बॉम्बे हाई कोर्ट ने वडाला में एक युवक के कस्टोडियल डेथ केस में फैसला सुनाते हुए महत्वपूर्ण बात कही है। कोर्ट ने फैसले की शुरुआत एक लेखिका के कथन से की है, जिसमें कहा गया है कि मृत व्यक्ति न्याय के लिए पुकार नहीं सकता है। यह जीवित लोगों का कर्तव्य है कि मृत के लिए न्याय की गुहार लगाएं। कोर्ट ने हत्या का मुकदमा चलाने का विरोध करने वाले आरोपी पुलिसकर्मियों की दलीलों को अस्वीकार कर उक्त बात का उल्लेख किया है।
ये हैं आरोपी पुलिसवाले
आरोपियों में तत्कालीन (साल 2014) सीनियर पुलिस इंस्पेक्टर जितेंद्र राठौड़, अरिसिर्टेंट पुलिस इंस्पेक्टर और जांच अधिकारी अर्चना पुजारी, पुलिस सब इंस्पेक्टर शत्रुम्न तोडसे, हेड कॉन्सटेबल सुरेश माने, विकास सूर्यवंशी, सत्यजीत कांबले और तुषार खैरना शामिल है। इन सभी पुलिसकर्मियों के खिलाफ हत्या का केस चलाया जाएगा।
क्या है एग्रेल वाल्डारिस कस्टोडियल डेथ केस
इस मामले में पहले दो विरोधाभासी फैसले आए थे। इसीलिए मामले को खंडपीठ रेफर किया गया था। गौरतलब है कि युवक एग्नेल वाल्डारिस को, तीन अन्य लोगों के साथ, लूट की एक शिकायत के सिलसिले में उठाया गया था। जीआरपी पुलिस ने 15 अप्रैल, 2014 को हिरासत में लिया था। मुंबई पुलिस ने दावा किया था कि वाल्डारिस की मौत 18 अप्रैल, 2014 को सुबह करीब साढ़े 11 बजे हिरासत से भागने के दौरान लोकल ट्रेन की चपेट में आने से हुई थी। हालांकि केस के सह आरोपियों ने पुलिस पर आरोप लगाया था कि हिरासत के दौरान उनका उत्पीड़न किया गया था।
मृत व्यक्ति न्याय के लिए गुहार नहीं लगा सकते; यह जीवित लोगों का कर्तव्य है कि वे उनके लिए ऐसा करें। पहली नज़र में ऐसा लगता है कि... एग्नेलो वाल्डारिस को गैर-कानूनी पुलिस हिरासत में बुरी तरह पीटा गया था।
हाई कोर्ट की बेंच ने क्या कहा
बॉम्बे हाई कोर्ट के जस्टिस अजय गडकरी और जस्टिस श्याम चांडक की बेंच ने कहा कि इस मामले में इस बात को लेकर विवाद है कि युवक की मौत हत्या थी या दुर्घटना थी। मामले में घटनाक्रम से जुड़ी विसंगतियां भी उजागर हुई है। जिसके तहत वाल्डारिस को अलग- अलग पुलिस स्टेशन में ले जाना शामिल था।
वाल्डारिस को रात में एक पुलिस स्टेशन से दूसरे पुलिस स्टेशन में ले जाने का कोई कारण नज़र नहीं आता है। बेंच ने कहा कि हमें इस प्रकरण में मेडिकल रिपोर्ट और पोस्टमॉर्टम रिपोर्ट की विसंगतियों के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दिया गया है। आखिर वाल्डारिस की गिरफ्तारी के बाद ही उसके शरीर में चोट के निशान क्यों दिखाई दिए। इसका भी कोई ठोस जवाब नहीं मिला है। मामले में गवाहों को दी गई धमकियों के कारण आरोपियों पर हुए अत्याचार का खुलासा करने में देरी हुई है। वाल्डारिस पुलिस की आगे की यातना से बचने के लिए ट्रेन की ओर भागा था। साल 2014 में कोर्ट के आदेश के बाद केस की जांच सीबीआई को सौपी गई थी।
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