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अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् अधिनियम, 1987 ( All India Council For Technical Education Act, 1987 )


 

अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् अधिनियम, 1987

(1987 का अधिनियम संख्यांक 52)

[23 दिसंबर, 1987]

सारे देश में तकनीकी शिक्षा प्रणाली की समुचित योजना और समन्वित विकास,

योजनाबद्ध परिमाणात्मक वृद्धि के संबंध में ऐसी शिक्षा के गुणात्मक सुधार

का संवर्धन करने और तकनीकी शिक्षा पद्धति के विनियमन और

मानदंड तथा मानक के समुचित अनुरक्षण की दृष्टि से

तकनीकी शिक्षा के लिए अखिल भारतीय

तकनीकी शिक्षा परिषद् की स्थापना

का और उससे संबंधित विषयों

का उपबंध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के अड़तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् अधिनियम, 1987 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) आयोग" से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 4 के अधीन स्थापित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अभिप्रेत है; 

(ख) परिषद्" से धारा 3 के अधीन स्थापित अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् अभिप्रेत है; 

(ग) निधि" से धारा 16 के अधीन गठित परिषद् की निधि अभिप्रेत है; 

(घ) सदस्य" से परिषद् का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष हैं; 

(ङ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(च) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं; 

(छ) तकनीकी शिक्षा" से इंजीनियरी, प्रौद्योगिकी, वास्तुकला, नगर योजना, प्रबंध, भेषजी और अनुप्रयुक्त कला और शिल्प में शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण के कार्यक्रम तथा ऐसे अन्य कार्यक्रम या क्षेत्र अभिप्रेत हैं जो केंद्रीय सरकार, परिषद् के परामर्श से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, घोषित करे;

(ज) तकनीकी संस्था" से ऐसी संस्था अभिप्रेत है जो तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रम या कार्यक्रम प्रस्थापित करती है और जो विश्वविद्यालय नहीं है तथा इसके अन्तर्गत ऐसी अन्य संस्थाएं होंगी जिन्हें केंद्रीय सरकार, परिषद् के परामर्श से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, तकनीकी संस्थाएं घोषित करे;

(ज) विश्वविद्यालय" से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 2 के खंड (च) के अधीन परिभाषित विश्वविद्यालय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसी संस्था भी है जिसे उस अधिनियम की धारा 3 के अधीन विश्वविद्यालय समझा गया है । 

अध्याय 2

परिषद् की स्थापना

3. परिषद् की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से, जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् के नाम से एक परिषद् की स्थापना की जाएगी । 

(2) परिषद्, पूर्वोक्त नाम से शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाली एक निगमित निकाय होगी और उसे संविदा करने की शक्ति होगी तथा उक्त नाम से वाद लाएगी और उस पर वाद लाया जाएगा । 

(3) परिषद् का प्रधान कार्यालय दिल्ली में होगा और परिषद् केंद्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, भारत में अन्य स्थानों पर कार्यालय स्थापित कर सकेगी । 

(4) परिषद् का गठन निम्नलिखित सदस्यों से होगा, अर्थात्: - 

(क) अध्यक्ष, जिसे केंद्रीय सरकार नियुक्त करेगी;

(ख) उपाध्यक्ष, जिसे केंद्रीय सरकार नियुक्त करेगी;

(ग) केंद्रीय सरकार के शिक्षा से संबंधित मंत्रालय में भारत सरकार का सचिव, पदेन;

(घ) शिक्षा सलाहकार (सामान्य), भारत सरकार, पदेन;

(ङ) चार प्रादेशिक समितियों के अध्यक्ष, पदेन;

(च) (i) अखिल भारतीय व्यावसायिक शिक्षा बोर्ड का अध्यक्ष, पदेन; 

(ii) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा बोर्ड का अध्यक्ष, पदेन;

(iii) अखिल भारतीय इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी स्नातक-पूर्व अध्ययन बोर्ड का अध्यक्ष, पदेन; 

(iv) अखिल भारतीय इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी स्नातकोत्तर शिक्षा और अनुसंधान बोर्ड का अध्यक्ष, पदेन;

(v) अखिल भारतीय प्रबंध अध्ययन बोर्ड का अध्यक्ष, पदेन; 

