Citation : 2026 Latest Caselaw 896 Chatt
Judgement Date : 23 March, 2026
1/5
(Cr. R. No.-405 of 2026)
2026:CGHC:13720
अप्रतिवेद्य
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
दाण्डिक पुनरीक्षण क्रमांक-405/2026
1.
यशवंत कु मार नाग, पिता-स्व. परसराम नाग, आयु लगभग 45 वर्ष, निवासी ग्राम
पिपरछेड़ी, थाना पिपरछेड़ी, जिला गरियाबंद, छत्तीसगढ़ ।
2. अभिषेक सिंह गहरवार, पिता-राधेश्याम सिंह गहरवार, आयु लगभग 39 वर्ष, निवासी
वार्ड क्रमांक 12, करोदिया, सिधी, जिला सिधी, मध्य प्रदेश ।
3. कमलेश साहू, पिता-गोरलाल साहू, आयु लगभग 34 वर्ष, निवासी नयापारा,
उजिय्यारपुर, थाना लालपुर, जिला मुंगेली, छत्तीसगढ़ ।
4. राजाराम तारक, पिता-खोरबहरा तारक, आयु लगभग 45 वर्ष, निवासी ग्राम तामासिवनी,
थाना आरंग, जिला रायपुर, छत्तीसगढ़ ।
-----पुनरीक्षणकर्तागण/अभियुक्तगण
विरूद्घ
1. छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना राजिम, जिला गरियाबंद, छत्तीसगढ़ ।
2. शरद चंद शर्मा, पिता-रघुदमन शर्मा, आयु लगभग 50 वर्ष, निवासी वुड आइलैंड
कॉलोनी, अमलेश्वर, थाना अमलेश्वर, जिला दुर्ग, छत्तीसगढ़ ।
3. अरुण कु मार द्विवेदी, पिता-स्व. लाल बिहारी द्विवेदी, आयु लगभग 47 वर्ष, निवासी
कछवारा, पोस्ट बिडा, थाना सेमरिया, जिला रीवा, मध्य प्रदेश (वर्तमान में जिला जेल
गरियाबंद, छत्तीसगढ़ में निरुद्ध) ।
Digitally
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POMAN
POMAN DEWANGAN
DEWANGAN Date:
2026.03.24
15:18:48
+0530
(Cr. R. No.-405 of 2026)
4. अजय कु मार विश्वकर्मा, पिता-राम स्वरूप विश्वकर्मा, आयु लगभग 45 वर्ष, निवासी वार्ड
क्रमांक 32, बलपुरवा, कट्टी चौक, थाना सोहागपुर, जिला शहडोल, मध्य प्रदेश ।
-----प्रत्यर्थीगण
पुनरीक्षणकर्तागण/अभियुक्तगण द्वारा : श्री मोहम्मद अफरोज अथर, अधिवक्ता आभासी माध्यम से ।
राज्य/प्रत्यर्थी क्रमांक-1 द्वारा : श्री सुमित सिंह, उपमहाधिवक्ता सहित सुश्री लक्ष्मीन कश्यप, पैनल अधिवक्ता ।
प्रत्यर्थी क्रमांक-2 से 4 द्वारा : सूचना प्रेषित नहीं ।
न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल
!! आदेश पीठ पर पारित !!
23/03/2026
1. पुनरीक्षण की ग्राह्यता पर प्रारंभिक तर्क सुने गए ।
2. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 438/442 के अंतर्गत प्रस्तुत इस
दाण्डिक पुनरीक्षण में, अपर सत्र न्यायाधीश, गरियाबंद, जिला गरियाबंद (छत्तीसगढ़) द्वारा
सत्र प्रकरण क्रमांक 43/2025, धारा 420, 120(बी), 409/34 भारतीय दण्ड
संहिता, "छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध शरदचंद शर्मा व अन्य" में पारित आदेश दिनांक
26/02/2026 को चुनौती दी गई है, जिसके तहत अभियोजन का आवेदन स्वीकार
करते हुए उक्त प्रकरण को न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, राजिम, जिला गरियाबंद
(छत्तीसगढ़) के न्यायालय में विधिवत विचारण हेतु प्रतिप्रेषित किया गया ।
3. प्रकरण के संक्षिप्त तथ्य इस प्रकार हैं कि ट्रेड एक्सो कं पनी में कार्यरत याचिकाकर्तागण तथा
प्रत्यर्थीगण--शरदचंद शर्मा, अरुण कु मार द्विवेदी, अजय कु मार विश्वकर्मा व अन्य--ने
(Cr. R. No.-405 of 2026)
मिलकर अनेक व्यक्तियों को कं पनी में निवेश करने पर 800 दिनों में मूलधन सहित पाँच
गुना राशि वापस देने का प्रलोभन देकर प्रेरित किया तथा कु ल ₹4,83,30,000/- की
राशि प्राप्त कर धोखाधड़ी की । उक्त संबंध में प्राप्त लिखित शिकायत पर थाना राजिम,
जिला गरियाबंद द्वारा अपराध क्रमांक 408/2024 पंजीबद्ध कर विवेचना उपरांत
अभियोगपत्र न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, राजिम के न्यायालय में प्रस्तुत किया गया,
जहाँ दाण्डिक प्रकरण क्रमांक 402/2025 "छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध शरदचंद शर्मा व
अन्य" के रूप में पंजीबद्ध हुआ । तत्पश्चात दिनांक 06/10/2025 को दण्ड प्रक्रिया
संहिता की धारा 323 के अंतर्गत, माननीय उच्चतम न्यायालय के न्यायदृष्टांत
Amandeep Singh Saran v. State of Chhattisgarh (2024) 6 SCC 541
