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भारतीय भूमि पत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 2010 ( Land Ports Authority of India Act, 2010 )


 

भारतीय भूमि पत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 2010

(2010 का अधिनियम संख्यांक 31)

[31 अगस्त, 2010]

भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के साथ-साथ अभिहित स्थानों पर सुरक्षा

संबंधी अनिवार्यताओं और यात्रियों तथा माल के सीमा पार संचलन

के लिए सुविधाओं के विकास और प्रबंध का समाधान करने

वाली प्रणालियों की व्यवस्था करने के लिए भारतीय

भूमि पत्तन प्राधिकरण की स्थापना और उससे

संबद्ध या उसके आनुषंगिक

विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के इकसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय भूमि पत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 2010 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी तथा ऐसे किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) प्राधिकरण" से धारा 3 के अधीन गठित भारतीय भूमि पत्तन प्राधिकरण अभिप्रेत है;

(ख) अध्यक्ष" से धारा 3 की उपधारा (3) के खंड (क) के अधीन नियुक्त प्राधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(ग) आप्रवासन जांच चौकी" से विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 (1946 का 31) के अधीन यथा अधिसूचित भूमि पर कोई पत्तन या स्थान का स्थान अभिप्रेत है;

(घ) एकीकृत जांच चौकी" से ऐसा भूमि पत्तन अभिप्रेत है, जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे;

(ङ) भूमि सीमाशुल्क केन्द्र" से सड़क मार्ग से या अंतर्देशीय जल मार्ग से आयात किए गए या निर्यात किए जाने वाले माल की निकासी के लिए सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) की धारा 7 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा उस रूप में अधिसूचित कोई स्थान अभिप्रेत है;

(च) भूमि पत्तन" से भारत की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर ऐसा क्षेत्र अभिप्रेत है जिसके अंतर्गत सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) या विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 (1946 का 31) के अधीन भूमि सीमाशुल्क केन्द्र या आप्रवासन जांच चौकी के रूप में अधिसूचित राष्ट्रीय राजमार्ग, राज्य राजमार्ग और अन्य सड़कों के भाग भी हैं, और जिनमें भारत की सीमाओं के पार यात्रियों और माल की निकासी और परिवहन की सुविधाओं सहित रेल मार्ग सम्मिलित है;

(छ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित कोई अधिसूचना अभिप्रेत है ;

(ज) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है; और

(झ) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं ।

अध्याय 2

भारतीय भूमि पत्तन प्राधिकरण

3. प्राधिकरण का गठन-(1) उस तारीख से जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे, भारतीय भूमि पत्तन प्राधिकरण नामक एक प्राधिकरण का गठन किया जाएगा ।

(2) प्राधिकरण, शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा जिसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जंगम और स्थावर दोनों प्रकार की संपत्ति का अर्जन, धारण तथा व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।

(3) प्राधिकरण निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-

(क)         अध्यक्ष;

(ख)        दो सदस्य जिनमें से एक सदस्य (योजना और विकास) तथा दूसरा सदस्य (वित्त) होगा;

(ग)         नौ से अनधिक सदस्य, पदेन जो गृह, विदेश, राजस्व, वाणिज्य, सड़क परिवहन और राजमार्ग, रेल, कृषि और सहकारिता, विधि और न्याय से संबंधित भारत सरकार के मंत्रालयों या विभागों का प्रतिनिधित्व करने वाले भारत सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्ति से नीचे के न हों, अधिकारियों में से केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे;

(घ) संबंधित राज्य का, जहां एकीकृत जांच चौकियां अवस्थित हैं, मुख्य सचिव या उसका ऐसा नामनिर्देशिती जो संबंधित राज्य की सरकार के सचिव से नीचे की पंक्ति का न हो;

(ङ) दो प्रतिनिधि, जिनमें से एक कर्मकारों के मान्यताप्राप्त निकायों में से होगा तथा दूसरा व्यापारियों में से होगा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे; और

(च) ऐसे अन्य प्रतिनिधि जिन्हें केन्द्रीय सरकार कृत्यकारी प्रयोजनों के लिए सहयोजित करे ।

(4) अध्यक्ष और खंड (ख) में निर्दिष्ट सदस्य केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे तथा पूर्णकालिक सदस्य होंगे ।

(5) अध्यक्ष का चुनाव ऐसे व्यक्तियों में से किया जाएगा जिन्हें सुरक्षा, परिवहन, उद्योग, वाणिज्य, विधि, वित्त या लोक प्रशासन के क्षेत्र में विशेष ज्ञान और अनुभव हो ।

4. सदस्य के पद के लिए निरर्हता-कोई व्यक्ति सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए निरर्हित होगा, यदि, (क) उसे ऐसे किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है और कारावास से दंडादिष्ट किया गया है, जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अंतर्ग्रस्त है; अथवा

