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नाविक भविष्य-निधि अधिनियम, 1966 ( Seamen’s Provident Fund Act, 1966 )


 

नाविक भविष्य-निधि अधिनियम, 1966

(1966 का अधिनियम संख्यांक 4)

[26 मार्च, 1966]

नाविकों के लिए भविष्य-निधि संस्थित किए जाने

का उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के सत्रहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो-

1. संक्षिप्त नाम तथा लागू होना-(1) यह अधिनियम नाविक भविष्य-निधि अधिनियम, 1966 कहा जा सकेगा

(2) जब तक कि अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबन्धित हो, इस अधिनियम के उपबन्ध हर नाविक को तथा ऐसे नाविक के नियोजक को लागू होंगे

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो,-

() “कर्मीदल के साथ करार" से वाणिज्य-पोत-परिवहन अधिनियम की, यथास्थिति, धारा 100 में या धारा 114 में निर्दिष्ट करार अभिप्रेत है ;

() “बोर्ड" से धारा 5 के अधीन गठित नाविक भविष्य-निधि का न्यासी बोर्ड अभिप्रेत है ;

() चलत उन्मोचन प्रमाणपत्र" से वाणिज्य-पोत-परिवहन अधिनियम की धारा 99 में निर्दिष्ट प्रमाणपत्र          अभिप्रेत है ;

() “अभिदाय" से स्कीम के अधीन किसी सदस्य की बाबत देय अभिदाय अभिप्रेत है ;

() “नियोजक" से नाविक के सम्बन्ध में, उस पोत का, जिस पर वह नाविक नियोजित या काम पर लगा हुआ है, स्वामी अथवा पोत के ऐसे स्वामी का अभिकर्ता या पोत का मास्टर अभिप्रेत है ;

() “निधि" से स्कीम के अधीन स्थापित नाविक भविष्य-निधि अभिप्रेत है ;

() “सरकार" से केन्द्रीय सरकार अभिप्रेत है ;

() “मास्टर" और पोत" के वे ही अर्थ हैं जो क्रमशः उन्हें वाणिज्य-पोत-परिवहन अधिनियम में समनुदिष्ट हैं ;

() “सदस्य" से ऐसा नाविक अभिप्रेत है जिसके कब्जे में चलत उन्मोचन प्रमाणपत्र हो और जिसे निधि के सदस्य के रूप में प्रविष्ट किया गया हो ;

() “वाणिज्य-पोत-परिवहन अधिनियम" से वाणिज्य-पोत-परिवहन अधिनियम, 1958 (1958 का 44)                  अभिप्रेत है ;

() “स्कीम" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन विरचित नाविक भविष्य-निधि स्कीम अभिप्रेत है ;

() “नाविक" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो वाणिज्य-पोत-परिवहन अधिनियम के अधीन पोत के कर्मीदल के सदस्य के रूप में नियोजित या काम पर लगा हुआ हो, किन्तु इसके अन्तर्गत  [कल्याण आफिसर, परिचारिका, संगीतज्ञ, पाइलट या डेक नाईट  नहीं आते ;

() “सेवा" से कर्मीदल के साथ करार के अधीन किसी नाविक के नियोजन की कालावधि अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसी कोई कालावधि आती है जिसकी बाबत उसे मजदूरी दी जाती है या देय होती है ;

() “मजदूरी" से कर्मीदल के साथ करार के अधीन नाविक को तत्समय देय आधारिक मजदूरी अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत-

(i) कोई ऐसा पारिश्रमिक आता है जिसका वह अवकाश दिनों की बाबत या किसी छुट्टी की कालावधि की बाबत हकदार है,

(ii) ऐसे करार या पक्षकारों के बीच के किसी अन्य करार के अनुसार ऐसी मजदूरी की कोई वृद्धि आती है,

किन्तु इसके अन्तर्गत अतिकालिक भत्ता नहीं आता

                3. नाविक भविष्य-निधि स्कीम-(1) सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नाविकों के लिए भविष्य-निधि की स्थापना करने के लिए नाविक भविष्य-निधि स्कीम के नाम से कही जाने वाली स्कीम विरचित कर सकेगी तथा इस स्कीम के विरचन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र इस अधिनियम और उस स्कीम के उपबन्धों के अनुसार एक निधि की स्थापना की जाएगी

