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Sanjay And 2 Others vs State Of U.P.
2025 Latest Caselaw 6126 ALL

Citation : 2025 Latest Caselaw 6126 ALL
Judgement Date : 17 March, 2025

Allahabad High Court

Sanjay And 2 Others vs State Of U.P. on 17 March, 2025

Bench: Saumitra Dayal Singh, Gautam Chowdhary




HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
 
 


						    निर्णय आरक्षण तिथि- 27.02.2025
 
						    निर्णय उद्बोधन तिथि- 17.03.2025
 
				 Neutral Citation No. - 2025:AHC:37159-DB 
 
Court No. - 45
 

 
Case :- CRIMINAL APPEAL No. - 2346 of 2021
 
Appellant :- Sanjay And 2 Others
 
Respondent :- State of U.P.
 
Counsel for Appellant :- Avaneendra Kumar,Avinash Mani Tripathi, Maheep Singh,Rajeev Kumar Singh,Sanjay Kr. Srivastava,Vinay Kumar Singh
 
Counsel for Respondent :- G.A.
 

 
Hon'ble Saumitra Dayal Singh,J.
 

Hon'ble Dr. Gautam Chowdhary,J.

(माननीय डा० न्यायमूर्ति गौतम चौधरी द्वारा पारित न्याय-पत्र)

1. वर्तमान दाण्डिक अपील सं० 2346 सन् 2021, अपीलार्थीगण/ अभियुक्तगण संजय, रामफेर एवं रवि उर्फ रविन्दर की ओर से मु०अ०सं० 503/2006 अंतर्गत धारा 302 भा०दं०सं० सपठित धारा 34 भा०दं०सं०, थाना सीकरीगंज, जनपद गोरखपुर से उद्भूत सत्र परीक्षण सं० 197/2007में अपर जनपद एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश, गोरखपुर द्वारा पारित निर्णय/आदेश, दिनांक 24.02.2021, जिसके द्वारा अपीलार्थीगण/ अभियुक्तगण को धारा 302 सपठित धारा 34 भा०दं०सं० के अंतर्गत दोषसिद्ध पाते हुए आजीवन कारावास के दण्ड एवं अंकन 20,000 हजार रुपये के अर्थदण्ड से दण्डित किया गया है एवं अर्थदण्ड अदा न करने पर 2 माह के अतिरिक्त कारावास के दण्ड से दण्डित किया गया है, के विरूद्ध योजित की गयी है।

2- संक्षेप में वाद के तथ्य इस प्रकार है कि वादी मुकदमा रामवृक्ष गोसाई पुत्र-माधो गोसाई, निवासी ग्राम रानीपुर, थाना-सिकरीगंज, जनपद-गोरखपुर के द्वारा संंबंधित थाने पर इस आशय का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया गया कि दिनांक 09-12-2006 की सायं 6.30 बजे के लगभग उसका भतीजा रणजीत गोसांई पुत्र स्व० छोटेलाल गोसाई, सत्येन्द्र, निवासी अरांव जगदीश, थाना-उरुवा बाजार, गोरखपुर के घर से सत्येन्द्र की हो मोटरसायकिल जिसका नं०- यू.पी. 53 वाई 4894 बजाज सी.टी. 100 लेकर अपने अरांव जगदीश स्थित मकान / दुकान के लिये चला की ग्राम मरची, निवासी संजय, रामफेर व रवि उर्फ रविन्दर तीनों एक ही मोटरसायकिल पर आकर उसके भतीजे से कुछ आपस में बातचीत किये और चारों लोग दोनों मोटरसायकिल पर बैठकर रवि के घर चले गये इससे पूर्व उसके भतीजे व रवि उर्फ रविन्दर के बीच कोटे की दुकान के आवंटन को लेकर कुछ रंजिश थी समय करीब 7.30 बजे जानकारी हुयी की उसके भतीजे का शव राजेश यादव, ग्राम मठ परशुराम के घर के पूरब रामकृपाल भारती के खेत के उत्तर तरफ खडन्जा रोड पर पड़ा है तथा वहीं बगल में सत्येन्द्र की मोटरसायकिल खड़ी है जो उसका भतीजा ले गया था। वह तथा गांव के तमाम लोग मौके पर जाकर देखे तो उसके भतीजे का शव खडन्जे पर चित्त दशा में पड़ा था। देखने पर गर्दन के दाहिने तरफ खरोंच है। अत: रिपोर्ट लिखकर उचित कार्यवाही करने की याचना की गयी।

3- उपरोक्त लिखित तहरीर के आधार पर अभियुक्तगण संजय, रामफेर व रवि उर्फ रविन्दर के विरूद्ध दिनांक10-12-2006 को थाना-सिकरीगंज, जनपद गोरखपुर में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज की गयी। जिसको इन्द्राज थाने की जी.डी. में किया गया। विवेचक द्वारा मामले की विवेचना ग्रहण की गयी। दौरान विवेचना विवेचक ने वादी तथा गवाहान का बयान लिया। घटनास्थल का निरीक्षण कर मानचित्र घटनास्थल तैयार किया तथा विवेचना से संबंधित अन्य आवश्यक कार्यवाही पूर्ण करने के उपरान्त अभियुक्तगण संजय, रामफेर व रवि उर्फ रविन्दर के विरुद्ध धारा302 सहपठित 34 भा.द.स. के अन्तर्गत आरोप-पत्र न्यायालय में प्रेषित किया गया।

4- अभियुक्तगण का प्रकरण दिनांक-10-09-2007 को विद्वान मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, गोरखपुर द्वारा सत्र न्यायालय को सुपुर्द किया गया, जहाँ से अन्तरित होकर अपर सत्र न्यायाधीश न्यायालय को प्राप्त हुआ।

5- प्रथम दृष्टया मामला बनता प्रतीत होने पर संबंधित न्यायालय द्वारा अभियुक्तगण संजय, रामफेर व रवि उर्फ रविन्दर के विरुद्ध धारा 302 सपठित 34 भा०द०सं० के अन्तर्गत आरोप विरचित किया गया। अभियुक्तगण ने उनके विरुद्ध लगाये गये आरोप से इंकार किया गया एवं उनके द्वारा विचारण की याचना की गयी।

6- अभियोजन पक्ष ने अपने कथन को साबित करने के लिये मौखिक साक्ष्य के रूप में अभियोजन साक्षी सं०-1 से अभियोजन साक्षी सं०-10 को परीक्षित कराया, जो निम्नवत् है-

क्रम संख्या

अभियोजन साक्षी संख्या

साक्षी का नाम

अभियोजन साक्षी सं. 01

रामवृक्ष गोसाई, पुत्र-माधो गोसाई

अभियोजन साक्षी सं. 02

माधुरी

अभियोजन साक्षी सं. 03

विशाल सिंह

अभियोजन साक्षी सं. 04

सत्येन्द्र कुमार

अभियोजन साक्षी सं. 05

सी.पी. देवेन्द्र सिंह यादव

अभियोजन साक्षी सं. 06

हरिश्चन्द्र राय

अभियोजन साक्षी सं. 07

एस.ओ. राजेन्द्र प्रसाद

अभियोजन साक्षी सं. 08

रामकृपाल भारती

अभियोजन साक्षी सं. 09

डॉ. एन.पी. गुप्ता

अभियोजन साक्षी सं. 10

राकेश कुमार गौड, पैरोकार

7- अभियोजन द्वारा पत्रावली पर दस्तावेजी साक्ष्य के रूप में तहरीर प्रदर्श क-1, फर्द प्रदर्श चिक-2, चिक एफ.आई.आर प्रदर्श क - 3, आरोप पत्र प्रदर्श क - 4, नक्शा-नजरी प्रदर्श क - 5, चिट्ठी सी.एम.ओ. प्रदर्श क- 6 , चिट्ठी आर. आई प्रदर्श क-7, पंचनामा प्रदर्श क-8, फार्म संख्या-13 प्रदर्श क-9, फोटोनाश प्रदर्श क 10, मृतक के शव परीक्षण आख्या प्रदर्श क-11, कार्बन प्रति कायमी मुकदमा की जी. डी. प्रदर्श क- 12के रुप में दाखिल किया गया ।

8- अभियोजन साक्ष्य समाप्त होने के पश्चात अभियुक्तगण का बयान धारा-313 द०प्र०सं० के अन्तर्गत अंकित किया गया जिसमें उन्होंने घटना को गलत, वादी द्वारा गलत रिपोर्ट दर्ज कराया जाना, विवेचना कर फर्जी मुकदमा एवं आरोप पत्र दाखिल किया जाना, गवाहों द्वारा रंजिशन गवाही दिया जाना एव मुकदमा रंजिशन गलत चलाया जाना कहा है और मुकदमा को गलत बताया है। बचाव पक्ष की ओर से किसी भी बचाव साक्षी को परीक्षित नहीं कराया गया है।

9- प्रस्तुत मामले में विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या अभियुक्तगण संजय, रामफेर व रवि उर्फ रविन्दर द्वारा दिनांक-09-12-2006 को समय लगभग 6.00-7.30 के मध्य रणजीत गोसाई की साशय या जानते हुये लाठी-डंडों से मारने के द्वारा मृत्यु कारित करके हत्या की ?

10- अभियोजन साक्षी सं-1/रामवृक्ष गोसाई जो मामले का वादी मुकदमा है, ने अपने मुख्य परीक्षा में सशपथ बयान दिया है कि "इस घटना के पहले से कोटे की दुकान रणजीत की माता श्रीमती विद्यावती के नाम से मिली थी किन्तु दुकान का कार्य वितरण आदि रणजीत करता था। वह दुकान रानीपुर गांव में थी। हमारे भतीजे के पूर्व उक्त कोटे की दुकान अभियुक्त रवि उर्फ रविन्दर के नाम से थी। गांव वालों के दरखास्त पड़ने पर दुकान में हेराफेरी के कारण रवि उर्फ रविन्दर के नाम से उक्त कोटे की दुकान निरस्त कर दी गयी थी इस बात को लेकर अभियुक्तगण रंजिश रखते थे। इस दुकान के बावत अभियुक्तगण व रणजीत के बीच वाद-विवाद चल रहा था। मुल्जिमान देख लेने की धमकी दिये थे। आज से घटना हुये लगभग 12-14 महीना हुआ शाम के लगभग 6.30 बजे के करीब हाजिर अदालत मुल्जिमान रवि उर्फ रविन्दर, संजय, रामफेर तीनों एक ही मोटरसायकिल से आये। हमारे भतीजे रणजीत से बातचीत किये और रवि उर्फ रविन्दर ने कहा कि चलिये हमारे घर कुछ काम है। चारों दो मोटर सायकिल, एक मोटरसायकिल अभियुक्त संजय व रणजीत गये। यह मोटरसायकिल रणजीत अपने मित्र सत्येन्द्र से मांग कर लाये थे। दूसरी मोटरसायकिल रवि की थी उस पर रवि उर्फ रविन्दर और रामफेर बैठकर गये। मृतक रणजीत कुमार के नाम से कोटे की दुकान मिली थी वह रानीपुर ग्राम सभा के लिये मिली थी। उक्त दुकान को ही रणजीत चलाता था। मेरा रानीपुर व ग्राम आरांव जगदीश में दोनों जगह मकान है। उक्त कोटे की दुकान की बिक्री आरांव जगदीश वाले मकान से हुयी थी। आरांव जगदीश वाले मकान में मृतक रणजीत व उसकी पत्नी माधुरी व उसके बच्चे रहते थे। मैं दिन भर कोटे वाली दुकान पर रहता था। शाम को मैं रानीपुर वाले मकान पर चला जाता था। रणजीत सत्येन्द्र की मोटरसायकिल मांग कर लाया था और उसी मोटरसायकिल से ही मुल्जिमान द्वारा साथ ले जाने पर उनके साथ गया था। मुझे 7-7.30 बजे शाम के लगभग सूचना पाकर घटनास्थल पर गया तो देखा कि मेरे भतीजे रणजीत की लाश व सत्येन्द्र की मोटरसायकिल वही पड़ी है। मेरे भतीजे की लाश व सत्येन्द्र की मोटरसायकिल ग्राम मठ परशुराम में राकेश यादव के मकान के पास खडन्जे पर पड़ी थी। मेरी बहु माधुरी ने मुझे बताया कि रणजीत के जाने के बाद उसकी लड़की अर्चना की तबियत खराब हो गयी। इसकी सूचना उसने सत्येन्द्र को फोन से दी। सत्येन्द्र ने कहा अभी रणजीत आये हैं भेज रहा हूं फिर उन्हीं की मोटरसायकिल से खडन्जा पकडकर जा रहे थे। सत्येन्द्र व विशाल ने भी बताया कि रणजीत सत्येन्द्र की मोटरसायकिल लेकर रवि उर्फ रविन्दर के घर के सामने पहुंचा तो मोटरसायकिल का बत्ती बुझ गया और मोटरसायकिल रुकते हुये देखकर सतेन्द्र व विशाल टार्च ले कर गये तो देखा कि रवि उर्फ रविन्दर के घर के पास पहुंचे तो देखा कि रवि उर्फ रविन्दर, रामफेर, संजय तीनों लाठी-डंडा लिये हुये थे और रणजीत को मार रहे थे और गाली-गुप्ता दे रहे थे तथा अभियुक्तगण विशाल व सतेन्द्र को जान-माल की धमकी दिया। जिससे डरकर ये लोग अपने घर की तरफ चले गये। यहाँ से रणजीत को मोटरसायकिल पर लादकर तथा सत्येन्द्र की मोटरसायकिल लेकर खड़न्जा पकड़कर पक्की सड़क की तरफ जा रहे थे कि ग्राम मठ परशुराम में रामप्रताप जो ग्राम मरची के रहने वाले है जलती हुयी लालटेन लेकर दुकान बंद करके आ रहे थे जिन्हें देखकर किसी चीज से लालटेन की चिमनी (सीसा) फोड़ दिये तथा लाश व मोटरसायकिल लेकर चले गये। लालटेन का सीसा फोड़कर लालटेन बुझा दिया। इस घटना की सूचना रामकृपाल भारती से लिखवाकर पढ़कर सुनने के बाद अपना हस्ताक्षर बनाकर थाने में दिये। इसके आधार पर मुकदमा दर्ज किया गया। वह प्रार्थना पत्र मेरे सामने है जिस पर मेरा हस्ताक्षर है जिस पर प्रदर्श क-1 डाला गया। दरखास्त वगैरह लिखवाते समय काफी रात हो गयी थी। मैं आधी रात के पहले थाने पर पहुँचा।"