(छ) केंद्रीय सरकार के वित्त मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक सदस्य, जिसे केंद्रीय सरकार नियुक्त करेगी;

(ज) केंद्रीय सरकार के विज्ञान और प्रौद्योगिकी मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक सदस्य, जिसे केंद्रीय सरकार नियुक्त करेगी;

(झ) खंड (छ) और खंड (ज) में विनिर्दिष्ट से भिन्न, केंद्रीय सरकार के मंत्रालयों और विभागों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चार सदस्य, जिन्हें केंद्रीय सरकार चक्रानुक्रम से नियुक्त करेगी;  

(ञ) संसद् के दो सदस्य, जिनमें से एक लोक सभा द्वारा और एक राज्य सभा द्वारा निर्वाचित किया जाएगा;

(ट) राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने के लिए आठ सदस्य, जिन्हें केंद्रीय सरकार वर्णक्रमानुसार, चक्रानुक्रम से, नियुक्त करेगी:

परंतु इस खंड के अधीन नियुक्ति, यथास्थिति, संबंधित राज्य या संघ राज्यक्षेत्र की सरकार की सिफारिश पर की जाएगी; 

(ठ) उद्योग और वाणिज्य के क्षेत्र में संगठनों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चार सदस्य, जिन्हें केंद्रीय सरकार नियुक्त करेगी;

(ड) निम्नलिखित का प्रतिनिधित्व करने के लिए सात सदस्य, जिन्हें केंद्रीय सरकार नियुक्ति करेगी-

(i) केंद्रीय शिक्षा सलाहकार बोर्ड;

(ii) भारतीय विश्वविद्यालय संगम;

(iii) भारतीय तकनीकी शिक्षा सोसाइटी; 

(iv) भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान परिषद्; 

(v) भारतीय भेषजी परिषद्; 

(vi) वास्तुकला परिषद्;

(vii) राष्ट्रीय उत्पादकता परिषद्; 

(ढ) तकनीकी और प्रबंध शिक्षा के क्षेत्र में वृत्तिक निकायों का प्रतिनिधित्व करने के लिए चार सदस्य, जिन्हें केंद्रीय सरकार नियुक्त करेगी;   

(ण) ऐसे हितों का प्रतिनिधित्व करने के लिए, जो पूर्वगामी खंडों के अंतर्गत नहीं आते हैं, जो केंद्रीय सरकार ठीक समझे, दो से अनधिक ऐसे सदस्य; जिन्हें केंद्रीय सरकार नियुक्त करेगी; 

(त) अध्यक्ष, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, पदेन; 

(थ) निदेशक, अनुप्रयुक्त जन-शक्ति अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली, पदेन; 

(द) महानिदेशक, भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद्, पदेन; 

(ध) महानिदेशक, वैज्ञानिक और औद्योगिक अनुसंधान परिषद्, पदेन; 

(न) सदस्य-सचिव जिसे केंद्रीय सरकार नियुक्त करेगी । 

(5) उपधारा (4) में किसी बात के होते हुए भी, -

(क) प्रथम अध्यक्ष केंद्रीय सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्री होंगे; 

(ख) परिषद् के प्रथम उपाध्यक्ष केंद्रीय सरकार के शिक्षा राज्य मंत्री होंगे; 

(ग) परिषद् का प्रथम सदस्य-सचिव केंद्रीय सरकार का शिक्षा सलाहकार (तकनीकी) होगा । 

4. सदस्यों की पदावधि-(1) पदेन सदस्य से भिन्न सदस्य की पदावधि, परिषद् के पहली बार गठन किए जाने पर पांच वर्ष और उसके पश्चात् तीन वर्ष होगी । 

(2) यदि अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग अथवा बीमारी या अन्य असमर्थता की वजह से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थता के कारण, उसके पद में कोई आकस्मिक रिक्ति हो जाती है तो उस रूप में तत्समय पद धारण करने वाला उपाध्यक्ष अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा और यदि इसके पूर्व कोई अन्य व्यक्ति अध्यक्ष के रूप में नियुक्त नहीं कर दिया जाता है तो वह अध्यक्ष का पद उस व्यक्ति की, जिसके स्थान पर उसे इस प्रकार कार्य करना है, पदावधि के शेष भाग के लिए धारण करेगा । 

