संसद् के अधिनियम
भरणपोषण आदेश प्रवर्तन अधिनियम, 1921
(1921 का अधिनियम संख्यांक 18)1
[5 अक्तूबर, 1921]
23॥।४व्यतिकारी राज्यक्षेत्रों 5॥। में किए गए भरणपोषण आदेशों
के ६भारत में और भारत में किए गए ऐसे आदेशों के
व्यतिकारी राज्यक्षेत्रों में प्रवर्तन को सुकर
बनाने के लिए
अधिनियम
यतः यह समीचीन है कि 4व्यतिकारी राज्यक्षेत्रों, 5॥ में किए गए भरणपोषण आदेशों के ६भारत में और भारत में किए गए ऐसे आदेशों के व्यतिकारी राज्यक्षेत्रों में प्रवर्तन को सुकर बनाया जाए;
अतः एतद््द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है:
- संक्षिप्त नाम और विस्तार - (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भरणपोषण आदेश प्रवर्तन अधिनियम, 1921 है ।
- 1 यह अधिनियम, 1963 के विनियम सं. 6 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा (1-7-1965 से) दादरा और नागर हवेली को विस्तारित और प्रवृत्त हुआ । यह अधिनियम, 1968 के अधिनियम सं. 26 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र पर लागू होने के लिए विस्तारित किया गया ।
- 2 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा के अन्य भागों में के स्थान पर प्रतिस्थपित ।
- 3 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा भाग ख राज्यों में या शब्दों का लोप किया गया ।
- 4 1952 के अधिनियम सं. 47 की धारा 2 द्वारा हिज मैजेस्टीज डोमिनियन एण्ड प्रोटेक्टारेट्स के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 5 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा सम्मिलित होने वाले राज्य अन्य भारतीय राज्यों शब्दों का लोप किया गया ।
- 6 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा भाग क राज्य और भाग ग राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
1(2) इसका विस्तार २जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।
- परिभाषाएं - इस अधिनियम में जब तक कि कोई बात विषय या संदर्भ में विरुद्ध न हो:
संक्षिप्त अधिकारिता का न्यायालय से मुख्य प्रेसिडेंसी मजिस्ट्रेट या जिला मजिस्ट्रेट का न्यायालय अभिप्रेत है;
आश्रित से ऐसे व्यक्ति अभिप्रेत हैं, जिनको वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध भरणपोषण आदेश किया गया है; उस 3व्यतिकारी राज्यक्षेत्र में जिसमें भरणपोषण आदेश दिया गया है प्रवृत्त विधि के अनुसार भरणपोषण करने के लिए दायी है ;
४भारत से जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय भारत का राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है;
भरणपोषण आदेश से किसी न्यायालय द्वारा सिविल या दांडिक अधिकारिता के प्रयोग में उस व्यक्ति की जिसके विरुद्ध आदेश दिया गया है पत्नी या अन्य आश्रितों के भरणपोषण के लिए धनराशियों के कालिक संदाय के लिए, सम्बद्ध किए जाने के आदेश से भिन्न, कोई डिक्री या आदेश अभिप्रेत है;
विहित से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
उचित प्राधिकारी से किसी व्यतिकारी राज्यक्षेत्र की विधि के अधीन या उसके द्वारा उन दस्तावेजों को जिनको यह अधिनियम लागू होता है, प्राप्त करने और पारेषित करने के लिए नियुक्त प्राधिकारी अभिप्रेत है; और
- 1 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा पूर्ववर्ती उपधारा (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा भाग ख राज्यों के सिवाय के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 3 1952 के अधिनियम सं. 47 की धारा 3 द्वारा हिज मैजेस्टीज डोमिनियन्स के भाग के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 4 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा अंतःस्थापित ।
