भारतीय पशु-चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 1984
(1984 का अधिनियम संख्यांक 52)
[18 अगस्त, 1984]
पशु-चिकित्सा व्यवसाय का विनियमन करने के लिए और उस प्रयोजन के लिए
भारतीय पशु-चिकित्सा परिषद् और राज्य पशु-चिकित्सा परिषदों की
स्थापना और पशु-चिकित्सा व्यवसायियों के रजिस्टर रखने के
लिए तथा उससे संसक्त विषयों के लिए
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
पशु-चिकित्सा व्यवसाय के विनियमन के लिए उपबन्ध करने के लिए और उस प्रयोजन के लिए भारतीय पशु-चिकित्सा परिषद् और राज्य पशु-चिकित्सा परिषदों की स्थापना और संपूर्ण भारत में पशु-चिकित्सा व्यवसाय में लगने के लिए अर्हित व्यक्तियों के रजिस्टरों को रखने के लिए और उससे संसक्त या आनुषंगिक विषयों के लिए उपबन्ध करना समीचीन है ;
और संसद् को पूर्वोक्त विषयों में से किसी की बाबत राज्यों के लिए, संविधान के अनुच्छेद 249 और 250 में जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, विधि बनाने की शक्ति नहीं है ;
और संविधान के अनुच्छेद 252 के खण्ड (1) के अनुसरण में हरियाणा, बिहार, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान राज्यों के विधान-मण्डलों के सभी सदनों द्वारा इस प्रभाव के संकल्प पारित किए गए हैं कि पूर्वोक्त विषयों का विनियमन उन राज्यों में संसद् की विधि द्वारा किया जाना चाहिए ;
भारत गणराज्य के पैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय पशु-चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 1984 है ।
(2) इसका विस्तार प्रथमतः संपूर्ण हरियाणा, बिहार, उड़ीसा, हिमाचल प्रदेश और राजस्थान राज्यों और सभी संघ-राज्यक्षेत्रों पर है, और इसका विस्तार ऐसे अन्य राज्यों पर भी होगा जो संविधान के अनुच्छेद 252 के खण्ड (1) के अनुसरण में उस निमित्त पारित संकल्प द्वारा इस अधिनियम को अंगीकृत करें ।
(3) यह उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में, जिस पर इसका विस्तार है, या भविष्य में जिस पर इसका विस्तार किया जा सकेगा, ऐसी तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिए या विभिन्न राज्यों या संघ राज्यक्षेत्रों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) परिषद्" से धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय पशु-चिकित्सा परिषद् अभिप्रेत है ;
(ख) सदस्य" से परिषद् का सदस्य अभिप्रेत है ;
(ग) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(घ) अध्यक्ष" से परिषद् का अध्यक्ष अभिप्रेत है ;
(ङ) मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता" से पहली अनुसूची या दूसरी अनुसूची में सम्मिलित पशु-चिकित्सा अर्हताओं में से कोई अभिप्रेत है ;
(च) रजिस्टर" से इस अधिनियम के अधीन रखा गया रजिस्टर अभिप्रेत है ;
(छ) रजिस्ट्रीकृत पशु-चिकित्सा व्यवसायी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसका नाम तत्समय किसी रजिस्टर में सम्यक् रूप से रजिस्ट्रीकृत है ;
(ज) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाया गया विनियम अभिप्रेत है ;
(झ) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद्" से धारा 32 के अधीन स्थापित पशु-चिकित्सा परिषद् अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत धारा 33 के अधीन किसी करार के अनुसार स्थापित संयुक्त राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् भी है ;
(ञ) पशु-चिकित्सा संस्था" से भारत में या भारत के बाहर ऐसा कोई विश्वविद्यालय या अन्य संस्था अभिप्रेत है जो पशु-चिकित्सा विज्ञान और पशु-पालन में उपाधि, डिप्लोमा या अनुज्ञप्ति अनुदत्त करती है ;
(ट) पशु-चिकित्सा औषधि" से आधुनिक वैज्ञानिक पशु-चिकित्सा औषधि, उसकी सभी शाखाओं में, अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत पशु-शल्य चिकित्सा और प्रसूति विज्ञान है ;
(ठ) उपाध्यक्ष" से परिषद् का उपाध्यक्ष अभिप्रेत है ।
अध्याय 2
भारतीय पशु-चिकित्सा परिषद्
3. परिषद् की स्थापना और संरचना-(1) ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त नियत करे, भारतीय पशु-चिकित्सा परिषद् के नाम से एक परिषद् स्थापित की जाएगी ।
(2) परिषद् पूर्वोक्त नाम से शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाली एक निगमित निकाय होगी, जिसे जंगम और स्थावर, दोनों प्रकार की सम्पत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगी और उसके विरुद्ध वाद लाया जाएगा ।
(3) परिषद् निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
(क) पांच सदस्य, जो उन राज्यों के जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, पशुपालन निदेशकों (उनका चाहे जो भी नाम हो) में से केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे ;
(ख) चार सदस्य, उन राज्यों में के, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, पशु-चिकित्सा संस्थाओं के प्रधानों में से केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे ;
(ग) एक सदस्य, जो भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ;
(घ) पशु-पालन आयुक्त, भारत सरकार, पदेन ;
(ङ) एक सदस्य, जो पशु पालन के सम्बन्ध में कार्य करने वाले केन्द्रीय सरकार के मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने के लिए, केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ;
(च) एक सदस्य, जो भारतीय पशु-चिकित्सा संगम द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ;
(छ) ग्यारह सदस्य, जो भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर में नामांकित व्यक्तियों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे ;
(ज) एक सदस्य, उन राज्यों में की, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, राज्य पशु-चिकित्सा-परिषदों के अध्यक्षों में से केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ;
(झ) एक सदस्य, उन राज्यों में के, जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, राज्य पशु-चिकित्सा संगमों के प्रधानों में से केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ;
(ञ) सचिव, भारतीय पशु-चिकित्सा परिषद्, पदेन ।
(4) अध्यक्ष और उपाध्यक्ष, सदस्यों द्वारा अपने में से ऐसी रीति से निर्वाचित किए जाएंगे, जो विनियमों द्वारा उपबन्धित की जाए ।
(5) जब कभी अध्यक्ष का पद रिक्त हो तब अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन उपाध्यक्ष करेगा ।
(6) सदस्यों के रूप में नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित व्यक्तियों के नाम केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचित करेगी ।
(7) कोई व्यक्ति परिषद् में नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक वह मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता धारण न करता हो ।
4. सदस्यों के निर्वाचन का ढंग-(1) धारा 3 की उपधारा (3) के खण्ड (छ) के अधीन निर्वाचन का संचालन केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे नियमों के अनुसार किया जाएगा, जो उसके द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं और इस प्रकार बनाए गए नियम में यह उपबन्ध किया जा सकेगा कि इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर के तैयार किए जाने तक उस खण्ड में निर्दिष्ट सदस्यों को, उसमें उपबन्धित रूप में, निर्वाचित किए जाने के बजाय केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जा सकेगा ।
(2) जहां परिषद् के लिए निर्वाचन के बारे में कोई विवाद उठता है, वहां वह केन्द्रीय सरकार को उसके विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा जिसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।
5. अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि-(1) अध्यक्ष या उपाध्यक्ष तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए पद धारण करेगा और उस अवधि का विस्तार परिषद् के सदस्य के रूप में उसकी अवधि के अवसान के बाद नहीं होगा ।
(2) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, पदेन सदस्य से भिन्न कोई सदस्य परिषद् के लिए अपने निर्वाचन या नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए या जब तक उसका पदोत्तरवर्ती सम्यक् रूप से निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट नहीं हो जाता है, तब तक के लिए, इसमें से जो भी अवधि दीर्घतर हो, पद धारण करेगा ।
(3) परिषद् के सदस्य पुनः नामनिर्देशन या पुनः निर्वाचन के पात्र होंगे ।
(4) जहां किसी सदस्य के संबंध में तीन वर्ष की अवधि का अवसान होने वाला है वहां पदोत्तरवर्ती, उक्त अवधि के अवसान के पूर्व तीन मास के भीतर किसी भी समय नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित किया जा सकेगा किन्तु वह तब तक पद ग्रहण नहीं करेगा जब तक उक्त अवधि का अवसान न हो जाए ।
6. सदस्यता की समाप्ित-(1) किसी सदस्य के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने अपना पद रिक्त कर दिया है :-
(क) यदि वह परिषद् की राय में बिना कारण के परिषद् के तीन निरन्तर अधिवेशनों में अनुपस्थित रहता है ;
(ख) यदि वह उस पद पर नहीं रह जाता है जिससे उसको नामनिर्दिष्ट किया गया है ;
(ग) धारा 3 की उपधारा (3) के खण्ड (छ) के अधीन निर्वाचित किसी सदस्य के मामले में, यदि वह रजिस्टर में नामांकित व्यक्ति नहीं रह जाता है ;
(घ) यदि वह नैतिक अधमता अन्तर्वलित करने वाले और कारावास से दण्डनीय किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है ;
(ङ) यदि वह अनुन्मोचित दिवालिया है ;
(च) यदि वह विकृतचित्त है और किसी सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित किया गया है ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी रिक्ति के होने पर अध्यक्ष ऐसी रिक्ति के तथ्य की रिपोर्ट तुरन्त केन्द्रीय सरकार को करेगा और तत्पश्चात् वह सरकार धारा 7 के परन्तुक के अधीन रहते हुए ऐसी रिक्ति को भरने के लिए आवश्यक कदम उठा सकेगी ।
7. आकस्मिक रिक्ति-परिषद् में कोई आकस्मिक रिक्ति, यथास्थिति, नामनिर्देशन या निर्वाचन द्वारा भरी जाएगी और रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित व्यक्ति उस अवधि के शेष भाग के लिए ही पद धारण करेगा जिसके लिए वह सदस्य, जिसका स्थान वह लेता है, नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित किया गया था :
परन्तु ऐसी किसी आकस्मिक रिक्ति को, जो नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित सदस्य की सामान्य पदावधि के अवसान की तारीख के तीन माह के भीतर होनी है इस धारा के अधीन भरे जाने की आवश्यकता नहीं है ।