बचाव पक्ष द्वारा की गयी प्रतिपरीक्षा में गवाह ने कथन किया है कि "मैं खेती करता हूँ। मेरे मकान से मृतक का मकान 1/2 कि०मी० दूरी पर है। यह भी मेरा ही मकान है। घटना वाले दिनों मेरे खेत में गेहूँ, चना, मटर आदि बोया गया था। जिस दिन की घटना है उस दिन में दिन भर आरांव वाले मकान पर था। शाम को जब दिन डूबने वाला था तभी मैं अपने पुश्तैनी मकान रानीपुर चला गया। मृतक रणजीत जिस मकान पर रहते थे उनके साथ उनकी मां, उनकी औरत व तीन बच्चे रहते थे। घटना के दिन शिवकुमार मेरे घर आकर करीब शाम 6-7 के बीच आकर बताया कि मेरे भतीजे का लाश रामकृपाल भारती के घर के पश्चिम खड़न्जे के पास पड़ी है। यह बताकर शिवकुमार चले गये। जब मैं घटनास्थल पर पहुँचा तो उस समय वहाँ काफी भीड़ थी। मेरा भतीजा रणजीत सत्येन्द्र की मोटरसायकिल दिन में कब मांग कर लाया था मुझे नहीं मालूम। घटना वाले दिन मृतक रणजीत दोपहर के पूर्व मोटरसायकिल मांगने गया था या दोपहर के बाद। रणजीत के दुकान से सत्येन्द्र का घर 1/2 कि०मी० से कम दूरी पर होगा। मोटरसायकिल मांग कर दुकान पर जाना था। मोटरसायकिल 12 बजे के बाद लाया था। वही चलाकर लाया था। इसके बाद उस दिन अकेले कही मोटरसायकिल लेकर नहीं गया था। यह मोटरसायकिल मांगे जाने वाली बात मेरी बहु माधुरी ने लाश बनने के बाद बतायी थी। मेरी बहू माधुरी के पास मोबाइल थी उसी से सत्येन्द्र के वहाँ फोन किया था। घटनास्थल पर पुलिस 12 बजे रात के बाद आयी थी फिर कहा कि काफी रात थी समय का ज्ञान नहीं हो सका मेरे गांव रानीपुर से मठ परशुराम करीब 1/2 कि.मी. दूरी पर है। पुलिस के आने के बाद रामकृपाल भारती भी आये थे। वह रिश्ते में मेरे साले लगते हैं। मैं पुलिस के लोगों से अपनी बात बताया था। पुलिस के लोगों ने रामकृपाल से बोल कर एफ.आई.आर. लिखवाया था। उस पर मैंने अपना हस्ताक्षर बनाया था। सत्येन्द्र की मोटरसायकिल बजाज सिटी थी उसका नम्बर मैं नहीं बता सकता है मैं अंग्रेजी नहीं पढ़ा हूं। मैंने गाड़ी के नम्बर पर ध्यान नहीं दिया था। तहरीर में यदि मोटर सायकिल का न. यू.पी. 53 वाई 4894 लिखा हो तो यह नम्बर मैंने नहीं बताया था। पुलिस वाले रामकृपाल को बताये होंगे। रामकृपाल अध्यापक है। घटनास्थल पर मैं लाश को देखा था। मृतक के दाहिने तरफ गर्दन पर खरोंच का निशान देखा था। मौके पर मृतक का सिर दक्षिण तरफ तथा पैर उत्तर व पश्चिम की ओर पड़ा था खडन्जे पर। मृतक पैंट शर्ट घडी पहने हुये था। ऐसा नहीं है कि मृतक का सिर उत्तर और पैर दक्षिण रहा हो। पंचनामा कब शुरु हुआ कब समाप्त हुआ मुझे नहीं मालूम। लाश रात में ही पुलिस के जीप में लादते हुये मैंने देखा था। चार बजे के आसपास भोर में थाने पर गया था उस समय थाने पर लाश रखी हुयी थी। लाश बिना सील किये हुये ही थाने पर रखा गया था। मैं लाश के साथ गोरखपुर आया था। लाश थाने में सूर्य उगने के पहले भोर के समय जीप से आयी थी। प्रदर्श क-1 पर अपना हस्ताक्षर मैं थाने पर बनाया था। यह बात मैंने प्रदर्श क-1 देखकर कहा। घटनास्थल से जहाँ लाश पड़ी थी वहाँ से अभियुक्त संजय व रवि उर्फ रविन्दर का घर 15-20 बिगहा की दूरी पर पश्चिम दिशा में एक-दूसरे से सटे है। रामफेर का घर संजय वगैरह के मोहल्ले/टोले में ही है, 4-5 बिगहा और दूर होगा। अभियुक्त तथा मृतक के घर से कोई पुरानी दुश्मनी नहीं थी। घटना के पहले से कोटे की दुकान को लेकर मनमुटाव था। मृतक से मुल्जिमान की बातचीत होती थी। राशन का कोटा मृतक के नाम से नहीं था बल्कि उसकी मां विद्यावती के नाम से था। रवि उर्फ रविन्दर का कोटा किसके शिकायत पर निरस्त हुआ इसकी मुझे कोई जानकारी नहीं है। मैंने व मेरे भतीजे रणजीत ने रवि उर्फ रविन्दर का कोटा निरस्त करने के लिये कोई शिकायती प्रार्थना पत्र नहीं दिया था। रवि उर्फ रविन्दर का राशन का कोटा घटना से साल-दो साल पहले ही निरस्त हो गया था। रवि उर्फ रविन्दर का कोटा निरस्त होने के बाद ग्राम सभा व ग्राम प्रधान द्वारा प्रस्ताव कराकर विद्यावती के नाम से कोटा मिला था। घटना के छः माह व साल भर के बीच से विद्यावती के नाम से कोटा चल रहा था। मैंने स्वयं मृतक को किसी मुल्जिम द्वारा मारते पीटते नहीं देखा था। यह कहना गलत है कि मैं रामकृपाल भारती के बहकावे में आकर रोश के आधार पर अभियुक्तगण के विरुद्ध झूठी रिपोर्ट दर्ज कराया हूँ। दरोगा जी मुझसे यह पूछताछ किये थे, कब किये थे यह याद नहीं है। यह कहना गलत है कि मैं अभियुक्तगण के विरुद्ध झूठा बयान दे रहा हूँ।"

11- अभियोजन साक्षी सं.-2 माधुरी जो मृतक रणजीत गोसाई की पत्नी है, ने अपने मुख्य परीक्षा में सशपथ बयान दिया है कि "मेरा मूल निवास व पैतृक घर ग्राम रानीपुर में है। अरांव जगदीश में जमीन लेकर मकान दुकान बनवाया है। घटना के पूर्व से मैं और मेरे पति रणजीत सिंह (मृतक) मेरे बच्चे और मेरी सास विद्यावती के साथ अरांव जगदीश वाले मकान में रहते हैं। मेरी सास विद्यावती के नाम से रानीपुर ग्राम सभा के सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान आवंटित की गयी। उक्त दुकान का वितरण आदि जगदीश वाले मकान से किया जाता है। यह सरकारी सस्ते गल्ले की दुकान सास को दुकान के आवंटन के पूर्व मुल्जिम रवि उर्फ रविन्दर के नाम से थी। खाद्यान्न के बाटने में गड़बड़ी करने पर रवि उर्फ रविन्दर के नाम से दुकान निरस्त हो गयी। इनके निरस्त होने के बाद उक्त दुकान का आवंटन सास के नाम से मिला। उक्त दुकान सास के नाम हो जाने के कारण रवि उर्फ रविन्दर, संजय व रामफेर जो एक ही बिरादरी के है। मेरे पति रणजीत से नाराज रहते थे। इस घटना के पूर्व कई बार मेरे पति से उक्त मुल्जिमान कई बार कहासुनी हो गयी थी और यह धमकी दिये थे कि पैसे के बल पर कोटे की दुकान ले लिये हो ठीक नहीं किये हो। मेरी सास विद्यावती पढ़ी लिखी नहीं है। उक्त सरकारी कोटे की दुकान मेरे पति रणजीत खाद्यान्न उठाने व वितरण का कार्य करते थे। घटना हुये आज से लगभग 1 वर्ष 7 माह हुआ है। मैं अरांव जगदीश वाले मकान पर मेरी सास, मेरे पति रणजीत व मेरे बच्चे के साथ में रहती हूं। सायं 4 बजे के लगभग संजय, रवि उर्फ रविन्दर व रामफेर मोटरसायकिल से अरांव जगदीश वाले मकान पर आये और बातचीत किये। मेरे पति को वह अपने साथ लेकर तीनों मुल्जिमान चले गये। सायं 6 बजे मेरी लडकी अर्चना की तबियत खराब हुयी। मैंने सत्येन्द्र के पास फोन किया क्योंकि मेरे पति सत्येनद्र की मोटरसायकिल लेकर गये थे। सत्येन्द्र ने बताया कि रणजीत मेरे ही पास है अभी जा रहे है। किन्तु मेरे पति देर रात तक नहीं आये। देर रात को मुझे पता चला कि मेरे पति रणजीत की लाश मठ परशुराम पर जाने वाली खडन्जे पर पड़ी है। सत्येन्द्र की मोटरसायकिल भी वही पड़ी थी। बाद में मुझे सत्येन्द्र व विशाल ने बताया रणजीत को रवि उर्फ रविन्दर, संजय व विशाल ने मारकर उनकी हत्या की है। तब मुझे विश्वास हो गया कि दुकान की रंजिश के कारण मेरे पति की हत्या उक्त तीनों मुल्जिमानों ने की है। मुल्जिमान मेरी दुकान पर कभी-कभी आते जाते है।"

