रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985
(1986 अधिनियम संख्यांक 1)
[8 जनवरी, 1986]
औद्योगिक उपक्रमों का स्वामित्व रखने वाली रुग्ण कंपनियों और संभाव्य रुग्ण कंपनियों
का ठीक समय पर पता लगाना, विशेषज्ञ बोर्ड द्वारा ऐसे निवारक, सुधारात्मक,
उपचारी और अन्य उपायों का, जिनका ऐसी कंपनियों के संबंध में किया
जाना आवश्यक है, शीघ्र अवधारण और इस प्रकार अवधारित
उपायों का शीघ्र प्रवर्तन सुनिश्चित करने की दृष्टि
से और उनसे संबंधित या उनके आनुषंगिक
विषयों का, लोकहित
में, विशेष उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के छत्तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, प्रारम्भ और लागू होना-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष उपबंध) अधिनियम, 1985 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी तथा इस अधिनियम के किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारम्भ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रारम्भ के प्रति निर्देश है ।
(4) यह, प्रथमतः पोतों और शक्ति चालित अन्य जलयानों से सम्बन्धित अनुसूचित उद्योगों से भिन्न, सभी अनुसूचित उद्योगों को लागू होगा ।
(5) केन्द्रीय सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक से परामर्श करके, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबन्धों को, पोतों और शक्ति चालित अन्य जलयानों से सम्बन्धित अनुसूचित उद्योग को ऐसी तारीख से ही, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, लागू कर सकेगी ।
2. घोषणा-इसके द्वारा यह घोषित किया जाता है कि यह अधिनियम संविधान के अनुच्छेद 39 के खंड (ख) और खंड (ग) में विनिर्दिष्ट तत्वों को सुनिश्चित करने के लिए राज्य की नीति को प्रभावी करने के लिए है ।
3. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) अपील प्राधिकरण" से धारा 5 के अधीन गठित औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण अपील प्राधिकरण अभिप्रेत है ;
(ख) बोर्ड" से धारा 4 के अधीन स्थापित औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड अभिप्रेत है ;
(ग) अध्यक्ष" से, यथास्थिति, बोर्ड या अपील प्राधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है ;
(घ) कंपनी" से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 3 में परिभाषित कंपनी अभिप्रेत है । । । ;
[(घक) सम्यक् रूप से संपरीक्षित लेखाओं को अन्तिम रूप दिए जाने की तारीख" से वह तारीख अभिप्रेत है, जिसको कंपनी के संपरीक्षित लेखाओं को कंपनी के वार्षिक साधारण अधिवेशन में अंगीकार किया जाता है ;]
(ङ) औद्योगिक कंपनी" से ऐसी कंपनी अभिप्रेत है जिसके स्वामित्व में एक या अधिक औद्योगिक उपक्रम हैं ;
(च) औद्योगिक उपक्रम" से किसी कंपनी द्वारा एक या अधिक कारखानों में चलाए जा रहे किसी अनुसूचित उद्योग से संबंधित कोई उपक्रम अभिप्रेत हैं किन्तु इसके अंतर्गत निम्नलिखित नहीं हैं :-
(i) उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 3 के खंड (कक) में परिभाषित आनुषंगिक औद्योगिक उपक्रम ; और
(ii) पूर्वोक्त धारा 3 के खंड (ञ) में परिभाषित कोई लघु उद्योग उपक्रम ;
(छ) सदस्य" से, यथास्थिति, बोर्ड या अपील प्राधिकरण का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत उसका अध्यक्ष भी है ;
[(छक) शुद्ध मालियत" से समादत्त पूंजी और खुली आरक्षितियों की कुल राशि अभिप्रेत है ।
स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, खुली आरक्षितियों" से लाभों और शेयर प्रीमियम लेखा में से उधार दी गई सभी आरक्षितियां अभिप्रेत हैं किन्तु इनके अन्तर्गत आस्तियों के पुनर्मूल्यांकन में से उधार दी गई आरक्षितियां, अवक्षयण उपबंधों का पुनरांकन और समामेलन नहीं हैं ;]
(ज) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;
[(झ) प्रचालन अभिकरण" से ऐसी कोई लोक वित्तीय संस्था, राज्य स्तर संस्था, अनुसूचित बैंक या कोई अन्य व्यक्ति अभिप्रेत है, जिसे बोर्ड, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, अपने अभिकरण के रूप में विनिर्दिष्ट करे ;]
(ञ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
। । । ।
(ठ) रिजर्व बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है ;
(ड) अनुसूचित बैंक" से ऐसा कोई बैंक अभिप्रेत है जो तत्समय भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934(1934 का 2) की द्वितीय अनुसूची में सम्मिलित है ;
(ढ) अनुसूचित उद्योग" से उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की पहली अनुसूची में तत्समय विनिर्दिष्ट कोई उद्योग अभिप्रेत है ;
2[(ण) रुग्ण औद्योगिक कंपनी" से ऐसी औद्योगिक कंपनी अभिप्रेत है (जो कम से कम पांच वर्ष से रजिस्ट्रीकृत कंपनी है) जिसकी किसी वित्तीय वर्ष के अन्त में संचयित हानियां उसकी समस्त शुद्ध मालियत के बराबर या उससे अधिक है ।
स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि रुग्ण औद्योगिक कंपनी (विशेष उपबन्ध) संशोधन अधिनियम, 1993 के प्रारम्भ के ठीक पूर्व विद्यमान कोई औद्योगिक कंपनी, जो कम से कम पांच वर्ष से रजिस्ट्रीकृत है और जिसकी किसी वित्तीय वर्ष के अन्त में संचयित हानियां उसकी समस्त शुद्ध मालियत के बराबर या उससे अधिक हैं, रुग्ण औद्योगिक कंपनी समझी जाएगी ;]
(त) राज्य स्तर संस्था" से निम्नलिखित संस्थाओं में से कोई संस्था अभिप्रेत है, अर्थात् :-
(i) राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 63) की धारा 3 या धारा 3क के अधीन स्थापित राज्य वित्तीय निगम और धारा 46 के अधीन अधिसूचित संस्थाएं ;
(ii) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन रजिस्ट्रीकृत राज्य औद्योगिक विकास निगम ;
(iii) ऐसी अन्य संस्थाएं, जो कंपनियां हैं और लोक वित्तीय संस्थाएं नहीं हैं और जो ऐसे औद्योगिक उपक्रमों के विकास और वित्तपोषण में लगी हुई हैं जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे :
परन्तु कोई संस्था इस प्रकार तब तक विनिर्दिष्ट नहीं की जाएगी जब तक उसकी समादत्त शेयर पूंजी का कम से कम इक्यावन प्रतिशत किसी राज्य सरकार या सरकारों द्वारा अथवा उपखंड (i) और उपखंड (ii) में वर्णित किसी संस्था या संस्थाओं द्वारा अथवा भागतः एक या अधिक लोक वित्तीय संस्थाओं अथवा उपखंड (i) और उपखंड (ii) में वर्णित संस्थाओं और भागतः एक या अधिक राज्य सरकारों द्वारा धृत नहीं है ।
(2) (क) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं वही अर्थ हैं जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में हैं ;
(ख) उन शब्दों और पदों के, यदि कोई हैं, जो इस अधिनियम में या कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं, वही अर्थ हैं जो उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951(1951 का 85) में हैं ।
(3) इस अधिनियम में किसी अन्य अधिनियमिति या उसके किसी उपबंध के प्रति निर्देश का, किसी ऐसे क्षेत्र के सम्बन्ध में, जिसमें ऐसी अधिनियमिति या ऐसा उपबन्ध प्रवृत्त नहीं है, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त तत्स्थानी विधि या तत्स्थानी विधि के सुसंगत उपबन्ध के, यदि कोई हो, प्रति निर्देश है ।
अध्याय 2
औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड और अपील प्राधिकरण
4. बोर्ड की स्थापना-(1) ऐसी तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा नियत करे, स्त्र्औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्डऱ् के नाम से ज्ञात बोर्ड की स्थापना की जाएगी, जो इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन बोर्ड को प्रदत्त या उस पर अधिरोपित अधिकारिता और शक्तियों का प्रयोग तथा कृत्यों और कर्तव्यों का निर्वहन करेगा ।
(2) बोर्ड में एक अध्यक्ष और कम से कम ऐसे दो तथा अधिक से अधिक ऐसे चौदह अन्य सदस्य होंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे ।
(3) अध्यक्ष और बोर्ड के अन्य सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जो उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हैं या रहे हैं अथवा होने के लिए अर्हित हैं या जो योग्यता, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले ऐसे व्यक्ति हैं जिन्हें विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अर्थशास्त्र, बैंककारी उद्योग, विधि, श्रम संबंधी विषय, औद्योगिक वित्त, औद्योगिक प्रबंध, औद्योगिक पुनर्निर्माण प्रशासन, विनिधान, लेखा-कर्म, विपणन या किसी अन्य विषय का विशेष ज्ञान और कम से कम पन्द्रह वर्ष का वृत्तिक अनुभव है, जो केन्द्रीय सरकार की राय में, बोर्ड के लिए उपयोगी होगा ।
5. अपील प्राधिकरण का गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसी तारीख से, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाए, इस अधिनियम के अधीन बोर्ड के आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करने के लिए औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण अपील प्राधिकरण कहे जाने वाले अपील अधिकरण का गठन कर सकेगी जो एक अध्यक्ष और अधिक से अधिक तीन ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा जो उस सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएं ।
