Citation : 2019 Latest Caselaw 4175 ALL
Judgement Date : 7 May, 2019
HIGH COURT OF JUDICATURE AT ALLAHABAD
ए.एफ.आर.
कोर्ट नं0 - 5
केस :- मैटर्स अंडर आर्टिकल 227 नं0 - 3462 ऑफ 2019
पिटीशनर :- डॉ0 मनीराम गुप्ता (डिसीज्ड) एण्ड ऐनादर
रेस्पान्डेन्ट :- अमरजू एण्ड 3 अदर्स
काउंसिल फार पिटीशनर :- रिषिकेश त्रिपाठी
काउंसिल फार रेस्पान्डेन्ट :- राजेश कुमार यादव
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याची के विद्वान अधिवक्ता एवं विपक्षी संख्या 3 व 4 के विद्वान अधिवक्ता को सुना।
प्रस्तुत याचिका के माध्यम से याची द्वारा अपर सिविल जज / लघुवाद न्यायाधीश, झांसी द्वारा पारित आदेश दिनांक 27.02.2019 को यह कहते हुए खारिज करने की प्रार्थना की कि उक्त आदेश द्वारा सिविल जज ने याची के प्रार्थना पत्र 103ए को बिना किसी समुचित आधार के निरस्त कर दिया।
संक्षेप में वाद के तथ्य इस प्रकार हैं कि अपर सिविल जज / लघुवाद न्यायाधीश, झांसी के सम्मुख मूल वाद संख्या 170/2011 याची संख्या 1 व 2 के द्वारा (सेलडीड) बिक्री अनुबंध पत्र को खारिज करने हेतु दिनांक 15.01.2011 को प्रस्तुत किया।
उक्त वाद में विपक्षी संख्या 3 व 4 द्वारा दिनांक 06.08.2012 को अपना लिखित विरोध दाखिल किया गया।
उपरोक्त वाद में न्यायालय द्वारा विचार बिन्दु/वाद विषय दिनांक 20.05.2017 को निर्धारित किए गए। वाद बिन्दु संख्या 4 न्यायालय शुल्क के सम्बन्ध में दिनांक 06.07.2017 को निर्णित किया गया।
दिनांक 06.07.2017 के आदेश के विरुद्ध विपक्षी संख्या 3 व 4 के द्वारा सिविल रिवीजन संख्या 38 वर्ष 2017 योजित की गई।
रिवीजनल कोर्ट द्वारा विपक्षी संख्या 3 व 4 द्वारा दाखिल वाद को दिनांक 08.03.2018 द्वारा सिविल जज (सीनियर डिवीजन), एफ टी सी, झांसी को यह आदेश देते हुए पुनर्स्थापित किया कि वे विषय बिन्दु संख्या 4 का पुनः परिशीलन कर तथा विचार कर विधिक नियमों के अनुपालनोपरान्त निर्णित करें।
अपर जिला न्यायाधीश (एफ टी सी), झांसी के द्वारा पारित आदेश को नीचे उल्लिखित किया जाता है-:
"निगरानीकर्ता/विपक्षीगण जितेन्द्र कुमार आदि द्वारा प्रस्तुत सिविल निगरानी संख्या 38/2017 स्वीकार की जाती है। विद्वान अवर न्यायालय सिविल जज (सीनियर डिवीजन)/एफ टी सी झांसी में लम्बित मूलवाद संख्या 170/2011 डा. मनीराम आदि बनाम अमरजू आदि में पारित आक्षेपित आदेश दिनांकित 06.07.2017 (निस्तारण वीवाद्यक संख्या 4) निरस्त किया जाता है तथा विद्वान अवर न्यायालय को आदेशित किया जाता है कि इस निर्णय के सम्प्रेक्षण के प्रकाश में विवाद्यक संख्या 4 पर पक्षकारों को पुनः सुन कर विधि सम्मत आदेश पारित करे।
इस निर्णय की प्रति अविलम्ब सम्बन्धित अवर न्यायालय प्रेषित की जावे। पक्षकार दिनांक 30.03.2018 को विद्वान अवर न्यायालय के समक्ष उपस्थित हो।"
दिनांक 08.03.2018 को आदेश के अनुपालन में सिविल जज (सीनियर डिवीजन) द्वारा वाद को विभिन्न तिथियों पर सुनने हेतु लगाया गया। याची द्वारा दिनांक 19.09.2018 को प्रार्थना पत्र अन्तर्गत आदेश 6 नियम-17 व धारा 151 सी0पी0सी0 के अन्तर्गत न्यायालय जज खफीफा, झांसी के सम्मुख प्रस्तुत किया गया।
प्रार्थनापत्र 103ए मय शपथ पत्र 104ए वादीगण की ओर से इन कथनों के साथ प्रस्तुत किया गया है कि वाद के पैरा- 6 में कुछ कानूनी तथ्यों का समावेश किये जाने से छूट गया है, जो एक सदभावी व मानवीय त्रुटि है। अतः वादपत्र में संशोधन किए जाने की अनुमति दिये जाने की प्रार्थना की गयी है।