                (2) इस अधिनियम के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, स्कीम इस अधिनियम की अनुसूची में विनिर्दिष्ट सब विषयों के लिए या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेगी

                (3) स्कीम उपबन्ध कर सकेगी का उसमें को कोई उपबन्ध ऐसी तारीख से, जैसी स्कीम में इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए, चाहे भविष्यलक्षी चाहे भूतलक्षी रूप से प्रभावशील होगा

                (4) स्कीम इस अधिनियम से भिन्न किसी तत्समय प्रवृत्त विधि में अथवा इस अधिनियम से भिन्न विधि के आधार पर प्रभावशील किसी लिखत में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी प्रभावशील होगी

                (5) सरकार स्कीम में परिवर्धन, संशोधन, फेरफार या उसका विखण्डन शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा कर सकेगी

                4. निधि का निहित होना आदि-(1) धारा 3 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट निधि धारा 5 के अधीन गठित बोर्ड में निहित होगी तथा उसके द्वारा प्रशासित की जाएगी

                (2) निधि में के धन-

() बोर्ड के कर्मचारियों के वेतन और भत्तों तथा बोर्ड के अन्य प्रशासनिक व्ययों की पूर्ति में ; तथा

() इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने में,

उपयोजित किए जाएंगे

                (3) निधि में के सब धन  [अनुमोदित बैंकट में निक्षिप्त किए अथवा ऐसी प्रतिभूतियों में, जैसी सरकार द्वारा अनुमोदित की जाएं, विनिहित किए जाएंगे

                 [स्पष्टीकरण- इस धारा मेंअनुमोदित बैंक", से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, या भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) की धारा 2 के खंड () में परिभाषित कोई समनुषंगी बैंक, या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन गठित कोई तत्स्थानी नया बैंक या बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित कोई तत्स्थानी नया बैंक अभिप्रेत है ।]

                5. न्यासी बोर्ड का गठन-(1) सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसी तारीख से जैसी उसमें विनिर्दिष्ट की जाए, नाविक भविष्य-निधि का न्यासी-बोर्ड के नाम से कहे जाने वाले एक बोर्ड का गठन करेगी जो शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निमित्त निकाय होगा तथा उस नाम से वह वाद ला सकेगा और उस पर वाद लाया जा सकेगा

                (2) बोर्ड का प्रधान कार्यालय, मुम्बई में या ऐसे अन्य स्थान में होगा जिसे सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा                       विनिर्दिष्ट करे

                (3) बोर्ड निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-

() एक अध्यक्ष जो सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा ;

() सरकार द्वारा अपने पदधारियों में से नियुक्त तीन से अधिक व्यक्ति ;

() नियोजकों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन व्यक्ति जो नियोजकों के ऐसे संगठन या संगठनों से, जो सरकार से इस निमित्त मान्यताप्राप्त हों, परामर्श के पश्चात् सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे ;

() नाविकों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन व्यक्ति जो नाविकों के ऐसे संगठन या संगठनों से, जो सरकार से इस निमित्त मान्यताप्राप्त हों, परामर्श के पश्चात् सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे ;

                (4) वे निबन्धन और शर्तें, जिनके अध्यधीन बोर्ड का सदस्य नियुक्त किया जा सकेगा और बोर्ड के अधिवेशनों का समय, स्थान और प्रक्रिया, जिसके अन्तर्गत गणपूर्ति आती है, ऐसी होगी जैसी स्कीम में उपबन्धित की जाएं

                (5) बोर्ड अपने में निहित निधि का प्रशासन ऐसी रीति से करेगा जैसी स्कीम में विनिर्दिष्ट की जाए

                (6) बोर्ड अन्य ऐसे कृत्यों का पालन करेगा जिनके पालन करने की अपेक्षा स्कीम के किसी उपबंध द्वारा या के अधीन उससे              की जाए

                6. समितियां-(1) बोर्ड एक या अधिक समितियां बोर्ड की किसी शक्ति का प्रयोग या किसी कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए अथवा ऐसे किसी विषयकी, जो बोर्ड ऐसी समिति या समितियों को निर्देशित करे, जांच करने या उस पर रिर्पोट देने और सलाह देने के लिए समय-समय पर गठित कर सकेगा