(2) अध्यक्ष ऐसा व्यक्ति होगा जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है अथवा जो कम से कम पांच वर्ष तक किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है ।
(3) अपील प्राधिकरण का सदस्य ऐसा व्यक्ति होगा जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है अथवा जो भारत सरकार के किसी सचिव की पंक्ति से अनिम्न का अधिकारी है या रहा है अथवा जो कम से कम तीन वर्ष तक के लिए बोर्ड का सदस्य है या रहा है ।
6. अध्यक्ष और अन्य सदस्यों की पदावधि, सेवा की शर्तें, आदि-(1) किसी व्यक्ति को अध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में नियुक्त करने से पूर्व, केन्द्रीय सरकार अपना यह समाधान कर लेगी कि उस व्यक्ति का कोई ऐसा वित्तीय या अन्य हित नहीं है और नहीं होगा जिससे ऐसे सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना हो ।
(2) अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य पांच वर्ष से अनधिक ऐसी अवधि के लिए पद धारण करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसकी नियुक्ति के आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए किन्तु वह पुनः नियुक्ति का पात्र होगा :
परन्तु ऐसा कोई व्यक्ति पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने के पश्चात् अध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में पद धारण नहीं करेगा ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी कोई सदस्य-
(क) केन्द्रीय सरकार को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा किसी भी समय अपना पद त्याग सकेगा ;
(ख) धारा 7 के उपबन्धों के अनुसार उसके पद से हटाया जा सकेगा ।
(4) अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के उपधारा (3) के अधीन पद त्याग या हटाए जाने से या अन्यथा, कारित कोई रिक्ति नए सिरे से नियुक्ति करके भरी जाएगी ।
(5) अध्यक्ष की मृत्यु, पद त्याग या अन्यथा उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में, सदस्यों में से ऐसा एक सदस्य, जिसे केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करे, उस तारीख तक अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा जिस तारीख को ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नियुक्त नया अध्यक्ष अपना पद ग्रहण करता है ।
(6) जब अध्यक्ष अनुपस्थिति, बीमारी या किसी अन्य कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है, तब सदस्यों में से ऐसा एक सदस्य, जिसे अध्यक्ष इस निमित्त लिखित रूप में प्राधिकृत करे, उस तारीख तक अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करेगा जिस तारीख को अध्यक्ष अपने कर्तव्य करना पुनः आरंभ करता है ।
(7) अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबन्धन और शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं :
परन्तु अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य के वेतन और भत्तों तथा सेवा के अन्य निबन्धनों और शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके अहित में परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।
(8) अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य, अपना पद ग्रहण करने से पूर्व, अनुसूची में दिए गए प्ररूप में विश्वसनीयता और गोपनीयता की घोषणा करेगा ।
(9) अध्यक्ष या कोई अन्य सदस्य उस हैसियत में पद पर न रहने के कारण, उस तारीख से जिसको वह ऐसे पद पर नहीं रहता है, पांच वर्ष की अवधि के लिए ऐसी किसी कंपनी में, जिसके संबंध में कोई विषय, यथास्थिति, बोर्ड या अपील प्राधिकरण के समक्ष विचारार्थ कोई विषय वस्तु रहा है, कोई नियुक्ति धारण नहीं करेगा अथवा उसके प्रबन्ध या प्रशासन से संबंधित नहीं रहेगा ।
7. कुछ परिस्थितियों में सदस्यों का पद से हटाया जाना-(1) केन्द्रीय सरकार उस सदस्य को पद से हटा सकेगी :-
(क) जिसे दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है ; या
(ख) जिसे ऐसे किसी अपराध का सिद्धदोष ठहराया गया है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अन्तर्वलित है ; या
(ग) जो सदस्य के रूप में कार्य करने के लिए शारीरिक रूप से या मानसिक रूप से असमर्थ हो गया है, या
(घ) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित कर लिया है जिसका सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की सम्भावना है, या
(ङ) जिसने अपने पद का इस प्रकार दुरुपयोग किया है कि उसका पद पर बना रहना लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला हो गया है ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, किसी सदस्य को उस उपधारा के खंड (घ) या खंड (ङ) में विनिर्दिष्ट आधार पर, उसके पद से तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उच्चतम न्यायालय ने, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त उसे निर्देश किए जाने पर, ऐसी प्रक्रिया के अनुसार, जो वह इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, उसके द्वारा की गई जांच पर यह रिपोर्ट नहीं दे दी है कि सदस्य को ऐसे आधारों पर हटाया जाना चाहिए ।
8. बोर्ड या अपील प्राधिकरण का सचिव, अधिकारी और अन्य कर्मचारी-(1) केन्द्रीय सरकार, बोर्ड का एक सचिव और अपील प्राधिकरण का एक सचिव (चाहे वह किसी भी नाम से ज्ञात हो) अध्यक्ष के नियंत्रण के अधीन ऐसी शक्तियों और कर्तव्यों का प्रयोग और पालन करने के लिए, जो अध्यक्ष द्वारा विहित किए जाएं या विनिर्दिष्ट किए जाएं, नियुक्त करेगी ।
[(2) केन्द्रीय सरकार, बोर्ड और अपील प्राधिकरण को ऐसे अन्य अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध करा सकेगी जो बोर्ड और अपील प्राधिकरण के कृत्यों के दक्ष पालन के लिए आवश्यक हों ।]
(3) बोर्ड और अपील प्राधिकरण के सचिव और अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं :
परन्तु ऐसा सचिव, अधिकारी या अन्य कर्मचारी अपने कर्तव्य ग्रहण करने से पूर्व अनुसूची में, दिए गए प्ररूप में विश्वसनीयता और गोपनीयता की घोषणा करेगा ।
9. वेतन, आदि का भारत की संचित निधि से चुकाया जाना-सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा प्रशासनिक व्यय, जिनके अन्तर्गत बोर्ड और अपील प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को या उनके संबंध में संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन भी हैं, भारत की संचित निधि से चुकाए जाएंगे ।
10. बोर्ड और अपील प्राधिकरण की कार्यवाहियों का रिक्तियों, आदि के कारण अविधिमान्य न होना-यथास्थिति, बोर्ड या अपील प्राधिकरण किसी कार्य या कार्यवाही को केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा कि बोर्ड या अपील प्राधिकरण में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है अथवा बोर्ड या अपील प्राधिकरण के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है ।
11. बोर्ड और अपील प्राधिकरण के सदस्यों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना-बोर्ड और अपील प्राधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्य तथा अधिकारी और अन्य कर्मचारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
12. बोर्ड या अपील प्राधिकरण की न्यायपीठों का गठन-(1) बोर्ड या अपील प्राधिकरण की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकारी का उसकी न्यायपीठों द्वारा प्रयोग किया जा सकेगा ।
(2) न्यायपीठों का गठन अध्यक्ष द्वारा किया जाएगा और प्रत्येक न्यायपीठ में कम से कम दो सदस्य होंगे ।
[(3) यदि न्यायपीठ के सदस्यों में किसी प्रश्न पर मतभेद है तो इस प्रश्न का विनिश्चय, यदि कोई बहुमत है तो बहुमत के अनुसार किया जाएगा, किन्तु यदि सदस्यों के मत बराबर हैं तो वे ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का कथन करेंगे जिनके बारे में उनमें मतभेद हैं, और उन्हें, यथास्थिति, बोर्ड के अध्यक्ष को या अपील प्राधिकरण को निर्देशित करेंगे जो ऐसे प्रश्न या प्रश्नों की स्वयं सुनवाई करेगा या उस मामले को ऐसे प्रश्न या प्रश्नों पर सुनवाई के लिए अन्य सदस्यों में से एक या अधिक को निर्देशित करेगा और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का विनिश्चय, उन सदस्यों के बहुमत के अनुसार, जिन्होंने उस मामले की सुनवाई की है, जिनके अन्तर्गत वे सदस्य हैं जिन्होंने सर्वप्रथम उस मामले की सुनवाई की थी, बहुमत के अनुसार किया जाएगा ।]
13. बोर्ड और अपील प्राधिकरण की प्रक्रिया-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यथास्थिति, बोर्ड या अपील प्राधिकरण को निम्नलिखित का विनियमन करने की शक्ति होगी :-
(क) कारबार की प्रक्रिया और संचालन ;