(3) यदि उपाध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य की मृत्यु, पद त्याग अथवा बीमारी या अन्य असमर्थता की वजह से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थता के कारण उसके पद में कोई आकस्मिक रिक्ति हो जाती है तो ऐसी रिक्ति केंद्रीय सरकार द्वारा नई नियुक्ति करके भरी जाएगी; और इस प्रकार नियुक्त किया गया सदस्य उस व्यक्ति की, जिसके स्थान पर उसे इस प्रकार कार्य करना है, पदावधि के शेष भाग के लिए पद धारण करेगा । 

(4) उपाध्यक्ष ऐसे कृत्यों का पालन करेगा जो समय-समय पर अध्यक्ष द्वारा उसे सौंपे जाएं ।

(5) सदस्यों द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया वह होगी जो विहित की जाए । 

5. परिषद् के अधिवेशन-(1) परिषद् का अधिवेशन ऐसे समय और ऐसे स्थान पर होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के बारे में (जिसके अंतर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति भी है) प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगी जिन्हें विनियमों द्वारा उपबंधित किया जाए:

परंतु परिषद् का प्रत्येक वर्ष में कम से कम एक बार अधिवेशन होगा ।

(2) अध्यक्ष, और उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, परिषद् के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा ।

(3) यदि किसी कारणवश अध्यक्ष या उपाध्यक्ष परिषद् के किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है, तो उस अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा चुना गया कोई अन्य सदस्य अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।

(4) ऐसे सभी प्रश्नों का जो परिषद् के किसी अधिवेशन में उठते हैं, विनिश्चय, उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा तथा मतों के बराबर होने की दशा में, अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में अध्यक्षता करने वाले व्यक्ति का द्वितीय या निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा । 

6. रिक्तियों आदि से परिषद् की कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-परिषद् का कोई भी कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि-

(क) परिषद् में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या 

(ख) परिषद् के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या 

(ग) परिषद् की प्रक्रिया में ऐसी कोई अनियमितता है जो मामले के गुणागुण को प्रभावित नहीं करती है । 

7. विशिष्ट प्रयोजनों के लिए परिषद् के साथ व्यक्तियों का अस्थायी सहयोजन-(1) परिषद् ऐसी रीति से और ऐसे प्रयोजनों के लिए, जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं, अपने साथ किसी भी व्यक्ति को सहयोजित कर सकती है जिसकी सहायता या सलाह की वह इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए वांछा करे । 

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी भी प्रयोजन के लिए परिषद् द्वारा अपने साथ सहयुक्त व्यक्ति को उस प्रयोजन से सुसंगत चर्चा में भाग लेने का अधिकार होगा, किन्तु उसे परिषद् की किसी बैठक में मत देने का अधिकार नहीं होगा वह किसी अन्य प्रयोजन के लिए सदस्य नहीं होगा । 

8. परिषद् के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति-(1) परिषद्, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का दक्षतापूर्वक निर्वहन करने में समर्थ होने के प्रयोजन के लिए, ऐसे विनियमों के अधीन रहते हुए जो इस निमित्त बनाए जाएं, उतनी संख्या में उतने अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को, जितने वह आवश्यक समझे (प्रतिनियुक्ति पर या अन्यथा) नियुक्त कर सकती है:

परंतु अधिकारियों के ऐसे प्रवर्ग की नियुक्ति जो ऐसे विनियमों में विनिर्दिष्ट की जाए, केंद्रीय सरकार के अनुमोदन के अधीन होगी । 

(2) परिषद् द्वारा नियुक्त प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी सेवा की ऐसी शर्तों के अधीन होगा और ऐसे पारिश्रमिक का हकदार होगा जो विनियमों द्वारा अवधारित किया जाएगा ।

9. परिषद् के आदेशों और अन्य लिखतों का अधिप्रमाणन-परिषद् के सभी आदेशों और विनिश्चयों का अधिप्रमाणन अध्यक्ष के या परिषद् द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के हस्ताक्षर से होगा और परिषद् द्वारा निकाली गई अन्य सभी लिखतों का अधिप्रमाणन सदस्य-सचिव या परिषद् द्वारा इस निमित्त वैसी ही रीति से प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से होगा ।