1व्यतिकारी राज्यक्षेत्र से भारत से बाहर ऐसा देश या राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है जिसकी बाबत यह अधिनियम धारा 3 के अधीन घोषणा के आधार पर तत्समय लागू होता है ।
2। । । । ।
- व्यतिकारी व्यवस्था की घोषणा - यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि भारत के बाहर किसी देश या राज्यक्षेत्र में, भारत के न्यायालयों द्वारा दिए गए भरणपोषण आदेशों के प्रवर्तन के लिए उस देश या राज्यक्षेत्र में विधिक उपबंध विद्यमान हैं तो, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषणा कर सकती है कि यह अधिनियम उस देश या राज्यक्षेत्र की बाबत लागू होता है और तब वह तद््नुसार लागू होगा ।
- व्यतिकारी राज्यक्षेत्रों में दिए गए भरणपोषण आदेशों का भारत में रजिस्ट्रीकरण - (1) जहां कोई भरणपोषण आदेश, चाहे इस अधिनियम के पारित होने के पहले या पश्चात्, किसी व्यतिकारी राज्यक्षेत्र में किसी न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति के विरुद्ध दिया गया है, और उस राज्यक्षेत्र के उचित प्राधिकारी द्वारा उस आदेश की प्रमाणित प्रति केन्द्रीय सरकार को पारेषित की गई है वहां, केन्द्रीय सरकार उस आदेश के एक प्रति ४भारत में किसी न्यायालय के विहित अधिकारी को रजिस्ट्रीकरण के लिए भेजेगी, और, उसकी प्राप्ति पर, आदेश विहित रीति में रजिस्टर किया जाएगा ।
(2) यदि वह न्यायालय जिसके द्वारा आदेश दिया गया था, केन्द्रीय सरकार की राय में, वरिष्ठ अधिकारिता का न्यायालय है तो वह न्यायालय जिसमें ऐसा आदेश यथापूर्वोक्त इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत किया जाना है उच्च न्यायालय होगा, और यदि उसकी राय में वह न्यायालय वरिष्ठ अधिकारिता का न्यायालय नहीं था, तो संक्षिप्त अधिकारिता का न्यायालय होगा ।
- 1 1952 के अधिनियम सं. 47 की धारा 3 द्वारा पूर्ववर्ती परिभाषा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 2 विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा अंतःस्थापित राज्यों की परिभाषा का 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा लोप किया गया ।
- 3 1952 के अधिनियम सं. 47 की धारा 4 द्वारा पूर्ववर्ती धारा 3 के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 4 1951 के अधिनियम सं. 1 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- भारत में दिए गए भरणपोषण आदेशों का पारेषण - जहां १भारत में न्यायालय ने चाहे इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात, ् किसी व्यक्ति के विरुद्ध भरणपोषण आदेश दिया है, और उस न्यायालय में यह साबित किया गया है कि वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध आदेश दिया गया है किसी व्यतिकारी राज्यक्षेत्र का निवासी है, तो न्यायालय उस राज्यक्षेत्र के उचित प्राधिकारी को पारेषण के लिए केन्द्रीय सरकार को आदेश की एक प्रमाणित प्रति भेजेगा ।
- संक्षिप्त न्यायालयों की व्यतिकारी राज्यक्षेत्र में निवासी व्यक्तियों के विरुद्ध अनन्तिम भरणपोषण आदेश देने की शक्ति - (1) जहां १भारत में संक्षिप्त अधिकारिता के किसी न्यायालय को किसी व्यक्ति के लिए भरणपोषण आदेश के लिए आवेदन किया जाता है, और यह साबित किया जाता है कि वह व्यक्ति किसी व्यतिकारी राज्यक्षेत्र में निवासी है, वहां उस व्यक्ति की अनुपस्थिति में यदि न्यायालय का साक्ष्य को सुनने के पश्चात् आवेदन के न्यायानुमत होने के बारे में समाधान हो जाता है तो, वह ऐसा आदेश दे सकता है जो वह तब दे सकता जब ऐसा व्यक्ति जानबूझकर न्यायालय में उपस्थित होने की उपेक्षा करता ; किन्तु ऐसी दशा में आदेश अनन्तिम ही होगा और तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक ऐसे राज्यक्षेत्र में सक्षम न्यायालय द्वारा उसकी पुष्टि न की जाए ।