(ख) वह अनुन्मोचित दिवालिया है; अथवा

(ग) विकृतचित्त है और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित कर दिया गया है; अथवा

(घ) सरकार या सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगमित निकाय की सेवा से हटा दिया गया है या पदच्युत कर दिया गया है; अथवा

(ङ) केन्द्रीय सरकार की राय में प्राधिकरण में ऐसा वित्तीय या अन्य हित रखता है जिसके कारण सदस्य के रूप में उसके द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ।

5. सदस्यों की पदावधि और सेवा की शर्तें-(1) धारा 6 के उपबंधों के अधीन रहते हुए प्रत्येक पूर्णकालिक सदस्य उस तारीख से, जिसको वह पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि के लिए या साठ वर्ष की आयु प्राप्त करने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, पद धारण करेगा: 

परंतु केन्द्रीय सरकार-

(क) ऐसे किसी पूर्णकालिक सदस्य की नियुक्ति, उसे तीन मास से अन्यून की अवधि की सूचना देने के पश्चात् अथवा उसके बदले में उसे तीन मास की अवधि के उसके वेतन और भत्ते, यदि कोई हों, के बराबर रकम का संदाय करने पर समाप्त कर सकेगी; और

(ख) ऐसे किसी सदस्य की नियुक्ति, जो सरकार का सेवक है, किसी भी समय समाप्त कर सकेगी ।

(2) सदस्यों की सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।

(3) कोई सदस्य केन्द्रीय सरकार को ऐसी अवधि की, जो विहित की जाए, लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा और ऐसे पदत्याग को उस सरकार द्वारा राजपत्र में अधिसूचित किए जाने पर उस सदस्य द्वारा अपना पद रिक्त कर दिया गया समझा जाएगा ।

6. सदस्यों के पद का रिक्त होना-केन्द्रीय सरकार किसी सदस्य को निम्नलिखित दशाओं में पद से हटा देगीः-

(क) यदि वह धारा 4 में वर्णित किसी भी निरर्हता से ग्रस्त हो जाता है:

परंतु किसी सदस्य को इस आधार पर कि वह उस धारा के खंड (ङ) में वर्णित निरर्हता से ग्रस्त हो गया है, तब हटाया जाएगा जब उसे उस मामले में सुनवाई का उचित अवसर दिया गया हो; अथवा

(ख) यदि वह कार्य करने से इंकार करता है या कार्य करने में असमर्थ हो जाता है; अथवा

(ग) यदि वह प्राधिकरण से अनुपस्थिति की इजाजत लिए बिना प्राधिकरण की लगातार तीन बैठकों से अनुपस्थित रहता है; अथवा

(घ) यदि केन्द्रीय सरकार की राय में उसने अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग किया है जिसके कारण उसका पद पर बने रहना लोकहित में हानिकारक है:

परंतु इस खंड के अधीन किसी सदस्य को तब हटाया जाएगा जब उसे उस विषय में सुनवाई का उचित अवसर दिया गया हो ।

7. पुनर्नियुक्ति के लिए सदस्यों की पात्रता-कोई भी व्यक्ति जो सदस्य नहीं रह गया है, जब तक वह धारा 4 के अधीन निरर्हित नहीं है तब तक पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा ।

8. बैठकें-(1) प्राधिकरण ऐसे समय और स्थान पर बैठकें करेगा और अपनी बैठकों में कारबार के संव्यवहार के बारे में (जिसके अंतर्गत ऐसी बैठकों में गणपूर्ति भी है) प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।

(2) यदि किसी कारण से अध्यक्ष प्राधिकरण की किसी बैठक में उपस्थित होने में असमर्थ है तो, बैठक में उपस्थित सदस्यों द्वारा चुना गया कोई अन्य सदस्य बैठक की अध्यक्षता करेगा ।

(3) ऐसे सभी प्रश्न जो प्राधिकरण की किसी बैठक के समक्ष आएं उपस्थित तथा मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत से विनिश्चित किए जाएंगे, और मतों के बराबर होने की दशा में अध्यक्ष अथवा उसकी अनुपस्थिति में पीठासीन व्यक्ति का निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा ।

9. प्राधिकरण की कार्यवाहियों का रिक्तियों आदि के कारण अविधिमान्य होना-प्राधिकरण का कोई कार्य या कार्यवाही मात्र-

(क) प्राधिकरण में किसी रिक्ति या उसके गठन में किसी त्रुटि; या

(ख) प्राधिकरण के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति की नियुक्ति में किसी त्रुटि; या

(ग) प्राधिकरण की कार्यवाही में किसी ऐसी अनियमितता, जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव न डालती हो,

