दिल्ली किराया अधिनियम, 1995
(1995 का अधिनियम संख्यांक 33)
[23 अगस्त, 1995]
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में परिसरों से संबंधित
किराए, मरम्मत और अनुरक्षण तथा बेदखली और
होटलों तथा वासों की दरों के विनियमन का
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छियालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दिल्ली किराया अधिनियम, 1995 है ।
(2) इसका विस्तार नई दिल्ली नगरपालिका परिषद् और दिल्ली छावनी बोर्ड की सीमाओं के भीतर आने वाले क्षेत्रों पर और तत्समय दिल्ली नगर निगम की सीमाओं के भीतर नगर क्षेत्रों पर है :
परंतु केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी क्षेत्र को इस अधिनियम या इसके किसी उपबंध के प्रवर्तन से अपवर्जित कर सकेगी :
परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी परिसर या किसी वर्ग के भवनों को इस अधिनियम या इसके किसी उपबंध के प्रवर्तन से अपवर्जित कर सकेगी ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) न्यायपीठ" से अधिकरण की न्यायपीठ अभिप्रेत है ;
(ख) अध्यक्ष" से अधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है ;
(ग) उचित दर" से धारा 39 के अधीन नियत की गई उचित दर अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत धारा 40 के अधीन पुनरीक्षित की गई दर है ;
(घ) होटल या वासा" से ऐसा भवन या भवन का ऐसा भाग अभिप्रेत है, जहां धनीय प्रतिफल के लिए आवास, भोजन या अन्य सेवाओं के साथ या उनके बिना, उपलब्ध कराया जाता है ;
(ङ) मकान मालिक" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी परिसर का किराया, चाहे अपने वास्ते अथवा किसी अन्य व्यक्ति के वास्ते या उसकी ओर से, या उसके फायदे के लिए, अथवा किसी अन्य व्यक्ति के न्यासी, संरक्षक या रिसीवर के रूप में, तत्समय प्राप्त कर रहा है या प्राप्त करने का हकदार है या जो किसी किराएदार को परिसर किराए पर देने की दशा में, इस प्रकार किराया प्राप्त करेगा या प्राप्त करने का हकदार होगा ;
(च) विधिपूर्ण वृद्धि" से इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किराए में अनुज्ञात वृद्धि अभिप्रेत है ;
(छ) किसी होटल का प्रबंधक" के अंतर्गत होटल के प्रबंध का भारसाधक कोई व्यक्ति है ;
(ज) सदस्य" से अधिकरण का कोई सदस्य अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत अध्यक्ष है ;
(झ) वासा का स्वामी" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो वासा में उपलब्ध कराए गए भोजन, आवास या अन्य सेवाओं मद्दे कोई धनीय प्रतिफल चाहे अपने वास्ते या अपनी ओर से और अन्य व्यक्तियों की ओर से अथवा किसी अन्य व्यक्ति के अभिकर्ता या न्यासी के रूप में, किसी व्यक्ति से प्राप्त करता है या प्राप्त करने का हकदार है ;
(ञ) परिसर" से कोई ऐसा भवन या भवन का भाग अभिप्रेत है जो निवास-स्थान के रूप में उपयोग के लिए या गैर-आवासिक उपयोग के लिए या किसी अन्य प्रयोजन के लिए अलग से किराए पर दिया जाता है या दिए जाने के लिए आशयित है और इसके अंतर्गत निम्नलिखित हैं, अर्थात् :-
(i) ऐसे भवन से या भवन के भाग से अनुलग्न कोई उद्यान, मैदान और उपगृह, यदि कोई हो ;
(ii) ऐसे भवन में या भवन के किसी भाग में उसके अधिक फायदाप्रद उपयोग के लिए कोई फिटिंग,
किन्तु इसके अंतर्गत होटल या वासा का कमरा नहीं है ;
(ट) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ठ) किराया प्राधिकारी" से धारा 43 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त कोई प्राधिकारी अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत उस धारा की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त कोई अपर किराया प्राधिकारी है ;
(ड) किसी परिसर के संबंध में, मानक किराया" से धारा 7 के अधीन संगणित किराया अभिप्रेत है ;
(ढ) किराएदार" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके द्वारा या जिसके वास्ते या जिसकी ओर से किसी परिसर का किराया संदेय है या यदि कोई विशेष संविदा न होती तो, संदेय होता, और इसके अंतर्गत निम्नलिखित है, अर्थात् :-
(i) कोई उप-किराएदार ;
(ii) कोई व्यक्ति, जिसका कब्जा उसकी किराएदारी की समाप्ति के पश्चात् भी, जारी है,
किन्तु इसके अंतर्गत,-
(i) कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसके विरुद्ध बेदखली के लिए कोई आदेश या डिक्री की गई है, सिवाय उस दशा के जहां बेदखली के लिए ऐसी डिक्री या आदेश पर, दिल्ली किराया नियंत्रण (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 का 18) की धारा 3 के परन्तुक के अधीन नए सिरे से विचार किया जा सकता है ;
(ii) कोई ऐसा व्यक्ति नहीं है जिसे भारतीय सुखाचार अधिनियम, 1882 (1882 का 5) की धारा 52 में परिभाषित अनुज्ञप्ति दी गई है ;
(ण) अधिकरण" से धारा 46 के अधीन स्थापित दिल्ली किराया अधिकरण अभिप्रेत है ;
(त) नगर क्षेत्र" का वही अर्थ है जो दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 (1957 का 66) में है ।
3. कतिपय उपबंधों का परिसरों को लागू न होना-(1) इस अधिनियम की कोई बात निम्नलिखित को लागू नहीं होगी, अर्थात् :-
(क) सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी का कोई परिसर ;
(ख) सरकार द्वारा पट्टे पर लिए गए या अधिगृहीत परिसर के संबंध में सरकार के किसी अनुदान द्वारा सृजित कोई किराएदारी या वैसा अन्य संबंध :
परन्तु जहां सरकार का कोई परिसर सरकार के साथ करार के आधार पर या अन्यथा किसी व्यक्ति द्वारा विधिपूर्वक किराए पर दिया गया है या दिया जाता है वहां, किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी, इस अधिनियम के उपबंध ऐसी किराएदारी को लागू होंगे ;
(ग) कोई ऐसा परिसर चाहे वह आवासिक हो या नहीं और चाहे इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या उसके पश्चात् किराए पर दिया गया हो, जिसका मासिक समझा गया किराया, इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख को, तीन हजार पांच सौ रुपए से अधिक है ;
(घ) कोई ऐसा परिसर जो 1 दिसम्बर, 1988 को या उसके पश्चात् किन्तु इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व सन्निर्मित किया गया है, ऐसे सन्निर्माण के पूरा होने की तारीख से दस वर्ष की अवधि तक ;
(ङ) कोई ऐसा परिसर जो इस अधिनियम के प्रारंभ को या उसके पश्चात् सन्निर्मित किया गया है, ऐसे निर्माण के पूरा होने की तारीख से पन्द्रह वर्ष की अवधि तक ;
(च) कोई ऐसा परिसर, जो ऐसा परिसर है जिसे सात वर्ष के भीतर किराए पर नहीं दिया गया है, उसके किराए पर दिए जाने की तारीख से पन्द्रह वर्ष की अवधि तक ;
(छ) कोई ऐसा परिसर, जो विदेश के किसी नागरिक या किसी विदेशी राज्य के किसी राज दूतावास, उच्चायोग, दूतावास या आयोग को या ऐसे अन्तरराष्ट्रीय संगठन को, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, किराए पर दिया गया है ;
(ज) कोई ऐसा परिसर, जो किसी ऐसे धार्मिक, पूर्त या शैक्षणिक न्यास या न्यासों के वर्ग का है, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ;
(झ) कोई ऐसी किराएदारी, जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या उसके पश्चात् बीस वर्ष या उससे अधिक की अवधि के लिए की गई है और जो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत है तथा जो मकान मालिक के विकल्प पर उसकी समाप्ति के पूर्व समाप्य नहीं है ।
स्पष्टीकरण 1-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि इस अधिनियम के उपबंध किसी ऐसे परिसर को लागू होंगे जो उपधारा (1) में उल्लिखित परिसर नहीं है, और जो-
(क) सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी को किराए पर दिया गया है ;
(ख) किसी ऐसे अवक्रेता, पट्टेदार या उप-पट्टेदार द्वारा, चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो, किराए पर दिया गया है जिसे ऐसा परिसर दिल्ली विकास प्राधिकरण या किसी अन्य स्थानीय प्राधिकारी द्वारा अवक्रय-करार, पट्टे या उपपट्टे के रूप में, यथास्थिति, ऐसे अवक्रेता, पट्टेदार या उप-पट्टेदार को पूर्ण स्वामित्व अधिकार प्रोद्भूत होने के पूर्व भले ही आबंटित किया गया हो ।
स्पष्टीकरण 2-सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी के परिसर" के अन्तर्गत किसी न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई ऐसा भवन नहीं आएगा, जो किसी करार, पट्टे, अनुज्ञप्ति या अनुदान के आधार पर सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा धारित की गई किसी भूमि पर किसी व्यक्ति द्वारा निर्मित किया गया है, चाहे वह भूमि ऐसे करार, पट्टे, अनुज्ञप्ति या अन्य अनुदान की शर्तों के अधीन सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी की बनी रहे ।
स्पष्टीकरण 3-इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख को समझा गया किराया" वह किराया होगा जो धारा 9 में उपबंधित पुनरीक्षण, यदि कोई हो, के साथ धारा 7 में उपबंधित रीति से संगणित किया गया हो और जो इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख को स्थिति दर्शित करने के लिए इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् सन्निर्मित परिसरों की दशा में उसी दर पर जो अनुसूची 1 में वृद्धि की दर के रूप में अनुबद्ध की गई है, घटाया गया हो ।
स्पष्टीकरण 4-सन्निर्माण के पूरा होने की तारीख", पूरा होने की वह तारीख जो संबंधित प्राधिकारी को सूचित की जाती है या संपत्ति कर के निर्धारण की तारीख, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, होगी और, जहां परिसर का सन्निर्माण प्रक्रमों में किया गया है वहां वह तारीख जिसको प्रारंभिक भवन पूरा किया गया था और जिसकी सूचना संबंधित प्राधिकारी को भेजी गई थी या जिसको संपत्ति कर का निर्धारण किया गया था, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, होगी ।
स्पष्टीकरण 5-सन्निर्मित परिसर" के अंतर्गत निम्नलिखित होगा-
(i) किसी विद्यमान भवन के पचहत्तर प्रतिशत से अधिक का पुनः निर्माण ;
(ii) किसी विद्यमान भवन का अतिरिक्त सन्निर्माण ।
(2) उपधारा (1) में, संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4), सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) और तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किराया प्राधिकारी को उपधारा (1) के खंड (ग) से खंड (झ) में निर्दिष्ट परिसरों के संबंध में किराएदारियों से संबंधित सभी विवादों का विनिश्चय करने की अधिकारिता होगी ।
4. किराएदारी करारों का रजिस्ट्रीकरण-(1) सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) की धारा 107 में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति, इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् लिखित करार द्वारा ही किसी परिसर को किराए पर देगा या लेगा, अन्यथा नहीं ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अथवा उपधारा (3) के अधीन रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए अपेक्षित प्रत्येक करार, रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन ऐसी अवधि के भीतर जो विहित की जाए, रजिस्ट्रीकृत कराया जाएगा और इस प्रयोजन के लिए करार ऐसा दस्तावेज समझा जाएगा जिसके लिए रजिस्ट्रीकरण उक्त अधिनियम की धारा 17 के अधीन अनिवार्य है ।
(3) जहां, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व सृजित किसी किराएदारी के संबंध में,-
(क) कोई लिखित करार किया गया था और रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत नहीं कराया गया था वहां मकान मालिक और किराएदार संयुक्त रूप से उसकी एक प्रति उक्त अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के समक्ष, रजिस्ट्रीकरण के लिए पेश करेंगे ;
(ख) कोई लिखित करार नहीं किया गया था वहां मकान मालिक और किराएदार उस किराएदारी की बाबत लिखित में करार करेंगे और उसे उक्त अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण अधिकारी के समक्ष रजिस्ट्रीकरण के लिए पेश करेंगे :
परन्तु जहां मकान मालिक और किराएदार खंड (क) के अधीन किराएदारी करार की प्रति संयुक्त रूप से पेश करने में असफल रहते हैं या खंड (ख) के अधीन कोई करार करने में असफल रहते हैं वहां ऐसा मकान मालिक और ऐसा किराएदार ऐसी किराएदारी के बारे में विशिष्टिया विहित प्राधिकारी के पास ऐसे प्ररूप में, ऐसी रीति से और ऐसी अवधि के भीतर जो, जो विहित की जाए, अलग से फाइल करेंगे ।
5. किराएदारी की उत्तराधिकार-प्राप्यता-(1) किसी किराएदार की मृत्यु की दशा में, किराएदारी अधिकार, उसकी मृत्यु की तारीख से दस वर्ष की अवधि के लिए उसके उत्तराधिकारियों को निम्नलिखित क्रम में न्यागत होगा, अर्थात् :-
(क) पति या पत्नी ;
(ख) पुत्र या पुत्री या जहां पुत्र और पुत्री दोनों हैं, वहां वे दोनों ;
(ग) माता-पिता ;
(घ) पुत्रवधू जो पूर्व मृत पुत्र की विधवा हो :
परन्तु यह तब जबकि उत्तराधिकारी, मृत किराएदार के साथ उस परिसर में उसकी मृत्यु की तारीख तक उसके कुटुंब के सदस्य के रूप में मामूली तौर से रह रहा हो और मृत किराएदार पर आश्रित था :
परंतु यह और कि किराएदारी का अधिकार उस दशा में उत्तराधिकारी को न्यागत नहीं होगा जिसमें ऐसा उत्तराधिकारी अथवा उसका पति या पत्नी अथवा उस पर आश्रित, कोई पुत्र या पुत्री, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में किसी आवासिक परिसर का स्वामी है या वह उसके अधिभोग में है ।
(2) यदि कोई व्यक्ति, जो उपधारा (1) में उल्लिखित उत्तराधिकारी है, मृत किराएदार के साथ उस परिसर में मामूली तौर से रह रहा था किंतु उसकी मृत्यु की तारीख को उस पर आश्रित नहीं था या वह अथवा उसका पति या पत्नी अथवा उस पर आश्रित कोई पुत्र या पुत्री, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में किसी आवासिक परिसर का स्वामी है या वह उसके अधिभोग में है, तो ऐसा उत्तराधिकारी, किराएदार की मृत्यु की तारीख से एक वर्ष की सीमित अवधि के लिए किराएदार के रूप में कब्जा जारी रखने का अधिकार अर्जित करेगा और उस अवधि की समाप्ति पर या उसकी मृत्यु हो जाने पर, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, ऐसे उत्तराधिकारी का परिसर का कब्जा जारी रखने का अधिकार निर्वापित हो जाएगा ।
स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि,-
(क) जहां, उपधारा (2) के कारण, किसी उत्तराधिकारी का परिसर का कब्जा जारी रखने का अधिकार निर्वापित हो जाता है वहां ऐसा निर्वापन, परिसर का कब्जा जारी रखने के उसी प्रवर्ग के किसी अन्य उत्तराधिकारी के अधिकार को प्रभावित नहीं करेगा, किन्तु यदि उसी प्रवर्ग का कोई अन्य उत्तराधिकारी नहीं है तो परिसर का कब्जा जारी रखने का अधिकार, ऐसे निर्वापन पर, यथास्थिति, किसी निम्नतर प्रवर्ग या प्रवर्गों में विनिर्दिष्ट किसी अन्य उत्तराधिकारी को अंतरित नहीं होगा ;
(ख) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक उत्तराधिकारी का परिसर का कब्जा जारी रखने का अधिकार उसका व्यक्तिगत अधिकार होगा और ऐसे उत्तराधिकारी की मृत्यु पर, उसके वारिसों में से किसी को न्यागत नहीं होगा ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) की कोई बात, गैर-आवासिक परिसर को लागू नहीं होगी और ऐसे परिसर का रिक्त कब्जा मकान मालिक को-
(i) यदि किराएदार कोई व्यक्ति है तो किराएदार की मृत्यु के ;
(ii) यदि किराएदार कोई फर्म है तो फर्म के विघटन के ;
(iii) यदि किराएदार कोई कम्पनी है तो कम्पनी के समापन के ;
(iv) यदि किराएदार कम्पनी से भिन्न कोई निगमित निकाय है तो निगमित निकाय के विघटन के,
एक वर्ष के भीतर परिदत्त कर दिया जाएगा ।
अध्याय 2
किराया
6. संदेय किराया-(1) किसी परिसर के संबंध में संदेय किराया निम्नलिखित होगा, अर्थात् :-
(क) मकान मालिक और किराएदार के बीच करार पाया गया वह किराया जो अनुसूची 1 में उपबंधित रीति से बढ़ाया गया है ; या
(ख) धारा 7 के अधीन विनिर्दिष्ट मानक किराया,
जो धारा 9 के अधीन पुनरीक्षित किया गया हो ।
(2) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व की गई किराएदारी की दशा में, मकान मालिक, ऐसे प्रारंभ की तारीख से तीन मास के भीतर किराएदार को लिखित सूचना द्वारा, धारा 7 के अधीन विनिर्दिष्ट किराए में वृद्धि कर सकेगा और इस प्रकार बढ़ाया गया किराया ऐसे प्रारंभ की तारीख से संदेय होगा ।
7. मानक किराया-(1) किसी परिसर के संबंध में, मानक किराया" से सन्निर्माण की लागत और परिसर का सन्निर्माण प्रारंभ होने की तारीख को परिसर में समाविष्ट भूमि के बाजार मूल्य की संकलित रकम के दस प्रतिशत प्रति वर्ष के आधार पर संगणित किराया अभिप्रेत है :
परन्तु यह कि पूर्वोक्त रूप से संगणित किराया अनुसूची 1 में उपबंधित रीति से बढ़ाया जाएगा ।
(2) इस धारा के प्रयोजन के लिए,-
(क) सन्निर्माण की लागत के अंतर्गत विद्युत फिटिंग, जलपंप, ऊर्द्धस्थ पानी की टंकी, भंडारण टंकी और अन्य जल, मलवहन और परिसर में लगाए गए अन्य फिक्सचर और फिटिंग की लागत है ;
(ख) यदि खंड (क) में निर्दिष्ट फिक्सचर और फिटिंग किसी भवन में एक से अधिक अधिभोगियों के सामान्य उपयोग में हैं तो फिक्सचर और फिटिंग की लागत के ऐसे अनुपात को परिसर के निर्माण की लागत में सम्मिलित किया जाएगा जो ऐसे परिसर के कुर्सी क्षेत्र का अनुपात उस भवन के कुर्सी क्षेत्र से है ;
(ग) सन्निर्माण की लागत, सन्निर्माण पर खर्च की गई वास्तविक रकम होगी और उस दशा में जिसमें जहां ऐसी रकम अभिनिश्चित नहीं की जा सकती है, ऐसी लागत का अवधारण उस वर्ष के लिए जिसमें परिसर का सन्निर्माण किया गया था वैसे ही सन्निर्माण के लिए सन्निर्माण की लागत के लिए केंद्रीय लोक निर्माण विभाग की अनुसूचित दरों के अनुसार किया जाएगा ;
(घ) भूमि की बाजार कीमत यदि सन्निर्माण रजिस्ट्रीकरण के वर्ष में प्रारम्भ हुआ था तो रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत विक्रय विलेख में अवधारित वह कीमत जिस पर भूमि क्रय की गई थी, अथवा सन्निर्माण प्रारम्भ किए जाने के वर्ष के लिए स्थानीय प्राधिकारी द्वारा अधिसूचित भूमि की दर, इनमें से जो भी अधिक हो, होगी ;
(ङ) परिसर में समाविष्ट भूमि उस भवन का कुर्सी क्षेत्र और कुर्सी क्षेत्र के पचास प्रतिशत तक उससे अनुलग्न खाली भूमि होगी ;
(च) ऐसी दशा में जिसमें कोई परिसर किसी ऐसे भवन का भाग है जिसमें एक से अधिक परिसर हैं, ऐसे भवन की भागरूप भूमि की कीमत के ऐसे अनुपात को परिसर में समाविष्ट भूमि की बाजार कीमत समझा जाएगा जो ऐसे परिसर के कुर्सी क्षेत्र के उस भवन के कुर्सी क्षेत्र के बराबर है ;
(छ) खंड (ग) और खंड (घ) में किसी बात के होते हुए भी सन्निर्माण की लागत और सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी से क्रय किए गए या उसके द्वारा आबंटित किसी परिसर में समाविष्ट भूमि की बाजार कीमत परिसर के लिए ऐसी सरकार या स्थानीय प्राधिकारी को संदेय कुल रकम होगी :