बचाव पक्ष द्वारा की गयी प्रतिपरीक्षा में गवाह ने कथन किया है कि "मैं पर्दानसीन हूँ घर पर रहती हूँ। गांव में नहीं घूमती हूँ। अरांव जगदीश एक ही टोला है यह अलग गांवसभा है और रानीपुर अलग गांवसभा है। रानीपुर से अरांव जगदीश लगभग 1 कि.मी. के फासले पर है। ग्राम मरची रानीपुर ग्रामसभा का टोला है। मैं रानीपुर में रही हूँ अरांव जगदीश के मकान में दुकान जब से खोली हूँ तब से अरांव जगदीश में रहती हूँ। इसके पहले रानीपुर वाले मकान में रहती थी। रानीपुर में बहुत पहले रहती थी कितने दिन तक रही मुझे याद नहीं है रानीपुर से टोला मरची पूरब तरफ है लेकिन कितने दूरी पर है मैं नहीं बता सकती। मैं मरची कभी नहीं गयी हूँ। जो लोग मेरे सरकारी दुकान कोटे पर आते थे उसमें से कुछ लोगों को जानती हूँ। कोटे का वितरण का काम मैं नहीं करती थी। राशन का कोटा वर्ष 2006 में मेरे सास के नाम हुआ था महीना याद नहीं है। वर्ष 2006 के पहले इस कोटे की दुकान का वितरण मुल्जिम रवि उर्फ रविन्दर के यहाँ से होता था। रवि उर्फ रविन्दर का कोटा कब निरस्त हुआ मुझे नहीं मालूम। किसकी शिकायत पर कोटा निरस्त हुआ था मुझे नहीं मालूम। रवि उर्फ रविन्दर के कोटे की गड़बड़ी की शिकायत मेरे परिवार के किसी सदस्य ने नहीं किया था। मुल्जिमान मेरे सास के नाम से कोटा हो जाने के बाद भी कभी-कभार मेरे घर आते जाते थे। तीनों मुल्जिमान जब भी आते थे साथ ही आते थे। घटना वाले दिन मेरे पति कहीं गये नहीं थे दुकान पर ही थे। कोटे के दुकान के बगल में एक सायकिल की दुकान है लेकिन मेरे पति कोटे की दुकान व सायकिल की दुकान दोनों देखते थे। दोनों दुकानें एक ही मकान में है। मैं पूरे दिन घटना वाले दिन अपने घर पर ही थी। उस दिन मेरे अरांव जगदीश वाले मकान में मेरे पति मेरी सास मेरे बच्चे और मैं घर पर ही मौजूद थे। घटना वाले दिन मेरे पति सत्येन्द्र के घर कितने बजे पहुंचे मुझे नहीं मालूम समय करीब 4 बजे मुल्जिमान ले गये। तीनों मुल्जिमान एक ही मोटरसायकिल से आये थे। मेरे पति अभियुक्तगण वाले मोटरसायकिल से नहीं गये थे मेरे पति सत्येन्द्र की मोटरसायकिल जो मेरे घर पहले से थी, से गये थे। अभियुक्तगण रवि उर्फ रविन्दर की हीरो हान्डा मोटर सायकिल से मेरे घर आये थे उसी से गये थे। सत्येन्द्र की मोटरसायकिल मेरे पति एक दिन पहले ले आये थे। मेरे घर पर ही थी। मेरे पति मुझे यह बताये थे कि मुल्जिमान मुझे ले जा रहे हैं। वह थोडी देर में कहाँ और किस कार्य के लिये उनको ले गये मुझे मेरे पति नहीं बताये थे। अभियुक्तगण के साथ पति के जाने के बाद में लगभग छः बजे शाम को सत्येन्द्र के मोबाइल पर फोन किया। सत्येन्द्र से बात हुयी मेरे पति से बात नहीं हुयी। सत्येन्द्र ने मुझे फोन पर ही बताया कि रणजीत है अभी भेज रहा हूँ। सत्येन्द्र ने अभियुक्तगण के अपने घर होने या न होने की बात मुझे नहीं बतायी थी रात लगभग 7.30-9 बजे तक मैंने अपने पति का इन्तजार किया नहीं आये। मैं घटनास्थल पर सूचना पर 8 बजे रात के लगभग में पहुँच गयी थी। मेरे घटनास्थल पर पहुँचने के बाद रात में ही पुलिस आ गयी थी मैं रोने चिल्लाने लगी इसलिये मैंने ध्यान नहीं दिया कितने बजे रात को पुलिस आयी। लाश रात में ही उठकर थाने में गयी। कितने बजे लाश उठी मैं नहीं बता सकती। मुझे घटना वाली रात में ही मुल्जिमानों द्वारा मारे जाने की बात सत्येन्द्र और विशाल ने बताया था। घटना के बावत विवेचक ने मेरा बयान लिया था। दरोगा जी से मैंने अपने बयान में सत्येन्द्र व विशाल द्वारा मुल्जिमानों द्वारा मारने की बात जो मुझे बताये थे वह बात मैंने दरोगा जी को बतायी थी यदि दरोगा जी ने मेरे बयान में यह बात न लिखी हो तो मैं इसकी कोई वजह नहीं बता सकती। यह कहना गलत है कि मुझे सत्येन्द्र व विशाल ने मुल्जिमान द्वारा मेरे पति को मारे जाने की बात मुझे नहीं बताये थे। आज मैं सिखाने पर मुकदमे में बल देने के लिये पहले न्यायालय में बतायी हूँ। यह कहना गलत है कि अभियुक्तगण घटना वाले दिन मेरे घर नहीं आये थे न ही मेरे पति को अपने साथ कही बुलाकर ले ही गये थे। घटना वाले दिन मेरे ससुर रामवृक्ष गोसाई कहाँ पर थे इस समय मुझे याद नहीं है। यह कहना गलत है कि मैं घर में थी इस कारण मैं अपने पति को मुल्जिमानों के साथ जाते नहीं देखी थी।"

12- अभियोजन साक्षी सं -3/विशाल सिंह, ने अपने मुख्य परीक्षा में सशपथ बयान दिया है कि दिनांक-09-12-2006 को शाम लगभग 6 बजे अपने गांव के सतेन्द्र के घर मौजूद था और मृतक रणजीत भी मौजूद था। वहाँ पर हम तीनों का खाना बन रहा था। शाम 6.30 बजे के लगभग मृतक रणजीत के पत्नी का फोन सत्येन्द्र के मोबाइल पर आया कि उसकी लड़की अर्चना की तबियत खराब है रणजीत को भेज दीजिये। रणजीत की औरत ने सत्येन्द्र से पूछा था कि अर्चना के पापा है। तो बताया हाँ वहाँ मौजूद है कही कि तुरन्त भेज दीजिये। इस सूचना पर रणजीत सत्येन्द्र की मोटरसायकिल बजाज CT 100 UP 53 Y 4894 लेकर अपने घर को गये। गाड़ी रवि उर्फ रविन्दर मुल्जिम के घर ग्राम मरची के सामने रुक गयी जब उसकी लाईट बुझ गयी। एक आध मिनट हम लोग देखे लाईट क्यों नहीं जल रही है। जब लाइट नहीं जली तो मैं और सत्येन्द्र अपनी-अपनी टार्च लेकर रवि उर्फ रविन्दर के घर के बगल में पहुंचे तो हम लोगों ने टार्च की रोशनी में देखा कि रवि उर्फ रविन्दर, रामफेर व संजय ये लोग लाठी-डंडे से रणजीत को मारपीट व गाली गुप्ता दे रहे थे और कह रहे थे कि हमारे मना करने बावजूद पैसे के दम पर कोटा की दुकान ले लिये हो। आज तुम्हें नहीं छोड़ेगें, हम लोग बचाने के लिये आगे बढ़े तो मुल्जिमान जान से मारने की धमकी दिये। आगे बचाने आओगे तो मार डालेंगे। हम लोग डरकर शोर मचाते हुये भागे और मृतक रणजीत के घर पर पहुंचे और उनके घर वालों को बताये। हम लोग साथ में गये तो देखे कि मठ परशुराम पर जाने वाली खडन्जा जो ग्राम मरची की तरफ जाता है। परशुराम मठ को आने वाली खडन्जे पर रणजीत की लाश व सत्येन्द्र की मोटरसायकिल कुछ दूरी पर लालटेन का शीशा फूटा हुआ था। बृजेश व राम प्रताप ने उन लोगों से बताया कि उक्त मुल्जिमान रणजीत को उक्त मोटरसायकिल से ले जाकर खडन्जे पर फेंक दिये। कोटे की दुकान पहले मुल्जिम रवि उर्फ रविन्दर के नाम से थी। शिकायत पर दुकान निरस्त हो गयी थी फिर कोटे की दुकान रणजीत की मां के नाम से हो गयी। जिसके कारण मुल्जिमान रणजीत से काफी खफा थे और घटना के पूर्व कई बार रवि उर्फ रविन्दर से वाद विवाद हुआ था तथा मुल्जिमान धमकी दिये थे। इसी दुश्मनी के नाते मुल्जिमान रणजीत की हत्या किये। तीनों मुल्जिमान आपस में मित्र व मेली मददगार है तथा मनबढ़ किस्म के हैं तथा इससे पूर्व भी कई अपराध कर चुके है। जिस टार्च की रोशनी में मैंने व सत्येन्द्र ने मुल्जिमानों को रणजीत को मारते हुये देखा था उस टार्च को दरोगा जी भी देखा था वह टार्च तीन सेल की पीतल की थी। देखने के बाद समक्ष गवाह फर्द तैयार किया था। फर्द पढ़कर सुनाने के बाद मेरा व अन्य गवाहान रामप्रताप के हस्ताक्षर बनवाये थे। जो मेरे सामने ही कागज सं०-7 क है जिस पर मेरे व गवाहान के हस्ताक्षर है जिस पर प्रदर्श क-2 डाला गया।"

बचाव पक्ष द्वारा की गयी प्रतिपरीक्षा में गवाह ने कथन किया है कि "मेरा गांव आरांव जगदीश की कुल आबादी करीब 150 घरों की है। सत्येन्द्र जिसके मोबाइल पर फोन आया था। वह आरांव जगदीश के ही है। सत्येन्द्र का घर गांव के सबसे पश्चिम तरफ है। गवाह ने फिर कहा कि आरांव जगदीश गांव के सबसे उत्तर की तरफ सत्येन्द्र का घर है। इनके घर के पूरब किसी का मकान नहीं है। पश्चिम तरफ मूरत का मकान है। उत्तर तरफ संजय का मकान है। दक्षिण तरफ जगदेव का मकान है। सत्येन्द्र के घर का दरवाजा उत्तर रुख को है। मेरा घर गांव के पश्चिम तरफ है। मेरे घर के चारों तरफ लोगों का मकान है। मैं घटना वाले दिन 6 बजे शाम को सत्येन्द्र के घर भोजन का प्रोग्राम था। बकरा का मीट बना था। खाना खाने का समय नहीं मिला था। मैं खेती बाड़ी का काम करता हूँ। मेरे मां के नाम से कोटे की दुकान है। उसकी मैं देखरेख करता हूँ। यह कोटे की दुकान मेरे गांव के गंगा विष्णु के नाम से तथा इस कोटे को रवि उर्फ रविन्दर ने कभी नहीं चलाया था। मुल्जिम रवि उर्फ रविन्दर का गांव आरांव जगदीश नहीं है बल्कि वह मरची गांव का रहने वाला है। मरची गांव में कुल 40-45 घर है। अभियुक्त का घर गांव के पश्चिम तरफ स्थित है। अभियुक्त के घर के पश्चिम भी मकान है लेकिन किसका मकान है। उसका नाम में नहीं बता सकता।"