अध्याय 3

परिषद् की शक्तियां और कृत्य

10. परिषद् के कृत्य-(1) परिषद् का कर्तव्य होगा कि वह सभी उपाय करे जो वह तकनीकी शिक्षा का समन्वित और एकीकृत विकास सुनिश्चित करने तथा स्तरमानों को बनाए रखने के लिए ठीक समझे और इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के प्रयोजनों के लिए, परिषद्- 

(क) तकनीकी शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों का सर्वेक्षण कर सकेगी, सभी संबंधित विषयों पर आंकड़ों का संग्रह कर सकेगी और तकनीकी शिक्षा में आवश्यक वृद्धि और विकास का पूर्वानुमान कर सकेगी; 

(ख) देश में सभी स्तरों पर तकनीकी शिक्षा के विकास का समन्वय कर सकेगी; 

(ग) परिषद् की निधि में से, -

(i) तकनीकी संस्थाओं को; और 

(ii) आयोग के समन्वय से तकनीकी शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालयों को, 

ऐसे अनुदानों का आबंटन और संवितरण ऐसे निबंधन और शर्तों पर कर सकेगी, जो वह ठीक समझे;

(घ) विकास संबंधी आवश्यकताओं को पूरा करने और शैक्षिक प्रक्रियाओं में समग्र सुधार के लिए, स्थापित और नई प्रौद्योगिकी में नव-परिवर्तन, अनुसंधान और विकास का और नई प्रौद्योगिकी के सृजन, अंगीकरण और अनुकूलीकरण का संवर्धन कर सकेगी; 

(ङ) महिलाओं, विकलांगों तथा समाज के कमजारे वर्गों के लिए तकनीकी शिक्षा के संवर्धन के लिए स्कीमें बना सकेगी; 

(च) तकनीकी शिक्षा प्रणाली और अन्य सुसंगत प्रणालियों के बीच, जिनके अंतर्गत अनुसंधान और विकास संगठन उद्योग और समुदाय भी हैं, प्रभावी संपर्क का संवर्धन कर सकेगी; 

(छ) तकनीकी संस्थाओं और तकनीकी शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालयों के लिए उपयुक्त कार्य-निष्पादन मूल्यांकन पद्धति विकसित कर सकेगी जिसमें उत्तरदायी होने की बात लागू करने के लिए मानदंड और क्रियाविधि सम्मिलित होगी;  

(ज) अध्यापकों के आरंभिक और सेवागत प्रशिक्षण के लिए स्कीमें बना सकेगी और संस्थानों या केंद्रों के साथ तादात्म्य स्थापित कर सकेगी तथा कर्मचारिवृन्द विकास कार्यक्रम, जिसके अन्तर्गत अध्यापकों की अनवरत शिक्षा भी है प्रस्थापित करने के लिए नए केंद्र स्थापित कर सकेगी; 

(झ) पाठ्यक्रम, पाठ्यविवरण; व्यायाम और शिक्षण संबंधी सुविधाओं, स्टाफ पैटर्न, कर्मचारिवृन्द अर्हताओं, क्वालिटी शिक्षण, मूल्यांकन और परीक्षाओं के लिए मानदंड और मानक अधिकथित कर सकेगी; 

(ञ) अध्यापन-फीस और अन्य फीसें प्रभारित करने के लिए मानदण्ड और मार्गदर्शक सिद्धांत नियत कर सकेगी;

(ट) नई तकनीकी संस्थाएं आरंभ करने के लिए और संबंधित अभिकरणों के परामर्श से नए पाठ्यक्रम या कार्यक्रम आरम्भ करने के लिए अनुमोदन प्रदान कर सकेगी; 

(ठ) तकनीकी शिक्षा के क्षेत्र में किसी वृत्तिक निकाय या संस्था को चार्टर के अनुदान के संबंध में केंद्रीय सरकार को सलाह दे सकेगी जिसमें उसके क्षेत्र में ऐसी वृत्ति के जिसमें संवर्धन के लिए उसको शक्तियां, अधिकार और विशेषाधिकार प्रदान करने हैं जिसके अंतर्गत परीक्षाओं का संचालन और सदस्यता प्रमाणपत्रों का दिया जाना भी है; 