परंतु किराया प्राधिकारी सन्निर्माण की लागत और परिसर में समाविष्ट भूमि की बाजार कीमत परिनिर्धारित करने के प्रयोजन के लिए परिसर में किसी सुधार, परिवर्धन या संरचनात्मक परिवर्तन के लिए मकान मालिक अथवा पहले या किसी पश्चात्वर्ती क्रेता या आबंटिती द्वारा उपगत किसी व्यय के लिए इस प्रकार संदेय रकम में परिवर्धन, सरकार या स्थानीय प्राधिकारी को संदेय रकम के अधिकतम तीस प्रतिशत के अधीन रहते हुए, अनुज्ञात कर सकेगा ।
8. अन्य संदेय प्रभार-(1) किराएदार, किराए के अलावा मकान मालिक को निम्नलिखित प्रभारों का संदाय करने के दायित्वाधीन होगा, अर्थात् :-
(क) प्रभार, जो मकान मालिक और किराएदार के बीच, अनुसूची 2 में विनिर्दिष्ट सुविधाओं के लिए करार पाए गए किराए के पन्द्रह प्रतिशत से अधिक न हों ;
(ख) मानक किराए के दस प्रतिशत की दर से अनुरक्षण प्रभार ;
(ग) स्थानीय प्राधिकारी को संपत्ति कर का संदाय करने के मकान मालिक के दायित्व पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, परिसर के संबंध में आनुपातिक संपत्ति कर ।
स्पष्टीकरण-किराएदार द्वारा मकान मालिक को संपत्ति कर मद्दे संदेय मासिक प्रभारों की संगणना करने के प्रयोजन के लिए, ठीक पूर्ववर्ती वर्ष के लिए संदत्त या संदेय संपत्ति कर की रकम या संदेय प्राक्कलित कर आधार होगा ।
(2) मकान मालिक, किराएदार से उपभुक्त बिजली या पानी के प्रभारों अथवा स्थानीय या अन्य प्राधिकारी द्वारा उद्गृहीत ऐसे अन्य प्रभारों मद्दे जो सामान्यतया किराएदार द्वारा संदेय होते हैं, अपने द्वारा संदत्त रकम वसूल करने का हकदार होगा ।
9. कतिपय दशाओं में किराए का पुनरीक्षण-(1) जहां किसी मकान मालिक ने इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किसी भी समय, किराएदार के अनुमोदन से या उसके बिना, या इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् किराएदार के लिखित अनुमोदन से परिसर में किसी सुधार, परिवर्धन या संरचनात्मक परिवर्तन के लिए ऐसा व्यय उपगत किया है, जो सजावट पर या ऐसे परिसर की किराए योग्य आवश्यक या प्रायिक मरम्मत पर व्यय नहीं है, और ऐसे सुधार, परिवर्धन या परिवर्तन की लागत उस परिसर के किराए का अवधारण करते समय हिसाब में नहीं ली गई है वहां मकान मालिक, किराए में प्रतिवर्ष ऐसी लागत के दस प्रतिशत से अनधिक रकम तक की विधिपूर्वक वृद्धि कर सकेगा ।
(2) जहां इस अधिनियम के अधीन किसी परिसर का, यथास्थिति, किराया नियत किए जाने या करार किए जाने के पश्चात् ऐसे परिसर में वास-सुविधा में कोई कमी आई है, ह्रास हुआ है या क्षय हुआ है वहां किराएदार किराए में कमी का दावा कर सकेगा ।
10. किराए के पुनरीक्षण की सूचना-(1) जहां कोई मकान-मालिक धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन किसी परिसर के किराए का पुनरीक्षण करना चाहता है वहां वह ऐसा पुनरीक्षण करने के अपने आशय की सूचना किराएदार को देगा और जहां तक ऐसा पुनरीक्षण इस अधिनियम के अधीन विधिपूर्ण है वहां वह सुधार, परिवर्धन या संरचनात्मक परिवर्तन की तारीख से शोध्य और वसूलीय होगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक सूचना, लिखित रूप में और मकान मालिक द्वारा या उसकी ओर से हस्ताक्षरित होगी और वह सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) की धारा 106 में उपबन्धित रीति से दी जाएगी ।
11. किराया प्राधिकारी मानक किराया, आदि नियत करेगा-(1) किराया प्राधिकारी, विहित रीति से इस निमित्त उसे आवेदन किए जाने पर, किसी परिसर के बारे में, -
(i) धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (ग) के प्रयोजन के लिए समझा गया किराया नियत करेगा;
(ii) अनुसूची 1 में उपबन्धित रीति से किराए में वृद्धि नियत करेगा;
(iii) धारा 7 के उपबंधों के अनुसार मानक किराया नियत करेगा;
(iv) धारा 8 के उपबंधों के अनुसार संदेय अन्य प्रभार नियत करेगा; और
(v) धारा 9 के उपबन्धों के अनुसार किराए का पुनरीक्षण करेगा:
परन्तु इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् की गई किराएदारी की दशा में मकान मालिक के लिए, धारा 7 के उपबन्धों के अनुसार मानक किराया नियत करने के लिए आवेदन करना, अनुज्ञेय नहीं होगा ।
(2) धारा 7 के प्रयोजनों के लिए किसी परिसर के सन्निर्माण की लागत या ऐसे परिसर में समाविष्ट भूमि की बाजार कीमत अथवा धारा 9 के प्रयोजन के लिए किसी परिसर में किसी सुधार, परिवर्धन या संरचनात्मक परिवर्तन के लिए उपगत व्यय या वास-सुविधा में कमी, ह्रास या क्षय का पता लगाने में, किराया प्राधिकारी, किसी ऐसे विहित मूल्यांकक की सहायता ले सकेगा जो विहित रीति से निर्धारण करेगा ।
(3) किसी परिसर का मानक किराया या किराए में विधिपूर्ण वृद्धि या कमी नियत करने या अन्य संदेय प्रभार अवधारित करने में, किराया प्राधिकारी ऐसी रकम नियत या अवधारित करेगा जो उसे धारा 7 या धारा 8 या धारा 9 के उपबन्धों और मामले की अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, युक्तियुक्त प्रतीत हो ।
(4) ऐसे किसी परिसर का, जिसका कोई भाग विधिपूर्वक उप-किराए पर दिया गया है, मानक किराया नियत करने में किराया प्राधिकारी, उप-किराए पर दिए गए ऐसे भाग का मानक किराया भी नियत कर सकेगा ।
(5) जहां किसी कारण से धारा 7 के अधीन उपवर्णित सिद्धांतों के आधार पर किसी परिसर का मानक किराया अवधारित करना संभव नहीं है, वहां किराया प्राधिकारी, ऐसा किराया नियत कर सकेगा जो, परिसर की अवस्थिति, परिक्षेत्र और दशा तथा उसमें दी गई सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए, और जहां उस परिक्षेत्र में समरूप या लगभग समरूप परिसर है वहां ऐसे परिसरों की बाबत संदेय किराए को भी ध्यान में रखते हुए, युक्तियुक्त हो ।
(6) सभी मामलों में, मानक किराया बारह मास की किराएदारी के लिए नियत किया जाएगा:
परन्तु जहां कोई परिसर बारह मास से कम की अवधि के लिए किराए पर या पुनः किराए पर दिया जाता है वहां ऐसी किराएदारी के लिए मानक किराए का वार्षिक किराए से वही अनुपात होगा जो किराएदारी की अवधि का बारह मास से है ।
(7) किराया प्राधिकारी, इस धारा के अधीन किसी परिसर का मानक किराया नियत करते समय, उसका मानक किराया परिसर की असुसज्जित अवस्था में नियत करेगा और किसी फिटिंग या फर्नीचर मद्धे जिसका मकान मालिक द्वारा प्रदाय किया जाता है, संदेय कोई अतिरिक्त प्रभार भी अवधारित कर सकेगा और मकान मालिक के लिए किराएदार से ऐसा अतिरिक्त प्रभार वसूल करना विधिपूर्ण होगा ।
(8) किराया प्राधिकारी, इस धारा के अधीन किसी परिसर की बाबत मानक किराया या किराए में विधिपूर्ण वृद्धि या कमी नियत करते समय अथवा अन्य संदेय प्रभार अवधारित करते समय वह तारीख विनिर्दिष्ट करेगा जिससे इस प्रकार नियत रकम प्रभावी समझी जाएगी:
परन्तु मानक किराए के मामले में, किसी भी दशा में इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख मानक किराए में वृद्धि या कमी के लिए आवेदन फाइल करने की तारीख के पूर्व की नहीं होगी:
परन्तु यह और कि यदि ऐसी वृद्धि, सुधार, परिवर्धन या संरचनात्मक परिवर्तन के कारण है तो वह ऐसे सुधार, परिवर्धन या परिवर्तन पूरा होने की तारीख से प्रभावी होगी ।
(9) किराया प्राधिकारी, मानक किराया या किराए में विधिपूर्ण वृद्धि या कमी अथवा अन्य संदेय प्रभार नियत करते समय देय रकम की बकाया का किराएदार द्वारा मकान मालिक को उतनी किस्तों में जितनी वह उचित समझे, संदाय करने के लिए आदेश कर सकेगा ।
12. अंतरिम किराया नियत करना-यदि मानक किराया नियत करने के लिए अथवा किराए या अन्य संदेय प्रभार में विधिपूर्ण वृद्धि या कमी के अवधारण के लिए धारा 11 के अधीन कोई आवेदन किया जाता है तो किराया प्राधिकारी, आवेदन पर अंतिम विनिश्चय लंबित रहने तक संदत्त की जाने वाली रकम को विनिर्दिष्ट करते हुए, यथाशक्य शीघ्र, आदेश करेगा और वह तारीख नियत करेगा जिससे इस प्रकार विनिर्दिष्ट रकम प्रभावी समझी जाएगी ।
13. मानक किराया आदि नियत करने के लिए आवेदन की परिसीमा-कोई किराएदार परिसर का मानक किराया नियत करने के लिए आवेदन फाइल कर सकेगा और कोई मकान मालिक या कोई किराएदार किराए या अन्य संदेय प्रभारों में विधिपूर्ण वृद्धि या कमी अवधारित करने के लिए किराया प्राधिकारी के समक्ष आवेदन, -
(क) किसी ऐसे परिसर की दशा में जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व किराए पर दिया गया था या जिसके किराए में विधिपूर्ण वृद्धि या कमी के लिए अथवा अन्य प्रभारों के संदाय के लिए वाद हेतुक उद्भूत हुआ था, ऐसे प्रारंभ से दो वर्ष के भीतर;
(ख) किसी ऐसे परिसर की दशा में जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् किराए पर दिया गया था, -
(i) उसका मानक किराया नियत करने के लिए, उस तारीख से जिसको परिसर किराए पर दिया गया था, दो वर्ष के भीतर;
(ii) किसी अन्य दशा में उस तारीख से जिसको वाद हेतुक उद्भूत हुआ, दो वर्ष के भीतर,
फाइल कर सकेगा:
परन्तु किराया प्राधिकारी दो वर्ष की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् आवेदन ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि आवेदक समय पर आवेदन फाइल करने से पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था ।
14. बिचौलियों के दायित्व की परिसीमा-कोई भी किराया संग्रहकर्ता या बिचौलिया, किसा परिसर की बाबत किराए और अन्य प्रभारों के रूप में किसी ऐसी राशि का, जो उस रकम से अधिक है जिसे वह इस अधिनियम के अधीन परिसर के किराएदार या किराएदारों से वसूल करने का हकदार है, अपने मालिक को संदाय करने का दायी नहीं होगा ।
15. संदत्त किराए के लिए रसीद का दिया जाना-(1) प्रत्येक किराएदार संविदा द्वारा नियत समय के भीतर या ऐसे अनुबंध के अभाव में, उस मास के, जिसके लिए किराया संदेय है, ठीक पश्चात्वर्ती मास के पन्द्रहवें दिन तक संदेय किराए और अन्य प्रभारों का संदाय करेगा और जहां किराए या अन्य प्रभारों के संदाय में व्यतिक्रम होता है वहां किराएदार उस तारीख से, जिसको ऐसे संदेय किराए या अन्य प्रभारों का संदाय देय हो और उस तारीख तक जिसको उसका संदाय किया जाता है, पन्द्रह प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज का संदाय करने का दायी होगा ।
(2) प्रत्येक किराएदार जो अपने मकान मालिक को संदेय किराए या अन्य प्रभारों का अथवा ऐसे किराए या अन्य प्रभारों मद्दे अग्रिम का संदाय करता है, मकान मालिक से उसके प्राधिकृत अभिकर्ता से उसे संदत्त रकम के लिए मकान मालिक या उसके प्राधिकृत अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित लिखित रसीद, अभिस्वीकृति के रूप में, तत्काल प्राप्त करने का हकदार होगा:
परन्तु किराएदार को मनीआर्डर से मकान मालिक को किराया भेजने की छूट होगी ।
(3) यदि मकान मालिक या उसका प्राधिकृत अभिकर्ता, किराएदार को उपधारा (2) में निर्दिष्ट रसीद देने से इंकार या उपेक्षा करता है तो किराया प्राधिकारी, किराएदार द्वारा संदाय की तारीख से दो मास के भीतर इस निमित्त उसके समक्ष आवेदन किए जाने पर और मकान मालिक या उसके प्राधिकृत अभिकर्ता को सुनने के पश्चात्, किराएदार के नुकसानी रूप में, ऐसी राशि का जो किराएदार द्वारा संदत्त किराए या अन्य प्रभार की रकम के दुगुने से अधिक नहीं होगी और आवेदन के व्यय का संदाय करने के लिए आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा और संदत्त किराए या अन्य प्रभारों के लिए किराएदार को एक प्रमाणपत्र भी देगा ।
(4) यदि मकान मालिक या उसका प्राधिकृत अभिकर्ता उसको संदेय किराए या अन्य प्रभारों को स्वीकार करने से इंकार करता है या उनकी प्राप्ति की स्वीकृति का अपवंचन करता है तो किराएदार, लिखित सूचना द्वारा, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में स्थित किसी बैंक में मकान मालिक से अपने बैंक खाते की विशिष्टियां जिसमें किराएदार, मकान मालिक के नाम में संदेय किराया और अन्य प्रभार जमा कर सके, उसे देने के लिए कह सकेगा ।
(5) यदि मकान मालिक अपने बैंक खाते की विशिष्टियां दे देता है तो किराएदार संदेय किराए और अन्य प्रभारों को समय-समय पर, ऐसे बैंक खाते में जमा करेगा ।
(6) यदि मकान मालिक उपधारा (4) के अधीन बैंक खाते की विशिष्टियां नहीं देता है तो किराएदार संदेय किराया और अन्य प्रभार, मकान मालिक को समय-समय पर, मनीआर्डर द्वारा डाक प्रभार काटने के पश्चात् भेजेगा ।
16. किराएदार द्वारा किराया जमा किया जाना-(1) जहां मकान मालिक धारा 15 में निर्दिष्ट समय के भीतर और रीति से किराएदार द्वारा पेश किया गया कोई संदेय किराया और अन्य प्रभार स्वीकार नहीं करता है अथवा उसमें निर्दिष्ट रसीदें देने से इंकार या उपेक्षा करता है या जहां इस बारे में वास्तविक शंका है कि किराया और अन्य प्रभार किस व्यक्ति या व्यक्तियों को संदेय है वहां किराएदार, ऐसा संदेय किराया और अन्य प्रभार, किराया प्राधिकारी के पास, विहित रीति से जमा कर सकेगा:
परन्तु ऐसे मामलों में जहां इस बारे में वास्तविक शंका है कि किराया और अन्य प्रभार किस व्यक्ति या व्यक्तियों को संदेय है वहां किराएदार ऐसा संदेय किराया और अन्य प्रभार, किराया प्राधिकारी को मनीआर्डर द्वारा भेज सकेगा ।
(2) इस जमा के साथ किराएदार द्वारा एक आवेदन दिया जाएगा जिसमें निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी, अर्थात्: -
(क) वह परिसर जिसके लिए संदेय किराया और अन्य प्रभार जमा किए जाते हैं, और उस परिसर की पहचान के लिए पर्याप्त वर्णन;
(ख) वह अवधि जिसके लिए संदेय किराया और अन्य प्रभार जमा किए जाते हैं;
(ग) मकान मालिक या उस व्यक्ति या व्यक्तियों के जो संदेय किराए और अन्य प्रभारों के हकदार होने का दावा कर रहें हैं, नाम और पते;
(घ) वे कारण और परिस्थितियां, जिनके कारण संदेय किराया और अन्य प्रभार जमा करने के लिए आवेदन किया जाता है; और
(ङ) ऐसी अन्य विशिष्टियां, जो विहित की जाएं ।
(3) संदेय किराया और अन्य प्रभार इस प्रकार जमा किए जाने पर, किराया प्राधिकारी, मकान मालिक को या संदेय किराया और अन्य प्रभार का हकदार होने का दावा करने वाले व्यक्तियों को, जमा कराने की तारीख के पृष्ठांकन सहित, आवेदन की प्रति विहित रीति से भेजेगा ।
(4) यदि जमा संदेय किराया और अन्य प्रभारों को निकालने के लिए कोई आवेदन किया जाता है तो किराया प्राधिकारी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि आवेदक वही व्यक्ति है जो जमा किराए और अन्य प्रभारों को प्राप्त करने का हकदार है तो किराए और अन्य प्रभारों की रकम का विहित रीति से उसे संदाय करने का आदेश करेगा:
परन्तु इस उपधारा के अधीन, संदेय किराए और अन्य प्रभारों की किसी जमा के संदाय के लिए किराया प्राधिकारी द्वारा कोई आदेश उपधारा (2) के अधीन किराएदार के आवेदन मे उसके द्वारा नामित उन सभी व्यक्तियों को, जो ऐसे किराए के संदाय के लिए हकदार होने का दावा करते हैं, सुनवाई का अवसर दिए बिना नहीं किया जाएगा और ऐसे आदेश का, सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा ऐसा संदेय किराया और अन्य प्रभार प्राप्त करने के ऐसे व्यक्तियों के अधिकारों का विनिश्चय किए जाने पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
(5) यदि उपधारा (4) के अधीन आवेदन फाइल करने के समय, किंतु जमा किराए की सूचना प्राप्त करने से तीस दिन की समाप्ति के अपश्चात् मकान मालिक या संदेय किराए और अन्य प्रभारों के हकदार होने का दावा करने वाला व्यक्ति या करने वाले व्यक्ति, किराया प्राधिकारी को यह शिकायत करते हैं कि उन कारणों और परिस्थितियों के बारे में, जिनके परिणामस्वरूप उन्होंने संदेय किराया और अन्य प्रभार जमा कराया है, किराएदार के आवेदन में, कथन असत्य है, तो किराया प्राधिकारी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उक्त कथन सारवान् रूप से असत्य है, किराएदार को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उस पर ऐसे जुर्माने का उद्ग्रहरण कर सकेगा जो दो मास के किराए के बराबर रकम तक का हो सकेगा और यह आदेश कर सकेगा कि वसूल किए गए जुर्माने में से कोई रकम प्रतिकर के रूप में मकान मालिक को दी जाए ।
(6) किराया प्राधिकारी, किराएदार के परिवाद पर और मकान मालिक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि मकान मालिक ने किसी युक्तियुक्त हेतुक के बिना, संदेय किराया और अन्य प्रभार स्वीकार करने से इंकार किया है, यद्यपि यह उसे धारा 15 में निर्दिष्ट समय के भीतर पेश किया गया था, मकान मालिक पर ऐसे जुर्माने का उद्ग्रहरण कर सकेगा जो दो मास के किराए के बराबर रकम तक का हो सकेगा, और यह आदेश भी कर सकेगा कि वसूल किए गए जुर्माने की रकम प्रतिकर के रूप में किराएदार को दी जाए ।
17. जमा करने की समय सीमा और जमा के लिए आवेदन में अशुद्ध विशिष्टियों के परिणाम-(1) धारा 16 के अधीन जमा किया गया कोई किराया और अन्य प्रभार उस धारा के अधीन विधिमान्यतः जमा किए गए तब तक नहीं समझे जाएंगे जब तक संदेय किराया या अन्य प्रभार, संदाय करने के लिए धारा 15 में निर्दिष्ट समय के इक्कीस दिन के भीतर जमा नहीं कर दिए जाते ।
(2) यदि किराएदार, संदेय किराया और अन्य प्रभार जमा कराने के लिए अपने आवेदन में जानबूझकर कोई मिथ्या कथन करता है तो ऐसी कोई जमा विधिमान्यतः जमा की गई तब तक नहीं समझी जाएगी जब तक मकान मालिक ने किराएदार से परिसर की पुनः प्राप्ति के लिए आवेदन फाइल करने की तारीख के पूर्व, उक्त जमा की गई रकम निकाल न ली हो ।
(3) यदि संदेय किराया और अन्य प्रभार, उपधारा (1) में उल्लिखित समय के भीतर जमा कर दिए जाते हैं और वे उपधारा (2) में उल्लिखित कारणों से विधिमान्य रूप से जमा रहे आते हैं तो वह जमा रकम मकान मालिक को संदेय किराए और अन्य प्रभार का ऐसा संदाय होगी मानो जमा की गई रकम विधिमान्य रूप से पेश की गई थी ।
18. संदेय किराए और अन्य प्रभारों की स्वीकृति के बारे में व्यावृत्ति और उस जमा का समपहरण-(1) धारा 16 के अधीन जमा किए गए संदेय किराए और अन्य प्रभारों का उसमें विहित रीति से निकाल लिया जाना, उसे निकालने वाले व्यक्ति के विरुद्ध संदेय किराया और अन्य प्रभारों की दर, व्यतिक्रम की अवधि, देय रकम, या उक्त धारा के अधीन संदेय किराया और अन्य प्रभार जमा करने के लिए किराएदार के आवेदन में कथित किसी अन्य तथ्य की शुद्धता के बारे में स्वीकृति नहीं होगी ।
(2) जमा संदेय किराया और अन्य प्रभार, जो मकान मालिक या ऐसा संदेय किराया और अन्य प्रभार प्राप्त करने के हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा नहीं निकाले जाते हैं, किराया प्राधिकारी द्वारा किए गए आदेश द्वारा सरकार को समपहृत हो जाएंगे यदि वे जमा की सूचना भेजे जाने की तारीख से पांच वर्ष की समाप्ति के पूर्व नहीं निकाले जाते हैं ।