"आरांव जगदीश गांव का बार्डर और मरची गांव के बार्डर के बीच में कुल 70 मीटर की दूरी है। रास्ता गुजरता है। रवि के घर के दक्षिण तरफ रास्ता है। सत्येन्द्र के घर के उत्तर तरफ रास्ता है सत्येन्द्र के घर पर सत्येन्द्र के मोबाइल पर रणजीत के घर से आरांव जगदीश वाले मकान से फोन आया था। सत्येन्द्र के घर से गया था। सत्येन्द्र के घर से भी रणजीत 6.20 मिनट पर गये थे। जहाँ लाइट बुझी थी वहाँ सत्येन्द्र का मकान नहीं था वहाँ रवि उर्फ रविन्दर का मकान था। रवि उर्फ रविन्दर के घर के सामने मोटरसायकिल का अगला हिस्सा पूरब तरफ पिछला हिस्सा पश्चिम तरफ था। मोटरसायकिल स्टैंड पर खड़ी थी। रवि उर्फ रविन्दर के मकान के अगल बगल जहाँ मोटरसायकिल खड़ी थी लगभग आठ-दस मकान है। जिन आठ-दस लोगों के मकानात है मै उनके नाम नहीं बता सकता। मैं जब सत्येन्द्र के घर से चला था तो मुझे शोर सुनाई नहीं दिया था। मैं सत्येन्द्र के घर से साढ़े छः बजे के लगभग पैदल टार्च लेकर चला था। जब मैं टार्च लेकर सत्येन्द्र के घर से चला तो पहले पूरब तरफ मुड़ा इस पूरब वाले मोड़ के उत्तर तरफ मकान है। पूरब तरफ 50-60 मीटर गये उसके बाद किसी दिशा में नहीं मुड़ा। सत्येन्द्र के घर से रवि उर्फ रविन्दर का घर दिन में साफ दिखाई देता है। सत्येन्द्र के घर से रवि उर्फ रविन्दर के घर के सामने की सड़क दिखायी देती है। बीच में कोई मकान नहीं है। जब मैं पहुँचा तो रणजीत चोट खाकर गिरे थे। रणजीत की चोट गर्दन पर थोडा सिर पर सीने पर चोट थी। गले की चोट से खून बह रहा था। हम लोग रणजीत को ले जाने की कोशिश किये तो मुल्जिमान ने हम लोगों को भी धमकी दिया। हम लोग दो लोग थे। मुल्जिमान के हाथ में कोई कट्टा, बन्दूक या भाला नहीं था। हम लोगों ने शोर मचाया। मैं मौके पर शोर नहीं मचाया। वहाँ से भागते हुये चिल्लाते हुये सत्येन्द्र के घर से शोर मचाते मृतक रणजीत के घर पहुँचा। मेरे बताने पर मृतक के परिवार वाले और हम और सत्येन्द्र रणजीत जहाँ मरा था मठ परशुराम वाले रास्ते होकर साढ़े सात बजे के लगभग पहुँच गये। जब हम लोग वहाँ पहुँचे तो जनता की भीड़ इकट्ठी थी। लगभग आधे घंटे बाद पुलिस आ गयी। पुलिस ने मेरा बयान लिया और वहाँ से आधे घंटे बाद लाश उठाकर थाने पर गयी। मैं भी थाने पर गया था। हम लोग थाने पर दो-तीन घंटे रहे। लाश थाने पर सील-मुहर किया गया था। रात में सील मुहर या सुबह सील मुहर हुआ नहीं बता सकता। मैं घटना वाले रात में टार्च को थाने पर लेकर गया था। थाने पर टार्च की भी लिखा पढ़ी रात में ही हुयी और टार्च को मैंने थाने पर ही बड़े साहब को सुपुर्द कर दिया। वह टार्च मुझे तब से आज तक मिला नहीं। थाने में ही जमा है। जब मैं रणजीत के घर से उनके घर वालों के साथ घटनास्थल पर जहाँ रणजीत गिरे थे पहुँचा था तो मैंने भी रणजीत की लाश को देखा था। सत्येन्द्र के पिता का नाम नकछेद है। नकछेद को रामधारी भी कहा जाता है। वाहन किसके नाम थी नहीं बता सकता। घटना में प्रयुक्त वाहन काले रंग की थी। रणजीत के पास डी.एल. था या नहीं मैं नही बता सकता। मृतक रणजीत के माँ के नाम से कोटा चल रहा है। मेरा भी कोटा चल रहा है। दोनों कोटो का राशन का व मिट्टी के तेल का उठान अलग-अलग होता है। मृतक रणजीत का लडका 18-20 साल का है। घटना वाली रात वादी मुकदमा रामवृक्ष गोसाई से मेरी मुलाकात घटनास्थल पर जहाँ लाश पड़ी थी, हुयी थी। उस समय शाम सात-साढ़े सात बजे का समय था। मैं रामवृक्ष गोसाई के साथ थाने पर भी गया था। जिस समय रिपोर्ट थाने पर लिखी गयी थी मैंने वादी मुकदमा रामवृक्ष गोसाई को यह बताया था कि मैं और सत्येन्द्र घटनास्थल पर घटना के समय पहुंच गये थे। रामवृक्ष गोसाई ने तहरीर थाने पर ही किसी आदमी से लिखवाया था। लेकिन किससे तहरीर लिखवाया था यह मुझे याद नहीं है। थाने पर रामकृपाल भारती भी मौजूद थे। इनको मैंने तहरीर लिखते हुये देखा था। थाने पर दरोगा जी मेरा बयान घटना वाली रात में ही लिये थे। उनको मैंने अपने बयान में यह बताया था कि मैं रामवृक्ष गोसाई से अपने द्वारा घटना देखने की बात लिखने हेतु कहा था। यदि दरोगा जी ने उक्त बातें मेरे बयान में न लिखी हो तो मैं कोई कारण नहीं बता सकता। घटना वाली रात के अतिरिक्त दरोगा जी ने मेरा कोई बयान नहीं लिया था। यह कहना गलत है कि घटना वाली रात दरोगा जी ने मेरा कोई बयान नहीं लिया था। यह भी कहना गलत है कि मैं वादी मुकदमा से घटना के समय घटनास्थल पर पहुंचने वाली बात नहीं बताया था। यह भी कहना गलत है कि मैंने कोई घटना नहीं देखा था। यह भी कहना गलत है कि में मृतक के मां के नाम कोटा स्वयं चलाता हूँ। इसी कारण में अभियुक्तगण के विरुद्ध झूठी गवाही दे रहा हूँ। यह भी कहना गलत है कि अभियुक्त रवि उर्फ रविन्दर के मकान के सामने सड़क पर मृतक रणजीत को नहीं मारा गया था।"

13- अभियोजन साक्षी सं-4/सत्येन्द्र कुमार, ने अपने मुख्य परीक्षा में सशपथ मुख्यतः कथन किया कि यह घटना 09-12-2006 की है। उस दिन शाम करीब 6 बजे मेरे घर पर रणजीत गोसाई (मृतक) और विशाल सिंह जो हमारे गांव के है हमारे घर पर आये हुये थे। शाम करीब 6.30 बजे मृतक रणजीत की औरत का फोन हमारे मोबाइल पर 9457567443 पर फोन आया कि, हमारे लड़की अर्चना की तबियत खराब हो गयी है, अर्चना के पापा रणजीत को भेज दीजिये। मैंने रणजीत से कहा कि मेरी मोटरसायकिल लेकर अपने घर जाइये आपकी लड़की अर्चना की तबियत खराब है। मेरे मोटर सायकिल का नं० सी.टी. 100 नं० यू.पी. 53 वाई 4894 है, जिसे लेकर रणजीत अपने घर के लिये गये थे। मोटरसायकिल से रणजीत, रवि उर्फ रविन्दर मुल्जिम के मकान के पास पहुँचा तो मोटरसायकिल रुक गयी थी, उसकी लाइट बुझ गयी, जब हम लोगों ने देखा कि कुछ देर तक जब मोटरसायकिल चालू नहीं हुयी तो मैं व विशाल सिंह अपनी-अपनी टार्च को लेकर रवि उर्फ रविन्दर के घर के पास जो मरची गांव में है के पास पहुँचे तो देखा कि टार्च की रोशनी में देखे कि मुल्जिमान रवि उर्फ रविन्दर, संजय व रामफेर गाली गुप्ता देते हुये लाठी-डंडा से रणजीत को मार रहे थे हम लोगों ने आगे बढ़कर रणजीत को बचाने का प्रयास किया तो हमे व विशाल सिंह को उक्त सभी मुल्जिमान धमकी देते हये यह कहे कि तुम लोग भाग जाओ नहीं तो तुम लोगों को भी जान से मार देंगे। हम लोग डर करके वहाँ से भाग गये। उसके बाद रणजीत मृतक के घर सूचना दिये और रणजीत के घरवालों के साथ में व विशाल आ रहे थे कि ग्राम मठ परशुराम जाने वाली सड़क पर परशुराम के खेत के सामने रणजीत की लाश पड़ी थी वही बगल में मेरी मोटरसायकिल जिसे रणजीत लेकर गये थे पड़ी थी तथा यहाँ पर लालटेन का टूटा सीसा पड़ा था। ग्राम सभा रानीपुर की कोटे की दुकान मुल्जिम रवि उर्फ रविन्दर की थी जो गांव वालों की शिकायत पर सरकारी कोटे की दुकान निरस्त हो गयी थी। उसे रणजीत के माता के नाम से हो गयी थी। इसी कारण मुल्जिमान रणजीत से काफी नाराज व दुश्मनी रखते थे और उसी दुश्मनी के कारण मुल्जिमान रणजीत की हत्या किये थे। सभी मुल्जिमान आपस में मित्र है। विवेचक द्वारा जिस टार्च की रोशनी में मैं व विशाल घटना को देखा था उसे कब्जा में लिया गया था रामप्रताप की लालटेन भी जिसका सीसा मुल्जिमान मारकर तोडकर दिये थे उसको भी कब्जा में लेकर समक्ष गवाहान लिखा पढ़ी करके पढ़कर सुना कर हम लोगों व गवाहान के हस्ताक्षर बनवाये गये थे। वह फर्द हमारे सामने प्रदर्श क-2 है। इस पर मेरा व अन्य गवाहान के हस्ताक्षर है।

बचाव पक्ष द्वारा की गयी प्रतिपरीक्षा में अभिसाक्षी ने मुख्यतः अपने उक्त अभिकथन की पुनरावृत्ति करते हुए अभिकथन बखूबी साबित किया।

14- अभियोजन साक्षी सं०-5/ एच.सी. 152 सी.पी. देवेन्द्र सिंह यादव, ने अपने मुख्य परीक्षा में सशपथ बयान दिया है कि दिनांक-10-12-2006 को में बतौर हे०मु० थाना सिकरीगंज, गोरखपुर में तैनात था। उस दिन वादी मुकदमा रामवृक्ष गोसाई ने प्रार्थना पत्र प्रदर्श क-1 के आधार पर इस मुकदमे का चिक सं०-109/06, अ०सं०-503/06 धारा-302 सहपठित 34 भा०द०सं० मेरे द्वारा अपने लेख व हस्ताक्षर में तैयार किया गया। वह इस पत्रावली में कागज सं०-4 के रुप में शामिल मिसिल है, जो मेरे लेख व हस्ताक्षर में है, जिस पर प्रदर्श क-3 डाला गया।"

15- अभियोजन साक्षी सं०-6/थानाध्यक्ष हरिश्चन्द्र राय, ने अपने मुख्य परीक्षा में सशपथ बयान दिया है कि "दिनांक-08-02-2007 को मैं थाना-सिंकरीगंज जनपद गोरखपुर में बहैसियत थानाध्यक्ष के पद पर कार्यरत था। मु०अ०सं०-503/06, धारा-302 सहपठित 34 भा०द०सं० की विवेचना मेरे पूर्वाधिकारी एस.ओ. श्री राजेन्द्र प्रसाद द्वारा की जा रही थी, उनके स्थानान्तरण के बाद यह विवेचना मुझको सुपुर्द की गयी। मैं उनके द्वारा किता किया गया पुराने पर्चों का अवलोकन किया। अवलोकन करके इस विवेचना में मशरुफ हुआ। इस अभियोग में सभी कार्यवाही पूर्व विवेचक द्वारा पूर्ण की जा चुकी थी। अभियुक्त संजय शर्मा, रामफेर व रवि उर्फ रविन्दर के विरुद्ध आरोप पत्र प्रेषित करना शेष था। मैंने प्राप्त साक्ष्य के आधार पर अभियुक्त उपरोक्त के विरुद्ध आरोप पत्र सं०10/2007 दिनांक-08-02-2007 को प्रेषित किया जो शामिल मिसिल पत्रावली है। जिसका कागज सं०-3/ क है, जिस पर प्रदर्श क-4 डाला गया।"

बचाव पक्ष द्वारा की गयी प्रतिपरीक्षा में गवाह ने कथन किया है कि "उक्त मुकदमें में विवेचना के दौरान मेरे द्वारा किसी का बयान नहीं लिया गया है क्योंकि मेरे पूर्व विवेचक द्वारा विवेचना की सभी कार्यवाही पूर्ण की जा चुकी थी केवल अभियुक्तों के विरुद्ध आरोप पत्र प्रेषित करना शेष था। विवेचना के दौरान मेरे द्वारा पूर्व मे काटे गये सभी पचों का अवलोकन किया गया। मात्र आरोप पत्र लगाना शेष था जो मैं अपने द्वारा किता किये गये पहले पर्चे में मुल्जिमानों के विरुद्ध प्रेषित किया। मेरे द्वारा कोई अलग से जांच या जानकारी की कोशिश नहीं की गयी। मात्र (पिछले) पूर्व विवेचना अधिकारी द्वारा काटे गये पर्चों के आधार पर मुल्जिमानों के विरुद्ध आरोप पत्र प्रेषित किया यह कहना गलत है कि मैंने अपने विवेक का प्रयोग न करके पूर्व विवेचना अधिकारी द्वारा काटे गये पर्चों के विरुद्ध गलत आरोप पत्र प्रेषित किया।"