के कारण अविधिमान्य नहीं होगी ।

10. प्राधिकरण के अधिकारी और अन्य कर्मचारी-(1) प्राधिकरण, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का दक्षतापूर्वक निर्वहन करने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, उतने अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जो वह आवश्यक समझे:

परंतु ऐसे प्रवर्ग के अधिकारियों की नियुक्ति, जो विनिर्दिष्ट की जाए, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के अधीन होगी

(2) प्राधिकरण द्वारा नियुक्त किया गया प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी सेवा की ऐसी शर्तों के अधीन रहेगा और ऐसे पारिश्रमिक का हकदार होगा, जो विनियमों द्वारा अवधारित किया जाए ।

अध्याय 3

प्राधिकरण के कृत्य

11. प्राधिकरण के कृत्य-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्राधिकारण को, भारत की अंतर्राष्ट्रीय सीमाओं के साथ-साथ अभिहित स्थानों पर यात्रियों और माल के सीमा पार संचलन के लिए सुविधाओं का विकास, दुरुस्तीकरण और प्रबन्ध करने की शक्तियां होंगी ।

(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना प्राधिकरण-

() सीमा पर एकीकृत जांच चौकियों की सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने वाली प्रणालियां स्थापित कर सकेगा;

(ख) किसी एकीकृत जांच चौकी पर राष्ट्रीय राजमार्गों, राज्य राजमार्गों और रेल मार्गों से भिन्न सड़कों, टर्मिनलों और अनुषंगी भवनों की योजना बना सकेगा, उनका सन्निर्माण और अनुरक्षण कर सकेगा;

(ग) किसी एकीकृत जांच चौकी पर संचार, सुरक्षा, माल की उठाई-धराई और स्कैनिंग उपस्कर की योजना बना सकेगा, उपाप्त कर सकेगा, प्रतिष्ठापन और अनुरक्षण कर सकेगा;

(घ) आप्रवासन, सीमाशुल्क, सुरक्षा, कराधान, प्राधिकारियों, पशुओं और संयंत्र, करंतीन, भांडागारों, स्थोरा और यात्री सामान, परीक्षण यार्डों, पार्किंग जोनों, बैंकों, डाकघरों, संचार सुविधाओं, पर्यटक सूचना केन्द्रों, प्रतीक्षालयों, कैंटीन, जलपान स्थलों, लोक सुविधाओं, स्वास्थ्य सेवाओं और ऐसी अन्य सेवाओं के लिए, जो आवश्यक समझी जाएं, समुचित स्थान और सुविधाएं उपलब्ध करा सकेगाः

(ङ) अपने कर्मचारियों के लिए निवास-स्थानों के साथ-साथ एकीकृत जांच चौकियों पर तैनात किए गए कर्मचारिवृंद के लिए आवासिक भवनों का सन्निर्माण कर सकेगा;

(च) होटलों, रेस्तराओं और विश्रामगृहों की स्थापना और अनुरक्षण कर सकेगा;

(छ) माल के भंडारण या प्रसंस्करण के लिए भांडागारों, आधान डिपो और स्थोरा, कांप्लेक्सों की स्थापना और अनुरक्षण कर सकेगा;

(ज) एकीकृत जांच चौकियों पर यात्रियों और अन्य व्यक्तियों के उपयोग के लिए डाक, धन विनिमय, बीमा और दूरभाष संबंधी सुविधाओं की व्यवस्था कर सकेगा;

(झ) एकीकृत जांच चौकियों की सुरक्षा के लिए समुचित इंतजाम कर सकेगा तथा उनसे संबंधित प्रासंगिक विधि के अनुसार वाहनों की आवाजाही, यात्रियों और माल के प्रवेश और निकासी के विनियमन और नियंत्रण के लिए व्यवस्था कर सकेगा;

(ञ) अग्नि और अन्य परिसंकटों का निवारण और नियंत्रण तथा ऐसी अन्य सुविधाओं को, जो आवश्यक समझी जाएं, सुनिश्चित कर सकेगा;

(ट) भारत सरकार की विधि, सुरक्षा और नयाचार को सम्यक् रूप से ध्यान में रखते हुए एकीकृत जांच चौकी में यानों के आवागमन तथा यात्रियों, परिवहन कर्मकारों, उठाई-धराई अभिकर्ताओं, निकासी और प्रेषण अभिकर्ताओं और माल का विनियमन और नियंत्रण कर सकेगा;

(ठ) ऐसे अभिकरणों के जिन्हें तत्समय प्रवृत्त संबंधित विधि के अनुसार एकीकृत जांच चौकी पर विभिन्न क्रियाकलापों को करने के लिए लगाया गया है, कार्यकरण का, समन्वय कर सकेगा और उसे सुकर बना सकेगा;

(ड) किसी एकीकृत जांच चौकी के संबंध में भारत में और विदेश में परामर्शी, सन्निर्माण या प्रबंध सेवाएं विकसित और उपलब्ध करा सकेगा तथा उनका प्रचालन कर सकेगा;

