मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने धार जिले के विवादित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद परिसर में मध्यकालीन जैन मंदिर और गुरुकुल होने का दावा करने वाली जनहित याचिका पर शुक्रवार को सरकार और अन्य प्रतिवादियों को अपनी आपत्तियां पेश करने का निर्देश दिया। याचिका में जैन समुदाय को विवादित परिसर में उपासना का अधिकार प्रदान करने की गुहार की गई है।
कोर्ट में अलग-अलग मामले हैं विचाराधीन
दिल्ली के सामाजिक कार्यकर्ता सलेकचंद जैन ने यह याचिका ऐसे वक्त दायर की है, जब संभवतः 11वीं सदी के इस परिसर के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर अलग-अलग मुकदमे उच्च न्यायालय में पहले ही विचाराधीन हैं। हिंदू पक्ष भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के वैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट के आधार पर दावा कर रहा है कि यह स्मारक मूलत: एक प्राचीन मंदिर है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद करार दे रहा है।
दो अप्रैल की तारीख तय
एमपी हाईकोर्ट की इंदौर बेंच में जैन की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान प्रतिवादियों की ओर से आपत्ति जताते हुए कहा गया कि यह मुकदमा जनहित याचिका के तौर पर चलने लायक नहीं है। न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और न्यायमूर्ति राजेश कुमार गुप्ता ने जनहित याचिका पर अगली सुनवाई के लिए दो अप्रैल की तारीख तय की और प्रतिवादियों से कहा कि वे याचिका पर अपना संक्षिप्त उत्तर या आपत्तियां इस तारीख से पहले पेश करें।
जैन मंदिर होने का दावा
याचिका में दावा किया गया है कि भोजशाला परिसर में कभी जैन मंदिर और गुरुकुल हुआ करता था, लिहाजा देश के संविधान के अनुच्छेद 25, 26 और 29 के तहत जैन धर्म के अनुयायियों को इस परिसर में पूजा का अधिकार है। याचिका में यह दावा भी किया गया है कि भोजशाला परिसर की जिस मूर्ति को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) की प्रतिमा बता रहा है, वह असल में जैन समुदाय की देवी अम्बिका (जैन यक्षिणी) की मूर्ति ,है जिसे धार के राजा भोज ने इस परिसर में 1034 ईस्वी में स्थापित किया था।
लंदन के संग्रहालय में है प्रतिमा
याचिका में कहा गया कि तत्कालीन ब्रितानी सरकार द्वारा 1875 में खोजी गई यह प्रतिमा फिलहाल लंदन के एक संग्रहालय में रखी हुई है। याचिका में गुहार की गई है कि इस प्रतिमा को वापस भारत लाकर भोजशाला परिसर में फिर से स्थापित करने के प्रयास किए जाने चाहिए।
भोजशाला परिसर का साइंटिफिक सर्वे हो गया है पूरा
एएसआई ने उच्च न्यायालय के आदेश पर दो साल पहले विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करके अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी। एएसआई की 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि इस परिसर में धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना मस्जिद के मुकाबले पहले से विद्यमान थी और वहां वर्तमान में मौजूद एक विवादित ढांचा मंदिरों के हिस्सों का फिर से इस्तेमाल करते हुए बनाया गया था।
धार के ऐतिहासिक परिसर को लेकर विवाद शुरू होने के बाद एएसआई ने सात अप्रैल 2003 को एक आदेश जारी किया था। इस आदेश के अनुसार अब तक चली आ रही व्यवस्था के मुताबिक हिंदुओं को इस परिसर में प्रत्येक मंगलवार पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार वहां नमाज अदा करने की इजाजत दी गई है।
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