(3) किराया प्राधिकारी समपहरण का आदेश पारित करने के पूर्व, मकान मालिक को या जमा किराया और अन्य प्रभार प्राप्त करने के हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों को रजिस्ट्री डाक द्वारा ऐसे मकान मालिक अथवा व्यक्ति या व्यक्तियों के अंतिम ज्ञात पते पर सूचना देगा और सूचना को अपने कार्यालय में तथा किसी स्थानीय समाचारपत्र में प्रकाशित भी कराएगा ।
अध्याय 3
परिसर की मरम्मत
19. मकान मालिक के कर्तव्य-(1) किसी लिखित प्रतिकूल संविदा के अधीन रहते हुए, प्रत्येक मकान मालिक, अनुसूची 3 के भाग क के अंतर्गत आने वाले विषयों के संबंध में, परिसर की अच्छी और किराए योग्य मरम्मत करने के लिए आबद्ध होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा और धारा 20 के अधीन अच्छी और किराए योग्य मरम्मत से ऐसी मरम्मत अभिप्रेत है जिससे परिसर को वैसी ही दशा में रखा जाए, जिस दशा में वह, सामान्य टूट-फूट को छोड़कर, किराए पर दिया गया था ।
(2) जहां, अनुसूची 3 के भाग क के अंतर्गत आने वाले विषयों के संबंध में, ऐसी कोई मरम्मत की जानी है जिसके बिना परिसर, अनावश्यक असुविधा के सिवाय, आवास योग्य या उपयोग योग्य नहीं है, और मकान मालिक लिखित सूचना के पश्चात् तीन मास की अवधि के भीतर मरम्मत करने में उपेक्षा करता है या असफल रहता है तो किराएदार, ऐसी मरम्मत स्वयं करने की अनुज्ञा के लिए किराया प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगा और ऐसी मरम्मत के खर्च का प्राक्कलन किराया प्राधिकारी को प्रस्तुत कर सकेगा, और तब, किराया प्राधिकारी, मकान मालिक को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और खर्च के उस प्राक्कलन पर विचार करने के पश्चात् तथा ऐसी अन्य जांच, जो वह ठीक समझे, करने के पश्चात्, लिखित आदेश द्वारा, किराएदार को ऐसे खर्च पर जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, मरम्मत करने की अनुज्ञा दे सकेगा और तत्पश्चात् किराएदार के लिए ऐसी मरम्मत स्वयं करना और उसका खर्च, जो किसी भी दशा में इस प्रकार विनिर्दिष्ट रकम से अधिक नहीं होगा, किराए से काट लेना या मकान मालिक से अन्यथा वसूल कर लेना, विधिपूर्ण होगा :
परन्तु किसी वर्ष में इस प्रकार किराए में से काटी गई या वसूलीय रकम उस वर्ष के लिए किराएदार द्वारा संदेय किराए के आधे से अधिक नहीं होगी और उस वर्ष में वसूल न की गई किसी शेष रकम को पश्चात्वर्ती वर्षों में किराए में से किसी मास के किराए के पच्चीस प्रतिशत से अनधिक दर से काट लिया जाएगा या वसूल कर लिया जाएगा:
परन्तु यह और कि जहां किसी भवन में मकान मालिक के स्वामित्व में एक से अधिक परिसर हैं वहां किराएदार, संयुक्त रूप से मरम्मत करा सकेंगे और खर्च अनुपाततः वहन करेंगे ।
(3) उपधारा (2) की कोई बात किसी ऐसे परिसर को लागू नहीं होगी जो-
(क) किराए पर दिए जाने के समय अनावश्यक असुविधा के सिवाय, आवास योग्य या उपयोग योग्य नहीं था और किराएदार ने उसे उसी दशा में लेने का करार किया था;
(ख) किराए पर दिए जाने के पश्चात्, अनावश्यक असुविधा के सिवाय, किराएदार द्वारा आवास योग्य या उपयोग योग्य नहीं रहने दिया गया था ।
20. किराएदार के कर्तव्य-(1) प्रत्येक किराएदार, अनुसूची 3 के भाग ख के अंतर्गत आने वाले विषयों के संबंध में, परिसर की अच्छी और किराए योग्य मरम्मत करने के लिए आबद्ध होगा ।
(2) जहां, अनुसूची 3 के भाग ख के अंतर्गत आने वाले विषयों के संबंध में, ऐसी कोई मरम्मत की जानी है जिसके बिना परिसर, अनावश्यक असुविधा के सिवाय, आवास योग्य या उपयोग योग्य नहीं है, और किराएदार लिखित सूचना के पश्चात् दो मास की अवधि के भीतर मरम्मत करने में उपेक्षा करता है या असफल रहता है तो मकान मालिक, ऐसी मरम्मत स्वयं करने की अनुज्ञा के लिए किराया प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगा, और ऐसी मरम्मत के खर्च का प्राक्कलन किराया प्राधिकारी को प्रस्तुत कर सकेगा और तब, किराया प्राधिकारी, किराएदार को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् और खर्चे के उस प्राक्कलन पर विचार करने के पश्चात् तथा ऐसी अन्य जांच, जो वह ठीक समझे, करने के पश्चात्, लिखित आदेश द्वारा, मकान मालिक को ऐसे खर्च पर जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, मरम्मत करने की अनुज्ञा दे सकेगा और तत्पश्चात्, मकान मालिक के लिए ऐसी मरम्मत स्वयं करना और उसका खर्च, जो किसी भी दशा में इस प्रकार विनिर्दिष्ट रकम से अधिक नहीं होगा, किराएदार से वसूल कर लेना, विधिपूर्ण होगा ।
(3) मकान मालिक या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को, विहित रीति से किराएदार को सूचना देने के पश्चात्, परिसर में प्रवेश करने और उसका निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) किराएदार, मकान मालिक द्वारा ऐसा करने की लिखित जानकारी देने के तीन मास के भीतर अपनी उपेक्षा द्वारा परिसर को कारित सभी नुकसान पूरा करेगा और ऐसा न करने की दशा में, मकान मालिक उक्त नुकसार को पूरा करने की अनुज्ञा के लिए किराया प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगा और किराया प्राधिकारी, उपधारा (2) में उपबंधित रीति से मामले का विनिश्चय करेगा ।
(5) किराएदार, किराएदारी की समाप्ति पर परिसर का कब्जा उसी दशा में, सामान्य टूट-फूट को छोड़कर, जिस दशा में वह उस समय था जब वह उसे ऐसी किराएदारी के आरंभ होने पर दिया गया था, सौंप देगा और किसी ऐसी दशा में जहां कुछ नुकसान कारित किया गया हो, जो ऐसा नुकसान नहीं है जो अपरिहार्य घटना द्वारा कारित हुआ हो, किराएदार परिसर को कारित नुकसान पूरा करेगा और ऐसा न करने की दशा में, मकान मालिक, उक्त नुकसानी को पूरा करने की अनुज्ञा के लिए किराया प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगा और किराया प्राधिकारी, उपधारा (2) में उपबंधित रीति से, मामले का विनिश्चय करेगा ।
(6) किराएदार, चाहे किराएदारी के अस्तित्व में रहने के दौरान या उसके पश्चात्, परिसर में अपने द्वारा किए गए किसी सुधार या परिवर्तन को मकान मालिक की अनुज्ञा के बिना न तो ढहाएगा और न ऐसे सुधार या परिवर्तन में प्रयुक्त किसी सामग्री को हटाएगा, सिवाय हटाने योग्य प्रकृति की किसी फिक्सचर के, और ऐसा न करने की दशा में, ऐसा ढहाया जाना या परिवर्तन, उपधारा (4) के अधीन ऐसे किराएदार द्वारा कारित नुकसान समझा जाएगा और तद्नुसार कार्यवाही की जाएगी ।
21. आवश्यक प्रदाय या सेवा का बंद किया जाना या विधारित किया जाना-(1) कोई भी मकान मालिक या किराएदार, स्वयं या उसकी ओर से कार्य करने के लिए तात्पर्यित किसी अन्य व्यक्ति के माध्यम से, यथास्थिति, उसको किराए पर दिए गए या उसके अपने अधिभोग के अधीन परिसर की बाबत, यथास्थिति, किराएदार या मकान मालिक द्वारा उपभुक्त किसी आवश्यक प्रदाय या सेवा को बिना किसी न्यायोचित और पर्याप्त हेतुक के बंद या विधारित नहीं करेगा ।
(2) यदि कोई मकान मालिक या किराएदार, उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करता है तो, यथास्थिति, ऐसा मकान मालिक या किराएदार, ऐसे उल्लंघन का परिवाद करते हुए किराया प्राधिकारी के समक्ष आवेदन कर सकेगा ।
(3) यदि किराया प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि आवश्यक प्रदाय या सेवा जानबूझकर बंद की गई थी या विधारित की गई थी तो वह उपधारा (4) में निर्दिष्ट जांच लंबित रहने तक सुविधाओं को तुरंत प्रत्यावर्तित करने का निदेश देते हुए आदेश पारित कर सकेगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के अधीन अंतरिम आदेश, यथास्थिति, मकान मालिक या किराएदार को सूचना दिए बिना, पारित किया जा सकेगा ।
(4) यदि जांच करने पर किराया प्राधिकारी इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि किराएदार या मकान मालिक द्वारा उपभुक्त आवश्यक प्रदाय या सेवा जानबूझकर और बिना किसी न्यायोचित और पर्याप्त हेतुक के, यथास्थिति, मकान मालिक या किराएदार द्वारा बन्द या विधारित की गई है, तो वह ऐसा प्रदाय या सेवा प्रत्यावर्तित करने के लिए निदेश देते हुए आदेश करेगा ।
(5) किराया प्राधिकारी, उपधारा (4) के अधीन जांच के लिए कोई आवेदन फाइल किए जाने के एक मास के भीतर जांच पूरी करेगा जब तक कि वह, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, यह विनिश्चय नहीं करता है कि उसके लिए ऐसी अवधि के भीतर जांच को पूरा करना संभव नहीं है ।
(6) किराया प्राधिकारी, अपने विवेकानुसार, यह निदेश दे सकेगा कि निम्नलिखित को एक हजार रुपए से अनधिक प्रतिकर का संदाय किया जाए-
(क) परिवादी द्वारा, यथास्थिति, मकान मालिक या किराएदार को, यदि उपधारा (2) के अधीन आवेदन तुच्छतया या परेशान करने के लिए किया गया था;
(ख) परिवादी को, यदि, यथास्थिति, मकान मालिक या किराएदार ने बिना न्यायोचित और पर्याप्त कारण के किसी प्रदाय या सेवा को, बन्द या विधारित कर दिया था ।
स्पष्टीकरण 1-इस धारा में, आवश्यक प्रदाय या सेवा" के अन्तर्गत जल, बिजली, रास्तों और सीढ़ियों में प्रकाश का प्रदाय, सफाई और स्वास्थ्य सेवाएं आती हैं ।
स्पष्टीकरण 2-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, आवश्यक प्रदाय या सेवा विधारित करने के अन्तर्गत, यथास्थिति, मकान मालिक या किराएदार की वजह से हुए ऐसे कार्य या लोप भी हैं जिनके कारण स्थानीय प्राधिकारी या किसी अन्य अभिकरण द्वारा आवश्यक प्रदाय या सेवा बन्द कर दी जाती है ।
अध्याय 4
बेदखली के विरुद्ध किराएदारों का संरक्षण
22. बेदखली के विरुद्ध किराएदार का संरक्षण-(1) किसी अन्य विधि या संविदा में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, जैसा उपधारा (2) में उपबंधित है उसके सिवाय, किसी परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए कोई आदेश या डिक्री, किसी न्यायालय, अधिकरण या किराया प्राधिकारी द्वारा किराएदार के विरुद्ध, मकान मालिक के पक्ष में, नहीं की जाएगी ।
(2) किराया प्राधिकारी, विहित रीति से उसे आवेदन किए जाने पर, केवल निम्नलिखित एक या अधिक आधारों पर परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए आदेश कर सकेगा, अर्थात्: -
(क) किराएदार ने उससे विधिपूर्वक वसूलीय निरंतर दो या अधिक मास का संपूर्ण संदेय बकाया किराया, या अन्य प्रभार, संपत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) की धारा 106 में उपबन्धित रीति से मकान मालिक द्वारा उस पर ऐसे संदेय किराए और अन्य प्रभार की बकाया और व्यतिक्रम की अवधि के लिए पन्द्रह प्रतिशत की दर से ब्याज के लिए मांग की सूचना की तामील की तारीख से दो मास के भीतर न तो संदत्त किया है और न पेश किया है:
परन्तु कोई किराएदार इस खंड के अधीन मकान मालिक द्वारा सूचना की तामील के फायदे का हकदार नहीं होगा, जहां वह किसी परिसर की बाबत एक बार ऐसा फायदा प्राप्त कर लेने के बाद उस परिसर की बाबत संदेय किराए और अन्य प्रभार के संदाय में फिर व्यतिक्रम करता है;
(ख) किराएदार ने 9 जून, 1952 को या उसके पश्चात् मकान मालिक की लिखित सहमति प्राप्त किए बिना, सम्पूर्ण परिसर या उसका कोई भाग उप-किराए पर दे दिया है, समनुदेशित कर दिया है या अन्यथा उस पर से अपना कब्जा छोड़ दिया है ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजन के लिए कोई ऐसा परिसर, जो कारबार या वृत्तिक प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाए जाने के लिए किराए पर दिया गया है, किराएदार द्वारा उप-किराए पर दिया गया समझा जाएगा यदि किराया प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि किराएदार ने मकान मालिक की लिखित सहमति प्राप्त किए बिना 16 अगस्त, 1958 के पश्चात् किसी व्यक्ति को पूर्ण परिसर या उसके किसी भाग का अधिभोग करने के लिए इस आधार पर दृश्यतः अनुज्ञात किया है कि ऐसा व्यक्ति कारबार या वृत्ति में किराएदार का भागीदार है जब कि उसने वास्तव में ऐसा उस व्यक्ति को ऐसा परिसर उप-किराएदारी पर देने के प्रयोजन के लिए किया है ;
(ग) किराएदार ने परिसर का उपयोग उससे भिन्न प्रयोजन के लिए किया है जिसके लिए वह उसे किराए पर दिया गया था, -
(i) यदि परिसर 9 जून, 1952 को या उसके पश्चात् मकान मालिक की लिखित सहमति प्राप्त किए बिना किराए पर दिया गया है; या
(ii) किराएदार, उसकी सहमति प्राप्त किए बिना, उसमें नहीं रह रहा है:
परंतु इस खंड के अधीन किसी परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए कोई आवेदन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि मकान मालिक ने किराएदार को उससे परिसर के दुरुपयोग को बंद करने की अपेक्षा करते हुए, विहित रीति से, सूचना नहीं दे दी हो और किराएदार ने ऐसी सूचना की तामील की तारीख से एक मास के भीतर ऐसी अपेक्षा का पालन करने से इंकार न कर दिया हो या वह उसका पालन करने में असफल न रहा हो और किराएदार के विरुद्ध बेदखली के लिए कोई आदेश ऐसे मामले में तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि किराया प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता है कि परिसर का दुरुपयोग, इस प्रकृति का है जो एक लोक न्यूसेंस है या परिसर को नुकसान पहुंचाता है या मकान मालिक के हितों के लिए अन्यथा अहितकर है ;
(घ) परिसर निवास के रूप में उपयोग के लिए किराए पर दिया गया था और-
(i) न तो किराएदार और न उसके कुटुम्ब का कोई सदस्य छह मास की अवधि से उसमें रह रहा है;
(ii) किराएदार, उसके कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए आवेदन फाइल करने की तारीख से ठीक पूर्व, किसी युक्तियुक्त कारण के बिना, दो वर्ष की अवधि से उसमें निवास नहीं कर रहा है:
परन्तु मकान मालिक, किराएदार के लिखित अनुरोध पर, किराएदार या उसके कुटुम्ब से भिन्न किसी व्यक्ति द्वारा परिसर की किराएदारी की अवधि से अनधिक के लिए अधिभोग की अनुज्ञा दे सकेगा ।
स्पष्टीकरण-इस खंड और खंड (द) के प्रयोजनों के लिए, कुटुम्ब" से माता-पिता, पति या पत्नी, आश्रित पुत्र और पुत्री या ऐसे अन्य नातेदार अभिप्रेत हैं जो मामूली तौर से किराएदार के साथ रह रहे हैं और उस पर आश्रित हैं;
(ङ) परिसर या उसका कोई भाग मानव निवास के लिए असुरक्षित या अयोग्य हो गया है और ऐसी मरम्मत कराने या पुनः सन्निर्माण के लिए, जो परिसर को खाली किए बिना नहीं की जा सकती, मकान मालिक को उसकी आवश्यकता है:
परन्तु इस खंड, खंड (छ), खंड (ज) और खंड (झ) के अधीन कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि किराया प्राधिकारी का यह समाधान नहीं हो जाता है कि, यथास्थिति, ऐसी मरम्मत या पुनः सन्निर्माण के रेखांक और प्राक्कलन उचित रूप से तैयार किए गए हैं और मकान मालिक के पास उक्त मरम्मत या पुनः सन्निर्माण करने के लिए आवश्यक साधन हैं:
परन्तु यह और कि यदि मकान मालिक पुनः सन्निर्माण के पश्चात् परिसर के उपयोग में परिवर्तन करने का प्रस्ताव करता है, तो वह कब्जे की पुनः प्राप्ति के अपने आवेदन में इस प्रकार विनिर्दिष्ट करेगा और मकान मालिक ऐसे पुनः सन्निर्माण के पश्चात् यदि ऐसा विधि के अधीन अन्यथा अनुज्ञेय है तो, मूल उपयोग के लिए पूर्व क्षेत्र के बराबर निर्मित क्षेत्र का धारा 32 की उपधारा (1) के प्रयोजन के लिए अपेक्षित सीमा तक उपयोग करेगा और शेष का किसी अन्य उपयोग के लिए;
(च) परिसर या उसके किसी भाग की सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा आदिष्ट तुरन्त ढहाए जाने के प्रयोजन के लिए मकान मालिक को आवश्यकता है अथवा परिसर की किसी सुधार स्कीम या विकास स्कीम के अनुसरण में सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी की प्रेरणा पर कोई निर्माण कार्य करने के लिए मकान मालिक को आवश्यकता है और ऐसा निर्माण कार्य परिसर खाली किए बिना नहीं किया जा सकता;
(छ) मकान मालिक को परिसर या उसके किसी भाग की ऐसी कोई मरम्मत करने के लिए आवश्यकता है जो परिसर को खाली किए बिना नहीं की जा सकती;
(ज) मकान मालिक को परिसर के निर्माण या पुनर्निर्माण या उसमें कोई सारवान् परिवर्धन या परिवर्तन करने के प्रयोजन के लिए जिसके अन्तर्गत टैरेस या अनुलग्न भूमि पर सन्निर्माण है, आवश्यकता है और ऐसा निर्माण या पुनर्निर्माण अथवा परिवर्धन या परिवर्तन परिसर को खाली किए बिना नहीं किया जा सकता;
(झ) परिसर में दो से अधिक तल नहीं हैं और उसके पुनर्निर्माण की दृष्टि से तुरन्त ढहाए जाने के प्रयोजन के लिए मकान मालिक को उसकी आवश्यकता है:
परन्तु जहां वह भवन जिसका ऐसा परिसर या वह परिसर जिसकी बाबत कब्जा खंड (ङ), खंड (च), खंड (छ) या खंड (ज) के अधीन पुनः प्राप्त किया गया है, उसका भाग है, पचहत्तर प्रतिशत से अन्यून सीमा तक पुनः निर्मित किया गया है वहां इस प्रकार बेकब्जा किए गए किराएदार को पुनः निर्मित भवन के परिसर में उस मूल परिसर के क्षेत्र के बराबर, जिसके लिए वह किराएदार था, किराएदारी के नए निबंधनों पर पुनः प्रवेश का अधिकार होगा;
(ञ) किराएदार उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री ने, जो मामूली तौर से उसके साथ रह रहा है इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या उसके पश्चात् कोई निवास-स्थान निर्मित किया है अथवा उसका खाली कब्जा अर्जित कर लिया है या वह उसे आबंटित किया गया है;
परन्तु किराया प्राधिकारी समुचित मामलों में किराएदार को परिसर ऐसी अवधि के भीतर खाली करने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा जैसी वह अनुज्ञा दे किंतु वह बेदखली का आदेश पारित किए जाने की तारीख से एक वर्ष से अधिक की नहीं होगी;
(ट) किराएदार को परिसर मकान मालिक की सेवा या नियोजन में होने के कारण निवास-स्थान के रूप में उपयोग के लिए किराए पर दिया गया था, और किराएदार, इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व या उसके पश्चात्, ऐसी सेवा या नियोजन में नहीं रह गया है:
परन्तु यदि किराया प्राधिकारी की यह राय है कि इस बारे में कोई वास्तविक विवाद नहीं है कि किराएदार मकान मालिक की सेवा या नियोजन में नहीं रह गया है तो इस आधार पर किसी परिसर का कब्जा पुनः प्राप्त करने का कोई आदेश नहीं किया जाएगा;
(ठ) किराएदार ने इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या उसके पश्चात् परिसर को पर्याप्त नुकसान पहुंचाया है या पहुंचाने दिया है या परिसर में ऐसा परिवर्तन किया है जिसका प्रभाव यह हुआ है कि उसका रूप ही बदल गया है या उसके मूल्य में कमी आ गई है ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, पर्याप्त नुकसान" से ऐसा नुकसान अभिप्रेत है जिसकी मरम्मत करने के लिए परिसर के छह मास या उससे अधिक के किराए के बराबर कोई व्यय या ऐसा कम व्यय अंतर्वलित है जिसकी बाबत किराया प्राधिकारी का नुकसान की विशेष प्रकृति को ध्यान में रखते हुए यह समाधान हो जाता है कि वह उसका पर्याप्त नुकसान माने जाने को न्यायोचित ठहराता है:
परन्तु किसी परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए कोई आदेश इस खंड में विनिर्दिष्ट आधार पर, नहीं किया जाएगा, यदि किराएदार ऐसे समय के भीतर, जो किराया प्राधिकारी द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए, पहुंचाए गए नुकसान की, किराया प्राधिकारी के समाधानप्रद रूप में; मरम्मत करा देता है या मकान मालिक को, प्रतिकर के रूप में ऐसी रकम का, जो किराया प्राधिकारी निर्दिष्ट करे, संदाय कर देता है;
(ड) किराएदार या किराएदार के साथ निवास करने वाला कोई व्यक्ति परिसर के पड़ोस में रहने वाले किसी व्यक्ति को न्यूसेंस या क्षोभ पहुंचाने के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है या परिसर का किसी अनैतिक या अवैध प्रयोजन के लिए उपयोग करने या उपयोग अनुज्ञात करने के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है;
(ढ) किराएदार ने, पूर्व सूचना होते हुए भी, सरकार या दिल्ली विकास प्राधिकरण या दिल्ली नगर निगम द्वारा उस भूमि का पट्टा देते समय, जिस पर परिसर स्थित है, मकान मालिक पर अधिरोपित किसी शर्त के प्रतिकूल रीति से परिसर का उपयोग किया है या उसके विषय में व्यवहार किया है:
परन्तु किसी परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए कोई आदेश इस आधार पर नहीं किया जाएगा यदि किराएदार, ऐसे समय के भीतर, जो किराया प्राधिकारी द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किया जाए; इस खंड में निर्दिष्ट किसी प्राधिकारी द्वारा मकान मालिक पर अधिरोपित शर्त का पालन नहीं करता है या ऐसी शर्त अधिरोपित करने वाले प्राधिकारी को प्रतिकर के रूप में ऐसी रकम का, जो किराया प्राधिकारी निर्दिष्ट करे, संदाय कर देता है;
(ण) किराएदार अपने उत्तर में मकान मालिक के स्वामित्व का प्रत्याख्यान करके उसे साबित करने में असफल रहा है या ऐसा प्रत्याख्यान सद्भाविक रीति से नहीं किया गया था;
(त) परिसर का अधिभोग करने वाला व्यक्ति यह साबित करने में असफल रहा है कि वह सद्भावपूर्वक किराएदार है;
(थ) किराएदार, मकान मालिक से परिसर खाली करने की तारीख की बाबत लिखित में करार करने या उसकी सूचना देने के पश्चात्, इस प्रकार करार की गई या सूचित की गई तारीख को या उसके पश्चात् ऐसा नहीं करता है;
(द) आवासिक या गैर-आवासिक प्रयोजनों के लिए किराए पर दिए गए परिसर की, उसी रूप में या पुनः सन्निर्माण या पुनः निर्माण के पश्चात् मकान मालिक को, यदि वह उसका स्वामी है तो, अपने लिए या अपने कुटुंब के किसी सदस्य के लिए, या किसी ऐसे व्यक्ति के लिए, जिसके फायदे के लिए वह परिसर धारित है, आवासिक या गैर-आवासिक प्रयोजन के लिए अधिभोग के लिए, आवश्यकता है और मकान मालिक या ऐसे व्यक्ति के पास उचित रूप से उपयुक्त कोई अन्य निवास-स्थान नहीं है:
परंतु जहां मकान मालिक ने परिसर अंतरण द्वारा अर्जित किया है वहां ऐसे परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए आवेदन इस खंड के अधीन तब तक नहीं किया जा सकेगा जब तक कि अर्जन की तारीख से तीन वर्ष की अवधि न बीत गई हो:
परन्तु यह और कि जहां किसी परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति का कोई आदेश इस खंड में विनिर्दिष्ट आधार पर किया जाता है वहां मकान मालिक बेदखली का आदेश पारित होने की तारीख से आवासिक परिसर की दशा में छह मास की और गैर-आवासिक परिसर का दशा में एक वर्ष की अवधि समाप्त होने पर उसका कब्जा प्राप्त करने का हकदार होगा ।
स्पष्टीकरण 1-इस खंड और धारा 23 से धारा 26 के प्रयोजनों के लिए, -
(i) जहां मकान मालिक किसी शपथ-पत्र द्वारा समर्थित अपने आवेदन में यह निवेदन करता है कि परिसर को उसे स्वयं अपने लिए या उस पर आश्रित अपने कुटुंब के किसी सदस्य के लिए आवश्यकता है तो किराया प्राधिकारी यह उपधारणा करेगा कि परिसर की इस प्रकार आवश्यकता है;
(ii) किसी विशिष्ट उपयोग या प्रयोग के लिए किराए पर दिए गए परिसर की मकान मालिक को किसी भिन्न उपयोग के लिए आवश्यकता हो सकती है, यदि ऐसा उपयोग विधि के अधीन अनुज्ञेय है ।
स्पष्टीकरण 2-इस खंड या धारा 23, धारा 24, धारा 25 या धारा 26 के प्रयोजनों के लिए, मकान मालिक द्वारा किसी ऐसे भवन के, जिसका उसके द्वारा किराए पर दिया गया कोई परिसर भाग है, किसी भाग का अधिभोग उसे ऐसे परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति के हक से वंचित नहीं करेगा ।
स्पष्टीकरण 3-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, परिसर के स्वामी" के अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति है जिसे ऐसा परिसर दिल्ली विकास प्राधिकरण या किसी अन्य स्थानीय प्राधिकारी द्वारा, अवक्रय करार या पट्टे या उपपट्टे के रूप में, यथास्थिति, ऐसे अवक्रेता, पट्टेदार या उपपट्टेदार को पूर्ण स्वामित्व अधिकार प्रोद्भूत होने के पूर्व ही, आबंटित किया गया है ।
(3) उपधारा (2) के खंड (ङ), खंड (च), खंड (छ), खंड (ज) या खंड (द) या धारा 23 या धारा 24 या धारा 25 या धारा 26 के अधीन बेदखली की किसी कार्यवाही में किराया प्राधिकारी परिसर के केवल एक भाग की बेदखली, यदि मकान मालिक उसके लिए सहमत है, अनुज्ञात कर सकेगा:
परन्तु ऐसी आंशिक बेदखली की दशा में किराएदार द्वारा संदेय किराया और अन्य प्रभार खाली किए गए भाग के अनुपात में कम कर दिए जाएंगे ।
(4) उपधारा (2) के अधीन किसी कार्यवाही में कब्जे की पुनः प्राप्ति का कोई आदेश धारा 29 में निर्दिष्ट किसी ऐसे उप-किराएदार पर, जिसने अपनी किराएदारी की सूचना उस धारा के उपबंधों के अधीन मकान मालिक को दे दी है, तब तक आबद्धकर नहीं होगा जब तक कि उप-किराएदार को उस कार्यवाही में पक्षकार नहीं बना लिया जाता है और बेदखली का आदेश उसके लिए आबद्धकर नहीं बना दिया जाता है ।
23. परिसर का तुरन्त कब्जा पुनःप्राप्त करने का अधिकार कतिपय व्यक्तियों के लिए प्रोद्भूत होना-(1) जहां किसी ऐसे व्यक्ति से, जो सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी द्वारा उसे आबंटित किसी आवासिक परिसर का अधिभोग करने वाला व्यक्ति है, उस सरकार या प्राधिकारी द्वारा किए गए किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा या उसके अनुसरण में ऐसे निवास-स्थान को खाली करने की, या उसके व्यतिक्रम में, कतिपय बाध्यताएं उपगत करने की, इस आधार पर अपेक्षा की जाती है कि, यथास्थिति, वह अथवा उसका पति या पत्नी अथवा उसका आश्रित पुत्र या पुत्री, दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में किसी निवास-स्थान की स्वामी है वहां ऐसे व्यक्ति को, इस अधिनियम में अन्यत्र, या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी (अभिव्यक्त या विवक्षित) संविदा, रूढ़ि या प्रथा में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, यथास्थिति, उसके द्वारा उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री द्वारा किराए पर दिए गए किसी परिसर का तुरंत कब्जा पुनःप्राप्त करने का अधिकार, उस आदेश की तारीख से ही प्रोद्भूत हो जाएगा :
परन्तु इस धारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि यह दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में, दो या अधिक निवास गृह के स्वामी, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति, उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री को एक से अधिक निवास गृह का कब्जा पुनःप्राप्त करने का अधिकार प्रदान करती है और, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री के लिए वह निवासगृह, जिसका कब्जा वह पुनः प्राप्त करना चाहता है, उपदर्शित करना विधिपूर्ण होगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा, धारा 24, धारा 25 और धारा 26 के प्रयोजनों के लिए तुरन्त कब्जे" से बेदखली के आदेश की तारीख से साठ दिन की समाप्ति पर पुनःप्राप्त किया जा सकने वाला कब्जा अभिप्रेत है ।
(2) जहां मकान मालिक उपधारा (1) या धारा 22, धारा 24, धारा 25 या धारा 26 द्वारा उसे प्रदत्त कब्जे की पुनः प्राप्ति के अधिकार का प्रयोग करता है और उसने-
(क) किराएदार से कोई अग्रिम किराया प्राप्त कर लिया है वहां वह उसके द्वारा परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के भीतर किराएदार को ऐसी रकम का प्रतिदाय करेगा जो संविदा, करार या पट्टे के शेष भाग के लिए संदेय किराए के बराबर हो;
(ख) कोई अन्य संदाय प्राप्त कर लिया है, वहां वह पूर्वोक्त अवधि के भीतर किराएदार को उतनी रकम का प्रतिदाय करेगा जिसका इस प्रकार प्राप्त कुल रकम से उतना अनुपात होगा जितना संविदा या करार या पट्टे के शेष भाग का संविदा, करार या पट्टे की कुल अवधि से है:
परन्तु यदि पूर्वोक्त रूप में कोई प्रतिदाय करने में कोई व्यतिक्रम किया जाता है तो मकान मालिक उस रकम पर, जिसका वह प्रतिदाय करने का लोप करता है या करने में असफल रहता है, छह प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज का संदाय करने का दायी होगा:
परन्तु यह और कि मकान मालिक के लिए यह अनुज्ञेय होगा कि वह किसी ऐसी रकम का मजुरा करे जो वह किराएदार को शोध्य प्रतिदाय मद्दे किराएदार से वसूल करने का विधिपूर्ण रूप से हकदार है ।
24. परिसर का तुरन्त कब्जा पुनः प्राप्त करने का अधिकार सशस्त्र बलों के सदस्यों आदि को प्रोद्भूत होना-(1) जहां कोई व्यक्ति, -
(क) किसी सशस्त्र बल से निर्मुक्त या सेवानिवृत्त व्यक्ति है और, यथास्थिति, उसके द्वारा अथवा, उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री द्वारा किराए पर दिए गए परिसर की उसे अपने निवास-स्थान के लिए आवश्यकता है; या
(ख) किसी सशस्त्र बल के ऐसे सदस्य का आश्रित है जो संघर्ष में मारा गया है और ऐसे सदस्य द्वारा किराए पर दिए गए परिसर की ऐसे सदस्य के कुटुम्ब के निवास-स्थान के लिए आवश्यकता है,
वहां, यथास्थिति, ऐसा व्यक्ति, उसका पति या पत्नी अथवा उसका आश्रित पुत्र या पुत्री, यथास्थिति, सशस्त्र बल से उसकी निर्मुक्ति या सेवानिवृत्ति की तारीख से या ऐसे सदस्य की मृत्यु की तारीख से एक वर्ष के भीतर अथवा इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, ऐसे परिसर का तुरंत कब्जा पुनः प्राप्त करने के लिए किराया प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगी ।
(2) जहां कोई व्यक्ति सशस्त्र बलों में से किसी का सदस्य है और उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख से पूर्व एक वर्ष से कम का समय रह गया है तथा, यथास्थिति, उसके द्वारा उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री द्वारा किराए पर दिए गए परिसर की उसे अपनी सेवानिवृत्ति के पश्चात् अपने निवास-स्थान के लिए आवश्यकता है वहां, यथास्थिति, वह, उसका पति या पत्नी अथवा उसका आश्रित पुत्र या पुत्री, उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख के पूर्व एक वर्ष की अवधि के भीतर, किसी भी समय, ऐसे परिसर का तुरंत कब्जा पुनः प्राप्त करने के लिए किराया प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगी ।
(3) जहां उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट व्यक्ति, उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री ने एक से अधिक परिसर किराए पर दिए हैं वहां चुने गए केवल एक ही परिसर की बाबत उस उपधारा के अधीन, यथास्थिति, उसको, उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री को आवेदन, करने की स्वतंत्रता होगी ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, सशस्त्र बल" से संसद् के किसी अधिनियम के अधीन गठित संघ का कोई सशस्त्र बल अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत दिल्ली पुलिस अधिनियम, 1978 (1978 का 39) की धारा 3 के अधीन गठित पुलिस बल का सदस्य है ।
25. परिसर का तुरन्त कब्जा पुनः प्राप्त करने का अधिकार केंद्रीय सरकार और राज्य सरकार के कर्मचारियों को प्रोद्भूत होना-(1) जहां कोई व्यक्ति, केन्द्रीय सरकार का या राज्य सरकार का सेवानिवृत्त कर्मचारी है और, यथास्थिति, उसके द्वारा उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री द्वारा किराए पर दिए गए परिसर की उसे अपने निवास-स्थान के लिए आवश्यकता है वहां, यथास्थिति, वह, उसका पति या पत्नी अथवा उसका आश्रित पुत्र या पुत्री, उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर अथवा इस अधिनियम के प्रारंभ होने की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर, इनमें से जो भी पश्चात्वर्ती हो, ऐसे परिसर का तुरंत कब्जा पुनः प्राप्त करने के लिए किराया प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगी ।
(2) जहां कोई व्यक्ति, केन्द्रीय सरकार का या राज्य सरकार का कर्मचारी है और उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख के पूर्व एक वर्ष से कम का समय रह गया है तथा, यथास्थिति, उसके द्वारा उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री द्वारा किराए पर दिए गए परिसर की उसे अपनी सेवानिवृत्ति के पश्चात् अपने निवास-स्थान के लिए आवश्यकता है वहां, यथास्थिति, वह, उसका पति या पत्नी अथवा उसका आश्रित पुत्र या पुत्री, उसकी सेवानिवृत्ति की तारीख के पूर्व एक वर्ष की अवधि के भीतर, किसी भी समय, ऐसे परिसर का तुरंत कब्जा पुनः प्राप्त करने के लिए किराया प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगी ।
(3) जहां उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति, उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री ने एक से अधिक परिसर किराए पर दे रखे हैं वहां चुने गए केवल एक ही परिसर की बाबत उस उपधारा के अधीन, यथास्थिति, उसे, उसके पति या पत्नी अथवा उसके आश्रित पुत्र या पुत्री को आवेदन करने की स्वतंत्रता होगी ।
26. परिसर का तुरंत कब्जा पुनः प्राप्त करने का अधिकार विधवा, विकलांग और वृद्ध व्यक्तियों को प्रोद्भूत होना-(1) जहां मकान मालिक-
(क) कोई विधवा है और उसके द्वारा या उसके पति द्वारा किराए पर दिए गए परिसर की;
(ख) कोई विकलांग व्यक्ति है और उसके द्वारा किराए पर दिए गए परिसर की;
(ग) कोई ऐसा व्यक्ति है जिसकी आयु पैंसठ वर्ष या उससे अधिक है और उसके द्वारा किराए पर दिए गए परिसर की,
उसे अपने या अपने कुटुंब या ऐसे किसी व्यक्ति के लिए जो मामूली तौर से उसके साथ रह रहा है, आवासिक या गैर-आवासिक उपयोग के लिए आवश्यकता है वहां वह ऐसे परिसर का तुरंत कब्जा पुनः प्राप्त करने के लिए किराया प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगा ।
(2) जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट मकान मालिक ने एक से अधिक परिसर किराए पर दिए हैं वहां उसके अपने द्वारा चुने गए किसी एक आवासिक और एक गैर-आवासिक परिसर की बाबत उस उपधारा के अधीन आवेदन करने की स्वतंत्रता होगी ।
स्पष्टीकरण 1-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, विकलांग व्यक्ति" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो निर्धारिती के रूप में आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 80प के अधीन कटौती के फायदों का तत्समय हकदार है ।
स्पष्टीकरण 2-इस धारा के अधीन कब्जा पुनः प्राप्त करने के अधिकार का प्रयोग, आवासिक और गैर-आवासिक उपयोग के लिए केवल एक बार ही किया जा सकेगा ।
27. बेदखली कार्यवाहियों के दौरान किराए का संदाय-(1) यदि धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (क) में निर्दिष्ट आधार से भिन्न किसी आधार पर किसी परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए किसी कार्यवाही में किराएदार बेदखली के दावे का प्रतिवाद करता है तो मकान मालिक कार्यवाही के किसी भी प्रक्रम पर किराएदार से विधिक रूप से वसूलीय किराए की रकम, मकान मालिक को संदत्त करने के लिए किराएदार को आदेश करने के लिए किराया प्राधिकारी को आवेदन कर सकेगा और किराया प्राधिकारी, पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, आदेश की तारीख से एक मास के भीतर मकान मालिक को किराए की उस दर से संगणित रकम का, जिस पर वह उस अवधि के लिए, जिसके लिए किराए की बकाया किराएदार से विधिक रूप से वसूलीय है, जिस अवधि के भीतर उस मास के पूर्व मास के अंत तक की पश्चात्वर्ती अवधि, जिसमें संदाय या जमा किया जाता है, अंतिम बार संदत्त की थी, संदाय करने या उसे किराया प्राधिकारी के पास जमा करने का और मासानुमास, प्रत्येक उत्तरवर्ती मास की पंद्रह तारीख तक उस दर पर किराए के बराबर किसी राशि का संदाय, या जमा करते रहने का निदेश देते हुए किराएदार को आदेश कर सकेगा ।
(2) यदि, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी कार्यवाही में, किराएदार द्वारा संदेय किराए की रकम के बारे में कोई विवाद है तो किराया प्राधिकारी कार्यवाही की पहली सुनवाई की तारीख से पंद्रह दिन के भीतर, परिसर के संबंध में उपधारा (1) के उपबंधों के अनुसार संदत्त या जमा किया जाने वाला अंतरिम किराया तब तक के लिए नियत करेगा जब तक कि उसके संबंध में किराया, इस अधिनियम के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए, अवधारित नहीं कर दिया जाता है और इस प्रकार अवधारित किराए के आधार पर संगणित बकाया की रकम, यदि कोई हो, किराएदार द्वारा उस तारीख से एक मास के भीतर, जिसको मानक किराया नियत किया जाता है या ऐसे अतिरिक्त समय के भीतर, जो किराया प्राधिकारी इस निमित्त अनुज्ञात करे, संदत्त या जमा किया जाएगा ।
(3) यदि, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी कार्यवाही में, उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों के बारे में कोई विवाद है जिसे या जिन्हें किराया संदेय है तो किराया प्राधिकारी, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किराएदार द्वारा संदेय रकम, अपने पास जमा करने के लिए किराएदार को निदेश दे सकेगा, और ऐसे मामले में, कोई भी व्यक्ति जमा रकम निकालने के लिए तब तक हकदार नहीं होगा जब तक कि किराया प्राधिकारी विवाद का विनिश्चय नहीं कर देता है और उसके संदाय के लिए आदेश नहीं कर देता है ।
(4) यदि किराया प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट कोई विवाद, किराएदार द्वारा ऐसे कारणों से उठाया गया है जो मिथ्या या तुच्छ है तो किराया प्राधिकारी, बेदखली के विरुद्ध प्रतिरक्षा को अपास्त करने का आदेश कर सकेगा और आवेदन की सुनवाई के लिए अग्रसर हो सकेगा ।
(5) यदि किराएदार इस धारा की अपेक्षानुसार रकम संदत्त या जमा करने में असफल रहता है तो किराया प्राधिकारी, बेदखली के विरुद्ध प्रतिरक्षा को अपास्त करने का आदेश कर सकेगा और आवेदन की सुनवाई करने के लिए अग्रसर हो सकेगा ।