(ड) तकनीकी संस्थाओं को स्वायत्तता प्रदान करने के लिए मानदंड अधिकथित कर सकेगी;

(ढ) तकनीकी शिक्षा के वाणिज्यीकरण को रोकने के लिए सभी आवश्यक उपाय कर सकेगी; 

(ण) तकनीकी संस्थाओं और तकनीकी शिक्षा देने वाले विश्वविद्यालयों में छात्रों के प्रवेश के लिए मार्गदर्शक सिद्धांतों का उपबंध कर सकेगी; 

(त) किसी तकनीकी संस्था का निरीक्षण कर सकेगी या करा सकेगी; 

(थ) ऐसी तकनीकी संस्थाओं को जो परिषद् द्वारा दिए गए निदेशों का नियत अवधि के भीतर पालन करने में असफल रहती है पाठ्यक्रमों, कार्यक्रमों की बाबत अनुदान रोक सकेगी या बन्द कर सकेगी और ऐसे अन्य उपाय कर सकेगी जो परिषद् के निदेशों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हों;  

(द) विद्यमान संगठनों को सुदृढ़ करने और परिषद् के उत्तरदायित्वों का प्रभावी निर्वहन सुनिश्चित करने के लिए नए संगठन स्थापित करने तथा आवश्यकतानुसार वृत्तिक, तकनीकी और सहायक कर्मचारिवृन्द के पद सृजित करने के लिए उपाय कर सकेगी;

(ध) तकनीकी शिक्षा के पाठ्यक्रम चलाने वाली विभिन्न स्तरों और प्रकारों की संस्थाओं को अनुदान प्राप्त करने के योग्य घोषित कर सकेगी; 

(न) तकनीकी शिक्षा देने वाली किसी संस्था को विश्वविद्यालय सम घोषित करने के लिए आयोग को सलाह दे सकेगी; 

(प) एक राष्ट्रीय प्रत्यायन बोर्ड स्थापित कर सकेगी जो तकनीकी संस्थाओं या कार्यक्रमों का उसके द्वारा विनिर्दिष्ट मार्गदर्शक सिद्धांतों, मानदंडों और स्तरमानों के आधार पर कालिक मूल्यांकन कर सकेगा कार्यक्रम के लिए तथा संस्था या कार्यक्रम को मान्यता या अमान्यता के संबंध में उसे या परिषद् को या आयोग को या अन्य निकायों को सिफारिश कर सकेगा; और  

(फ) कोई अन्य कृत्य कर सकेगी जो विहित किए जाएं । 

11. निरीक्षण-(1) परिषद्, किसी तकनीकी संस्था या विश्वविद्यालय की वित्तीय आवश्यकताओं की या उसके अध्ययन, परीक्षा और अनुसंधान के स्तरमानों को अभिनिश्चित करने के प्रयोजनों के लिए, ऐसी तकनीकी संस्था या विश्वविद्यालय के किसी विभाग या विभागों का ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, और ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा, जो वह निर्दिष्ट करे, निरीक्षण करा सकेगी । 

(2) परिषद् तकनीकी संस्था या विश्वविद्यालय को वह तारीख संसूचित करेगी जिसको उपधारा (1) के अधीन कोई निरीक्षण किया जाना है और तकनीकी संस्था या विश्वविद्यालय निरीक्षण से ऐसी रीति से सहयुक्त किए जाने का हकदार होगा जो विहित की जाए । 

(3) परिषद्, तकनीकी संस्था या विश्वविद्यालय को ऐसे किसी निरीक्षण के परिणामों के संबंध में अपने विचार संसूचित करेगी और उस तकनीकी संस्था या विश्वविद्यालय की राय अभिनिश्चित करने के पश्चात् उस संस्था या विश्वविद्यालय को ऐसे निरीक्षण के परिणामस्वरूप की जाने वाली कार्रवाई की सिफारिश करेगी ।

