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स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़ अधिनियम, 1966 ( Post-Graduate Institute Of Medical, Education And Research,Chandigarh, Act, 1966 )


 

स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़ अधिनियम, 1966

(1966 का अधिनियम संख्यांक 51)

झ्र्17 दिसम्बर, 1966

स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़

नामक संस्था को राष्ट्रीय महत्व की संस्था घोषित

करने के लिए तथा उसके निगमन और

उससे सम्बन्धित विषयों का

उपबन्ध करने के लिए

 अधिनियम

भारत गणराज्य के सत्रहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :श्न्

1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभश्न्(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़ अधिनियम, 1966 है

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करेश्न्

2. स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़, का राष्ट्रीय महत्व की संस्था के रूप में घोषित किया जानाश्न्चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र में स्थित स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़ नामक संस्था के उद्देश्य ऐसे हैं जो उस संस्था को एक राष्ट्रीय महत्व की संस्था बनाते हैं, अतः इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़ नामक संस्था राष्ट्रीय महत्व की संस्था है

3. परिभाषाएंश्न्इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो,श्न्

() निधिञ्ज् से धारा 16 में निर्दिष्ट संस्थान की निधि अभिप्रेत है ;

() शासी-निकायञ्ज् से संस्थान का शासी-निकाय अभिप्रेत है ;

() संस्थानञ्ज् से इस अधिनियम के अधीन निगमित आयुर्विज्ञान शिक्षा और संस्थान, चंडीगढ़ नामक संस्था अभिप्रेत है ;

() सदस्यञ्ज् से संस्थान का कोई सदस्य अभिप्रेत है ;

() विनियमञ्ज् से संस्थान द्वारा बनाया गया विनियम अभिप्रेत है ;

() नियमञ्ज् से केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया नियम अभिप्रेत है

4. संस्थान का निगमनश्न्इसके द्वारा स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, चंडीगढ़ को पूर्वोक्त नाम का एक निगमित निकाय गठित किया जाता है और ऐसे निगमित निकाय के रूप में उसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और उसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, संपत्ति के अर्जन, धारण और व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी और वह उक्त नाम से वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा

5. संस्थान का गठनश्न्संस्थान में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :श्न्

                () पंजाब विश्वविद्यालय का कुलपति, पदेन ;

                () भारत सरकार की स्वास्थ्य सेवाओं का महानिदेशक, पदेन ;

                () संस्थान का निदेशक, पदेन ;

() केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले उस सरकार के तीन प्रतिनिधि, जिनमें से एक वित्त मंत्रालय से, एक शिक्षा मंत्रालय से और एक स्वास्थ्य मंत्रालय और परिवार नियोजन मंत्रालय से होगा ;

() केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले सात व्यक्ति, जिनमें से इंडियन साइस कांग्रेस एसोसिएशन का प्रतिनिधित्व करने वाला ऐसा एक व्यक्ति होगा जो आयुर्विज्ञान नहीं है ;

() नियमों द्वारा विहित रीति से केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाने वाले भारतीय विश्वविद्यालयों के आयुर्विज्ञान संकायों के चार प्रतिनिधि ; और

() संसद् के तीन सदस्य, जिनमें से दो लोक सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से और एक राज्य सभा के सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे

6. सदस्यों की पदावधि और उनके बीच होने वाली रिक्तियांश्न्(1) इस धारा में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, सदस्य की पदावधि, उसके नामनिर्देशन या निर्वाचन की तारीख से पांच वर्ष होगी

(2) धारा 5 के खण्ड () के अधीन निर्वाचित सदस्य की पदावधि, जैसे ही वह  झ्र्कोई मंत्री या राज्य मंत्री या उप मंत्री या लोक सभा का अध्यक्ष या उपाध्यक्ष अथवा राज्य सभा का उपसभापति बन जाता है याट उस सदन की, जहां से वह निर्वाचित किया गया था, सदस्य नहीं रह जाता है, समाप्त हो जाएगी