8. पद-त्याग-(1) अध्यक्ष या उपाध्यक्ष परिषद् को संबोधित और सचिव को परिदत्त लिखित सूचना द्वारा अपना पद किसी भी समय त्याग सकेगा और त्याग-पत्र उस तारीख से जिसको वह परिषद् द्वारा स्वीकार किया जाता है या उस तारीख से, जिसको त्याग-पत्र सचिव को प्राप्त होता है, नब्बे दिन की समाप्ति पर, जो भी पूर्वतर हो, प्रभावी होगा ।
(2) कोई सदस्य अध्यक्ष को संबोधित लिखित सूचना द्वारा अपना पद किसी भी समय त्याग सकेगा और ऐसा प्रत्येक त्याग-पत्र उस तारीख से, जिसको वह अध्यक्ष द्वारा स्वीकार किया जाता है या उस तारीख से, जिसको अध्यक्ष को प्राप्त होता है, नब्बे दिन की समाप्ति पर, जो भी पूर्वतर हो, प्रभावी होगा ।
9. परिषद् के अधिवेशन-(1) परिषद् का अधिवेशन वर्ष में कम से कम दो बार ऐसे समय और स्थान पर होगा, जो परिषद् द्वारा नियत किया जाए ।
(2) परिषद् के अधिवेशन में कारबार के संव्यवहार के लिए आवश्यक गणपूर्ति नौ से होगी ।
(3) अध्यक्ष, जब वह उपस्थित हो, परिषद् के सभी अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा और उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष और दोनों की अनुपस्थिति में उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित कोई अन्य सदस्य ऐसे अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।
(4) इस अधिनियम में, जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, परिषद् के किसी अधिवेशन में उसके समक्ष आने वाले सभी प्रश्नों का विनिश्चय उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाएगा ।
(5) मत बराबर होने की दशा में अध्यक्ष का निर्णायक मत होगा ।
(6) उपधारा (1) से (5) तक के उपबन्धों के अधीन रहते हुए परिषद् अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी, जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।
10. परिषद् में रिक्तियों से कार्यों आदि का अविधिमान्य न होना-परिषद् का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इसी कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि परिषद् में कोई रिक्ति थी या उसके गठन में कोई त्रुटि या अनियमितता थी ।
11. सचिव और अन्य अधिकारियों या सेवकों की नियुक्ति-(1) परिषद् केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से, एक सचिव नियुक्त कर सकेगी जो कोषाध्यक्ष के रूप में तब तक कार्य करेगा जब तक परिषद् किसी अन्य व्यक्ति को कोषाध्यक्ष के रूप में नियुक्त नहीं करती है और ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकेगी, जो वह इस अधिनियम के प्रयोजन को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक समझे ।
(2) परिषद् द्वारा नियुक्त सचिव, अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी, जो विनियमों द्वारा उपबंधित की जाए ।
(3) परिषद् के सचिव, अधिकारी और अन्य कर्मचारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
(4) परिषद् के सभी आदेश और विनिश्चय तथा अन्य लिखतें परिषद् के सचिव के या परिषद् द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत उसके किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी ।
12. कार्यपालिका समिति और अन्य समितियां-(1) परिषद् अपने सदस्यों में से एक कार्यपालिका समिति नियुक्त करेगी और ऐसे साधारण या विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए, जो परिषद् आवश्यक समझे, अन्य समितियां गठित कर सकेगी और विशेष रूप से अर्हित किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को, कार्यपालिका समिति से भिन्न किसी समिति को किसी विषय पर सलाह देने के लिए सहयोजित कर सकेगी ।
(2) इस धारा के अधीन गठित समिति का अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगी जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।
13. फीस और भत्ते-अध्यक्ष और अन्य सदस्यों तथा समितियों के सदस्यों को (परिषद् के सदस्यों से भिन्न) परिषद् और समितियों के अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए ऐसी फीसों और भत्तों का संदाय किया जाएगा, जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।
14. परिषद् द्वारा दी जाने वाली जानकारी और उसका प्रकाशन-(1) परिषद् केन्द्रीय सरकार को ऐसी रिपोर्टें, अपने कार्यवृत्तों की प्रतिलिपियां, अपने लेखाओं की संक्षिप्ति और अन्य जानकारी देगी, जिसकी वह सरकार अपेक्षा करे ।
(2) केन्द्रीय सरकार इस धारा के अधीन उसे दी गई कोई रिपोर्ट, प्रतिलिपि, संक्षिप्ति या अन्य जानकारी ऐसी रीति से प्रकाशित कर सकेगी जो वह ठीक समझे ।
15. भारत में पशु-चिकित्सा संस्थाओं द्वारा अनुदत्त पशु-चिकित्सा अर्हताओं की मान्यता-(1) भारत में की किसी पशु-चिकित्सा संस्था द्वारा अनुदत्त ऐसी पशु-चिकित्सा अर्हताएं जो पहली अनुसूची में सम्मिलित हैं इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हताएं होगी ।
(2) भारत में की कोई पशु-चिकित्सा संस्था, जो ऐसी पशु-चिकित्सा अर्हता अनुदत्त करती है जो पहली अनुसूची में सम्मिलित नहीं है, ऐसी अर्हता को मान्यताप्राप्त कराने के लिए केन्द्रीय सरकार को आवेदन कर सकेगी और केन्द्रीय सरकार परिषद् से परामर्श करने के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, पहली अनुसूची में संशोधन कर सकेगी, जिससे ऐसी अर्हता को उसमें सम्मिलित किया जा सके और ऐसी किसी अधिसूचना में यह निदेश भी दिया जा सकेगा कि पहली अनुसूची के अंतिम स्तम्भ में ऐसी पशु-चिकित्सा अर्हता के सामने यह घोषणा करने वाली प्रविष्टि की जाएगी कि यह मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता केवल तब होगी जब उसे विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात् अनुदत्त किया जाए ।
16. ऐसे देशों की, जिनके साथ व्यतिकारिता की स्कीम है, पशु-चिकित्सा संस्थाओं द्वारा अनुदत्त पशु-चिकित्सा अर्हताओं की मान्यता-(1) भारत के बाहर की पशु-चिकित्सा संस्थाओं द्वारा अनुदत्त पशु-चिकित्सा अर्हताएं, जो दूसरी अनुसूची में सम्मिलित हैं, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हताएं होगी ।
(2) परिषद् भारत के बाहर के किसी देश के किसी प्राधिकारी के साथ, जिसे ऐसे देश की विधि द्वारा पशु-चिकित्सा व्यवसायियों का रजिस्टर रखने का कार्य सौंपा गया है, पशु-चिकित्सा अर्हताओं की मान्यता के लिए व्यतिकारिता की स्कीम तैयार करने के लिए बातचीत कर सकेगी और ऐसी किसी स्कीम के अनुसरण में केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, दूसरी अनुसूची में संशोधन कर सकेगी जिससे उसमें ऐसी पशु-चिकित्सा अर्हता को सम्मिलित किया जा सके जिसके बारे में परिषद् ने यह विनिश्चय किया है कि उसे मान्यता दी जानी चाहिए और ऐसी किसी अधिसूचना में यह निदेश भी दिया जा सकेगा कि दूसरी अनुसूची के अंतिम स्तम्भ में ऐसी पशु-चिकित्सा अर्हता के सामने यह घोषणा करते हुए प्रविष्टि की जाएगी कि वह मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता केवल तब होगी जब उसे किसी विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात् अनुदत्त किया जाए ।
(3) केन्द्रीय सरकार परिषद् से परामर्श करने के पश्चात् राजपत्र में अधिसूचना द्वारा दूसरी अनुसूची में यह निदेश देते हुए संशोधन कर सकेगी कि उसमें किसी पशु-चिकित्सा अर्हता की बाबत यह घोषणा करते हुए प्रविष्टि की जाए कि यह मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता केवल तब होगी जब उसे विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व अनुदत्त किया जाए ।
(4) जहां परिषद् ने किसी ऐसी पशु-चिकित्सा अर्हता की, जिसको मान्यता देने के लिए उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी प्राधिकारी द्वारा प्रस्थापना की गई है, सिफारिश करने से इंकार किया है और प्राधिकारी, इस निमित्त केन्द्रीय सरकार को आवेदन करता है वहां केन्द्रीय सरकार ऐसे आवेदन पर विचार करने के पश्चात् और परिषद् से ऐसे किसी इंकार के लिए कारणों के बारे में कोई रिपोर्ट, यदि कोई हो, अभिप्राप्त करने के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, दूसरी अनुसूची में संशोधन कर सकेगी जिससे ऐसी अर्हता को उसमें सम्मिलित किया जा सके और उपधारा (2) के उपबंध ऐसी अधिसूचना को लागू होंगे ।
17. ऐसे देशों की, जिनके साथ व्यतिकारिता की कोई स्कीम नहीं है, पशु-चिकित्सा संस्थाओं द्वारा अनुदत्त पशु-चिकित्सा अर्हताओं की मान्यता के लिए कुछ मामलों में विशेष उपबंध-(1) केन्द्रीय सरकार, परिषद् से परामर्श करने के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि भारत के बाहर के किसी ऐसे देश की पशु-चिकित्सा संस्थाओं द्वारा, जिनके संबंध में पशु-चिकित्सा की अर्हताओं को मान्यता देने के लिए व्यतिकारिता की स्कीम प्रवृत्त नहीं है, अनुदत्त पशु-चिकित्सा अर्हताएं इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हताएं होंगी या ऐसा केवल तब होगा जब उन्हें विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात् अनुदत्त किया जाए :
परन्तु ऐसी अर्हताएं रखने वाले व्यक्ितयों द्वारा पशु-चिकित्सा व्यवसाय-
(क) केवल तभी अनुज्ञात किया जाएगा जब ऐसे व्यक्ति उस देश में तत्समय प्रवृत्त पशु-चिकित्सा व्यवसायियों के रजिस्ट्रीकरण को विनियमित करने वाली विधि के अनुसार पशु-चिकित्सा व्यवसायियों के रूप में नामांकित हैं ;
(ख) ऐसी संस्था तक सीमित रहेगा जिससे वह शिक्षण, अनुसंधान कार्य, पूर्त कार्य के प्रयोजन के लिए उस समय संलग्न है ;
(ग) केन्द्रीय सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त निर्दिष्ट कालावधि तक सीमित होगा ।
(2) किसी ऐसी पशु-चिकित्सा अर्हता के बारे में केन्द्रीय सरकार, परिषद् से परामर्श करने के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि वह मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता केवल तब होगी जब उसे विनिर्दिष्ट तारीख के पूर्व अनुदत्त किया जाए ।
18. पाठ्यक्रमों और परीक्षाओं के संबंध में जानकारी की अपेक्षा करने की शक्ति-किसी राज्य में की ऐसी प्रत्येक पशु-चिकित्सा संस्था, जो मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता अनुदत्त करती हो, ऐसी अर्हता अभिप्राप्त करने के लिए पूरे किए जाने वाले पाठ्यक्रम और ली जाने वाली परीक्षाओं के बारे में, उस आयु के बारे में जिस पर ऐसे पाठ्यक्रमों का पूरा किया जाना और परीक्षाओं का लिया जाना अपेक्षित हो और ऐसी अर्हता प्रदत्त की जाए और साधारणतया ऐसी अर्हता अभिप्राप्त करने के लिए अपेक्षाओं के बारे में ऐसी जानकारी देगी जिसकी परिषद्, समय-समय पर, अपेक्षा करे ।