(4) इस धारा के अधीन तकनीकी संस्था या विश्वविद्यालय को दी जाने वाली सभी संसूचनाएं उसके कार्यपालक प्राधिकारी को दी जाएंगी और उस तकनीकी संस्था या विश्वविद्यालय का कार्यपालक प्राधिकारी परिषद् को उस कार्रवाई की, यदि कोई हो, रिपोर्ट देगा जिसकी उपधारा (3) में यथा निर्दिष्ट ऐसी किसी सिफारिश को क्रियान्वित करने के प्रयोजनों के लिए, की जाने के लिए प्रस्थापना है । 

अध्याय 4

परिषद् के निकाय

12. परिषद् की कार्यकारिणी समिति-(1) परिषद् एक समिति गठित करेगी जो कार्यकारिणी समिति कहलाएगी और वह ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगी जो परिषद् द्वारा उसे सौंपे जाएं । 

(2) कार्यकारिणी समिति का गठन निम्नलिखित सदस्यों से होगा, अर्थात्: -

(क) परिषद् का अध्यक्ष; 

(ख) परिषद् का उपाध्यक्ष; 

(ग) केंद्रीय सरकार के शिक्षा से संबंधित मंत्रालय में भारत सरकार का सचिव, पदेन; 

(घ) प्रादेशिक समितियों के दो अध्यक्ष; 

(ङ) पाठ्य समितियों के तीन अध्यक्ष;

(च) केंद्रीय सरकार के वित्त मंत्रालय का प्रतिनिधित्व करने वाला परिषद् का एक सदस्य पदेन;  

(छ) धारा 3 की उपधारा (4) के खंड (ट) के अधीन राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले परिषद् के आठ सदस्यों में से चार सदस्य; 

(ज) तकनीकी शिक्षा से सुसंगत क्षेत्रों में विशेषज्ञता और विशिष्टता प्राप्त चार सदस्य जो परिषद् के अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे; 

(झ) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का अध्यक्ष, पदेन; 

(ञ) अनुप्रयुक्त जनशक्ति अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली का निदेशक, पदेन;

(ट) भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् का महानिदेशक, पदेन; 

(ठ) परिषद् का सदस्य-सचिव । 

(3) परिषद् के अध्यक्ष और सदस्य-सचिव, कार्यकारिणी समिति के क्रमशः अध्यक्ष और सदस्य-सचिव के रूप में कृत्य करेंगे;

(4) परिषद् का अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में परिषद् का उपाध्यक्ष कार्यकारिणी समिति के अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा और अध्यक्ष तथा उपाध्यक्ष दोनों की अनुपस्थिति में, अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा चुना गया कोई अन्य सदस्य अधिवेशनों की अध्यक्षता करेगा । 

                (5) कार्यकारिणी समिति का अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होगा और वह अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के बारे में (जिसके अंतर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति भी है) प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगी जिन्हें परिषद् विनियमों द्वारा उपबंधित करे ।

13. पाठ्य समिति-(1) परिषद् निम्नलिखित पाठ्य समिति स्थापित करेगी, अर्थात्: -

(i) अखिल भारतीय व्यावसायिक शिक्षा बोर्ड; 

(ii) अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा बोर्ड; 

(iii) अखिल भारतीय इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी पूर्व स्नातक पाठ्य समिति; 

(iv) अखिल भारतीय इंजीनियरी और प्रौद्योगिकी स्नातकोत्तर शिक्षा और अनुसंधान बोर्ड; 

(v) अखिल भारतीय प्रबंध पाठ्य समिति ।

(2) परिषद्, यदि वह आवश्यक समझती है तो, ऐसी अन्य पाठ्य समिति स्थापित कर सकेगी जो वह ठीक समझे । 

(3) पाठ्य समिति अपने से संबद्ध क्षेत्र में आने वाले शैक्षणिक विषयों के बारे में, जिसके अंतर्गत मानदंड, स्तरमान, आदर्श पाठ्यक्रम आदर्श सुविधाएं और पाठ्यक्रमों की रूपरेखा है, कार्यकारिणी समिति को सलाह देगी ।

(4) पाठ्य समिति के सम्बद्ध क्षेत्र, उसकी शक्तियां, उसका गठन और उसके कृत्य ऐसे होंगे जैसे परिषद् विनियमों द्वारा उपबंधित करे । 