(3) पदेन सदस्य की पदावधि तब तक बनी रहेगी जब तक वह उस पद को धारण किए रहता है जिसके आधार पर वह ऐसा सदस्य है

(4) आकस्मिक रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्देशित या निर्वाचित सदस्य की पदावधि उस सदस्य की अवशिष्ट अवधि के लिए होगी, जिसके स्थान पर वह नामनिर्देशित या निर्वाचित हुआ था

(5) धारा 5 के खण्ड () के अधीन निर्वाचित सदस्य से भिन्न पदावरोही सदस्य, जब तक केन्द्रीय सरकार अन्यथा निदेश दे, पद पर तब तक बना रहेगा, जब तक कि कोई अन्य व्यक्ति उसके स्थान पर सदस्य के रूप में नामनिर्देशित नहीं कर दिया जाता

(6) पदावरोही सदस्य पुनः नामनिर्देशित या पुनः निर्वाचन का पात्र होगा

(7) सदस्य केन्द्रीय सरकार को संबोधित लेख द्वारा जिस पर उसके हस्ताक्षर होंगे, अपना पद त्याग सकेगा किन्तु वह तब तक अपने पद पर बना रहेगा जब तक सरकार उसका त्यागपत्र स्वीकार नहीं कर लेती

(8) सदस्यों के मध्य रिक्तियां भरने की रीति वह होगी जो नियमों द्वारा विहित की जाए

7. संस्थान का सभापतिश्न्(1) संस्थान का एक सभापति होगा, जो संस्थान के निदेशक से भिन्न उसके सदस्यों में से केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा

(2) सभापति उन शक्तियों का प्रयोग और उन कृत्यों का निर्वहन करेगा जो इस अधिनियम में अधिकथित किए जाएं या नियमों या विनियमों द्वारा विहित किए जाएं

8. सभापति और सदस्यों के भत्तेश्न्सभापति और अन्य सदस्यों को संस्थान से ऐसे भत्ते, यदि कोई हों, मिलेंगे जो नियमों द्वारा विहित किए जाएं

9. संस्थान के अधिवेशनश्न्संस्थान अपना पहला अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर करेगा जिसे केन्द्रीय सरकार नियत करे और पहले अधिवेशन में कार्य-संचालन के संबंध में प्रक्रिया के उन नियमों का पालन करेगा जो उस सरकार द्वारा अधिकथित किए जाएं ; और तत्पश्चात् संस्थान ऐसे समय और स्थान पर अपना अधिवेशन करेगा और अपने अधिवेशन में कार्य-संचालन के संबंध में प्रक्रिया के उन नियमों का पालन करेगा जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं

10. संस्थान का शासी-निकाय और अन्य समितियांश्न्(1) संस्थान का एक शासी-निकाय होगा जिसका गठन संस्थान द्वारा ऐसी रीति से किया जाएगा जो विनियमों द्वारा विहित की जाए :

परन्तु ऐसे सदस्यों की संख्या, जो संस्थान के सदस्य नहीं हैं, शासी-निकाय की कुल सदस्य संख्या के एक-तिहाई से अधिक  नहीं होगी

(2) शासी-निकाय, संस्थान की कार्यकारिणी समिति होगा और वह उन शक्तियों का प्रयोग और उन कृत्यों का निर्वहन करेगा जिन्हें संस्थान, इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा उसे प्रदत्त या उस पर अधिरोपित करे

(3) संस्थान का सभापति शासी-निकाय का अध्यक्ष होगा और उसके अध्यक्ष के नाते ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं

(4) शासी-निकाय द्वारा अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कृत्यों का निर्वहन करने में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया तथा शासी-निकाय के सदस्यों की पदावधि और उनके मध्य रिक्तियों को भरने की रीति वह होगी जो विनियमों द्वारा विहित की जाए