(ढ) इस अधिनियम द्वारा उस पर अधिरोपित कृत्यों का दक्षतापूर्ण निर्वहन करने के लिए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या कंपनियों से संबंधित किसी अन्य विधि के अधीन एक या अधिक कंपनियां बना सकेगा;

(ण) ऐसे सभी उपाय कर सकेगा जो इस अधिनियम द्वारा उसको प्रदत्त किसी शक्ति का प्रयोग करने या उस पर अधिरोपित किसी कृत्य का निर्वहन करने के लिए आवश्यक या समीचीन हो या उसके आनुषंगिक होंः

परन्तु प्राधिकरण के संप्रभुतात्मक कृत्य किसी निजी निकाय को नहीं सौंपे जाएंगे;

(त) प्राधिकरण को समनुदेशित कृत्यों में से किसी कृत्य का निर्वहन करने के लिए संयुक्त उद्यमों को स्थापित कर सकेगा; और

(थ) प्राधिकरण के सर्वोत्तम वाणिज्यिक हितों में एकीकृत जांच चौकी पर कोई अन्य क्रियाकलाप कर सकेगा ।

(3) इस धारा के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में प्राधिकरण, भारत सरकार के या राज्य सरकार के ऐसे मंत्रालय या विभाग से परामर्श कर सकेगा, जिसे वह आवश्यक समझे तथा भूमि पत्तन सेवाओं के विकास तथा ऐसी सेवा की दक्षता, अर्थव्यवस्था तथा सुरक्षा को सम्यक् रूप से ध्यान में रखेगा ।

(4) इस धारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह-

(क) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की प्राधिकरण द्वारा अवहेलना को प्राधिकृत करती है;

(ख) ऐसे कर्तव्य या दायित्व की बाबत, जिनके अधीन प्राधिकरण या उसके अधिकारी या अन्य कर्मचारी अन्यथा नहीं आते हैं, किसी व्यक्ति को कोई कार्यवाही संस्थित करने के लिए प्राधिकृत करती है ।

12. अन्य अभिकरणों के उत्तरदायित्व और शक्तियां-(1) भारत की सीमाओं पर तैनात किए गए संबंधित सीमा रक्षक बल किसी एकीकृत जांच चौकी के आसपास सुरक्षा के लिए उत्तरदायी होंगे ।

(2) प्राधिकरण, किसी एकीकृत जांच चौकी पर शांति और सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए जब कभी ऐसा करना आवश्यक समझे, तब तत्समय प्रवृत्त विधि के उपबंधों के अनुसार सशस्त्र बल, केन्द्रीय अर्द्धसैनिक बल या राज्य पुलिस की सहायता ले सकेगा ।

(3) सीमाशुल्क, आप्रवासन, करंतीन और अन्य पदधारी प्राधिकरण के कृत्यों के प्रभावी निर्वहन के लिए उसके साथ समन्वय करेंगे ।

(4) इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी सीमाशुल्क, आप्रवासन, करंतीन पदधारी, सीमा रक्षक बल और पुलिस, तत्समय प्रवृत्त विधि के अनुसार अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे ।

अध्याय 4

संपत्ति और संविदा

13. आस्तियों और दायित्वों का प्राधिकरण में निहित होना-(1) धारा 2 के खंड (घ) के अधीन जारी की गई अधिसूचना की तारीख को, सभी ऐसी आस्तियां, अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा ऐसी जंगम और स्थावर संपत्ति, वास्तविक या निजी, मूर्त या अमूर्त, वर्तमान या समाश्रित, चाहे वह किसी प्रकृति की हो, जिसके अंतर्गत भूमि, भवन, मशीनरी, उपस्कर, संकर्म, कार्यशाला, नकद अतिशेष, पूंजी, आरक्षितियां, आरक्षित निधियां, विनिधान, अभिधृतियां, हानि और बही ऋण तथा ऐसी संपत्ति से उद्भूत होने वाले ऐसे सभी अन्य अधिकार और हित भी हैं, जो उस अधिसूचना के जारी करने से ठीक पूर्व, किसी भूमि पत्तन में भारत सरकार के स्वामित्व या कब्जे में थी, जो केन्द्रीय सरकार ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करे, प्राधिकरण में निहित होंगे और ऐसे निहित होने में सभी उधारों, दायित्वों और बाध्यताओं को भी, चाहे वे किसी भी प्रकार से अस्तित्व में हो, सम्मिलित समझा जाएगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना उस दशा में भारत सरकार के संबंधित मंत्रालयों या विभागों की सहमति के पश्चात् ही जारी की जाएगी जहां ऐसी संपत्तियां, ऐसे मंत्रालयों या विभागों के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन हैं ।

