिनियम सं. 13) द्वारा केवल बंगाल पर लागू धारा 23क जोड़ी गई ।