                (2) समिति में ऐसे व्यक्ति हो सकेंगे जो बोर्ड के सदस्य नहीं हैं किन्तु उनकी संख्या समिति की सदस्य संख्या  के आधे से अधिक होगी

                7. बोर्ड के कर्मचारियों की नियुक्ति-(1) सरकार, एक नाविक भविष्य-निधि आयुक्त नियुक्त करेगी, जो बोर्ड का मुख्य कार्यपालक आफिसर होगा तथा बोर्ड के साधारण नियंत्रण और अधीक्षण के अध्यधीन होगा

                (2) सरकार नाविक भविष्य-निधि आयुक्त के कर्तव्यों के निर्वहन में उसकी सहायता करने के लिए इतने नाविक भविष्य-निधि उप-आयुक्त  नियुक्त कर सकेगी, जितने सरकार आवश्यक समझे

                (3) बोर्ड ऐसे अन्य आफिसरों और कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जिन्हें वह स्कीम के दक्ष प्रशासन के लिए                   आवश्यक समझे

                (4) नाविक भविष्य-निधि आयुक्त या नाविक भविष्य-निधि उप-आयुक्त के पद पर कोई भी नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग से परामर्श के पश्चात् किए जाने के सिवाय की जाएगी :

                परन्तु ऐसा कोई भी परामर्श किसी ऐसी नियुक्ति की बाबत आवश्यक होगा-

() यदि नियुक्ति एक वर्ष से अनधिक की कालावधि के लिए हो ; तथा

() यदि नियुक्त किया जाने वाला व्यक्ति अपनी नियुक्ति के समय-

                (i) भारतीय प्रशासनिक सेवा का सदस्य हो ; अथवा

                (ii) सरकार की सेवा में वर्ग ख्र् या वर्ग ख्र्ख्र् पद पर हो या बोर्ड की सेवा में हो

                (5) नाविक भविष्य-निधि आयुक्त की तथा उपधारा (2) में निर्दिष्ट आफिसरों की भर्ती की रीति, उनके संबलम् और भत्ते, अनुशासन तथा सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी जैसी सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं

                (6) बोर्ड के अन्य आफिसरों और कर्मचारियों की भर्ती की रीति, उनके संबलम् और भत्ते, अनुशासन तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी जैसी सरकार के अनुमोदन से बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं

                (7) इस धारा के अधीन नियुक्त सब व्यक्ति बोर्ड के कर्मचारी होंगे

                8. अभिदाय-(1) हर नियोजक, जिसे यह अधिनियम लागू होता है, अपने द्वारा नियोजित हर एक नाविक की बाबत (जो सदस्य हो) जुलाई, 1964 के प्रथम दिन आरम्भ होने वाली और मार्च, 1968 के 31वें दिन समाप्त होने वाली कालावधि के लिए, ऐसे हर एक नाविक को दी गई या देय मजदूरी के छह प्रतिशत की दर से,  [अप्रैल, 1968 के प्रथम दिन से आरंभ होने वाली और दिसम्बर,   1977 के 31वें दिन को समाप्त होने वाली कालावधि के लिए आठ प्रतिशत की दर से और तत्पश्चात् दस प्रतिशत की दर से या ऐसी उच्चतर दर से जो स्कीम में विनिर्दिष्ट की जाए, उस निधि में अभिदाय करेगा तथा ऐसा हर नाविक भी उस निधि में ऐसी रकम का, जो उसकी बाबत नियोजक द्वारा देय अभिदाय के बराबर है, अभिदाय करेगा :

                परन्तु पूर्वोक्त अभिदाय की रकम, जहां तक कि वह स्कीम के प्रारम्भ से पूर्व की कालावधि से सम्बद्ध है, केवल ऐसी तारीख को (जो स्कीम के प्रारम्भ के पश्चात् साठ दिन से पूर्वतर की होगी) जैसी कि सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, यथास्थिति, नियोजक या नाविक द्वारा देय होगी

