मद्रास हाईकोर्ट ने एक मामले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा है कि डॉक्टर फैक्ट्री के मजदूर नहीं हैं। कोर्ट ने कहा कि अस्पताल सेवा के लिए होते हैं, उन्हें कारोबार की तरह नहीं चलाया जा सकता। अस्पताल न भी हों तो डॉक्टर काम कर सकते हैं, लेकिन डॉक्टरों के बिना अस्पताल नहीं चल सकते। यह पूरा मामला चेन्नई के एक प्राइवेट अस्पताल 'मद्रास इंस्टीट्यूट ऑफ ऑर्थोपेडिक्स एंड ट्रॉमेटोलॉजी' (MIOT) से जुड़ा है। यहां काम करने वाले कार्डियोलॉजिस्ट (हृदय रोग विशेषज्ञ) डॉ। बलरामण पलनियप्पन ने अस्पताल के खिलाफ एक याचिका दायर की थी, जिस पर सुनवाई करते हुए कोर्ट ने यह बातें कहीं।
यह विवाद तब शुरू हुआ जब डॉ. बलरामण ने अप्रैल 2025 में अस्पताल से इस्तीफा दे दिया। अस्पताल मैनेजमेंट ने उन पर दबाव बनाया कि वे तीन महीने का नोटिस पीरियड पूरा करें, नहीं तो 42 लाख रुपये हर्जाने के तौर पर जमा करें। इस मामले में अस्पताल की याचिका को कोर्ट ने खारिज कर दिया। इतना ही नहीं, कोर्ट ने अस्पताल पर 1 लाख रुपये का जुर्माना लगाया और यह रकम डॉक्टर को देने का आदेश दिया।
डॉक्टर से क्यों मांगे 42 लाख रुपये?
जस्टिस एन आनंद वेंकटेश ने इस केस में यह अहम फैसला सुनाया। अस्पताल का आरोप था कि डॉक्टर ने कॉन्ट्रैक्ट तोड़कर किसी दूसरे हॉस्पिटल में नौकरी करने का फैसला किया है, इसलिए उन्हें हर्जाना देना होगा। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि डॉक्टर ने कायदे से नोटिस देकर ही इस्तीफा दिया था और उन्होंने कॉन्ट्रैक्ट के किसी भी नियम का उल्लंघन नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि एक अस्पताल का डॉक्टर के प्रति ऐसा रवैया अपनाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। ऐसा लगता है कि याचिकाकर्ता अस्पताल यह भूल गया है कि वह एक हॉस्पिटल चला रहा है, कोई फैक्ट्री नहीं। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि किसी भी डॉक्टर को अपनी पसंद की जगह पर अपनी सेवाएं देने से नहीं रोका जा सकता।
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