14. प्राधिकरण में उपक्रमों के निहित होने के साधारण प्रभाव-धारा 2 के खंड (घ) के अधीन जारी की गई और भूमि पत्तन को प्रभावित करने वाली अधिसूचना की तारीख से ठीक पूर्व विद्यमान सभी संविदाओं, करारों और कार्यकरण व्यवस्थाओं का प्राधिकरण की बाबत पूर्ण बल और प्रभाव होगा ।

15. प्रत्याभूति का प्रवर्तनशील होना-किसी ऋण, पट्टे या वित्त की बाबत भूमि सीमाशुल्क केन्द्रों या आप्रवासन जांच चौकियों के लिए या उनके पक्ष में दी गई कोई प्रत्याभूति, ऐसे केन्द्रों या जांच चौकियों के संबंध में प्रवर्तनशील रहेगी जो इस अधिनियम के कारण प्राधिकरण में निहित की गई हैं ।

16. प्राधिकरण के लिए भूमि का अनिवार्य अर्जन-प्राधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए अपेक्षित कोई भूमि, किसी लोक प्रयोजन के लिए आवश्यक समझी जाएगी और ऐसी भूमि राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनिमय, 1956 (1956 का 48) के उपबंधों या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन प्राधिकरण के लिए अर्जित की जा सकेगी ।

17. प्राधिकरण द्वारा संविदाएं-धारा 18 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्राधिकरण इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक कोई संविदा करने और उसका पालन करने के लिए सक्षम होगा ।

18. प्राधिकरण की ओर से संविदाओं का निष्पादन करने का ढंग-(1) प्राधिकरण की ओर से, प्रत्येक संविदा, प्राधिकरण के अध्यक्ष या ऐसे अधिकारी द्वारा की जाएगी, जिसे प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त साधारण रूप से या विशेष रूप से सशक्त किया जाए और ऐसी संविदा, जो विनियमों में उपबंधित की जाए, प्राधिकरण की सामान्य मुद्रा से मुद्रांकित की जाएगी:

परंतु यह कि ऐसे मूल्य या रकम जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त आदेश द्वारा नियत करे, से अधिक की कोई संविदा तब तक नहीं की जाएगी, जब तक उसका केन्द्रीय सरकार द्वारा पूर्व में अनुमोदन न किया गया हो :

परंतु यह और कि स्थावर संपत्ति के अर्जन या विक्रय के लिए या तीस वर्ष से अधिक की अवधि के लिए किसी ऐसी संपत्ति के पट्टे के लिए कोई संविदा नहीं की जाएगी और ऐसे मूल्य या रकम से, जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त आदेश द्वारा नियत करे, अधिक की कोई अन्य संविदा तब तक नहीं की जाएगी जब तक उसका केन्द्रीय सरकार द्वारा पूर्व में अनुमोदन न किया गया हो ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन हुए वह प्ररूप और रीति जिसमें कोई संविदा इस अधिनियम के अधीन की जाएगी, ऐसी होगी जो विनियमों द्वारा उपबंधित की जाए ।

(3) ऐसी संविदा, जो इस अधिनियम के उपबंधों और उसके अधीन बनाए गए नियमों और विनियमों के अनुसार नहीं है, प्राधिकरण पर आबद्धकर नहीं होगी ।

अध्याय 5

वित्त, लेखा और लेखापरीक्षा

19. फीस, किराया, आदि प्रभारित करने की प्राधिकरण की शक्ति-प्राधिकरण, ऐसी फीस या किराया, जो किसी अन्य अधिनियम के अधीन कोई कानूनी उद्ग्रहण नहीं है, अवधारित और प्रभारित कर सकेगा, जिसे प्रत्येक एकीकृत जांच चौकी के लिए पृथक् रूप से निम्नलिखित के संबंध में विनियमों द्वारा उपबंधित किया जाए, -

(क) स्थोरा उठाई-धराई, भांडागारण, ट्रकों की पार्किंग या किसी अन्य सेवा या सुविधा जो परिवहन प्रचालनों के संबंध में प्रस्थापित की जाए;

(ख) यात्री यानों की पार्किंग और यात्रियों और आगंतुकों को दी गई अन्य सुविधाएं; और

(ग) प्राधिकरण द्वारा उपलब्ध कराई गई सुविधाओं और अन्य सेवाओं का उपभोग करना ।

20. केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकरण को अतिरिक्त पूंजी और अनुदान-केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा, इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्ः-

(क) उतनी पूंजी, जितनी प्राधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए अथवा उनसे संबद्ध किसी प्रयोजन के लिए अपेक्षित हो, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर उपलब्ध करा सकेगी, जो वह सरकार अवधारित करे;