(2) प्रत्येक साक्षी का जिसका ऐसे आवेदन पर परीक्षण किया जाता है साक्ष्य लेखबद्ध किया जाएगा और ऐसा अभिसाक्ष्य उसको पढ़कर सुनाया जाएगा और उसके द्वारा हस्ताक्षरित होगा ।
(3) जहां ऐसा आदेश दिया जाता है वहां, न्यायालय केन्द्रीय सरकार को उस व्यतिकारी राज्यक्षेत्र के, जिसमें वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध आदेश दिया गया है निवास करता है ऐसा अधिकथित है, उचित प्राधिकारी को पारेषण के लिए इस प्रकार लिए गए अभिसाक्ष्य और आदेश की प्रमाणित प्रति उन आधारों के कथन के साथ जिन पर, यदि वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध आदेश दिया गया है यदि उस पर समन सम्यक््तः तामील किया जाता और वह सुनवाई पर उपसंजात होता तो जिन आधारों पर आदेशों के दिए जाने का विरोध होता और ऐसी जानकारी के साथ जो न्यायालय के पास उस व्यक्ति की पहचान और उसका ठौर ठिकाना अभिनिश्चित करने को सुकर बनाने के लिए हो, भेजेगा ।
- 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(4) जहां ऐसा कोई अनन्तिम आदेश किसी व्यतिकारी राज्यक्षेत्र में किसी न्यायालय के समक्ष पुष्टि के लिए आया है और वह आदेश, उस न्यायालय द्वारा संक्षिप्त अधिकारिता के उस न्यायालय को जिसने आदेश दिया था अतिरिक्त साक्ष्य लेने के प्रयोजन के लिए प्रेषित किया गया है, वहां, वह न्यायालय, विहित सूचना देने के पश्चात् मूल आवेदन के समर्थन में जैसे साक्ष्य लिया जाता है उसी रीति में और वैसी ही शर्तों के अधीन साक्ष्य लेने की कार्यवाही करेगा ।
(5) यदि ऐसा साक्ष्य सुनने वाले न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि आदेश नहीं किया जाना था तो न्यायालय उस आदेश को विखंडित कर सकता है किन्तु किसी अन्य दशा में अभिसाक्ष्य केन्द्रीय सरकार को भेजा जाएगा और मूल अभिसाक्ष्य के समान रीति में निपटाया जाएगा ।
(6) इस धारा के अधीन दिए गए किसी आदेश की पुष्टि संक्षिप्त अधिकारिता के न्यायालयों की उस आदेश में फेरफार करने या उसे खंडित करने की शक्ति को प्रभावित नहीं करेगी:
परन्तु फेरफार या विखंडन का आदेश करने के पश्चात्, न्यायालय उस व्यतिकारी राज्यक्षेत्र में जिसमें मूल आदेश की पुष्टि की गई थी या जिसको वह पुष्टि के लिए भेजा गया था, उचित प्राधिकारी को पारेषण के लिए उसकी एक प्रमाणित प्रति केन्द्रीय सरकार को भेजेगा, और मूल आदेश में फेरफार करने वाले आदेश की दशा में, आदेश प्रभावशील नहीं होगा जब तक कि मूल आदेश के समान रीति में उसकी पुष्टि न हो जाए ।
- संक्षिप्त अधिकारिता के न्यायालय की भारत से बाहर किए गए भरणपोषण आदेश की पुष्टि करने की शक्ति - (1) जहां किसी व्यतिकारी राज्यक्षेत्र में न्यायालय द्वारा भरणपोषण का आदेश किया गया है और आदेश अनन्तिम ही है, और १भारत में संक्षिप्त अधिकारिता के न्यायालय द्वारा पुष्टि किए जाने तक उसका कोई प्रभाव नहीं है, और साक्षियों के अभिसाक्ष्य और जिन आधारों पर उस आदेश का विरोध किया जा सकता था उनके कथन के साथ आदेश की एक प्रमाणित प्रति केन्द्रीय सरकार को पारेषित की गई है, और केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत होता है कि वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध आदेश दिया गया है १भारत में निवासी है तो, केन्द्रीय सरकार इस अध्यपेक्षा के साथ कि उस व्यक्ति से यह मांग करते हुए एक समन जारी किया जाए, कि वह एक हेतुक दर्शाए कि क्यों उस आदेश की पुष्टि न की जाए, संक्षिप्त अधिकारिता के न्यायालय के विहित अधिकारी को उक्त दस्तावेज भेज सकती है, और, ऐसे दस्तावेजों और अध्यपेक्षा की प्राप्ति पर, न्यायालय समन जारी करेगा और उसे ऐसे व्यक्ति पर तामील कराएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन जारी किया गया समन सभी प्रयोजनों के लिए न्यायालय द्वारा अपनी आरंभिक दांडिक अधिकारिता के प्रयोग में जारी किया गया समन समझा जाएगा ।