16- अभियोजन साक्षी सं०-7/थानाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने अपने मुख्य परीक्षा में सशपथ बयान दिया है दिनांक 10-12-2006 को थाना-सिकरीगंज, जनपद-गोरखपुर में थानाध्यक्ष के पद पर तैनात था। मु०अ०सं०-503/2006, धारा 302 सहपठित 34 भा०दं०सं० एस. ओ की मौजूदगी में पंजीकृत हुआ। नक्शा-नजरी मेरे लेख व हस्ताक्षर में जो कागज सं०-9/क है, इस पर प्रदर्श क-5 डाला गया। चिट्ठी सी.एम.ओ. जो कागज सं०-10/क है। जिस पर मेरा हस्ताक्षर है व मेरे लेख व हस्ताक्षर में है, जिसे मैं तस्दीक करता हूँ, इस पर प्रदर्श क-6 डाला गया। इसी प्रकार चिट्ठी आर.आई. जो मेरे लेख व हस्ताक्षर में है और जो कागज सं०- 10/क/2 है, इस पर प्रदर्श क-7 डाला गया और इसी क्रम में पंचनामा जो कागज सं०-11/क है जो एस.आई. एल.पी. शर्मा से मैंने बोलकर लिखयाया था, वह उनके लेख व हस्ताक्षर में है। जिस पर मेरा भी हस्ताक्षर बना है। मैं उनके लेख व हस्ताक्षर को पहचानता है, जिसे मैं तस्दीक करता हूँ। इस पर प्रदर्श क-8 डाला गया। इसी क्रम में फार्म नं०-13 जिस पर मेरे हस्ताक्षर बने हैं. इस पर प्रदर्श क-9 डाला गया व फोटो जो कागज सं०-13/क है, जिस पर मेरे हस्ताक्षर बने है जिसको मैं तस्दीक करता हूँ इस पर क-10 डाला गया।"

बचाव पक्ष द्वारा की गयी प्रतिपरीक्षा में अभिसाक्षी द्वारा मुख्यतः यह कथन किया है कि घटना की सूचना मुझे 00.30 बजे मिली थी। घटना की सूचना मिलने के तत्काल बाद घटनास्थल के लिये हम लोग मय फोर्स रवाना हो गये करीब आधे घंटे बाद घटनास्थल पर पहुंच गया। घटनास्थल पर काफी भीडभाड थी तथा मृतक के परिजन भी मौजूद थे वादी मुकदमा भी मौजूद था। जब मेरी पहली नजर मृतक पर पड़ी तो दशा शव की क्या स्थिति थी मुझे याद नहीं है। मौके पर रोशनी थी अथवा नहीं थी टार्च की रोशनी से देखा गया था। शव को घटनास्थल पर ही सील मुहर कर दिया गया था। मृतक के गले में बांये तरफ कनपटी पर चोट पायी गयी थी वादी का बयान मेरे द्वारा मौके पर ही लिया गया था। मृतक की पत्नी का बयान 11-12-06 को लिया गया था गवाह माधुरी ने अपने बयान में सत्येन्द्र व विशाल द्वारा मुल्जिमानों को मारने की बात मुझे नहीं बतायी थी। गवाह विशाल सिंह का बयान मेरे द्वारा दिनांक-12-12-06 को लिया गया था। अरांव जगदीशपुर में बयान लिया था। यह गलत होगा कि मैं घटना वाले दिन ही बयान लिया था। रामवृक्ष गोसाई द्वारा घटना देखने की बात मुझे नहीं बतायी थी। गवाह सत्येन्द्र कुमार का बयान मेरे द्वारा ग्राम अराव जगदीशपुर दिनांक-12-12-06 को लिया गया था। गवाह सत्येन्द्र कुमार द्वारा रणजीत के दुबारा आने वाली बात नहीं बतायी थी। गवाह ने मुझे यह बयान भी नहीं दिया था कि घटना की सूचना मृतक की बीवी मेरे साथ आयी थी। यह कहना गलत होगा कि उक्त गवाह का ब्यान मेरे द्वारा थाने पर उसी दिन लिया गया था। उक्त गवाह द्वारा अपने साक्ष्य में तीनों अभियुक्तों द्वारा रणजीत को डंडे से मारने वाली बात नहीं बतायी थी। उक्त गवाह द्वारा मुल्जिमानों को डंडा लेकर मृतक को मारने वाली बात यदि बतायी गयी थी वह गलत है। गवाह को नक्शा नजरी प्रदर्श क-5 दिखाकर पूछा गया कि तैयार किये गये नक्शा नजरी में गवाहों द्वारा घटना देखने वाला स्थान प्रदर्शित नहीं है। स्थान और कि.मी. दूरी मेरे द्वारा नहीं बतायी गयी है। घटनास्थल पर कोई खून वगैरह नहीं पाया गया। यह कहना गलत है कि मेरे द्वारा फर्जी साक्ष्य इक्ट्ठा कर थाने पर बैठकर सारी कार्यवाही विवेचना पूर्ण किया गया।"

17- अभियोजन साक्षी सं०-8/रामकृपाल भारती, ने अपने मुख्य परीक्षा में सशपथ बयान दिया है कि "में रामवृक्ष गोसाई, निवासी-ग्राम रानीपुर, थाना-सिकरींगज, गोरखपुर को जानता हूँ जो पद में मेरे जीजा लगते है। उनके चार बच्चे है। मेरा भतीजा रणजीत प्रसाद इस समय जीवित नहीं है। वह राशन का कोटेदार था उसकी मृत्यु उसके साथी लोग कर दिये है जिनका नाम संजय, रवि उर्फ रविन्दर व रामफेर है। इन लोगों ने कोटे की रंजिश के चलते मेरे भांजा रणजीत गोसाई की हत्या कर दिये। यह घटना दिनांक-09-12-06 सायं 6.30 बजे की है। शामिल मिसिल कागज सं०- 5 क मूल प्रार्थना पत्र वादी मुकदमा रामवृक्ष गोसाई है। जब मैंने प्रार्थना पत्र लिख लिया तथा उसको पढ़कर रामवृक्ष गोसाई को सुनाया था सुनने के बाद रामवृक्ष ने अपना हस्ताक्षर बनाये थे। प्रदर्श क-1 पर मेरा तथा वादी मुकदमा का हस्ताक्षर बना हुआ है। जिसकी मैं पहचान व पुष्टि करता है। "

बचाव पक्ष द्वारा की गयी प्रतिपरीक्षा में अभिसाक्षी द्वारा मुख्यतः यह कथन किया है कि 'घटना की सूचना मुझे सायं 6-6.30 बजे मिली थी में अपने घर पर मौजूद था। यह सूचना गांव के तमाम लोगों के चिल्लाने (शोर) पर जानकारी हुयी। मैं करीब 20 मिनट बाद मौके पर पहुँच गया। उस समय शाम के सात लगभग बज रहा था। जब में घटनास्थल पर पहुँचा। मैं करीब आधा घंटा घटनास्थल पर रहा। उसके बाद मैं थाने पर पुलिस के साथ गाड़ी में गया। यह दरख्वास्त मैंने थाने पर ही लिखा था। यह दरख्वास्त लिखते करीब दस पन्द्रह मिनट लगा होगा। उसके बाद तत्काल मेरी मौजूदगी में रामवृक्ष द्वारा यह दरख्वास्त मुकदमा दर्ज करने हेतु दिया गया जिस पर मुकदमा दर्ज हुआ। पत्रावली शामिल प्रदर्श क-1 वही दरख्वास्त है जो मेरे द्वारा लिखी गयी थी और रामवृक्ष के द्वारा दी गयी थी। मेरे अलावा रामवृक्ष, लाला साहब आदि बहुत से लोग थे। मेरे सामने कोई घटना नहीं घटी थी और न ही मैंने घटना देखी। पंचानामा थाने पर ही हुआ था। पंचायतनामा की कार्यवाही 10 मिनट चली थी। यह कहना गलत है कि थाने पर शिकायती प्रार्थना पत्र लिखने नहीं गया था। यह भी कहना गलत है कि पुलिस वालों के कहने पर तहरीर लिखा गया। यह भी कहना गलत है कि रिश्तेदार होने के नाते में झूठी गवाही दे रहा हूँ।"

18- अभियोजन साक्षी सं०-9 /डॉ एन.पी. गुप्ता, ने अपने मुख्य परीक्षा में सशपथ बयान दिया है कि 'दिनांक-10-12-06 को जिला चिकित्सालय गोरखपुर पर आडोपैडियस सर्जन के पद पर कार्यरत था। उस दिन मेरी ड्यूटी तत्कालीन ई.एम.ओ. गोरखपुर के आदेश पर पी.एम. हेतु लगायी गयी थी। मैंने दिनांक-10-12-06 में पी.एम. नम्बर 1731 में मृतक रणजीत, उम्र 32 वर्ष, पुत्र-छोटेलाल गोसाई, ग्राम-रानीपुर, थाना-सिकरीगंज, गोरखपुर का शव विच्छेदन किया। शव को एस.ओ. सिकरीगंज ने सील मुहर हालत में सी.पी.नं०-578 दिनेश प्रताप तथा सी.पी. नं०-449 जगदीश प्रसाद के द्वारा भेजा गया था। "

शव की दशा - मृतक प्रारुप लगभग उम्र 32 वर्ष, सामान्य कद काठी थी, अकड़न शव के हाथ-पैर में मौजूद थी, आँख आधी तथा मुँह आधा खुला था।

शव पर आयी मृत्यु पूर्व चोटें-

1- छिला हुआ लाल निशान गले पर 6x4 cm दाहिने तरफ खून जमा हुआ था।

2- छिला हुआ लाल निशान 3X2 cm की परिधि में बांये व दांये से 2cm नीचे चेहरे पर था। जिस पर जमा हुआ खून था।

3- छिला हुआ लाल निशान 15x10 cm दाहिने तरफ छाती पर था। छाती पर दाहिने तरफ की छठी सातवी व आठवी नवी तथा दसवी पसली टूटी हुयी थी एवं दाहिना फेफडा फटा हुआ था तथा 500 ml खून जमा हुआ था। 4-नीला निशान 12x12 cm बांयी तरफ सीने पर था। जिसे विच्छेदन करने पर 4, 5, 6, 7, 8, 9 पसली टूटी हुयी थी एवं बांया फेफड़ा फटा हुआ था एवं करीब 500 ml खून जमा हुआ था।

शव का आन्तरिक परीक्षण-

शव को खोलने पर फेफड़ा की स्थिति उपरोक्त चोटों में दर्शाया गया है।

मृत्यु का समय - मृतक की मृत्यु लगभग 01 दिन पहले हुये थी।

मृत्यु का कारण - मृतक के शरीर पर आयी चोटों के कारण SHOCK के कारण एवं मृत्यु पूर्व आयी चोटों के कारण हुयी थी।

"मृतक की मृत्यु दिनांक-09-12-06 को समय 6.30 पी.एम. से 7.30 पी.एम. के बीच होना संभव है। शव विच्छेदन करने के उपरान्त मैंने शव विच्छेदन रिपोर्ट 3 प्रतियों में तैयार करके उसकी प्रति एस.एस.पी. गोरखपुर को 7 संलग्नकों के साथ एवं दूसरी कापी एस.ओ. सिकरीगंज को सील बण्डल मुहर जिसमें मृतक के कपड़े पैन्ट 01, बण्डी-01, शर्ट-01, स्वेटर-01 द्वारा भेजा गया। तीसरी प्रति सी.एम.ओ. गोरखपुर को भेजा गया। शव विच्छेदन रिपोर्ट शामिल मिसिल कागज सं०-14 क/1 है। जिस पर मेरा हस्ताक्षर बना है तथा जिसकी पहचान तथा पुष्टि करता हूँ। जिस पर प्रदर्श क-11 डाला गया। विवेचक ने मेरा बयान लिया था।"

बचाव पक्ष द्वारा की गयी प्रतिपरीक्षा में अभिसाक्षी द्वारा मुख्यतः यह कथन किया है कि "मजरुब को आयी चोटें मोटरसायकिल से एक्सीडेंट के कारण भी हो सकती है। पेट में 100ml शव विच्छेदन के समय द्रव था।"