(5) ऐसे नियंत्रण और निबन्धनों के अधीन रहते हुए, जो नियमों द्वारा विहित किए जाएं, संस्थान उतनी स्थायी समितियां और उतनी तदर्थ समितियां गठित कर सकेगा जितनी वह संस्थान की किसी शक्ति का प्रयोग या किसी कृत्य का निर्वहन करने के लिए या किसी ऐसे मामले में जो संस्थान उन्हें निर्दिष्ट करे, जांच करने अथवा उसके संबंध में रिपोर्ट या सलाह देने के लिए ठीक समझे

(6) शासी-निकाय के अध्यक्ष और सदस्यों को तथा किसी स्थायी समिति या तदर्थ सीमिति के अध्यक्ष और सदस्यों को ऐसे भत्ते, यदि कोई हों, मिलेंगे जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं

11. संस्थान के कर्मचारिवृन्दश्न्(1) संस्थान का एक मुख्य कार्यपालक अधिकारी होगा जो संस्थान के निदेशक के रूप में अभिहित किया जाएगा और ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए जाएं, संस्थान द्वारा नियुक्त किया जाएगा :

परन्तु संस्थान का प्रथम निदेशक केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा

 झ्र्(1) निदेशक उस तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि के लिए या पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, अपना पद धारण करेगा :

परन्तु अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान और स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान (संशोधन) अधिनियम, 2007 के प्रारंभ से ठीक पूर्व निदेशक के रूप में पद धारण करने वाला कोई व्यक्ति, जहां तक उसकी नियुक्ति इस उपधारा के उपबंधों से असंगत है, ऐसे प्रारंभ पर ऐसे निदेशक के रूप में पद पर नहीं रहेगा और अपने पद के या सेवा की किसी संविदा के समयपूर्व पर्यवसान के लिए तीन मास के वेतन और भत्तों से अनधिक प्रतिकर का दावा करने का हकदार होगा ।ट

(2) निदेशक, संस्थान और शासी-निकाय के सचिव के रूप में कार्य करेगा  

(3) निदेशक ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा, जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं या जो उसे संस्थान द्वारा या संस्थान के सभापति द्वारा या शासी-निकाय द्वारा या शासी-निकाय के अध्यक्ष द्वारा प्रत्यायोजित किए जाएं

(4) ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, संस्थान उतने अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जितने उसकी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए आवश्यक हों और ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के पदनाम और ग्रेड अवधारित कर सकेगा  

(5) ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं, संस्थान के निदेशक तथा अन्य अधिकारी और कर्मचारी ऐसे वेतन और भत्तों के हकदार होंगे और छुट्टी, पेंशन, भविष्य-निधि तथा अन्य मामलों में सेवा की ऐसी शर्तों से शासित होंगे जो इस निमित्त बनाए गए विनियमों द्वारा विहित की जाएं

12. संस्थान के उद्देश्यश्न्संस्थान के उद्देश्य निम्नलिखित होंगेश्न्

() आयुर्विज्ञान शिक्षा की सभी शाखाओं में स्नातकपूर्व एवं स्नातकोत्तर शिक्षण के स्वरूपों को इस प्रकार विकसित करना कि आयुर्विज्ञान शिक्षा का एक ऊंचा स्तर निर्देशित हो ;

() स्वास्थ्य क्रियाकलाप की सभी महत्वपूर्ण शाखाओं में कर्मचारियों के प्रशिक्षण के लिए उच्चतम कोटि की शिक्षा सुविधाएं यथासाध्य एक स्थान पर एकत्र करना ; और

() देश के लिए जितने विशेषज्ञों और आयुर्विज्ञान अध्यापकों की आवश्यकता है उसे पूरा करने के लिए स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा में आत्मनिर्भरता प्राप्त करना

13. संस्थान के कृत्यश्न्संस्थान धारा 12 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेगा,श्न्

() आधुनिक आयुर्विज्ञान तथा अन्य सहबद्ध विज्ञानों में, जिनके अन्तर्गत भौतिक विज्ञान एवं जीव विज्ञान भी है, स्नातकपूर्व और स्नातकोत्तर शिक्षण की व्यवस्था करना ;

() ऐसे विज्ञानों की विभिन्न शाखाओं में अनुसंधान के लिए सुविधाओं की व्यवस्था करना ;