                (2) नियोजक अपने द्वारा नियोजित हर एक नाविक की बाबत (जो सदस्य हो) नियोजक-अभिदाय और कर्मचारी-अभिदाय दोनों देगा तथा ऐसा कर्मचारी-अभिदाय नाविक से उसकी मजदूरी में से कटौती करके, कि अन्यथा, वसूल करने का हकदार होगा

                (3) हर नियोजक निधि के प्रशासन के खर्च के लिए धन की ऐसी राशियां देगा जैसी कि स्कीम में विनिर्दिष्ट हों

                (4) जहां कि उपधारा (1) के अधीन किसी अभिदाय की रकम में या उपधारा (3) के अधीन देय किसी राशि में रुपए का भाग अन्तर्विष्ट हो वहां यदि ऐसा भाग पचास पैसे या अधिक है तो उसे पूरा एक रुपया गिना जाएगा और यदि ऐसा भाग पचास पैसे से कम है तो उसे गणना में नहीं लिया जाएगा

                9. नियोजकों द्वारा शोध्य धन का अवधारण-(1) नाविक भविष्य-निधि आयुक्त या कोई नाविक भविष्य-निधि उप-आयुक्त उस रकम का निर्धारण आदेश द्वारा कर सकेगा जो किसी नियोजक द्वारा इस अधिनियम या स्कीम के किसी उपबन्ध के अधीन शोध्य हो तथा इस प्रयोजन के लिए ऐसी जांच कर सकेगा जैसी वह आवश्यक समझे

                (2) उपधारा (1) के अधीन जांच करने वाले आफिसर की, ऐसी जांच के प्रयोजन के लिए, निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो किसी वाद का विचारण करने के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-

() किसी व्यक्ति को हाजिर कराना या शपथ पर उसकी परीक्षा करना ;

() दस्तावेजों को प्रकट करने या पेश करने की अपेक्षा करना ;

() शपथपत्र पर साक्ष्य प्राप्त करना ;

() साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना,

और ऐसी जांच भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ के अंदर और धारा 196 के प्रयोजन के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी

                (3) इस धारा के अधीन कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि नियोजक को अपने मामले का अभ्यावेदन करने का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो

                (4) इस धारा के अधीन किया गया आदेश अन्तिम होगा और किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा

                10. नियोजकों द्वारा शोध्य धन की वसूली का ढंग-कोई ऐसी रकम जो नियोजक द्वारा निधि में देय किसी अभिदाय की बाबत या धारा 18 के अधीन वसूलीय नुकसानी की बाबत या इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के अधीन या स्कीम के किसी उपबन्ध के अधीन उसके द्वारा देय किन्हीं प्रभारों की बाबत शोध्य हो, यदि वह रकम बकाया में हो तो, सरकार द्वारा उसी रीति से वसूल की जाएगी जैसे कि भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती है

                11. निधि का 1961 के अधिनियम 43 के अधीन मान्यताप्राप्त भविष्य-निधि समझा जाना-निधि आय-कर अधिनियम, 1961 के प्रयोजनों के लिए उस अधिनियम के अर्थ के अंदर मान्यताप्राप्त भविष्य-निधि समझी जाएगी

                12. कुर्की के विरुद्ध संरक्षण-(1) निधि में किसी सदस्य के नाम जमा रकम किसी प्रकार भी समनुदिष्ट या भारित किए जाने योग्य होगी और उस सदस्य द्वारा उपगत किसी ऋण या दायित्व के बारे में किसी न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश के अधीन कुर्क किए जाने के दायित्व के अधीन होगी और तो प्रेसिडेन्सी नगर दिवाला अधिनियम, 1909 (1909 का 3) के अधीन नियुक्त शासकीय समनुदेशिती और प्रान्तीय दिवाला अधिनियम, 1920 (1920 का 5) के अधीन नियुक्त कोई रिसीवर ऐसी किसी रकम का, या उस रकम पर किसी दावे का, हकदार होगा

                (2) किसी सदस्य की मृत्यु के समय उसके नाम जमा और स्कीम के अधीन उसके नामनिर्देशिती को देय कोई रकम उस नामनिर्देशिती में ऐसी किसी कटौती के अध्यधीन निहित होगी जो स्कीम द्वारा प्राधिकृत हो तथा मृतक द्वारा उपगत या उस सदस्य की मृत्यु के पूर्व मृतक या नामनिर्देशिती द्वारा उपगत किसी ऋण या अन्य दायित्व से मुक्त होगी