19. पशु-चिकित्सा संस्थाओं का निरीक्षण और परीक्षाएं-(1) धारा 12 के अधीन गठित समिति, परिषद् द्वारा बनाए गए विनियमों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए किसी पशु-चिकित्सा संस्था या किसी महाविद्यालय या अन्य संस्था के, जहां पशु-चिकित्सा की शिक्षा दी जाती है, निरीक्षण के लिए या किसी पशु-चिकित्सा संस्था द्वारा अनुदत्त की जाने वाली पशु-चिकित्सा अर्हताओं की मान्यता के लिए केन्द्रीय सरकार से सिफारिश करने के प्रयोजन से उस पशु-चिकित्सा संस्था द्वारा ली जाने वाली किसी परीक्षा में उपस्थित रहने के लिए उतनी संख्या में, जितनी वह अपेक्षित समझे, पशु-चिकित्सा निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी ।
(2) पशु-चिकित्सा निरीक्षक किसी प्रशिक्षण या परीक्षा के संचालन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे किन्तु पशु-चिकित्सा के स्तरों की, जिनके अन्तर्गत कर्मचारिवृन्द, उपस्कर, वास-सुविधा, प्रशिक्षण तथा पशु-चिकित्सा देने के लिए विनियमों द्वारा विहित अन्य सुविधाएं भी हैं, पर्याप्तता पर अथवा प्रत्येक परीक्षा की, जिसमें वे उपस्थित रहे, पर्याप्तता पर समिति को रिपोर्ट देंगे ।
(3) समिति ऐसी किसी रिपोर्ट की प्रति संबंधित पशु-चिकित्सा संस्था को भेजगी और उस पर उक्त संस्था के टिप्पणों सहित, यदि कोई हों, एक प्रति केन्द्रीय सरकार को भी भेजेगी ।
20. परिदर्शकों की नियुक्ति-(1) परिषद् किसी पशु-चिकित्सा संस्था या किसी महाविद्यालय या अन्य संस्था के, जहां पर पशु-चिकित्सा की शिक्षा दी जाती है, निरीक्षण के लिए, अथवा मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता अनुदत्त करने के प्रयोजन के लिए किसी पशु-चिकित्सा संस्था द्वारा ली जाने वाली किसी परीक्षा में उपस्थित होने के लिए उतनी संख्या में, जितनी वह अपेक्षित समझे परिदर्शक नियुक्त कर सकेगी ।
(2) कोई व्यक्ति, चाहे वह सदस्य हो या न हो, इस धारा के अधीन परिदर्शक के रूप में नियुक्त किया जा सकेगा किन्तु ऐसा व्यक्ति, जो किसी निरीक्षण या परीक्षा के लिए धारा 19 के अधीन निरीक्षक के रूप में नियुक्त किया जाता है, उसी निरीक्षण या परीक्षण के लिए परिदर्शक के रूप नियुक्त नहीं किया जाएगा ।
(3) परिदर्शक किसी प्रशिक्षण या परीक्षा के संचालन में हस्तक्षेप नहीं करेंगे किन्तु पशु-चिकित्सा शिक्षा के स्तरों की, जिनके अंतर्गत कर्मचारिवृन्द, उपस्कर, वास-सुविधा, प्रशिक्षण और पशु-चिकित्सा देने के लिए विनियमों द्वारा विहित अन्य सुविधाएं भी हैं, पर्याप्तता पर अथवा ऐसी प्रत्येक परीक्षा की, जिसमें वे उपस्थित हों, पर्याप्तता पर अध्यक्ष को रिपोर्ट देंगे ।
(4) परिदर्शक की रिपोर्ट तब के सिवाय जब किसी विशिष्ट मामले में अध्यक्ष अन्यथा निदेश दे, गोपनीय मानी जाएगी :
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार परिदर्शक की रिपोर्ट की प्रति की अपेक्षा करे, तो परिषद् उसे प्रस्तुत करेगी ।
21. मान्यता का वापस लिया जाना-(1) जब समिति या परिदर्शक की रिपोर्ट पर परिषद् को यह प्रतीत होता है कि-
(क) किसी पशु-चिकित्सा संस्था में पूरे किए जाने वाले पाठ्यक्रम और ली जाने वाली परीक्षा या उसके द्वारा ली गई परीक्षा में अभ्यर्थियों से अपेक्षित प्रवीणता इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों के अनुरूप नहीं है या उसके द्वारा अपेक्षित स्तर से नीचे की है, या
(ख) ऐसी पशु-चिकित्सा संस्था या उससे संबद्ध किसी महाविद्यालय या अन्य संस्था में कर्मचारिवृन्द, उपस्कर, वास-सुविधा, प्रशिक्षण और शिक्षण तथा प्रशिक्षण की अन्य सुविधाएं, परिषद् द्वारा विहित स्तर के अनुरूप नहीं हैं, तो परिषद् उस आशय का अभ्यावेदन केन्द्रीय सरकार को करेगी ।
(2) ऐसे अभ्यावेदन पर विचार करने के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार उसे उस राज्य की राज्य सरकार को भेज सकेगी जिसमें वह पशु-चिकित्सा संस्था स्थित है और वह राज्य सरकार उसे ऐसे टिप्पणों सहित जो वह करे उस पशु-चिकित्सा संस्था को, उस कालावधि की प्रज्ञापना सहित जिसके भीतर वह संस्था राज्य सरकार को अपना स्पष्टीकरण दे सकेगी, भेजेगी ।
(3) स्पष्टीकरण की प्राप्ति पर या जहां नियत कालावधि के भीतर कोई स्पष्टीकरण न दिया जाए वहां उस कालावधि के अवसान पर, राज्य सरकार केन्द्रीय सरकार से अपनी सिफारिश करेगी ।
(4) केन्द्रीय सरकार, ऐसी जांच करने के पश्चात्, यदि कोई हो, जो वह ठीक समझे, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि समुचित अनुसूची में उक्त पशु-चिकित्सा अर्हता के संबंध में ऐसी प्रविष्टि की जाए जो यह घोषित करे कि, यथास्थिति, वह मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता तब ही होगी जब वह निर्दिष्ट तारीख से पूर्व अनुदत्त की जाए अथवा यह कि यदि उक्त पशु-चिकित्सा अर्हता किसी पशु-चिकित्सा संस्था से संबद्ध किसी विनिर्दिष्ट महाविद्यालय या संस्था के विद्यार्थियों को अनुदत्त की जाए, तो वह मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता तब ही होगी जब वह विनिर्दिष्ट तारीख से पूर्व अनुदत्त की जाए, या यह कि उक्त पशु-चिकित्सा अर्हता किसी पशु-चिकित्सा संस्था से संबद्ध विनिर्दिष्ट महाविद्यालय या संस्था के संबंध में मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता तब ही होगी जब वह विनिर्दिष्ट तारीख के पश्चात्, अनुदत्त की जाए :
परन्तु यह कि ऐसी अधिसूचना जारी करने से पूर्व केन्द्रीय सरकार भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् से परामर्श करेगी ।
22. पशु-चिकित्सा शिक्षा में न्यूनतम स्तर-(1) परिषद् उन राज्यों में जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है पशु-चिकित्सा संस्थाओं द्वारा मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हताओं के अनुदत्त किए जाने के लिए अपेक्षित पशु-चिकित्सा शिक्षा के न्यूनतम स्तर विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।
(2) प्रारूप विनियमों और उनके सभी पश्चात्वर्ती संशोधनों की प्रतियां परिषद् द्वारा संबंधित राज्य सरकार को दी जाएंगी और परिषद्, यथास्थिति, ऐसे विनियमों या उनके किसी संशोधन को केन्द्रीय सरकार को अनुमोदन के लिए भेजने से पूर्व राज्य सरकार की टीका-टिप्पणियों पर विचार करेगी जो यथापूर्वोक्त प्रतियों के दिए जाने से तीन मास के भीतर प्राप्त हों ।
(3) केन्द्रीय सरकार ऐसे विनियमों या उनके किसी संशोधन का अनुमोदन करने से पूर्व, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् से परामर्श करेगी ।
(4) धारा 12 के अधीन गठित समिति समय-समय पर, विनियमों की प्रभावकारिता पर परिषद् को रिपोर्ट देगी और उनमें ऐसे संशोधन के लिए जो वह ठीक समझे सिफारिश कर सकेगी ।
अध्याय 3
भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर
23. भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर-(1) परिषद्, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विनियमों द्वारा उपबंधित की जाए, भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर के नाम से ज्ञात पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर रखवाएगी जिसमें ऐसे सभी व्यक्तियों के नाम होंगे, जिनके पास मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हताएं हैं और जो उस राज्य के जिस पर इस अधिनियम का विस्तार है, राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में नामांकित किए गए हैं ।
(2) परिषद् के सचिव का यह कर्तव्य होगा कि वह इस अधिनियम और परिषद् द्वारा बनाए गए किन्हीं आदेशों के उपबन्धों के अनुसार भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर रखे और समय-समय पर रजिस्टर का पुनरीक्षण करे और उसे भारत के राजपत्र में या ऐसी अन्य रीति से प्रकाशित करे जो विनियमों द्वारा उपबन्धित की जाए ।
(3) ऐसा रजिस्टर भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) के अर्थ के भीतर लोक दस्तावेज माना जाएगा और भारत के राजपत्र में प्रकाशित प्रतिलिपि द्वारा साबित किया जा सकेगा ।
(4) प्रत्येक राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् प्रत्येक वर्ष के अप्रैल के प्रथम दिन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर की छह मुद्रित प्रतियां परिषद् को देगी और प्रत्येक राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में समय-समय पर किए गए सभी परिवर्धनों और अन्य संशोधनों की सूचना परिषद् को अविलम्ब देगी ।
24. भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर में रजिस्ट्रीकरण-परिषद् का सचिव राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में किसी व्यक्ति के रजिस्ट्रीकरण की रिपोर्ट की प्राप्ति पर या ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से जो विनियमों द्वारा उपबन्धित की जाए, आवेदन करने पर उसका नाम भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर में प्रविष्ट कर सकेगा :
परन्तु यह तब जब कि सचिव का यह समाधान हो जाए कि सम्बन्धित व्यक्ति के पास मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता है ।
25. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का जारी किया जाना-(1) कोई व्यक्ति, जिसका नाम भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर में प्रविष्ट किया गया है, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के लिए, इस निमित्त ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से आवेदन किए जाने पर तथा पंद्रह रुपए से अनधिक ऐसी फीस का संदाय किए जाने पर, जो विनियमों द्वारा उपबंधित की जाए, हकदार होगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर परिषद् आवेदक को एक रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र ऐसे प्ररूप में, जो विनियमों द्वारा उपबन्धित किया जाए अनुदत्त करेगी :
परन्तु रजिस्टर से उसका नाम हटाए जाने पर ऐसे प्रमाणपत्र की विधिमान्यता समाप्त हो जाएगी ।
(3) जहां परिषद् के सचिव के समाधानप्रद के रूप में यह दर्शित किया गया है कि रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र खो गया है या नष्ट हो गया है, वहां सचिव दस रुपए से अनधिक ऐसी फीस का संदाय किए जाने पर, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति ऐसे प्ररूप में जारी करेगा, जो विनियमों में विनिर्दिष्ट किया जाए ।
26. अतिरिक्त अर्हताओं का रजिस्ट्रीकरण-(1) यदि कोई व्यक्ति, जिसका नाम भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर में प्रविष्ट है, अपनी मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता के अतिरिक्त पशु-चिकित्सा विज्ञान में कोई स्नातकोत्तर उपाधि या डिप्लोमा अभिप्राप्त करता है, तो वह ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से और पन्द्रह रुपए से अनधिक ऐसी फीस का संदाय किए जाने पर, जो विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, इस निमित्त आवेदन किए जाने पर ऐसी प्रविष्टि करवाने का हकदार होगा, जिसमें पहले की गई किसी प्रविष्टि के अतिरिक्त ऐसे रजिस्टर में उसके नाम के सामने ऐसी उपाधि या डिप्लोमा का कथन किया गया हो ।