() मानविकी के शिक्षण की व्यवस्था करना ;

() स्नातकपूर्व और स्नातकोत्तर, दोनों, में आयुर्विज्ञान शिक्षा के संतोषप्रद स्तर प्राप्त करने के लिए आयुर्विज्ञान की नई पद्धतियों में प्रयोग करना ;

() स्नातकपूर्व और स्नातकोत्तर दोनों ही शिक्षणों के लिए पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम विहित करना ;

() तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी निम्नलिखित की स्थापना करना और उन्हें बनाए रखनाश्न्

(त्) निरोधक और सामाजिक आयुर्विज्ञान विभाग सहित विभिन्न विभागों वाले एक या अधिक आयुर्विज्ञान महाविद्यालय, जिनमें विभिन्न विषयों पर केवल स्नातकपूर्व आयुर्विज्ञान शिक्षा बल्कि स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा प्रदान करने के लिए भी पर्याप्त कर्मचारी हों और जो इस निमित्त पर्याप्त रूप से सज्जित हों ;

(त्त्) एक या अधिक सुसज्जित अस्पताल ;

(त्त्त्) दन्त चिकित्सा महाविद्यालय, जिसमें दंत चिकित्सा का अभ्यास करने के लिए और विद्यार्थियों को व्यावहारिक प्रशिक्षण देने के लिए ऐसी संस्थागत सुविधाएं हों, जो आवश्य हों ;

(त्ध्) परिचर्या महाविद्यालय, जिसमें नर्सों को प्रशिक्षण देने के लिए पर्याप्त कर्मचारी हों और जो इसके लिए पर्याप्त रूप से सुसज्जित हों

(ध्) ग्राम्य एवं नागरी स्वास्थ्य संगठन, जो संस्थान के आयुर्विज्ञान, दंत चिकित्सा और परिचर्या के विद्यार्थियों को क्षेत्र-प्रशिक्षण देने के लिए और साथ ही सामुदायिक स्वास्थ्य समस्याओं में अनुसंधान करने के लिए केन्द्रों के रूप में होंगे ; और

(ध्त्) विभिन्न प्रकार के स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, जैसे भौतिक चिकित्सक, व्यवसायिक चिकित्सक, भेषजज्ञ, ओषधि विश्लेषक और विभिन्न प्रकार के चिकित्सा तकनीकियों के प्रशिक्षणार्थ अन्य संस्थाएं ;

                                () भारत में विभिन्न आयुर्विज्ञान महाविद्यालयों के लिए अध्यापकों का प्रशिक्षण ;

() स्नातकपूर्व तथा स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा में परीक्षाएं संचालित करना और ऐसी उपाधियां, डिप्लोमे तथा विद्या संबंधी अन्य विशिष्ट उपाधियां और पदवियां देना जो विनियमों में अधिकथित की जाएं ;

() आचार्य पद, उपाचार्य पद, प्राध्यापक पद और किसी अन्य पद को विनियमों के अनुसार संस्थित करना और उन पदों पर व्यक्तियों की नियुक्ति करना ;

() सरकार से अनुदान प्राप्त करना तथा संदाताओं, उपकारियों, वसीयतकर्ताओं या अंतरकों द्वारा, यथास्थिति, दान, संदान, उपकृतियों, वसीयतों तथा जंगम और स्थावर दोनों प्रकार की संपत्ति के अंतरणों को प्राप्त करना ;

() संस्थान की या उसमें निहित किसी संपत्ति के संबंध में ऐसी किसी रीति से कार्यवाही करना जो धारा 12 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक समझी जाए ;

() ऐसे फीस तथा अन्य प्रभारों की मांग करना और उन्हें प्राप्त करना, जो विनियमों द्वारा विहित किए जाएं ;

 झ्र्() अपने कर्मचारिवृन्द के लिए आवासगृहों का निर्माण करना और ऐसे आवासगृहों को, ऐसे विनियमों के अनुसार जो इस निमित्त बनाए जाएं कर्मचारिवृन्द को आबंटित करना ;

() केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, संस्थान की संपत्ति की प्रतिभूति पर, धन उधार लेना ;

 झ्र्() ऐसे अन्य कार्य और बातें करना जो धारा 12 में विनिर्दिष्ट उद्देश्यों की पूर्ति के लिए आवश्यक हों ।ट

14. सम्पत्ति का निहित होनाश्न्संस्थान की संपत्ति, जो पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) के आधार पर केन्द्रीय सरकार में निहित हो गई थी, इस अधिनियम के प्रारम्भ पर संस्थान में निहित होगी

15. संस्थान को संदायश्न्केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, संस्थान को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशि ऐसी रीति से देगी जिसे वह सरकार इस अधिनियम के अधीन उसकी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करने के लिए आवश्यक समझे  

16. संस्थान की निधिश्न्(1) संस्थान एक निधि कायम रखेगा ; जिसमें निम्नलिखित जमा किए जाएंगे :श्न्

                () वह सभी धन जो केन्द्रीय सरकार द्वारा दिया गया हो ;

                () संस्थान द्वारा प्राप्त सभी फीस तथा अन्य प्रभार ;

() अनुदान, दान, संदान, उपकृति, वसीयत अथवा अंतरणों के रूप में संस्थान को प्राप्त सभी धन ; और

() किसी अन्य रीति से या किसी अन्य स्रोत से संस्थान को प्राप्त सभी धन

(2) निधि में जमा किए गए सभी धन ऐसे बैंकों में जमा या ऐसी रीति से विनिहित किए जाएंगे जिसे संस्थान, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, विनिश्चित करे  

(3) निधि का उपयोग, संस्थान के व्ययों की, जिनके अन्तर्गत धारा 13 के अधीन उसकी शक्तियों के प्रयोग और कृत्यों के निर्वहन में किए गए व्यय भी हैं, पूर्ति के लिए किया जाएगा

17. संस्थान का बजटश्न्संस्थान प्रतिवर्ष एक बजट, आगामी वित्तीय वर्ष की बाबत, ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर तैयार करेगा जो नियमों द्वारा विहित किया जाए, और जिसमें संस्थान की प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दिखाए जाएंगे और केन्द्रीय सरकार को उसकी उतनी प्रतियां भेजेगा जितनी नियमों द्वारा विहित की जाएं

18. लेखा और लेखापरीक्षाश्न्(1) संस्थान उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, जिसके अन्तर्गत तुलनपत्र भी है, ऐसे प्ररूप में, जो केन्द्रीय सरकार नियमों द्वारा विहित करे और ऐसे साधारण निदेशों के अनुसार तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परमार्श से जारी करे

(2) संस्थान के लेखाओं की परीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा की जाएगी और ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा किया गया कोई भी व्यय संस्थान द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा

(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के तथा संस्थान के लेखाओं की परीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति के ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में वे ही अधिकार, विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को सरकारी लेखाओं की परीक्षा के संबंध में होते हैं और विशिष्टतया उसे बहियां, लेखा, संबद्ध वाउचर तथा अन्य दस्तावेजें और कागजपत्रों को पेश किए जाने की मांग करने तथा संस्थान के कार्यालयों तथा उसके द्वारा स्थापित और बनाई रखी गई संस्थाओं के कार्यालयों का निरीक्षण करने का अधिकार होगा

(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा यथा प्रमाणित संस्थान के लेखे, उन पर लेखापरीक्षा की रिपोर्ट सहित, प्रतिवर्ष केन्द्रीय सरकार को भेजे जाएंगे और वह सरकार उन्हें संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी

19. वार्षिक रिपोर्टश्न्संस्थान प्रत्येक वर्ष के लिए, उस वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलापों के संबंध में एक रिपोर्ट तैयार करेगा और उसे ऐसे प्ररूप में तथा ऐसी तारीख को या उसके पूर्व जो नियमों द्वारा विहित की जाए, केन्द्रीय सरकार को भेजेगा और इस रिपोर्ट की एक प्रति उसकी प्राप्ति के एक मास के भीतर संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखी जाएगी