(ख) न्यायपीठों की प्रक्रिया जिसके अन्तर्गत वे स्थान भी हैं जहां न्यायपीठों की बैठकें होंगी ;
(ग) एक या अधिक सदस्यों को ऐसी शक्तियों या कृत्यों का प्रत्यायोजन जो, यथास्थिति, बोर्ड या अपील प्राधिकरण विनिर्दिष्ट करे ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यथास्थिति, बोर्ड या अपील प्राधिकरण की शक्तियों के अन्तर्गत उस सीमा का, जिस तक उसके समक्ष किसी कार्यवाही की विषय-वस्तु में हितबद्ध या हितबद्ध होने का दावा करने वाले व्यक्ति या तो स्वयं या अपने प्रतिनिधियों द्वारा उपस्थित होने के लिए या सुने जाने के लिए या साक्षियों की प्रतिपरीक्षा करने या कार्यवाहियों में भाग लेने के लिए अनुज्ञात किए जा सकते हैं, अवधारण करने की शक्तियां भी हैं ।
(3) बोर्ड या अपील प्राधिकरण को इस अधिनियम के अधीन जांच के प्रयोजनों के लिए या किसी अन्य प्रयोजन के लिए निम्नलिखित विषयों की बाबत वादों का विचारण करते समय वही शक्तियां होगी, जो किसी सिविल न्यायालय में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निहित होती हैं, अर्थात् :-
(क) किसी साक्षी को समन करना और उसे हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना ;
(ख) साक्ष्य के रूप में पेश किए जा सकने वाले दस्तावेज या अन्य सारवान् पदार्थ का प्रकटीकरण और पेश करना ;
(ग) साक्ष्य का शपथ पर लिया जाना ;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख की अध्यपेक्षा करना ;
(ङ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कोई कमीशन निकालना ;
(च) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
14. बोर्ड या अपील प्राधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों का न्यायिक कार्यवाहियां होना-बोर्ड या अपील प्राधिकरण दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा और बोर्ड या अपील प्राधिकरण के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में और धारा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी ।
अध्याय 3
निर्देश, जांच और स्कीम
15. बोर्ड को निर्देश-(1) जहां कोई औद्योगिक कंपनी रुग्ण औद्योगिक कम्पनी हो गई है वहां कंपनी का निदेशक बोर्ड कंपनी के उस वित्तीय वर्ष के, जिसके अन्त में कंपनी रुग्ण औद्योगिक कंपनी हुई है, सम्यक् रूप से संपरीक्षित लेखाओं को अंतिम रूप दिए जाने की तारीख से साठ दिन के भीतर ऐसे उपायों के अवधारण के लिए बोर्ड को निर्देशित करेगा जो कंपनी की बाबत अपनाए जाएंगे :
परन्तु यदि निदेशक बोर्ड के पास, ऐसा अंतिम रूप दिए जाने से पूर्व भी अपनी यह राय बनाने के लिए कि कंपनी रुग्ण औद्योगिक कंपनी हो गई है, पर्याप्त कारण है तो निदेशक बोर्ड ऐसी राय बनाने के पश्चात् साठ दिन के भीतर ऐसे उपायों के, जो कंपनी की बाबत अपनाए जाएंगे, अवधारण के लिए बोर्ड को निर्देश करेगा :
[परन्तु यह और कि वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 के प्रारंभ के पश्चात् औद्योगिक और वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड को कोई भी निर्देश नहीं किया जाएगा जहां उस अधिनियम की धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन किसी प्रतिभूतिकरण कंपनी या पुनर्निर्माण कंपनी द्वारा वित्तीय आस्तियां अर्जित की गई हों :
परन्तु यह भी कि वित्तीय आस्तियों का प्रतिभूतिकरण और पुनर्गठन तथा प्रतिभूति हित का प्रवर्तन अधिनियम, 2002 के प्रारंभ पर या उसके पश्चात् जहां औद्योगिक और वित्तीय पुनर्गठन बोर्ड के समक्ष कोई निर्देश लंबित है, वहां उस निर्देश का उपशमन हो जाएगा यदि ऐसे प्रतिभूत लेनदार के उधार लेने वाले को संवितरित वित्तीय सहायता की बकाया रकम के मूल्य में तीन चौथाई से अन्यून का प्रतिनिधित्व करने वाले प्रतिभूत लेनदारों ने उस अधिनियम की धारा 13 की उपधारा (4) के अधीन अपना प्रतिभूत ऋण वसूल करने के लिए कोई उपाय किए हैं ।]
(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक या कोई राज्य सरकार या कोई लोक वित्तीय संस्था अथवा कोई राज्य स्तर संस्था या कोई अनुसूचित बैंक, यदि उसके पास यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण है कि कोई औद्योगिक कंपनी इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए रुग्ण औद्योगिक कंपनी हो गई है, तो वह ऐसे उपायों के, जो ऐसी कम्पनी की बाबत अपनाए जाएंगे, अवधारण के लिए बोर्ड को ऐसी कंपनी के संबंध में निर्देश कर सकेगा :
परन्तु किसी औद्योगिक कंपनी की बाबत इस उपधारा के अधीन कोई निर्देश-
(क) किसी राज्य की सरकार द्वारा तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक ऐसी कंपनी के सभी औद्योगिक उपक्रम या उनमें से कोई उस राज्य में स्थित नहीं है,
(ख) किसी लोक वित्तीय संस्था या किसी राज्य स्तर संस्था या किसी अनुसूचित बैंक द्वारा तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक उसका ऐसी कंपनी की बाबत उसके द्वारा दी गई वित्तीय सहायता या बाध्यता या उसके द्वारा किए गए वचनबंध के कारण ऐसी कंपनी में कोई हित नहीं है ।
16. रुग्ण औद्योगिक कंपनियों के कार्यकरण की जांच-(1) बोर्ड, यह अवधारण करने के लिए कि क्या कोई औद्योगिक कंपनी रुग्ण औद्योगिक कंपनी हो गई है-
(क) धारा 15 के अधीन ऐसी कंपनी की बाबत निर्देश की प्राप्ति पर ; या
(ख) ऐसी कंपनी की बाबत प्राप्त सूचना के आधार पर या कंपनी की वित्तीय दशा के बारे में अपनी जानकारी पर ऐसी जांच कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
(2) बोर्ड, यदि वह उपधारा (1) के अधीन किसी जांच के शीघ्र निपटारे के लिए ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझता है तो, प्रचालन अभिकरण से ऐसे विषयों की बाबत जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, जांच करने और रिपोर्ट देने के लिए आदेश द्वारा अपेक्षा कर सकेगा ।
(3) यथास्थिति, बोर्ड या प्रचालन अभिकरण जांच को यथासंभव शीघ्र पूरा करेगा और जांच को उसके प्रारम्भ से साठ दिन के भीतर पूरा करने का प्रयास किया जाएगा ।
[स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, कोई जांच, बोर्ड द्वारा किसी निर्देश या सूचना की प्राप्ति पर अथवा अपनी जानकारी पर जो बोर्ड द्वारा लेखबद्ध की गई हो, प्रारंभ की गई समझी जाएगी ।]
(4) जहां बोर्ड किसी औद्योगिक कंपनी की बाबत, यथास्थिति, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन कोई जांच करना या कराना ठीक समझता है, वहां वह उस कंपनी के वित्तीय और अन्य हितों की रक्षा करने के लिए 1[या लोकहित में] कंपनी के विशेष निदेशक या विशेष निदेशकों के रूप में एक या अधिक व्यक्तियों को [नियुक्त कर सकेगा] ।
1[(4क) बोर्ड उपधारा (4) के अधीन नियुक्त विशेष निदेशक को, ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह उसके कर्तव्यों के उचित निर्वहन के लिए आवश्यक या समीचीन समझे ।]
(5) उपधारा (4) में निर्दिष्ट किसी विशेष निदेशक की नियुक्ति कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या औद्योगिक कंपनी से संबंधित संगम ज्ञापन और संगम अनुच्छेदों या किसी अन्य लिखत में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी विधिमान्य और प्रभावी होगी और शेयर अर्हता, आयु सीमा, निदेशक पदों की संख्या, निदेशकों के पद से हटाए जाने से संबंधित उपबंध और किसी ऐसी विधि या उपरोक्त लिखत में अंतर्विष्ट इसी प्रकार की शर्तें बोर्ड द्वारा नियुक्त किए गए किसी निदेशक को लागू नहीं होंगी ।
(6) उपधारा (4) के अधीन नियुक्त कोई विशेष निदेशक-
(क) बोर्ड के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा और बोर्ड द्वारा लिखित आदेश द्वारा किसी व्यक्ति द्वारा हटाया या प्रतिस्थापित किया जा सकेगा ;
(ख) निदेशक होने के कारण ही या निदेशक के रूप में अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने से लोप की गई किसी बात के लिए बाध्यता या दायित्व उपगत नहीं करेगा ;
(ग) चक्रानुक्रम द्वारा निवृत्ति का दायी नहीं होगा और ऐसी निवृत्ति के लिए दायी निदेशकों की संख्या की संगणना करने के लिए हिसाब में नहीं लिया जाएगा ;
[(घ) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के संबंध में अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने से लोप की गई किसी बात के लिए किसी विधि के अधीन अभियोजित किए जाने का भागी नहीं होगा ।]
17. जांच के पूरा होने पर यथोचित आदेश करने की बोर्ड की शक्तियां-(1) यदि धारा 16 के अधीन जांच करने के पश्चात् बोर्ड का यह समाधान हो जाता है कि कोई कंपनी रुग्ण औद्योगिक कंपनी हो गई है तो बोर्ड मामले के सभी सुसंगत तथ्यों और उसकी परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात्, लिखित आदेश द्वारा यथाशक्य शीघ्र विनिश्चय करेगा कि क्या कंपनी के लिए उचित समय के भीतर [अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक करना] साध्य है ।