14. प्रादेशिक समितियां-(1) परिषद् निम्नलिखित प्रादेशिक समितियां स्थापित करेगी, अर्थात्: -

(i) उत्तरी प्रादेशिक समिति जिसका कार्यालय कानपुर में होगा; 

(ii) दक्षिणी प्रादेशिक समिति जिसका कार्यालय मद्रास में होगा;

(iii) पश्चिमी प्रादेशिक समिति जिसका कार्यालय मुम्बई में होगा;

(iv) पूर्वी प्रादेशिक समिति जिसका कार्यालय कलकत्ता में होगा ।

(2) परिषद्, यदि वह आवश्यक समझती है तो, ऐसी अन्य प्रादेशिक समितियां स्थापित कर सकेगी जो वह ठीक समझे । 

(3) प्रादेशिक समिति क्षेत्र के भीतर तकनीकी शिक्षा की आयोजना, प्रोन्नयन और विनियमन के सभी पक्षों पर ध्यान रखने में परिषद् को सलाह देगी और सहायता प्रदान करेगी ।

(4) वह क्षेत्र जिसके लिए प्रादेशिक समिति स्थापित की जा सकेगी और ऐसी समितियों का गठन और कृत्य ऐसे होंगे जैसे परिषद् विनियमों द्वारा उपबंधित करे । 

 

 

अध्याय 5

वित्त, लेखा और लेखा परीक्षक

15. परिषद् को संदाय-केंद्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, परिषद् को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशियों का संदाय कर सकेगी जो इस अधिनियम के अधीन परिषद् के कृत्यों के पालन के लिए आवश्यक समझी जाएं ।

16. परिषद् की निधि-(1) परिषद् की अपनी निधि होगी और वे सभी धनराशियां, जो समय-समय पर उसे केंद्रीय सरकार द्वारा संदत्त की जाएं तथा परिषद् की सभी प्राप्तियां (जिनके अंतर्गत ऐसी धनराशि भी है जिसे कोई राज्य सरकार या कोई अन्य प्राधिकारी या व्यक्ति परिषद् को सौंपे) निधि में जमा की जाएंगी और परिषद् द्वारा सभी संदाय उनमें से किए जाएंगे । 

(2) निधि का सब धन ऐसे बैंकों में जमा किया जाएगा या ऐसी रीति से विनिहित किया जाएगा जो केंद्रीय सरकार के अनुमोदन से परिषद् द्वारा विनिश्चित की जाए । 

(3) परिषद् इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के लिए ऐसी राशियां व्यय कर सकेगी जो वह ठीक समझे, और ऐसी धनराशियां परिषद् की निधि में से संदेय व्यय मानी जाएंगी ।

17. बजट-परिषद् प्रत्येक वर्ष ऐसे प्ररूप में और समय पर जो विहित किया जाए, आगामी वित्तीय वर्ष की बाबत प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित करते हुए एक बजट तैयार करेगी और उसकी प्रतियां केंद्रीय सरकार को भेजी जाएंगी ।

18. वार्षिक रिपोर्ट-परिषद् प्रत्येक वर्ष में एक बार ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर जो विहित किया जाए पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान अपने कार्यकलापों का सही और पूर्ण वृत्तांत देते हुए एक वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगी, और उसकी प्रतियां केंद्रीय सरकार को भेजी जाएंगी तथा उक्त सरकार उसे संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।

19. लेखा और लेखा परीक्षा-(1) परिषद् अपने लेखाओं के संबंध में ऐसी लेखा बहियां और अन्य बहियां ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से रखवाएगी जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित की जाए । 

(2) परिषद् अपने वार्षिक लेखाओं को बंद करने के पश्चात् यथाशीघ्र ऐसे प्ररूप में एक लेखा-विवरण तैयार करेगी और उसे भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को ऐसी तारीख तक भेजेगी जो केंद्रीय सरकार, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से, अवधारित करे ।

(3) परिषद् के लेखाओं की लेखापरीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे समय पर और ऐसी रीति से की जाएगी जो वह ठीक समझे । 

(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथा प्रमाणित परिषद् के लेखा और उसके संबंध के लेखापरीक्षा रिपोर्ट प्रति वर्ष केंद्रीय सरकार को भेजी जाएगी और उक्त सरकार उसे संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।