(ख) प्राधिकरण को, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो केन्द्रीय सरकार अवधारित करे, उधारों या अनुदानों के रूप में उतनी धनराशि का संदाय कर सकेगी जितनी वह सरकार, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के लिए आवश्यक समझे ।

21. प्राधिकरण की निधि और उसका विनिधान-(1) प्राधिकरण अपनी निधि स्थापित करेगा और प्राधिकरण की सभी प्राप्तियां उसमें जमा की जाएंगी और प्राधिकरण द्वारा सभी संदाय उसमें से किए जाएंगे ।

(2) प्राधिकरण को इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उतनी राशि खर्च करने की शक्ति होगी, जितनी वह प्राधिकरण के सभी प्रशासनिक व्ययों की पूर्ति के लिए तथा इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत प्रयोजनों के लिए ठीक समझे और ऐसी राशि को प्राधिकरण की निधि में से किया गया व्यय समझा जाएगा ।

(3) प्राधिकरण के नाम जमा वह सब धनराशि, जो उपधारा (2) में उपबंधित रूप में तुरंत उपयोजित नहीं की जा सकती है, -

(क) भारतीय स्टेट बैंक या किसी ऐसे अनुसूचित बैंक या बैंकों में या अन्य लोक वित्तीय संस्थाओं में ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट की जाएं, निक्षिप्त की जाएगी; और

(ख) केन्द्रीय सरकार की प्रतिभूतियों में या ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, विनिधान की जाएगी ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा में अनुसूचित बैंक" का वही अर्थ है जो भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 2 के खंड (ङ) में है ।

22. अधिशेष निधियों का आबंटन-(1) प्राधिकरण, किसी एकीकृत जांच चौकी पर विद्यमान सुविधाओं या सेवाओं के विस्तार अथवा नई सुविधाओं या सेवाओं के सृजन के प्रयोजन अथवा अस्थायी कारणों से व्यय की वृद्धि या किसी प्राकृतिक आपदा या अन्य दुर्घटना से हुई हानि या नुकसान से उद्भूत प्रतिस्थापन या व्यय की पूर्ति के प्रयोजनों अथवा इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में किसी कार्य या लोप से उत्पन्न किसी दायित्व की पूर्ति के लिए, समय-समय पर उतनी रकम, जितनी वह ठीक समझे, आरक्षित निधि या निधियों के रूप में पृथक् रख सकेगा :

परंतु प्राधिकरण को विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए विनिर्दिष्ट आरक्षितियां स्थापित करने की भी शक्ति होगी:

परंतु यह और कि विनिर्दिष्ट और साधारण आरक्षितियों में से प्रत्येक की या किसी की बाबत प्रतिवर्ष पृथक् रखी गई राशियों तथा किसी समय ऐसी राशियों का योग उन सीमाओं से अधिक नहीं होगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उस निमित्त, समय-समय पर, नियत   की जाएं ।

(2) ऐसी आरक्षित निधि या निधियों के लिए तथा डूबंत और शंकास्पद ऋणों, आस्तियों के अवक्षयण और ऐसी सभी अन्य बातों के लिए व्यवस्था करने के पश्चात् जिनके लिए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत और निगमित कंपनियां प्रायः व्यवस्था करती हैं, प्राधिकरण अपने वार्षिक शुद्ध लाभों का अतिशेष केन्द्रीय सरकार को संदत्त करेगा ।

23. क्रियाकलापों के कार्यक्रम और वित्तीय प्राक्कलनों का प्रस्तुत किया जाना-प्राधिकरण, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारंभ से पूर्व आगामी वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों के कार्यक्रम का विवरण और साथ ही उससे संबंधित वित्तीय प्राक्कलन तैयार करेगा और उसे केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के लिए प्रस्तुत करेगा ।

24. उधार लेने की प्राधिकरण की शक्तियां-(1) प्राधिकरण, इस अधिनियम के अधीन अपने सभी या किन्हीं कृत्यों के निर्वहन के लिए, केन्द्रीय सरकार की सहमति से या केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे दिए गए किसी साधारण या विशेष प्राधिकार के निबंधनों के अनुसार बंधपत्रों, डिबेंचरों या ऐसी अन्य लिखतों का, जो वह ठीक समझे, निर्गमन करके किसी भी स्रोत से धन उधार ले सकेगा ।

(2) केन्द्रीय सरकार, प्राधिकरण द्वारा उपधारा (1) के अधीन लिए गए उधारों की बाबत, मूलधन के प्रतिसंदाय और उस पर ब्याज के संदाय को ऐसी रीति से प्रत्याभूत कर सकेगी, जो वह ठीक समझे ।

(3) प्राधिकरण, ऐसी सीमाओं के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर अधिकथित करे, ओवरड्राफ्ट अथवा अन्यथा द्वारा अस्थायी रूप से ऐसी रकम उधार ले सकेगा जो इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए उसे अपेक्षित हो ।