प्रार्थनापत्र के विरुद्ध आपत्ति 105सी प्रतिवादी संख्या 3 व 4 की ओर से इन कथनों के साथ प्रस्तुत की गयी है कि उक्त प्रार्थना पत्र असत्य कथनों के आधार पर प्रस्तुत किया गया है। प्रस्तुत वाद वादी ने बैनामा दिनांकित 15.01.2011 को शून्य व बेअसर घोषित कराये जाने के बावत संस्थित किया है और न्यायालय द्वारा दिनांक 06.07.2017 को वादी पक्ष में मूल्यांकन सम्बन्धी वाद बिन्दु संख्या 4 निस्तारित कर दिया गया है, जिस आदेश के विरुद्ध प्रतिवादी संख्या 3 व 4 ने जिला जज महोदय के यहां निगरानी संख्या 38/2017 जितेन्द्र कुमार यादव बनाम मुकेश गुप्ता प्रस्तुत की थी, जो दिनांक 08.03.2018 को स्वीकार हुई और आदेश दिनांकित 06.07.2017 निरस्त कर वाद बिन्दु संख्या 4 के सम्बन्ध में पुनः सुनवाई कर निर्णित होना है। उक्त वाद में उभय पक्ष की साक्ष्य पूर्ण हो चुकी है और वाद तर्क हेतु नियत है। प्रार्थनापत्र खारिज किए जाने की प्रार्थना की गयी है।
अपने कथन के समर्थन में याची के विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपर न्यायालय के सम्मुख वाद पत्र में संशोधन हेतु प्रस्तुत प्रार्थना पत्र के समर्थन में उच्चतम न्यायालय द्वारा विधि व्यवस्था को प्रस्तुत किया गया।
विपक्षी द्वय के अधिवक्ता द्वारा याची के प्रार्थना पत्र का विरोध किया गया तथा कहा गया कि प्रस्तुत प्रार्थना पत्र याची द्वारा जानबूझकर वाद की कार्यवाही को विलम्बित करने के आशय से प्रस्तुत किया गया तथा यह कि निगरानी न्यायालय द्वारा पारित निर्णय को निष्प्रभावी करने की एक जानबूझकर चाल है।
विद्वान सिविल जज (सीनियर डिवीजन)/ लघूवाद न्यायाधीश, झांसी द्वारा याची के प्रार्थना पत्र का सम्यक परीक्षण तथा परिशीलन किया गया तथा पत्रावली के अवलोकनोपरान्त निम्न आदेश पारित किया:-
"पत्रावली के अवलोकन से यह भी विदित होता है कि प्रस्तुत मामले में न्यायालय के आदेश दिनांकित 20.05.2017 द्वारा वाद बिन्दु विरिचत किए गए हैं तथा आदेश दिनांकित 06.07.2017 द्वारा वाद बिन्दु संख्या 3 निर्मित किया गया है, जिसमें वाद की मालियत रुपये 13,30,000/- (तेरह लाख तीस हजार) तय की गयी है तथा यह वाद बिन्दु दिनांक 06.07.2017 को वादीगण के पक्ष में निर्णित किया जा चुका है।
यहाँ यह भी उल्लेखनीय है कि प्रस्तुत मामले में न्यायालय के आदेश दिनांकित 06.07.2017 को वाद बिन्दु संख्या 4 व 5 भी वादी के पक्ष में निर्णित किया गया है, जिसके विरुद्ध प्रतिवादीगण की ओर से माननीय निगरानी न्यायालय के समक्ष निगरानी संख्या 38/2017 जितेन्द्र कुमार यादव व अन्य बनाम मुकेश गुप्ता योजित की गयी है, जिसमें माननीय निगरानी न्यायालय ने वाद बिन्दु संख्या 4 का पक्षकारों को सुनकर पुनः विधि सम्मत आदेश पारित किए जाने हेतु इस न्यायालय को आदेशित किया गया है।
वाद बिन्दु संख्या 4 की सुनवाई, माननीय निगरानी न्यायालय के आदेश के अनुपालन के स्तर पर, यह प्रार्थनापत्र स्वयं वादी की ओर से प्रस्तुत किया गया है।