अध्याय 6

प्रकीर्ण

20. केंद्रीय सरकार द्वारा निदेश-(1) परिषद्, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन में, नीति संबंधी प्रश्नों पर ऐसे निर्देशों से आबद्ध होगी जो केंद्रीय सरकार समय-समय पर, लिखित रूप में उसे दे । 

(2) इस बाबत की कोई प्रश्न नीति का है या नहीं, केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा । 

21. परिषद् को अतिष्ठित करने की शक्ति-(1) यदि केंद्रीय सरकार की यह राय है कि परिषद् इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उस पर अधिरोपित कर्तव्य का पालन करने में असमर्थ है या उसने उनका पालन करने में बार-बार व्यतिक्रम किया है या अपनी शक्तियों से अधिक का प्रयोग या उनका दुरुपयोग किया है, या वह केंद्रीय सरकार द्वारा धारा 20 के अधीन दिए गए किसी निदेश का अनुपालन करने में जानबूझकर अथवा पर्याप्त हेतुक के बिना असफल रही है तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, परिषद् को ऐसी अवधि के लिए जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, अतिष्ठित कर सकेगी : 

परन्तु केंद्रीय सरकार, इस उपधारा के अधीन अधिसूचना जारी करने के पूर्व, परिषद् को यह हेतुक दर्शित करने के लिए उचित समय देगी कि उसे अतिष्ठित क्यों न कर दिया जाए और परिषद् के स्पष्टीकरण और आक्षेपों पर, यदि कोई हैं, विचार करेगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन परिषद् को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर, -

(क) परिषद् के सभी सदस्य, इस बात के होते हुए भी कि उनकी पदावधि समाप्त नहीं हुई है, अतिष्ठित किए जाने की तारीख से ऐसे सदस्य के रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे; 

(ख) वे सभी शक्तियां और कर्तव्य जिनका प्रयोग या पालन इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन परिषद् द्वारा या उसकी ओर से किया जा सकता है उनका प्रयोग या पालन अतिष्ठित रहने की अवधि के दौरान, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा किया जाएगा जो केंद्रीय सरकार निर्दिष्ट करे; 

(ग) परिषद् में निहित सभी संपत्ति, अतिष्ठित रहने की अवधि के दौरान, केंद्रीय सरकार में निहित रहेगी । 

(3) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अतिष्ठन की अवधि की समाप्ति पर, -

(क) अतिष्ठन की अवधि को ऐसी अतिरिक्त अवधि के लिए बढ़ा सकेगी जैसी वह आवश्यक समझे; या 

(ख) धारा 3 में उपबंधित रीति से परिषद् का पुनर्गठन कर सकेगी । 

22. नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: - 

(क) सदस्यों द्वारा उनके कृत्यों के निर्वहन में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;

(ख) तकनीकी संस्थाओं और विश्वविद्यालयों का निरीक्षण;

(ग) वह प्ररूप और रीति जिसमें परिषद् द्वारा बजट और रिपोर्ट तैयार की जाएगी;

(घ) वह रीति जिसमें परिषद् के लेखे रखे जाएंगे; और

(ङ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जा सकता है ।

23. विनियम बनाने की शक्ति-(1) परिषद् इस अधिनियम के प्रयोजनों को साधारणतया कार्यान्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम और नियमों से सुसंगत विनियम बना सकेगी । 

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या उनमें से किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

(क) परिषद् की बैठकों और उनमें कारबार के संचालन की प्रक्रिया का विनियमन; 

(ख) परिषद् के अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें;

(ग) कार्यकारिणी समिति की बैठकें और उनमें कारबार के संचालन की प्रक्रिया का विनियमन;

(घ) पाठ्य समिति का संबद्ध क्षेत्र, गठन, शक्तियां और कृत्य;

(ङ) वह क्षेत्र जिसके लिए प्रादेशिक समिति स्थापित की जाएगी और ऐसी समिति का गठन और कृत्य ।

24. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव ही जाएगा । किंतु नियम या विनियम में ऐसे परिवर्तन या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

25. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे आदेश बना सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक प्रतीत हों:

परंतु इस धारा के अधीन कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं बनाया जाएगा । 

(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक आदेश, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

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