28. उप-किराएदारी पर निर्बन्धन-(1) जहां 9 जून, 1952 के पूर्व किसी समय किराएदार ने कोई परिसर पूर्णतः या भागतः उप-किराए पर दिया है और उप-किराएदार, इस अधिनियम के प्रारंभ के समय, ऐसे परिसर का अधिभोग कर रहा है तो इस बात के होते हुए भी कि ऐसी उप-किराएदारी के लिए मकान मालिक की सहमति प्राप्त नहीं की गई थी, वह परिसर विधिपूर्वक उप-किराएदारी पर दिया गया समझा जाएगा ।
(2) वह परिसर, जो 9 जून, 1952 को या उसके पश्चात्, मकान मालिक की लिखित सहमति प्राप्त किए बिना, पूर्णतः या भागतः उप-किराए पर दिया गया है, विधिपूर्वक उप-किराए पर दिया गया नहीं समझा जाएगा ।
(3) इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात्, कोई भी किराएदार, मकान मालिक की लिखित पूर्व सहमति के बिना, -
(क) किराएदार के रूप में उसके द्वारा धारित संपूर्ण परिसर या उसका भाग उप-किराएदारी पर नहीं देगा, या
(ख) किराएदारी या उसके किसी भाग में अपना अधिकार अंतरित या समनुदेशित नहीं करेगा ।
29. उप-किराएदारी के सृजन और समाप्ति की सूचना-जहां, इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात्, मकान मालिक की लिखित पूर्व सहमति से किराएदार द्वारा कोई परिसर पूर्णतः या भागतः उप-किराएदारी पर दे दिया जाता है वहां ऐसा किराएदार या उप-किराएदार, जिसे परिसर उप-किराएदारी पर दिया गया है, ऐसी उप-किराएदारी की तारीख से एक मास के भीतर उप-किराएदारी के सृजन की सूचना, विहित रीति से, मकान मालिक को दे सकेगा और ऐसी उप-किराएदारी की समाप्ति के एक मास के भीतर ऐसी समाप्ति को अधिसूचित करेगा ।
30. कतिपय मामलों में उप-किराएदार का किराएदार होना-जहां किसी परिसर की बाबत किसी किराएदार के विरुद्ध धारा 22 के अधीन बेदखली का आदेश किया जाता है, किन्तु धारा 29 में निर्दिष्ट किसी उप-किराएदार के विरुद्ध ऐसा आदेश नहीं किया जाता है और मकान मालिक को उप-किराएदारी की सूचना दे दी गई है वहां उप-किराएदार के बारे में आदेश की तारीख से यह समझा जाएगा कि वह उस परिसर को, जो उसके अधिभोग में है, सीधे मकान मालिक के अधीन उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर, धारण करने वाला किराएदार बन गया है जिन पर, यदि किराएदारी चालू रहती तो किराएदार उस मकान मालिक से वह परिसर धारण करता ।
31. अधिभोग और पुनः प्रवेश के लिए कब्जे की पुनः प्राप्ति-(1) जहां कोई मकान मालिक, धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (द) के अधीन अथवा धारा 23, धारा 24, धारा 25, धारा 26 या धारा 33 के अधीन किए गए आदेश के अनुसरण में किराएदार से किसी परिसर का कब्जा पुनः प्राप्त करता है वहां मकान मालिक, संपूर्ण परिसर या उसके किसी भाग को ऐसा कब्जा प्राप्त करने की तारीख से तीन वर्ष के भीतर पुनः किराए पर किराया प्राधिकारी से विहित रीति से प्राप्त अनुज्ञा से ही देगा, अन्यथा नहीं और ऐसी अनुज्ञा प्रदान करने में, किराया प्राधिकारी परिसर का कब्जा ऐसे बेदखल किए गए किराएदार को देने के लिए मकान मालिक को निदेश दे सकेगा :
परन्तु जहां कोई मकान मालिक, धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (द) के अधीन किए गए आदेश के अनुसरण में किराएदार से किसी परिसर का कब्जा पुनःसन्निर्माण या पुनः निर्माण के पश्चात् अधिभोग के लिए पुनः प्राप्त करता है वहां तीन वर्ष की अवधि की गणना, यथास्थिति, पुनःसन्निर्माण या पुनः निर्माण के पूरा होने की तारीख से की जाएगी ।
(2) जहां कोई मकान मालिक, किसी परिसर का पूर्वोक्त रूप में कब्जा पुनः प्राप्त करता है और मकान मालिक द्वारा या उस व्यक्ति द्वारा, जिसके फायदे के लिए परिसर धारित है, ऐसा कब्जा प्राप्त करने के दो मास के भीतर वह परिसर अधिभोग में नहीं लिया जाता है या इस प्रकार अधिभोग में लिए जाने पर वह परिसर, कब्जा प्राप्त करने की तारीख से तीन वर्ष के भीतर किसी भी समय, उपधारा (1) के अधीन किराया प्राधिकारी की अनुज्ञा प्राप्त किए बिना, बेदखल किराएदार से भिन्न किसी व्यक्ति को पुनः किराए पर दे दिया जाता है या ऐसे परिसर का कब्जा, ऐसे कारणों से जो किराया प्राधिकारी को सद्भाविक प्रतीत नहीं होते हों, किसी अन्य व्यक्ति को अंतरित कर दिया जाता है वहां किराया प्राधिकारी, इस प्रकार बेदखल किराएदार द्वारा, ऐसे समय के भीतर, जो विहित किया जाए, इस निमित्त उसके समक्ष आवेदन किए जाने पर, किराएदार को उन्हीं निबन्धनों और शर्तों पर, यदि परिसर उसी रूप में है अथवा नए निबन्धनों और शर्तों पर यदि परिसर पुनः निर्मित किया गया है, और यदि उसने पहले ही दूसरा परिसर पुनःसन्निर्मित नहीं करा लिया है, उसका खाली कब्जा प्राप्त नहीं कर लिया है या उसे दूसरा परिसर आबंटित नहीं कर दिया गया है तो, परिसर का कब्जा देने के लिए या उसे ऐसा प्रतिकर का संदाय करने के लिए, जैसा किराया प्राधिकारी ठीक समझे या दोनों के लिए जैसा कि मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में अपेक्षित हो, मकान मालिक को निदेश दे सकेगा ।
32. मरम्मत और पुनः निर्माण के लिए कब्जे की पुनः प्राप्ति और पुनः प्रवेश-(1) धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (ङ), खंड (च), खंड (छ), खंड (ज) या खंड (झ) में विनिर्दिष्ट आधारों पर कोई आदेश करने में, किराया प्राधिकारी, नया किराया नियत करेगा और किराएदार से यह सुनिश्चित करेगा कि क्या वह उस परिसर या उसके उस भाग का, जिससे उसे बेदखल किया जाना है, अधिभोग प्राप्त करने का चयन करता है और यदि किराएदार इस प्रकार चयन करता है तो किराया प्राधिकारी आदेश में ऐसे चयन के तथ्य को अभिलिखित करेगा और उसमें वह तारीख, जिसको या जिसके पूर्व वह कब्जा देगा, जिससे कि मकान मालिक को, यथास्थिति, मरम्मत या निर्माण या पुनः निर्माण कार्य प्रारंभ करने में समर्थ बनाया जा सके और वह तारीख, जिसके पूर्व मकान मालिक उक्त परिसर का कब्जा देगा, विनिर्दिष्ट करेगा ।
(2) यदि किराएदार, आदेश में विनिर्दिष्ट तारीख को या उसके पूर्व कब्जा दे देता है तो मकान मालिक, मरम्मत या निर्माण या पुनः निर्माण कार्य पूरा होने पर उस परिसर या उसके भाग का अधिभोग उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट तारीख या ऐसी बढ़ाई गई तारीख के पूर्व जो किराया प्राधिकारी आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, किराएदार को देगा ।
(3) यदि, आदेश में विनिर्दिष्ट तारीख को या उसके पूर्व किराएदार द्वारा कब्जा दिए जाने के पश्चात्, मकान मालिक विनिर्दिष्ट तारीख के तीन मास के भीतर, मरम्मत या निर्माण या पुनः निर्माण कार्य प्रारंभ करने में असफल रहता है तो किराया प्राधिकारी, किराएदार द्वारा, इस निमित्त उसे आवेदन किए जाने पर ऐसे समय के भीतर जो विहित किया जाए, उस परिसर को उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर किराएदार के अधिभोग में देने का और किराएदार को ऐसे प्रतिकर का, जो किराया प्राधिकारी ठीक समझे, संदाय करने का, मकान मालिक को आदेश कर सकेगा ।
(4) यदि, किराएदार ने आदेश में विनिर्दिष्ट तारीख को या उसके पूर्व कब्जा दे दिया है और मकान मालिक उपधारा (2) के अनुसार, यथास्थिति, मरम्मत, निर्माण या पुनः निर्माण के पश्चात् परिसर को किराएदार के अधिभोग में देने में असफल रहता है तो किराया प्राधिकारी, किराएदार द्वारा इस निमित्त उसे आवेदन किए जाने पर, ऐसे समय के भीतर जो विहित किया जाए, परिसर को पुनरीक्षित निबंधनों और शर्तों पर किराएदार के अधिभोग में देने का और किराएदार को ऐसे प्रतिकर का जो किराया प्राधिकारी ठीक समझे, मकान मालिक को संदाय करने का आदेश कर सकेगा ।
33. सीमित अवधि वाली किराएदारियों की दशा में कब्जे की पुनः प्राप्ति-(1) जहां मकान मालिक को संपूर्ण परिसर या उसके किसी भाग की किसी विशेष अवधि के लिए आवश्यकता नहीं है, और वह, किराया प्राधिकारी की विहित रीति से अनुज्ञा प्राप्त करने के पश्चात्, संपूर्ण परिसर या उसके किसी भाग को निवास-स्थान के रूप में ऐसी अवधि के लिए, जो पांच वर्ष से अधिक की नहीं होगी और जो मकान मालिक और किराएदार के बीच लिखित रूप में करार पाई जाए, किराए पर देता है और किराएदार उक्त अवधि की समाप्ति पर, ऐसे परिसर को खाली नहीं करता है, वहां, धारा 22 में या किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किराया प्राधिकारी, मकान मालिक द्वारा ऐसे समय के भीतर जो विहित किया जाए, इस निमित्त उसे आवेदन किए जाने पर, किराएदार को और प्रत्येक अन्य व्यक्ति को, जिसके अधिभोग में ऐसा परिसर हो, बेदखल करके उस खाली परिसर या उसके भाग का कब्जा मकान मालिक को दिला सकेगा ।
(2) किराया प्राधिकारी, -
(i) किसी परिसर के संबंध में उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा, अच्छे और पर्याप्त कारणों के बिना, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, निरंतर दो बार से अधिक नहीं देगा ।
स्पष्टीकरण-उपधारा (1) के अधीन दी गई अनुज्ञा का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह निरंतर है यदि अंतिम सीमित किराएदारी की अवधि की समाप्ति के पश्चात् पांच वर्ष या उससे अधिक की अवधि बीत गई है ;
(ii) किराएदार से ऐसा कोई आवेदन ग्रहण नहीं करेगा जिसमें इस धारा के अधीन परिसर को किराए पर देने के मकान मालिक की सद्भावना को प्रश्नगत किया गया है ।
(3) किराएदार द्वारा किराया प्राधिकारी के समक्ष किए गए सभी आवेदनों और अधिकरण के समक्ष की गई अपीलों का, ऐसी अवधि की समाप्ति पर जिसके लिए उपधारा (1) के अधीन अनुज्ञा दी गई है, उपशमन हो जाएगा ।
(4) उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश करते समय किराया प्राधिकारी, मकान मालिक को ऐसे आदेश की तारीख से किराएदार द्वारा परिसर को वस्तुतः खाली करने की तारीख तक की अवधि के लिए, परिसर के उपयोग या अधिभोग के लिए किराएदार द्वारा अंतिम संदत्त किराए से दुगुनी नुकसानी और साथ ही पन्द्रह प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से ब्याज दिलवा सकेगा ।
34. कतिपय दशाओं में कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए विशेष उपबंध-जहां किसी परिसर की बाबत मकान मालिक कोई कम्पनी या अन्य निगमित निकाय या कोई लोक संस्था है वहां, धारा 22 में या किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किराया प्राधिकारी, ऐसे मकान मालिक द्वारा इस निमित्त उसे आवेदन किए जाने पर, ऐसे खाली परिसर का कब्जा किराएदार को और प्रत्येक अन्य व्यक्ति को, जिसके अधिभोग में वह परिसर है, बेदखल करके मकान मालिक को दिला सकेगा, यदि किराया प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि,-
(क) वह किराएदार जिसे ऐसा परिसर उस समय निवास-स्थान के रूप में उपयोग के लिए किराए पर दिया गया था, जब वह मकान मालिक की सेवा या नियोजन में था, ऐसी सेवा या नियोजन में नहीं रह गया है और परिसर की ऐसे मकान मालिक के कर्मचारियों के उपयोग के लिए आवश्यकता है; या
(ख) उस किराएदार ने उस अभिव्यक्त या विवक्षित निबन्धनों के उल्लंघन में कार्य किया है, जिसके अधीन उसे ऐसे परिसर का अधिभोग करने के लिए प्राधिकृत किया गया था; या
(ग) ऐसा परिसर किसी अन्य व्यक्ति के अप्राधिकृत अधिभोग में है; या
(घ) मकान मालिक द्वारा अपने कर्मचारियों के उपयोग के लिए या किसी लोक संस्था की दशा में, अपने क्रियाकलापों को अग्रसर करने के लिए परिसर की वास्तविक आवश्यकता है ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, लोक संस्था" के अन्तर्गत शैक्षणिक संस्था, पुस्तकालय, चिकित्सालय और पूर्त औषधालय है्, किन्तु इसके अन्तर्गत किसी प्राइवेट न्यास द्वारा स्थापित ऐसी कोई संस्था नहीं है ।
35. अतिरिक्त संरचनाओं का सन्निर्माण करने की अनुज्ञा-जहां कोई मकान मालिक ऐसे किसी भवन में कोई सुधार करने या उस पर कोई अतिरिक्त संरचना सन्निर्मित करने का प्रस्ताव करता है, जो भवन किराएदार को किराए पर दिया गया है और किराएदार ऐसा कोई सुधार या ऐसी अतिरिक्त संरचना सन्निर्मित करने के लिए मकान मालिक को अनुज्ञात करने से इंकार करता और किराया प्राधिकारी का, मकान मालिक द्वारा इस निमित्त उसे आवेदन किए जाने पर, यह समाधान हो जाता है कि मकान मालिक कार्य प्रारंभ करने के लिए तैयार और रजामंद है और ऐसा कार्य किराएदार को कोई असम्यक् कष्ट नहीं पहुंचाएगा वहां किराया प्राधिकारी ऐसा कार्य करने के लिए मकान मालिक को अनुज्ञात कर सकेगा और ऐसा अन्य आदेश कर सकेगा जो वह मामले की परिस्थितियों में ठीक समझे ।
36. खाली भवन स्थलों के संबंध में विशेष उपबंध-धारा 22 में किसी बात के होते हुए भी, जहां ऐसे किसी परिसर में, जो किराए पर दिया गया है, ऐसी भूमि समाविष्ट है जिस पर, तत्समय प्रवृत्त, भवन निर्माण विनियमों या नगरपालिक उपविधियों के अधीन कोई भवन, चाहे निवास-स्थान के रूप में या किसी अन्य प्रयोजन के लिए, बनाना अनुज्ञेय है और ऐसा भवन बनाने का प्रस्ताव करने वाला मकान मालिक, किराएदार से करार द्वारा उस भूमि का कब्जा प्राप्त करने में असमर्थ है और किराया प्राधिकारी का, मकान मालिक द्वारा इस निमित्त उसे आवेदन किए जाने पर, यह समाधान हो जाता है कि मकान मालिक कार्य प्रारंभ करने के लिए तैयार और रजामंद है और शेष खाली परिसर से भूमि का पृथक्करण किराएदार को कोई असम्यक् कष्ट नहीं पहुंचाएगा वहां किराया प्राधिकारी,-
(क) ऐसे पृथक्करण का निदेश दे सकेगा;
(ख) मकान मालिक को खाली भूमि का कब्जा दिला सकेगा;
(ग) शेष परिसर के बारे में किराएदार द्वारा संदेय किराए का अवधारण कर सकेगा; और
(घ) ऐसा अन्य आदेश कर सकेगा, जो वह मामले की परिस्थितियों में ठीक समझे ।
37. मकान मालिक को खाली परिसर का कब्जा-किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी परिसर में किराएदार का हित किसी भी कारण से अवधारित किया जाता है और किराया प्राधिकारी द्वारा ऐसे परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए इस अधिनियम के अधीन आदेश किया जाता है वहां ऐसा आदेश, धारा 30 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उन सभी व्यक्तियों पर, जिनके अधिभोग में वह परिसर है, आबद्धकर होगा और उस खाली परिसर का कब्जा, ऐसे व्यक्तियों को उससे बेदखल करके मकान मालिक को दिया जाएगा :
परन्तु इस धारा की कोई भी बात ऐसे किसी व्यक्ति को लागू नहीं होगी जिसका ऐसे परिसर पर स्वतंत्र हक है ।
अध्याय 5
होटल और वासा
38. अध्याय का लागू होना-इस अध्याय के उपबंध उन क्षेत्रों के सभी होटलों और वासों को लागू होंगे जिन्हें केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे:
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी वर्ग के होटलों या वासों को इस अध्याय के उपबंधों को लागू करना लोक हित में वांछनीय नहीं होगा तो वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे वर्ग के होटलों और वासों को इस अध्याय के प्रवर्तन से छूट दे सकेगी ।
39. उचित दर नियत करना-(1) जहां किराया प्राधिकारी के पास, लिखित परिवाद पर या अन्यथा, यह विश्वास करने का कारण है कि किसी होटल या वासा में उपलब्ध कराए गए भोजन या आवास या किसी अन्य सेवा के लिए, किए जाने वाले प्रभार अत्यधिक हैं, वहां वह होटल या वासा में उपलब्ध कराए गए भोजन, आवास या अन्य सेवाओं के लिए प्रभारित की जाने वाली उचित दर नियत कर सकेगा और ऐसी उचित दर नियत करने में आवास, भोजन या अन्य सेवाओं के लिए अलग-अलग दर विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
(2) किराया प्राधिकारी, उपधारा (1) के अधीन उचित दर का अवधारण करने में, मामले की परिस्थितियों को और 1 जून, 1951 के ठीक पूर्ववर्ती बारह मास के दौरान, उसी या वैसी ही वास-सुविधा, भोजन और सेवा के लिए प्रभारों की प्रवृत्त दर को, और उस तारीख के पश्चात् निर्वाह व्यय में किसी सामान्य वृद्धि को ध्यान में रखेगा ।
40. उचित दर का पुनरीक्षण-किराया प्राधिकारी, किसी होटल के प्रबंधक या वासा के स्वामी के लिखित आवेदन पर या अन्यथा, समय-समय पर, किसी होटल या वासा में भोजन, निवास या अन्य सेवाओं के लिए प्रभारित की जाने वाली उचित दर का पुनरीक्षण कर सकेगा, और ऐसी दर नियत कर सकेगा जो वह, निर्वाह व्यय में सामान्य वृद्धि या गिरावट को ध्यान में रखते हुए, जो उचित दर नियत करने के पश्चात् हुई हो, ठीक समझे ।
41. उचित दर से अधिक प्रभारों का वसूलीय न होना-जब किराया प्राधिकारी, किसी होटल या वासा की बाबत प्रभारों की उचित दर अवधारित कर देता है तब, -
(क) यथास्थिति, होटल का प्रबंधक या वासा का स्वामी उचित दर से अधिक कोई रकम प्रभारित नहीं करेगा और किराया प्राधिकारी की पूर्व लिखित अनुज्ञा के बिना, वास करने वाले से, ऐसी किसी रियायत या सेवा को प्रत्याहृत नहीं करेगा जो उस समय दी जा रही थी जब किराया प्राधिकारी ने उचित दर अवधारित की थी;
(ख) ऐसी उचित दर से अधिक किन्हीं प्रभारों के संदाय के लिए कोई करार ऐसे आधिक्य की बाबत शून्य होगा और उसके बारे में इस प्रकार अर्थ लगाया जाएगा मानो वह करार उक्त उचित दर के संदाय के लिए हो;
(ग) वास करने वाले द्वारा उचित दर से अधिक संदत्त कोई रकम, संदाय की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर, किसी भी समय, होटल प्रबंधक या वासा के स्वामी या उसके विधिक प्रतिनिधि से वास करने वाले व्यक्ति द्वारा वसूलीय होगी और वसूली के किसी अन्य ढंग पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, वास करने वाले द्वारा ऐसे प्रबंधक या स्वामी को संदेय रकम में से उसके द्वारा काटी जा सकेगी ।
42. होटल के प्रबंधक या वासा के स्वामी द्वारा कब्जे की पुनः प्राप्ति-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, किसी होटल का प्रबंधक या वासा का स्वामी, उसके द्वारा वास करने वाले किसी व्यक्ति को उपलब्ध कराई गई वास सुविधा का कब्जा, किराया प्राधिकारी से यह प्रमाणित करने वाला प्रमाणपत्र प्राप्त करने के पश्चात्, पुनः प्राप्त करने का हकदार होगा कि, -
(क) वास करने वाला ऐसे आचरण का दोषी है जो न्यूसेंस है या जो किसी पार्श्व या पड़ोस में वास करने वाले को क्षोभ पहुंचाता है ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, न्यूसेंस" के बारे में यह समझा जाएगा कि इसके अंतर्गत ऐसा कोई कार्य है जो अनैतिक व्यापार (निवारण) अधिनियम, 1956 (1956 का 104) के अधीन अपराध है;
(ख) यथास्थिति, होटल या वासा के स्वामी को उस वास-सुविधा की या तो अपने अधिभोग के लिए या ऐसे किसी व्यक्ति के अधिभोग के लिए जिसके फायदे के लिए वह वास-सुविधा धारित है या ऐसे किसी अन्य कारण से जिसे किराया प्राधिकारी समाधानप्रद समझे, उस वास-सुविधा की युक्तियुक्त रूप से और वास्तविक रूप से आवश्यकता है;
(ग) वास करने वाला उस वास-सुविधा की बाबत करार की अवधि की समाप्ति पर उसे खाली करने में असफल रहा है;
(घ) वास करने वाले ने ऐसा कोई कार्य किया है जो उस प्रयोजन से असंगत है जिसके लिए वास-सुविधा उसे दी गई थी या जो उसमें स्वामी के हित को प्रतिकूलतः या सारतः प्रभावित कर सकता है:
(ङ) वास करने वाला उससे देय किराए का संदाय करने में असफल रहा है ।
अध्याय 6
किराया प्राधिकारी
43. किराया प्राधिकारियों और अपर किराया प्राधिकारियों की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उतने किराया प्राधिकारी नियुक्त कर सकेगी जितने वह ठीक समझे, और उन स्थानीय सीमाओं को या उन होटलों और वासों को परिनिश्चित कर सकेगी जिनके भीतर या जिनकी बाबत प्रत्येक किराया प्राधिकारी, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन और धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (ग) से खंड (झ) के अंतर्गत आने वाले परिसरों और किराएदारी से संबंधित सभी किराएदारी मामलों की बाबत सम्पत्ति अन्तरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) द्वारा या उसके अधीन किराया प्राधिकारियों को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करेगा, और उन पर अधिरोपित कर्तव्यों का पालन करेगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उतने अपर किराया प्राधिकारी भी नियुक्त कर सकेगी जितने वह ठीक समझे और अपर किराया प्राधिकारी, किराया प्राधिकारी के ऐसे कृत्यों का पालन करेगा जो, केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन रहते हुए, उसे किराया प्राधिकारी लिखित रूप में समनुदेशित करे और इन कृत्यों के निर्वहन में, अपर किराया प्राधिकारी को वही शक्तियां प्राप्त होंगी और वह उन्हीं शक्तियों का प्रयोग करेगा तथा उन्हीं कर्तव्यों का निर्वहन करेगा जो किराया प्राधिकारी को प्राप्त हैं या उसकी हैं ।
(3) कोई व्यक्ति किराया प्राधिकारी या अपर किराया प्राधिकारी के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह भारत में कम से कम दस वर्ष तक न्यायिक पद धारण कर चुका है या वह भारत में अधिवक्ता या प्लीडर के रूप में कम से कम दस वर्ष तक विधि व्यवसाय करता रहा है ।
44. किराया प्राधिकारी की शक्तियां-(1) किराया प्राधिकारी, -
(क) अपने समक्ष लंबित किसी कार्यवाही को निपटाने के लिए किसी अपर किराया प्राधिकारी को अंतरित कर सकेगा, या
(ख) किसी अपर किराया प्राधिकारी के समक्ष लंबित किसी कार्यवाही को अपने पास मंगा सकेगा और उसको स्वयं निपटा सकेगा या कार्यवाही को निपटारे के लिए किसी अन्य अपर किराया प्राधिकारी को अंतरित कर सकेगा ।
(2) किराया प्राधिकारी को निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्:-
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;
(घ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए,
और किराया प्राधिकारी के समक्ष कोई कार्यवाही, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में और धारा 196 के प्रयोजन के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी, और किराया प्राधिकारी, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 के प्रयोजन के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा किन्तु उसके अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए नहीं ।
(3) इस अधिनियम के अधीन कोई जांच करने या किसी कर्तव्य का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए, किराया प्राधिकारी, -
(क) चौबीस घंटे से अन्यून की लिखित सूचना देने के पश्चात्, सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच किसी भी समय, किसी परिसर में प्रवेश और उसका निरीक्षण कर सकेगा या अपने अधीनस्थ किसी अधिकारी को प्रवेश या निरीक्षण करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा; या
(ख) लिखित आदेश द्वारा, किसी व्यक्ति को अपने निरीक्षण के लिए सभी ऐसे लेखे, बहियां या अन्य दस्तावेज, जो जांच से सुसंगत हों, ऐसे समय और ऐसे स्थान पर, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, तो पेश करने की अपेक्षा कर सकेगा ।
(4) किराया प्राधिकारी, यदि वह ठीक समझता है तो, विचाराधीन विषय का विशेष ज्ञान रखने वाले एक या अधिक व्यक्तियों को अपने समक्ष किसी कार्यवाही में अपने को सलाह देने के लिए, असेसर या असेसरों के रूप में नियुक्त कर सकेगा ।
(5) इस अधिनियम के अधीन किराया प्राधिकारी द्वारा अधिरोपित कोई जुर्माना उस व्यक्ति द्वारा, जिस पर जुर्माना किया गया है, ऐसे समय के भीतर, जो किराया प्राधिकारी द्वारा अनुज्ञात किया जाए, संदत्त किया जाएगा और किराया प्राधिकारी, अच्छे और पर्याप्त कारण से, उस समय को बढ़ा सकेगा और ऐसे संदाय के व्यतिक्रम में, वह रकम दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंधों के अधीन जुर्माने के रूप में वसूलीय होगी, तथा किराया प्राधिकारी, ऐसी वसूली के प्रयोजनों के लिए उक्त संहिता के अधीन मजिस्ट्रेट समझा जाएगा ।
(6) इस अधिनियम के अधीन किराया प्राधिकारी या अधिकरण द्वारा निकाला गया कोई आदेश या नियंत्रक द्वारा निकाला गया कोई आदेश या दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (1958 का 59) के अधीन अपील में पारित किया गया कोई आदेश, इस निमित्त अधिकरण द्वारा अभिहित किराया प्राधिकारी द्वारा निष्पादनीय होगा और इस प्रकार अभिहित किराया प्राधिकारी को इस प्रयोजन के लिए सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी ।
45. किराया प्राधिकारी द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया-(1) किराया प्राधिकारी इस अधिनियम के अधीन ऐसा कोई भी आदेश, जो किसी व्यक्ति पर प्रतिकूल प्रभाव डालता है, तब तक नहीं करेगा जब तक कि प्रस्तावित आदेश के विरुद्ध उस व्यक्ति को हेतुक दर्शित करने का युक्तियुक्त अवसर नहीं दे दिया जाता है और जब तक कि उसके आक्षेपों पर, यदि कोई हों, और ऐसे किसी साक्ष्य पर जो वह उसके समर्थन में पेश करे, किराया प्राधिकारी द्वारा विचार नहीं कर लिया जाता है ।
(2) ऐसे किन्हीं नियमों के जो इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएं और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, किराया प्राधिकारी, अपने समक्ष किसी कार्यवाही में जांच करते समय जिसके अंतर्गत साक्ष्य अभिलिखित करना है, लघुवाद न्यायालय की पद्धति और प्रक्रिया का, जहां तक हो सके, पालन करेगा ।
(3) किराया प्राधिकारी, साधारणतया, पूरी कार्यवाही में किसी पक्षकार के अनुरोध पर तीन से अधिक स्थगन अनुज्ञात नहीं करेगा और उस दशा में जब वह ऐसा करने का विनिश्चय करता है तब वह उसके कारणों के बारे में अध्यक्ष को सूचित करेगा तथा अन्य पक्षकार को उचित खर्च के संदाय का आदेश देगा ।
(4) किराया प्राधिकारी, इस अधिनियम के अधीन प्रत्येक आवेदन के संबंध में, अनुसूची 4 में विनिर्दिष्ट प्ररूप में, समन जारी करेगा ।
(5) किराया प्राधिकारी, विरोधी पक्षकार पर तामील के लिए समन जारी करने के अतिरिक्त और उसके साथ-साथ, यह भी निदेश दे सकेगा कि उस समन की तामील, विरोधी पक्षकार के या ऐसी तामील स्वीकार करने के लिए सशक्त उसके अभिकर्ता के उस स्थान के पते पर, जहां विरोधी पक्षकार या उसका अभिकर्ता वास्तव में और स्वेच्छा से निवास करता है या कारबार करता है या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है, रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा की जाए और, यदि मामले की परिस्थितियों में ऐसा आवश्यक है तो यह भी निदेश दे सकेगा कि समन, उस क्षेत्र में परिचालित किसी समाचारपत्र में प्रकाशित किया जाए जहां यह ज्ञात है कि विरोधी पक्षकार अंतिम बार निवास करता था या कारबार करता था या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता था ।
(6) जब विरोधी पक्षकार या उसके अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षर की गई तात्पर्यित अभिस्वीकृति किराया प्राधिकारी को प्राप्त होती है या वह रजिस्ट्रीकृत वस्तु, जिसमें समन था, डाक कर्मचारी द्वारा किए गए तात्पर्यित इस आशय के पृष्ठांकन के सहित वापस प्राप्त होती है कि विरोधी पक्षकार या उसके अभिकर्ता ने रजिस्ट्रीकृत वस्तु को लेने से इंकार कर दिया है तो किराया प्राधिकारी यह घोषित कर सकेगा कि समन की विधिमान्य तामील हो गई है ।
(7) (क) धारा 21 के अधीन आवेदन का निपटारा इस उपधारा में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार किया जाएगा ।
(ख) किराया प्राधिकारी आवेदन फाइल किए जाने के सात दिन के भीतर उसकी सुनवाई प्रारम्भ करेगा और ऐसी सुनवाई के प्रारम्भ से तीस दिन के भीतर उसका निपटारा करेगा । सुनवाई के ऐसे प्रारम्भ होने या ऐसे समय के भीतर निपटारा न होने पर किराया प्राधिकारी, उसके कारणों के बारे में अधिकरण के अध्यक्ष को सूचित करेगा ।
(8) (क) धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (ङ) या खंड (च) या खंड (द) में अथवा धारा 23 के अधीन या धारा 24 के अधीन या धारा 25 के अधीन या धारा 26 के अधीन या धारा 33 के अधीन विनिर्दिष्ट आधार पर किसी परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए मकान मालिक द्वारा किए गए प्रत्येक आवेदन पर इस उपधारा में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार कार्यवाही की जाएगी ।
(ख) वह किराएदार, जिस पर अनुसूची 4 में विनिर्दिष्ट प्ररूप में (चाहे सामान्य रीति से या रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा) समन की सम्यक्तः तामील कर दी जाती है, परिसर से बेदखली के लिए की गई प्रार्थना का तब तक प्रतिवाद नहीं करेगा जब तक कि वह उन आधारों का, जिन पर वह बेदखली के लिए आवेदन का प्रतिवाद करना चाहता है, कथन करते हुए शपथपत्र फाइल नहीं कर देता है और किराया प्राधिकारी से इसमें इसके पश्चात् उपबंधित रीति से इजाजत प्राप्त नहीं कर लेता है और समन के अनुसरण में उसके हाजिर होने में या ऐसी इजाजत प्राप्त करने में उसके व्यतिक्रम की दशा में, मकान मालिक द्वारा बेदखली के लिए आवेदन में किया गया कथन किराएदार द्वारा स्वीकार किया गया समझा जाएगा और आवेदक पूर्वोक्त आधार पर बेदखली के आदेश के लिए हकदार होगा ।
(ग) किराया प्राधिकारी, किराएदार को आवेदन कर प्रतिवाद करने के लिए इजाजत देगा, यदि किराएदार द्वारा फाइल किया गया शपथपत्र ऐसे तथ्यों को प्रकट करता है जो मकान मालिक को परिसर के कब्जे की पुनः प्राप्ति का आदेश प्राप्त करने के हक से वंचित करता है ।
(घ) जहां आवेदन का प्रतिवाद करने के लिए किराएदार को इजाजत दी जाती है वहां किराया प्राधिकारी आवेदन की सुनवाई ऐसी इजाजत देने से सामान्यतया सात दिन के भीतर प्रारंभ करेगा और दिन-प्रतिदिन सुनवाई की व्यवस्था करेगा तथा ऐसी सुनवाई के प्रारंभ से तीस दिन के भीतर आवेदन का निपटारा करेगा । उक्त समय के भीतर ऐसी सुनवाई का प्रारंभ करने या आवेदन का निपटारा करने में असफल रहने पर किराया प्राधिकारी, उसके कारणों के बारे में अधिकरण के अध्यक्ष को सूचित करेगा ।
(ङ) जहां किराएदार को खण्ड (ग) के अधीन आवेदन का प्रतिवाद करने की इजाजत देने का प्रत्याख्यान किया जाता है वहां किराएदार ऐसे प्रत्याख्यान से दस दिन के भीतर किराया प्राधिकारी के समक्ष पुनर्विलोकन के लिए आवेदन फाइल कर सकेगा और किराया प्राधिकारी ऐसा आवेदन फाइल किए जाने के सात दिन के भीतर उसका निपटारा करने का प्रयास करेगा ।
(9) किराया प्राधिकारी को किए गए प्रत्येक आवेदन की सुनवाई, यथासंभव शीघ्रता से की जाएगी और उपधारा (7) और उपधारा (8) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, इस बात का प्रयास किया जाएगा कि सुनवाई और आवेदन का निपटारा, उसके पेश किए जाने के छह मास के भीतर पूरा हो जाए ।
(10) किराया प्राधिकारी अपने समक्ष सभी कार्यवाहियों में खर्चे के प्रश्न पर विचार करेगा और किसी पक्षकार को या उसके विरुद्ध ऐसा खर्च अधिनिर्णीत करेगा जो वह किराया प्राधिकारी युक्तियुक्त समझे ।
अध्याय 7
दिल्ली किराया अधिकरण
46. दिल्ली किराया अधिकरण की स्थापना-केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अधिकरण को प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक अधिकरण की स्थापना करेगी, जिसका नाम दिल्ली किराया अधिकरण होगा ।
47. अधिकरण और उसके न्यायपीठों की संरचना-(1) अधिकरण एक अध्यक्ष और तीन से अन्यून उतने अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा जितने केन्द्रीय सरकार ठीक समझे और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग उसके न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा ।
(2) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, न्यायपीठ एक या एक से अधिक ऐसे सदस्यों से मिलकर बनेगा जो अध्यक्ष उन नियमों के अनुसार जो विहित किए जाएं, विनिश्चित करे ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष किसी सदस्य का एक न्यायपीठ से दूसरे न्यायपीठ को स्थानान्तरण कर सकेगा ।
(4) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण के न्यायपीठ साधारणतया दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र में ऐसे स्थानों पर अधिविष्ठ होंगे जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।
48. अध्यक्ष और सदस्यों के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) कोई व्यक्ति, अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब, -
(क) वह किसी उच्च न्यायालय का न्यायधीश है या रहा है; या
(ख) उसने कम से कम तीन वर्ष तक सदस्य का पद धारण किया है; या
(ग) भारतीय विधि सेवा का सदस्य है या रहा है और उसने उस सेवा की श्रेणी 1 का पद कम से कम तीन वर्ष तक धारण किया है; या
(घ) उसने किसी राज्य सरकार के विधि विभाग में सचिव का पद कम से कम तीन वर्ष तक धारण किया है ।
(2) कोई व्यक्ति, सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा, जब, -
(क) उसने किराया प्राधिकारी का पद कम से कम आठ वर्ष तक धारण किया है; या
(ख) जिला न्यायाधीश का पद कम से कम पांच वर्ष तक धारण किया है; या
(ग) वह भारतीय विधि सेवा की श्रेणी 1 का सदस्य है या रहा है; या
(घ) उसने किसी राज्य सरकार के विधि विभाग में सचिव का पद कम से कम दो वर्ष तक धारण किया है; या
(ङ) कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता रहा है ।
(3) उपधारा (4) और उपधारा (5) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण का अध्यक्ष और अन्य सदस्य, राष्ट्रपति द्वारा, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात्, नियुक्त किए जाएंगे ।
(4) अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की नियुक्ति, भारत के राष्ट्रपति द्वारा केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्: -
(क) दिल्ली उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति या उसका नामनिर्देशिती, जो उच्च न्यायालय का कोई आसीन न्यायाधीश होगा;
(ख) अधिकरण का अध्यक्ष (सिवाय अध्यक्ष की नियुक्ति की दशा में);
(ग) भारत सरकार के विधि कार्य से संबंधित मंत्रालय का सचिव;
(घ) भारत सरकार के शहरी विकास से संबंधित मंत्रालय का सचिव;
(ङ) दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन का मुख्य सचिव ।
(5) चयन समिति, उस प्रक्रिया के अनुसार, जो विहित की जाए, उन व्यक्तियों में से जो शहरी विकास मंत्रालय द्वारा भारत सरकार के न्याय विभाग के परामर्श से तैयार की गई अभ्यर्थियों की सूची में है, अध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए किसी व्यक्ति की सिफारिश करेगी ।
49. पदावधि-अध्यक्ष, या कोई अन्य सदस्य, अपने पद ग्रहण की तारीख से, पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा किंतु पांच वर्ष की और अवधि के लिए पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा:
परन्तु अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य-
(क) अध्यक्ष की दशा में, पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात्; और
(ख) किसी अन्य सदस्य की दशा में, बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात्,
उस हैसियत में अपना पद धारण नहीं करेगा ।
50. कतिपय परिस्थितियों में ज्येष्ठतम सदस्य का अध्यक्ष के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन करना-(1) अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग या अन्य कारण से उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में, ज्येष्ठतम सदस्य उस तारीख तक अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा जिस तारीख को ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार नियुक्त नया अध्यक्ष अपना पद ग्रहण करता है ।
(2) जब अध्यक्ष, अनुपस्थिति, बीमारी या अन्य किसी कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है तब ज्येष्ठतम सदस्य उस तारीख तक अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करेगा जिस तारीख को अध्यक्ष अपना पद फिर से संभालता है ।
51. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के वेतन, भत्ते और सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें-अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें (जिनके अन्तर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवा निवृत्ति प्रसुविधाएं हैं) ऐसी होंगी, जो विहित की जाएं:
परन्तु अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के वेतन और भत्तों में तथा सेवा के अन्य निबन्धनों और शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।
52. पद त्याग और हटाया जाना-(1) अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, भारत के राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा, अपना पद त्याग सकेगा:
परन्तु अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य, जब तक कि उसे भारत के राष्ट्रपति द्वारा उससे पहले पदत्याग करने के लिए अनुज्ञा नहीं दी जाती है, ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास की समाप्ति तक या उसके उत्तराधिकारी के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त व्यक्ति द्वारा अपना पद ग्रहण कर लेने तक या उसकी पदावधि की समाप्ति तक, इनमें से जो भी पूर्वतम हो, अपना पद धारण करता रहेगा ।
(2) अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को उसके पद से उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा ऐसी जांच किए जाने के पश्चात्, जिसमें ऐसे अध्यक्ष या अन्य सदस्य को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की सूचना दे दी गई है और उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया है, साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर, भारत के राष्ट्रपति द्वारा किए गए आदेश से ही हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
(3) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (2) में निर्दिष्ट अध्यक्ष या अन्य सदस्य के कदाचार या असमर्थता के अन्वेषण के लिए प्रकिया, नियमों द्वारा, विनियमित कर सकेगी ।