19- अभियोजन साक्षी सं०10/ राकेश कुमार गौड़, ने अपने मुख्य परीक्षा में सशपथ बयान दिया है कि "शव परीक्षण सं०-197/07 से संबंधित मु०अ०सं०-503/06 धारा 302 सपठित 34 भा०द०सं० कायमी जी.डी. दिनांक-10-12-06 जिसकी सं०-4/00.30 थाना सिकरीगंज में दर्ज है। मैं वर्तमान समय में का०/पैरोकार के पद पर नियुक्त हूँ। कागज सं०-6 क3 6 क2 मेरे थाने कायमी जी.डी. लिखी गयी है। जिसकी मैं पहचान करता हूँ। जिस पर प्रदर्श क-12 डाला गया।"

बचाव पक्ष द्वारा की गयी प्रतिपरीक्षा में गवाह ने कथन किया है कि "मैं वर्ष 2016 में बतौर नौकरी पे आया हूँ। प्रदर्श क -12 किसका लिखा हुआ है, ये नहीं बता सकता हूँ। प्रदर्श क-12 पर मेरे थाने की मोहर भी नहीं लगी है।"

20- विचारण न्यायालय ने अभियोजन की ओर से विद्वान शासकीय अधिवक्ता (फौजदारी) व बचाव पक्ष के विद्वान अधिवक्ता को सुनने तथा पत्रावली का भलीभांति अवलोकन करने के पश्चात यह पाया कि-

21- अभियोजन की ओर से तर्क दिया गया कि अभियोजन साक्षीगण ने अपने बयान में घटना का पूर्णरुप से समर्थन किया है तथा उनका बयान विश्वसनीय है। घटना का मोटिव स्पष्ट है कि रवि उर्फ रविन्दर की दुकान मृतक की शिकायत पर निरस्त हुयी थी, इससे उपरोक्त रवि उर्फ रविन्दर व मुल्जिमान खार खाये हुये थे। जिसके प्रतिशोध उक्त हत्या कारित की गयी है। साक्षियों के साक्ष्य से घटना की सारी कड़िया एक-दूसरे से जुड़ रही है। मुल्जिमानों का घटना के पूर्व भी आपराधिक इतिहास रहा है। घटना के मोटिव कि मृतक को अभियुक्त का सरकारी कोटा (दुकान) निरस्त होने के बाद मृतक को आवंटित हुयी थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के द्वारा एफआईआर का समय, एफ.आई.आर. में बतायी गयी घटना की तिथि व समय, गवाहों के बयान में भी बताये गये तथ्यों से पूरी तरह से अभियोजन का कथन बिना किसी विरोधाभाष के साबित हो रहा है। यह भी तर्क दिया गया है कि साक्षीगण के बयानों में जो छोटे-मोटे विरोधाभाष है। वे इस प्रकार के नहीं है जिसके आधार पर साक्षीगण के साक्ष्य को नकारा जा सके क्योंकि साक्षियों के बयान में ऐसे विरोधाभाष सामान्यत: स्वाभाविक रुप से आ सकते हैं। प्रस्तुत सत्र विचारण में अभियोजन साक्षीगण ग्रामीण पृष्ठभूमि के है इसिलये उनके द्वारा दिये गये बयानों का मूल्याकन करते समय छोटे-छोटे विरोधाभाषी और विभिन्नताओं के आधार पर उनके साक्ष्य की विश्वसनीयता को संदिग्ध नहीं माना जाना चाहिये। अभियोजन साक्षियों के बयान से अभियुक्तगण के विरुद्ध लगाये गये आरोप संदेह से परे साबित होते हैं। तदनुसार अभियुक्तगण को दोषसिद्ध करके दण्डित किया जाये।

22- बचाव पक्ष के विद्वान अधिवक्ता द्वारा तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अभियोजन साक्षी द्वारा झूठे बयान दिये गये हैं और साक्षीगण के बयानों में गंभीर एवं तात्विक विरोधाभाष है, जिसके कारण उनके साक्ष्य पर विश्वास नहीं किया जा सकता। बचाव पक्ष ने यह तर्क भी प्रस्तुत किया कि जो कोटे की दुकान थी वह पूर्व में अभियुक्त रवि उर्फ रविन्दर के नाम से थी। अतः मोटिव रवि उर्फ रविन्दर के प्रति था अन्य अभियुक्तगण संजय व रामफेर के प्रति नहीं था। इसके साथ यह भी तर्क दिया कि घटनास्थल के संबंध में जो नक्शा-नजरी प्रदर्श क-5 विवेचक द्वारा प्रस्तुत किया गया है उसमें रवि उर्फ रविन्दर के मकान का वर्णन नहीं किया गया है। जबकि रवि उर्फ रविन्दर का मकान घटनास्थल से 400 मीटर की दूरी पर है। जिसे दर्शाया नहीं गया है। इसी प्रकार मृतक रणजीत के कोटे की दुकान को भी नक्शा-नजरी में नहीं दर्शाया गया है जबकि घटनास्थल से उसके कोटे की दुकान 500 मीटर दूरी पर है। अभियोजन पक्ष, अभियुक्तगण के विरुद्ध लगाये गये किसी भी आरोप को संदेह से परे साबित करने में असफल रहा है, तदनुसार अभियुक्तगण लगाये गये सभी आरोपों में दोषमुक्त किये जाने योग्य है।

23- प्रश्नगत प्रकरण में अभियोजन साक्षीगण एवं अभियुक्तगण के अभिकथनों तथा पत्रावली पर उपलब्ध कथन व साक्ष्यों के आधार पर विचारण न्यायालय इस निष्कर्ष पहुंचा कि अभियुक्तगण संजय, रामफेर व रवि उर्फ रविन्दर, प्रत्येक को धारा 302 सहपठित धारा 34 भा०दं०सं० के अपराध के लिये आजीवन कारावास तथा अंकन 20,000/- रुपये (बीस हजार रुपये) के अर्थदण्ड से दण्डित किया तथा अर्थदण्ड अदा न करने पर अभियुक्तगण को दो माह की अतिरिक्त साधारण कारावास के दण्ड से दण्डित किया।

24- अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण के दोषसिद्धि के प्रश्नगत निर्णय/आदेश को चुनौती देते हुए अपीलार्थीगण के विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कमल कृष्ण एवं उनके सहयोगी विद्वान अधिवक्ता श्री अविनाश मणि त्रिपाठी ने यह तर्क प्रस्तुत किया किः-

(क) जहां तक अभियोजन साक्षी सं.-1/सूचनाकर्ता रामवृक्ष गोसाईं तथा अभियोजन साक्षी सं.-2/ माधुरी, जो मृतक की पत्नी है, वे घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी नहीं हैं तथा उनके द्वार मृतक के शरीर पर अभियुक्तगण द्वारा कथित हमला करते हुए नहीं देखा गया है।

(ख) प्रथम सूचना रिपोर्ट के अवलोकन से दर्शित हो रहा है कि मृतक/रणजीत पर हमला करते हुए अपीलार्थीगण देखने वाले किसी भी प्रत्यक्षदर्शी साक्षी का नाम शामिल नहीं किया गया है।

(ग) अभियोजन साक्षी सं.-3/विशाल सिंह के बयान से पता चलता है कि अभियोजन साक्षी सं..-3, विशाल सिंह, अभियोजन साक्षी सं..-4, सत्येन्द्र कुमार के साथ अभियोजन साक्षी सं.-1, सूचनाकर्ता रामवृक्ष गोसाई के साथ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन गए थे, फिर भी अभियोजन साक्षी सं..-3 और अभियोजन साक्षी सं..-4 के नाम एफआईआर में उल्लेखित नहीं हैं और अभियोजन साक्षी सं.-3 और अभियोजन साक्षी सं.-4 द्वारा अभियुक्तगणों के खिलाफ दिए गए बयानों का भी एफआईआर में उल्लेख नहीं है।

(घ) अभियोजन साक्षी सं.-3 और अभियोजन साक्षी सं.-4 का यह कथन कि मृतक रणजीत पर लाठी से हमला किया गया था, मृतक रंजीत को लगी चोटों की प्रकृति की पुष्टि नहीं करता है। चूंकि चोट संख्या 3 और 4 जो कि मृतक के सीने के दाहिने हिस्से पर 15X10 सेमी और सीने के बाएं हिस्से पर 12X12 सेमी है, यह इस तथ्य का संकेत है कि ये चोटें लाठी से नहीं लग सकती हैं, इसलिए मृतक रंणजीत को लाठी से हमले के अलावा किसी अन्य तरीके से ऐसी चोटें लग सकती हैं।

(च) इस संबंध में, यह इंगित करना प्रासंगिक है कि चिकित्सक अभियोजन साक्षी सं.9 ने अपनी जिरह में यह राय व्यक्त की है कि मृतक को लगी चोटें संभवतः मोटरसाइकिल दुर्घटना में लगी हों।

(छ) यह इंगित करना भी प्रासंगिक है कि अभियोजन पक्ष ने जानबूझकर डॉक्टर अभियोजन साक्षी-9 से यह सवाल नहीं पूछा कि मृतक को लगी चोटें उस पर लाठी से किए गए हमले के परिणामस्वरूप आई थीं। इससे अभियोजन पक्ष की कहानी पर भी गंभीर संदेह पैदा होता है।

(ज) यह उल्लेख करना भी उचित है कि एफआईआर में यह भी उल्लेख नहीं है कि आरोपी अपीलकर्ताओं ने मृतक के शरीर पर लाठी मारकर उसे चोटें पहुंचाईं।

(झ) यह उल्लेख करना भी महत्वपूर्ण है कि दिनांक 17.10.2007 को आरोप-पत्र का ज्ञापन भी इस बात का उल्लेख नहीं करता है कि इसमें यह कथन है कि आरोपी ने मृतक को लाठी से घायल किया।

(ट) यह इंगित करना प्रासंगिक है कि प्रथम जांच अधिकारी अभियोजन साक्षी सं-7 राजेंद्र प्रसाद ने मृतक की पोस्टमार्टम रिपोर्ट की प्रतिलिपि केस डायरी में 11.12.2006 को ही दर्ज की थी, जब उन्होंने पाया कि मृतक को एफआईआर और पंचायतनामा में बताए गए से अधिक चोटें आई थीं। उसके बाद, घटना के 3 दिन की अस्पष्ट देरी के बाद 12.12.2006 को ही अभियोजन साक्षी सं-3 और अभियोजन साक्षी सं-4 के धारा 161 सीआरपीसी के तहत बयान दर्ज किए गए।

(ठ) यह तर्क नहीं बनता कि जब अभियोजन साक्षी सं-3 और अभियोजन साक्षी सं-4 एफआईआर दर्ज करने के समय पुलिस स्टेशन में मौजूद थे तो अभियोजन साक्षी सं-3 और अभियोजन साक्षी सं-4 ने जांच अधिकारी अभियोजन साक्षी सं-7 को अपीलकर्ताओं द्वारा मृतक के शरीर पर हमले के तथ्य के बारे में क्यों नहीं बताया। भले ही गवाह का दावा है कि उसने मृतक पर हमले की घटना देखी थी और उसने स्वीकार किया कि जब वह घटनास्थल पर पहुंचा तो मृतक घायल अवस्था में पड़ा था, जिससे पता चलता है कि उसने हमला नहीं देखा था। यह उल्लेख करना महत्वपूर्ण है कि अभियोजन साक्षी सं-3 और अभियोजन साक्षी सं-4 के बयान के अनुसार, वे एक साथ घटनास्थल पर पहुंचे थे।

(ड) विचारणीय कुछ अन्य कारक भी हैं जो दर्शाते हैं और स्थापित करते हैं कि गवाह अर्थात् अभियोजन साक्षी सं-3 और अभियोजन साक्षी सं-4 घटना के समय उपस्थित नहीं थे जैसा कि उन्होंने दावा किया है।

(ढ) अभियोजन साक्षी सं-1, रामवृक्ष गोसाई ने अदालत के समक्ष अपने बयान में स्वीकार किया है कि उसे शिव कुमार नामक व्यक्ति ने सूचना दी थी जबकि अभियोजन साक्षी सं.-3 ने गवाही दी थी यह अभियोजन साक्षी सं.-3 और अभियोजन साक्षी सं.-4 ही थे जो घटना के तुरंत बाद अभियोजन साक्षी सं.-1 के घर गए और उसे घटना के बारे में बताया। इस प्रकार अभियोजन साक्षी सं.-1, रामवृक्ष गोसाई के साक्ष्य और अभियोजन साक्षी सं.-3 और अभियोजन साक्षी सं.-4 के साक्ष्य एक दूसरे के परस्पर विरोधाभाषी हैं, जो इस तथ्य का भी संकेत देते हैं कि अभियोजन साक्षी सं.-3 और अभियोजन साक्षी सं.-4 ने घटना को नहीं देखा था जैसा कि वे देखने का दावा कर रहे हैं।