(2) राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में प्रविष्टियों में भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर में किए गए परिवर्तनों के अनुसार परिवर्तन किया जाएगा ।
27. भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर से नामों का हटाया जाना-यदि राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में नामांकित किसी व्यक्ति का नाम इस अधिनियम के अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में उसमें से हटा दिया जाता है, तो परिषद् भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर से ऐसे व्यक्ति के नाम को हटाने का निदेश देगी ।
28. भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर में नामांकित व्यक्ति द्वारा निवास या व्यवसाय के स्थान में परिवर्तन का सूचित किया जाना-भारतीय पशु-चिकित्सा रजिस्टर में रजिस्ट्रीकृत प्रत्येक व्यक्ति अपने निवास या व्यवसाय के स्थान के किसी अन्तरण को परिषद् और राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् को ऐसे परिवर्तन के नब्बे दिन के भीतर सूचित करेगा और ऐसा करने में असफल होने पर परिषद् या किसी राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के सदस्यों के निर्वाचन में भाग लेने का उसका अधिकार केन्द्रीय सरकार के आदेश द्वारा या तो स्थायी रूप से या ऐसी अवधि के लिए जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाए, समपहृत किया जा सकेगा ।
अध्याय 4
रजिस्ट्रीकृत पशु-चिकित्सा व्यवसायियों के विशेषाधिकार
29. भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर -इस अधिनियम में अधिकथित शर्तों और निबंधनों के अधीन रहते हुए ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जिसका नाम तत्समय भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर में है, अपनी अर्हताओं के अनुसार पशु-चिकित्सा व्यवसायी के रूप में व्यवसाय करने के लिए और ऐसे व्यवसाय के संबंध में विधि के सम्यक् अनुक्रम में औषध द्रव्य और अन्य साधित्रों की बाबत कोई व्यय, प्रभार या कोई फीस, जिसके लिए वह हकदार है, वूसल करने के लिए हकदार होगा ।
30. भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर में नामांकित व्यक्ितयों के अधिकार-रजिस्ट्रीकृत पशु-चिकित्सा व्यवसायी से भिन्न कोई व्यक्ित-
(क) सरकार में या किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी द्वारा अनुरक्षित किसी संस्था में पशु-चिकित्सक या शल्य-चिकित्सक के रूप में कोई पद या इसी प्रकार का अन्य कोई पद (उसका चाहे जो नाम हो) धारण नहीं करेगा ;
(ख) किसी राज्य में पशु-चिकित्सा औषधि का व्यवसाय नहीं करेगा :
परन्तु राज्य सरकार आदेश द्वारा ऐसे किसी व्यक्ति को जो किसी राज्य के पशुपालन निदेशालय द्वारा (उसका चाहे जो भी नाम हो) या भारत में किसी पशु-चिकित्सा संस्था द्वारा जारी किया गया पशु-चिकित्सा पर्यवेक्षक, पशुपाल, या पशु सहायक का (चाहे उसका जो भी नाम हो) डिप्लोमा या माणपत्र धारण करता हो, किसी रजिस्ट्रीकृत पशु-चिकित्सा व्यवसायी के पर्यवेक्षण और निदेशन में गौण पशु-चिकित्सा सेवा करने की अनुज्ञा दे सकेगी ।
स्पष्टीकरण-लघु पशु-चिकित्सा सेवा" से टीका लगाने, बंध्यकरण या घावों पर मरहम पट्टी करने जैसी प्रारम्भिक पशु-चिकित्सा सहायता और ऐसी बीमारियों की ऐसी अन्य प्रकार की आरम्भिक सहायता या उपचार अभिप्रेत है, जो राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ;
(ग) ऐसे किसी पशु-स्वास्थ्य प्रमाणपत्र या किसी अन्य प्रमाणपत्र को हस्ताक्षरित या अधिप्रमाणित करने का हकदार नहीं होगा जो किसी विधि द्वारा सम्यक् रूप से अर्हताप्राप्त पशु-चिकित्सा व्यवसायी द्वारा हस्ताक्षरित या अधिप्रमाणित किया जाना अपेक्षित है ;
(घ) पशु-चिकित्सा औषधि से संबंधित किसी विषय पर भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 45 के अधीन विशेषज्ञ के रूप में किसी मृत्यु-समीक्षा पर या किसी न्यायालय में साक्ष्य देने का हकदार नहीं होगा ।
अध्याय 5
अनुशासन
31. वृत्तिक आचरण-(1) परिषद्, विनियमों द्वारा, पशु-चिकित्सा व्यवसायियों के लिए वृत्तिक आचरण और शिष्टाचार का स्तर और आचार संहिता विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।
(2) परिषद् द्वारा उपधारा (1) के अधीन बनाए गए विनियम यह विनिर्दिष्ट कर सकेंगे कि उनका कौन सा अतिक्रमण किसी वृत्ति के संबंध में गर्हित आचरण अर्थात् वृत्तिक अवचार गठित करता है और तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी ऐसे उपबंध प्रभावी होंगे ।
अध्याय 6
राज्य पशु-चिकित्सा परिषद्
32. राज्य पशु-चिकित्सा परिषदों की स्थापना और संरचना-(1) वहां के सिवाय जहां धारा 33 के अधीन किए गए किसी करार के अनुसार किसी संयुक्त राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् की स्थापना की गई है, राज्य सरकार एक राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् की स्थापना करेगी जिसमें निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :-
(क) चार सदस्य, जो राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में रजिस्ट्रीकृत पशु-चिकित्सा व्यवसायियों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे ;
(ख) राज्य में पशु-चिकित्सा संस्थाओं के, यदि कोई हों, प्रधान, पदेन ;
(ग) तीन सदस्य, जो राज्य सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए गए हों ;
(घ) राज्य की पशु-चिकित्सा सेवाओं का निदेशक, (उसका चाहे जो नाम हो), पदेन ;
(ङ) एक सदस्य जो राज्य पशु-चिकित्सा संगम, यदि कोई हो, द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ;
(च) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का रजिस्ट्रार, पदेन ।
(2) सदस्यों के रूप में नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित व्यक्तियों के नाम राज्य सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित किए जाएंगे ।
(3) कोई व्यक्ति, राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के सदस्य के रूप में नामनिर्देशित या निर्वाचित किए जाने के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह कोई मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता न धारण करता हो ।
33. अन्तरराज्यिक करार-(1) दो या अधिक राज्य सरकारें ऐसा करार कर सकेंगी जो उतनी अवधि के लिए प्रवृत्त रह सकेगा और जिसका नवीकरण ऐसी अतिरिक्त अवधियों के लिए, यदि कोई हो, किया जा सकेगा जो करार में विनिर्दिष्ट की जाएं, और उस करार में-
(क) सभी भाग लेने वाले राज्यों के लिए संयुक्त राज्य की शु-चिकित्सा परिषद् की स्थापना के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा ; या
(ख) यह उपबन्ध किया जा सकेगा कि एक राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् अन्य भाग लेने वाले राज्यों की आवश्यकताओं को पूरा करेगी ।
(2) ऐसे मामलों के अतिरिक्त, जो इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट हैं, इस धारा के अधीन किए गए करार में-
(क) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् या संयुक्त राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के संबंध में हुए व्ययों का, भाग लेने वाले राज्यों के बीच प्रभाजन करने के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा ;
(ख) यह अवधारित किया जा सकेगा कि भाग लेने वाली राज्य सरकारों में से कौन-कौन सी सरकारें इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार के विभिन्न कृत्यों का निर्वहन करेंगी और इस अधिनियम में राज्य सरकार के प्रति निर्देशों का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा ;
(ग) भाग लेने वाली राज्य सरकारों के बीच या तो साधारणतया या इस अधिनियम के अधीन उठने वाले विशिष्ट मामलों के प्रतिनिर्देश से परामर्श करने के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा ;
(घ) ऐसे अनुषंगी और समनुषंगी उपबन्ध किए जा सकेंगे जो इस अधिनियम से असंगत न हों और जो करार को प्रभावी करने के लिए आवश्यक या समीचीन समझे जाएं ।
(3) इस धारा के अधीन किया गया करार, भाग लेने वाले राज्यों के राजपत्रों में प्रकाशित किया जाएगा ।
34. संयुक्त राज्य पशु-चिकित्सा परिषदों की संरचना-(1) संयुक्त राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-
(क) दो सदस्य, जो भाग लेने वाले राज्यों में से प्रत्येक के रजिस्टर में रजिस्ट्रीकृत पशु-चिकित्सा व्यवसायियों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे ;
(ख) भाग लेने वाले राज्यों में पशु-चिकित्सा संस्थाओं के, यदि कोई हों, प्रधान, पदेन ;
(ग) दो सदस्य, जो प्रत्येक भाग लेने वाली राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे ;
(घ) भाग लेने वाले राज्यों में से प्रत्येक की पशु-चिकित्सा सेवाओं का निदेशक, उसका चाहे जो नाम हो, पदेन ;
(ङ) भाग लेने वाले राज्यों में से प्रत्येक राज्य पशु-चिकित्सा संगमों का, यदि कोई हो, एक नामनिर्देशिती ;
(च) संयुक्त राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का रजिस्ट्रार, पदेन ।
(2) सदस्यों के रूप में नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित व्यक्तियों के नाम राज्य सरकारों द्वारा राज्यों के राजपत्रों में अधिसूचित किए जाएंगे ।
(3) कोई व्यक्ति संयुक्त राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के सदस्य के रूप में नामनिर्देशन या निर्वाचन के लिए तब तक अर्हित नहीं होगा जब तक कि वह कोई मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता न रखता हो ।
35. राज्य पशु-चिकित्सा परिषदों का निगमन-प्रत्येक राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् ऐसे नाम से, जो राज्य सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित किया जाए, या संयुक्त राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के मामले में, जो करार में अवधारित किया जाए, एक निगमित निकाय होगी जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी, और जिसे जंगम और स्थावर दोनों ही प्रकार की सम्पत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगी या उस पर वाद लाया लाएगा ।
36. अध्यक्ष-राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का अध्यक्ष उस परिषद् के सदस्यों द्वारा अपने में से ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, निर्वाचित किया जाएगा ।