53. अध्यक्ष और सदस्य द्वारा ऐसे अध्यक्ष या सदस्य न रहने पर पद धारण करने के संबंध में उपबंध-पद पर न रहने पर, -
(क) अधिकरण का अध्यक्ष, भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी भी और नियोजन का पात्र नहीं होगा;
(ख) अध्यक्ष से भिन्न अधिकरण का कोई अन्य सदस्य, इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी अन्य अधिकरण के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किन्तु भारत सरकार या किसी राज्य की सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन का पात्र नहीं होगा;
(ग) अध्यक्ष या अन्य सदस्य, अधिकरण के समक्ष उपस्थित नहीं होगा, कार्य नहीं करेगा या अभिवचन नहीं करेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य सरकार के अधीन नियोजन के अन्तर्गत भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन अथवा सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन किसी निगम या सोसाइटी के अधीन नियोजन है ।
54. अध्यक्ष की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां-अध्यक्ष, न्यायपीठों पर ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करेगा, जो विहित की जाएं:
परन्तु अध्यक्ष को अपनी ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों को, जिन्हें वह उचित समझे, अधिकरण के किसी अन्य सदस्य या किसी अधिकारी को, इस शर्त के अधीन रहते हुए, प्रत्यायोजित करने का प्राधिकार होगा कि ऐसा सदस्य या अधिकारी ऐसी प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग करते समय, अध्यक्ष के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करता रहेगा ।
55. अधिकरण के कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार, ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों का प्रकार और प्रवर्ग अवधारित करेगी जो अधिकरण को उसके कृत्यों का निर्वहन करने में सहायता करने के लिए अपेक्षित हों और अधिकरण के लिए ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की व्यवस्था करेगी, जो वह ठीक समझे ।
(2) अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।
(3) अधिकरण के अधिकारी और अन्य कर्मचारी, अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे ।
56. न्यायपीठों के बीच कारबार का वितरण-अध्यक्ष, न्यायपीठों के बीच अधिकरण के कारबार के वितरण के बारे उपबन्ध कर सकेगा ।
57. अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार-(1) इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, अधिकरण, उस तारीख से ही जिससे धारा 46 के अधीन उसकी स्थापना की जाती है, ऐसी सभी अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेगा जो (उच्चतम न्यायालय के सिवाय) सभी न्यायालयों द्वारा निम्नलिखित के संबंध में प्रयोक्तव्य हैं, अर्थात्: -
(क) इस अधिनियम के अधीन किराया प्राधिकारी के आदेशों की सभी अपीलें;
(ख) इस अधिनियम के उपबंधों से उद्भूत होने वाला कोई अन्य विषय;
(ग) अपने स्वयं के आदेशों और विनिश्चयों का पुनर्विलोकन ।
(2) अधिकरण, स्वप्रेरणा से या किसी पक्षकार के आवेदन पर और पक्षकारों को सूचना देने के पश्चात् तथा उनमें से उसकी सुनवाई करने के पश्चात्, जो सुने जाने की वांछा रखता है इस अधिनियम के अधीन किराया प्राधिकारी के समक्ष लंबित किसी मामले के अभिलेख मंगा सकेगा और वह स्वयं मामले का विचारण कर सकेगा या ऐसे किराया प्राधिकारी द्वारा मामले का निपटारा किए जाने का निदेश दे सकेगा ।
(3) अधिकरण को अपने समक्ष लंबित किसी मामले में पक्षकारों के बीच सुलह कराने की शक्तियां होंगी ।
58. अवमान के लिए दंड देने की शक्ति-अधिकरण को स्वयं अपने या इस अधिनियम के अधीन किराया प्राधिकारी के अवमान की बाबत वही अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार होंगे और वह उनका प्रयोग करेगा, जो किसी उच्च न्यायालय को हैं और वह जिनका प्रयोग कर सकता है और इस प्रयोजन के लिए न्यायालय अवमान अधिनियम, 1971 (1971 का 70) के उपबंध निम्नलिखित उपांतरणों के अधीन रहते हुए, प्रभावी होंगे, अर्थात्: -
(क) उसमें किसी उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत अधिकरण के प्रति निर्देश है;
(ख) उक्त अधिनियम की धारा 15 में महाधिवक्ता के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह महान्यायवादी या महासालिसिटर या अपर महासालिसिटर के प्रति निर्देश है;
(ग) उक्त अधिनियम की धारा 6, धारा 10, धारा 11क, धारा 12, धारा 15 और धारा 17 में, अधीनस्थ न्यायालय या न्यायालय के अधीनस्थ के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत इस अधिनियम के अधीन किराया प्राधिकारी के प्रति निर्देश है; और
(घ) उक्त अधिनियम की धारा 14 में, मुख्य न्यायमूर्ति, न्यायाधीश या न्यायाधीशों के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत अध्यक्ष, सदस्य या सदस्यों के प्रति निर्देश है ।
59. अधिकरण को आवेदन-(1) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसा कोई व्यक्ति, जो अधिकरण की अधिकारिता के भीतर किसी मामले से संबंधित किसी आदेश से व्यथित है, अपनी शिकायत को दूर कराने के लिए अधिकरण को आवेदन कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में होगा और उसके साथ ऐसे शपथपत्र, दस्तावेज या कोई अन्य साक्ष्य और ऐसा आवेदन फाइल करने की बाबत ऐसी फीस और आदेशिकाओं की तामील या निष्पादन के लिए ऐसी अन्य फीस होगी, जो विहित की जाए ।
(3) उपधारा (1) के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति पर, यदि अधिकरण का, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, यह समाधान हो जाता है कि उक्त आवेदन उसके द्वारा न्यायनिर्णयन या विचारण के लिए उचित मामला है तो वह ऐसे आवेदन को ग्रहण करेगा, किंतु जहां अधिकरण का इस प्रकार समाधान नहीं होता है वहां वह आवेदन को, उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करने के पश्चात्, संक्षेपतः नामंजूर कर सकेगा ।
60. अधिकरण की प्रक्रिया-(1) अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित प्रक्रिया द्वारा आबद्ध नहीं होगा किंतु वह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शन प्राप्त करेगा और इस अधिनियम के और केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए किन्हीं नियमों के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अधिकरण को, अपनी प्रक्रिया को अधिकथित और विनियमित करने की शक्ति होगी, जिसके अन्तर्गत अपनी जांच का स्थान और समय नियत करना और यह विनिश्चय करना है कि क्या बैठक सार्वजनिक या प्राइवेट रूप से की जाए ।
(2) अधिकरण, अपने को किए गए प्रत्येक आवेदन का विनिश्चय यथासंभव शीघ्रता से और दस्तावेजों, शपथ पत्रों तथा लिखित अभ्यावेदनों का परिशीलन करने और ऐसे मौखिक तर्कों की, जो दिए जाएं, सुनवाई करने के पश्चात् करेगा:
परन्तु जहां अधिकरण, ऐसे उन कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह ठीक समझता है वहां मौखिक साक्ष्य पेश किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा ।
(3) अधिकरण को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए, निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -
(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या दस्तावेज अथवा ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की अपेक्षा करना;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;
(च) अपने आदेशों और विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;
(छ) किसी आवेदन या अपील को व्यतिक्रम के लिए खारिज करना या उसका एकपक्षीय रूप से विनिश्चय करना;
(ज) किसी आवेदन या अपील को व्यतिक्रम के लिए खारिज करने के किसी आदेश को या अपने द्वारा एकपक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को अपास्त करना;
(झ) इस अधिनियम के अधीन अपने आदेशों और विनिश्चयों तथा किराया प्राधिकारी के आदेशों और विनिश्चयों का, किसी सिविल न्यायालय को निर्देशित किए बिना, सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पादन कराना; और
(ञ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
(4) अधिकरण द्वारा किसी मामले में स्थगन, ऐसा स्थगन देने को न्यायोचित ठहराने वाले कारणों को अभिलिखित किए बिना नहीं किया जाएगा और यदि कोई पक्षकार तीसरी बार और पश्चात्वर्ती समय पर स्थगन के लिए अनुरोध करता है तो खर्चा अधिनिर्णीत किया जाएगा ।
61. अधिकरण को अपील-(1) किराया प्राधिकारी द्वारा पारित किए गए आदेश या किए गए विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे आदेश या विनिश्चय की तारीख से तीस दिन के भीतर, विहित प्ररूप में अधिकरण को लिखित रूप में अपील कर सकेगा और उसके साथ ऐसे आदेश या विनिश्चय की जिसके विरुद्ध अपील की गई है, प्रमाणित प्रति और ऐसी फीस होगी जो विहित की जाए:
परन्तु कोई अपील तीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् ग्रहण की जा सकेगी, यदि अपीलार्थी अधिकरण का यह समाधान कर देता है कि उसके पास विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अपील न करने के लिए पर्याप्त हेतुक था ।
(2) तीस दिन की पूर्वोक्त अवधि की संगणना करने में, उस आदेश या विनिश्चय की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, प्रमाणित प्रति प्राप्त करने में लगे समय को अपवर्जित किया जाएगा ।
(3) इस अधिनियम के अधीन किए गए किराया प्राधिकारी के प्रत्येक आदेश या विनिश्चय के विरुद्ध विधि और तथ्यों, दोनों के प्रश्नों के बारे में अपील, अधिकरण को होगी:
परन्तु इस अधिनियम की धारा 11, धारा 12, धारा 21 या धारा 33 के अधीन किराया प्राधिकारी द्वारा किए गए किसी आदेश या विनिश्चय से कोई अपील नहीं होगी ।
(4) उपधारा (1) के अधीन किसी अपील की प्राप्ति पर, यदि अधिकरण का, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह आवश्यक समझे, यह समाधान हो जाता है कि उक्त अपील उसके द्वारा न्यायनिर्णयन के लिए उचित मामला है तो वह ऐसी अपील को ग्रहण करेगा, किन्तु जहां अधिकरण का इस प्रकार समाधान नहीं होता है वहां वह अपील को, उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करने के पश्चात् संक्षेपतः नामंजूर कर सकेगा ।
(5) अधिकरण, धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (ङ), खंड (च) या खंड (द) अथवा धारा 23, धारा 24, धारा 25, धारा 26 या धारा 33 के अधीन किराया प्राधिकारी के आदेश या विनिश्चय के विरुद्ध किसी अपील का, ऐसी अपील फाइल किए जाने के एक मास के भीतर, निपटारा करने का प्रयास करेगा ।
62. अंतरिम आदेश करने के बारे में शर्तें-इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी आवेदन या अपील पर या उससे संबंधित किसी कार्यवाही में (व्यादेश के रूप में या रोक के रूप में या किसी अन्य रीति से) कोई अन्तरिम आदेश तभी किया जाएगा जब-
(क) ऐसे पक्षकार को, जिसके विरुद्ध ऐसा आवेदन किया जाता है या अपील की जाती है, ऐसे आवेदन या अपील की और ऐसे अंतरिम आदेश के लिए अभिवाक् के समर्थन में सभी दस्तावेजों की प्रतिलिपियां दे दी जाती हैं; और
(ख) ऐसे पक्षकार को उस विषय में सनुवाई का अवसर दे दिया जाता है:
परन्तु यदि अधिकरण का ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएंगे, यह समाधान हो जाता है कि, यथास्थिति, आवेदक या अपीलार्थी को पहुंचाई गई किसी ऐसे हानि के, जिसकी धन के रूप में पूर्ति पर्याप्त रूप से नहीं की जा सकती है, निवारण के लिए ऐसा करना आवश्यक है तो वह खंड (क) और खंड (ख) की अपेक्षाओं से अभिमुक्ति प्रदान कर सकेगा और आपवादिक उपाय के रूप में अंतरिम आदेश कर सकेगा । किन्तु ऐसा अंतरिम आदेश, यदि वह पहले ही रद्द नहीं कर दिया जाता है, ऐसी तारीख से जिसको वह किया जाता है, चौदह दिन की अवधि की समाप्ति पर प्रभावहीन हो जाएगा जब तक कि उक्त अपेक्षाओं का उस अवधि की समाप्ति के पूर्व अनुपालन नहीं कर दिया जाता है और अधिकरण, अंतरिम आदेश का प्रवर्तन जारी नहीं रखता है ।
63. आवेदक को विधि व्यवसायी की सहायता लेने का अधिकार-इस अधिनियम के अधीन अधिकरण को आवेदन करने वाला या अपील करने वाला कोई व्यक्ति, अधिकरण के समक्ष अपना मामला प्रस्तुत करने के लिए स्वयं हाजिर हो सकेगा या वह अपनी पंसद के किसी विधि व्यवसायी की सहायता ले सकेगा ।
64. एक न्यायपीठ से दूसरे न्यायपीठ को मामले अंतरित करने की अध्यक्ष की शक्ति-किसी भी पक्षकार के आवेदन पर और पक्षकारों को सूचना देने के पश्चात् तथा पक्षकारों में से ऐसे पक्षकारों की, जिनकी वह सुनवाई करना चाहता है, सुनवाई करने के पश्चात् या ऐसी सूचना दिए बिना स्वप्रेरणा से, अध्यक्ष एक न्यायपीठ के समक्ष लंबित किसी मामले को निपटाए जाने के लिए किसी अन्य न्यायपीठ को अंतरित कर सकेगा ।
65. बहुमत द्वारा विनिश्चय-एक से अधिक सदस्यों वाले न्यायपीठ का किसी प्रश्न पर विनिश्चय जहां बहुमत है, वहां बहुमत के अनुसार किया जाएगा और जहां बहुमत नहीं है और सदस्य राय में बराबर बंटे हैं वहां वे ऐसे प्रश्न, या प्रश्नों को, जिन पर उनमें मतभेद हैं, उल्लिखित करते हुए मामले का कथन तैयार करेंगे और अध्यक्ष को निर्देशित करेंगे और ऐसे निर्देश की प्राप्ति पर अध्यक्ष, ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का एक या अधिक अन्य सदस्यों द्वारा (जिनके अंतर्गत यदि अध्यक्ष ने ऐसे न्यायपीठ की अध्यक्षता नहीं की थी तो वह भी है) सुनवाई के लिए व्यवस्था कर सकेगा और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का विनिश्चय ऐसे सदस्यों के जिन्होंने उस मामले की सुनवाई की है, जिनके अंतर्गत वे सदस्य हैं, जिन्होंने प्रथमतः उस मामले की सुनवाई की थी, बहुमत के अनुसार किया जाएगा ।
66. उच्चतम न्यायालय के सिवाय न्यायालयों की अधिकारिता का अपवर्जन-ऐसी तारीख से ही जिससे किसी विषय के संबंध में कोई अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार इस अधिनियम के अधीन अधिकरण द्वारा प्रयोक्तव्य हो जाता है, (उच्चतम न्यायालय के सिवाय) किसी न्यायालय को ऐसे विषय के संबंध में कोई अधिकारिता, शक्तियां या प्राधिकार नहीं होगा या वह उसका प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा ।
67. लंबित मामलों का अंतरण-इस अधिनियम के प्रारंभ पर, ऐसे विषयों से संबंधित ऐसे सभी मामले, जिनकी बाबत अधिकरण को इस अधिनियम के अधीन अधिकारिता होगी जिनके अंतर्गत धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (ग) से खंड (झ) के अंतर्गत आने वाले परिसरों और किराएदारियों की बाबत संपत्ति अंतरण अधिनियम, 1882 (1882 का 4) के अधीन आने वाले मामले हैं और जो उच्च न्यायालय में लंबित हैं और साथ ही ऐसे सभी मामले, जो दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (1958 का 59) के अधीन गठित किराया नियंत्रण अधिकरण या अतिरिक्त किराया नियंत्रण अधिकरण में लंबित हैं, अधिकरण को अंतरित हो जाएंगे और अधिकरण, उस विषय पर नए सिरे से या उस प्रक्रम से, जिस पर वह इस प्रकार अन्तरित किया गया है, आगे कार्यवाही कर सकेगा ।
68. अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों का न्यायिक कार्यवाहियां होना-अधिकरण के समक्ष सभी कार्यवाहियां भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193, धारा 219 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगी ।
69. अधिकरण के सदस्यों और कर्मचारिवृन्द का लोक सेवक होना-अध्यक्ष और अन्य सदस्य तथा वे अधिकारी और अन्य कर्मचारी, जिनका धारा 55 के अधीन अधिकरण के लिए उपबंध किया गया है, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक होंगे ।
70. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम अथवा इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या निकाले गए आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध अथवा अधिकरण के अध्यक्ष अथवा अन्य सदस्य के अथवा ऐसे अध्यक्ष या अन्य सदस्य द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।
71. अधिकरण की दांडिक अधिकारिता-(1) अधिकरण से भिन्न कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
(2) अधिकरण इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान तब तक नहीं करेगा जब तक कि उस अपराध के संबंध में परिवाद अपराध के किए जाने की तारीख से तीन मास के भीतर नहीं किया गया हो ।
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रत्येक परिवाद में वे तथ्य, जिनसे अभिकथित अपराध गठित होता है, ऐसे अपराध की प्रकृति और ऐसी अन्य विशिष्टियां दी जाएंगी जो अभियुक्त को समन करने के लिए और ऐसे अपराध की, जिसका किया जाना अभिकथित है, सूचना देने के लिए और अभियोजन का संचालन करने के लिए लोक अभियोजक को सूचित करने के लिए युक्तियुक्त रूप से पर्याप्त हों ।
(4) अधिकरण, इस अधिनियम के अधीन अपराधों के विचारण के लिए प्रक्रिया का वैसी ही अनुपालन करेगा जिसका उच्च न्यायालय अनुपालन करता यदि उसके द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 474 के अधीन मामले का विचारण किया जाता और उस प्रयोजन के लिए अधिकरण, उक्त संहिता के अधीन उच्च न्यायालय समझा जाएगा ।
72. आदेशों का संशोधन-अधिकरण या किराया प्राधिकारी द्वारा पारित किसी आदेश में लिपिकीय या गणितीय भूलों को या उसमें किसी आकस्मिक चूक या लोप से उत्पन्न गलतियों को, किसी भी समय, यथास्थिति, अधिकरण या प्राधिकारी द्वारा किसी पक्षकार से इस निमित्त प्राप्त किसी आवेदन पर या अन्यथा, सुधारा जा सकेगा ।
73. आदेशों की अंतिमता-इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, इस अधिनियम के अधीन किराया प्राधिकारी द्वारा निकाला गया प्रत्येक आदेश या अपील में पारित किया गया कोई आदेश अंतिम होगा और किसी भी मूल वाद, आवेदन या निष्पादन कार्यवाही में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
अध्याय 8
शास्तियां
74. शास्तियां-(1) उस दशा में जिसमें कोई किराएदार, धारा 11 के अधीन उस परिसर का मानक किराया नियत करने के लिए आवेदन करता है, जिसका मानक किराया दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (1958 का 59) के अधीन या इस अधिनियम के अधीन पूर्व किराएदारी में नियत किया गया था, मकान मालिक, किराएदार के अनुरोध पर, ऐसे किराएदार को इस प्रकार नियत किए गए मानक किराए की लिखित सूचना देगा और यदि मकान मालिक ऐसा करने में असफल रहेगा तो वह एक हजार रुपए के जुर्माने से या पूर्व किराएदारी में नियत किए गए मानक किराए के दुगुने से, इनमें से जो भी अधिक हो, दंडनीय होगा ।