(त) उक्त शिव कुमार अभियोजन पक्ष के मामले को खोलने के लिए एक आवश्यक गवाह था, फिर भी उसे पेश नहीं किया गया और उससे पूछताछ नहीं की गई, जिससे अभियोजन पक्ष की कहानी पर गंभीर संदेह पैदा होता है।

(थ) अभियोजन पक्ष के अनुसार मृतक रणजीत दिनांक 09.12.2006 को सायं लगभग 6 बजे अभियोजन साक्षी सं.-4 सत्येन्द्र कुमार के घर पर मौजूद था, जब अभियोजन साक्षी सं.-4 के मोबाइल पर मृतक की पत्नी अभियोजन साक्षी सं.-2 माधुरी के मोबाइल से फोन आया कि उसकी पुत्री अर्चना बीमार हो गयी है, इस सूचना पर मृतक मोटरसाइकिल से अपने घर चला गया।

(द) यहां यह उल्लेख करना उचित है कि अभियोजन पक्ष अपनी कहानी को प्रमाणित करने के लिए अभियोजन साक्षी सं.-2 और अभियोजन साक्षी सं.-4 के बीच टेलीफोन संचार के कॉल विवरण प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रहा है, जबकि जांच अधिकारी का यह कर्तव्य था कि वह अभियोजन साक्षी सं.-2 और अभियोजन साक्षी सं.-4 के मोबाइल फोन के कॉल विवरण एकत्र करे ताकि यह सत्यापित किया जा सके कि कोई टेलीफोन संचार हुआ था या नहीं। इससे अभियोजन पक्ष के मामले पर भी गंभीर संदेह पैदा होता है।

(ध) अभियोजन पक्ष के अनुसार जब मृतक अपीलकर्ता संख्या 3, रवि उर्फ रविन्द्र के घर के सामने पहुंचा तो मोटरसाइकिल की लाइट बंद हो गई और फिर अभियोजन साक्षी सं.-3 और अभियोजन साक्षी सं.-4 वहां से चले गए घटना स्थल पर पहुंचे और उसके बाद अभियोजन साक्षी सं.-1 के घर पहुंचे और फिर उन्हें सूचना दी और जब सभी लोग आये तो लोगों ने बताया कि शव को रामकृपाल के खेत के पास मठ परशुराम के खड़ंजा रोड पर फेंक दिया गया है।

(प) यह प्रस्तुत किया गया है कि साइट प्लान के मात्र अवलोकन से पता चलता है कि इसमें यह उल्लेख नहीं है कि गवाहों ने घटना को कहाँ से देखा और न ही अपीलकर्ता नंबर 3, रवि रविन्द्र के घर का उल्लेख है जहाँ मृतक पर कथित हमले की घटना हुई थी। साइट प्लान में न तो अभियोजन साक्षी सं.-4, सत्येन्द्र का घर दिखाया गया है और न ही आरोपी रवि उर्फ रविन्द्र का घर दिखाया गया है।

(फ) यह इंगित करना भी महत्वपूर्ण है कि अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, अपीलकर्ता संख्या 3- रवि उर्फ रविन्द्र के घर के सामने मारपीट की घटना हुई थी, फिर भी मृतक पर हमला करने की घटना के स्थान का कोई साइट प्लान तैयार नहीं किया गया था।

(ब) अभियोजन साक्षी-3 के बयान के अनुसार, पुलिस मृतक पर हमले के आधे घंटे बाद लगभग 8 बजे घटनास्थल पर पहुंची जबकि अभियोजन साक्षी-1, के साक्ष्य से पता चलता है कि पुलिस रात 12 बजे के बाद मौके पर आई थी और पुलिस ने रिपोर्ट को अभियोजन साक्षी-8, एफआईआर लिखने वाले को लिखवाया था। इस तरह यह अभियोजन पक्ष की पूरी कहानी को गलत साबित करता है।

25- अपीलार्थीगण के विद्वान अधिवक्ता द्वारा माननीय उच्चतम न्यायालय के दृष्टांन्त Anwar Ali vs. State of Himachal Pradesh, (2020) 10 SCC 166 के पैराग्राफ 11, 12 एवं 14 पर न्यायालय का ध्यान आकृष्ट किया जो कि निम्नलिखित है-

11. In Anwar Ali vs. State of Himachal Pradesh, (2020) 10 SCC 166 this Court made the legal position clear in following words:-

24. Now so far as the submission on behalf of the accused that in the present case the prosecution has failed to establish and prove the motive and therefore the accused deserves acquittal is concerned, it is true that the absence of proving the motive cannot be a ground to reject the prosecution case. It is also true and as held by this Court in Suresh Chandra Bahri v. State of Bihar, 1995 Supp (1) SCC 80 that if motive is proved that would supply a link in the chain of circumstantial evidence but the absence thereof cannot be a ground to reject the prosecution case.

However, at the same time, as observed by this Court in Babu v. State of Kerala, (2010) 9 SCC 189, absence of motive in a case depending on circumstantial evidence is a factor that weighs in favour of the accused. In paras 25 and 26, it is observed and held as under : (Babu case, SCC pp. 200-01)

"25. In State of U.P. v. Kishanpal, (2008) 16 SCC 73 this Court examined the importance of motive in cases of circumstantial evidence and observed : (SCC pp. 87-88, paras 38-39)

'38. ... the motive is a thing which is primarily known to the accused themselves and it is not possible for the prosecution to explain what actually promoted or excited them to commit the particular crime.

39. The motive may be considered as a circumstance which is relevant for assessing the evidence but if the evidence is clear and unambiguous and the circumstances prove the guilt of the accused, the same is not weakened even if the motive is not a very strong one. It is also settled law that the motive loses all its importance in a case where direct evidence of eyewitnesses is available, because even if there may be a very strong motive for the accused persons to commit a particular crime, they cannot be convicted if the evidence of eyewitnesses is not convincing. In the same way, even if there may not be an apparent motive but if the evidence of the eyewitnesses is clear and reliable, the absence or inadequacy of motive cannot stand in the way of conviction.'

26. This Court has also held that the absence of motive in a case depending on circumstantial evidence is a factor that weighs in favour of the accused. (Vide Pannayar v. State of T.N., (2009) 9 SCC 152 )"

12. In the subsequent decision in Shivaji Chintappa Patil vs. State of Maharashtra, (2021) 5 SCC 626 this Court relied upon the decision in Anwar Ali1 and observed as under:- "27. Though in a case of direct evidence, motive would not be relevant, in a case of circumstantial evidence, motive plays an important link to complete the chain of circumstances. The motive...................."

14. The circumstances on record do not make a complete chain to dispel any hypothesis of innocence of the appellant. The prosecution having failed to establish through clear, cogent and consistent evidence, the chain of events, on the basis of which the guilt of the appellant could be established, the courts below were not right in accepting the case of prosecution and convicting the appellant.

26- माननीय उच्चतम न्यायालय के दृष्टांन्त Alauddin & The State of Assam & anr. [2024] 6 S.C.R. के पैराग्राफ 08 पर न्यायालय का ध्यान आकृष्ट किया जो कि निम्नलिखित है-

As stated in the proviso to sub-Section (1) of section 162, the witness has to be contradicted in the manner provided under Section 145 of the Evidence Act. Section 145 reads thus:

"145. Cross-examination as to previous statements in writing.--A witness may be cross-examined as to previous statements made by him in writing or reduced into writing, and relevant to matters in question, without such writing being shown to him, or being proved; but, if it is intended to contradict him by the writing, his attention must, before the writing can be proved, be called to those parts of it which are to be used for the purpose of contradicting him."

The Section operates in two parts. The first part provides that a witness can be cross-examined as to his previous statements made in writing without such writing being shown to him. Thus, for example, a witness can be cross-examined by asking whether his prior statement exists. The second part is regarding contradicting a witness. While confronting the witness with his prior statement to prove contradictions, the witness must be shown his prior statement. If there is a contradiction between the statement made by the witness before the Court and what is recorded in the statement recorded by the police, the witness's attention must be drawn to specific parts of his prior statement, which are to be used to contradict him. Section 145 provides that the relevant part can be put to the witness without the writing being proved. However, the previous statement used to contradict witnesses must be proved subsequently. Only if the contradictory part of his previous statement is proved the contradictions can be said to be proved. The usual practice is to mark the portion or part shown to the witness of his prior statement produced on record. Marking is done differently in different States. In some States, practice is to mark the beginning of the portion shown to the witness with an alphabet and the end by marking with the same alphabet. While recording the cross-examination, the Trial Court must record that a particular portion marked, for example, as AA was shown to the witness. Which part of the prior statement is shown to the witness for contradicting him has to be recorded in the cross-examination. If the witness admits to having made such a prior statement, that portion can be treated as proved. If the witness does not admit the portion of his prior statement with which he is confronted, it can be proved through the Investigating Officer by asking whether the witness made a statement that was shown to the witness. Therefore, if the witness is intended to be confronted with his prior statement reduced into writing, that particular part of the statement, even before it is proved, must be specifically shown to the witness. After that, the part of the prior statement used to contradict the witness has to be proved. As indicated earlier, it can be treated as proved if the witness admits to having made such a statement, or it can be proved in the cross-examination of the concerned police officer. The object of this requirement in Section 145 of the Evidence Act of confronting the witness by showing him the relevant part of his prior statement is to give the witness a chance to explain the contradiction. Therefore, this is a rule of fairness.

10. We are tempted to quote what is held in a landmark decision of this Court in the case of Tahsildar Singh & Anr. v. State of U.P. Paragraph 13 of the said decision reads thus:

"13. The learned counsel's first argument is based upon the words "in the manner provided by Section 145 of the Indian Evidence Act, 1872" found in Section 162 of the Code of Criminal Procedure. Section 145 of the Evidence Act, it is said, empowers the accused to put all relevant questions to a witness before his attention is called to those parts of the writing with a view to contradict him. In support of this contention reliance is placed upon the judgment of this Court in Bhagwan Singh v. State of Punjab [(1952) 1 SCC 514 : (1952) SCR 812]. Bose, J. describes the procedure to be followed to contradict a witness under Section 145 of the Evidence Act thus at p. 819:

Resort to Section 145 would only be necessary if the witness denies that he made the former statement. In that event, it would be necessary to prove that he did, and if the former statement was reduced to writing, then Section 145 requires that his attention must be drawn to these parts which are to be used for contradiction. But that position does not arise when the witness admits the former statement. In such a case all that is necessary is to look to the former statement of which no further proof is necessary because of the admission that it was made."

It is unnecessary to refer to other cases wherein a similar procedure is suggested for putting questions under Section 145 of the Indian Evidence Act, for the said decision of this Court and similar decisions were not considering the procedure in a case where the statement in writing was intended to be used for contradiction under Section 162 of the Code of Criminal Procedure. Section 145 of the Evidence Act is in two parts : the first part enables the accused to cross-examine a witness as to previous statement made by him in writing or reduced to writing without such writing being shown to him; the second part deals with a situation where the cross-examination assumes the shape of contradiction : in other words, both parts deal with cross examination; the first part with cross-examination other than by way of contradiction, and the second with cross-examination by way of contradiction only. The procedure prescribed is that, if it is intended to contradict a witness by the writing, his attention must, before the writing can be proved, be called to those parts of it which are to be used for the purpose of contradicting him. The proviso to Section 162 of the Code of Criminal Procedure only enables the accused to make use of such statement to contradict a witness in the manner provided by Section 145 of the Evidence Act. It would be doing violence to the language of the proviso if the said statement be allowed to be used for the purpose of cross-examining a witness within the meaning of the first part of Section 145 of the Evidence Act. Nor are we impressed by the argument that it would not be possible to invoke the second part of Section 145 of the Evidence Act without putting relevant questions under the first part thereof. The difficulty is more imaginary than real. The second part of Section 145 of the Evidence Act clearly indicates the simple procedure to be followed. To illustrate : A says in the witness box that B stabbed C; before the police he had stated that D stabbed C. His attention can be drawn to that part of the statement made before the police which contradicts his statement in the witness box. If he admits his previous statement, no further proof is necessary; if he does not admit, the practice generally followed is to admit it subject to proof by the police officer. On the other hand, the procedure suggested by the learned counsel may be illustrated thus : If the witness is asked "did you say before the police officer that you saw a gas light?" and he answers "yes", then the statement which does not contain such recital is put to him as contradiction. This procedure involves two fallacies : one is it enables the accused to elicit by a process of cross-examination what the witness stated before the police officer. If a police officer did not make a record of a witness's statement, his entire statement could not be used for any purpose, whereas if a police officer recorded a few sentences, by this process of cross-examination, the witness's oral statement could be brought on record. This procedure, therefore, contravenes the express provision of Section 162 of the Code. The second fallacy is that by the illustration given by the learned counsel for the appellants there is no self-contradiction of the primary statement made in the witness box, for the witness has yet not made on the stand any assertion at all which can serve as the basis. The contradiction, under the section, should be between what a witness asserted in the witness box and what he stated before the police officer, and not between what he said he had stated before the police officer and what he actually made before him. In such a case the question could not be put at all : only questions to contradict can be put and the question here posed does not contradict; it leads to an answer which is contradicted by the police statement. This argument of the learned counsel based upon Section 145 of the Evidence Act is, therefore, not of any relevance in considering the express provisions of Section 162 of the Code of Criminal Procedure."