37. निर्वाचनों का ढंग-इस अध्याय के अधीन निर्वाचन का संचालन विहित रीति से किया जाएगा और जहां ऐसे किसी निर्वाचन के बारे में कोई विवाद उठता है वहां वह राज्य सरकार को उसके विनिश्चय के लिए निर्देशित किया जाएगा, जिसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।
38. पदावधि और आकस्मिक रिक्तियां-(1) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, पदेन सदस्य से भिन्न, राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का सदस्य, राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् में अपने निर्वाचन या नामनिर्देशन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के लिए या तब तक के लिए जब तक उसका पदोत्तरवर्ती सम्यक् रूप से निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट नहीं हो जाता है, इसमें से जो भी अवधि दीर्घतर हो, पद धारण करेगा :
परन्तु धारा 32 की उपधारा (1) के खण्ड (ग) या धारा 34 की उपधारा (1) के खण्ड (ग) के अधीन नामनिर्दिष्ट राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का सदस्य उसे नामनिर्दिष्ट करने वाले प्राधिकारी के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।
(2) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के सदस्य, यथास्थिति, पुनः निर्वाचन या पुनः नामनिर्देशन के पात्र होंगे ।
(3) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट सदस्य के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने अपना पद रिक्त कर दिया है,-
(क) यदि वह राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् की राय में बिना कारण के राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के निरन्तर तीन अधिवेशनों में अनुपस्थित रहता है ;
(ख) यदि वह उस पद पर नहीं रह जाता है जिससे उसको नामनिर्दिष्ट किया गया है ;
(ग) ऐसे किसी सदस्य के मामले में, जिसका नाम किसी राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में सम्मिलित किए जाने के लिए अपेक्षित है, यदि उसका नाम रजिस्टर से निकाल दिया जाता है ;
(घ) यदि वह नैतिक अधमता अन्तर्वलित करने वाले और कारावास से दण्डनीय किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है ;
(ङ) यदि वह अनुन्मोचित दिवालिया है ;
(च) यदि वह विकृतचित्त है और किसी सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित किया गया है ।
(4) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् द्वारा किया गया कोई कार्य केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा कि राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् में कोई रिक्ति या उसकी स्थापना में कोई त्रुटि विद्यमान थी ।
(5) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् में आकस्मिक रिक्ति, यथास्थिति, नए निर्वाचन या नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी और रिक्ति को भरने के लिए निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट व्यक्ति उस अवधि के शेष भाग के लिए ही पद धारण करेगा जिसके लिए वह सदस्य जिसका स्थान वह लेता है, निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट किया गया था ।
(6) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के बारे में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी, जो विहित किए जाएं ।
39. पद त्याग-(1) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का अध्यक्ष, राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् को सम्बोधित और रजिस्ट्रार को परिदत्त लिखित सूचना द्वारा अपना पद किसी भी समय त्याग सकेगा और त्यागपत्र उस तारीख से, जिसको वह उस परिषद् द्वारा स्वीकार किया जाता है या उस तारीख से, जिसको त्यागपत्र रजिस्ट्रार को प्राप्त होता है, नब्बे दिन की समाप्ति पर, जो भी पूर्वतर हो, प्रभावी होगा ।
(2) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का कोई सदस्य राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के अध्यक्ष को सम्बोधित लिखित सूचना द्वारा अपना पद किसी समय त्याग सकेगा और ऐसा प्रत्येक त्यागपत्र उस तारीख से जिसको वह अध्यक्ष द्वारा स्वीकार किया जाता है या उस तारीख से, जिसको त्यागपत्र अध्यक्ष को प्राप्त होता है, नब्बे दिन की समाप्ति पर, जो भी पूर्वतर हो, प्रभावी होगा ।
40. कार्यपालिका और अन्य समितियां-ऐसी शर्तों और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् एक कार्यपालिका समिति और अन्य समितियों को राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् की किसी शक्ति का प्रयोग करने या किसी कर्तव्य का पालन करने के लिए या ऐसे किसी विषय की, जो राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् उन्हें निर्दिष्ट करे, जांच करने के लिए, उसकी बाबत रिपोर्ट देने के लिए या उस पर सलाह देने के लिए गठित कर सकेगी ।
41. फीस और भत्ते-राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को और (राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के सदस्यों से भिन्न) समितियों के सदस्यों को राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् और समितियों के अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए ऐसी फीसों और भत्तों का संदाय किया जाएगा जो विहित किए जाएं ।
42. रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारियों या सेवकों की नियुक्ति-(1) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से, एक रजिस्ट्रार की नियुक्ति करेगी जो कोषाध्यक्ष के रूप में भी तब तक कार्य करेगा जब तक राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् कोषाध्यक्ष के रूप में किसी व्यक्ति को नियुक्त न करे और ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकेगी, जो वह इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए,आवश्यक समझे ।
(2) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् द्वारा नियुक्त रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों की सेवा के निबन्धन और शर्तें ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं ।
(3) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों को भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।
(4) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के सभी आदेश और विनिश्चय तथा अन्य लिखतें राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के रजिस्ट्रार या राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी ।
(5) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के प्रथम गठन से पहले दो वर्षों तक राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का रजिस्ट्रार राज्य सरकार द्वारा नियुक्त व्यक्ति होगा, जो राज्य सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।
43. राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् द्वारा दी जाने वाली जानकारी-(1) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् ऐसी रिपोर्टों, अपने कार्यवृत्तों और कार्यपालिका समिति के कार्यवृत्तों की प्रतिलिपियों और अपने लेखाओं की संक्षिप्ति राज्य सरकार को देगी जैसी राज्य सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे और राज्य सरकार को इस प्रकार दी गई सारी सामग्री की प्रतिलिपियां परिषद् को भेजेगी ।
(2) राज्य सरकार इस धारा के अधीन उसे दी गई किसी रिपोर्ट, प्रतिलिपि या संक्षिप्ति को ऐसी रीति से, जो वह ठीक समझे, प्रकाशित कर सकेगी ।
अध्याय 7
रजिस्ट्रीकरण
44. राज्य पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर का तैयार किया जाना और रखा जाना-(1) राज्य सरकार, यभासंभव शीघ्र, इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति से राज्य के लिए राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर के नाम से ज्ञात एक पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर तैयार करवाएगी ।
(2) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् अपनी स्थापना पर इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर रखने का कर्तव्य ग्रहण करेगी ।
(3) राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में उन व्यक्तियों के नाम होंगे जो मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हताएं रखते हैं ।
(4) राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में निम्ललिखित विशिष्टियां सम्मिलित होंगी, अर्थात् :-
(क) रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति का पूरा नाम, राष्ट्रीयता और निवास का पता ;
(ख) राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में उसके प्रवेश की तारीख ;
(ग) रजिस्ट्रीकरण के लिए उसकी अर्हता और वह तारीख जिसको उसने ऐसी अर्हता प्राप्त की और वह प्राधिकारी जिसने उसको प्रदत्त किया ;
(घ) उसका वृत्तिक पता ; और
(ङ) ऐसी अन्य विशिष्टियां, जो विहित की जाएं ।
45. रजिस्टर का पहली बार तैयार किया जाना-(1) राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर के पहली बार तैयार किए जाने के प्रयोजन के लिए राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक रजिस्ट्रीकरण अधिकरण का गठन करेगी जो ऐसे तीन व्यक्तियों से, जो मान्यता प्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता धारण करते हों, मिलकर बनेगा और एक रजिस्ट्रार की भी नियुक्ति करेगी जो अधिकरण के सचिव के रूप में कार्य करेगा ।
(2) राज्य सरकार, उसी या वैसी ही अधिसूचना द्वारा, एक तारीख नियत करेगी जिसको या जिसके पूर्व रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन, जिसके साथ पच्चीस रुपए से अनधिक विहित फीस होगी, रजिस्ट्रीकरण अधिकरण को दिया जाएगा ।
(3) रजिस्ट्रीकरण अधिकरण नियत तारीख को या उसके पूर्व प्राप्त प्रत्येक आवेदन की परीक्षा करेगा और यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि आवेदक धारा 46 के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए अर्हित है तो रजिस्टर में आवेदक के नाम को प्रविष्ट किए जाने का निदेश देगा ।
(4) इस प्रकार तैयार किया गया रजिस्टर तत्पश्चात् ऐसी रीति से प्रकाशित किया जाएगा जो राज्य सरकार निर्दिष्ट करे और रजिस्ट्रीकरण अधिकरण के किसी विनिश्चय से जो इस प्रकार प्रकाशित रजिस्टर में अभिव्यक्त या विवक्षित है, व्यथित कोई व्यक्ति राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त प्राधिकारी को, ऐसे प्रकाशन की तारीख से साठ दिन के भीतर, अपील कर सकेगा ।
(5) रजिस्ट्रार उपधारा (4) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी के विनिश्चयों के अनुसार रजिस्टर में संशोधन करेगा और तत्पश्चात् ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को, जिसका नाम रजिस्टर में प्रविष्ट किया जाता है, रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र विहित प्ररूप में जारी करेगा ।