20. पेंशन और भविष्य निधिश्न्(1) संस्थान अपने अधिकारियों, अध्यापकों तथा अन्य कर्मचारियों के लाभ के लिए ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो विनियमों द्वारा विहित की जाएं, ऐसी पेंशन नियत करेगा और भविष्य-निधि स्थापित करेगा जो वह ठीक समझे

(2) जहां ऐसी कोई पेंशन नियत की गई है या भविष्य-निधि स्थापित की गई है वहां केन्द्रीय सरकार यह घोषणा कर सकेगी कि भविष्य-निधि अधिनियम, 1925 (1925 का 19) के उपबन्ध उस निधि को वैसे ही लागू होंगे मानो वह सरकारी निधि हो

21. संस्थान के आदेशों और लिखतों का अधिप्रमाणनश्न्संस्थान के सभी आदेश और विनिश्चय सभापति के या इस निमित्त संस्थान द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जाएंगे और अन्य सभी लिखतें निदेशक के या संस्थान द्वारा उसी रीति से इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित की जाएंगी

22. कार्यों और कार्यवाहियों का रिक्तियों आदि के कारण अविधिमान्य होनाश्न्संस्थान, शासी-निकाय या किसी अन्य स्थायी या तदर्थ समिति द्वारा इस अधिनियम के अधीन किया गया कोई कार्य या की गई कोई कार्यवाही केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि संस्थान, शासी-निकाय या ऐसी किसी स्थायी या तदर्थ समिति में कोई रिक्ति थी या उसके गठन में कोई त्रुटि रह गई थी

 झ्र्23. संस्थान द्वारा आयुर्विज्ञान, दंत चिकित्सा या नर्सिंग उपाधियां, डिप्लोमे, आदि प्रदान किया जानाश्न्तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, संस्थान को इस अधिनियम के अधीन आयुर्विज्ञान, दंत चिकित्सा या नर्सिंग उपाधियां, डिप्लोमे और विद्या संबंधी अन्य विशिष्ट उपाधियां और पदवियां प्रदान करने की शक्ति होगी ।ट

 झ्र्24. संस्थान द्वारा प्रदत्त आयुर्विज्ञान, दंत चिकित्सा और नर्सिंग अर्हताओं की मान्यताश्न्भारतीय चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102), दंत चिकित्सक अधिनियम, 1948 (1948 का 16) और भारतीय नर्स परिषद् अधिनियम, 1947 (1947 का 48) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन संस्थान द्वारा प्रदत्त आयुर्विज्ञान, दंत चिकित्सा या नर्सिंग, यथास्थिति, उपाधियां या डिप्लोमे,श्न्

() भारतीय चिकित्सा परिषद् अधिनियम, 1956 के प्रयोजन के लिए मान्यताप्राप्त आयुर्विज्ञान अर्हताएं होंगी और उस अधिनियम की पहली अनुसूची में सम्मिलित समझी जाएंगी ;

() दंत चिकित्सक अधिनियम, 1948 के प्रयोजन के लिए मान्यताप्राप्त दंत चिकित्सा अर्हताएं होंगी और उस अधिनियम की अनुसूची में सम्मिलित समझी जाएंगी ; और

() भारतीय नर्स परिषद् अधिनियम, 1947 के प्रयोजन के लिए मान्यताप्राप्त नर्सिंग अर्हताएं होंगी और उस अधिनियम की अनुसूची में सम्मिलित समझी जाएंगी ।ट

25. केन्द्रीय सरकार द्वारा नियंत्रणश्न्संस्थान ऐसे निदेशों का पालन करेगा जो इस अधिनियम के दक्ष प्रशासन के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे समय-समय पर दिए जाएं

26. संस्थान और केन्द्रीय सरकार के बीच विवादश्न्यदि संस्थान द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कृत्यों का निर्वहन करने में या उसके सबंध में, संस्थान और केन्द्रीय सरकार के बीच कोई विवाद उठता है तो ऐसे विवाद पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा

27. विवरणियां और जानकारीश्न्संस्थान केन्द्रीय सरकार को ऐसी रिपोर्टें, विवरणियां और अन्य जानकारी देगा जिसकी वह सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे

28. विद्यमान कर्मचारियों की सेवा का अन्तरणश्न्इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक व्यक्ति, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व स्नातकोत्तर आयुर्विज्ञान शिक्षा और अनुसंधान संस्थान, चण्डीगढ़, में नियोजित है, ऐसे प्रारम्भ से ही संस्थान का कर्मचारी हो जाएगा और उसमें अपना पद या सेवा उसी अवधि के लिए, उन्हीं पारिश्रमिकों तथा उन्हीं निबन्धनों और शर्तों पर तथा पेंशन, छुट्टी, उपदान, भविष्य-निधि और अन्य बातों के बारे में उन्ही अधिकारों और विशेषाधिकारों पर धारण करेगा जैसा कि वह, यदि यह अधिनियम पारित नहीं किया जाता तो, इस अधिनियम के प्रारम्भ होने की तारीख पर धारण करता और तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक उसका नियोजन समाप्त कर दिया जाए या तब तक ऐसी अवधि, पारिश्रमिक और निबन्धन और शर्तों को विनियमों द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित कर दिया जाए :

परन्तु किसी ऐसे व्यक्ति की सेवा की अवधि, पारिश्रमिक तथा निबन्धन और शर्तें केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन के बिना उसे अलाभकर रूप में परिवर्तित नहीं की जाएंगी

29. संस्थान में सुविधाओं का जारी रहनाश्न्संस्थान हरियाणा और पंजाब राज्यों की सरकारों तथा चण्डीगढ़ और हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्रों के संबंध में केन्द्रीय सरकार को और उपर्युक्त राज्यों और राज्यक्षेत्रों की जनता को सुविधाएं देता रहेगा और ऐसी सुविधाएं, किसी भी बात के बारे में, ऐसी सरकारों और जनता के पक्ष में उससे कम नहीं होंगी, जितनी उन्हें 1 नवम्बर, 1966 के पूर्व दी जाती थीं और ऐसी अवधि के लिए और ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर (जिनमें ऐसी सुविधाओं की व्यवस्था के लिए किए जाने वाले अंशदान से संबंधित निबन्धन और शर्तें भी हैं) जैसा संस्थान, हरियाणा और पंजाब की राज्य सरकारों और केन्द्रीय सरकार के बीच                  1 अप्रैल, 1967 के पूर्व करार पाया जाए, या यदि उक्त तारीख तक कोई करार किया जा सके तो जैसा केन्द्रीय जैसा केन्द्रीय सरकार के आदेश द्वारा नियत किया जाए, उपलब्ध कराई जाएंगी

30. कठिनाइयों का निवारण करने की शक्तिश्न्यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रारम्भ से तीन वर्ष की अवधि के भीतर, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबन्ध कर सकेगी या ऐसे निदेश दे सकेगी जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत हों, और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों

31. नियम बनाने की शक्तिश्न्(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, संस्थान से परामर्श करने के पश्चात्, राजपत्र में अधिसूचना, द्वारा बना सकेगी

परन्तु इस धारा के अधीन पहली बार नियम बनाने के समय संस्थान से परामर्श करना आवश्यक नहीं होगा किन्तु केन्द्रीय सरकार ऐसी किन्हीं सुझावों पर विचार करेगी जो संस्थान इन नियमों के बनाए जाने के पश्चात् उनमें कोई संशोधन किए जाने के संबंध में दे

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इन नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात् :श्न् 

                () धारा 5 के खण्ड () के अधीन सदस्यों के नामनिर्देशन की रीति ;

                () धारा 10 की उपधारा (5) के अधीन स्थायी और तदर्थ समितियों के गठन के संबंध में नियंत्रण और निर्बन्धन ;

() संस्थान के सदस्यों की सेवा की शर्तें और उनके द्वारा अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया और उनमें होने वाली रिक्तियों को भरने की रीति ;