का हवाला देते हुए प्रकरण सत्र न्यायालय को विचारण हेतु उपार्पित किया गया ।
4. अभियोजन द्वारा अपर सत्र न्यायाधीश, गरियाबंद के समक्ष यह तर्क देते हुए आवेदन पेश
किया गया कि धारा 409 भारतीय दण्ड संहिता के अपराध का विचारण न्यायिक मजिस्ट्रेट
प्रथम श्रेणी द्वारा ही किया जाना है । उक्त तर्क स्वीकार करते हुए अपर सत्र न्यायालय,
गरियाबंद द्वारा प्रकरण पुनः न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, राजिम को विधिवत विचारण
हेतु प्रेषित किया गया । इसी आदेश को वर्तमान पुनरीक्षण में चुनौती दी गई है ।
5. पुनरीक्षणकर्तागण/अभियुक्तगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि भारतीय संविधान के
अनुच्छेद 21 के अंतर्गत त्वरित विचारण प्रत्येक व्यक्ति का मूल अधिकार है । वर्तमान
मामले में कु ल 09 अभियुक्त हैं, जिनमें से 02 फरार हैं, 01 अभियुक्त निरुद्ध है तथा कु ल
111 साक्षी सूचीबद्ध हैं । धारा 409 भारतीय दण्ड संहिता का अपराध आजीवन कारावास
से दण्डनीय है, अतः न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा त्वरित एवं प्रभावी विचारण संभव
(Cr. R. No.-405 of 2026)
नहीं है । साथ ही, धारा 409 के अंतर्गत दण्डादेश देने की पूर्ण क्षमता मजिस्ट्रेट न्यायालय
में नहीं है । अतः Amandeep Singh Saran (पूर्वोक्त) में प्रतिपादित विधिक सिद्धांतों
के आलोक में मजिस्ट्रेट द्वारा पारित उपार्पण आदेश उचित था तथा अपर सत्र न्यायाधीश
का आदेश त्रुटिपूर्ण है, जिसे अपास्त कर प्रकरण सत्र न्यायालय को विचारण हेतु भेजा
जाना चाहिए ।
6. राज्य/प्रत्यर्थी क्रमांक-1 के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि Amandeep Singh
Saran (पूर्वोक्त) प्रकरण में अभियुक्त लगभग 08 वर्षों से निरुद्ध था तथा 86 साक्षियों में
से मात्र 10 का परीक्षण हुआ था, जिससे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत त्वरित
विचारण आवश्यक पाया गया । विचारणीय वर्तमान प्रकरण में ऐसी परिस्थितियाँ विद्यमान
नहीं हैं । याचिकाकर्तागण जमानत पर हैं तथा के वल एक सह-अभियुक्त अभिरक्षा में है,
जिसने कोई याचिका प्रस्तुत नहीं की है । अतः तथ्यों की भिन्नता के कारण उक्त
न्यायदृष्टांत का समर्थन वर्तमान याचिकाकर्तागण को प्राप्त नहीं होता । साथ ही, विधि के
अनुसार धारा 409 भारतीय दण्ड संहिता का विचारण न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी द्वारा
ही किया जाना है । अतः अपर सत्र न्यायाधीश द्वारा पारित प्रश्नाधीन आदेश विधिसम्मत
है और पुनरीक्षण निरस्त किए जाने योग्य है ।
7. अभिलेख के परिशीलन से स्पष्ट है कि अभियुक्तगण के विरुद्ध धारा 409 एवं 420 भारतीय
दण्ड संहिता के आरोप हैं तथा 111 साक्षी सूचीबद्ध हैं । तथापि, याचिकाकर्तागण जमानत
पर हैं तथा दो सह-अभियुक्त फरार हैं । प्रकरण में Amandeep Singh Saran (पूर्वोक्त)
प्रकरण जैसी परिस्थितियाँ परिलक्षित नहीं होतीं । उक्त मामले में माननीय उच्चतम
न्यायालय द्वारा प्रकरण की विशेष परिस्थितियों में आदेश पारित किया गया है । दण्ड
(Cr. R. No.-405 of 2026)
प्रक्रिया संहिता की अनुसूची के अनुसार धारा 409 भारतीय दण्ड संहिता का विचारण
न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी के क्षेत्राधिकार में आता है । अतः उक्त न्यायदृष्टांत का
समर्थन याचिकाकर्तागण को प्राप्त नहीं होता ।
8. अभिलेख में उपलब्ध समस्त तथ्य एवं परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए, न्यायालय अपर
सत्र न्यायाधीश, गरियाबंद द्वारा पारित "प्रश्नाधीन आदेश" में कोई अवैधता अथवा अशुद्घता
परिलक्षित नहीं होती है । अतः उसमें हस्तक्षेप किए जाने की आवश्यकता नहीं पाई जाती ।
अतः यह याचिका प्रारंभिक स्तर पर खारिज की जाती है ।
9. रजिस्ट्री को निर्देशित किया जाता है कि इस आदेश की प्रति यथाशीघ्र विचारण न्यायालय
को सूचनार्थ प्रेषित किया जाए ।
10. उपरोक्तानुसार, इस पुनरीक्षण याचिका का निराकरण किया जाता है ।
सही/-
(संजय कु मार जायसवाल) न्यायाधीश
पोमन
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