(3) वह व्यक्ति जिसे समन जारी किया गया था सुनवाई में अपनी प्रतिरक्षा में ऐसी कोई बात रख सकता है जो वह आरंभिक कार्यवाही में रख सकता था यदि वह उसका पक्षकार होता, किन्तु इससे भिन्न कोई प्रतिवाद नहीं होगा, और अनन्तिम आदेश देने वाले न्यायालय का उन आधारों का कथन करते हुए, जिन पर यदि वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध आदेश दिया गया है कार्यवाहियों का पक्षकार होता तो जिन पर आदेश का विरोध कर सकता था, दिया गया प्रमाणपत्र इस बात का निश्चायक साक्ष्य होगा कि वे आधार ही ऐसे आधार हैं जिन पर आक्षेप किया जा सकता है ।
(4) यदि वह व्यक्ति जिस पर समन तामील किया गया है सुनवाई में उपसंजात नहीं होता है, या उपसंजात होता है किन्तु न्यायालय का यह समाधान करने में असफल रहता है कि आदेश की पुष्टि नहीं की जानी चाहिए तो न्यायालय, भारत में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा उसकी शक्ति पर अधिरोपित वित्तीय सीमा के होते हुए भी, बिना उपान्तरों के या ऐसे उपान्तरों सहित जो न्यायालय साक्ष्य सुनने के बाद उचित समझे आदेश की पुष्टि कर सकता है:
परन्तु इस धारा के अधीन कोई राशि भरणपोषण के रूप में अनन्तिम आदेश की प्रस्थापित दर से अधिक दर पर अधिनिर्णीत नहीं की जाएगी, या इस रूप में वसूल नहीं की जा सकेगी ।
- 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(5) यदि वह व्यक्ति जिसको समन जारी किया गया था सुनवाई में उपस्थित होता है और न्यायालय का यह समाधान कर देता है कि प्रतिवाद करने के प्रयोजन के लिए यह आवश्यक है कि अतिरिक्त साक्ष्य लेने के लिए मामले को उस न्यायालय को प्रेषित किया जाए जिसने अनन्तिम आदेश दिया था, तो न्यायालय उस प्रयोजन के लिए व्यतिकारी राज्यक्षेत्र के उचित अधिकारी के माध्यम से उस न्यायालय को पारेषण के लिए केन्द्रीय सरकार को अभिलेख की प्रमाणित प्रति भेज सकता है और कार्यवाहियों को स्थगित कर सकता है ।
(6) जहां इस धारा के अधीन किसी अनन्तिम आदेश की पुष्टि की गई है वहां, उसमें उसी रीति में फेरफार या विखंडन किया जा सकता है मानो वह मूलतः पुष्टि करने वाले न्यायालय द्वारा दिया गया है, और जहां विखण्डन या फेरफार करने के लिए आवेदन पर न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि मामले को अतिरिक्त साक्ष्य लेने के प्रयोजन के लिए उस न्यायालय को प्रेषित करना आवश्यक है जिसने अनन्तिम आदेश दिया था वहां, न्यायालय उस प्रयोजन के लिए व्यतिकारी राज्यक्षेत्र के उचित अधिकारी के माध्यम से उस न्यायालय को पारेषण के लिए केन्द्रीय सरकार को अभिलेख की प्रमाणित प्रति भेज सकता है, और कार्यवाहियों को स्थगित कर सकता है ।
- भरणपोषण आदेशों का प्रवर्तन (1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई आदेश किसी उच्च न्यायालय में रजिस्ट्रीकृत किया गया है वहां, आदेश का ऐसे रजिस्ट्रीकरण की तारीख से वही बल और प्रभाव होगा और उस पर ऐसी सभी कार्यवाहियां की जा सकेंगी मानो वह उच्च न्यायालय से उसकी सिविल अधिकारिता के प्रयोग में, या उसी न्यायालय के अधीनस्थ ऐसे सिविल न्यायालय में जो इस निमित्त उच्च न्यायालय द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाए, मूलतः अभिप्राप्त आदेश है, और उस न्यायालय को तद््नुसार आदेश को प्रवृत्त कराने की शक्ति होगी ।