                13. अभिदायों के संदाय की अन्य ऋणों पर पूर्विकता-जहां कि कोई नियोजक दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है, अथवा कम्पनी होने की दशा में उसके परिसमापन का आदेश किया जाता है, वहां ऐसी कोई रकम जो नियोजक द्वारा निधि में देय किसी अभिदाय की बाबत, या धारा 18 के अधीन वसूलीय नुकसानी की बाबत, या इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के अधीन या स्कीम के किसी उपबन्ध के अधीन उसके द्वारा देय किन्हीं प्रभारों की बाबत शोध्य हो, उस दशा में जबकि उनके लिए दायित्व ऐसे न्यायनिर्णयन या परिसमापन का आदेश दिए जाने से पूर्व प्रोद्भूत हुआ हो, ऐसे ऋणों के अन्तर्गत समझी जाएगी जिन्हें प्रेसीडेन्सी नगर दिवाला अधिनियम, 1909 (1909 का 3) की धारा 49 के अधीन या प्रान्तीय दिवाला अधिनियम, 1920 (1920 का 5) की धारा 61 के अधीन या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 530 के अधीन, यथास्थिति, दिवालिए की सम्पत्ति का या परिसमापन की जाने वाली कम्पनी की आस्तियों का वितरण करने में अन्य सब ऋणों के ऊपर पूर्विकता दिया जाना है

                14. नियोजक द्वारा मजदूरी का कम किया जाना-कोई भी नियोजक किसी नाविक की, जिसे स्कीम लागू होती है, मजदूरी को अथवा वार्धक्य पेंशन, उपदान, या भविष्य-निधि की प्रकृति के फायदों की कुल मात्रा को, जिसके लिए वह नाविक किसी कर्मीदल के साथ करार के या पक्षकारों के बीच किसी अन्य करार के अधीन हकदार है, निधि के लिए किसी अभिदाय की अथवा इस अधिनियम या स्कीम के अधीन किसी प्रभारों के संदाय की बाबत अपने दायित्व के कारण ही प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः कम नहीं करेगा

                15. निरीक्षक-(1) सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम और स्कीम के प्रयोजनों के लिए, बोर्ड के ऐसे कर्मचारियों को, जिन्हें सरकार ठीक समझे, निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी तथा उनकी अधिकारिता परिनिश्चित कर सकेगी

                (2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त हर निरीक्षक इस अधिनियम या स्कीम के सम्बन्ध में दी गई किसी जानकारी की शुद्धता की जांच करने के प्रयोजन के लिए, अथवा यह अभिनिश्चय करने के प्रयोजन के लिए कि इस अधिनियम के या स्कीम के उपबन्धों में से किसी का अनुपालन हुआ है या नहीं-

() किसी नियोजक से ऐसी जानकारी देने की अपेक्षा कर सकेगा जो वह स्कीम के सम्बन्ध में आवश्यक समझे ;

() किसी युक्तियुक्त समय पर और ऐसी सहायता के साथ, यदि कोई हो, जैसी वह ठीक समझे, किसी कार्यालय में या पोत में प्रवेश कर सकेगा, उसकी तलाशी ले सकेगा तथा उसका भारसाधक पाए गए व्यक्ति से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह नाविकों के नियोजन से या नाविकों की मजदूरी के संदाय से सम्बन्धित लेखाओं, बहियों, रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों को उसके समक्ष परीक्षा के लिए पेश करे ;

() पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी से सुसंगत किसी बात के बारे में नियोजक को, उसके अभिकर्ता या सेवक की, या किसी अन्य ऐसे व्यक्ति की, जो कार्यालय या पोत का भारसाधक पाया जाए या जिसके बारे में निरीक्षक को यह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त हेतुक हो कि वह उस कार्यालय में या उस पोत पर कर्मचारी है या रहा है, परीक्षा कर सकेगा ;