(6) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् की स्थापना पर रजिस्टर उसकी अभिरक्षा में दिया जाएगा और राज्य सरकार यह निदेश दे सकेगी कि प्रथम रजिस्टर में रजिस्टीकरण के लिए संपूर्ण आवेदन फीस या उसका कोई विनिर्दिष्ट भाग राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के खाते में संदत्त किया जाएगा ।
46. रजिस्टर तैयार किए जाने पर प्रविष्टि के लिए अर्हताएं-कोई व्यक्ित, विहित फीस का संदाय करने पर, जो पच्चीस रुपए से अधिक नहीं होगी, राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में अपना नाम प्रविष्ट करवाने के लिए हकदार होगा यदि वह राज्य में निवास करता है और यदि वह मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता धारण करता है ।
47. रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदनों की संवीक्षा-(1) धारा 45 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदनों की प्राप्ति के लिए नियत तारीख के पश्चात् रजिस्ट्रीकरण के लिए सभी आवेदन राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के रजिस्ट्रार को सम्बोधित किए जाएंगे और उनके साथ विहित फीस होगी जो पच्चीस रुपए से अधिक नहीं होगी ।
(2) यदि ऐसे आवेदन पर राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के रजिस्ट्रार की यह राय हो कि आवेदक राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में अपना नाम प्रविष्ट कराए जाने के लिए हकदार है तो तत्पश्चात् वह आवेदक का नाम उसमें प्रविष्ट करेगा :
परन्तु ऐसा कोई व्यक्ति, जिसका नाम इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किसी राज्य के राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर से हटा दिया गया है, अन्य राज्य के राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में अपना नाम, उस राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के, जिसके रजिस्टर से उसका नाम हटाया गया है, अनुमोदन से ही प्रविष्ट करवाने का हकदार होगा, अन्यथा नहीं ।
(3) कोई व्यक्ति, जिसके रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के रजिस्ट्रार द्वारा नामंजूर किया गया है, ऐसे नामंजूर किए जाने की तारीख से तीन मास के भीतर राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् को अपील कर सकेगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के किसी विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसे विनिश्चय के उसे संसूचित किए जाने से साठ दिनों के भीतर राज्य सरकार को अपील कर सकेगा ।
(5) राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में इस धारा के अधीन कोई नाम प्रविष्ट किए जाने पर राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का रजिस्ट्रार रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र विहित प्ररूप में जारी करेगा ।
48. नवीकरण फीस-(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में किसी नाम के बनाए रखने के लिए राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् को प्रत्येक पांच वर्ष में, पन्द्रह रुपए से अनधिक ऐसी नवीकरण फीस का संदाय किया जाएगा जो विहित की जाए, और जहां ऐसा निदेश किया गया है वहां ऐसी नवीकरण फीस उस वर्ष के, जिससे वह संबंधित है, एक अप्रैल से पूर्व संदाय किए जाने के लिए शोध्य होगी ।
(2) जहां उक्त अवधि के भीतर नवीकरण फीस का संदाय नहीं किया जाता है वहां राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का रजिस्ट्रार व्यतिक्रमी का नाम राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर से निकाल देगा :
परन्तु इस प्रकार निकाला गया नाम नवीकरण फीस का ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, संदाय किए जाने पर उक्त रजिस्टर में पुनःस्थापित किया जा सकेगा ।
(3) नवीकरण फीस का संदाय किए जाने पर राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का रजिस्ट्रार नवीकरण प्रमाणपत्र जारी करेगा और ऐसा प्रमाणपत्र रजिस्ट्रीकरण के नवीकरण का सबूत होगा ।
49. रजिस्टर से हटाया जाना-(1) इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् यह आदेश दे सकेगी कि किसी व्यक्ति का नाम राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर से हटा दिया जाए जहां उस व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् और ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात्, यदि कोई हो, जैसी वह ठीक समझे, उसका यह समाधान हो जाता है कि :-
(क) उसका नाम राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में गलती से या दुर्व्यपदेशन अथवा किसी तात्त्विक तथ्य के छिपाने के कारण प्रविष्ट किया गया है, या
(ख) वह नैतिक अधमता अन्तर्वलित करने वाले और कारावास से दण्डनीय किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है या वह कोई वृत्तिक संबंधी गर्हित आचरण के लिए दोषी पाया गया है या उसने वृत्तिक आचरण और शिष्टाचार के स्तर का या आचरण संहिता का उल्लंघन किया है जो राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् की राय में उसे उस रजिस्टर में रखे जाने के अयोग्य बनाता है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किसी आदेश में यह निदेश दिया जा सकेगा कि कोई व्यक्ति, जिसके नाम को राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर से हटाने का आदेश दिया गया है, इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए या तो स्थायी रूप से या उतने वर्षों की अवधि के लिए, जो विनिर्दिष्ट की जाए, अपात्र होगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश उसकी तारीख से तीन मास के अवसान तक या ऐसे आदेश पर किसी अपील के, यदि कोई हो, उसे अंतिम रूप से निपटाए जाने तक, इसमें से जो भी तारीख पश्चात्वर्ती हो, प्रभावी नहीं होगा ।
(4) उपधारा (1) के अधीन किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसा आदेश उसे संसूचित किए जाने से साठ दिन के भीतर, परिषद् को अपील कर सकेगा ।
(5) उपधारा (4) के अधीन परिषद् के विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति ऐसे विनिश्चय के उसे संसूचित किए जाने से साठ दिन के भीतर केन्द्रीय सरकार को अपील कर सकेगा ।
(6) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसका नाम इस धारा के अधीन या धारा 48 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्टर से हटा दिया गया है, अपना रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र और नवीकरण प्रमाणपत्र यदि कोई हो, राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के रजिस्ट्रार को तुरन्त अभ्यर्पित करेगा और इस प्रकार हटाया गया नाम राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा ।
(7) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसका नाम इस धारा के अधीन या धारा 48 की उपधारा (2) के अधीन राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर से हटा दिया गया है, राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में या किसी अन्य राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में अपना नाम उस राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के, जिसके रजिस्टर से उसका नाम हटा दिया गया है, अनुमोदन से ही रजिस्ट्रीकृत कराए जाने का हकदार होगा, अन्यथा नहीं ।
50. राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में पुनःस्थापन-राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् किसी भी समय उसे पर्याप्त प्रतीत होने वाले कारणों से और परिषद् के अनुमोदन के अधीन रहते हुए यह आदेश दे सकेगी कि विहित फीस का, जो पच्चीस रुपए से अधिक नहीं होगी, संदाय किए जाने पर राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर से हटाए गए किसी व्यक्ति का नाम उसमें पुनःस्थापित किया जाएगा ।
51. राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर का मुद्रण-प्रत्येक वर्ष एक अप्रैल के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का रजिस्ट्रार राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर की प्रतियां, जैसे कि वह उक्त तारीख को हों, मुद्रित कराएगा और ऐसी प्रतियां उनके लिए आवेदन करने वाले व्यक्तियों को ऐसे विहित प्रभार का संदाय किए जाने पर, दो दस रुपए से अधिक नहीं होगा, उपलब्ध कराई जाएंगी ; और वे इस बात का साक्ष्य होंगी कि उक्त तारीख को वे व्यक्ति जिनके नाम उनमें प्रविष्ट हैं, रजिस्ट्रीकृत पशु-चिकित्सा व्यवसायी थे ।
अध्याय 8
प्रकीर्ण
52. रजिस्ट्रीकरण का अंतरण-जहां किसी एक राज्य का रजिस्ट्रीकृत पशु-चिकित्सा व्यवसायी, किसी अन्य राज्य में पशु-चिकित्सा औषधि का व्यवसाय कर रहा है, वहां वह विहित फीस का संदाय करने पर, जो ऐसे अन्य राज्य में रजिस्ट्रीकरण के लिए नवीकरण फीस से अधिक नहीं होगी, उस राज्य के, जिसमें वह रजिस्ट्रीकृत है, राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर से उस राज्य के, जिसमें वह पशु-चिकित्सा औषधि का व्यवसाय कर रही है, राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में अपने नाम के अन्तरण के लिए विहित प्ररूप में एक आवेदन परिषद् को कर सकेगा और ऐसे आवेदन की प्राप्ति पर परिषद् इस अधिनियम में अन्यत्र किसी बात के होते हुए भी, यह निदेश देगी कि ऐसे व्यक्ति का नाम प्रथम वर्णित राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर से हटा दिया जाए और द्वितीय वर्णित राज्य के राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में प्रविष्ट किया जाए और संबंधित राज्य पशु-चिकित्सा परिषदें ऐसे निदेश का पालन करेंगी :
परन्तु ऐसे व्यक्ति से इस आशय का एक प्रमाणपत्र पेश करने की अपेक्षा की जाएगी कि पूर्ववर्ती राज्य में उसके रजिस्ट्रीकरण के संबंध में सभी देयों का संदाय कर दिया गया है :
परन्तु यह और कि जहां अन्तरण के लिए ऐसा कोई आवेदन किसी ऐसे पशु-चिकित्सा व्यवसायी द्वारा किया गया है जिसके विरुद्ध कोई अनुशासनिक कार्यवाही लम्बित है या जहां किसी अन्य कारण से परिषद् को यह प्रतीत होता है कि अंतरण के लिए आवेदन सद्भाविक रूप से नहीं किया गया है और अंतरण नहीं किया जाना चाहिए वहां परिषद् पशु-चिकित्सा व्यवसायी को इस निमित्त अभ्यावेदन करने का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, उसका आवेदन नामंजूर कर सकेगी ।
53. अधिकारिता का वर्जन-किसी रजिस्टर में नाम प्रविष्ट करने से इंकार करने या रजिस्टर से नाम हटाने से इंकार करने वाला कोई आदेश किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