(2) यदि बोर्ड उपधारा (1) के अधीन विनिश्चय करता है कि किसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी के लिए उचित समय के भीतर 2[अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक करना] साध्य है, तो बोर्ड लिखित आदेश द्वारा और ऐसे निर्बन्धनों या शर्तों के अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, कंपनी को उतना समय देगा जितना वह 2[अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक करने] के लिए ठीक समझे ।
(3) यदि बोर्ड उपधारा (1) के अधीन यह विनिश्चय करता है कि किसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी के लिए उचित समय के भीतर 2[अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक करना] साध्य नहीं है और उक्त कंपनी के संबंध में धारा 18 में विनिर्दिष्ट सभी या कोई उपाय अपनाना लोक हित में आवश्यक या समीचीन है तो वह आदेश में विनिर्दिष्ट किसी प्रचालन अभिकरण को, ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, ऐसी कंपनी के संबंध में ऐसे उपायों के लिए उपबंध करने वाली कोई स्कीम तैयार करने का निदेश दे सकेगा ।
(4) बोर्ड-
(क) यदि उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी आदेश में विनिर्दिष्ट निबन्धनों या शर्तों में से किन्हीं का संबंधित कंपनी द्वारा अनुपालन नहीं किया जाता है [या यदि वह कंपनी उक्त आदेश के अनुसरण में पुनरुज्जीवित होने में असफल रहती है] तो धारा 15 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी अभिकरण द्वारा उस निमित्त किए गए किसी निर्देश पर या स्वप्रेरणा पर ऐसे आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगा और ऐसी कंपनी के संबंध में उपधारा (3) के अधीन नया आदेश पारित कर सकेगा ;
(ख) यदि उपधारा (3) के अधीन किए गए किसी आदेश में विनिर्दिष्ट प्रचालन अभिकरण उस निमित्त कोई निवेदन करता है तो ऐसे आदेश का पुनर्विलोकन कर सकेगा और आदेश को ऐसी रीति से उपांतरित कर सकेगा जो वह उचित समझे ।
18. स्कीमें तैयार करना और मंजूर करना-(1) जहां किसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी के संबंध में धारा 17 की उपधारा (3) के अधीन कोई आदेश किया जाता है वहां उस आदेश में विनिर्दिष्ट प्रचालन अभिकरण यथासम्भव शीघ्र और सामान्यतः ऐसे आदेश की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के भीतर ऐसी कंपनी की बाबत एक स्कीम तैयार करेगा जिसमें निम्नलिखित एक या अधिक उपायों के लिए उपबंध किए जाएंगे, अर्थात् :-
[(क) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के वित्तीय पुनर्गठन के लिए ;]
(ख) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के प्रबंध में परिवर्तन करके या उसका प्रबंध ग्रहण करके उस रुग्ण औद्योगिक कंपनी के समुचित प्रबंध के लिए ; या
4[(ग) (i) रुग्ण औद्योगिक कंपनी का किसी अन्य कंपनी के साथ, या
(ii) किसी अन्य कंपनी का रुग्ण औद्योगिक कंपनी के साथ,
समामेलन करने के लिए (जिसे इस धारा में इसके पश्चात्, उपखंड (i) की दशा में, अन्य कंपनी को और उपखंड (ii) की दशा में, रुग्ण औद्योगिक कंपनी को अंतरिती कंपनी" कहा गया है) ; ]
(घ) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के किसी औद्योगिक उपक्रम को पूर्णतः या भागतः बेचने या पट्टे पर देने के लिए ; या
[(घक) प्रबन्धकार कार्मिकों, पर्यवेक्षण कर्मचारिवृन्द और कर्मकारों का विधि के अनुसार सुव्यवस्थीकरण करने के लिए ;]
(ङ) ऐसे अन्य निवारक, सुधारात्मक और उपचारी उपायों के लिए जो उपयुक्त हों ; या
(च) ऐसे आनुषंगिक, पारिणामिक या अनुपूरक उपायों के लिए जो खंड (क) से खंड (ङ) तक में विनिर्दिष्ट उपायों के संबंध में या उनके प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन हों ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट स्कीम में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किए जा सकेंगे, अर्थात् :-
(क) यथास्थिति, रुग्ण औद्योगिक कंपनी या [अंतरिती कंपनी] का गठन, नाम और रजिस्ट्रीकृत कार्यालय, पूंजी, आस्तियां, शाक्तियां, अधिकार, हित, प्राधिकार और विशेषाधिकार, कर्तव्य और बाध्यताएं ;
(ख) 1[अन्तरिती कंपनी] को, रुग्ण औद्योगिक कंपनी के कारबार, संपत्ति, आस्तियों और दायित्वों का ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जो स्कीम में विनिर्दिष्ट की जाएं, अन्तरण ;
(ग) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के निदेशक बोर्ड में कोई परिवर्तन या नए निदेशक बोर्ड की नियुक्ति और वह प्राधिकरण जिसके द्वारा, वह रीति जिससे और ऐसे अन्य निबंधन तथा शर्तें जिन पर, ऐसा परिवर्तन या नियुक्ति की जाएगी और किसी नए निदेशक बोर्ड या किसी निदेशक की नियुक्ति की दशा में वह कालावधि जिसके लिए ऐसी नियुक्ति की जाएगी ;
(घ) यथास्थिति, रुग्ण औद्योगिक कंपनी या 1[अन्तरिती कंपनी] के संगम ज्ञापन या संगम अनुच्छेद में, उसके पूंजी संघटन में परिवर्तन करने के प्रयोजन के लिए या ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए परिवर्तन जो पुनर्गठन या समामेलन को प्रभावी करने के लिए आवश्यक हो ;
(ङ) यथास्थिति, रुग्ण औद्योगिक कंपनी या 1[अन्तरिती कंपनी] द्वारा या उसके विरुद्ध ऐसी किसी कार्रवाई या अन्य विधिक कार्यवाहियों का चालू किया जाना, जो धारा 17 की उपधारा (3) के अधीन किए गए आदेश की तारीख से ठीक पूर्व रुग्ण औद्योगिक कंपनी के विरुद्ध लंबित थी ;
(च) ऐसे हित या अधिकारों में, जो शेयर धारक रुग्ण औद्योगिक कंपनी में रखते हैं, उस परिमाण तक कमी, जिसे निदेशक बोर्ड रुग्ण औद्योगिक कंपनी के पुनर्गठन, पुनरुज्जीवन या पुनरुद्धार के हित में या रुग्ण औद्योगिक कंपनी के कारबार को बनाए रखने के लिए आवश्यक समझे ;
(छ) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के शेयर धारकों को, यथास्थिति, रुग्ण औद्योगिक कंपनी या अन्तरिती औद्योगिक कंपनी में शेयरों का आबंटन और जहां कोई शेयर धारक नकद संदाय के लिए, न कि शेयरों के आबंटन के लिए दावा करता है, या जहां किसी शेयर धारक को शेयरों का आबंटन करना संभव नहीं है, वहां उन शेयर धारकों को उनके दावों की पूर्ण तुष्टि के लिए-
(i) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के पुनर्गठन या समामेलन के पूर्व शेयरों में उनके हित के संबंध में,
(ii) जहां ऐसे हित को खंड (च) के अधीन कम कर दिया गया है वहां इस प्रकार कम किए गए शेयरों में उनके हित के संबंध में,
नकद संदाय ;
(ज) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के पुनर्गठन या समामेलन के लिए कोई अन्य निबंधन और शर्तें ;
(झ) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के औद्योगिक उपक्रम का, सभी विल्लंगमों और कंपनी के सभी दायित्वों या अन्य ऐसे विल्लंगमों और दायित्वों से रहित, जो विनिर्दिष्ट किए जाएं, किसी व्यक्ति को, जिसके अंतर्गत ऐसे उपक्रम के कर्मचारियों द्वारा विरचित सहकारी सोसाइटी है विक्रय करना या ऐसे विक्रय के लिए आरक्षित कीमत नियत करना ;
(ण) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के औद्योगिक उपक्रम का किसी व्यक्ति को, जिसके अन्तर्गत ऐसे उपक्रम के कर्मचारियों द्वारा विरचित सहकारी सोसाइटी है, पट्टा देना ;
(ट) रुग्ण औद्योगिक कंपनी के औद्योगिक उपक्रम की आस्तियों के विक्रय का ढंग जैसे लोक नीलामी द्वारा या निविदाएं आमंत्रित करके या किसी अन्य रीति से, या विनिर्दिष्ट की जाए, और उसके लिए प्रचार की रीति के लिए ;
(ठ) किसी औद्योगिक कंपनी या किसी व्यक्ति को, जिसके अन्तर्गत रुग्ण औद्योगिक कंपनी के कार्यपालक और कर्मचारी भी हैं, रुग्ण औद्योगिक कंपनी में शेयरों का, अंकित मूल्य पर या वास्तविक मूल्य पर जो कि बट्टा मूल्य पर हो सकेगा, या ऐसे अन्य मूल्य पर, जो विनिर्दिष्ट किया जाए अन्तरण या निर्गमित किया जाना ;
(ङ) ऐसे आनुषंगिक, पारिणामिक और अनुपूरक विषय जो यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हों कि स्कीम में वर्णित पुनर्गठन या समामेलन या अन्य उपाय पूर्ण और प्रभावी रूप से किए गए हैं ।
(3) 1[(क) प्रचालन अभिकरण द्वारा तैयार की गई स्कीम की बोर्ड द्वारा परीक्षा की जाएगी और उस स्कीम के प्रारूप की एक प्रति, बोर्ड द्वारा किए गए उपान्तरण के साथ, यदि कोई हो, रुग्ण औद्योगिक कंपनी और प्रचालन अभिकरण को तथा समामेलन की दशा में, संबंधित किसी अन्य कंपनी को भी, भेजी जाएगी और बोर्ड प्रारूप स्कीम को संक्षेप में ऐसे दैनिक समाचारपत्रों में, जिन्हें बोर्ड आवश्यक समझे, ऐसी अवधि के भीतर जो बोर्ड विनिर्दिष्ट करे, सुझावों और आक्षेपों के लिए, यदि कोई हों, प्रकाशित करेगा या प्रकाशित कराएगा ;]
(ख) बोर्ड, स्कीम के प्रारूप में ऐसे उपान्तरण, यदि कोई हों, कर सकेगा जो वह रुग्ण औद्योगिक कंपनी और प्रचालन अभिकरण से, और [अन्तरिती कंपनी] से भी और समामेलन से संबंधित 1[किसी अन्य कंपनी] से तथा 1[ऐसी कंपनियों] के किसी शेयर धारक या अन्य लेनदारों अथवा कर्मचारियों से प्राप्त हुए सुझावों और आक्षेपों को ध्यान में रखते हुए आवश्यक समझे :