पत्रावली के अवलोकन से यह भी स्पष्ट है कि प्रस्तुत वाद, वादीगण की ओर से प्रश्नगत सम्पत्ति के सम्बन्ध में निष्पादित, विक्रय-पत्र को शून्य एवं निष्प्रभावी घोषित किए जाने के अनुतोष हेतु प्रस्तुत किया गया है तथा वादी द्वारा वाद का मूल्यांकन प्रश्नगत सम्पत्ति के विक्रय-मूल्य रूपये 13,30,000/- (तेरह लाख तीस हजार) तक किया गया है।
अब वादीगण की ओर से यह प्रार्थनापत्र प्रश्नगत सम्पत्ति पर देय लगान के आधार पर संशोधन हेतु प्रस्तुत किया गया है।
माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा विधि व्यवस्था-रीवा जीतू बिल्डर्स एण्ड डेवलपर्स बनाम नारायन स्वामी एण्ड सन्स व अन्य 2009(1) एस0सी0सी0 84 में यह अवधारित किया गया है-
(a) Whether the amendment sought is imperative for proper and effective adjudication of the case,
(b) Whether the application for amendment is bona fide or mala fide,
(c) the amendment should not cause such prejudice to the other side which cannot be compensated adequately in terms of money,
(d) refusing amendment would in fact lead to injustice or lead to multiple litigation,
(e) Whether the proposed amendment constitutionally or fundamentally changes the nature and character of the case,
(f) as a general rule, the court should decline amendments if a fresh suit on the amended claims would be barred by limitation on the date of application.
इससे स्पष्ट है कि वादीगण की ओर से प्रस्तुत प्रार्थनापत्र मात्र वाद की कार्यवाही को अनावश्यक रूप से विलम्बित किए जाने के आशय से प्रस्तुत किया गया है। वादीगण की ओर से प्रस्तुत संशोधन प्रार्थनापत्र न तो वाद के प्रभावी न्याय-निर्णयन के लिए आवश्यक है एवं वादीगण की ओर से प्रस्तुत प्रार्थनापत्र माननीय निगरानी न्यायालय द्वारा दिए गए निर्देशों एवं पूर्व में निर्णित वाद बिन्दु संख्या 3 को निष्प्रभावी करने के उद्देश्य से दिया गया प्रतीत होता है और वादीगण की ओर से प्रस्तुत प्रार्थनापत्र स्वीकार किए जाने का कोई न्यायोचित आधार नहीं है और प्रार्थनापत्र निरस्त किए जाने योग्य है।"
मेरे द्वारा याची एवं विपक्षीगण के विद्वान अधिवक्ताओं को समुचित सुना गया एवं सम्पूर्ण पत्रावली का परिशीलन किया गया तथा अपर सिविल जज (सीनियर डिवीजन)/ लघुवाद न्यायाधीश, झांसी के द्वारा पारित आदेश दिनांक 27.02.2019 को विस्तृत रूप से जाँचा एवं परखा गया, तदोपरान्त मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचता हूँ कि विद्वान अपर सिविल जज (सीनियर डिवीजन)/ लघुवाद न्यायाधीश, झांसी द्वारा पारित निर्णय पूर्णतः विधिक एवं स्पष्ट है।
विद्वान अपर सिविल जज का यह निर्णय कि याची द्वारा प्रस्तुत प्रार्थना पत्र 103ए अनावश्यक रूप से वाद को विलम्बित किये जाने के आशय से प्रस्तुत की गई है सही है।
विद्वान अपर सिविल जज का यह निर्णय कि याची की ओर से प्रस्तुत संशोधन प्रार्थना पत्र न तो वाद की प्रभावी न्याय निर्णय के लिए आवश्यक है न ही निगरानी न्यायालय द्वारा दिये गये निर्देशों को विचार करने के पश्चात पोषणीय है।
उपरोक्तानुसार प्रस्तुत याचिका अस्वीकार की जाती है एवं अपर सिविल जज (सीनियर डिवीजन)/ लघुवाद न्यायाधीश को आदेशित किया जाता है कि वे बिना किसी विलम्ब के वाद का निर्धारण विधि अनुसार सुनिश्चित करें।
दिनाँक :- 7.5.2019
एस0 के0 श्रीवास्तव
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