() संस्थान के सभापति द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियां और निर्वहन किए जाने वाले कृत्य ;

() संस्थान के सभापति और अन्य सदस्यों को दिए जाने वाले भत्ते, यदि कोई हों ;

() संस्थान द्वारा नियुक्त किए जाने वाले अधिकारियों तथा कर्मचारियों की संख्या और ऐसी नियुक्ति की रीति ;

() वह प्ररूप जिसमें और वह समय जब बजट तथा रिपोर्टें संस्थान द्वारा तैयार की जाएंगी और उनकी प्रतियों की संख्या जो केन्द्रीय सरकार को भेजी जाएंगी

() वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे विवरणियां और जानकारी संस्थान द्वारा केन्द्रीय सरकार को भेजी जानी है ;

() कोई अन्य विषय जिसे नियमों द्वारा विहित किया जाना है या विहित किया जाए

 झ्र्(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों  सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।ट

32. विनियम बनाने की शक्तिश्न्(1) संस्थान इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए विनियम, जो इस अधिनियम और उसके अधीन बनाए गए नियम से संगत हों, 1झ्र्केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, राजपत्र में अधिसूना द्वाराट बना सकेगा और इस शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना इन विनियमों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगाश्न्

() संस्थान के पहले अधिवेशन को छोड़कर शेष अधिवेशनों का बुलाया जाना तथा आयोजित किया जाना, वह समय और स्थान जहां ऐसे अधिवेशन किए जाएंगे और ऐसे अधिवेशनों में कार्य संचालन और गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्य संख्या ;

() शासी-निकाय और स्थायी तथा तदर्थ समितियों के गठन की रीति, तथा शासी-निकाय और स्थायी तथा तदर्थ समितियों के सदस्यों की पदावधि और उनमें होने वाली रिक्तियों को भरने की रीति ;

() संस्थान के सभापति और शासी-निकाय के अध्यक्ष द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियां औरनिर्वहन किए जाने वाले कृत्य ;

() शासी-निकाय और स्थायी तथा तदर्थ समितियों के अध्यक्ष और सदस्यों को दिए जाने वाले भत्ते, यदि कोई हों ;

() शासी-निकाय और स्थायी तथा तदर्थ समितियों द्वारा अपने कार्य संचालन में, शक्तियों के प्रयोग और कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने प्रक्रिया ;

() संस्थान के निदेशक तथा अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की शक्तियां और कर्तव्य ;

() शासी-निकाय के सभापति की शक्तियां और कर्तव्य ;

() संस्थान के निदेशक तथा अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की, जिनके अंतर्गत संस्थान द्वारा नियुक्त अध्यापक भी हैं, पदावधि, वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें;

() संस्थान की सम्पत्ति का प्रबंध ;

() संस्थान द्वारा प्रदान की जाने वाली उपाधियां, डिप्लोमे तथा विद्या सम्बन्धी अन्य विशिष्ट उपाधियां और पदवियां ;

() आचार्य पद, उपाचार्य पद, प्राध्यापक पद तथा अन्य पद जो संस्थित किए जाएं और ऐसे आचार्य पदों, उपाचार्य पदों, प्राध्यापक पदों तथा अन्य पदों पर नियुक्त किए जाने वाले व्यक्ति ;

() संस्थान द्वारा मांगी जा सकने वाली और उसे प्राप्त होने वाली फीस तथा अन्य प्रभार ;

() वह रीति जिससे और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए संस्थान के अधिकारियों, अध्यापकों तथा अन्य कर्मचारियों के फायदे के लिए पेंशन दी जाए या भविष्य-निधि स्थापित की जाए ;

() कोई अन्य विषय जिसके लिए इस अधिनियम के अधीन विनियमों द्वारा उपबन्ध किया जाए

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन प्रथम विनियम, केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए जाएंगे और इस प्रकार बनाए गए किसी विनियम में संस्थान उपधारा (1) के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए परिवर्तन या विखंडन कर सकेगा

 झ्र्(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा

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