परन्तु जहां स्कीम ॥। समामेलन के संबंध में हो, वहां उक्त स्कीम को 1[रुग्ण औद्योगिक कंपनी से भिन्न कंपनी] के समक्ष उसके साधारण अधिवेशन में शेयर धारकों के अनुमोदन के लिए रखा जाएगा और ऐसी किसी स्कीम पर तब तक कार्यवाही नहीं की जाएगी जब तक उसे उपान्तरण सहित या उसके बिना 2[रुग्ण औद्योगिक कंपनी से भिन्न कंपनी] शेयर धारकों द्वारा पारित विशेष संकल्प द्वारा अनुमोदित न कर दिया गया हो ।
(4) तत्पश्चात् स्कीम यथाशक्य शीघ्र बोर्ड द्वारा मंजूर की जाएगी (जिसे इसमें इसके पश्चात् मंजूर की गई स्कीम" कहा गया है) और उस तारीख को प्रवृत्त होगी जो बोर्ड इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे
परन्तु स्कीम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी ।
(5) बोर्ड प्रचालन संबंधी अभिकरण की सिफारिशों पर या अन्यथा मंजूर की गई किसी स्कीम का पुनर्विलोकन कर सकेगा और ऐसे उपान्तरण कर सकेगा जो वह उचित समझे या लिखित आदेश द्वारा, आदेश में विनिर्दिष्ट प्रचालन संबंधी किसी अभिकरण को, ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, ऐसे उपायों के लिए जो प्रचालन अभिकरण आवश्यक समझे, उपबंध करने वाली नई स्कीम बनाने का निदेश दे सकेगा ।
(6) जब उपधारा (5) के अधीन कोई नई स्कीम तैयार की जाती है तब उस संबंध में उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबंध उसी प्रकार लागू होंगे जैसे उपधारा (1) के अधीन तैयार की गई किसी स्कीम के संबंध में लागू होते हैं ।
[(6क) जहां मंजूर की गई किसी स्कीम में रुग्ण औद्योगिक कंपनी की किसी संपत्ति या दायित्व को किसी अन्य कंपनी या व्यक्ति के पक्ष में अंतरण करने के लिए उपबंध किया जाता है या जहां ऐसी स्कीम में किसी अन्य कंपनी या व्यक्ति की किसी संपत्ति या दायित्व का रुग्ण औद्योगिक कम्पनी के पक्ष में अंतरण करने के लिए उपबंध किया जाता है, वहां उस स्कीम के आधार पर और उसमें उपबंधित सीमा तक, मंजूर की गई स्कीम या उसके किसी उपबंध के प्रवर्तन में आने की तारीख से ही, ऐसी संपत्ति, यथास्थिति, ऐसी अन्य कम्पनी या व्यक्ति या रुग्ण औद्योगिक कम्पनी को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएगी और ऐसा दायित्व, यथास्थिति, ऐसी अन्य कम्पनी या व्यक्ति या रुग्ण औद्योगिक कंपनी का दायित्व, हो जाएगा ।]
(7) उपधारा (4) के अधीन बोर्ड द्वारा दी गई मंजूरी इस बात का निश्चायक साक्ष्य होगी कि उसमें विनिर्दिष्ट पुनर्गठन या समामेलन या किसी अन्य उपाय से संबंधित इस स्कीम की सभी अपेक्षाओं का अनुपालन किया गया है और मंजूर की गई स्कीम की ऐसी प्रति जिसे बोर्ड का कोई अधिकारी उसकी सत्य प्रति के रूप में प्रमाणित करे, सभी विधिक कार्यवाहियों में (चाहे अपील में या अन्यथा) साक्ष्य के रूप में ग्रहण की जाएगी ।
1[(8) मंजूर की गई स्कीम या उसके किसी उपबंध के प्रवर्तन में आने की तारीख से ही, स्कीम या ऐसा उपबंध, यथास्थिति, रुग्ण औद्योगिक कम्पनी और अंतरिती कम्पनी या अन्य कम्पनी पर और उक्त कम्पनियों के शेयर धारकों, लेनदारों, प्रत्याभूतिदाताओं और कर्मचारियों पर भी आबद्धकर होगा ।]
(9) यदि मंजूर की गई स्कीम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो बोर्ड प्रचालन अभिकरण की सिफारिश पर 3[या अन्यथाट आदेश द्वारा कोई भी ऐसी बात कर सकेगा जो ऐसे उपबंधों से असंगत न हो और जो कठिनाई दूर करने के प्रयोजन के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ।
(10) यदि बोर्ड ऐसा करना आवश्यक या समीचीन समझता है तो वह लिखित आदेश द्वारा, आदेश में विनिर्दिष्ट प्रचालन किसी अभिकरण को निदेश दे सकेगा कि वह ऐसे निबंधनों और शर्तों सहित और ऐसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी के संबंध में, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, मंजूर की गई किसी स्कीम को कार्यान्वित करे ।
(11) जहां रुग्ण औद्योगिक कंपनी के सम्पूर्ण उपक्रम का मंजूर की गई स्कीम के अधीन विक्रय कर दिया जाता है वहां बोर्ड विक्रय आगम के हकदार पक्षकारों को कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 529 के उपबंधों और अन्य उपबंधों के अनुसार उसका वितरण कर सकेगा ।
3[(12) बोर्ड, मंजूर की गई स्कीम के कार्यान्वयन को कालिकतः मानीटर कर सकेगा ।]
19. वित्तीय सहायता देकर पुनरुद्धार-(1) जहां स्कीम किसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी की बाबत निवारक, सुधारात्मक, उपचारी और अन्य उपायों के संबंध में है, वहां स्कीम में रुग्ण औद्योगिक कंपनी को केन्द्रीय सरकार, किसी राज्य सरकार, किसी अनुसूचित बैंक या अन्य बैंक, किसी लोक वित्तीय संस्था या राज्य स्तर की संस्था या किसी संस्था या अन्य प्राधिकरण (कोई सरकार, बैंक, संस्था या अन्य प्राधिकरण, जिससे किसी स्कीम द्वारा ऐसी वित्तीय सहायता की व्यवस्था करने की अपेक्षा की गई है, जिसे इस धारा में इसके पश्चात् वह व्यक्ति, जिससे स्कीम द्वारा वित्तीय सहायता की व्यवस्था करने की अपेक्षा की गई है, कहा गया है) द्वारा उधारों, अग्रिमों या प्रत्याभूतियों या अनुतोष या रियायतों या त्याग के रूप में वित्तीय सहायता के लिए उपबंध किया जा सकेगा ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक स्कीम ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को, परिचालित की जाएगी, जिससे स्कीम द्वारा वित्तीय सहायता की व्यवस्था करने की अपेक्षा की गई है और वह उस पर अपनी सम्मति ऐसे परिचालन की तारीख से साठ दिन की अवधि के भीतर देगा [या साठ दिन से अनधिक ऐसी अतिरिक्त अवधि के भीतर देगा जो बोर्ड अनुज्ञात करे और यदि ऐसी अवधि या अतिरिक्त अवधि के भीतर सम्मति प्राप्त नहीं होती है तो यह समझा जाएगा कि सम्मति दे दी गई है] ;
(3) जहां किसी स्कीम के संबंध में उपधारा (2) में निर्दिष्ट सम्मति ऐसे प्रत्येक व्यक्ति द्वारा दी गई है, जिससे स्कीम द्वारा वित्तीय सहायता की व्यवस्था करने की अपेक्षा की गई है वहां बोर्ड यथाशीघ्र स्कीम को मंजूर कर सकेगा और ऐसी मन्जूरी की तारीख से ही स्कीम सभी संबंधित व्यक्तियों पर आबद्धकर होगी ।
1[(3क) उपधारा (3) के अधीन किसी स्कीम के मंजूर किए जाने पर, वित्तीय संस्थाएं और बैंक जिनसे वित्तीय सहायता की व्यवस्था करने की अपेक्षा की गई है, पारस्परिक करार द्वारा अपने में से ऐसी किसी वित्तीय संस्था और बैंक को अभिहित करेंगे, जो संबंधित सभी वित्तीय संस्थाओं या बैंकों की ओर से स्कीम के अधीन उधारों या अग्रिमों या प्रत्याभूतियों या अनुतोषों या रियायतों या त्याग के रूप में व्यवस्था या अनुदत्त किए जाने के लिए करार पाई गई वित्तीय सहायता संवितरित करने के लिए जिम्मेदार होगा ।
(3ख) उपधारा (3क) के अधीन अभिहित वित्तीय संस्था और बैंक, रुग्ण औद्योगिक कम्पनी को इस संबंध में अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए वित्तीय सहायता को जारी करने के लिए तत्काल अग्रसर होगा ।]
(4) जहां किसी स्कीम के संबंध में उपधारा (2) के अधीन सम्मति ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा नहीं दी गई है जिससे स्कीम द्वारा वित्तीय सहायता की व्यवस्था करने की अपेक्षा की गई है, वहां बोर्ड ऐसे अन्य उपाय, जिनके अन्तर्गत रुग्ण औद्योगिक कम्पनी का परिसमापन है, जो वह ठीक समझे, कर सकेगा ।
[19क. जांच के दौरान प्रचालन, आदि के जारी रखने के लिए ठहराव-(1) धारा 16 के अधीन किसी जांच के पूरा होने के पूर्व किसी भी समय, रुग्ण औद्योगिक कम्पनी या केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक या कोई राज्य सरकार या कोई लोक वित्तीय संस्था या राज्य स्तर संस्था या कोई अनुसूचित बैंक या कोई अन्य संस्था, बैंक या प्राधिकरण, जो रुग्ण औद्योगिक कम्पनी को उधारों या अग्रिमों या प्रत्याभूतियों या अनुतोषों या रियायतों के रूप में वित्तीय सहायता की व्यवस्था कर रहा है या व्यवस्था करने का आशय रखता है, बोर्ड के समक्ष निम्नलिखित के लिए आवेदन कर सकेगा, अर्थात् :-
(क) रुग्ण औद्योगिक कम्पनी के प्रचालन को जारी रखने के लिए किसी ठहराव पर सहमति ; या
(ख) रुग्ण औद्योगिक कम्पनी के वित्तीय पुनर्गठन के लिए किसी स्कीम का सुझाव ।
(2) बोर्ड, उपधारा (1) के अधीन किसी आवेदन की प्राप्ति के साठ दिन के भीतर उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।]
20. रुग्ण औद्योगिक कंपनी का परिसमापन- [(1) जहां धारा 16 के अधीन जांच करने के पश्चात् और सभी संबंधित तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात् तथा सभी संबंधित पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् बोर्ड की यह राय है कि यह संभावना नहीं है कि रुग्ण औद्योगिक कंपनी, अपनी सभी वित्तीय बाध्यताओं को पूरा करते हुए समय के भीतर अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक कर सकेगी और उसके परिणामस्वरूप यह संभावना नहीं है कि कम्पनी भविष्य में व्यवहार्य बन सकेगी तथा यह न्यायसंगत और साम्यापूर्ण है कि कंपनी का परिसमापन किया जाना चाहिए वहां वह अपनी राय लेखबद्ध कर सकेगा और संबंधित उच्च न्यायालय को भेज सकेगा ।]