(emphasis added)

This decision is a locus classicus, which will continue to guide our Trial Courts. In the facts of the case, the learned Trial Judge has not marked those parts of the witnesses' prior statements based on which they were sought to be contradicted in the cross-examination.

27- विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया है कि अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण द्वारा गंभीर अपराध कारित किया गया है एवं विचारण न्यायालय ने रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्यों पर विचारोपरांत दोषसिद्धि के निष्कर्ष पर पहुंचने के उपरांत अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण को आजीवन कारावास की सजा सुनाई है, इसलिए विचारण न्यायालय द्वारा पारित दोषसिद्धि के निर्णय/आदेश में कोई अवैधता या विकृति नहीं है और इस प्रकार आरोपित निर्णय और दोषसिद्धि के आदेश में किसी हस्तक्षेप की आवश्यकता प्रतीत नहीं हो रही है।

28- हमने उत्तर प्रदेश राज्य की ओर से विद्वान अपर शासकीय अधिवक्ता- प्रथम श्री पतंजलि मिश्रा एवं अपीलार्थीगण के विद्वान वरिष्ठ अधिवक्ता श्री कमल कृष्ण एवं उनके सहयोगी विद्वान अधिवक्ता श्री अविनाश मणि त्रिपाठी को सुना, उनके द्वारा प्रस्तुत किये गये तर्कों पर गहनतापूर्वक विचार किया, उनके द्वारा प्रस्तुत माननीय उच्चतम न्यायालय के महत्वपूर्ण दृष्टांतों का परिशीलन किया तथा विचारण न्यायालय के मूल पत्रावली सहित पत्रावली पर उपलब्ध सामग्री का परिशीलन किया, तदोपरांत इस न्यायालय का अभिमत है किः-

(क) अभियोजन साक्षी सं०-3/विशाल सिंह के बयान से दृष्टिगत होता है कि अभियोजन साक्षी सं०-3/विशाल सिंह, अभियोजन साक्षी सं०-4, सत्येन्द्र कुमार के साथ अभियोजन साक्षी सं०-1/सूचनाकर्ता रामवृक्ष गोसाई के साथ प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने के लिए पुलिस स्टेशन गए थे, फिर भी अभियोजन साक्षी सं०-3 और अभियोजन साक्षी सं०-4 के नाम एफआईआर में उल्लेखित नहीं हैं और अभियोजन साक्षी सं०-3 और अभियोजन साक्षी सं०-4 द्वारा दिए गए बयानों में कही गयी बातों का भी प्रथम सूचना रिपोर्ट में उल्लेखित नहीं है।

(ख) अभियोजन साक्षी सं०-3 और अभियोजन साक्षी सं०-4 का यह कथन कि मृतक रणजीत पर लाठी से हमला किया गया था, किंतु मृतक रणजीत के शव विच्छेदन आख्या में अंकित उसके शरीर पर आयी चोटों की प्रकृति, इसकी पुष्टि नहीं करता है। चूंकि चोट संख्या 3 और 4 जो कि मृतक के सीने के दाहिने हिस्से पर 15X10 सेमी और सीने के बाएं हिस्से पर 12X12 सेमी है, इस तथ्य को परिलक्षित कर रहे है कि ये चोटें लाठी से नहीं आ सकती हैं, इसलिए मृतक रणजीत को लाठी से हमले के अलावा किसी अन्य तरीके से ऐसी चोटें आना संभाव्य हैं।

(ग) यहां यह इंगित करना प्रासंगिक है कि चिकित्सक अभियोजन साक्षी सं.9 ने अपनी प्रतिपरीक्षा में यह राय व्यक्त की है कि मृतक को लगी चोटें संभवतः मोटरसाइकिल दुर्घटना से आना भी संभाव्य है।

(घ) अभियोजन साक्षी सं-3 और अभियोजन साक्षी सं-4 प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करने के समय सूचनाकर्ता के साथ पुलिस स्टेशन में मौजूद थे तो अभियोजन साक्षी सं-3 और अभियोजन साक्षी सं-4 ने जांच अधिकारी/अभियोजन साक्षी सं-7 को अपीलकर्ताओं द्वारा मृतक के शरीर पर हमले के तथ्य के बारे में क्यों नहीं बताया?

(च) अभियोजन साक्षी सं-1/रामबृक्ष गोसाई ने विचारण न्यायालय के समक्ष अपने अभिकथन में स्वीकार किया है कि उसे शिव कुमार नामक व्यक्ति ने सूचना दी थी, जबकि अभियोजन साक्षी सं०-3 ने यह कथन किया कि वह/अभियोजन साक्षी सं०-3 और अभियोजन साक्षी सं०-4 ही थे, जो घटना के तुरंत बाद अभियोजन साक्षी सं०-1 के घर गए और उसे घटना के बारे में बताया। इस प्रकार अभियोजन साक्षी सं०-1/रामवृक्ष गोसाई के साक्ष्य और अभियोजन साक्षी सं०-3 और अभियोजन साक्षी सं०-4 के साक्ष्य एक-दूसरे के परस्पर विरोधाभाषी हैं, जो इस तथ्य का भी संकेत देते हैं कि अभियोजन साक्षी सं०-3 और अभियोजन साक्षी सं०-4 इस घटना के प्रत्यक्षदर्शी साक्षी नहीं है, जैसा कि वे प्रत्यक्षदर्शी साक्षी होने का दावा कर रहे हैं।

(छ) उक्त अभिकथित शिव कुमार अभियोजन पक्ष के मामले को साबित करने के लिए एक आवश्यक साक्षी का कार्य कर सकता था, फिर भी उसे विवेचना का भाग नहीं बनाया गया और न ही उससे पूछताछ की गई, जो अभियोजन कथानक को पुष्टि करने में एक आलंब बन सकता था।

(ज) अभियोजन पक्ष अपनी कहानी को प्रमाणित करने के लिए अभियोजन साक्षी सं.-2 और अभियोजन साक्षी सं.-4 के बीच टेलीफोन संचार के कॉल विवरण प्रस्तुत करने में पूरी तरह विफल रहा है, जबकि जांच अधिकारी का यह कर्तव्य था कि वह अभियोजन साक्षी सं०-2 और अभियोजन साक्षी सं.-4 के मोबाइल फोन के कॉल विवरण एकत्र करे,ताकि यह सत्यापित किया जा सके कि उभय पक्ष के मध्य तत्समय कोई टेलीफोन/मोबाइल संचार हुआ था या नहीं।

(झ) महत्वपूर्ण यह भी है कि अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, अपीलकर्ता संख्या 3- रवि उर्फ रविन्द्र के घर के सामने मारपीट की घटना हुई थी, फिर भी मृतक पर हमला करने की घटना के स्थान की कोई नक्शा-नजरी तैयार नहीं किया गया था।

(ट) अभियोजन साक्षी सं०-7 ने कथन किया है कि पंचायतनामा घटनास्थल पर तैयार किया गया था, जबकि अभियोजन साक्षी-8 जो कि जांच का साक्षी है, के साक्ष्य में कहा है कि जांच कार्यवाही पुलिस स्टेशन सिकरीगंज, गोरखपुर में की गई थी इस प्रकार अभियोजन पक्ष की कहानी भी संदिग्ध हो जाती है।

(ठ) अभियोजन साक्षी सं०-3 के बयान के अनुसार, पुलिस मृतक पर हमले के आधे घंटे बाद लगभग 8 बजे घटनास्थल पर पहुंची जबकि अभियोजन साक्षी-1 के साक्ष्य से पता चलता है कि पुलिस रात 12 बजे के बाद मौके पर आई थी। इसप्रकार इन दोनों बोतो में परस्पर विरोधाभाष है।

(ड) अभियोजन साक्षी सं० 07 थानाध्यक्ष राजेन्द्र प्रसाद ने यह अभिकथन किया कि वादी का बयान मेरे द्वारा मौके पर ही लिया गया था फिर भी वादी द्वारा अभियोजन साक्षी सं.-3 एवं अभियोजन साक्षी सं. 04 द्वारा देखी गयी घटना के बारे में बताया नही गया जबकि बयान देते वक्त यह बात तो स्वयं वादी के मुह पर आ जानी चाहिए एवं उन्होने यह भी कहा कि मैने मृतक की पत्नी का बयान 11.12.2006 को लिया गया था अभियोजन साक्षी सं. 02 गवाह माधुरी ने अपने बयान में अभियोजन साक्षी सं. 3 विशाल व अभियोजन साक्षी सं. 4 सत्येन्द्र द्वारा मुल्जिमानों द्वारा मृतक को मारने की बात मुझे नहीं बतायी थी।

29- इस प्रकार उभय पक्षों के विद्वान अधिवक्ताओं द्वारा प्रस्तुत तर्कों को सुनने के पश्चात उपरोक्त प्रस्तर 25(क) से 25 (ठ) में उद्घृत अभिमत के दृष्टिगत हम पाते हैं कि मामले के तथ्य के साक्षीगण और चिकित्सीय साक्ष्य से मेल नहीं खाते हैं। साथ ही इस तथ्य को भी शामिल किया गया कि साक्षीगण द्वारा अपराध को देखने के तरीके तथा समय में विरोधाभास है। इस स्तर पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते हैं कि कि अभियोजन साक्षीगण के कथनों में विरोधाभाष होने के कारण उन्हें निर्विवाद की संज्ञा नहीं दी जा सकती है तथा चूंकि अभियोजन पक्ष, अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण के विरुद्ध लगाए गए हत्या के आरोपों को संदहे से परे साबित करने में विफल रहा है, इसलिए अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण संदेह का लाभ पाने के हकदार है।

30- तद्नुसार, पत्रावली पर उपलब्ध उपरोक्त संपूर्ण साक्ष्यों पर विचार-विमर्श करने के मद्देनजर, यह आपराधिक अपील स्वीकार की जाती है तथा सत्र परीक्षण सं० 197/2007में अपर जनपद एवं सत्र न्यायाधीश/विशेष न्यायाधीश, गोरखपुर द्वारा पारित प्रश्नगत निर्णय/आदेश दिनांक 24.02.2021, जिसके द्वारा अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण को धारा 302 सपठित धारा 34 भा०दं०सं० के अंतर्गत दोषसिद्ध पाते हुए आजीवन कारावास के दण्ड एवं अंकन 20,000 हजार रुपये के अर्थदण्ड से दण्डित किया गया है एवं अर्थदण्ड अदा न करने पर 2 माह के अतिरिक्त कारावास के दण्ड से दण्डित किया गया है, को खण्डित किया जाता है।

31- अपीलार्थी/अभियुक्त, यदि धारा 437-ए दं०प्र०सं० के अनुपालन के अधीन किसी अन्य मामले में वांछित न हो तो उन्हें अविलंब कारागार से अवमुक्त कर दिया जाय।

32- कार्यालय को निर्देशित किया जाता है कि विचारण न्यायालय का अभिलेख वापस भेज दिया जाय तथा इस आदेश की एक प्रतिलिपि संबंधित विचारण न्यायालय को अनुपालन हेतु तुरंत भेजना सुनिश्चित किये जाय।

Order Date : 17.03.2025

Shashi Mishra

(Dr.Gautam Chowdhary,J.) (S.D. Singh,J.)

 

 

 
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