25. लेखा और लेखा-परीक्षा-(1) प्राधिकरण उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा तथा लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अतंर्गत लाभ और हानि लेखा तथा तुलनपत्र भी है, ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित किया जाए ।

(2) प्राधिकरण के लेखाओं की भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा प्रतिवर्ष लेखापरीक्षा की जाएगी और ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा उपगत किसी व्यय की प्राधिकरण द्वारा उसको प्रतिपूर्ति की जाएगी ।

(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के तथा प्राधिकरण के लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में वही अधिकार तथा विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे, जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के सरकारी लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में हैं और विशिष्टतया उसे बहियों, लेखाओं संबंधित वाउचरों, दस्तावेजों और कागजों के पेश किए जाने की मांग करने और प्राधिकरण के किसी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।

(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथाप्रमाणित प्राधिकरण के लेखे उसके संबंध में लेखापरीक्षा रिपोर्ट सहित केन्द्रीय सरकार को प्रत्येक वर्ष भेजे जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

26. वार्षिक रिपोर्ट का प्रस्तुत किया जाना-(1) प्राधिकरण, प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पश्चात् यथाशीघ्र, उस वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों का विवरण देते हुए यथाविहित प्ररूप में एक रिपोर्ट तैयार करेगा तथा उसे केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा और इस रिपोर्ट में उन क्रियाकलापों का भी विवरण दिया जाएगा, जिनके प्राधिकरण द्वारा आगामी वित्तीय वर्ष के दौरान किए जाने की संभावना है ।

(2) केन्द्रीय सरकार, ऐसी रिपोर्ट को, उसके प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी

27. प्रत्यायोजन-प्राधिकरण, लिखित रूप में साधारण या विशेष आदेश द्वारा, इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों और कृत्यों में से (धारा 35 के अधीन शक्तियों के सिवाय) उन शक्तियों और कृत्यों का प्रत्यायोजन, जिन्हें प्रत्यायोजित करना वह आवश्यक समझे, अध्यक्ष को या प्राधिकरण के किसी अन्य सदस्य या किसी अधिकारी को ऐसी शर्तों और सीमाओं के, यदि कोई हों, अधीन कर सकेगा, जिन्हें आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए

28. प्राधिकरण के आदेशों और अन्य लिखतों का अधिप्रमाणन-प्राधिकरण के सभी आदेश और विनिश्चय अध्यक्ष या किसी ऐसे अन्य सदस्य के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जाएंगे जो प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया गया हो और प्राधिकरण द्वारा निष्पादित की गई अन्य सभी लिखतें प्राधिकरण के किसी ऐसे अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी, जिसे प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया गया हो

29. प्राधिकरण के अधिकारियों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना-प्राधिकरण के सभी अधिकारी और कर्मचारी जब वे इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या विनियम के उपबंधों के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या उनका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित हो, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के भीतर लोक सेवक समझे जाएंगे ।

30. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही प्राधिकरण के किसी सदस्य, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी

31. खोई हुई संपत्ति की अभिरक्षा और व्ययन-ऐसे विनियमों के अधीन रहते हुए जिन्हें प्राधिकरण इस निमित्त बनाए, प्राधिकरण किसी ऐसी संपत्ति की, जो उचित अभिरक्षा में न होते हुए, प्राधिकरण के या उसके संपूर्ण नियंत्रण के अधीन किसी परिसर में पाई जाती है, सुरक्षित अभिरक्षा और वापसी सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था करेगा ।

32. प्राधिकरण को अतिष्ठित करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि किसी समय, केन्द्रीय सरकार की यह राय है किः-

(क) गंभीर आपात के कारण प्राधिकरण इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों और कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है; या

(ख) प्राधिकरण ने केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन जारी किए गए किसी निदेश के अनुपालन में या इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन में बार-बार व्यतिक्रम किया है और उस व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप प्राधिकरण की वित्तीय स्थिति या किसी एकीकृत जांच चौकी के प्रशासन का ह्रास हुआ है; या

(ग) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं, जिनके कारण लोकहित में ऐसा करना आवश्यक हो गया है,

तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, छह मास से अनधिक ऐसी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, प्राधिकरण को अतिष्ठित कर सकेगीः

परंतु खंड (ख) में वर्णित कारणों से इस उपधारा के अधीन कोई अधिसूचना जारी करने से पूर्व, केन्द्रीय सरकार, प्राधिकरण को यह कारण दर्शित करने के लिए उचित अवसर देगी कि उसे अतिष्ठित क्यों न कर दिया जाए और प्राधिकरण के स्पष्टीकरणों और आपत्तियों पर, यदि कोई हों, विचार करेगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर, -

(क) सभी सदस्य, अधिक्रमण की तारीख से, उस रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे;