(2) उच्च न्यायालय बोर्ड की राय के आधार पर रुग्ण औद्योगिक कंपनी के परिसमापन का आदेश करेगा और रुग्ण औद्योगिक कंपनी के परिसमापन के लिए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबंध के अनुसार कार्यवाही कर सकेगा और कार्यवाही करा सकेगा ।
(3) उच्च न्यायालय, उक्त रुग्ण औद्योगिक कंपनी के परिसमापन के प्रयोजन के लिए प्रचालन संबंधी अभिकरण के किसी अधिकारी को, यदि प्रचालन संबंधी अभिकरण अपनी सम्मति देता है तो, रुग्ण औद्योगिक कंपनी के समापक के रूप में नियुक्त कर सकेगा और इस प्रकार नियुक्त किया गया अधिकारी रुग्ण औद्योगिक कंपनी के परिसमापन के प्रयोजनों के लिए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन शासकीय समापक समझा जाएगा और उसे उसके अधीन सभी शक्तियां प्राप्त होंगी ।
(4) उपधारा (2) या उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी बोर्ड रुग्ण औद्योगिक कंपनी की आस्तियों, का ऐसी रीति से, जो वह ठीक समझे, विक्रय कराएगा और विक्रय आगमों को कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 529क और अन्य उपबंधों के अनुसार वितरण के आदेशों के लिए उच्च न्यायालय को भेजेगा ।
21. प्रचालन संबंधी अभिकरण द्वारा पूरी तालिका आदि का तैयार किया जाना-जहां [इस अधिनियम के अधीन बोर्ड के कृत्यों के उचित निर्वहन के लिएट परिस्थितियों द्वारा ऐसा अपेक्षित है, वहां बोर्ड किसी प्रचालन अभिकरण की मार्फत-
(क) 1[किसी कंपनी] की बाबत-
(i) सभी आस्तियों और दायित्वों को, चाहे वे किसी भी प्रकार की हों ;
(ii) सभी लेखाबहियों, रजिस्टरों, नक्शों, योजनाओं, अभिलेखों, संपत्ति के हक या स्वामित्व दस्तावेजों और उनसे संबंधित किसी भी प्रकार की सभी अन्य दस्तावेजों की,
पूर्ण तालिका तैयार कराएगा ;
(ख) शेयर धारकों की सूची और लेनदारों की सूची तैयार कराएगा, लेनदारों की सूची में प्रतिभूत लेनदारों और अप्रतिभूत लेनदारों को अलग-अलग दर्शाया जाएगा ;
(ग) कंपनी के औद्योगिक उपक्रम के भाग के या संपूर्ण औद्योगिक उपक्रम के विक्रय के लिए आरक्षित कीमत निकालने के उद्देश्य से या पट्टा भाटक अथवा शेयर विनिमय अनुपात नियत करने के लिए शेयरों और आस्तियों की बाबत मूल्यांकन रिपोर्ट तैयार कराएगा ;
(घ) आरक्षित कीमत, पट्टा भाटक या शेयर विनिमय अनुपात का प्राकलन तैयार कराएगा ;
(ङ) जहां अद्यतन संपरीक्षित लेखा उपलब्ध नहीं है वहां प्रो-फार्मा लेखा तैयार कराएगा ।
22. विधिक कार्यवाहियों, संविदाओं आदि का निलम्बन-(1) जहां किसी औद्योगिक कम्पनी के संबंध में धारा 16 के अधीन कोई जांच लम्बित है या धारा 17 के अधीन निर्दिष्ट कोई स्कीम तैयार की जा रही है या विचाराधीन है, या मंजूर की गई कोई स्कीम कार्यान्वयाधीन है या जहां किसी औद्योगिक कंपनी के संबंध में धारा 25 के अधीन कोई अपील लम्बित है, वहां कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या किसी अन्य विधि में या औद्योगिक कम्पनी के संगम ज्ञापन और संगम अनुच्छेदों में या किसी अन्य लिखत में जो उक्त अधिनियम या अन्य विधि के अधीन प्रभावी है, किसी बात के होते हुए भी, ऐसी औद्योगिक कम्पनी के परिसमापन के लिए या औद्योगिक कम्पनी की किसी भी संपत्ति के विरुद्ध निष्पादन, करस्थम् या वैसे ही प्रकार की किसी कार्यवाही के लिए या उसकी बाबत [रिसीवर की नियुक्ति के लिए कोई कार्यवाही और धन की वसूली के लिए या औद्योगिक कम्पनी के विरुद्ध किसी प्रतिभूति का या औद्योगिक कम्पनी को दिए गए किसी ऋण या अग्रिम की बाबत किसी प्रत्याभूति का प्रवर्तन कराने के लिए कोई वाद, यथास्थिति, बोर्ड या अपील प्राधिकरण की सम्मति से ही होगा या आगे चलाया जाएगा, अन्यथा नहींट ।
(2) जहां कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या किसी अन्य विधि में या ऐसी कंपनी के संगम ज्ञापन और संगम अनुच्छेदों अथवा उक्त अधिनियम या अन्य विधि के अधीन प्रभाव रखने वाली किसी अन्य लिखत में किसी बात के होते हुए भी [धारा 18 के अधीन मंजूर की गई किसी स्कीम के अनुसरण में] रुग्ण औद्योगिक कंपनी का प्रबंध ग्रहण कर लिया जाता है या उसमें परिवर्तन किया जाता है वहां-
(क) ऐसी कंपनी के शेयर धारकों या किसी अन्य व्यक्ति के लिए यह विधिपूर्ण नहीं होगा कि वह किसी व्यक्ति को कंपनी का निदेशक नामनिर्दिष्ट करे या नियुक्त करे ;
(ख) ऐसी कंपनी के शेयर धारकों के किसी अधिवेशन में पारित कोई संकल्प तब तक प्रभावी नहीं किया जाएगा जब तक बोर्ड द्वारा उसका अनुमोदन नहीं कर दिया जाता है ।
(3) 3[जहां धारा 16 के अधीन कोई जांच लंबित है या धारा 17 में निर्दिष्ट कोई स्कीम तैयार की जा रही है या] धारा 18 के अधीन किसी स्कीम पर विचार किए जाने की अवधि के दौरान या जहां स्कीम के सम्यक् कार्यान्वयन के लिए बोर्ड द्वारा कोई ऐसी स्कीम मंजूर की जाती है वहां बोर्ड संबंधित रुग्ण औद्योगिक कंपनी की बाबत आदेश द्वारा घोषणा कर सकेगा कि आदेश की तारीख से ठीक पूर्व प्रवृत्त सभी या किन्हीं संविदाओं, संपत्ति के हस्तान्तरणपत्रों, करारों, व्यवस्थापनों, पंचाटों, स्थायी आदेशों या अन्य लिखतों का, जिनकी ऐसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी एक पक्षकार है या जो ऐसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी को लागू हो, प्रवर्तन निलंबित रहेगा और उक्त तारीख के पूर्व उनके अधीन प्रोद्भूत या उद्भूत सभी या कोई अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यताएं और दायित्व निलंबित रहेंगे और ऐसे अनुकूलनों सहित और ऐसी रीति से प्रवर्तनीय होंगे जो बोर्ड द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए :
परन्तु ऐसी घोषणा दो वर्ष से अधिक की अवधि के लिए नहीं की जाएगी जो एक बार में एक वर्ष के लिए बढ़ाई जा सकेगी किन्तु कुल अवधि सात वर्ष से अधिक की नहीं होगी ।
(4) किसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी की बाबत उपधारा (3) के अधीन की गई कोई घोषणा कंपनी अधिनियम, 1956(1956 का 1), किसी अन्य विधि, कंपनी के संगम ज्ञापन और संगम अनुच्छेदों या उक्त अधिनियम या अन्य विधि के अधीन प्रभाव रखने वाली किसी लिखत या किसी करार या किसी न्यायालय, अधिकरण, अधिकारी या अन्य प्राधिकारी की किसी डिक्री या आदेश या किसी निवेदन, व्यवस्थान या स्थायी आदेश में किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होगी और तदनुसार-
(क) ऐसी घोषणा द्वारा निलंबित या उपांतरित कोई अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता और उसके संबंध में किसी न्यायालय, अधिकरण, अधिकारी या अन्य प्राधिकारी के समक्ष लंबित सभी कार्यवाहियां रुकी रहेंगी या ऐसी घोषणा के अधीन रहते हुए ही चालू रखी जाएगी, और
(ख) घोषणा के प्रभावी न रह जाने पर-
(i) इस प्रकार निलंबित या उपांतरित रहने वाला कोई अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व ऐसे पुनरुज्जीवित और प्रवर्तनीय हो जाएगा मानो घोषणा कभी की ही नहीं गई थी ; और
(ii) इस प्रकार रुकी रहने वाली कोई कार्यवाही, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबंधों के अधीन रहते हुए उसी प्रक्रम से आगे चलाई जाएगी जिस पर वह उस समय पहुंच चुकी थी जब कार्यवाहियां रोक दी गई थीं ।
(4) किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व के प्रवर्तन के लिए परिसीमा काल की संगणना करने में, वह अवधि अपवर्जित की जाएगी जिसके दौरान यह या उसके प्रवर्तन के लिए उपाय इस धारा के अधीन निलंबित रहता है ।
[22क. आस्तियों का व्ययन न करने का निदेश-यदि बोर्ड की यह राय है कि रुग्ण औद्योगिक कंपनी या लेनदारों या शेयर धारकों के हित में अथवा लोकहित में कोई निदेश आवश्यक है तो वह, लिखित आदेश द्वारा, रुग्ण औद्योगिक कंपनी को यह निदेश दे सकेगा कि वह, बोर्ड की सहमति के बिना, अपनी किसी आस्ति का,-
(क) धारा 18 के अधीन स्कीम तैयार करने या उस पर विचार करने की अवधि के दौरान ; और
(ख) धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन कंपनी के परिसमापन के लिए बोर्ड द्वारा राय का अभिलेखन किए जाने से प्रारंभ होने वाली और संबंधित उच्च न्यायालय के समक्ष परिसमापन से संबंधित कार्यवाहियों के प्रारंभ होने तक की अवधि के दौरान व्ययन न करे ।]
अध्याय 4
संभाव्य रुग्ण कंपनियों की दशा में कार्यवाहियां, अपकरण कार्यवाहियां, अपीलें और प्रकीर्ण
23. औद्योगिक कंपनियों द्वारा पचास प्रतिशत शुद्ध मालियत की हानि-(1) यदि किसी औद्योगिक कंपनी की संचयित हानियों की रकम से, जैसी कि वह किसी वित्तीय वर्ष के (जिसे इसमें इसके पश्चात् सुसंगत वित्तीय वर्ष कहा गया है) अन्त में हो, ठीक पूर्ववर्ती [चार वित्तीय वर्षों] के दौरान उसकी चरम शुद्ध मालियत के पचास प्रतिशत के बराबर या उससे अधिक कमी हुई है तो-
(क) कम्पनी, सुसंगत वित्तीय वर्ष के लिए कम्पनी के सम्यक् रूप से संपरीक्षित लेखाओं को अन्तिम रूप दिए जाने की तारीख से (जिसे इसमें इसके पश्चात् सुसंगत तारीख कहा गया है) साठ दिन के भीतर-
(i) ऐसी कमी के तथ्य की रिपोर्ट बोर्ड को करेगी ; और
(ii) ऐसी कमी पर विचार करने के लिए कंपनी के शेयर धारकों का साधारण अधिवेशन करेगी ;
