दिल्ली की एक अदालत ने 52।81 लाख रुपये की साइबर ठगी के आरोपी दीपक वत्स की जमानत याचिका खारिज करते हुए बड़ा खुलासा किया है। कोर्ट के अनुसार, एफआईआर दर्ज कराने वाली घरेलू सहायिका असल पीड़ित नहीं है बल्कि हनीट्रैप का असली शिकार हरियाणा की एक महिला न्यायिक अधिकारी (जज) हैं। बदनामी के डर से जज ने खुद सामने आने के बजाय नौकरानी के नाम का इस्तेमाल किया, जिस पर अदालत ने गंभीर चिंता जताई है।
डिजिटल युग में साइबर ठगी और हनीट्रैप के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं, लेकिन दिल्ली की एक अदालत से एक ऐसा चौंकाने वाला मामला सामने आया है जिसने न्यायपालिका को भी हैरत में डाल दिया है। एक महिला न्यायिक अधिकारी (Judicial Officer) खुद एक डेटिंग ऐप टिंडर के जरिए हनीट्रैप का शिकार हो गईं और अपने 52।81 लाख रुपये गंवा बैठीं। इस मामले का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह रहा कि जब पुलिस में शिकायत करने की बारी आई तो समाज में बदनामी और पेशेवर संवेदनशीलता के डर से महिला जज ने खुद सामने आने के बजाय अपनी घरेलू सहायिका के नाम से एफआईआर (FIR) दर्ज करा दी।
दिल्ली की पटियाला हाउस कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश सौरभ प्रताप सिंह लालेर ने आरोपी दीपक वत्स की जमानत याचिका पर सुनवाई की। कोर्ट ने 9 जून को दिए अपने आदेश में साफ कहा कि शिकायत भले ही नौकरानी दीक्षा देवी के नाम पर है, लेकिन असल पीड़ित और शिकायतकर्ता कोई और नहीं बल्कि हरियाणा की एक महिला जज हैं। कोर्ट ने इस बात पर गहरी चिंता और नाराजगी जताई कि जो न्यायिक अधिकारी दूसरों को न्याय देने की कुर्सी पर बैठती हैं उन्होंने खुद अदालत के सामने तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया और अपनी नौकरानी को ढाल बनाया।
जज हनी ट्रैप केस की 5 मुख्य बातें
• टिंडर से शुरुआत: हरियाणा की महिला न्यायिक अधिकारी ने टिंडर पर ‘Altruistic Joy’ नाम से एक फेक प्रोफाइल बनाई थी, जिसके जरिए नवंबर 2025 में उनकी मुलाकात आरोपी दीपक वत्स से हुई और दोनों के बीच रोमांटिक संबंध बने।
• 52 लाख से ज्यादा की ठगी: आरोपी ने महिला जज को अपने झांसे में लेकर गेमिंग और ऑनलाइन सट्टेबाजी के खातों में निवेश के नाम पर कुल 52,81,999 रुपये ट्रांसफर करवा लिए।
• नौकरानी के नाम का इस्तेमाल: ठगी का अहसास होने पर महिला जज ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल में खुद शिकायत दर्ज कराने के बजाय अपनी मेड (घरेलू सहायिका) दीक्षा देवी के नाम से एफआईआर दर्ज करवाई।
• कोर्ट पीन से कैश डिपॉजिट: पूरे मामले में बैंक ट्रांजैक्शन जज के खातों से हुए जबकि एक 5 लाख रुपये का नकद डिपॉजिट हरियाणा में तैनात कोर्ट के चपरासी के जरिए करवाया गया जिसे नौकरानी का पैसा बताया गया था।
• जमानत याचिका खारिज: अदालत ने आरोपी दीपक वत्स की जमानत याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया क्योंकि उसने जांच में सहयोग नहीं किया, अपने फोन का पासवर्ड नहीं दिया और 52 लाख रुपये से अधिक की रकम उसके खातों में पाई गई।
कानूनी और सामाज में बदनामी का डर
यह मामला केवल एक साइबर ठगी या हनीट्रैप का साधारण वाकया नहीं है बल्कि यह न्यायपालिका के नैतिक और प्रक्रियात्मक सिद्धांतों पर गंभीर सवाल खड़े करता है। अदालत ने अपने 24 पन्नों के आदेश में बहुत ही महत्वपूर्ण टिप्पणियां की हैं। कोर्ट ने माना कि एक न्यायिक अधिकारी के लिए हनीट्रैप जैसे जाल में फंसना बेहद व्यक्तिगत रूप से शर्मनाक और पेशेवर रूप से संवेदनशील हो सकता है लेकिन इस व्यक्तिगत असुविधा के कारण एक आपराधिक जांच की अखंडता और सच्चाई से समझौता नहीं किया जा सकता। कानून की नजर में हर नागरिक बराबर है और जब एक जज ही कानून के सामने सीधे आने के बजाय अप्रत्यक्ष रास्ता चुनती हैं तो इससे पूरी जांच प्रणाली धूमिल होती है।
इसके अलावा कोर्ट ने दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की जांच (IO) पर भी तीखी टिप्पणी की। जांच अधिकारी ने बिना किसी स्वतंत्र इलेक्ट्रॉनिक वेरिफिकेशन (जैसे टिंडर डेटा, व्हाट्सएप चैट या कॉल रिकॉर्ड की गहन जांच) के आंख मूंदकर नौकरानी की शिकायत को सच मान लिया जबकि डिजिटल मनी ट्रेल साफ तौर पर महिला जज के बैंक खातों की तरफ इशारा कर रहा था। आरोपी दीपक वत्स का आचरण भी पूरी तरह संदेहास्पद रहा; उसने व्हाट्सएप के केवल एकतरफा चैट पेश किए (जिसमें केवल जज के संदेश थे, उसके खुद के नहीं) और अपने फोन का पासवर्ड न देकर साक्ष्यों को छुपाने का प्रयास किया, जिसके कारण वह राहत का हकदार नहीं पाया गया
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