() निधि के सम्बन्ध में रखी गई किसी पुस्तक, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज की प्रतिलिपियां बना सकेगा या उनसे उद्धरण ले सकेगा और जहां कि उसके पास यह विश्वास करने का कारण हो कि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध नियोजक द्वारा किया गया है वहां वह ऐसी सहायता के साथ, जैसी वह ठीक समझे, ऐसी बही, रजिस्टर या अन्य दस्तावेज या उनके कोई प्रभाग, जैसे वह उस अपराध की बाबत सुसंगत समझे, अभिगृहीत कर सकेगा ;

() ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जैसी कि स्कीम में उपबन्धित हों

                 [(3) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंध उपधारा (2) के अधीन की किसी तलाशी या अभिग्रहण को, यथाशक्य, वैसे ही लागू होंगे कि वे उक्त संहिता की धारा 94 के अधीन निकाले गए वारंट के प्राधिकार के अधीन की गई किसी तलाशी या अभिग्रहण को लागू होते हैं ।ट

                (4) हर निरीक्षक भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के अंदर लोक सेवक समझा जाएगा

                16. शास्तियां-(1) जो कोई इस अधिनियम या स्कीम के अधीन अपने द्वारा किसी संदाय के दिए जाने से बचने अथवा ऐसे संदाय से बचने में किसी अन्य व्यक्ति को समर्थ करने के प्रयोजन से, जानते हुए, मिथ्या कथन या मिथ्या व्यपदेशन करेगा या कराएगा वह कारावास से, जिसकी अवधि  [एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो पचास हजार रुपए तक का हो सकेगाट या दोनों से दण्डनीय होगा

                (2) स्कीम यह उपबन्ध कर सकेगी कि कोई व्यक्ति, जो उसके उपबन्धों में से किसी का उल्लंघन करेगा या उसके अनुपालन में व्यतिक्रम करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दण्डनीय होगा

                (3) जो कोई इस अधिनियम के किसी उपबन्ध का उल्लंघन करेगा या उसके अनुपालन में व्यतिक्रम करेगा वह, यदि ऐसे उल्लंघन या अननुपालन के लिए इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन कोई अन्य शास्ति अन्यत्र उपबन्धित नहीं है, कारावास से, जो तीन मास तक का हो सकेगा या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा

                (4) कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन या स्कीम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान ऐसा अपराध गठित करने वाले तथ्यों की ऐसी लिखित रिपोर्ट पर करने के सिवाय नहीं करेगा जो नाविक भविष्य-निधि आयुक्त द्वारा या धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किसी निरीक्षक द्वारा ऐसे प्राधिकारी की, जो सरकार द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, पूर्व मंजूरी से की गई हो

                17. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) यदि इस अधिनियम या स्कीम के अधीन अपराध करने वाला व्यक्ति कम्पनी है तो हर व्यक्ति, जो अपराध के किए जाने के समय कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उस कम्पनी के प्रति उत्तरदायी था और वह कम्पनी भी उस अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही की जाने और दंडित किए जाने के दायित्व के अधीन होंगे :

                परन्तु इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई भी बात ऐसे किसी व्यक्ति को किसी दण्ड के दायित्व के अधीन करेगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या ऐसे अपराध का किया जाना निवारित करने के लिए उसने सम्यक् तत्परता बरती थी

                (2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, जहां कि इस अधिनियम या स्कीम के अधीन कोई अपराध कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित कर दिया जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य आफिसर की सम्मति या मौनानुकूलता से किया गया है या उसकी ओर से हुई किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य आफिसर उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही की जाने और दण्डित किए जाने के दायित्व के अधीन होगा

                (3) जहां कि इस अधिनियम या स्कीम के अधीन कोई अपराध ऐसी कम्पनी द्वारा किया जाता है जो भारत में रजिस्ट्रीकृत नहीं है और ऐसी कम्पनी का भारत में कोई अभिकर्ता है, जो अभिकर्ता भी कम्पनी ही है वहां इस धारा के उपबन्ध उस अभिकर्ता को ऐसे लागू होंगे मानो वह अपराध उस अभिकर्ता द्वारा किया गया था