(2) संक्षिप्त अधिकारिता का कोई न्यायालय जिसमें इस अधिनियम के अधीन आदेश रजिस्ट्रीकृत किया गया है या जिसके द्वारा कोई आदेश इस अधिनियम के अधीन पुष्ट किया गया है, और ऐसे न्यायालय के अधिकारियों को, ऐसी शक्ति होगी और वे ऐसे कर्तव्यों का पालन करेंगे जो आदेश के प्रवर्तन के प्रयोजन के लिए, विहित किए जाएं ।
- भरणपोषण के रूप में अधिनिर्णीत राशियों के पारेषण के लिए प्रभार और अन्य खर्चों और प्रभारों का संदाय - इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार भरणपोषण के आदेश को रजिस्टर करने या उसकी पुष्टि करने में न्यायालय, यह निदेश देगा कि उस न्यायालय को, जिससे, यथास्थिति, आदेश प्राप्त हुआ है या जिसमें अनन्तिम आदेश दिया गया है, भरणपोषण के रूप में अधिनिर्णीत राशि के पारेषण के प्रभारों का वहन वह व्यक्ति करेगा जिसके विरुद्ध आदेश दिया गया है या आदेश की पुष्टि की गई है, और उससे भरणपोषण के रूप में अधिनिर्णीत राशि के अतिरिक्त वसूल किया जाएगा और इसके अतिरिक्त, और उसी रीति में ऐसे अन्य खर्चे और प्रभार वसूल किए जाएंगे जो न्यायालय द्वारा अधिनिर्णीत या उद््गृहीत किए जाएं ।
- न्यायालय के अधिकारियों द्वारा हस्ताक्षरित दस्तावेजों का सबूत - इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, ऐसे दस्तावेज के बारे में जिसका १भारत से बाहर किसी न्यायालय के न्यायाधीश या अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, जब तक प्रतिकूल साबित न किया जाए, जिस व्यक्ति के हस्ताक्षर किए गए प्रतीत होते हैं उसके न्यायिक या शासकीय हैसियत के हस्ताक्षर के सबूत के बिना यह समझा जाएगा कि वह इस प्रकार हस्ताक्षरित है, और किसी न्यायालय के अधिकारी के बारे में जिसके द्वारा दस्तावेज हस्ताक्षरित है जब तक प्रतिकूल साबित न किया जाए, यह समझा जाएगा कि वह उस दस्तावेज को हस्ताक्षरित करने के लिए न्यायालय का उचित अधिकारी था ।
- 1951 के अधिनियम सं. 3 की धारा 3 और अनुसूची द्वारा राज्यों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- अभिसाक्ष्य का साक्ष्य होना - किसी व्यतिकारी राज्यक्षेत्र में किसी न्यायालय में लिए गए अभिसाक्ष्य, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, इस अधिनियम के अधीन संक्षिप्त अधिकारिता के न्यायालयों के समक्ष कार्यवाहियों से साक्ष्य में ग्रहण किए जाएंगे ।
- नियम बनाने की शक्ति - 1(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए २राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम3 बना सकती है और विशिष्टतया इस अधिनियम के अधीन की गई किसी बात के लिए खर्चे या प्रभार के उद््ग्रहण के लिए और उन सभी विषयों के लिए जो विहित किए जाने के लिए निदिष्ट या अनुज्ञात हैं, नियम बना सकती है ।
4(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
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- 1983 के अधिनियम सं. 20 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15.3.1984 से) धारा 12 की उपधारा (1) के रूप में पुनःसंख्यांकित किया गया ।
- 1983 के अधिनियम सं. 20 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15.3.1984 से) नियम बना सकेगी के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- ऐसे नियमों के लिए देखिए भारत का राजपत्र, 1923, भाग 1, पृ. 1263.
- 1983 के अधिनियम सं. 20 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15.3.1984 से) अंतः स्थापित ।