54. प्रमाणपत्रों की दूसरी प्रति का जारी किया जाना-जहां राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के रजिस्ट्रार के समाधानप्रद रूप में यह दर्शित किया जाता है कि रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र या नवीकरण का प्रमाणपत्र खो गया है या नष्ट हो गया है वहां रजिस्ट्रार विहित फीस का संदाय किए जाने पर, जो दस रुपए से अधिक नहीं होगी, विहित प्ररूप में प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति जारी कर सकेगा ।
55. रजिस्ट्रीकृत होने का मिथ्या दावा करने के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, जिसका नाम किसी रजिस्टर में तत्समय प्रविष्ट नहीं है, मिथ्या रूप से यह व्यपदेशन करेगा कि उसका नाम इस प्रकार प्रविष्ट है या अपने नाम या उपाधि के संबंध में ऐसे शब्दों या अक्षरों का प्रयोग करेगा जो यह इंगित करने के लिए युक्तियुक्त रूप से प्रकल्पित है कि उसका नाम इस प्रकार प्रविष्ट किया गया है तो वह प्रथम दोषसिद्धि पर जुर्माने से जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा और किसी पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए से अधिक नहीं होगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
56. पदवी का दुरुपयोग-यदि कोई व्यक्ति,-
(क) जो किसी रजिस्टर में रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति नहीं है, पशु-चिकित्सा व्यवसायी के वर्णन को ग्रहण करेगा अथवा उसका उपयोग करेगा, या
(ख) जिसके पास मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता नहीं है, ऐसी किसी उपाधि या डिप्लोमा या अनुज्ञप्ति या संक्षिप्ति का उपयोग करेगा जो ऐसी अर्हता को उपदर्शित या विवक्षित करती है,
तो वह प्रथम दोषसिद्धि पर जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, और किसी पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा, या जुर्माने से, पांच हजार रुपए से अधिक नहीं होगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
57. अरजिस्ट्रीकृत व्यक्तियों द्वारा व्यवसाय-(1) धारा 45 की उपधारा (2) के अधीन नियत तारीख से एक वर्ष के अवसान के पश्चात् रजिस्ट्रीकृत पशु-चिकित्सा व्यवसायी या उस राज्य सरकार द्वारा धारा 30 के खंड (ख) के परन्तुक के अधीन अनुज्ञात व्यक्ति से भिन्न कोई व्यक्ति उस राज्य में, यथास्थिति, पशु-चिकित्सा औषधि का व्यवसाय नहीं करेगा या पशु-चिकित्सा लघु सेवाएं नहीं देगा ।
(2) यदि कोई व्यक्ति उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा तो वह प्रथम दोषसिद्धि पर जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा और किसी पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा या जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए से अधिक नहीं होगा या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
58. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अभ्यर्पण में असफलता-यदि कोई व्यक्ति, जिसका नाम रजिस्टर से हटा दिया गया है, अपना रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र या नवीकरण प्रमाणपत्र या दोनों, पर्याप्त कारण के बिना तुरन्त अभ्यर्पित करने में असफल रहेगा तो वह जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा, और जारी रहने वाले अपराध की दशा में अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रथम दिन के पश्चात् प्रत्येक दिन के लिए जिसके दौरान अपराध जारी रहता है, दस रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
59. अपराधों का संज्ञान-कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, राज्य सरकार या राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के आदेश द्वारा किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।
60. वाद और अन्य विधिक कार्यवाहियों का वर्जन-कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी ऐसी बात के संबंध में, जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों, विनियमों या आदेशों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित है, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या परिषद् या राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के विरुद्ध नहीं होगी ।
61. परिषद् की फीसों के भाग का संदाय-राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् प्रत्येक वर्ष जून के अन्त के पूर्व परिषद् को, उस वर्ष के 31 मार्च को समाप्त होने वाली बारह मास की अवधि के दौरान इस अधिनियम के अधीन राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् द्वारा वसूल की गई कुल फीसों के एक चौथाई के बराबर राशि का संदाय करेगी ।
62. लेखा और लेखा-परीक्षा-(1) परिषद् उचित लेखाओं और अन्य सुसंगत अभिलेखों को रखेगी और लेखाओं का वार्षिक विवरण, जिसके अन्तर्गत तुलनपत्र भी है, ऐसे साधारण निदेशों के अनुसार, जो जारी किए जाएं और ऐसे प्ररूप में जो केन्द्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके विनिर्दिष्ट करे, तैयार करेगी ।
(2) परिषद् के लेखाओं की परीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा प्रतिवर्ष की जाएगी और ऐसी लेखापरीक्षा के सम्बन्ध में उसके द्वारा या इस प्रकार नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई व्यय परिषद् द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक तथा परिषद् के लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के ऐसी लेखापरीक्षा के सम्बन्ध में वे ही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को सरकारी लेखाओं की लेखापरीक्षा के सम्बन्ध में प्राप्त हैं और विशिष्टतया उसे लेखा बहियां, सम्बद्ध वाउचर तथा अन्य दस्तावेज और कागजपत्र पेश किए जाने की मांग करने तथा परिषद् के कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति द्वारा प्रमाणित परिषद् के लेखाओं को, उन पर लेखापरीक्षा की रिपोर्ट सहित, प्रति वर्ष केन्द्रीय सरकार को भेजा जाएगा और वह सरकार उन्हें संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
(5) इस प्रकार प्रमाणित परिषद् के लेखाओं की एक प्रति उन पर लेखा परीक्षा रिपोर्ट सहित, परिषद् को साथ-साथ भेजी जाएगी ।
63. जांच आयोग की नियुक्ति-(1) जब केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत हो कि परिषद् इस अधिनियम के उपबन्धों का पालन नहीं कर रही है, तो केन्द्रीय सरकार एक जांच आयोग की नियुक्ति कर सकेगी, जो तीन व्यक्तियों से मिलकर बनेगा, जिनमें से दो व्यक्तियों की नियुक्ति, जिनमें से एक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होगा, केन्द्रीय सरकार करेगी और एक व्यक्ति परिषद् द्वारा नियुक्त किया जाएगा और वह उसे वे मामले विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिनकी जांच की जानी है ।
(2) आयोग संक्षिप्त रूप से जांच आरम्भ करेगा और उसको निर्दिष्ट मामलों पर, ऐसे उपचारों सहित यदि कोई हों जिनकी आयोग सिफारिश करना चाहे, केन्द्रीय सरकार को रिपोर्ट देगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार उस रिपोर्ट को स्वीकार कर सकेगी या उसे उपान्तरण या पुनर्विचार के लिए आयोग को लौटा सकेगी ।
(4) रिपोर्ट के अन्तिम रूप से स्वीकार कर लिए जाने के पश्चात्, केन्द्रीय सरकार परिषद् को यह आदेश दे सकेगी कि वह उन उपचारों को, जिनकी इस प्रकार सिफारिश की गई है, आदेश में विनिर्दिष्ट समय के भीतर अंगीकार कर ले और यदि परिषद् इस प्रकार विनिर्दिष्ट समय के भीतर उस आदेश का पालन नहीं करती है तो केन्द्रीय सरकार आयोग की सिफारिशों को प्रभावी बनाने के लिए ऐसा आदेश दे सकेगी या ऐसी कार्रवाई कर सकेगी, जो आवश्यक हो ।
(5) जब कभी राज्य सरकार को यह प्रतीत हो कि राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् इस अधिनियम के किन्हीं उपबन्धों का अनुपालन नहीं कर रही है तो राज्य सरकार राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के संबंध में वैसा ही जांच आयोग उसी प्रकार जांच करने के लिए नियुक्त कर सकेगी और उपधारा (3) और उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट आदेश पारित कर सकेगी या कार्रवाई कर सकेगी ।
64. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अध्याय 2, 3, 4 और 5 के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
65. नियम बनाने की राज्य सरकार की शक्ति-(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अध्याय 6, 7 और 8 के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) वह रीति, जिसमें राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् का अध्यक्ष धारा 36 के अधीन निर्वाचित किया जाएगा ;
(ख) वह रीति, जिसमें अध्याय 6 के अधीन निर्वाचन संचालित किए जाएंगे ;
(ग) राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् द्वारा धारा 38 की उपधारा (6) के अधीन उसके अधिवेशनों में पालन की जाने वाली प्रक्रिया ;
(घ) धारा 40 की अधीन कार्यपालिका समिति और अन्य समितियों के गठन की बाबत शर्तें और निर्बन्धन ;
(ङ) धारा 41 के अधीन राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् और समितियों के अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए फीस और भत्ते ;
(च) धारा 42 की उपधारा (2) के अधीन राज्य पशु-चिकित्सा परिषद् के रजिस्ट्रार, अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति के निबन्धन और शर्तें ;
(छ) धारा 44 की उपधारा (4) के खण्ड (ङ) के अधीन राज्य पशु-चिकित्सा रजिस्टर में सम्मिलित की जाने वाली विशिष्टियां ;
(ज) धारा 45 की उपधारा (2) और धारा 47 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए किसी आवेदन के साथ भेजी जाने वाली फीस ;
(झ) धारा 45 की उपधारा (5) और धारा 47 की उपधारा (5) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का प्ररूप ;
(ञ) धारा 46, धारा 50 , धारा 52 और धारा 54 के अधीन संदेय फीस ;
(ट) धारा 48 की उपधारा (1) के अधीन नवीकरण फीस ;
(ठ) धारा 48 की उपधारा (2) के परन्तुक के अधीन नवीकरण फीस के संदाय की रीति ;
(ड) धारा 51 के अधीन राज्य पशु-चिकित्सक रजिस्टर की मुद्रित प्रतियों का प्रदाय करने के लिए प्रभार ;
(ढ) धारा 54 के अधीन प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति का प्ररूप ;
(ण) कोई अन्य विषय जो अध्याय 6, 7 और 8 के अधीन विहित किया जाना है या किया जाए ।
(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र राज्य विधान-मण्डल के, जहां उसमें दोनों सदन हैं, प्रत्येक सदन के समक्ष, या जहां ऐसे विधान मण्डल में केवल एक सदन है, वहां उस सदन के समक्ष, रखा जाएगा ।