(ख) निदेशक बोर्ड ऐसी तारीख से, जिसको खंड (क) के उपखंड (ii) के अधीन अधिवेशन किया जाता है, कम से कम इक्कीस दिन पूर्व, कम्पनी के प्रत्येक सदस्य को ऐसी कमी के बारे में और ऐसी कमी के लिए कारणों के बारे में रिपोर्ट भेजेगा ।
(ग) कंपनी खंड (क) के अधीन किए गए अधिवेशन में पारित साधारण संकल्प द्वारा किसी ऐसे निदेशक को (जो कंपनी के सदस्यों द्वारा नियुक्त कोई निदेशक है) हटा सकेगी और ऐसे हटाए जाने से उत्पन्न रिक्ति को, जहां तक हो सके, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 284 की उपधारा (2) से उपधारा (6) तक में उपबंधित क्रिया के अनुसार, भर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन हटाया गया कोई निदेशक, निदेशक के रूप में अपनी नियुक्ति की अथवा ऐसी किसी नियुक्ति की, जो निदेशक के रूप में नियुक्ति के साथ ही समाप्त हो जाती है, समाप्ति के लिए किसी प्रतिकर या नुकसानी का हकदार नहीं होगा ।
(3) यदि इस धारा के उपबंधों का अनुपालन करने में कोई व्यतिक्रम किया जाता है तो कंपनी का प्रत्येक निदेशक या अन्य अधिकारी, जो व्यतिक्रम करता है, कारावास से, जिसकी अवधि छह मास से कम की नहीं होगी किन्तु दो वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने से, दंडनीय होगा ।
[23क. शुद्ध मालियत के पचास प्रतिशत की हानि की रिपोर्ट, आदि पर कार्यवाहियां-(1) धारा 23 की उपधारा (1) के खंड (क) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक या कोई राज्य सरकार या कोई लोक वित्तीय संस्था या कोई राज्य स्तर संस्था या कोई अनुसूचित बैंक, यदि उसके पास यह विश्वास करने का पर्याप्त कारण है कि किसी औद्योगिक कंपनी की संचयित हानियों से ठीक पूर्ववर्ती चार वित्तीय वर्षों के दौरान उसकी चरम शुद्ध मालियत के पचास प्रतिशत के बराबर या उससे अधिक कमी हुई है तो वह, ऐसी कमी के तथ्य की रिपोर्ट बोर्ड को करेगा ।
(2) यदि बोर्ड के पास प्राप्त जानकारी या अपने ज्ञान के आधार पर यह विश्वास करने का कारण है कि किसी औद्योगिक कंपनी की संचयित हानियों से ठीक पूर्ववर्ती चार वित्तीय वर्षों के दौरान उसकी चरम शुद्ध मालियत के पचास प्रतिशत के बराबर या उससे अधिक कमी हुई है तो वह उस कंपनी से ऐसी जानकारी मांग सकेगा जो वह ठीक समझे ।
(3) जहां बोर्ड की यह राय है कि यह संभावना नहीं है कि उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई औद्योगिक कंपनी, अपनी सभी वित्तीय बाध्यताओं को पूरा करते हुए, उचित समय के भीतर, अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक कर सकेगी और उसके परिणामस्वरूप यह संभावना नहीं है कि कंपनी भविष्य में व्यवहार्य बन सकेगी वहां वह, किसी प्रचालन अभिकरण से ऐसे विषयों की बाबत, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, जांच करने और रिपोर्ट देने की, आदेश द्वारा, अपेक्षा कर सकेगा ।
(4) प्रचालन अभिकरण की रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात्, बोर्ड कोई सूचना ऐसे दैनिक समाचार-पत्रों में, जिन्हें बोर्ड आवश्यक समझे, इस बारे में कि कंपनी का परिसमापन क्यों न कर दिया जाए, ऐसी अवधि के भीतर, जो बोर्ड विनिर्दिष्ट करे, सुझावों और आक्षेपों के लिए, यदि कोई हों, प्रकाशित कर सकेगा या करा सकेगा ।
(5) जहां सुसंगत तथ्यों और परिस्थितियों पर विचार करने के पश्चात् तथा सभी संबंधित पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, बोर्ड की यह राय है कि यह संभावना नहीं है कि औद्योगिक कंपनी, अपनी, सभी वित्तीय बाध्यताओं को पूरा करते हुए, उचित समय के भीतर अपनी शुद्ध मालियत संचयित उधारों से अधिक कर सकेगी और उसके परिणामस्वरूप यह संभावना नहीं है कि कंपनी, भविष्य में व्यवहार्य बन सकेगी तथा यह न्यायसंगत और साम्यापूर्ण है कि कंपनी का परिसमापन किया जाना चाहिए वहां बोर्ड, कंपनी के संबंध में अपनी राय लेखबद्ध कर सकेगा और उसे संबंधित उच्च न्यायालय को अग्रेषित कर सकेगा मानो वह रुग्ण औद्योगिक कंपनी हो और तद्नुसार धारा 20 की उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (4) के उपबंध लागू होंगे ।
23ख. बोर्ड की कालिक जानकारी मांगने की शक्ति-धारा 23 की उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (i) के अधीन या धारा 23क की उपधारा (2) के अधीन किसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर अथवा धारा 23क की उपधारा (2) के अधीन जानकारी या अपने ज्ञान के आधार पर बोर्ड, कंपनी से उस कार्रवाई के बारे में जो कंपनी ने अपनी शुद्ध मालियत संचयित हानियों से अधिक करने के लिए की हो, कोई कालिक जानकारी मांग सकेगा और कंपनी ऐसी जानकारी देगी ।]
24. अपकरण कार्यवाहियां-(1) यदि, किसी स्कीम या प्रस्ताव की संवीक्षा या कार्यान्वयन के दौरान, बोर्ड को यह प्रतीत होता है कि ऐसा कोई व्यक्ति, जिसने रुग्ण औद्योगिक कंपनी या उसके उपक्रम के संप्रवर्तन, बनाए जाने या प्रबन्ध में भाग लिया है, जिसके अन्तर्गत रुग्ण औद्योगिक कंपनी का कोई भूतपूर्व या वर्तमान निदेशक, प्रबन्धक अथवा अधिकारी या कर्मचारी भी है-
(क) जिसने रुग्ण औद्योगिक कम्पनी के किसी धन या संपत्ति का दुरुपयोजन या प्रतिधारण किया है अथवा उसके लिए दायित्वाधीन या लेखादायी हो गया है ; या
(ख) जो रुग्ण औद्योगिक कंपनी के संबंध में किसी अपकरण, दुष्करण या अकरण या न्यास भंग का दोषी रहा है,
तो बोर्ड धन या संपत्ति या उसके किसी भाग का, ब्याज सहित या उसके बिना, जो वह न्यायसंगत समझे, प्रतिसंदाय या प्रत्यावर्तन करने के लिए अथवा रुग्ण औद्योगिक कंपनी या उसके हकदार अन्य व्यक्ति की आस्तियों में दुरुपयोजन, प्रतिधारण, अपकरण या न्यास भंग की बाबत प्रतिकर के रूप में ऐसी रकम का, जो बोर्ड न्याय संगत समझे, अभिदाय करने के लिए उसको आदेश द्वारा निदेश दे सकेगा और मामले की रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को किसी अन्य कार्रवाई के लिए, जो वह सरकार ठीक समझे, कर सकेगा ।
(2) यदि बोर्ड का ऐसे किसी व्यक्ति के बारे में, जो रुग्ण औद्योगिक कम्पनी का कोई निदेशक या अधिकारी या अन्य कर्मचारी है या था, अपने कब्जे में की किसी जानकारी और साक्ष्य के आधार पर यह समाधान हो जाता है कि ऐसे व्यक्ति ने स्वयं या किसी अन्य व्यक्ति के साथ ऐसी कम्पनी की निधियों या अन्य सम्पत्ति का कम्पनी के सद्भाविक प्रयोजनों से भिन्न किसी प्रयोजन के लिए अपयोजन किया है या कम्पनी के कार्यकलापों का प्रबंध कंपनी के हित के लिए अति हानिकारक रीति से किया है तो बोर्ड, लोक वित्तीय संस्थाओं, अनुसूचित बैंकों और राज्य स्तर की संस्थाओं को आदेश द्वारा यह निदेश देगा कि आदेश की तारीख से दस वर्ष की अवधि के दौरान ऐसे व्यक्ति को या किसी फर्म को, जिसका ऐसा व्यक्ति कोई भागीदार है या किसी ऐसी कम्पनी या अन्य निगमित निकाय को, जिसका ऐसा व्यक्ति निदेशक है (उसका चाहे जो नाम हो), कोई वित्तीय सहायता न दे ।
(3) बोर्ड द्वारा इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक कि ऐसे व्यक्ति को अपना निवेदन करने का अवसर न दिया गया हो ।
(4) यह धारा इस बात के होते हुए भी लागू होगी कि वह विषय ऐसा विषय है जिसके लिए ऐसा व्यक्ति आपराधिक दायित्व के अधीन हो सकेगा ।
25. अपील-(1) इस अधिनियम के अधीन किए गए बोर्ड के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसी तारीख से जिसको, आदेश की प्रति उसको जारी की जाती है, पैंतालीस दिन के भीतर, अपील प्राधिकरण को अपील कर सकेगा ।
परन्तु अपील प्राधिकरण पैंतालीस दिन की उक्त अवधि के पश्चात् किन्तु पूर्वोक्त तारीख से साठ दिन के अपश्चात्, कोई अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय के भीतर अपील फाइल करने से पर्याप्त हेतुक से निवारित हो गया था ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अपील की प्राप्ति पर, अपील प्राधिकरण, अपीलार्थी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, यदि वह ऐसा चाहता है तो और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, ऐसे आदेश को, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्ट, उपांतरित या अपास्त कर सकेगा [या मामले का नए सिरे से विचार करने के लिए बोर्ड को प्रतिप्रेषण कर सकेगा] ।
26. अधिकारिता का वर्जन-इस अधिनियम के अधीन पारित कोई आदेश या किया गया प्रस्ताव, जैसा उसमें उपबंधित है उसके सिवाय, अपीलीय नहीं होगा और किसी सिविल न्यायालय को किसी ऐसे विषय की बाबत जिसका अवधारण करने के लिए अपील प्राधिकरण या बोर्ड इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन सशक्त है, अधिकारिता नहीं होगी, और कोई व्यादेश इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्रवाई की बाबत किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकरण द्वारा अनुदत्त नहीं किया जाएगा ।