() उन सभी शक्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का, जिनका प्रयोग या निर्वहन इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन प्राधिकरण द्वारा या उसकी ओर से किया जा सकता है, प्रयोग या निर्वहन, उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन किए जाने तक, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया जाएगा, जिन्हें केन्द्रीय सरकार निदेश दे;         

(ग) उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण के पुनर्गठन किए जाने तक प्राधिकरण के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन पूरी संपत्ति, केन्द्रीय सरकार में निहित होगी ।   

(3) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अधिक्रमण की अवधि की समाप्ति पर केन्द्रीय सरकार-

(क) अधिक्रमण की अवधि को छह मास से अनधिक इतनी अतिरिक्ति अवधि के लिए बढ़ा सकेगी जितनी वह आवश्यक समझे; या

(ख) नई नियुक्ति द्वारा प्राधिकरण का पुनर्गठन कर सकेगी और ऐसी दशा में वे सदस्य जिन्होंने उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन अपने पदों को रिक्त किया था, नियुक्ति के लिए निरर्हित नहीं समझे जाएंगेः

परंतु केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन मूलतः विनिर्दिष्ट अथवा इस उपधारा के अधीन विस्तारित की गई अधिक्रमण की अवधि की समाप्ति के पूर्व किसी समय, इस उपधारा के खंड (ख) के अधीन कार्रवाई कर सकेगी ।

(4) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना को और इस धारा के अधीन की गई किसी कार्रवाई की तथा उन परिस्थितियों की, जिसके कारण ऐसी कार्रवाई की गई, पूरी रिपोर्ट संसद् के ठीक आगामी सत्र में संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।

33. निदेश जारी करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन में नीति के प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से आबद्ध होगा जो केन्द्रीय सरकार लिखित रूप में समय-समय पर उसे देः

परंतु इस उपधारा के अधीन कोई निदेश दिए जाने के पूर्व यथासाध्य, प्राधिकरण को अपने विचार अभिव्यक्त करने का अवसर दिया जाएगा ।

(2) कोई प्रश्न नीति विषयक है या नहीं, इस संबंध में केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।

(3) केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर प्राधिकरण को धारा 11 की उपधारा (2) के खंडों के अधीन उसके द्वारा किसी कृत्य के निर्वहन के बारे में निदेश जारी कर सकेगी और प्राधिकरण ऐसे निदेशों का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगा ।

34. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण के सदस्यों की सेवा की अन्य शर्तें;

(ख) उस सूचना की अवधि, जो धारा 5 की उपधारा (3) के अधीन किसी सदस्य द्वारा अपना पद त्याग करने के लिए दी जाए;

(ग) वह रीति जिसमें धारा 21 की उपधारा (3) के खंड (ख) के अधीन प्राधिकरण अपनी निधियों का विनिधान   कर सकेगाः

(घ) वह प्ररूप, जिसमें धारा 25 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण के वार्षिक लेखा विवरण तैयार किए जाएंगे;

(ङ) वह प्ररूप जिसमें धारा 26 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण अपने क्रियाकलापों का लेखा-जोखा देते हुए एक रिपोर्ट तैयार करेगा और केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा; और

() कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए

35. विनियम बनाने की शक्ति-(1) प्राधिकरण, इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से ऐसे विनियम बना सकेगा, जो इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों से असंगत हों

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगेः-

() धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण की बैठकों का समय और स्थान तथा ऐसी बैठकों में कारबार के संव्यवहार के लिए अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया जिसके अंतर्गत गणपूर्ति भी है;

() धारा 10 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण द्वारा नियुक्त किए जाने वाले अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा की शर्तें तथा पारिश्रमिक;

() धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण की सामान्य मुद्रा द्वारा मुद्रांकित की जाने वाली संविदाएं और उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण द्वारा की जाने वाली संविदाओं का प्ररूप और रीति;

() धारा 19 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण द्वारा प्रभारित की जाने वाली फीस और किराया;

() खोई हुई संपत्ति की अभिरक्षा और वापसी तथा वे निबंधन और शर्तें जिनके अधीन खोई हुई संपत्ति को धारा 31 के अधीन उसके लिए हकदार व्यक्तियों को वापस किया जा सकेगा

36. नियमों, विनियमों और अधिसूचनाओं का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम या जारी की गई अधिसूचना बनाए जाने या जारी किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा/रखी जाएगी यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन, यथास्थिति, उस नियम, विनियम या अधिसूचना में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा/होगी यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि, यथास्थिति, वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए या अधिसूचना जारी नहीं की जानी चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा/हो जाएगी किंतु नियम, विनियम या अधिसूचना के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा

37. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत हों, जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत होः

परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा

(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक आदेश बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा

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