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-

() “कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम आता        है ; तथा

() किसी फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है

                18. नुकसानी वसूल करने की शक्ति-जहां कि कोई नियोजक निधि में किसी अभिदाय का संदाय करने में अथवा इस अधिनियम के किसी अन्य उपबन्ध के या स्कीम के अधीन देय किन्हीं प्रभारों का संदाय करने में व्यतिक्रम करेगा वहां सरकार बकाया की रकम के पच्चीस प्रतिशत से अनधिक उतनी नुकसानी, जितनी वह ठीक समझे, नियोजक से वसूल कर सकेगी

                19. लेखा का अन्तरण-जहां कि कोई नाविक अपनी सांयात्रिक वृत्ति, उस वृत्ति को पुनःग्रहण करने के वर्तमान आशय के बिना, छोड़ देता है और किसी अन्य स्थापन में, जिसे कर्मचारी भविष्य-निधि अधिनियम, 1952 (1952 का 19) लागू है, नियोजन अभिप्राप्त कर लेता है वहां यदि वह नाविक ऐसा चाहे और उस भविष्य-निधि से सम्बन्धित नियम ऐसा अन्तरण अनुज्ञात करे तो निधि में ऐसे नाविक के नाम जमा रकम ऐसे समय के भीतर जैसा बोर्ड द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए उस स्थापन की भविष्य-निधि के उसके खाते में उसके नाम अन्तरित कर दी जाएगी

                20. छूट देने की शक्ति-(1) बोर्ड किसी नाविक को, जिसे यह अधिनियम लागू होता है, और उसके नियोजक को इस अधिनियम के सभी उपबन्धों के या उनमें से किसी के प्रवर्तन से लिखित आदेश द्वारा छूट दे सकेगा, यदि बोर्ड की राय में वह नाविक भवि या पेंशन की प्रकृति की किन्हीं प्रसुविधाओं का उपभोग कर रहा है और उस नाविक को ऐसी प्रसुविधा पृथक्तः या संयुक्ततः इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उपबन्धित प्रसुविधाओं से कुल मिलाकर कम हितकर नहीं है

                (2) जहां कि उपधारा (1) के अधीन कोई छूट दी गई है वहां नियोजक ऐसी छूट के दिए जाने के पश्चात् किसी भी समय, बोर्ड की इजाजत के बिना, भविष्य-निधि, पेंशन या उपदान की प्रकृति की प्रसुविधाओं की कुल मात्रा को, जिसके लिए वह नाविक ऐसी छूट के दिए जाने के समय हकदार था कम कर सकेगा

                (3) यदि नियोजक उपधारा (2) की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में असफल रहे तो इस धारा के अधीन दी गई छूट बोर्ड द्वारा लिखित आदेश द्वारा रद्द की जा सकेगी :

                परन्तु ऐसा कोई भी आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि नियोजक को प्रस्थापित रद्दकरण के विरुद्ध हेतुक दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो             

                21. सद्भावपूर्वक किए गए कार्यों के लिए परित्राण-कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही इस अधिनियम के या स्कीम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात की बाबत सरकार या बोर्ड या उसके किसी आफिसर या कर्मचारी के विरुद्ध होगी

                22. प्रत्यायोजन-(1) सरकार आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि (धारा 3 के अधीन स्कीम विरचित करने की शक्ति से भिन्न) किसी शक्ति या कर्तव्य का, जो इस अधिनियम द्वारा या स्कीम द्वारा सरकार को प्रदत्त या सरकार पर अधिरोपित हो, ऐसी परिस्थितियों में और ऐसी शर्तों के अधीन, यदि कोई हों, जैसी निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, प्रयोग या निर्वहन ऐसे आफिसर या प्राधिकारी द्वारा भी किया जाएगा, जैसा इस प्रकार विनिर्दिष्ट किया जाए

                (2) सरकार के पूर्व अनुमोदन से बोर्ड इस अधिनियम के अधीन के अपने ऐसे कृत्य, जिन्हें वह स्कीम के दक्ष प्रशासन के लिए आवश्यक समझे, अपने अध्यक्ष या अपने कर्मचारियों में से किसी को, ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अध्यधीन, यदि कोई हों, जैसी विनिर्दिष्ट की जाएं, प्रत्यायोजित कर सकेगा

