कुछ मामलों में जहां सरकारी कर्मचारी या पुलिस में शामिल कुछ अधिकारी के आतंकवादियों से कनेक्शन हों, तो वह सारी गुप्त जानकारियां पैसे या किसी लालच के बल पर उन्हें मुहैया कराता रहा है। यह काफी गंभीर मसला है।
जम्मू और कश्मीर में ऐसा ही एक मामला था, जिसमें पुलिसकर्मी को सीधे बर्खास्त कर दिया गया था। मामला अदालत में पहुंचा। फिर इसे जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने सही ठहराया। इसी दिलचस्प मामले के सभी कानूनी पहलुओं की जानकारी देंगे.. कि आखिर क्यों हाईकोर्ट ने पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी को सही ठहराया
पुलिस कांस्टेबल पर आतंकी संबंधों के क्या आरोप लगे थे
यह मामला जम्मू-कश्मीर पुलिस विभाग में ड्राइवर कांस्टेबल रहे गुलाम मोहम्मद से जुड़ा था। एक सैन्य ऑपरेशन के दौरान उस पर आरोप लगे कि उसने एक पाकिस्तानी आतंकी को शरण दी थी और उसकी कई तरह से सहायता करने में भूमिका निभाई थी। साल 2007 में उसे जम्मू-कश्मीर सरकार ने सेवा से बर्खास्त कर दिया था। इस कार्रवाई के खिलाफ मामला अदालत पहुंचा था।
बर्खास्तगी को अदालत ने सही माना, क्योंjam
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पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी में सरकार ने उस समय जम्मू-कश्मीर संविधान की धारा 126(2)(c) का उपयोग किया था, जो वर्तमान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311(2)(c) के समान मानी जाती है। इस प्रावधान के तहत कहा गया है कि राज्य सुरक्षा के हित में विभागीय जांच को छोड़ा जा सकता है।
- हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अनुच्छेद 311 सरकारी कर्मचारियों को मनमानी बर्खास्तगी से सुरक्षा देता है, लेकिन इसके कुछ अपवाद भी हैं। अनुच्छेद 311(2)(c) ऐसा ही एक अपवाद है।
- पुलिस कांस्टेबल की सेवा समाप्ति को वैध ठहराते हुए कहा है कि राज्य की सुरक्षा से जुड़े मामलों में सरकार को असाधारण संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करने का अधिकार है।
- यदि किसी कर्मचारी की गतिविधियां राज्य की सुरक्षा के लिए खतरा मानी जाती हैं, तो सरकार बिना नियमित विभागीय जांच कराए भी उसे सेवा से हटाने का निर्णय ले सकती है।
दरअसल , इस मामले को जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने जम्मू कश्मीर के संविधान के प्रावधानों के तहत देखा। जिसके तहत यदि राष्ट्रपति या राज्यपाल यह संतुष्ट हों कि राज्य की सुरक्षा के हित में विभागीय जांच कराना उचित नहीं है, तो कर्मचारी को बिना नियमित जांच के हटाया जा सकता है। गौरतलब करने वाली बात यहां यह है कि, तब जम्मू- कश्मीर को, भारतीय संविधान के तहत विशेष दर्जा हासिल था, उसका अपना संविधान था।
पुलिस अधिकारी की बर्खास्तगी में सरकार ने उस समय जम्मू-कश्मीर संविधान की धारा 126(2)(c) का उपयोग किया था, जो वर्तमान भारतीय संविधान के अनुच्छेद 311(2)(c) के समान मानी जाती है। इस प्रावधान के तहत कहा गया है कि राज्य सुरक्षा के हित में विभागीय जांच को छोड़ा जा सकता है।
कानून और न्यायिक निष्पक्षता की कसौटी पर पूरी तरह खरा फैसला
देखा जाए तो जम्मू कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट का फैसला कानून और न्यायिक निष्पक्षता की कसौटी पर पूरी तरह खरा उतरता है। पुलिस और सुरक्षा बलों के सदस्यों की जिम्मेदारी, सामान्य सरकारी कर्मचारियों से ज्यादा अहम हैं। सरकार और जनता द्वारा, उनसे उच्च स्तर की निष्ठा, अनुशासन और राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता की उम्मीद होती है। ऐसे में यदि किसी के भी आतंकवादी गतिविधियों से जुड़े होने या उनके प्रति सहानुभूति रखने के सबूत सामने आते हैं तो सरकार और फिर अदालत कड़ी कार्रवाई करने का अधिकार रखती है।
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