27. शक्तियों का प्रत्यायोजन-बोर्ड, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, बोर्ड के किसी सदस्य या सचिव या अन्य अधिकारी या कर्मचारी अथवा बोर्ड द्वारा प्राधिकृत अन्य व्यक्ति को ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के, यदि कोई हों, जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, अधीन रहते हुए, किसी औद्योगिक कंपनी या औद्योगिक उपक्रम या किसी प्रचालन संबंधी अभिकरण का प्रबन्ध करने के लिए इस अधिनियम के अधीन ऐसी शक्तियों और कर्तव्यों का, धारा 16 की उपधारा (2) और उपधारा (4), धारा 17, धारा 19 की उपधारा (3) और उपधारा (4), धारा 20 की उपधारा (1) और उपधारा (4), धारा 22 की उपधारा (3) और धारा 24 के अधीन शक्तियों और कर्तव्यों को छोड़कर, जो वह आवश्यक समझे, प्रत्यायोजन कर सकेगा ।
28. विवरणियां और जानकारी-(1) बोर्ड, केन्द्रीय सरकार की समय-समय पर ऐसी विवरणियां देगा जिनकी केन्द्रीय सरकार अपेक्षा करे ।
(2) बोर्ड, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के प्रयोजन के लिए,-
(क) केन्द्रीय सरकार,
(ख) रिजर्व बैंक,
(ग) अनुसूचित बैंक या किसी अन्य बैंक,
(घ) लोक वित्तीय संस्था, । । ।
(ङ) राज्य स्तर संस्था, [या]
3[(च) रुग्ण औद्योगिक कंपनी और समामेलन की दशा में, अन्य कंपनी,]
से ऐसी जानकारी जो वह इस प्रयोजन के लिए उपयोगी समझे, ऐसी रीति से और ऐसे समय के भीतर जो वह ठीक समझे संगृहीत कर सकेगा या उसे दे सकेगा ।
29. मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट और जिला मजिस्ट्रेट की सहायता प्राप्त करने की शक्ति-(1) बोर्ड या कोई प्रचालन संबंधी अभिकरण, बोर्ड द्वारा निर्दिष्ट किए जाने पर सभी ऐसी संपत्ति, चीजबस्त या अनुयोज्य दावों को जिनकी रुग्ण औद्योगिक कंपनी हकदार है या हकदार प्रतीत होती है, अभिरक्षा या नियंत्रण में लेने की दृष्टि से, ऐसे मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट से जिसकी अधिकारिता के भीतर ऐसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी की कोई संपत्ति, लेखाबहियां या अन्य दस्तावेजें हैं या पाई जाती हैं, उनका कब्जा लेने के लिए, लिखित रूप में अनुरोध कर सकेगा और, यथास्थिति, मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट उससे ऐसा अनुरोध किए जाने पर,-
(i) ऐसी संपत्ति, लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों को कब्जे में लेगा ; और
(ii) उन्हें बोर्ड या प्रचालन संबंधी अभिकरण को सौंप देगा ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों का अनुपालन सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट ऐसे कदम उठा सकेगा या उठवा सकेगा और ऐसे बल का प्रयोग कर सकेगा या करवा सकेगा, जो उसकी राय में आवश्यक है ।
(3) मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा इस धारा के अनुसरण में किया गया कोई कार्य किसी न्यायालय में या किसी प्राधिकारी के समक्ष, किसी भी आधार पर, प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
30. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी हानि या नुकसान के लिए जो ऐसी कार्रवाई द्वारा, जो इस अधिनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित है, हुई या होनी संभाव्य है, बोर्ड या अपील प्राधिकरण या बोर्ड अथवा अपील प्राधिकरण के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य, अधिकारी या अन्य कर्मचारी या प्रचालन संबंधी अधिकरण या इस अधिनियम के अधीन किसी कृत्य के निर्वहन के लिए बोर्ड या अपील प्राधिकरण द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।
31. लम्बित कार्यवाहियों की व्यावृत्ति-जहां किसी औद्योगिक कंपनी के परिसमापन के लिए किसी कार्यवाही में, जो इस अधिनियम के ठीक पूर्व किसी उच्च न्यायालय में लम्बित है कोई रिसीवर या शासकीय समापक नियुक्त किया गया है वहां ऐसी कार्यवाही का उपशमन नहीं होगा किन्तु वह ऐसे उच्च न्यायालय में चालू रहेगी [और ऐसी औद्योगिक कंपनी की बाबत कोई भी कार्यवाही बोर्ड के समक्ष नहीं होगी या आगे चलाई नहीं जाएगी] ।
32. अधिनियम का अन्य विधियों पर प्रभाव-(1) इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या स्कीम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में, विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) और नगर भूमि (अधिकतम सीमा और विनियमन) अधिनियम, 1976 (1976 का 33) के उपबंधों को छोड़कर या किसी औद्योगिक कंपनी के संगम ज्ञापन या संगम अनुच्छेद अथवा इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी अन्य लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।
(2) जहां इस अधिनियम के अधीन किसी स्कीम के अधीन किसी रुग्ण औद्योगिक कंपनी का किसी दूसरी कंपनी के साथ समामेलन हो गया है, वहां आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) की धारा 72क के उपबंध, ऐसे उपांतरणों के अधीन रहते हुए कि बोर्ड द्वारा उस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार की शक्ति का प्रयोग, उस धारा में निर्दिष्ट विनिर्दिष्ट प्राधिकारी द्वारा की गई किसी सिफारिश के बिना किया जा सकेगा, ऐसे समामेलन के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे दूसरी कंपनी के साथ किसी औद्योगिक उपक्रम का स्वामित्व रखने वाली कंपनी के समामेलन के संबंध में लागू होते हैं ।
। । । । ।
33. कुछ अपराधों के लिए शास्ति-(1) जो कोई इस अधिनियम या किसी स्कीम के उपबंधों या बोर्ड अथवा अपील प्राधिकरण के किसी आदेश का उल्लंघन करेगा और जो कोई बोर्ड अथवा अपील प्राधिकरण को मिथ्या कथन करेगा या मिथ्या साक्ष्य देगा वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।
[(2) कोई भी न्यायालय, उपधारा (1) के अधीन किसी अपराध का संज्ञान, बोर्ड के सचिव या ऐसे किसी अन्य अधिकारी या अपील प्राधिकरण या किसी प्रचालन अभिकरण के किसी ऐसे अधिकारी के, जो बोर्ड या अपील प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया जाए, लिखित परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।]
34. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि वह अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था अथवा उसने ऐसे अपराध के निवारण के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सम्मति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी, उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है ; और
(ख) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का कोई भागीदार अभिप्रेत है ।
35. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों, बनाई गई स्कीमों या निकाले गए आदेशों के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसी कठिनाई को दूर कर सकेगी :
परन्तु ऐसी कोई अधिसूचना उस तारीख से, जिसकी इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त होती है तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् केन्द्रीय सरकार द्वारा नहीं निकाली जाएगी ।
36. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 6 की उपधारा (7) के अधीन अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें ;
(ख) वे शक्तियां जिनका प्रयोग और वे कर्तव्य जिनका पालन धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन बोर्ड या अपील प्राधिकरण के सचिव द्वारा किया जा सकेगा ;
(ग) वे निबन्धन और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए, अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन बोर्ड या अपील प्राधिकरण में की जा सकेगी ;
(घ) धारा 8 की उपधारा (3) के अधीन बोर्ड या अपील प्राधिकरण के सचिव और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें ;
(ङ) धारा 13 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट अतिरिक्त विषय ;
(च) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में हो प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
अनुसूची
[धारा 6(8) और धारा 8(3) देखिए]
विश्वसनीयता और गोपनीयता की घोषणा
मैं..................................................................घोषणा करता हूं कि मैं औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण बोर्ड/औद्योगिक और वित्तीय पुनर्निर्माण प्राधिकरण के अध्यक्ष, सदस्य, सचिव, अन्य अधिकारी या कर्मचारी के रूप में मुझसे अपेक्षित और उक्त बोर्ड/अपील प्राधिकरण में या उसके संबंध में मेरे द्वारा धारित पद या ओहदे से उचित रूप से संबंधित कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक, सच्चाई से तथा अपने सर्वोत्तम कौशल और योग्यता से निष्पादन और पालन करूंगा ।
मैं यह भी घोषणा करता हूं कि मैं बोर्ड/अपील प्राधिकरण के कार्यकलापों से संबंधित कोई जानकारी ऐसे किसी व्यक्ति को, जो उसका विधिक रूप से हकदार नहीं है, संसूचित नहीं करूंगा या संसूचित नहीं होने दूंगा तथा ऐसे व्यक्ति को बोर्ड/अपील प्राधिकरण की या उसके कब्जे में की या उक्त बोर्ड/अपील प्राधिकरण के साथ व्यवहार करने वाले व्यक्ति के कारबार से संबंधित किन्हीं बहियों या दस्तावेजों का निरीक्षण नहीं करने दूंगा और उसकी उन तक पहुंच नहीं होने दूंगा ।
मेरे समक्ष हस्ताक्षरित ।
हस्ताक्षर
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