(2) यदि कोई मकान मालिक या किराएदार, धारा 21 की उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा तो वह तीन मास के किराए की रकम के बराबर जुर्माने से या, एक मास के कारावास से या दोनों से दंडनीय होगा, और आवश्यक प्रदाय या सेवा के बंद या विधारण करने की तारीख को प्रारम्भ होने वाले और आवश्यक प्रदाय या सेवा के प्रत्यावर्तित किए जाने की तारीख तक, ऐसे प्रत्येक दिन के लिए एक सौ रुपए के जुर्माने का भी दायी होगा ।
(3) यदि कोई किराएदार, धारा 22 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) के उपबंधों के उल्लंघन में, सम्पूर्ण परिसर या उसके किसी भाग को उप-किराए पर देगा, समनुदेशित करेगा या अन्यथा कब्जा छोड़ेगा तो वह जुर्माने से, जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या उस समय तक जब तक कि परिवाद का कारण समाप्त नहीं हो जाता, उप-किराएदारी के लिए प्रत्येक मास के लिए किराएदार द्वारा प्राप्त किए गए किराए के दुगुने, इनमें से जो अधिक हो, या एक मास की अवधि के कारावास से दंडनीय होगा ।
(4) यदि कोई मकान मालिक, धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (द) के स्पष्टीकरण 1 के पैरा (i) के अधीन अपने शपथपत्र में कोई मिथ्या व्यपदेशन करेगा तो वह जुर्माने से जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा या यदि वह पुनः किराए पर दिया गया है तो उस किराए के दुगुने से जो, तीन वर्ष की अवधि के लिए प्राप्त किया जा सकता है इनमें से, जो भी अधिक हो, दण्डनीय होगा ।
(5) यदि कोई मकान मालिक, धारा 31 की उपधारा (1) के उल्लंघन में संपूर्ण परिसर को या उसके किसी भी भाग को पुनः किराए पर देगा तो वह जुर्माने से, जो पांच हजाए रुपए तक का हो सकेगा या उस किराए के दोगुने से जो मकान मालिक पुनः किराएदारी पर देने के पश्चात् प्राप्त करता है, इनमें से जो भी अधिक हो, या कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा और उपधारा (3) के प्रयोजनों के लिए, उन दशाओं में जिनमें उस किराए को साबित करना कठिन है जो, यथास्थिति, मकान मालिक या किराएदार पुनः किराएदारी या उप-किराएदारी पर देने के पश्चात् प्राप्त करता है, जुर्माना पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा ।
(6) यदि किराएदार द्वारा कब्जा परिदत्त कर दिए जाने के पश्चात् मकान मालिक धारा 32 की उपधारा (3) के अधीन विनिर्दिष्ट तारीख से तीन मास के भीतर, यथास्थिति, मरम्मत या निर्माण या पुनर्निर्माण का कार्य प्रारंभ करने में असफल रहेगा तो वह तीन मास के किराए के बराबर जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
(7) यदि कोई मकान मालिक, धारा 32 की, उपधारा (2) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा तो वह जुर्माने से, जो परिसर के छह मास के किराए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(8) यदि कोई किराएदार, धारा 32 की उपधारा (2) के अधीन मकान मालिक द्वारा लिखित में सूचित की गई, यथास्थिति, मरम्मत या निर्माण या पुनर्निर्माण के पूरा होने की तारीख से तीन मास के भीतर युक्तियुक्त प्रतिहेतु के बिना पुनः प्रवेश करने में असफल रहेगा तो वह पुनः प्रवेश का अपना अधिकार खो देगा और परिसर के तीन मास के किराए के बराबर जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
अध्याय 9
प्रकीर्ण
75. कतिपय मामलों में सिविल न्यायालय की अधिकारिता का वर्जन-इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, कोई भी सिविल न्यायालय, कोई ऐसा वाद या कार्यवाही, जहां तक उसका संबंध किसी ऐसे विषय से है, जिसको यह अधिनियम लागू होता है, या किसी ऐसे अन्य विषय से है जिसका विनिश्चय करने के लिए इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन किराया प्राधिकारी सशक्त है, ग्रहण नहीं करेगा, और इस अधिनियम के अधीन किराया प्राधिकारी या अधिकरण द्वारा की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत कोई व्यादेश किसी सिविल न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा नहीं दिया जाएगा ।
76. किराया प्राधिकारियों का लोक सेवक होना-इस अधिनियम के अधीन नियुक्त सभी किराया प्राधिकारी और अपर किराया प्राधिकारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
77. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही किसी किराया प्राधिकारी या अपर किराया प्राधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी ।
78. दिल्ली किराएदार (अस्थायी संरक्षण) अधिनियम, 1956 और दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 द्वारा दी गई डिक्रियों के बारे में विशेष उपबंध-जहां ऐसे किसी परिसर के, जिसे दिल्ली किराएदार (अस्थायी संरक्षण) अधिनियम, 1956(1956 का 9) या दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (1958 का 59) लागू होता है, कब्जे की पुनः प्राप्ति के लिए किसी डिक्री या आदेश का उस परिसर के संबंध में उन अधिनियमों में से किसी के प्रवर्तन की समाप्ति पर निष्पादन कराए जाने की वांछा की जाती है वहां उस डिक्री या आदेश को निष्पादित करने वाला किराया प्राधिकारी उस व्यक्ति के, जिसके विरुद्ध वह डिक्री या आदेश पारित किया गया है, आवेदन पर या अन्यथा, मामले पर नए सिरे से विचार कर सकेगा और यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि वह डिक्री या आदेश पारित नहीं किया गया होता यदि उस डिक्री या आदेश की तारीख को यह अधिनियम प्रवृत्त होता तो किराया प्राधिकारी, इस अधिनियम के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए, उस डिक्री या आदेश को अपास्त कर सकेगा या उसके संबंध में ऐसा अन्य आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।
79. लंबित मामलों का किराया प्राधिकारी को अन्तरण-इस अधिनियम के प्रारंभ पर, ऐसे विषयों से संबंधित ऐसे सभी मामले जिनकी बाबत किराया प्राधिकारी को इस अधिनियम के अधीन अधिकारिता होगी और जो दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (1958 का 59) के अधीन नियंत्रक या किसी अन्य न्यायालय के समक्ष लंबित है किराया प्राधिकारी को अंतरित हो जाएंगे और किराया प्राधिकारी, उस विषय पर नए सिरे से या उस प्रक्रम से, जिस पर वह अंतरित किया गया था, आगे कार्यवाही कर सकेगा ।
80. कठिनाइयों को दूर करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों:
परन्तु इस धारा के अधीन कोई आदेश, इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
81. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -
(क) वह अवधि, जिसके भीतर करार धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकृत किए जाएंगे;
(ख) वह प्राधिकारी जिसके समक्ष, वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे और वह अवधि जिसके भीतर मकान मालिक और किराएदार धारा 4 की उपधारा (3) के परंतुक के अधीन किराएदारी के बारे में विशिष्टियां अलग से फाइल करेंगे;
(ग) धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन करने की रीति;
(घ) वह मूल्यांकक, जिसकी सहायता किराया प्राधिकारी द्वारा ली जा सकेगी और धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन उसके द्वारा किए जाने वाले निर्धारण की रीति;
(ङ) धारा 16 की उपधारा (1) के अधीन किराया या अन्य प्रभार जमा करने की रीति;
(च) धारा 16 की उपधारा (2) के खंड (ङ) के अधीन विशिष्टियां;
(छ) धारा 16 की उपधारा (3) के अधीन मकान मालिक को आवेदन की प्रति भेजने की रीति;
(ज) वह रीति जिससे जमा किए गए किराए या अन्य प्रभारों का धारा 16 की उपधारा (4) के अधीन आवेदक को संदाय किया जाएगा;
(झ) धारा 20 की उपधारा (3) के अधीन किराएदार को सूचना देने की रीति;
(ञ) वह रीति जिससे धारा 22 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन किराया प्राधिकारी को किया जाएगा;
(ट) वह रीति जिससे धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (ग) के परन्तुक के अधीन सूचना दी जाएगी;
(ठ) वह रीति जिससे धारा 29 के अधीन किराएदार या उप-किराएदार द्वारा मकान मालिक को सूचना दी जाएगी;
(ड) वह रीति जिससे धारा 31 के अधीन मकान मालिक द्वारा किराया प्राधिकारी की अनुज्ञा प्राप्त की जाएगी;
(ढ) वह समय जिसके भीतर धारा 31 की उपधारा (2) या धारा 32 की उपधारा (3) और उपधारा (4) के अधीन आवेदन किए जाएंगे;
(ण) वह रीति जिससे धारा 33 के अधीन मकान मालिक द्वारा किराया प्राधिकारी की अनुज्ञा प्राप्त की जाएगी;
(त) वह समय जिसके भीतर धारा 33 के अधीन आवेदन मकान मालिक द्वारा किराया प्राधिकारी को किया जाएगा;
(थ) सिविल न्यायालय की वे शक्तियां जो धारा 44 की उपधारा (2) के खंड (घ) के अधीन किराया प्राधिकारी में निहित की जा सकेंगी;
(द) धारा 47 की उपधारा (2) के अधीन अध्यक्ष द्वारा विनिश्चित की जाने वाली न्यायपीठों के सदस्यों की संख्या;
(ध) वह प्रक्रिया जिसके अनुसार धारा 48 की उपधारा (5) के अधीन अभ्यर्थियों की सूची, भारत सरकार के न्याय विभाग के परामर्श से शहरी विकास मंत्रालय द्वारा तैयार की जाएगी;
(न) धारा 51 के अधीन अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (जिनके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति प्रसुविधाएं हैं);
(प) धारा 52 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट अध्यक्ष या अन्य सदस्य के कदाचार या असमर्थता के अन्वेषण के लिए धारा 52 की उपधारा (3) के अधीन प्रक्रिया;
(फ) धारा 54 के अधीन अध्यक्ष की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां;
(ब) धारा 55 की उपधारा (2) के अधीन अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की शर्तें;
(भ) धारा 59 की उपधारा (1) के अधीन आवेदन का प्ररूप और शपथपत्र, दस्तावेजें या कोई अन्य साक्ष्य और उक्त आवेदन के फाइल करने की बाबत फीस तथा उक्त धारा की उपधारा (2) में उल्लिखित आदेशिकाओं की तामील या निष्पादन के लिए अन्य फीसें ;
(म) धारा 60 की उपधारा (3) के खंड (ञ) के अधीन विहित किए जाने वाले विषय;
(य) धारा 61 की उपधारा (1) के अधीन अपील का प्ररूप और संदेय फीस;
(यक) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।
82. निरसन और व्यावृत्ति-(1) दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (1958 का 59) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी और धारा 67 और धारा 79 के उपबंधों के अधीन रहते हुए इस अधिनियम के प्रारंभ पर, उक्त अधिनियम के अधीन लंबित सभी मामले और अन्य कार्यवाहियां चालू रहेंगी और उनका निपटारा इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किया जाएगा ।
(3) ऐसे निरसन के होते हुए भी, दिल्ली किराया नियंत्रण अधिनियम, 1958 (1958 का 59) की धारा 47 के अधीन सरकार द्वारा पट्टे पर लिए गए परिसरों से संबंधित सभी पट्टे, इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से छह मास की अवधि की समाप्ति पर समाप्त हो जाएंगे जब तक कि उन्हें सरकार द्वारा उससे पहले समाप्त नहीं कर दिया जाता है ।
अनुसूची 1
(धारा 6 और धारा 7 देखिए)
ऐसा किराया जो, यथास्थिति, धारा 6 की उपधारा (1) के खंड (क) या धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन बढ़ाया जा सकता है, नीचे दी गई सारणी 1 के स्तंभ (2) में दर्शित दरों पर, वार्षिक आधार पर चक्रवृद्धि करते हुए, मकान मालिक और किराएदार के बीच करार पाए गए किराए की दशा में करार की तारीख के प्रति और मानक किराए की दशा में सन्निर्माण के प्रारंभ की तारीख के प्रति निर्देश से उस अवधि के लिए, जिसके लिए किराया अवधारित किया जाना है, संदेय किराया परिनिर्धारित करने के लिए, संगणित किया जाएगा :
परन्तु इस अधिनियम के प्रारंभ तक इस प्रकार संगणित वृद्धि की कुल रकम, सारणी 2 के स्तंभ (1) में उपदर्शित उसके आकार के आधार पर किसी परिसर की बाबत ऐसी प्रतिशतता तक, जो उक्त सारणी के स्तंभ (2) में तत्स्थानी प्रविष्टि में विनिर्दिष्ट है, निर्बन्धित होगी:
परंतु यह और कि इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व की गई किराएदारी की दशा में ऐसी वृद्धि, पांच बराबर वार्षिक किस्तों में धीरे-धीरे प्रभावी होगी ।
स्पष्टीकरण-इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् किराए में वार्षिक वृद्धि की संगणना के लिए आधार किसी एक वर्ष में संदेय किराया होगा मानो इस अधिनियम के प्रारंभ पर शोध्य किराए की कुल वृद्धि, किसी पांच वर्ष की अवधि में धीरे-धीरे प्रभावी होने के स्थान पर, तुरन्त प्रभावी हुई हो और किराए की ऐसी वार्षिक वृद्धि धीरे-धीरे की गई वृद्धि के अतिरिक्त संदेय होगी:
परन्तु यह भी कि धारा 26 में निर्दिष्ट किसी ऐसे मकान मालिक के संबंध में, जो विधवा है, विकलांग व्यक्ति है अथवा पैंसठ वर्ष या उससे अधिक आयु का व्यक्ति है, किराए की वृद्धि पांच वर्ष की अवधि में बांटी नहीं जाएगी किंतु तुरन्त प्रभावी होगी ।
सारणी 1
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करार/सन्निर्माण के प्रारंभ की तारीख |
किराए की वृद्धि की दर |
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(1) |
(2) |
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1. |
31 दिसंबर, 1949 तक |
दो प्रतिशत । |
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2. |
1 जनवरी, 1950 को और से 31 दिसंबर, 1960 तक |
चार प्रतिशत । |
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3. |
1 जनवरी, 1961 को और से 31 दिसंबर, 1970 तक |
छह प्रतिशत । |
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4. |
1 जनवरी, 1971 को और से 31 दिसंबर, 1994 तक |
(i) आवासिक परिसरों के लिए आठ प्रतिशत; |
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(ii) गैर-आवासिक परिसरों के लिए दस प्रतिशत । |
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5. |
1 जनवरी, 1995 को और से आगे |
आवासिक परिसरों की दशा में थोक मूल्य सूचकांक पर आधारित वार्षिक मुद्रा स्फीति दर का पचहत्तर प्रतिशत और गैर-आवासिक परिसरों की दशा में ऐसी दर का सौ प्रतिशत । |
सारणी 2
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परिसरों का आकार (निर्मित क्षेत्र) |
किराए की अनुज्ञात वृद्धि |
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(1) |
(2) |
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1. |
25 वर्गमीटर या उससे कम के आवासिक परिसर |
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पच्चीस प्रतिशत । |
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2. |
25 वर्गमीटर या उससे अधिक के किंतु चालीस वर्ग मीटर या उससे कम के आवासिक परिसर |
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पचास प्रतिशत । |
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3. |
40 वर्गमीटर या उससे अधिक के किंतु 80 वर्गमीटर या उससे कम के आवासिक परिसर |
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पचहत्तर प्रतिशत । |
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4. |
80 वर्गमीटर या उससे अधिक के आवासिक परिसर |
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एक सौ प्रतिशत । |
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5. |
गैर-आवासिक परिसर (आकार को दृष्टि में लाए बिना) |
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एक सौ प्रतिशत । |
अनुसूची 2
(धारा 8 देखिए)
1. एयर कंडीशनर ।
2. विद्युत तापित्र ।
3. जल शीतलित्र ।
4. गीजर ।
5. रेफ्रिजरेटर ।
6. कुकिंग रेंज ।
7.फर्नीचर ।
8. उद्यान जो अनन्यतः किराएदार द्वारा उपयोग किए जाने के लिए अभिप्रेत है ।
9. कीड़ा भूमि जो अनन्यतः किराएदार द्वारा उपयोग किए जाने के लिए अभिप्रेत है ।
10. सन-ब्रेकर ।
11. भोगाधिकार, यदि कोई हों, जिनका किराएदार द्वारा उपभोग किया जाता है ।
अनुसूची 3
(धारा 19 और धारा 20 देखिए)
क. मकान मालिक द्वारा कराई जाने वाली संरचनात्मक मरम्मत
1. संरचनात्मक मरम्मत, उसको छोड़कर जो किराएदार द्वारा कारित नुकसान के कारण अनिवार्य हो ।
2. तीन वर्षों में एक बार दीवारों की पुताई और दरवाजों और खिड़कियों की रंगाई ।
3. जब आवश्यक हो, पाइपों को बदलना और नलकर्म ।
4. भीतरी और बाहरी वायरिंग और उससे संबंधित अनुरक्षण ।
ख. किराएदार द्वारा कराई जाने वाली दिन-प्रतिदिन की मरम्मत
1. टोंटी के वाशरों और टोंटियों का बदला जाना ।
2. नाली की सफाई ।
3. शौच कूपों की मरम्मत ।
4. वाशवेशन की मरम्मत ।
5. बाथ टब की मरम्मत ।
6. गीजर की मरम्मत ।
7. सर्किट ब्रेकर की मरम्मत ।
8. स्विच और सॉकेट की मरम्मत ।
9. प्रमुख भीतरी और बाहरी वायरिंग को बदलने के सिवाय विद्युत उपस्कर की मरम्मत और उसका बदला जाना ।
10. किचन फिक्सचर की मरम्मत ।
11. दरवाजों, कप बोर्डों, खिड़कियों आदि की घुंडियां और उनके ताले बदलना ।
12. फ्लाई नेट को बदलना ।
13. खिड़कियों या दरवाजों आदि में लगे ग्लास पैनल को बदलना ।
14. किराएदार को किराए पर दिए गए उद्यानों और खुले स्थान का रखरखाव ।
अनुसूची 4
[धारा 45 की उपधारा (4) देखिए]
समन का प्ररूप
(किराएदार का नाम, वर्णन और निवास-स्थान)
श्री--------------------------ने धारा--------------------------में विनिर्दिष्ट आधारों पर--------------------------के लिए एक आवेदन (जिसकी एक प्रति संलग्न है) फाइल किया है ।
आपको इसके द्वारा इसकी तामील के (।) दिनों के भीतर किराया प्राधिकारी के समक्ष हाजिर होने और--------दिन के भीतर उत्तर फाइल करने के लिए समन किया जाता है, जिसमें व्यतिक्रम होने की दशा में मामले की एक पक्षीय रूप में सुनवाई की जाएगी और उसका निपटारा किया जाएगा ।
(॥) आपको----------------------के आधार पर बेदखली के लिए आवेदन का प्रतिवाद करने के लिए किराया प्राधिकारी की इजाजत प्राप्त करनी है, जिससे व्यतिक्रम होने पर आवेदक, पंद्रह दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् किसी भी समय, उक्त परिसर से आपकी बेदखली के लिए आदेश प्राप्त करने के लिए हकदार होगा ।
हाजिर होने और आवेदन का प्रतिवाद करने की इजाजत, किराया प्राधिकारी को धारा 45 की उपधारा (7) के खंड (ख) में निर्दिष्ट शपथपत्र द्वारा समर्थित आवेदन पर अभिप्राप्त की जा सकती है ।
किराया प्राधिकारी/अपर किराया प्राधिकारी के हस्ताक्षर और मुद्रा से
तारीख-----------को दिया गया ।
(मुद्रा) किराया प्राधिकारी/अपर किराया
प्राधिकारी
।इसे भरा जाए ।
॥जो लागू न हो उस काट दें ।
टिप्पण: -
।धारा 22 की उपधारा (2) के खंड (ङ) और खंड (च) और धारा 23, धारा 24, धारा 25, धारा 26 और धारा 33 के अंतर्गत आने वाले मामलों के लिए पंद्रह दिन उपदर्शित करें और अन्य मामलों के लिए तीस दिन उपदर्शित करें ।
॥केवल धारा 45 की उपधारा (7) के खंड (क) के अंतर्गत आने वाले मामलों के लिए ।
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