                23. कठिनाइयों के निराकरण की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावशील करने में कोई कठिनाई उद्भूत हो तो सरकार ऐसा आदेश कर सकेगी या ऐसा निदेश दे सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत हो और जो उस कठिनाई के निराकरण के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो और ऐसा आदेश अन्तिम होगा

                24. स्कीम का संसद् के सदनों के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन विरचित स्कीम, ऐसे विरचित की जाने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र संसद् के हर एक सदन के समक्ष, उस समय जब वह सत्र में हो, कुल मिलाकर तीस दिन की कालावधि के लिए, जो एक सत्र में या दो क्रमवर्ती सत्रों में समाविष्ट हो सकेगी, रखी जाएगी और यदि उस सत्र के, जिसमें वह ऐसे रखी गई हो या अव्यवहित पश्चात्वर्ती सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस स्कीम के किसी उपबन्ध में कोई उपान्तर करने के लिए सहमत हो जाएं या यदि दोनों सदन सहमत हो जाएं कि उस स्कीम में का कोई उपबन्ध नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात्, उस स्कीम का वह उपबन्ध, यथास्थिति, ऐसे उपान्तरित रूप में ही प्रभावशील होगा या उसका कोई भी प्रभाव होगा किन्तु ऐसे कि ऐसा कोई उपान्तर या बातिलकरण उस उपबन्ध के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा

अनुसूची

[धारा 3 (2) देखिए]

                वे विषय जिनके लिए स्कीम में उपबन्ध किया जा सकेगा

                                1. वे नाविक जो निधि में शामिल होंगे

2. वह समय जिसमें और वह रीति जिससे नियोजकों द्वारा और नाविकों द्वारा या उनकी ओर से निधि में अभिदाय किए जाएंगे

3. नियोजक द्वारा ऐसी धनराशियों का संदाय जो निधि के प्रशासन का खर्च पूरा करने के लिए आवश्यक हों, तथा वह दर जिस पर और वह रीति जिससे वह संदाय किया जाएगा

4. बोर्ड के अन्य कृत्य

5. बोर्ड को सहायता देने के लिए किसी समिति का गठन

6. बोर्ड के प्रादेशिक और अन्य कार्यालयों का खोला जाना

7. वह रीति जिसमें लेखा रखे जाएंगे, सरकार द्वारा निकाले गए निदेशों या विनिर्दिष्ट शर्तों के अनुसार निधि के धनों का विनिधान, बजट का तैयार किया जाना, लेखाओं की संपरीक्षा और सरकार को रिपोर्टों का निवेदन

8. वे शर्तें जिनके अधीन निधि में से रकम निकालना अनुज्ञात किया जा सकेगा तथा कोई कटौती या समपहरण किया जा सकेगा और ऐसी कटौती या समपहरण की अधिकतम रकम

9. सदस्यों को देय ब्याज की दर का बोर्ड के परामर्श से सरकार द्वारा नियत किया जाना

10. वह प्ररूप जिसमें नाविक अपने और अपने कुटुम्ब के बारे में, जब कभी अपेक्षा की जाए, विशिष्टियां देगा

11. किसी सदस्य के नाम में जमा रकम की उसकी मृत्यु के पश्चात् प्राप्ति के लिए किसी व्यक्ति का उस सदस्य द्वारा नामनिर्देशित किया जाना तथा ऐसे नामनिर्देशन का रद्द किया जाना या उसमें फेरफार किया जाना

12. नाविकों की बाबत रखे जाने वाले रजिस्टर और अभिलेख तथा नियोजकों द्वारा दी जाने वाली विवरणियां

13. इस अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों में से किसी के लिए उद्गृहीत की जाने वाली फीसें

14. वे उल्लंघन या व्यतिक्रम जो धारा 16 के अधीन दण्डनीय होंगे

15. वे अतिरिक्त शक्तियां, यदि कोई हों, जिनका निरीक्षकों द्वारा प्रयोग किया जा सकेगा

16. वे शर्तें जिनके अधीन किसी सदस्य को निधि में से जीवन बीमा प्रीमियम देने के लिए अनुज्ञात किया             जा सकेगा

17. कोई अन्य विषय जिसके लिए स्कीम में उपबन्ध किया जाना है या जो स्कीम को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या उचित हो

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