66. विनियम बनाने की शक्ति-(1) परिषद् अध्याय 2, 3, 4 और 5 के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, इस अधिनियम और धारा 64 के अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों से असंगत विनियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यपाकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) वह रीति, जिसमें धारा 3 की उपधारा (4) के अधीन अध्यक्ष और उपाध्यक्ष का निर्वाचन किया जाएगा ;
(ख) वह प्रक्रिया जिसका परिषद् और समिति द्वारा क्रमशः धारा 9 की उपधारा (6) और धारा 12 की उपधारा (2) के अधीन उनके अधिवेशनों में पालन किया जाएगा ;
(ग) धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन परिषद् के सचिव, अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति के निबन्धन और शर्तें ;
(घ) धारा 13 के अधीन परिषद् और समितियों के अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए फीस और भत्ते ;
(ङ) वह प्ररूप और रीति जिसमें भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन रखा जाएगा ;
(च) धारा 23 की उपधारा (2) के अधीन भारतीय पशु-चिकित्सा व्यवसायी रजिस्टर रखने की रीति ;
(छ) वह प्ररूप और रीति जिसमें धारा 24 के अधीन आवेदन किया जा सकेगा ;
(ज) धारा 25 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन का प्ररूप और संदेय फीस ;
(झ) धारा 25 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का प्ररूप ;
(ञ) धारा 25 की उपधारा (3) के अधीन संदेय फीस ;
(ट) धारा 25 की उपधारा (3) के अधीन प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति का प्ररूप ;
(ठ) वह प्ररूप और रीति जिसमें धारा 26 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन किया जाएगा और संदेय फीस ;
(ड) वृत्तिक आचरण और शिष्टाचार का स्तर और आचार संहिता जिसका धारा 31 की उपधारा (1) के अधीन पशु-चिकित्सा व्यवसायी पालन करेंगे ;
(ढ) कोई अन्य विषय जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन विनियमों द्वारा उपबन्ध किया जा सकेगा ।
(3) प्रत्येक विनियम, परिषद् द्वारा बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र केन्द्रीय सरकार को भेजा जाएगा और वह सरकार, उसकी एक प्रति संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखवाएगी । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
67. निरसन और व्यावृत्ति-किसी राज्य में इस अधिनियम के प्रारम्भ से इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी विषय से संबंधित और उस राज्य में प्रवृत्त प्रत्येक अन्य अधिनियम उस विस्तार तक जहां तक वह अधिनियम या उसमें अन्तर्विष्ट कोई उपबन्ध इस अधिनियम या अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी उपबन्ध का तत्स्थानी या उसके विरुद्ध है, निरसित हो जाएगा और साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 के उपबन्ध, ऐसे निरसन को वैसे ही लागू होंगे मानो ऐसा अन्य अधिनियम केन्द्रीय अधिनियम हो ।
पहली अनुसूची
[धारा 2(ङ) और धारा 15 देखिए]
भारत में विश्वविद्यालयों या पशु-चिकित्सा संस्थाओं द्वारा अनुदत्त मान्यता प्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हताएं
|
विश्वविद्यालय या पशु-चिकित्सा संस्था |
मान्यता प्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता |
रजिस्ट्रीकरण के लिए संक्षेपाक्षर |
|
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1 |
2 |
3 |
|
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उपाधियां |
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1. |
आगरा विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइन्स एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
2. |
आन्ध्र प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच०
|
|
3. |
असम कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
4. |
विधानचन्द्र कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
5. |
बिहार विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
6. |
मुम्बई विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ साइंस (वैटी) बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी० एस-सी० (वैट) बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच०
बी०वी० एस-सी० |
|
7. |
कलकत्ता विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
8. |
कालीकट विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० |
|
9. |
चन्द्रशेखर आजाद कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
10. |
गोहाटी विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
11. |
गोबिन्द बल्लभ पन्त कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
12. |
गुजरात कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
13. |
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री बैचलर आफ वैटरिनरी एनीमल साइंस |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० बी०वी० ए० एस-सी० |
|
14. |
जबलपुर विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी० वी० एस-सी० बी०वी०एस-सी० एंड ए० एच० |
|
15. |
जवाहरलाल नेहरू कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
16. |
केरल कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० बी०वी० एस-सी० |
|
17. |
केरल विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० |
|
18. |
कोंकण कृषि विद्यापीठ |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
19. |
मद्रास विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० |
|
20. |
मगध विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
21. |
महाराष्ट्र कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
22. |
महात्मा फूले कृषि विद्यापीठ |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
23. |
मराठवाड़ा कृषि विद्यापीठ |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
24. |
मैसूर विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० |
|
25. |
नागपुर विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री बैचलर आफ साइंस (वैटी) |
बी०वी० एस-सी० बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० बी०वी० एस-सी० (वैट) |
|
26. |
उड़ीसा कृषि और प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
27. |
उस्मानिया विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
28. |
पंजाब विश्वविद्यालय, लाहौर (1942-अगस्त, 1947) |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० |
|
29. |
ईस्ट पंजाब विश्वविद्यालय, सोलन (1948-54) |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० |
|
30. |
पंजाब विश्वविद्यालय, चंडीगढ़ (1954-62) |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
31.
|
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एंड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
32. |
पंजाबराव कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
33. |
राजस्थान कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड ऐनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
34. |
राजस्थान विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
35. |
राजेन्द्र कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
36. |
रांची विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
37. |
सरदार पटेल विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
38. |
सागर विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० |
|
39. |
श्री वेंकटेश्वर विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० |
|
40. |
तमिलनाडु कृषि विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० |
|
41. |
उदयपुर विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
42. |
कृषि विज्ञान विश्वविद्यालय, हैबल |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी०वी० एस-सी० |
|
43. |
उत्तर प्रदेश कृषि विश्वविद्यालय, पन्त नगर |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
44. |
उत्कल विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एंड ए० एच० |
|
45. |
विक्रम विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
46. |
मोहनलाल सुखाड़िया विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
बी०वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
डिप्लोमा: |
|
||
|
1. |
आसाम वैटरिनरी कालेज |
ग्रेजुएट इन वैटरिनरी साइंस ग्रेजुएट इन वैटरिनरी साइंस एण्ड एनिमल हज्बेन्ड्री |
जी० वी० एस-सी० जी० वी० एस-सी० एण्ड ए० एच० |
|
2. |
बंगाल वैटरिनरी कालेज |
ग्रेजुएट आफ बंगाल वैटरिनरी कालेज ग्रेजुएट इन वैटरिनरी साइंस |
जी० बी० वी० सी० जी० वी० एस-सी० |
|
3. |
बिहार वैटरिनरी कालेज |
ग्रेजुएट आफ बिहार वैटरिनरी कालेज |
जी० बी० वी० सी० |
|
4. |
मुम्बई वैटरिनरी कालेज |
ग्रेजुएट आफ मुम्बई वैटरिनरी कालेज |
जी० बी० वी० सी० |
|
5. |
मद्रास वैटरिनरी कालेज |
ग्रेजुएट आफ मद्रास वैटरिनरी कालेज |
जी० एम० वी० सी० |
|
6. |
पंजाब वैटरिनरी कालेज |
लाइसेंस्ड वैटरिनरी प्रैक्टीशनर (15-8-1947 के पूर्व प्रदत्त) |
एल० वी० पी० |
दूसरी अनुसूची
[धारा 2 (ङ) और धारा 16 देखिए]
भारत से बाहर की पशु-चिकित्सा संस्थाओं द्वारा अनुदत्त मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हताएं
|
देश और संस्था |
मान्यताप्राप्त पशु-चिकित्सा अर्हता |
रजिस्ट्रीकरण के लिए संक्षेपाक्षर |
|
|
1 |
2 |
3 |
|
|
यूनाइटेड किंगडम |
|
|
|
|
1. |
रायल कालेज आफ वैटरिनरी सर्जन्स |
मैम्बर आफ दी रायल कालेज आफ वैटरिनरी सर्जन्स |
एम० आर० सी० वी० एस० |
|
2. |
ब्रिस्टल विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी० वी० एस-सी० |
|
3. |
कैम्ब्रिज विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी० वी० एस-सी० |
|
4. |
एडिनवरा विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी० वी० एस-सी० |
|
5. |
ग्लासगो विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी० वी० एस-सी० |
|
6. |
लिवरपूल विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी साइंस |
बी० वी० एस-सी० |
|
7. |
लंदन विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी मैडिसिन |
बी० वी० मैड० |
|
रिपब्लिक आफ आयरलैंड |
|
|
|
|
8. |
डबलिन विश्वविद्यालय |
बैचलर आफ वैटरिनरी मैडिसिन |
बी० वी० एम० |
|
9. |
राष्ट्रीय विश्वविद्यालय, आयरलैंड |
बैचलर आफ वैटरिनरी मैडिसिन |
बी० वी० एम० |
_________________

